भारतकोश
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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

(५९)

कवीर पुरुष यक उहाँ छिपाये । सत्य पुरुष जग दास कहाये ॥ धाये चरण गहु अति सकुचायी । हे प्रभु हम परिचै अब पायी ॥ यह शोभा कस उहाँ छिपावा । कस नहिं जगमहँ प्रगट दिखावा ॥

सतगुरु वचन

धर्मनि जोवहि छवि जग जाऊ । तो होय विकल निरअन राऊ ॥ सब जीव तब मोहि लौलावे । उजरे भौ सब लोकहि आवै ॥ ताते गुप्त राखो जग भाऊ । शब्द सँदेश जीवन समुझाऊ ॥ शब्दपरखि चीन्हैं माहिं कोई । गहि प्रतीति घर पहुँचे सोई ॥ कहै कवीर सुनहुँ सुकृति हंसा । दरश पुरुष मिटेहु चित मंसा ॥ अब तुम्ह वेगि चला संसारा । जिवहि चेतावहु करहु पुकारा ॥

धर्मदास वचन

हो साहेब अब उहाँ न जाही । यह सुख घरतजि कहाँ झुराही ॥ वहि यम देश अपरबल काला । नहिं जानौधौ मति होयवेहाला ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तोहि चिन्ता नाहीं । तुमरे सङ्ग हम सदा रहाहीं ॥ तुम देखो सत्य लोक प्रभाऊ । हंसन कहो संदेश सुनाऊ ॥

धर्मदास वचन

मानेउँ शब्द शीश पर राखा । लैचलु अंश सुकृत तब भाषा ॥ छिन एक महँ जगहीं चलि आये । पैठि देह धर्मनि अकुलाये ॥ परेउ चरण गहि साहब केरा । करि बिनती पदगहि सुख हेरा ॥

छन्द-धन्य साहेब सतगुरु तुम सत्य पुरुष अनादि हो ॥ तुव अमितलीला कोलखै प्रभु सकल लोकके तुम आदिहो ॥ त्रिदेव मुनि सनकादि नारद कोईना लखि तुम पावई ॥ तेहि हंस भाग सराहिये जो नाम तुव लौ लावई ॥

(६०)

ज्ञानप्रकाश

दोहा-निर्गुण सर्गुण आदिहौं, अविगति अगम अथाह ॥

गुप्त भये जग महाँ फिरो, को तुव पावै थाह ॥

सोरठा-मोहि परचै तुम दीन्ह, ताते चीन्हैउँ तोहि प्रभु ॥

भये चरण लौलीन, दुचितार्ई सकलो गयी ॥

चौपाई

कीट ते भुंङ्ग मोहि प्रभुकीन्ह। निश्चलरंग आपनो दीन्ह। ॥

जिमिनिलते जग होय फुलेला। तिमिमोहिं भयोसमर्थपदमेला॥

पारस परसि लोहा जिमिहेमा। तिमि मोहिं भयउनाथव्रतनेमा॥

अगर परसि जिमिभयोसुवासा। जल प्रसंग बसन मल नासा ॥

सनपट शुद्ध सूत कहै न कोई। प्रभुगुण लखित शिरनावैलोई ॥

हे प्रभु तिमिमाहिं भयउ अनंदा। जिमिचकोरहरहितलखिचंदा ॥

जनम मरण भौ संशय नाशी। तवपद सुखनिधान सुखराशी ॥

हे प्रभु अस शिख दीजै मोहीं। एकौ पल न विसारौं तोहीं ॥

सतगुरु वचन

जस मनसा तस आगे आवै। कहै कवीर ईजा नहिं पावै ॥

धर्मनि गुरुहिं दोष देह प्रानी। आपु करहिंनर आपनहानी ॥

जो गुरु वचन कहै चित लाई। ब्यापै नाहिं ताहि दुचितार्ई ॥

जो गुरुचरन शिष्य संयोग। उपजै ज्ञान न नासै भ्रम रोगा ॥

जिमि सौदागर साहु मिलाहीं। पूँजि जोग बहु लाभ बढ़ाहीं ॥

सतगुरु साहु सन्त सौदागर। सजीशब्द गुरुयोगा बहुनागर ॥

जो गुरु शब्द कहै विश्वासा। गुरु पूरा पुरवहिं आसा ॥

विनु विश्वास पावै दुखचैला। गहै न निश्चय हृदय गुरुमेला ॥

सुत नारी तन मन धन जाई। तन जोरहै न प्रीति टढाई ॥

शूरा हंस सोई कहलावै। अग्नि रहै तो शोक न लावै ॥

जो विचलै तौ यम धरि खायी। अड़ा रहै तौ निज घर जायी ॥

हंसरहनीवर्णन

बोधसागर

(६१)

