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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ज्ञानीजीका संसारमें आना और गरुड़से भेंट होना

( ६६ )

गरुड बोध

तब साहब मोहि दाय़ा कीन्ह़ा । बचन मानिहम शिरपर लीन्ह़ा॥ करि प्रणाम परदक्षिण कीन्ह़ा । पाछे जगहिं पयाना दीन्ह़ा ॥ यही भौंति धर्मनि जग आवा । बहुत भौंतिते जिव समझावा॥ प्रथम गरुडसे भेंट जब भयऊ । सत्य नाम कह बोल सुनयऊ॥ धर्मदास सुनु कह्यो बुझायी । जेहि विधिसे ताही समझायी ॥

गरुड वचन

शीश नाइ तिन पूछा भाये । हौ तुम कौन कहाँसे आये ॥ कौन दिशा ते तुम चलि आऊ । अपनो नाम कही समझाऊ ॥

ज्ञानी वचन

कह ज्ञानी है नाम हमारा । दीक्षा देन आयऊ संसारा ॥ सत्यलोक से हम चलि आये । जीव छुडावन जग महाँ आये ॥ सत्यपुरुष मोहि आज्ञा दीन्ह़ा । सत्य शब्द हम लेइ तब लीन्ह़ा ॥

गरुड वचन

सुनत गरुड़ अचम्भो माना । सत्य पुरुष आही को आना॥ प्रत्यक्ष देव कृष्ण कहावैं । दश औतार सो धरि धरि आवैं॥

ज्ञानी वचन

तब हम कहा सुनहु तुम स्याना । सत्य पुरुष तुम नहिं पहिचाना॥ अवतारन का कहो विचारा । इतने साहब रहै नियारा ॥ जाकर कीन्ह सकल विस्तारा । सो साहब नहिं जग औतारा ॥ योनी संकट वह नहिं आवे । वह तो साहब अछय रहावे ॥ जहाँ लगे जो जगमें आये । तहाँ लगि सबही अंश कहाये॥

साखी-ताते साहब अछय है, तीन लोक सों न्यार । योनि संकट ना आवई, ना वह लेइ औतार ॥

गरुड वचन-चौपाई

तबही गरुड जो बोलहिं बानी । कौने देश बसन है ज्ञानी ॥ हम बाहन हैं कृष्ण के भाई । तिनकी गति तुमहू नहिं पाई ॥

गरुड़का श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना

बोधसागर

( ६७ )

तीनि लोकके ठाकुर आही । तिनके आगे कौनको शाही ॥ तीनि लोकके ठाकुर कहिये । तिनके और कौनको गहिये ॥ सोई मोहि अब देहु बतायी । मोरे मन चिंता समुहायी ॥ दूसर कौन सो देहु बतायी । हमरे मन गुमान नहिं आयी ॥

ज्ञानी वचन

सुनहु गरुड यक वचन हमारा । वह साहब है सबसे न्यारा ॥ यह तो सबै ईश्वरी माया । उपजहिं विनसहिं बहुरि विलाया ॥ वह नहिं आवे नहीं जाहीं । वह तो सदा अजर घरमाहीं ॥ उनकी आज्ञा इन पर आवें । तब इन गरभ वास सो पावें ॥ तुम पर सदा कृष्ण असवारी । काहे न दाय़ा करहिं विचारी ॥ हम तो शब्द संदेशी आये । योनी संकट नहिं निरमाये ॥ तब हम उसको तत्त्व लखावा । होइ विदेह तब वचन सुनावा ॥

गरुड वचन

तबही गरुडे अस्तुति ठानी । तुम साहिब निर्गुण सहिदानी ॥ तुमहो प्रभू सगुण ते न्यारा । निर्गुण तत्त्व साहिब विस्तारा ॥ धरि अस्थूल मोहि दरश दिखावा । निर्गुण शब्द प्रभु मोहि सुनावा ॥ अब गुरु मैं बन्दों तब पायो । अब जाना प्रभु तुम्हरो भायो ॥ निज प्रतीति हमरे मन आऊ । हंसराज मोहि दरश दिखाऊ ॥ अब प्रभु मोहीं दर्शन दीजे । हंस उबार आपन करि लीजे ॥ भेद तुम्हार सकल मैं पाया । धरि स्वरूप तुम दरश दिखाया ॥

ज्ञानी वचन

देह धरी हम दरशन दीना । तब उन चरणबन्दना कीन्हा ॥

गरुड वचन

शीश नाइ चरणन लपटाये । अब साहब मोहिं लेहु बचाये ॥ सार्वी-निर्गुण प्राण अधार तुम, दरश दीन्ह प्रभु आय । आपन करि समझावहु, लेहु जीव मुकुताय ॥

गरुड़का ज्ञानीजीके आधीन होना

( ६८ )

गरुडबोध

ज्ञानी वचन—चौपाई

अहो गरुड तुम चीन्हा भाई । दे परवान लेऊँ मुकुतार्ई ॥ बाहर भीतर सबै बताओं । तुमसों गरुड कछू न छिपाओं ॥ अब तुम जाहु कृष्णके पास । आज्ञा मानिके करहु विलासा ॥ आज्ञा मांगि कृष्णसे आओ । तब आरति विस्तार बनाओ ॥ तबही गरुड गये पुनि तहवों । श्रीकृष्ण बैठे रहे जहवों ॥ जाइ गरुड तब विन्ती लाई ।

गरुड वचन श्रीकृष्ण प्रति

तुम प्रभु सदा संत सुखदाई ॥ हम यक निर्गुण भेद जो पाया । ताका हम प्रभु विन्ती लाया ॥ ओय कबीर सत्यलोकसे आये । तिन मोहि भेद कही समझाये ॥ उन अन्तर नहिं ऐसो दिढावा । निज साहब नहिं पृथ्वी आवा ॥ नाम कबीर उन आप धराया । यह शब्द उनही भाष सुनाया ॥ निर्गुण भेद सबनते न्यारा । अस उन हमसो कीन्ह पुकारा ॥ जो मोहि आज्ञा करो गुसाई । तौ उनको गुरु करिये जाई ॥ दाया करि मोहि आज्ञा दीजै । सो हममानि अपन फिर लीजै ॥

