भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( २५ )

यह ब्रह्मा की है कगवृत्ती । जगहि लखाये झूठी रीती ॥ ब्रह्माने यह जग भरमाया । पत्त पुरुषका भेद न पाया ॥ तिहुँपुर कालके जाल पसारा । तामें अटके सब संसारा ॥ जात पांत कोई भेद न चीन्हा । मिथ्या राह जगहि गहलीन्हा ॥ ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जाने । ब्रह्म रूप नाहीं पहचाने ॥ सार शब्द ब्राह्मण नहीं जाने । आदि नाम शूद्रही बखाने ॥ ब्राह्मण धरे शूद्र औतारा । करे मुक्ति तिहुँ पुरसे न्यारा ॥ धन्य शूद्र जो सेवा करई । आदि नामको हियमें धरई ॥ जाति वनरमें भेद बताऊँ । जो कोई समझे ताह लखाऊँ ॥ जाति बरण सब एकहि होई । दूसर जाति नहीं है कोई ॥ दूसर कर्म जाति है भाई । कर्म करे सो नाम धराई ॥ जैसो कर्म करे जो भाई । तैसी ताकी जात बनाई ॥ चार बरण सब एकहि जानो । दूसरे कर्म जो जात बखानो ॥ जाति बरणका चिह्न न कोई । कैसे जाति दूसरी होई ॥ दूसरि जाति कोई विधि माने । जग अज्ञात भेद न जाने ॥ जाति पांति होके नहिं आये । यह जगमें झगड़ा फैलाये ॥ जाति पांति नाहीं कोई न्यारी । एक जाति है सब संसारी ॥ भगके द्वार जीव सब आये । जन्म मरनमें बहुरि समाये ॥ राह एक आये संसारा । कौन ज्ञानसे भये नियोग ॥ एकइ घरसे सब जिव आये । एक बाप एक माता जाये ॥ ऊँच नीच सब सम कर जाना । ऊँच नीच सब झूँठ बखाना ॥ डार जनेऊ ब्राह्मण कहलायें । ब्राह्मणिको कहो का पहिराये ॥ सुनत करा मुसलमानहि कीन्हा । तुर्कानीको का कर दीन्हा ॥ ना हिन्दू ना तुर्क कहाये । ज्ञान हीन जिव धोखा खाये ॥ जात बरन मिथ्या कर जानो । सत्त कहे निश्चय कर मानो ॥

( २६ )

ज्ञानबोध

यह जग आंधर जानो भाई । नाम न जाने ऊँच कहाई ॥ ऊँच वही जो नामहि जानें । विना नाम सब नीच कहानें ॥ ना कोउ वर्ण नहीं कोउ भेषा । शब्द सरूपी जैहै देशा ॥ सब मिल भक्ति करो रे भाई । सतगुरु मुखसे यह फरमाई ॥ यह सतगुरुका ज्ञान है भाई । जो कोइलखे सो लोक सिधाई ॥ जात वर्ण हम भाख सुनाई । धर्मदास जगसे कहो जाई ॥ ऐसा तुम जग जान लख वो । सत्तलोकमें जिव पहुँचावो ॥

साखी-यह जग त्रयगुण भक्तमें, धूल परे धर्मदास ॥ नाम गहे विश्वास करि, जाय पुरुषके पास ॥ माना कहा कबारकी, सबको यहै पुकार । भरम जाल सब त्यागदे, गहले नाम अपार ॥

सारठा

जिन सब न म आधार विना नाम भव ना तरे । जाय काल दर्बार, सत्तपुरुष जो ना गहे ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब निज भेद कहों तुम पास ॥ अकह हतो पुनि कहा बखानी । उत्पति प्रलय हती मम वाणा ॥ आदि न अंत हती नहि माया । उत्पति प्रलय हती न काया ॥ सोहं ब्रह्म न नहि ओङ्कारा । काल निरंजन नहि औतारा ॥ दश आतारन चौबीस रूपा । तब नहि होता ज्योति स्वरूपा ॥ जब नहि चंद्रलोक दीपविस्तारा । तब नहि सुकृत करचो संसारा ॥ जब नहि लाक चंद्रसूर्य अरुतारा । तब नहि तीनों गुण औतारा ॥ वहां नहीं है दिन अरु राती । ऊच न नीच जात ना पांती ॥ नाही मुख पवन नहि पानी । समरथ गति काहू नहि जानी ॥ आदि ब्रह्म नहि करे पसारा । आप अकह तब हता नियारा ॥

बोधसागर

( २७ )

