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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(१४७)

त्रिकालदर्शी घटोज्ञानवर्शी । बडानन्दकशीं मिटावर्तं तर्ही ॥ अखण्डं निर्द्वन्द्वं अयं पद्मगामी । जपेऽहं भजेऽहं कवीरं नमामि ॥६॥

पंचक्षेश इहितं घटो उर्मिदहितं । वेदोक्तं कुवानीं परखीं सर्वं वहितं ॥ यथा सु उतोत्कृष्टहे गुरुनामी । जपेऽहं भजेऽहं कवीरं नमामि ॥ ६ ॥

निजानन्द आपे देखी काल कांपे । माया नहीं व्यापे जपे मूनि जापे ॥ सोई शरणोंमें टरू ठाम ठामी । जपेऽहं भजेऽहं कवीरं नमामि ॥ ७ ॥

अजन्यं अमरणं सदा सिन्धुकर्णं । भवाब्धि महाकाल ताहि सुतर्णं ॥ सोई तवदास धरे ध्यान सामी । जपेऽहं भजेऽहं कवीरं नमामि ॥ ८ ॥

श्लोक ।

इदं स्तोत्रं पठेन्नित्यं श्रद्धाभावेन संस्थितम् । यस्य सर्वफलं भुक्त्वा तस्य मुक्तिर्न संशयः ॥ नमोस्तु ते कव्वीर साधु वृंद नमोस्तु ते । गोस्वामी धर्मदासं च वन्दनं मे पुनः पुनः ॥

अथ कवीरसाप्राज्यस्तोत्र ।

सत्यकवीराय नमः ।

शार्ङ्गलक्ष्मीडितवृत्तम् ।

नित्यानन्दसदात्मबोलरसितं चन्द्रावदातप्रभम् लोकातीतमहोदयं निजजनोद्धारवतारोदयम् ॥ सारासारविवेकपारग इति परीक्षको यो मतस्तस्मै सद्गुरुरूपिणे कुरु नमः श्रीमतकवीराय भो ॥१॥ प्रत्यक्षा प्रमितिर्न चागतिगती; चत्वारि भूतानि च संधिर्भावगतं च कार्य्यमपरो देहान्न जीवस्तु हि ॥ चार्वार्कैर्विरुतं परीक्षयति यो भावं स्वभावात्पृथक् । तस्मै सद्गुरुरूपिणे कुरु नमः श्रीमतक-

(१४८)

कवीरपंथी—

वीराय भो ॥२॥ जैनः प्राह जयं न जीवमितरं पुण्यञ्च पापं तथा द्रव्यं पुद्गलकञ्च कालमितियत्स्वातन्त्र्यता कर्मणि ॥ तद्युक्त्या- नुभवैः परीक्षयति यः किं तन्त्रता कर्मणस्तस्मै सदगुरुरूपिणे कुरु नमः श्रीमत्कवीराय भो ॥३॥ गोरक्षप्रमुखा वदन्ति वपुषः श्वासस्य संशोधनैरात्मानन्दकरोऽत्र भैरवने सिद्धिः ससुज्जूम्रते ॥ तच्चेदं नटवत्परीक्षयति यः कृत्या किमिष्टायुषा तस्मै सदगुरुरूपिणे कुरु नमः श्रीमत्कवीराय भो ॥ ४ ॥

शून्याज्जातमशून्यमेतदसुतः शून्यं भविष्यज्जगद्वाह्याभ्यन्तरभेद- तः परिणता चिद्वासना भासते ॥ इत्थं बौद्धरुतं परीक्षयति यः शून्यस्य साक्षी सकस्तस्मै सदगुरुः ॥ ५ ॥ योगी प्राह यमा- दिभिर्बहुविधैः स्याच्चेतसो निग्रहस्तेनात्मा प्रभुतासुपैति मणितो लोहः सुवर्णायते ॥ इत्युक्तं किमुतं परीक्षयति यो जातः क्वचि- ताभियात्तस्मै स० ॥ ६ ॥ स्वञ्चान्धे इव कर्तुं भोक्तृकलिते नित्ये अजाजे रते मृत्युः कुम्भवदेव सा परिणता सुक्तस्तया यः करी ॥ इत्युक्तं कियते परीक्षयति यः का भोक्तृकर्त्रोर्भिदा तस्मै स० ॥ ७ ॥