श्रीकृष्ण वचन

सुनिके कृष्ण उतर तब दीन्हा । भले गरुड तुम उनको चीन्हा ॥ भले गरुड तुम पूछा आयी । दुविधा दुर्मति कपट नशायी ॥ जो यह भेद गुप्त करि रखते । हमसों तुमसों अन्तर पढ़ते ॥ जो तुम हमसों पूछो भाई । उनकर भेद है अगम उपाई ॥ वह निर्गुण हम सर्गुण भाई । निर्गुण सर्गुण बहु बीच रहाई ॥ हम सर्गुण कई बार औतारा । वह साहिब है सबते न्यारा ॥ जाकर पठाये वह यहाँ आये । तिनही पुनि हम कहँ निर्माये ॥ उन आज्ञा जब कीन्ह उचारा । तब हम लीन जोइनि औतारा ॥ जो कबीर अहहीं अर्थाई । सोई वचन सत्य है भाई ॥

बोधसागर

( ६९ )

गरुड वचन

गरुड कहे तब काहे न भाषा । कैसे मोहि छिपाइके राखा ॥ निर्गुण भेद प्रभु मोहि छिपायी । सगुण भेद दीन्हा फैलायी ॥

श्रीकृष्ण वचन

सुनो गरुड यक शब्द निदाना । निर्गुण भेद कोइ विरले जाना ॥ देह धरी हम क्रीडा कीन्हा । यहै मानि सब काहु लीन्हा ॥ हम गीता महँ सन्धि जनाई । ताको कोइ न चीन्हे भाई ॥ निर्भय भक्ति कह्यो परमाना । ताकर भेद काहु नहि जाना ॥ पठि गीता पण्डित बौराये । अर्थ भेद को गम नहि पाये ॥ पठि गीता औरहि समुझावे । आप भरममें जन्म गमावे ॥ करै अचार छूतिकै माने । औरनको हीनहि करि जाने ॥ सर्वमयी हमहीं सब माहीं । पण्डित अँधरे समुझत नाहीं ॥ हम सबमें सब हमरे माहीं । हमते भिन्न कोइ जानत नाहीं ॥ करै सो कौन अचार बिचारा । पण्डित भूले धरि हँकारा ॥ सर्वमयी है नाम हमारा । पण्डित अर्थ न करै विचारा ॥ कहि गीता हम सब समझायी । गीता पढ़ै समुझि नहि जायी ॥ कब हम पूजा नेम बतावा । कब हम जीव घात फरमावा ॥ ब्रह्मा विष्णु और शिव कहवाये । इन तीनों मिलि बाजी लाये ॥ तेहि बाजी अटका सब कोई । निर्गुण गमि कैसे के होई ॥ बाजी लायके जग भरमाया । निर्गुणकी गति काहु न पाया ॥ जो जो कछु हम कहा उधारी । सो काहु नहि दृष्टि निहारी ॥ हम जानहि सब भेद अवगाहा । और देव नहि पावहि थाहा ॥ ब्रह्मा विष्णु शिव बाजी लाये । उन काहु नहि और सुहाये ॥ अपस्वारथसों बहुविधि लीन्हा । परमारथ काहु नहि चीन्हा ॥ गीता मथी कही समझायी । सो अर्जुन नहि जानी भाई ॥ चारि वेद मथि गीता कही । सो अर्जुन निज मानी सही ॥

श्रीकृष्णका गरुड़को कबीर साहबको गुरु बनानेकी आज्ञा देना

( ७० )

गङ्गबोध

श्रवण लगाय गीता उन सुनी । रहनि गहनि एको नहिं गुनी ॥ रहनि गहनि उनहुँ नहिं पायी । अर्थ सुनी सब कान उडायी ॥ सुनि सुनिसो सब जग अरुझावे । सांचा भेद न कोई पावे ॥ उनहुँ अचार विचार न छूटा । ब्रह्मा विनशे यम सो लूटा ॥ श्रवण अवाज सबहिंकी लीन्हे । रहनी गहनी कोइ न चीन्हे ॥ अहमेव कीन्हो अधिकारा । ताते जाहि गले सोहि मारा ॥ करै विचार पाखण्ड छूटे । भर्म विगुर्चन यमकी लूटे ॥ पण्डित बाँचि गीता अथावे । गीता केर अर्थ नहिं पावे ॥ फिर फिर हमहीं को ठहरावे । पंडित अँधरा भेद न पावे ॥ सुनहु गुरुड यक शब्द हमारा । होय निर्गुण जिव केर उवारा ॥ हम कबीर कै निज करिजाना । उनहीं सकल कीन मण्डाना ॥ उन्ही सब अस्थान हटाया । जहाँ ले तीर्थ तिन सबहि गढाया ॥ जहाँ जहाँ उन चरण छुआया । सोइ सोइ तीर्थ अस्थान बनाया ॥ आपु जानिके चर्ण जो दीन्हा । यहि विधि सबको थापन कीन्हा ॥ वही मानि सब काहु लीना । आप गुप्त होय काहु न चीना ॥ इन सबही मिलि बाजी लायी । आप आपकी कीन बढाई ॥ जिनकी आज्ञा सब कछु भयऊ । तिनको छिपाये तीनों दयऊ ॥