काल कसौटी ठहरे हँसा । कहैं कबीर सोइ सुकृत अंसा ॥ सत्य असत्य जानि किमि जायी । कादर विचलै सूर रहायी ॥ धर्मदास तोहि बहुत बुझावा । रहनि गहनि सतपन्थ बतावा ॥ बहुते बेर सिखायो तोही । देखौ अयश न पावै मोही ॥ बहुरि कोटि शिखापन तोही । देखहुँ कोइ हँसै ना मोही ॥

रहनी वर्णन

अभ्यागत जो आवे द्वारा । सन्त असन्त सोहि विचारा ॥ दीजै भिक्षा हरष सो ताहीं । एहि सम योग पुण्य तप नाहीं ॥

धर्मदास वचन

हे साहेब विनती एक करऊं । समरथ जानि पट उतर धरऊं ॥ हे प्रभु रंक होय कोइ दासा । जाय अभ्यागत ताहि अवासा ॥ ताके घर कछु सुकृत न होई । सो कस करै कहो प्रभु सोई ॥ सो कस करै कहौ प्रभुराई । केहि प्रकार तेहि सेवा लाई ॥

सत्गुरु वचन

मुनु धर्मनि पथ नीती भाखे । शक्ति अछत पुनि गोय न राखे ॥ तन बस्तर लै गोय न भाई । जब अशक्त तब काह कराई ॥ आप खाय तब ताहि खिआवै । नहि तो यक सम समय गँवावै ॥ तीरथ व्रत जप तप बहु करमा । काहे परै याहि निज धरमा ॥ कोटि तीर्थ भ्रमर फल पावै । सो फल भरहीं साधु जिवैं ॥ मानो गुरु साधुनका बानी । कह कबीर शब्द सहिदानी ॥ कहै कबीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम गहि मिटै उपाधू ॥ सत्यकवीर सत्यगुरु औ साधू । सत्यनाम कहैं सत्य अवराधू ॥ सत्य नाम गहि तजे दुचितार्ई । कहैं कवीर हम ताहि सहाई ॥ सत्यनाम कहैं चीन्हैं सोई । कहैं कवीर गुरु गम जेहि होई ॥ को हम को तुम को है अनन्ता । कहैं कबीर यह बूझैं सन्ता ॥

(६२)

ज्ञानप्रकाश

सोइ हम सोइ तुम सोइ अनन्ता । कहैं कबीर गुरु पारस सन्ता ॥ सन्त चेतु चित सतगुरु ध्याना । कहैं कबीर सद्गुरु परमाना ॥ सतगुरु शब्द ज्ञान गुरु पुंजा । कहैं कबीर लखु मोहनकुंजा ॥ कुंज मोहि मोहन ठहरावै । कहैं कबीर सोइ सन्त कहावै ॥ सन्त कहाय जो सोधै आपू । कहैं कबीर तेहि पुण्य न पापू ॥ पुण्य पाप नहि मान गुमाना । कहैं कबीर सो लोक समाना ॥ जिन्दा सुरदा चीन्है जीवा । कहैं कबीर सतगुरु निज पीवा ॥ सुरदा जग जिन्दा सतनामा । कहैं कबीर सतगुरु निज धामा ॥ यक जग जीतै यक जग हारै । कहैं कबीर गुरु काज सवैरै ॥

धर्मदास बचन

कौन जग जीतै कौन जग हारै । कहौ कौन विधि काज सवैरै ॥

सतगुरु बचन

इन्द्रिन जीते साधुन सो हारै । कहैं कबीर सतगुरु निस्तारै ॥ सतगुरु सो सत्यनाम लखावै । सतपुर लै हंसन पहुँचावै ॥ सत्यनाम सतगुरु तत भाखा । शब्द ग्रन्थ कथि गुप्तहि राखा ॥ सत्य शब्द गुरु गम पहिचाना । विनु जिभ्या करु अमृत पाना ॥ सत्य सुरति अम्मर सुख चीरा । अमी अंकका साजहु वीरा ॥ सोहं ओहं जावन वीरु । धर्मदास सो कहै कबीरु ॥ धरिहौ गोय कहिहौ जिन काहीं । नाद सुशील लखैहो ताहीं ॥ प्रथमहि नाद विन्द तब कीन्हा । मुक्ति पन्थ सो नाद गहि चीन्हा ॥ नाद सो शब्द पुरुष मुख बानी । गुरुमुख शब्द सो नाद बखानी ॥ पुरुष नाद सुत षोडश अहई । नाद पुत्र शिष्य शब्द जो लहई ॥ शब्द प्रतीति गहै जो हंसा । शब्द चालु जेहिसे मम बंशा ॥ शब्द चाल नाद दृढ़ गहई । यम शिर पगु देइ सो निस्तरई ॥ सुमिरण दया सेवा चित धरई । सत्यनाम गहि हंसा तरई ॥

पठित मूर्खका वर्णन

बोधसागर

(६३)