है अनाम अक्षर के माहीं । निहअक्षर कोइ जानत नाहीं ॥ अमर लोक जहाँ अम्बर काया । अकाल पुरुष जहाँ आपरहाया ॥ धर्मदास जहाँ वाम हमारा । काल अकाल न पावे पारा ॥ निरभय घर बोही है भाई । रोग न व्यापे काल न खाई ॥ समरथ घर हैं पैले पारा । सबके ऊपर है निरधारा ॥ जिनकी गम्य काल नहीं पाई । तीन देवकी कौन चलाई ॥ मन माया काल गति नाहीं । जीव सहाय बसै तेहिं ठाही ॥ ऐसा है वह देश हमारा । जहाँसे हम आये संसारा ॥ ताकी भक्ति करे जो कोई । भवते छूटै जन्म न होई ॥ वहाँ जाय जीव करे विलासा । अमरलोक जिवका नहीं नासा ॥ कहै कबीर सुनो धर्मदासा । आदिनाम मैं कहा तुम पासा ॥ जो कोई माने कहा तु हारा । निरभय जाय पुरुषके द्वारा ॥ मूरख सतगुरु मरम न पावे । भवसागरमें भटका खावे ॥ सार युक्ति मैं तुम्हें लखया । गन मुनि काहू भेद न पाया ॥ भाषा ग्रंथ ज्ञान उपदेशा । तुम अपने घट करो प्रवेशा ॥

सारखी-अस मुख है हमरे घरे, कहैं कबीर समझाय ।

सत्त शब्द तो कोई गहे, अस्थिर बैठे जाय ॥

सोरठा

चौथे पद निरवान, पूरे गुरुसे पाइये ।

कहे कबीर बखान, सत्त मान सतगुरु सही ॥

चौपाई

और सुनो गुरुमु का लेखा । भक्त होय सो करै विवेका ॥

जो कोई पान पम्बाना पावै । ताके निकट काल नहीं जावै ॥

पान परवाना पावै भाई । नाम गहे अरु भरम नशाई ॥

तन मन से गुरु सेवा लाई । गुरुसे देव और नहीं भाई ॥

गुरु से कपट शिष्य जो राखे । जमराजाके सुदगर चाखे ॥

( २८ )

ज्ञानबोध

सोई हंस काल घर जावे । सत् लोकमें वास न पावे ॥ निरभय घर कबहुँ ना पावै । कोट जन्मतिहिकालसतावै ॥ भक्ति कर पूजत हैं जो देवा । निश्चय जाय कालकी सेवा ॥ मनुष्य तन वे कभी न पावै । लख चौरासी भटका खावै ॥ जैसे कर्म करे संसारा । तस भुगते चौरासी धारा ॥ ना गुरु ना निगुरा पंथी । कहा कयो बांचैसे ग्रंथी ॥

साखी-भक्ति करें भरमत फिरे, जग छोड़े नहिं सोय ।

कहैं कबीर धर्मदास से, जिनका तरन न होय ॥

सोरठा

करनी देय वहाय, आदि नाम कह जानके ।

ता महाँ रहै समय, भरम जाल सब छोड़ दे ॥

धर्मदास वचन

चौपाई

धर्मदास तब कहै करजोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥

हो स्वामी मैं बूझो तोहीं । करके कृपा बताइये मोहीं ॥

हो अविनाशी ब्रह्म कहाये । यह जगमें तुम कैसे आये ॥

यह सब भेद बताइय स्वामी । तुम सब घटके अंतर्यामी ॥

सकल चरित तुम मोहि बतावो । मैं जाते जगजीव चितावो ॥

यह जग तब पतियावे साई । चारों जुग तुम कहाँ रहाई ॥

साखी-सो अब मोहि बतावहूँ, तुम गुरु अगम अपार ।

धर्मदास विनती करे, सुनियो हो करतार ॥

कबीर वचन चौपाई

कहै कबीर सुनो धर्मदासा । अब यह भेद कहों तुम पासा ॥

वेद पुराण शास्त्र जग ठाना । भूले जीव न पांय ठिकाना ॥

बोधसागर

( २९ )

तीन लोक जिव काल सतावै । ब्रह्मा विष्णू पार न पावै ॥ सत् पुरुष तब मोहिं पठावा । जीव उबारन मैं जग आवा ॥ यहि कारण आयो संसारा । जगके जीव मैं करों उबारा ॥ जग जीवनको नाम लखावै । पकड़ हंस सतलोक पठावै ॥ हम हैं सतलोकके बासी । दास कहाय प्रगट भये कासी ॥ ना कोइ वर्ण नहीं कोइ भेशा । सत् पुरुषके थे हम देशा ॥ तहैंकी रचना अद्भुत भाई । सो मैंने तोहि पहिले सुनाइ ॥ और तोहि मैं कहूँ समझाई । धर्मदास सुन चित्त लगाई ॥ धरी देह भवसागर आये । धर्मदास तोहि नाम सुनाये ॥ कलियुगमें काशी चल आये । जब हमरे तुम दर्शन पाये ॥ तब हम नाम कबीर धराये । काल देख तब रह सुरझाये ॥ जो कोइ हमको चीन्हा भाई । जिनका काल धोक मिट जाई ॥ देह नहीं अरु दरसै देही । जग ना चीन्हे पुरुष विदेही ॥ नहीं बाप ना माता जाये । अब गतिहीसे हम चल आये ॥ हते विदेह देह धर आये । जग जीवोंके बन्द छुड़ाये ॥ नाम गहे तेहि लोक पठाये । बिना नाम जिव कालहि खाये ॥ गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥ चारों जुग भवसागर आये । आदि नाम जग ढेर सुनाये ॥ नाम सुने शरणागत आवें । तिनहीकी हम बंद छुडावें ॥ जीव प्रबोध लोक पहुँचावें । काल निरंजन देख डरावें ॥ चारों जगके चारों नामा । माया रहित रहै तिहि ठामा ॥ सतजुग सत् सुकृत कहलाये । त्रेता नाम सुनींद धराये ॥ द्वापरमें करुनामय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥ आदि नाम चारों जुग ढेरा । सज्जन जीव सुनतही दौरा ॥ जो जो जीव शरणमें आये । तिनको हमने नाम सुनाये ॥