सारखी-कहैं कृष्ण कबीरसों, गुरु तुम करो कबीर ।

हंस लै जइहैं लोक के, खेइ लंगैहैं तीर ॥

चौपाई

चरण टेकिके गुरुड रिगायी । कीन्हो भेंट द्वारका जायी ॥ वृन्दावन होय आज्ञा लीन्हा । दर्शन जाइ द्वारका कीन्हा ॥ चरण टेकि प्रदक्षिण दीन्हा । मस्तक नाइ बन्दगी कीन्हा ॥ समरथ कहो मोहि समझायी । आरति साज मैं लेउँ मैगायी ॥ तब हम उनपै पूछे लीन्हा । कहो कृष्ण आज्ञा कस कीन्हा ॥

गरुड़का आरतीका साज इकट्ठा करना

बाधसागर

( ७१ )

गरुड वचन

तबही गरुड कह्यो अर्थाई । अस्तुति कीन्ह बहुत लौ लाई॥ एको बात गोंय नहीं राखी । कृष्ण बहुत कै अस्तुति भाखी॥ निर्गुण के हम गम्य न जाना । बहुत भाँति उन गम्य बखाना॥ उनतो निर्गुण गम्य बतावा । ब्रह्मा विष्णु शिव पार न पावा॥ औ हम उन कहँदल जो दीन्ह। उन आवे की आज्ञा कीन्ह। ॥

सत्गुरु वचन

तब हम उनको भेद बतावा । एकोत्तर से नरियर फरमावा ॥ बहुत जतन कै मंडप छावा । बहु अतुरागी साज सजावा ॥ जेतके साधु द्वारका आया । सबको गरुड कानि बुलवाया ॥ जेतिक साधू तहाँ रहाये । गरुड सबहिंको दल पहुँचाये ॥ जहाँ ले सुनि हैं सहस अठासी । नाग लोकके नाग जो वासी ॥ वासुकि देव जो आपु रहाये । औरो नाग बहुत चलि आये ॥ आय विष्णु ब्रह्मा दोउ भाई । शीव आय बहु तेज जनाई ॥ सब पर तेज महादेव कीन्ह। तुम सब मिलिके गरुडहि चीन्ह। ॥ तबहि गरुड पूछा सहिदानी । जोई कृष्ण कहा मोहि बानी ॥

गरुड वचन

सुनहु ब्रह्मा विष्णु मदेशा । यह मुहि कृष्ण कहा उपदेशा ॥ एति समय बीति जब जायी । तब हम तुमसों कहब बुझायी ॥ जोइ कृष्ण सब कहा विवेकी । सो तुम्हरी मति आँखिन देखी ॥

महादेव वचन

यह सुनि महादेव रिसियाने । हमरी गति तुम काहु न जाने ॥ हम तीनों हैं त्रिभुवन राई । हमहीं छोड़ि अवर चित लाई ॥ तुम हैं पंछी मतिके हीना । हमहिंछोड़ि औरहिं चित दीना ॥

महादेवका बोध करना और गरुड़का उन्हें समझाना

( ७२ )

गरुडबोध

गरुड वचन

तबही गरुड कहे समझायी । मति हमारि कोइ विरले पायी॥ अजर अमर घर पहुँचे सोई । मती हमार लखै जो कोई ॥ अवसर वीति जबै यह जायी । तब महादेव हम कहब बुझायी॥ सब साधुन की करिये सेवा । यह निज आहि भक्तिको भेवा॥ सबको गरुड जो भोजन दीन्हा । बहुत यतनकै भक्ति सो कीन्हा॥ करि प्रसाद जब माँड मैडायी । हमसे पूछी विन्ती लायी ॥ तबहि गरुड विन्ती अनुसारी । चलिये समरथ चौक विस्तारी॥ धर्मदास सुनि चौका कीन्हा । लोक समान पयाना दीन्हा ॥ संत समाज सब गावहिं गाजी । ऐसी भक्ति भक्त भल साजी ॥ बजो शंख वीन स्वर सोई । झांझन केरी बाजन होई ॥ ताल मृदंग गगन सो बाजै । ऐसी भक्ति भक्त भल छाजै ॥ शब्द स्वरूप तबै हम भयऊ । तुरत जाइ सत्यलोकहि गयऊ॥ सकलो साज वहां ते आना । बहुत भाँतिकी भक्ति जो ठाना ॥ सत्यलोक ते उतरे अंशा । अधम कालका भया विध्वंशा॥ सब समेत साज जो आये । जग मग ज्योति बरनिनहिं जाये निर्गुण भक्त हो सुरति संजोई । कौतुक देखि रहे सब कोई ॥ नाग लोक को कीना मोही । ऐसी भक्ति न देखी कोही ॥ शेषनाग भये आपु मोहाने । औरकी बातें काहि बखाने ॥ मोहे ब्रह्मा विष्णु महेशा । नारद मोहे शुकदेव शेशा ॥ गण गंधर्व मोहे सब झारी । निर्गुण भक्ति न परे विचारी ॥ मोहे कृष्ण द्वारका वासी । मोहे सकल सिद्ध चौरासी ॥ यह समाज सो कैसो आई । ताहि देखि सब रहैं झँवाई ॥ ताते रंग उठे ततकारी । मोहि रहे सब सभा विचारी ॥ मोहे विष्णु वैकुण्ठके वासी । मोहे इन्द्र रुद्र लोक कैलासी ॥

गरुड़की आरतीमें सब देवोंका आना और गरुड़का परवाना लेना

बोधसागर

( ७३ )

मोहे इन्द्र और उरवशी । नौ लख तारा सूरज शशी ॥ यहि विधि कीन्ह भक्ति मनलायी । तनमन सुधि सकलौ बिसरायी ॥