बिन्दो होय शब्द मम धावैँ । नाहबिन्दु दोउ मोहिँ पहुँ आवैँ ॥ नाद सखा जेहि अहँविगुरचे । अहँ रहित सो निज घर पहुँचे ॥ केते पढ़ि गुणि नर्कीहि जैहै । केते पढ़ि गणि लोक सिधैहै ॥

धर्मदास बचन

हो सद्गुरु मैं तुम्हारो दासा । विनती करौँ खसम तुव पासा ॥ पढ़े गुणै दुइदिशि किमिजाहीं । सो चरित्र वरणों मोहिँ पाहीं ॥

सतगुरु बचन

सुनु धर्मनि बहु पढ़ि अरथावै । शब्द कहै सो चालु न पावै ॥ पढ़ि गुणि नीति विचारे नाही । अस पढुआ सुनु नरकहिँ जाही ॥ जिन्ह पढ़िशब्दचाल गहिभाई । सुनु धर्मनि सो लोकहि जाई ॥ छन्द-जो कथत बकतौ तरे जग तो जग सबै तरि जायहो ॥ तजि तरुत सुलतान उबैर नृप कयों बनजाय हो ॥ तातै कहूँ निज समुझ पापी शब्द पढ़ि सतपद गहै ॥ जो सत्य पद निरखत चलै तो नहिँ फेरि जो नीवहै ॥ दोहा-सत्यनाम सुमिरण करै, सतगुरुपद निज ध्यान ॥ आतम पूजा जीव दया, लहै सो मुक्ति अमान ॥ सोरठा-सदगुरु कहै पुकारी, चाल चलै पथ निरखिके ॥ इंस होय भव पारि, शब्द गहन सदगुरु कृपा ॥

चोपाई

गुप्त भयो कहि शब्द प्रमाना । कालिंजर पुनि आय तुलाना ॥ कहैं कालिंजर विनै बडाई । देहु पान मोहिँ अहो गुसाई ॥ धर्मदास कहै देउँ परवाना । साहिब मोहि कह्यो सहिदाना ॥ कह कालिंजर सुनहुँ गोसाई । का सहिदान आहि तुव ठाई ॥ तब सहिदान कहा सुख बासा । सतगुरु बोल कीन्ह परगासा ॥ समय संयोग बोल सो कहेऊ । सुनि भौमौन मुगुध होई रहेऊ ॥ जात कमीना सुनत परायी । केहि कारण आरती लायी ॥

साधन वर्णन

(६४)

ज्ञानप्रकाश

औरहिँ और बुझा उन्ह भाई । पान नलीन्ह वैसहिँ चलिजाई ॥ तेहि गौनत प्रभु प्रगटे तुरन्ता । कला अमित को पावै अन्ता ॥ धर्मदास गहि चरणशिर नाथी । युगकर जोरि ठाढ़ भो जायी ॥ बैठे पुनि आज्ञा प्रभु पाई । विमुख जीव कर बात जनाई ॥

धर्मदास वचन

प्रभु विरतन्त कहो अब ताहीं । वह पान मुक्तिकै लीन्हेसि नाहीं ॥ मैं भाषेऊँ तुमरी सहि दाना । दुर्मति बूझेसि कहु आना ॥

सतगुरु वचन

धर्मनि उन्ह जोन पान नलीन्है । परिहैं कालमुख जायकमीने ॥ तजि रणभूमि टरै जो भाई । तेहि जीवहिं निश्चै यम ख ई ॥ वह यम चोर कालके हंस । धर्मराय धरि करै विध्वंसा ॥ धर्मदास तुम सुनहु हमारा । निशिदिनरहिहो नाम अधारा ॥ अब तुम आपन करहु विचारा । करिहहु निशिदिन ज्ञानविचारा ॥ दुष्ट मित्र सों प्रेम बढै हो । भक्ति भजन आनन्द रहै हो ॥

अर्थ—दुष्ट और मित्र दोनोंमें किसीसे राग द्वेष न रखकर समान प्रीति रखना सबकी भलाई चाहूँ किसीकी बुराई नहीं चाहना ॥

जो सुख होय तो जनि इतरैहौ । दुख परै तौ जनि विललैहौ ॥ संकट महाँ बहु साहब कीजै । निश्चल नाम ध्यान चित दीजै ॥ चित निश्चन्त रहै जो भाई । तो तेहि संकट जाय नसाई ॥ यह मम देश दोउ है भाई । दुख सुख तन धरि चारै आई ॥ चहिये साधुन नहि चित डोलावैँ । हठ प्रतीतिनाम गुरु गावैँ ॥ कच्चे जीवन कर यह लेखा । संकट परै विकल हिय पेखा ॥ सुख सम्पति धन पुत्र सगाई । यह सब सपना आहै भाई ॥ धर्मनि शूरा हंस जो होई । गन न दुख सुख एकौ सोई ॥ अरु घर झगरा निवेरेहु भाई । गुरु गमहि पन्थ कहौ उपाई ॥

समाप्ति

बोधसागर

(६५)