( ३० )

ज्ञानबोध

आदि नाम जो नित गुन गावैं । कर विश्वास अमर पद पावैं ॥ जो कोइ सतगुरु नामको धावैं । तिनको साहब पार लगावैं ॥ पार हाय जो माया त्यागे । जन्म मरनको संशय भागे ॥ माया त्याग वैरागी होई । अजर अमरको पावैं सोई ॥

धर्मदास वचन

कह धर्मदाम सुनो प्रभु राई । भक्त भाव मोहि देव बताई ॥

कबीर वचन

भक्तोंकी यह कथा पसारा । धर्मदास सुनियो चित्त धारा ॥ जगमें भक्त भये अधिकारी । जोगी सन्यासी लट धारी ॥ शीव गोरख अरु बहु ब्रह्मचारी । मायाने सबको ठग डारी ॥ इनको ठग जब हमपर धाई । गुप्त नाम हम टेरे सुनाई ॥ लोट गइ माया बहुवारी । रहे जीत माया गइ हारी ॥ माया जल है कठिण अपारा । तासे गन सुनि बैठे हारा ॥ माया जाल परो मत भाई । धर्मदास जग कहो गुहराई ॥ भवसागर है भक्त बहुतेरा । जिनको तुमसे कहो निबेरा ॥ मौनी भये मुखहु नहिं बोलें । भेष बनाये घर घर डोलें ॥ अंगहि भस्म गले बिच माला । मठिया बैठ सुने मतवाला ॥ धून रमाय गुरिया सरकावे । गगन चढ़ाय के जग भरमावैं ॥ कान फाड़ शिर जटा बढ़ाये । माथे चन्दन तिलक लगाये ॥ वस्त्र रँगा जोगी बन आये । सतगुरु मिले न भेष बनाये ॥ बहुत करें जप तप रे भाई । आदि नाम कोई नहिं पाई ॥ पाहन सेवैं भक्त कहावैं । चन्दन तेल सिंदूर चढ़ावैं ॥ मानुष जन्म बड़े तप होई । नाम बिना झूठे तन खोई ॥ साधु युक्ति अस चाल बताऊँ । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाऊँ ॥ काम क्रोध लोभ अहँकारा । सोई साधु जिन इतने मारा ॥ सूखा फीका करे अहारा । निशिदिन सुमरे नाम हमारा ॥

बोधसागर

( ३१ )

तत्त्व प्रकृति और बल माया । इन्हिं जीत तब साधु कहाया ॥ अन्त कपट सब देय बहाई । क्षमा गङ्गमें बैठ नहाई ॥ हार जीत और अभिमाना । इनसों रहित साधुको ज्ञाना ॥ बिहँसत बदन भजनको आगर । शीतल दया प्रेम सुखसागर ॥ सब षट् कर्म छोड़ अज्ञाना । धर ले केवल निर्गुन ध्याना ॥ धन्य धन्य जग साधु है सोई । जिन अपनी दुरमति सब खोई ॥ ऐसी रहन साधुकी भाई । जब हँसा निरभय पद पाई ॥ यह भक्तोंकी कथा सुनाई । निरभय पद कोइ बिरले पाई ॥ साधू लक्षण तुम्हें सुनाया । गन सुनि काहू भेद न पाया ॥ आदि नामको नित गुनगावो । सोवत जागत ना बिसरावो ॥ सत साहिब है सबसे न्यारा । ताहि जपे होवे भव पारा ॥ भक्त अनेक भये जग माहीं । जोग करै पै युक्ति न पाहीं ॥ जोगहि युक्तिनाम बिन नाहीं । झूठी माया आन लगाहीं ॥ नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूझे सब हँसा ॥ नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥ माया त्याग भजो निज नामा । तब जिव जाय पुरुषके धामा ॥ सबसे कहो पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥ सत्य पुरुषकी युक्ति न पाई । ऊदय धरे नहिं सत्य को भाई ॥ शिव गोरख सोइ पार न पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥ कहें कबीर सुनो मम बानी । जोग युक्ति मैं कहों बखानी ॥ अब गेहीका सुनो विचारा । धर्मदास मैं कहों पुकारा ॥ गेही भक्त करे जो कोई । अब मैं तुमसे भाखों सोई ॥ गेही भक्ति सत्त गुरुकी करई । आदि नाम निज हृदसे धरई ॥ गुरु चरनसे ध्यान लगावै । अन्त कपट गुरुसे ना लागै ॥

( ३२ )