साखी-तेतीस कोटि देवता, गण गन्धर्व सब झार । सुर असुर सबही थके, लीला नाम अपार ॥

चौपाई

धन्य धन्य सब करहिं पुकारा । धन्य गुरुडजी ध्यान तुम्हारा ॥ धन्य कबीर जिन भक्त उधारा । भक्ति ज्ञान का कीन पसारा ॥ धन्य गुरुड सबही अस कीन्हा । ऐसी भक्ति हृदय चित दीन्हा ॥ भक्ति मंडान पहर दोय भयऊ । तहैं हम उठिके आरति कियऊ ॥ आरति भइ पुनि बहुते भांती । बरणि न जाय शोभाकी कांती ॥ एकोतर नरियर मालुम कीन्हो । बाँटि प्रसाद सबनको दीन्हो ॥ सत्य सत्य सबन मिलि कीन्हा । धन्य गुरुड तुम यह मति लीन्हा ॥

गुरुड वचन

विन्ती करै गुरुड चित लायी । सबसे करब हम चर्चा जायी ॥ दया करहु हम पैं गुरु देवा । तीनों देव सो कहिहो भेवा ॥ हम तो चरचा करब गुसाई । हमको दो लखाइ सब ठाई ॥

ज्ञानी वचन

अहो गुरुड तुम हौ बड ज्ञानी । विद्या देहु सब घरके जानी ॥ घर आयेसे राड न कीजै । क्षमावंत हो बिदा सब कीजै ॥ बिदा देहु सबही सावधाना । तिनके घर तुम करिहो ज्ञाना ॥ अस्तुति ठानि चले सब देवा । धन्य कबीर देवनके देवा ॥

साखी-कहैं कबीर धर्मदाससे, यहि विधि आज्ञा लीन ।

अपने अपने लोक को, सबही प्याना कीन ॥

चौपाई

सबको बिदा जबहि करि दीन्हा । तबहिं गुरुड अस कहबे लीन्हा ॥

गरुड़का त्रिदेवसे चर्चा करने जाना

( ७४ )

गरुडबोध

गरुड वचन

हमको हुक्म तुम देहु गुसाईं । तुव प्रताप करौं बडाईं ॥ तुमरी कृपा काल हम जीता । सबही भांति छुटी मन चीता ॥ तुमरी दया आश सब झूटी । भया निराश तब फन्द़ा टूटी॥ अब मनमें मोहीं यक आवै । चरचा करनकौ मनमें भावै ॥ जो आज्ञा हम तुम तुमरी पावै । फिरि सर्बहिं सो चर्चा लावै॥ त्री देवन सों कहूँ बुझायी । तिन कर फँद सब देहुँ तुडायी ॥

ज्ञानी वचन

तब हम तिनको बहु समझावा । निर्गुण सगुण सब भेद बतावा॥ पाईं भेद गरुड मनसाने । त्रिदेव सो चरचा मन आने ॥ तब हम आज्ञा तेही दीना । हमहू बिदा तहाँ से लीना ॥ साखी-दया लेइ गरुड चले, हृदये धरि गुरु ज्ञान । ब्रह्मपुरी ठाढे भये, चर्चा कर मन ठान ॥

चौपाई

हुते द्वारका ज्ञान मडाना । गरुड वहाँते कीन्ह पयाना ॥ जाइ सुमेरु पर बैठे जायी । कीन्हो भेंट ब्रह्म सों आयी ॥ गरुड ब्रह्म लोकहि जब आये । ब्रह्मा आदर कीन्ह बनाये ॥ आदर भाव ब्रह्मा तब कीन्हा । डारि सिंहासन बैठक दीन्हा ॥ जल करजोरि ब्रह्म लइ आये । गरुड के चरण पखारन आये॥

ब्रह्मा वचन

धन्य गरुड यहाँ पगु धारी । अब पूरी सब आश हमारी ॥ तुमतो बाहन कृष्ण के भाई । आज कृष्ण पग धारे आई ॥ जो तुम हमपर दया कीन्हा । कृष्ण बदल हम तुमकर चीन्हा॥ आयसुमौंगिप्रसाद जो भयञ्ज । करि प्रसाद वैकुण्ठमें गयञ्ज ॥ पान फूल जो अगर मैगायञ्ज । इच्छा भोजन तहँवा पायञ्ज ॥

बोधसागर

( ७५ )

बैठे जाय पुनि गरुड समाजा । उठि तब चर्चा निर्गुण साजा॥ ब्रह्मा कह तुम कैसे आये । सो मोहि वचन कहो समुझाये॥ कौन काज यहाँ पगु धारा । कहे ब्रह्मा तुम कृष्णके प्यारा॥

गरुड वचन

तबही गरुड कहे समझायी । तुमहिं चितावन आयउँ भाई ॥ तुमहिं चितावन हौं पगुधारा । आदि पुरुष वह रहै नियारा ॥

साखी-विनु देखे को जाय यह, नहिं पावे कोइ ठाम ।

जन्म अनेक भरमत फिरे, मरे विनु गुरुके नाम ॥

आदि पुरुष आगम है, जाको सकल प्रकाश ।

निर्गुण भेद अपार है, तुम कहैं बांधी आश ॥

चौपाई

कोटिन ब्रह्मा गये सिरायी । अविगतकी गति काहु न पायी॥

कोटिन ब्रह्मा पृथ्वी विलाने । अविगतकी गति काहु न जाने॥

कोटिन विष्णू गये सिरायी । फिरि फिरिकै पृथ्वीहु विलायी॥

कोटिन रुद्र देह धरि लीना । अस्थिर होय जगत्सो कीन्हा॥

कोटिन इन्द्र अवतार जोलीन्हा । अविगति पुरुष काहु नहिं चीन्हा॥

गण गंधर्व नर कौन चलावै । सनक सनन्दन पार न पावै ॥

शेष नाग बहु भांति भुलाने । आदिपुरुषकी खबरि न जाने॥

सब परिवार जो भूले भाई । अवगति की गति काहु न पाई॥

भुला देखि जिव दथा न आई । जीव अनेक घात किहु भाई ॥

सब भूले कोइ लागु न तीरा । महा अधम सो आहि शरीरा॥

देह धरी सब भरमें आई । आपन आप सब करै बडाई ॥

अहमेव कैसे खोजेहु जाई । मांताको कहा न कीनेहु भाई ॥

१ जिन २ पुस्तकों में सृष्टि उत्पत्ति प्रकरणका वर्णन आया है, उन सबोंमें आद्याकी आत्माको न मान कर हठ करके ब्रह्माका निरंजन के खोजमें जानेका वर्णन आया है वहासे जानना चाहिये और यथार्थ भेद गुस्ते ।