पाँचौ कै परपञ्च मिटावै । पाँच भूतकै स्वाद गँवावै ॥ नासा श्रवण रसना चक्षु इन्द्री । पाँचौ चोर काल मतिमन्द्री ॥ पाँचहु स्वाद विषयकी पूजा । गुरुगमिपन्थ परखहि तेहि दूजा ॥ चक्षु स्वाद रस रूप सलोना । राँचि रहै जग अकिलविलोना ॥ साधु चक्षु राते सतरूपा । गुरुपदनिरखत अकिल अनूपा ॥ श्रवण स्वाद रस गीत कवीता । मगन होई सुनु रसमत चीता ॥ सन्तन श्रवण स्वाद गुरु बानी । शब्द भजन पद सार समानी ॥ नासा वास सुवास अघाहीं । कुबास वासके निकटन जाहीं ॥ सन्त न लागे वास कुवासा । नाम विदेह जपै निःस्वासा ॥ रसना स्वाद षट्स रस मधुभोजन । तजे विलोना सुरस परोजन ॥ सन्त न स्वाद नाम रससारा । षट्स रस व्यंजन छार असारा ॥ निःइच्छित जो पहुँचे आई । सुरस व्यंजन प्रीति सोपाई ॥ इन्द्री स्वादु काम रति नेहा । नारी भोग रतन तजि देहा ॥ सत्य सुरति अनुराग समावे । निशिदिन प्रेमभक्ति चितलावे ॥ पाँचौ आहि प्रबल घट माहीं । मन राजा पाँचौ कर नाहीं ॥ सत्यगुरु ज्ञान मन धरि राखे । पाँच चोरसाधि सत्यसुखमाखे ॥ छन्द-धरि मनहि बाँधहु पाँच साधहु सारसतगुरु ज्ञानते ॥ यह देशहै यमराजको तरे सो विदेही नामते ॥ सतनामव्रतगहिशब्द हियधरि करहु सेवा तासु हो ॥ तत्त्वध्यान सतपदरूप स्थित होय अमर लोकैनिवासुहो ॥ दोहा-गुरु सुखशब्द प्रतीति करि, हर्ष शोक विसराय ॥ दया क्षमा सतशील गहि, अमरलोक को जाय ॥ सोरठा-वण्यौ ज्ञान प्रकार, धर्मदास सम्बोध मत ॥ कहै कवीर कवीर, जेहि मम शब्द प्रतीति दृढ ॥ इति श्री धर्मदास बोध ज्ञान प्रकाश समाप्तः ॥

इति श्री बोधसागरे धर्मदास बोधज्ञानप्रकाश वर्णनो नामप्रथमस्तत्रंगः ॥

नं. ४ कबीरसागर - ३

इति श्रीधर्मदासबोध ग्रन्थ ज्ञानप्रकाश समाप्त

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित

श्री-अमरसिंह बोध

A decorative horizontal line with a central diamond-shaped ornament, used as a section separator.

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन

बम्बई

श्रीमद्भगवद्गीता

संस्कृत भाषायां प्रथमः विभागः

सप्तमः अध्यायः

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता

१९९९

सत्य कबीराय नमः

बोधसागर

द्वितीयस्तत्रंगः

अमरसिंहबोध

धर्मदास वचन-बीपाई

धर्मदास उठि ठाढे भयऊ । दोउकर जोरि सो विनती कियऊ ॥ जुग जुग जीव चेताये ज्ञानी । कालफांस ते छुडाये आनी ॥ युगकमोद कीना जिव काजा । सोई तुम भाषि कहो निज साजा ॥ यमराजाते भये छुटारा । निर्भय हंसालोक सिधारा ॥

सतगुर वचन

धर्मदास मैं कहि समुझाऊँ । युगकमोदकी खबर सुनाऊँ ॥ जब हम इते पुरुषमें पाँही । तबकी बात कहू सब तोही ॥ युग परवान चाकरी भयऊ । युग जुग पंथपसारा कियऊ ॥ अर्बे खर्बेजिव असंख्य अपारा । सब उबार लाये पुरुष दरबारा ॥ रहे सब हंस पुरुषके पास । करते कुतूहल लोकनिवासा ॥ भूख प्यास निद्रा नहिं भाई । पुरुष ध्यानमें रहे समाई ॥ पुरुष दयाल दयाकरि भारी । षोडश रवि हंस उजियारी ॥ सेज पुष्प बनी अति भावन । सुख विनोद सब लोकसुहावन ॥ बैठे पुरुष सेजपर आयी । तत्क्षण ज्ञानी लिये बुलाई ॥ ज्ञानी तुम जाओ संसारा । जाइ करो अब हंस उबारा ॥ सिंगलद्वीप अमरपुर गामा । अमरसिंह राजा करनामा ॥ ताको अबे चेताओं जायी । चेतन अंश जग रहे खुलायी ॥