ज्ञानबोध

गुरु सेवामें फल सब आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥ गुरु वचन निश्चय कर मानै । पूरे गुरुकी सेवा ठानै ॥ विन विश्वास भक्ति परकाशा । प्रीति विना नहिं दुबिधा नाशा ॥ मीन मांस मद निकट न जाई । अंकुर भक्ष सो सदा कराई ॥ गुरुसे शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नर्कमें जाई ॥ परधन पाहन समझे भाई । झूठ वचन हृदये नहिं लाई ॥ पर तिरिया माता सम मानै । झूठ छोड़ सत्यहिको जाने ॥ जीवपै दया करै रे भाई । बुरे कर्म सब देय बिहाई ॥ हृदये दया प्रीति ना होई । सतगुरु सपने मिले न सोई ॥ नाम नेह गुरु सुतै लगावे । आदि नामको पल पल ध्यावे ॥ लेवै पान सुक्ति सहदानी । जाते काल न रोकै आनी ॥

सारखी-पुरुष नाम निशिदिन गहो, शब्द करो परतीत ।

अंक नाम निज पाइया, जाहो भवजल जीत ॥

सोरठा

भर्म तजे यम जाल, सत्तनाम लौ लावई ।

चले संतकी चाल, परमार्थ चित दे गहे ॥

चौपाई

गेही भक्त आरती आने । प्रति पूनोकी आरति ठाने ॥ अमावस आरती नहिं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥ पाख दिवस नहिं होवे साजू । प्रति पूनो कर आरति काजू ॥ पूनो पान लीन्ह धर्मदासा । पावे शिष्य होट सुखबासा ॥ छटे मास नहिं आरति भेवा । साल माह गुरु चौका सेवा ॥ नाम कबीर जपै लौलाई । तुम्हरा नाम कहे गुहराई ॥ ऐसी रहनि गेहि जो धरि है । गुरु प्रताप दोई निस्तरि है ॥

बोधसागर

( ३३ )

साखी-सो भव पार उतारि है, केवटसे कर प्रीत । जब सतगुरु केवट मिले, जैहै भव जल जीत ॥ सोरठा-काल जीव धर खाय, सत्तनाम जाने विना । बचि है एक उपाय, सत्त कबीर कह भव तरे ॥

चौपाई

सत्त कबीर गुरु धर्मदासा । जीव पठै है पुरुष के पास ॥ सत्त गुरु सत्त कबीरहि आहीं । गुप्त रहे जग चीन्हत नाहीं ॥ सतगुरु आप जगत पग धारे । दासा तन धर शब्द पुकारे ॥ काल निरंजन सब पर छाया । आदि नामका चिह्न भिटया ॥ धर अवतार असुर संहारा । जिव जाने यह धनी हमारा ॥ एही धोख नर्क सब जाहीं । जिव अचेत छल चीन्है नाहीं ॥ नर्क बास नहिं छूटै भाई । जो सतगुरु को चीन्है नाहीं ॥ ब्रह्मा विष्णु शिवसे नहिं देवा । जिन्ह बैकुण्ठवास नहिं देवा ॥ ऐसा काल अपरबल भाई । जिहिके छल जग चीन्है नाई ॥ जगमें जीव घात बहुतेरे । करे घात अरु पाप घनेरे ॥ दुष्ट अन्याई करजिवकी घाता । खेल शिकार माने मन माता ॥ जीव मार तन करत अहारा । जीव दया नहिं करत गँवारा ॥ जीवघाती खो बहुत दुख पावे । जन्मजन्म तिथिकाल सतावे ॥ काग देह धर विष्टा खाहीं । जन्म अनेक भ्रमे जगमाहीं ॥ जीव दया विन मुक्ति न पावैं । मीन मांस मद राक्षस खावैं ॥ धर्मदास यह जग बौराई । दुष्ट जीवकी कथा सुनाई ॥ जीव कष्ट मोहिं सहा न जाई । ज्ञान हीन नर जीव सताई ॥ यहि कारण हम जगमें आये । तीन लोक जम लूटत पाये ॥ पहले लूटे विष्णु सुरारी । फिर लूटे शंकर लटधारी ॥

( ३४ )

ज्ञानबोध

गनमुनि लूटे तपसी झारी । अरु लूटे सगले संसारी ॥ चन्द्र सूर्य तारागण सोई । कहै कबीर बचा नहिं कोई ॥ देखो यही काल की रीती । धर्म न परखो रीति अनीती ॥ ऐसा काल कठिन बरियारा । बचे सोह जो नाम पुकारा ॥ काल रीति मैं तोहिं सुनाई । धर्मदास जिव बोधा जाई ॥

साखी-कहे कबीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय ।

काल भेद ना जानहीं मूरख रहै झुलाय ॥

सोरठा-तजो काल बरयार, जीव दया चितमें करो ।

उतरो भव जल पार, आदि नाम हृदय गहो ॥

सुनो संत मति धीर, कहो ज्ञान परखो हिये ।

काल अपरबल बीर, हृदये विवेकं दृढ ॥

चौपाई

आदि नाम है अजर शरीरा । तनमनसे गह सत्त कबीरा ॥

जोई गहे धर्मदास कबीरा । सो पावे सुख सागर तीरा ॥

काया बीर नाम है धीरू । सब घट रहे सभायक बीरू ॥

निजही शब्द कबीर है सारा । जाका है निज सकल पसारा ॥

एकै रूप शब्द पुर एका । एक भाव दुतिया नहिं देखा ॥

कैसे दुतिया कहिये सोई । दुतिया भर्म मिटै सब कोई ॥

एकहि हम तुम एक शरीरा । एक शब्द है मतिके धीरा ॥

दूसर भाव नहीं है आसा । सोई कबीर सोई धर्मदासा ॥

एक रूप एकै अनुहारी । एकहि पुरुष सकल विस्तारी ॥

आदि नाम मैं भाख सुनाओ । नाम गहे जब मुक्ती पाओ ॥

जो कोइ आदि नामको चीन्हा । तासो काल भयो बलहीना ॥

साखी-आदि नाम है मुक्तिका, जप जाने जो कोय ।

कोटि जाप संसारमें, तासे मुक्ति न होय ॥

बोधसागर

( ३५ )