( ७६ )

गुरुवोध

कीन्होखोज तुम आपुगुमाना । नहिं पाये तब रहे लजाना ॥ खोजकीन्हो जब अन्त न पावा । तब तुम आप आप ठहरावा ॥ आपु दृढाय थापना कीन्हा । सोई अहम् निर्गुण नहिं चीन्हा ॥ तुमरे भूले जगत भुलाना । आदिपुरुषको मर्म न जाना ॥ यहि विधि जग सब रहत भुलायी । टीका मूल काहु नहिं पायी ॥ तेतीस कोटी देव भुलाये । यहि भूले कोह गम्य न पाये ॥ सारखी-भूले गम्य न पाइया, भूले मूठ गँवार । टीका भूल न जानई, अरुझि रहा संसार ॥

चौपाई

तुम बाजीगर बाजी लाये । तुमतो सब दुनियाँ भरमाये ॥

ब्रह्मा वचन

सुनि ब्रह्मा तबहीं रिसियाने । हमते दूजा केहि को जाने ॥

गुरु वचन

सुनु ब्रह्मा यक वचन हमारा । तुम अस ब्रह्मा कोटि हजार ॥ कोटिन ब्रह्मा ठाढ़े द्वारा । कोटिन वेद सो करहिं उचारा ॥ खोज करन ब्रह्मा तुम गयऊ । कहूँ पिता के अन्त न पयऊ ॥ झूठ कहे मातासों जायी । ताते ब्रह्म शाप तुम पायी ॥ माता ते तुम भये लबारा । आय जीवमें सकल संसारा ॥ सबकी प्रतिमा थीर न आयी । आपु समेत सकलो भरमायी ॥ जो कोह कहै भूलकी वानी । कोटिन जन्म नरककी खानी ॥ यह संसार रहट की घरिया । कइक बार राजा अवतरिया ॥ कइक बार नरक में परई । कइक बार ब्राह्मण औतरई ॥ यहि विधि जीव आवे जायी । भरमि भरमि चौरासी पायी ॥ कोटिन बार अस्थावर जानी । कोटिन बार पिंडज उत्पानी ॥ कोटिन जन्म अंडज अवतारा । यहि विधि भरमहिं जीव विचारा ॥ यहि विधि भरमें जीव विचारा । विनु सतगुरु नहिं होय उबारा ॥

ब्रह्माका विमान भेजकर विष्णु और महादेवको बुलाना

बोधसागर

( ७७ )

साखी-कहे गरुड समझाइके, सुनहु ब्रह्म यह बात । अविगत पुरुष सु और है, जाके माय न तात ॥

ब्रह्मा-वचन चौपाई

सुनि ब्रह्मा तब पूछे बानी । कैसे अविगतिकी गति जानी ॥ कौनी युक्ति साच कै मानी । साहिबकी गति कैसे जानी ॥

गरुड वचन

गरुड कहै तुम आपही ज्ञाना । जहाँ गर्व तहाँ पुरुष छिपाना ॥ गर्व गुमान में जो है पूरा । रहै सदा सो धूर अधूरा ॥ साखी-मानुषदेह अपराधि है, देह धरे अभिमान । ताते सबै विगुचै, भक्ति मर्म नहिं जान ॥

चौपाई

भक्ति जो आदि अंतसे आयी । जाते सकल माँड निर्मायी ॥ ताकर मर्म जो जाने नायी । ताते काल फांस निरमायी ॥

साखी-लोक वेद जानै नहीं, करै भक्ति अभिमान । ताते सबै विगुरचे, भक्ति करन का जान ॥ ध्वजा जो फरके शून्यमें, बाजे अनहद तूर । तकिया है मैदान में, पहुंचेगा कोइ शूर ॥

ब्रह्मा वचन-चौपाई

ब्रह्मा कहै गरुड सुनु भाई । अपने मुख तुम करहु बडाई ॥ इतना ब्रह्मा किया विचारा । देव विमान तुरत भये ठाढ़ा ॥ कहे ब्रह्मा तुम जाहु विमाना । लाओ विष्णु बुलाइ सयाना ॥ चला विमान विष्णु पै गयऊ । तबहि विष्णु अस पूछनलयऊ ॥ कहो विमान कहाँ पगु धारे । सत्य सत्य कहो वचन सम्हारे ॥

विमान वचन

गरुड भक्त यक आया देवा । सो नहिं माने तुम्हरी सेवा ॥

( ७८ )

गरुडबोध

सुनते विष्णु विमान चढ़ाये । चढ़ि विमान ब्रह्म लोकहि आये॥ विष्णुपुरीसे विष्णु जब आये । बैठे जाय ब्रह्माके ठाये ॥