धर्मदास साहबका सद्गुरुसे युगकमोदका वृत्तान्त पूछना और सद्गुरुका उत्तर - राजा अमर सिंहकी कथा आरंभ

(७०)

अमरसिंह बोध

ज्ञानी वचन

ज्ञानी वचन कहै कर जोरी । सत्यपुरुषएक बिनती मोरी ॥ पुरुष मोहिं पठवो संसारा । कौन नामते हंस उबारा ॥ साखी-कौन नाम हंसन कहैं, कौन देऊँ कडिहार ॥ कौन नाम नारिन कहैं, जाते होई उबार ॥

चौपाई

कालफाँस जासे कटि जावे । सहजे हंसलोक महाँ आवे ॥ इतना बोल पुरुषसे पाऊँ । तब भवसागरमें चलिजाऊँ ॥

पुरुष वचन

अहो ज्ञानी वचन सुनि लेहू । मान सिखापन शिरपर देहू ॥ सब राह दिखाऊँ मैं तोही । उबरे हंसा अधिकारी सोई ॥ साखी-बालककू बीरा कहो, तिरिया कुटिल सनेह ॥ सुरतवंत कोयह शब्द है; पुरुष नाम निज लेह ॥

चौपाई

पुरुष हुकम दीना तेहि बारा । ज्ञानी वेग जाओ संसारा ॥ मूलनाम परवाना देहू । सकल जीव अपना करि लेहू ॥ ज्ञानी चले लोकते जबहीं । धर्म धीर मिले पुनि तबहीं ॥ देखत धर्मरायमनहिं संकाना । आपन हानि मनहिं अनुमाना ॥ ज्ञानी तुम सुनो वचन हमारा । काहेको आये तुम संसारा ॥ चौदा भुवन राज लिख दीना । अब काहेको चितवन कीना ॥ आहार यही हम कहैं दियऊ । पुरुषदया अब काहेकु कियऊ ॥ राज हमारो है संसारी । मुखदुःख जीवन देहुँ अपारी ॥ ब्रह्मा विष्णु मदेश कहाई । मेरे अंस जगमाँहि रहाई ॥ हमतो रहही शून्य मँझारी । गम नहिं पावे कोइ हमारी ॥ राज भार सब उनको दियेऊ । हम न्यारे होइ देखत रहेऊ ॥

कबीर साहबका अमर पुरीमें जाना और अमर सिंहका मिलना और कबीर साहबका गुप्त हो जाना फिर राजाकी विकलताका वर्णन

बोधसागर

(७१)

ज्ञानी तुम जाओ संसारा । वचन एक अब सुनो हमारा ॥ पुरुष वचनकी तुम कहैं लाजा । ता पाछे करियो जिव काजा ॥

ज्ञानी वचन

सुनहु वचन निरंजन राई । सबै बात मैं कहुं समुझाई ॥ कोटि ज्ञान हम तुम कहैं हारा । द्वादश पंथ चले संसारा ॥ ताते चलिहै आहार तुमारा । इतना वचन धर्म कहैं हारा ॥ धर्मदास सुनियो चित लाई । धर्मधीर ऐसा ठहराई ॥ तब हम आये यहि संसारा । जीवनकाज पृथ्वी पगु धारा ॥ अमरपुरी एक नगर रह्राई । सिंगलद्वीपके माँहि बसाई ॥ तहाँ आई हम कीन्ह पसारा । पहुँचे रायके महल मैझारा ॥ षोडश रविकी ज्योति पसारा । महलन मांही भयो उजियारा ॥ अमरसिंह राजाको नामा । लागी कचहरी बहु विधि धामा ॥ देख प्रकाश उठे तब राई । नृप धाये महलनमें आई ॥ आये महलमें सतगुरु पासा । सतगुरु चरण गहे विश्वासा ॥

अमरसिंह वचन

अहो संत एक विनती करिहो । पूछत वचन क्रोध जनि धरिहो ॥ कै तुम तीन देवनमें कोई । कै परब्रह्म तुम आये सोई ॥ और गम्य नहीं चलत हमारी । सो तुम वचन कहो निरवारी ॥

सतगुरु वचन

साखी—हम आये सतलोकसे, जीवन करन उबार ॥ कालफांस निवारके, ले जाऊँ लोक मैझार ॥

चौपाई

यह कहि गुप्त भये प्रभु राई । राव परे धरनी सुरझाई ॥ बिकल भये मुख आवे न बानी । तलफत मीन जैसे बिन पानी ॥ सतगुरु बिन तलफत नृप तैसे । स्वाँति बुंद बिन चात्रिक जैसे ॥

पांच दिन पीछे फिर कबीर साहबका राजा अमरसिंहको मिलना

(७२)