सोरठा-बूझ लेहु हो हंस, आदि नाम निज सार है । अमर होय ते वंश, जिन जानो निज नामको ॥ और मन्त्र सब छार, आदि नाम निज मंत्र है । बूढ़ मरा संसार, कह कबीर निजनाम विन ॥

चौपाई

कहे कबीर सुनो धर्मदासु । चार गुरुकी कथा प्रकासु ॥ चार गुरु संसारहि कीन्हों । जिनके हा जिवमुक्ती दीन्हों ॥ वे हंसन को लोक पठाये । भवसागर जिव बहुरि न आये ॥ सार शब्द साहब का न्यारा । सोई शब्द कहैं गुरु उचारा ॥ सार शब्द काल नहिं पाईं । तीन देवकी कौन चलाई ॥ शब्द सङ्ग हंसा घर जाईं । काल अपरबल देख डराईं ॥ सार शब्द मैं तुमको दीन्हा । काल तुम्हारे रहे अधीना ॥ धर्मदास तुम मतिके धीरा । तुमको दीन्हा मुक्तिका वीरा ॥ तुमते जीव उतारि है पारा । सौंप दीन्ह तोहि जगको भारा ॥ सतजुग शिष्यसहतेजी कहाये । द्वापर चतुर्भुज नाम सुनाये ॥ त्रेता शिष्य बंकेजी भाई । कलियुगमें धर्मदास गुसाई ॥ चार गुरु भवसागर माहीं । धर्मदास वे जिव मुक्ताहीं ॥ यह मैं तुमसे कहां समझाईं । सब संशय तुम्हरे भिट जाईं ॥ वंस ब्यालिस तुम्हारे सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥ इनहीं सौंप देव जिव भारा । सब जीवनको करे उबारा ॥ धर्मदास तुम पुरुषके अंशा । अब हमको कछु नाहीं संशा ॥ होय पंथ भव सागर सारा । तुम्हरे वंश सब जीव उबारा ॥ ब्यालिस वंशराजलिख दीन्हों । अटल राज भवसागर कीन्हों ॥ धर्मदास मैं कहां बिचारी । यहि विधि निबहै सब संसारी ॥

साखी-नाम भेद जो जानहीं, सोई वंश हमार ।

नातर दुनिया बहुत है, बूढ़ मरा संसार ॥

( ३६ )

ज्ञानबोध

सोरठा-जैसे भव जल जीत, सार शब्द जो जानहीं । कठिन काल विपरीत, नातो जम ले जायगा ॥

धर्मदास वचन

चौपाई

धर्मदास तब विन्ती लाई । अब मैं पंथ करो गुन गाई ॥ अमरलोकके हो गुरु वासी । कारन कौन आये अविनाशी ॥ मृत्युलोक आये कैहि काजा । धर्मराय पापी बड़ राजा ॥

साहब कबीरका वचन

धर्मदाम तुम सुनियो भाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥ सक्त पुरुष सतलोकके बासी । सकल हंसके लिये अविनाशी ॥ पुरुषदरश कोइ बहुरि न पावै । तीन लोकमें आन रहावै ॥ तीन लोक सब परले होई । अमरलोक सुखदायक सोई ॥ जीवकाज जगमें हम आये । धर्मरायसे जीव छुड़ाये ॥ आदि अनाम अमोल अपारा । अकह अगोचर सबसे न्यारा ॥ तहाँसे हम आये संसारा । पहुँचे काशी नगर मैझारा ॥ सत्त सत्त हम करें पुकारा । भवसागरके जीव उबारा ॥ नाम सुने जो मो लग धाये । जिनको हमने पार लगाये ॥ समझे सुने जो वाचा मेरी । काटूँ ताकी कर्मकी बेरी ॥ भगकी राह नहीं हम आये । जन्म मरन ना बहुरि समाये ॥ त्रिगुण पांच ताव हम नाही । इच्छारूप देह हम आहीं ॥ साखी-पांच तत्त्व गुन तीन नहीं, तामें सकल शरीर ।

सब कोइ हृदये चीन्हियो, सतगुरु पुरुष कबीर ॥

चौपाई

हम जमके शिर मर्दन द्वारा । जो कोइ गहे सो उतरे पारा ॥ जहाँ हम रहें काल तहाँ नाही । हंसन हम सुखदायक आहीं ॥

बोधसागर

( ३७ )