विष्णु वचन

केहि काज पर मोहि बुलायी । सो मोहि भेद कहो समझायी ॥

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा वचन कहै अर्थावै । कहै गरुड हम केहि चेतावै ॥ हमको मनुष्य देह करि जाने । आदि पुरुष औरै को माने ॥ भले विष्णु तुम आये भाई । अब शिवको तुम लेहु बुलाई ॥ गढ कैलास शिवका अस्थाना । तहाँको अब तुम जाहु विमाना ॥ सब देवनको आनु बुलायी । सुनहीं चर्चा गरुड की आयी ॥ महा विमान तुरत चलि गयऊ । गढ कैलास पर ठाढे भयऊ ॥ शिवशंकर को माथ नवायी । पाछे ब्रह्माका वचन सुनायी ॥ ब्रह्मा गरुड जहाँ झगर पसारा । तेहि कारण तुम सबके हँकारा ॥ ब्रह्मा विष्णु बैठे एक ठाई । कीन्ही चर्चा मंड मँडाई ॥ गरुड सबहि का करै उच्छेदा । सो मैं तुमहि बतायो भेदा ॥ बाजे डमरू हने निशाना । चले रुद्र तब साजि विमाना ॥ तुरत चले नहीं लाये बारी । चले रुद्र आये पगुथारी ॥ ब्रह्माको जहाँ भयउ उच्छेदा । बैठे जहाँ करे बहु भेदा ॥ इन्द्र लोक सो इन्द्र बुलाये । जेहि सँग देव सबै चलि आये ॥ सो सब चलि ब्रह्मा पहुँ आये । वासुकि देव जो आप रहाये ॥ आवत उनके नाग बहु आये । बहुते नागिन आयी बहुभाये ॥ सुर नर मुनि सब आनिबुलायी । जो जस आसन तस बैठई ॥ ब्रह्मा विष्णु बैठे यक ठावा । गरुड तहाँ पुनि ज्ञान सुनावा ॥

गरुड वचन

अविगतिकी गतिआहि निनारा । सब भूले कोइ पाउ न पारा ॥

ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत

बोधसागर

( ७९ )

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । गुरुडको ज्ञान सुनो विख्याता॥ हम तीनों अवरे नहिं कोई । हमरे परे सुनावै सोई ॥ ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । हमको कहत है परलय घाता॥ हम तो तीन लोकको कीन्हा । हमको सकल देवता चीन्हा ॥

गुरुड वचन

तबहि गुरुड यक वचन उचारा । जब कर्ता तुम सृष्टि सव्वारा ॥ वह साहब सबही ते न्यारा । कस नहिं ताकर करो विचारा॥ जिन साहब तुम्हें निर्मायी । तुम कस ताको नाम छिपाई॥ विष्णु रहत हैं तुम्हरे पास । तिनहुं को पुनि काल गरासा॥ क्रोधवंत ब्रह्मा तब भयेऊ । अचरज बात गुरुड जो कहेऊ॥ जाकी तैं पुनि सेवा करई । सो तो हमरे त्रास महँ डरई ॥ सुर नर सुनि सब काहू चीन्हा । सुनु पंछी तैं मतिका हीना ॥ लोक वेद सब हम कहैं जाने । न जानूं कस आप चित आने॥

गुरुड वचन

सुनु ब्रह्मा तैं गर्व भुलासी । तोहि अस ब्रह्म कोटि मरासी॥ हम तो ब्रह्मा बहुत जो देखा । जी पूछहु तो काढों लेखा ॥ काढों विष्णु कोटि सै चारी । महादेव जाके भंडारी ॥ मैं तो भक्त कवीरका चेला । युगन युगन जिन कीन्हो मेला॥ हमसों कह्यो कवीर बुझायी । ताते आय कह्यो गोहराई ॥

ब्रह्मा वचन

ब्रह्मा कोपि उठे तब भाई । विष्णु महादेव सुनहुँ आई ॥

विष्णु वचन

आये दूनों जन ब्रह्मा ठाई । विष्णु कहै कस मता दिढाई ॥ काह आज जिव बहुत उदासा । कीन्हो क्रोध गुरुड के पास ॥ कहो वचन मुख होय प्रकाश । हम अजान है तुम्हरे आसा ॥

( ८० )

गरुडबोध

ब्रह्मा कहै सुनो हो भाई । अविगत की गति गरुड सुनाई॥ हमहीं तीन अवर नहिं कोई । चौथे एक निरंजन सोई ॥ ताको गरुड न माने भाई । ताते मोहि कोध भौ आई ॥ तिहि कारण हम तुम्हें बुलावा । गरुड ज्ञान हमहीं समझावा ॥

विष्णु वचन

विष्णु कहैं सुनो गरुड विचारी । आदि अंत कोई अगम है भारी॥ एक ध्यान हमहूं नहिं कीना । अविगति बात हमहूँ नहिं चीना॥ अहमेव मटी सुरत लगाया । अविगति ध्यान तबहूँ नहिं पाया॥ ध्यान मध्य हम देखा जाही । ब्रह्मा विष्णु महादेव नाहीं ॥ साखी-विष्णु नहीं ब्रह्मा नहीं, माहादेव नहिं कोय । ओम्ओंकार तहवाँ नहीं, निरखि देखा हम सोय ॥

ब्रह्मावचन-चौपाई

तब ब्रह्मा अस वचन उचारा । यह है बड़ा काल वटपारा ॥

विष्णु वचन

सुनु ब्रह्म अविगती कहानी । विना तत्त्व मैं निरखा बानी ॥ ताकी का कहिये अब वाता । अगम अपार कहूँ विरुगता ॥ साखी-निःकामी निध्यानि सोई, निज्जेमी निर्वान । कहै विष्णु ब्रह्मा सुनो, अविगति यहि विधि जान ॥

चौपाई

ब्रह्मासों कहै विष्णु बखानी । है कोई आदि पुरुष निर्वानी ॥ दुर्वासा संग रहे जब भाई । अविगतिकी गति तब हम पाई ॥ तबका बोल हम कीन्ह परमाना । ताते हम जानहिं निरवाना ॥ दुरवासा गुरुभक्ति दृढाया । तब ते हमहु परम पद पाया ॥

साखी-ब्रह्मा हमकहैं जानहुँ, और न कोई सांच । दृढा ज्ञान नहिं आवई, ताते काया कांच ॥