अमरसिंह बोध

छन्द चर्चरी

मोहि कहा जानि दरशन दिये प्रभु गुप्त पुनि काहे भये ॥ हग पलक देत बिलंब नाही कवन दिशि कहँवा गये ॥ हमहीं अभागी कीन्ह सतगुरु दरस देके छिप रहे ॥ कैसे धरूँ मन धीर तबलग दरश तुम ना देखिहे ॥

सोरठा-भये अभाग मुहि जान, दरश देहेके छिप रहे ॥

नहीं करूँ जलपान, जबलग दरश न देखहुँ ॥

चौपाई

दिवस पाँच तब ऐसे बीता । निपट राय उर बाढ़ी चींता ॥ सुनी खबर तब पंथ चलि आये । तिन राजाको आन उठाये ॥ ले झारी मुख मंजन कीना । संत चरण चितवहु विधिदीना ॥ सतगुरु दरश दिये तेहि वारा । महल मांहि कीनो उजियारा ॥ तहां जाइ जब ठाडे भयऊ । राजा चरण धाय तब गह्यऊ ॥ हमहि सनाथ किये प्रभुराई । हम निज सेवक तुमरे आई ॥

सतगुरु वचन

ज्ञानी कहे सुनो हो राई । यमफांसीते लेहों छुड़ाई ॥ सब जग परचो कालके फंदा । बहुविधि तिनको बांधे बंधा ॥ नेम धर्म कुल कर्म लगाये । ये फंदा सब जगत फँदाये ॥ जो कोइ हंसा होय सुभागी । काल फांसते बचिहै भागी ॥ धर्मकाल ताको नहि पावे । सुरति निरति ले शब्द समावे ॥ साखी-शब्द सुरत युग बांधई, कर्म भर्म दे छोर ॥ हंस गति जब आवई, कहा करे यम चोर ॥

अमरसिंह वचन-चौपाई

हे साहेब जो आयेसु पाऊँ । तो रानीको वचन सुनाऊँ ॥ अबके सतगुरु जाहु दुराई । तो हमकूँ नहि जीवत पाई ॥

रानीका साहबकी शरणमें आना और राजाको सत्यलोक देखना

बोधसागर

(७३)

सतगुरु वचन

सतगुरु कहे सुनो हो राई । भक्ति प्रेम बस कतहुँ न जाई॥ तत्क्षण राजा चलिभे जबहीं । सात खण्डपर पहुँचे तबहीं ॥ सुस्वरकला रानि तहाँ रहेऊ । तासों राय वचन एक कहेऊ ॥ सुनो रानी एक वचन हमारा । अपने जीवका करौ उवारा ॥ साखी-राजा रानीसों कहै, मानो वचन हमार ॥ साहेब आये लोकसे, चरन सोगहो सम्हार ॥

रानी वचन-चौपाई

रानी कहै सुनो हो राजा । विलख वदन आये केहि काजा ॥ केहि कारन आये तुम खरारी । हमसे वचन कहो निरुवारी ॥

राजा वचन

रानी तुमसों कहूँ हवाला । जो सतगुरुने दीनो प्याला ॥ एक दिना लीला अस कियेऊ । महलनमें उजियारा भयेऊ ॥ तब हम तत्क्षण धाये जबहीं । महलन बीच पहुँचे तबहीं ॥ दरशन पाये भयउ अनन्दा । बारहिँ बार चरण गहि वंदा ॥ पलक ओट प्रभु गये विलायी । चार दिवस परे धरनि सुरझाई ॥ प्रोहित विप्र सब आये जबहीं । कहे समुझाइ हमकूँ तबहीं ॥ बनिया मोदी सगरे धाये । छीया सेठ चौधरी आये ॥ भाई भतीजे परजा धाई । काहे राय मरत हो भाई ॥ सबे मिलि आनिउठाये जबहीं । ले झारी भर दीना तबहीं ॥ ले झारी मुख धोवंत भयऊ । साहेब दरश बेगि तब दयऊ ॥ दरश पाय मैं भयउ सनाथा । रानी सत्य कहत हौं बाता ॥

रानी वचन

राजा बात कहत हौं तोही । सत्य कहूँ जो मानो मोही ॥ अब तुम बात कहत हो नीका । तेहि पाछे पुनिलागे नहि फीका ॥

(७४)

अमरसिंह बोध

राजा बात कहीहौ आछी । पाछे जगमें होय न हाँसी ॥

राजा वचन

रानी मानो कहा हमारा । साहेब चरण बेगि चितधारा ॥ धन जौवन तनरंग पतंगा । छिनमें छार होत है अंगा ॥ तुरत मान जो रानी लीना । संत दरश कामिनि जो कीना ॥ हाथ नारियल आरति लीना । सात खंडसे उतर पग दीना ॥ सात सहेली संग लगी जबहीं । स्वरकला पुनि उतरी तबहीं ॥ सब उमराव बैठे दरबारा । रानी आइ बाहिर पग धारा ॥ तब उमराव उठे भहराई । स्वरकला कस अचरज लाई ॥ रानी कबहु न देखी भाई । सो रानी कस बाहेर आई ॥ गजमोतिन से पूरे मांगा । लाल हिरा पुनि दमके आंगा ॥ आधा मस्तक कीन्ह उघारा । मानिक दमके झलाहलपारा ॥ तब रानी सतगुरु पहुँ आई । नारियल भेट जो आनचढ़ाई ॥ रानी थाल हाथमें लियऊ । करत निछावर आरतिकियऊ ॥ साखी-रानी ठाड़ि मैदानमें, सुनो संत धर्मदास ॥ सुरजकिरन अरु रानिको, एकही भयो प्रकाश ॥