जो साहब सतलोक रहाई । तिनको सब कोई चीन्हौ भाई॥ नाम बिना दुखि तीनों देवा । जिनकी गन गंधर्व करें सेवा ॥ जगके देव सब काल अधीना । बचे सोई जो नामको चीन्हा ॥ हम बल एक शब्दका भाई । ताही बल हंसा सुत्काई ॥ जहाँ नाम काल गति नाही । बिना नाम है कालकी छाई ॥ ज्ञान हीन जाने नहीं भाई । जीव कै सँग मन काल रहाई ॥ जीव के संग कालको वासा । अज्ञानी जन गहे विश्वासा ॥ मनको कहो न कीजे कोई । मन जिवको भरमावे सोई ॥ कहे कबीर मन जात गँवारी । मनको कहो न करो नर नारी ॥ मनको कहो जो कर है भाई । भवसागरमें देय बहाई ॥ मन चंचल सो काल है भाई । मनको त्यागे निरमल हो जाई ॥ मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥ मन थिरकर परमात्म जाना । यहि विधितत्त्वलेय पहिचाना ॥ काल जाल ते तेही छूटे । काल विचारा ताहि न लूटे ॥ यही भेद धर्म सुन लीजे । शब्द माहि तुम बासा कीजे ॥ काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥ काल चरित्र तुमसे कहो भाई । यही भेद कोई नहीं पाई ॥ काया माया झूठी जानो । झूठा सकल पसारा मानो ॥ झूठो नाम साहबको नाही । बूझ लेव अपने हिय माहीं ॥ साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय सब धाय । कालपाय सब विनसही, काल काल कह खाय ॥ सोरठा-धर्मदास लेव जान, मुन्य सुरूपी मनहि है । वचन कबीर प्रमान, रूप रेख मनको नहीं ॥

चौपाई

परम पुरुष नाम गहो भाई । ताते हंसा लोक सिधाई ॥ आदि नाम है जिव रखवारा । उनको सब कोई करो पुकारा ॥

( ३८ )

ज्ञानबोध

अमर लोक साहबका न्यारा । जहाँ पुरुष का है दरबारा ॥ आदि पुरुष जहाँ आप अकेला । धर्मराय नहि मन के मेला ॥ अंधकार जहाँ कबहुँ न होई । सदा जोति अमरापुर सोई ॥ आदि पुरुष जहाँ काल न जाई । तीन देव की कौन चलाई ॥ आदि नाम जो ध्यान लगाई । तब हँसा सत लोकहि पाई ॥ ऐसा लोक साहबका भाई । जहाँ हँसा सुख सदा रहाई ॥ तादि लोकमें जो कोइ जावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥ धर्म राय से तिन का टूटे । जन्म मरण को संशय छूटे ॥ बिरले जीव निःसंशय होई । दृढ़ परतीत नाम गहँ सोई ॥ अगम भेद मैं तुम्हें बताया । काल निरञ्जन गम्य न पाया ॥ जगके जीव प्रबोधो भाई । पुरुष शरण जब हँसा जाई ॥ जीवहि बोधो सब संसारा । पकड़ हँस फँको पैले पारा ॥ भवसागरसे जीव उबारो । जन्म मरण जिव संशय टारो ॥ जीव मुक्त मैं तुमको दीन्हा । पुरुष भक्ति है नामको चीन्हा ॥ सार युक्ति मैं तुमसे कहिया । कहन सुननको अब नहिं रहिया ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विनवे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥ निरगुन नाम लखे नहिं कोई । सरगुनमें जग भरमें सोई ॥ अज्ञानी जिव कहा न माने । आदि नामको भेद न जाने ॥ यह सब भेद कहो प्रभुराई । कैसे जीव प्रबोधों जाई ॥

साहिव कबीर वचन-चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । अब मैं भेद कहाँ तुम पासा ॥ सज्जन जन जो होवे भाई । तुम्हरे शरन दौरके आई ॥ तन मन तुमसे ध्यान लगाई । ताको नाम सुनइयो भाई ॥ जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना । तबही देव पान परवाना ॥

बोधसागर

( ३९ )

निरभय ज्ञान कहो जिवपासा । जो कोह होय तुम्हारा दासा ॥ मूरखके तुम पास न जइयो । बचन हमारो हियमें गहियो ॥ मूरख ज्ञान कहो मत भाई । नाहक ज्ञान गांठको जाई ॥ डुरमति मन जाही कर भाई । तासे राखो भेद छिपाई ॥ ज्ञानी जनको नाम सुनावो । परम पुरुषसों हृदय चिन्हाओ ॥ साखी-मूरखसे ना खोलिहौ कहैं कबीर विचार । ज्ञानीसे न डुरायहौ, सुनो सत् मतसार ॥

चौपाई

अलख नाम घट भीतर देखो । हृदये माहीं करो विवेको ॥ घट घट राम बसे हैं भाई । विना ज्ञान नहिं देत दिखाई ॥ अतुभव ज्ञान प्रगट जब होई । आतमराम चीन्ह है सोई ॥ आतमराम चीन्ह जब पावा । सकल पसारा मेट बहावा ॥ हिये नयनसे देखो भाई । जब तुमको वह राम दिखाई ॥ सब घट व्यापक सबसे न्यारा । सोई राम है जीव मँझारा ॥ अकह नाम कहा नहिं जाई । घट घट व्याप्त निरंतर आई ॥ आतमराम देख जिव पाई । आप आप सब ठांव समाई ॥ जहाँ देखा तहाँ आप समाना । ब्रह्म छोड़ दूसर नहिं आना ॥ यही मता हम तुमकह दीन्हा । दूसर कोउ न पावै चीन्हा ॥ ऐसा ज्ञान लखाओ भाई । जो नहिं मानकाल तिहिं खाई ॥