गरुड़ और महादेवका वार्तालाप

बोधसागर

( ८१ )

ब्रह्मा कहै सुनो विष्णु विचारी । हमही रचा पुरुष औ नारी ॥ हमते और कौन है भाई । सो मोहि भेद कहौ समझाई ॥ हम तो सर्गुण सकल पसारा । हमतो अगम निगम विस्तारा ॥ हमतो रचा पवन औ पानी । हम कहैं वेदव्यास बखानी ॥ हम चौरासी नाव जो कीन्हा । हम निर्गुण सरगुण चीन्हा ॥ इतनी कथा कहि ब्रह्मा सुनाई । तबहूँ गुरुड न मानैं भाई ॥

गुरुड वचन

कहै गुरुड सुनो ब्रह्म कुमारा । तुम कहैं रची सृष्टि करतारा ॥ सबको रची सबै जिन कीन्हा । वह तो पुरुष सबन ते भीना ॥ वह तो पृथ्वी पाँव न दीन्हा । शब्दहि ते सकलो जग कीन्हा ॥ जो आप रचना करि जाना । तो हमसे हठि भाषहु ज्ञाना ॥ जो तुम रचा पवन औ पानी । पृथ्वी अकाश तुमहिं जो ठानी ॥ रचा तुम्हार तब जानहिं भाई । अब रचहु तुम फिरि विनशाई ॥ जो तुम्हार है सकल बनाई । फिरिके परलय करहु तुम भाई ॥ तब हम जानहिं कीन तोहारा । यह मेटहु सकलो विस्तारा ॥ अपने हाथ रचै जो कोई । फिरिकै मेटि सके पुनि सोई ॥ तब ब्रह्मा सुनि रहे लजाई । सम्मुख उत्तर कह्यो न जाई ॥

महादेव वचन

कहे महादेव सुनो रे भाई । अचरज बात कही नहिं जाई ॥ सुनु ब्रह्मा गुरुड जो कहई । ताकर भेद कोई विरला लहई ॥ दश औतार विष्णु जो लियऊ । काया काल ब्रास जो कियऊ ॥ तबही कृष्ण भेद यक कीन्हा । ताको ब्रह्मा तुम नहिं चीन्हा ॥ गोपी ग्वाल सबै हरि लाये । तब जो कृष्ण सब दीन मेराये ॥ इतनी बात ब्रह्मा तुम नहिं जानो । अविगतिकी गति कैसे पहिचानो ॥

( ८२ )

गरुडबोध

सारखी-कौन सरूपी कृष्ण है, कौन धरे अनुमानु । देह धरे नहीं चीन्हहूँ, निर्गुण कैसे जानु ॥

चोपाई

निरगुणको गुण है बड भारी । जिन उत्पन्न कियो सब सारी ॥ वह तो पुरुष मूल है माथा । गति प्रतीति ताहीके साथा ॥ नहीं महात्म पुरुष की पूजा । जप तप संयम नाम विनु दूजा ॥ वार पार नाम नर सेई । अजर नामको सुमिरन देई ॥ बारहिं बार नाम लौ लावे । अजर अमर होय लोक सिधावे ॥ नाम सिखापन बदन सो खोले । विना नाम विनु महात्म डोले ॥ सतगुरु विना मर्म नहीं जाने । हमैं तुम्हैं सब जगत बखाने ॥

ब्रह्मा वचन

सुनो महादेव साँच बखाना । निर्गुणके गुण हमहूँ नहीं जाना ॥ अविगतिकी गति हम ना जानी । योगी जंगम सेविं हम जानी ॥ सुर नर मुनि सब हमको ध्यावें । हम उपजावें हमही विनशावें ॥ साखी-मैं उपजावों मैं विनसावों, मैं खरचों मैं खाऊँ । तीन लोक पैदा करें, मोर ब्रह्म है नाऊँ ॥

गरुड वचन चोपाई

ममताते नर नरकें जायी । ताते बहुरि बहुरि जन्मायी ॥ तुहि अब ब्रह्मा बहुत विचारा । ताते काया विनसे सब सारा ॥ तू ब्रह्मा अस जो धरे हँकारा । तेहिते काल भया वटपारा ॥ सुनु ब्रह्मा अविगति की बाता । एकै पुरुष एक है माता ॥ सुनहू सब सभा विचारो । यक मैं निरखिकहौं निरुआरो ॥ वहि साहबकी खबरि न पावा । तुव अस ब्रह्मा बहुत उपावा ॥ वही हम निरखि परखिके जानी । साहब शब्द लेहु पहिचानी ॥

१ ब्रह्मा शिवकी बातकी व्यंगसे हँसी करते हैं ।

तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद पूछनेको जाना

बोधसागर

( ८३ )

साखी-कहो ब्रह्मका भूलहू, कहौं तोहि समुझाय । मोर मोर कै धावहू, ममता अमल चलाय ॥

चोपाई

ममिता ते दशों अवतारा । ममिता महादेव धरु छारा ॥ ममिता लोमश योग जो कीन्ह। आयु बढी भगती नहिं चीन्ह।। ममिता ते आपुहिं जो रहेऊ । ममिता ते तीन लोक बहि गयऊ।। ममिता तेज निरञ्जन कियऊ । ममिता ते पुरुष दरश नपयऊ।। तुम ब्रह्मा कीन्हे अभिमाना । तेहिंते साहब अछय छिपाना ॥ साखी-ब्रह्मा गर्व तुम कीनिया, सुनि राखू यक बात । जो साहब अभि अंतरे, सोई सदा सँघात ॥ तुम अज्ञानी नहिं जानहू, सुनु ब्रह्मा यक बात । अविगति अगम अपार है, समरथ सदा सँघात ॥