चौपाई

लगिचकाचौधि अधिक पुनि जबहीं । देखि न जाय रानी तन तबहीं ॥ राजा रानी दंडवत कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदयमें चीन्हा ॥ दोउ कर जोरि राय भयो ठाढा । उपज्यो प्रेम हृदय अति गाढा ॥ साहेब हमपर दया जो कीजै । भुवन हमारे पांव जो दीजै ॥ तबहीं हम मंदिर महाँ आये । पलंग बिछाय तहाँ बैठाये ॥ झारी भर तब राजा लीना । चरनामृतकी युक्ति कीना ॥ राजा ऊपरते डारत पानी । चरण पखारे स्वरकला रानी ॥ चरण पखारि अँगोछा लीना । जैसी भाव भक्ति उन कीना ॥

बोधसागर

(७५)

चरणामृत तब शीश चढावा । लेचरणामृत बहु विनती लावा ॥ जैसी भक्ति राव जो पावा । धरमदास तोहि बरनिसुनावा ॥

धर्मदास वचन

और कहो राजाकी करनी । सो साहेब तुम भाखो वरनी ॥

सतगुरु वचन

तुरतहि तब सब साज बनावा । हमको सो अस्नान करावा ॥ हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनेउ सार धरे दोड थारा ॥ अधर थार भूमिते रहई । रानी तबहीं चितवन करई ॥ रानी कहे रायसों तबहीं । लीला निरखो गुरुकी अबहीं ॥ अधर अग्र जिनका पनवारा । महा प्रसादते आइ अपारा ॥ नर नारी तब ठाढे भय आई । महा प्रसाद अब देहु गुसाई ॥ तब हम दीनेउ तहां प्रसादा । पाय प्रसाद भई तब यादा ॥ पुरुषलोककी भई सुधि तबहीं । ज्ञानी आय चेताये भलहीं ॥ हम भूले तुम लीन चेताई । फिरि न विगोवे आइ यमराई ॥ या यम देश कठिन है फांसी । काम क्रोध मद लोभविनाशी ॥ साखी-काम क्रोध अरु लोभ यह, त्रिगुन बसे मन माहि ॥ सत्य नाम पाये विना, जमते छुटको नाहि ॥

चौपाई

श्रवन लागिनिलाम सुनाई । तुरत राय कह चले लिवाई ॥ पहुँचे जाय सुमेर पहारारा । पुर बैकुंठ रच्यो जेहि ठारा ॥ जय विजय जो तहां रहेऊ । तेहि साहेबको देखत भयेऊ ॥ देखत पौरिया ठाडे भयऊ । आदर करि साहेबको लयऊ ॥ कहे पौरिया विनती लाई । भूपति लोक कहाँको जाई ॥ तब हम पौरियन सो कहेऊ । एक जिव सत्यनाम जो गहेऊ ॥

१ इरे !

(७६)

अमरसिंह बोध

पुर वैकुंठ दिखायो चाहीं । ताते हम आये यहि ठाहीं ॥ तहाँते हम चले रिगई । पहुँचे चित्रगुप्तके ठाई ॥ लगयो दरबार चित्रको जहँवा । पुण्य पापको निबेरो तहँवा ॥ देखि साहेबको ठाडे भयऊ । हाथ जोरिके बिनती कियऊ ॥ डार सिंघासन बैठक दीना । तब साहेब सो बिनती कीना ॥ धन्य आजबड भाग्य हमारा । साहेब आये इहाँ पग धारा ॥ आये गुप्त साहेबके पास । विनति करत बहुभये उदासा ॥ हे साहेब हम पूछत तुमपै । कह लाये भूपन कहु हमपै ॥ यह तो हमरो चोर कहाई । अधम पापि राजा यह आई ॥ तब साहेब गुप्तसे कहेऊ । लीखनी तुमारी देहि चुकोई ॥ यह सुनि गुप्तते रेसियाना । हमरी लिखाई बाद बखाना ॥ गुप्त कर्म करे नर कोई । सो निज चोर हमारा होई ॥ सारखी-प्रकट करम जो करहिं नर, सोई चित्र लिख लेहूँ ॥ भूपतिलोक कहावहीं, पाप पुन्य कर येहु ॥