साखी-अजर पुरुष एकै रहै, अजर लोक अस्थान ।

कहे कबीर सर्वांग जो, ताहि पुरुषको जान ॥

सोरठा-सुनहु ज्ञानी धर्मदास, सोइ ज्ञान जप ऊपजै ।

एक नाम विश्वास, प्रगट ब्रह्म स्वरूप है ॥

चौपाई

आदि नाम जो राखे आसा । तापै परे न कालकी फाँसा ॥ आदि नाम निरअक्षर भाई । ताहि नाम ले लोकहि जाई ॥

( ४० )

ज्ञानबोध

सोहँ शब्द निरक्षर वासा । ताहि शब्द जपहै निज दासा ॥ आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥ तुम कहँ शब्द दीन्ह टकसारा । सो हंसन सो कहौ पुकारा ॥ सार शब्दका सुमरण करि है । सहज अमर लोक निस्तारि है ॥ सुमरन का बल ऐसा होई । कर्म काट सब पलमें खोई ॥ जाके कर्म काट सब डारा । दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा ॥ जाकहँ दिव्य ज्ञान परकाशा । आपहिमें सब लोग निवासा ॥ लोक अलोक शब्द है भाई । जिन जाना तिन संशय जाई ॥ तत्व सार सुमरन है भाई । जातै कालकी तपन बुझाई ॥ सुमरनते सब कर्म विनाशा । सुमरनसों दिव्य ज्ञान प्रकाशा ॥ धर्मन सुमरन दयो लखाई । जासों हंस सबै मुक्ताई ॥

सारखी-कहे कबीर विचारके, सुमरन सार बखान ।

कहै भेद जो पावहीं, पहुँचे लोक ठिकान ॥

धर्मदास-वचन चौपाई

कहँ धर्मदास सुनों प्रभुराई । अब जिवको सन्देह मिटाई ॥ अलख अगोचर हो प्रभु मेरा । अब जीवन को करें उबेरा ॥ आदि ब्रह्म तुम अगम अपारा । जीव काज आये करतारा ॥ आदि नाम गुरु मोहिँ लखाये । जीवनके तुम बंद छुड़ाये ॥ अजर लोकमें जिव पहुँचाये । धन्य भाग हम दर्शन पाये ॥ अमर वस्तु सतगुरु मोहिँ दीन्ह। जीवनके सब दुखहर लीन्ह ॥ सतगुरु चरण गहँ हिय माहीं । भानु उदय पंकज बिगसाहीं ॥ सतगुरुने मोहिँ लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥ अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसो हियमाहीं ॥

सोरठा-दीन्हों मोहिँ लखाय, परमात्म आत्म सकल ।

अलख नाम समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हऊ ॥

बोधसागर

( ४१ )

साहब कबीर बचन-चौपाई

ज्ञान उपदेश कहा मैं भाई । ताते जीव हिय ज्ञान समाई ॥ यही ग्रंथ मैं नाम नियारा । सूक्ष्म रीति से कहो पुकारा ॥ आदि नाम जाने संसारा । करे भक्ति पहुँचे दरबारा ॥ पढ़े सन्त होवै मति धीरा । आदि नाम गहै अन्न शरीरा ॥ आदि नाम है सत् कबीरा । जो जन गहे छूटे भव पीरा ॥ आदि नाम पहिचाने भाई । तब हंसा निज घरही जाई ॥ ज्ञान उपदेश कहा गुरु पूरा । नाम गहे चेला कोई सूरा ॥ साधु सन्तसों बिनती मोरी । नाम भूले अक्षर लीजो जोरी ॥

इति श्रीग्रन्थज्ञानबोध समाप्त


भवतारणबोध (चतुर्दश तरंग)

सत्यपुरुषाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

चतुर्दशस्तरंगः

ग्रन्थ भवतारणबोध

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास बिनवै कर जोरी । सद्गुरु सुनिये विनती मोरी ॥ भवसागर कवनहिं विधि छूटे । यमबंधन कवनहिं विधि टूटे ॥ भव दरियाका वार न पारा । ता मई अँटके सब संसारा ॥ सो दरियाव कौन विधि थाहूँ । परम पुरुषको कैसे पाहूँ ॥ करों भक्तिके योग कमावों । देओं दानके तीर्थ नहावों ॥ करों यज्ञ के इन्द्री साधों । बाहर फिरों के मतको बांधों ॥ जो तुम कहो मैं करिहों । वचन तुम्हारे हृदये धरिहों ॥ भवसागर दुख मेटो मोरा । दूटै जन्म मरनको ठौरा ॥ संशय रहित करहु मोहिं स्वामी । तुम सब घटके अन्तर्यामी ॥