विष्णु वचन-चोपाई

विष्णु कहैं सुनो हो भाई । चलहू तुरत ज्योति पहुँ जाई।। ज्योति कहैं सो सुनिये भाई । सब मिल चलहु साँचके आई।। आंखिन देखी पूछि न जाई । पाय अभिमान चीन्हे नहिं पाई।। अभिमान मता सब दूर दीजे । साँच बस्तुको धारण कीजे ॥ अभिमान समेत चीन्हे नहिं कोई । देह धरी सब गये विगोई ॥ आपा थापि सुधि बुधि खोई । आपा छोडे पावे सोई ॥

महादेव वचन

तब महादेव कहैं विचारी । अहो विष्णु पूछहु महतारी ॥ जो वह कहैं सो हम तुम मानैं । औरी बात नाहिं हम जानैं ॥ ब्रह्मा विष्णु से हुई यह बात । तुम बडे हो कि बडी है माता ॥ सबै मिली तब कीन्ह पयाना । जाइ माता ढिग कीन्ह बयाना ॥ बोलहु माता सत के भाऊ । नहिं अरुझावहु भाषि सुनाऊ ॥

( ८४ )

गरुडबोध

तीनों देव कहैं सुनु माता । और कौन पुरुष आहि विधाता ॥ हम तीनों कि और है कोई । यह निज भेद बतावहु सोई ॥

माता वचन

तब माता बोले हितकारी । कस न ब्रह्मा करहु विचारी ॥ जब तुम हते हमारे पास । तब तुम कौन पिता की आसा ॥ तबकी बात विसरी तुम गयऊ । पुरुष ते विमुख तुम भयऊ ॥ पुनि माता यक वचन अनुसारी । महादेव ही कृतम भिकारी ॥ अमर वचन जो हमहीं भाखा । युग चारों देह अमर राखा ॥ सोई वचन भूलि जो गयऊ । मातु पिता सो अंतर लयऊ ॥ पुनि माता गरुडसे बोली । अमृत वचन रसाल अति खोली ॥ कहे माता सुनु गरुड सुजाना । तुमतो वचन कही परमाना ॥

गरुड वचन

गरुड तब पूछे ज्योतिसों बानी । कैसे तुम यह सिरजा खानी ॥

माया वचन

तब उन कहा पुरुष सों बानी । पावक नीर पवन वैसानी ॥ जल रंग अंश सो साथहि रहई । ताकी खबरि कोई नहि लहई ॥ प्रथम अंशजल रंग जो कीन्हा । तब जलसिन्धुनाम कहि दीन्हा ॥ सारखी-ब्रह्मा विष्णु कोई नहीं, महादेव भी नाहिं । पुरुष एक तब अविगति, अगम अगोचर माहिं ॥

ब्रह्मा वचन चौपाई

कहे ब्रह्मा हम आपु प्रकाशा । हम पुहमी नौ खण्ड निवासा ॥ हम हैं नीर हमहिं हैं पवना । हमहीं रचा सकल सब भवना ॥ हमहीं पांच तत्त्व सब कीन्हा । हमहीं आप सृष्टि रचि लीन्हा ॥ हमहीं सकल सृष्टि विस्तारा । हम कर्ता है सकल पसारा ॥ हमहीं चन्द्र सूर दिन राती । हमहीं कीन्ह किरतम उत्पाती ॥ हमहीं आदि अंत मधि तारा । हमहीं अंध कूप उजियारा ॥

बोधसागर

( ८५ )

हमहीं ब्रह्मा विष्णु महेशा । हमहीं नारद शुक्रदेव शेशा ॥ हमहीं कंस कृष्ण बलि वावन । हमहीं रघुपति हमहीं रावन ॥ हमहीं हैं मच्छ कच्छ बाराहा । हमहीं भादों फागुन माहा ॥ हमहीं दशौ भये अवतारा । तीरथ बरत देहरा धारा ॥ हमहीं हंसा समुद्र तरंगा । हमहीं सरस्वती यमुना गंगा ॥ हमहीं योग युक्ति व्रत पूजा । हमहीं छौंठि देव नहीं दूजा ॥ हमहीं पटना गुनना लीखा । हमहीं पाप पुण्य गुरु शीखा ॥ हमहीं विद्या वेद पुराना । हमहीं कीन कितेक कुराना ॥ हमहीं आवें हमहीं जावें । हमहीं आदि अन्त की छावें ॥ तीन लोक हमहीं विस्तारा । सकल निबल देही हम धारा ॥ साखी-तीन लोक में रमि रहे, सबही मोही मान ।

कहु माता ससुझायके, किरतम कैसे जान ॥

माता वचन-चौपाई

तब माता अस बोली बानी । तू तो ब्रह्मा चतुर सुजानी ॥ हमसे भयी उत्पत्ति तुम्हारी । तुमही पुत्र हमही महतारी । पिता केर खोज जो कीन्हा । तब हम तुमको हुकुम नदीन्हा ॥ बरबस कै तुम खोजेउ जायी । तब हम पिताकी खोज बतायी ॥ तब हम तुमसों बोली बानी । दर्शन ते बेसुख तुम्हें जानी ॥ तब तुम पैज बाँधि कै चलेऊ । पिता के दर्शन नहीं भयऊ ॥ जो तुम कीन्हे सकल बखाना । ताकर मोसों कहो विधाना ॥ जो तुम आपुहिँ आप तुम रहऊ । कवनके खोज करन तुम गयऊ ॥ काहे को बोलहु अनरीती । तुम लबार सो कीन्ही प्रीती ॥ बरबस खोज पिताके गयऊ । खोजन पाय अमरख तब भयऊ ॥ तब हमतो बोले झूठे लबारा । तैसहिँ सब चलही संसारा ॥ एक बार लबारी करेऊ । तब हम तो कहैँ शाप सो दयऊ ॥ अब बोलहु तुम वचन सम्हारी । काहे ब्रह्मा बोलु लबारी ॥