चोपाई

तब साहेब एक जुगति बनाई । पारसपथरी तहाँ दिखाई ॥ अनेक कर्मसे लोहा भरिया । पारस भेटत कंचन करिया ॥ साहेब गुप्तसे कहे समुझाई । इनकू लोहा करो रे भाई ॥ लोहासे जो कंचन कियेऊ । यहि विधि हंसा निरमल भयऊ ॥ इतनी सुनि यम भये अधीना । फेर न तिनसे बोलन कीना ॥ अहो जमराय वचन सुनु मोरा । कही करो तो करहु चोरा ॥ राजाकू ले जाओ भाई । इनकू यमपुरी लाओ दिखाई ॥ तबयमराज हुकुम करिदीयऊ । दूत दोय राज संग गयऊ ॥

१ चित्रगुप्त ।

नरकका वर्णन

बोधसागर

(७७)

दूत रायको चले लिवाई । पहुँचे जाय यमपुरी मांही ॥ त्रास जीवको देतहै जहँवा । देखत राजा मन पछितावा ॥

नरकको वर्णन

एक तो कोल्हू मांहि पिराई । ऊंधे मस्तक एक झुलाई ॥ एक तो बांध खंभसू ताते । चीसे देत बहुतही भांते ॥ एक जीवको खात चवाई । भागत फिरे वचत नहिं भाई ॥ एक जीव कुंडमहिं डारा । मोगरी झिरपै मारे अपारा ॥ कुंड चौरासी बने है ति भाई । भांति भांति यम त्रास दिखाई ॥ ऐसे त्रास जीवनको दियऊ । देखत राजा व्याकुल भयऊ ॥ एक कुंड तो रुधिर भराई । दूजा कुंड तो पीब कहाई ॥ त्रीजो कुंड हि सूत्र भराई । योजन एक ताकि गहराई ॥ योजन चारकी है चकराई । योजन चार लगि गन्ध उडाई ॥ परे जीव ता मांहि अपारा । चौथा कुंड नरककी धारा ॥

साखी-परे जीव ता कुंडमें, कोइ अब हमहिं उबार ॥ मारत मोगरी शीरपर, बहुतहिं करत पुकार ॥

चौथाई

पांचैं कुंड सो अग्नि कहाई । बहुत जीव तहँ जरहीं भाई ॥ योजन लक्ष है ता गहिराई । पांच लक्षकी है चकराई ॥ करत पुकार तहँ जीव अपारा । यहि अवसर को उहमहिं उबारा ॥ राजा यमपुरी देखि बनाई । कहत न बने रहे शिरनाई ॥ झूठी वचन कहत है जोई । जीभ्या काटिलेत पुनि सोई ॥ झूठी बांह देखाई जो कबही । काटे बांह यम टूंठा करही ॥ झूठी साख भरे जो भाई । विषधर ताके जीभ लगाई ॥

१ अच्छी तरहसे ।

(७८)

अमरसिंह बोध

बिन अपराध मारे जो कोई । बहुत मार तेहि ऊपर होई ॥ स्वपुरुषतजिपरपुरुषसंगजावे । अगिनपुरुष तेहिसंग मिलावे ॥ पुरुष होय नारी कहैं त्यागे । नारी और सो मन जो लागे ॥ अग्निनारि तेहिसंग मिलावैं । यहि विधिजीवनत्रास दिखावैं ॥ एक एकको त्रास दिखावैं । हाथ छूरी ले कण्ठ चलावैं ॥ एक जीवको ठाडे कीना । काग गीधकोहुकमकरि दीना ॥ काग गीध नोचत हैं भाई । भागत फिरे त्रास अधिकाई ॥ जे नर नारी मदिरा पावैं । तत्त तेल पुनि ताहि पिलावैं ॥ संत साधुकी निंदा करई । जूठी साख पंचमें भरई ॥ ताको फल पावत है सोई । सब अँगमें कुछ पुनि होई ॥ ऐसी यमपुरी देखी बनाई । देखत राजा मन पछताई ॥

साखी-देखी राजा यमपुरी, मनमें भये हुशियार ॥ साहेबसो विनती करे, हमको लेउ उबार ॥

चौपाई

नृप अरु दूत पहुँचे तहवाँ । चित्रगुप्तको दरबार रहै जहवाँ ॥ जहाँ बिराजे ज्ञानी सिंहासन । गहे चरण तहाँ नृपति ततक्षण ॥

राजा बचन

तब राय चरण परस्यो आयी । अबकी साहेब लेहु बचाई ॥ यह यम देश कठिन है गांसी । सुरनर सुनि परे यमफांसी ॥

साखी-सुनि कथा जब नरककी, धर्मदासभय मान ॥ सतगुरु सो कहने लगे, औरौ कहहु बयान ॥

सतगुरु बचन-चौपाई

कहैं कवीर सुनो धर्मदासा । नरक वृत्तान्त करौ परकासा ॥ धर्मराय अस बाजी लावा । पाप पुण्य दोउ कीन उपावा ॥