सद्गुरु वचन

सुन धर्मदास मैं सत्य बताऊँ । भवसागरका भरम मिटाऊँ ॥ संशय रहित सदा तुम होऊँ । तुम्हरी राह न रोकै कोऊ ॥ करो भक्ति औ बंधन काटो । जन्म मरणका संशय पाटो ॥ भाव भक्ति करिये चित लाई । सेवहु साधु तजि मान बढ़ाई ॥ सुन धर्मदास भक्तिपद ऊचा । इन सीढ़ी कोई नहिं पहुँचा ॥ योगी योगसाधना करई । भवसागरते नाहीं तरई ॥ दान देय सोई फल पावे । भवसागर भुक्तनको आवे ॥ तीर्थ नहाये जो कछु होहीं । सो सब भाषा सुनाऊँ तोहीं ॥

बोधसागर

( ४३ )

जन्म लेय उज्ज्वल तन पावे । सम्पति है जगमें पुनि आवे ॥ ऊंचे घरसे ले अवतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यवहारा ॥ इन्द्री साधन है यह नीका । विना भक्ति जानों सब फीका ॥ इन्द्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥ क्रोध किये गति सुक्ति न पावे । भक्ति महात्महाथ नहिं आवे ॥ बरत एक भक्तिका पूरा । और बरत कीजै सब दूरा ॥ और बरत सब यम की फांसी । भक्ति बरत मिलही अविनासी ॥ हर अवराधन की सुनु बाता । कहा भेद सुनिये तुम ज्ञाता ॥ हरि हर नाम सदा शिव केरा । तासों दूर होत भव फेरा ॥ बहुत प्रीतिसों शिवको ध्यावे । रिधि सिद्धि द्रव्य बहुत सुख पावे ॥ मन जिसके निश्चय कर धरहीं । गिरि कैलासमें वासा करहीं ॥ फिरके काल झपेटे बाहीं । डार देय भवसागर माहीं ॥ ताते संशय छूटे नाहीं । भवसागरमें जीव जो जाहीं ॥ शिवकी साधन है यह गती । निर्भय पद पावे नहिं रती ॥ जाके सुमिरे योगी यती । चौरासी भरमें उत्पती ॥ हरि हरकी यह कथा सुनाई । आगे और सुनाऊ भाई ॥

सारखी-शिवसाधनकी यह गती, शिव हैं भवके रूप ।

विन समझे ये जगत सब, परे महा भ्रम रूप ॥

नरक वासमें मनु परे, ऐसी शिवकी मौज ।

कहे कबीर विचारिके, मिटे न यमकी फौज ॥

चौपाई

हरि हरि नाम विष्णुका होई । विष्णु विष्णु भाषे सब कोई ॥ विष्णुहिं को कर्ता बतलावे । कहो जीव कैसे फल पावे ॥ सब घट माहीं विष्णु विराजे । खान पानमें विष्णुहि गाजे ॥ सकल भोग विष्णु जो लेही । भोग करे जग भरमें देही ॥

( ४४ )

भवतारणबोध

हरि हरि नाम विष्णुका भाषा । शुभ और अशुभ कर्म दोहराया ॥ इनमें करें कलोल सदाई । करें भोग जीवन भरमाई ॥ बहुत प्रीतिसो विष्णुहि ध्यावे । सो जिव विष्णुपुरीको जावे ॥ विष्णु पुरीमें निर्भय नाहीं । फिरके डार देय भूमाहीं ॥ हरि हरि नाम विष्णुका भाषा । हरिकी और सुनो अब साखा ॥ साखी-हरि नाम है विष्णुका, जिन कीन्हा सब जेर । चौरासी भरमे सदा, मिटै न भवका फेर ॥

चौपाई

सुनहु धर्मदास तुम हो साधू । इनको कबहुँ मत अवराधू ॥ हरि हर ब्रह्मा को है नाऊँ । रज गुण व्यापक है सब ठाऊँ ॥ जगत् कहै ब्रह्मा है करता । मर्म माहिँ सब बह बह मरता ॥ ब्राह्मण को पूजे ससारा । जीव होय नहि भवते न्यारा ॥ पढ़ पढ़ विद्या जग भर्मावे । भक्ति पदार्थ कैसे पावे ॥ पोथी पाठ पढ़ै दिनराती । ये केवल भ्रमके उत्पाती ॥ आप भरम ते निर्भय नाहीं । बहे जात हैं भ्रमके माहीं ॥ औरनको शिक्षा सब देही । ताते मिलै न परम सनेही ॥ पाप पुण्य का लेखा करही । विना भक्ति चौरासी परही ॥ यह ब्राह्मणकी यह करतूती । ब्राह्मण पूजे होय न सुक्ती ॥

साखी-त्रिगुण भक्ति है जगकी, निर्गुण लखै न कोय ।

सर्गुण निर्गुण दोह मिटै, भक्ति रहित घर होय ॥

इह त्रिगुणहि कि भक्तिमें, जिन भूलो धर्मदास ।

ऊपर निर्गुण जानिये, जहाँ योगीका बास ॥

चौपाई

धर्मदास सुनसन्त सुजाना । नर्गुण सों अब करो बखाना ॥ निर्गुण नाम निरंजन भाई । जिन सारी उत्पत्ति बनाई ॥