मीमांसा सु मिते श्रुतिर्विधिगतासूयाकृतिः स्यान्मुदे आत्मज्ञान गुणेश्वरे च परमं देवाश्च मन्त्रात्मकाः ॥ इत्युक्तं प्रकटं परीक्षयति यः कर्त्ता कथञ्चिक्रियास्तस्मै सदगुरुरूपिणे कुरु नमः श्रीमत्क- वीराय भो ॥ ८ ॥ आत्मानौ च विभू स्वतन्त्रपरतन्त्राभ्यां भिदा संशयाद्भूम्यादेः परमाणवः कृतनयाः कार्यस्य चारंभकाः ॥ काणादेः कथितं परीक्षयति यः कालञ्च किं वा विभोस्तस्मै सदगुरुरूपिणे कुरु नमः श्रीमत्कवीराय भो ॥ ९ ॥

प्रामाण्यादिवसुद्वयार्थविदुषोऽमी संजगौ गौतमं दुःखं ध्वंसकृतं दृशादृशमथो ज्ञानोपमर्दादिति ॥ तत्किं तथ्यमिदं परीक्षयति यो दुःखात्यये किं सुखं तस्मै स० ॥ १० ॥ सत्यं ब्रह्म न चान्यदस्ति

शब्दावली

( १४९ )

किमपि ब्रह्मैव चाहं ममाज्ञानाद्वाति ह्यनादितो जगदिदं रज्यौ भुजङ्गाकृति ॥ इत्थं दण्डिमत परीक्षयति यः स्वण्डव्यतण्डा- त्मकं तस्मै सदगुरुरूपिणे कुरु नमः श्रीमत्कवीराय भो ॥ ११ ॥ नानासूर्तिधरः पृथक्पृथगयं पूज्यश्च पौराणिकाः प्राहुः शंकरशां- करीशिवसुतः सूर्या हरिर्वा विधिः ॥ इत्याख्यानभरं परीक्षयति यः कोऽसावमूर्तिः परस्तस्मै सदगुरुरूपिणे कुरुनमः श्रीमत्कवीराय भो ॥ १२ ॥ शाक्तानां भणितं सुखात्मकचनं शक्तिः स्वधर्मात्मिका तस्या व्यक्तिरिहास्ति कौलकृतयश्चोर्णेः प्रकारैः स्वतः ॥ एत- त्कामकृतं परीक्षयति यो लोकस्य वाचाजुषस्तस्मै सदगुरुरूपिणे कुरु नमः श्रीमत्कवीराय भोः ॥ १३ ॥ यच्चोक्तं यवनैर्जगज्जनिक- रोऽल्लेयास्ति सोऽल्ला परः जीवा नित्यनवाः क्रियाफलजुषः कस्मिंश्चिदेवान्तरे ॥ तच्च नेकतय परीक्षयति यः स्वात्मानबोधो- दयात्तस्मै सदगुरुरूपिणे कुरु नमः श्रीमत्कवीराय भो ॥ १४ ॥ द्वैताद्वैतविभेदकनिराकारप्रकारादिवल्लङ्घ्यालङ्घ्यप्रकाश्यकाशप्र- तिभूप्येवापशेषातिगः ॥ यः कश्चिद्ब्रह्मता भवेद्वि विरतौ साप्ता- ज्यलङ्घ्या स्थिरस्तस्मै स० ॥ १५ ॥ एकोऽनेकसुशक्तिरादिपुरुषो जन्मावसानाजिते बीजं विश्वतरोर्विभुर्विहरतां यः पक्षिणां सन्मुदे ॥ भव्यं स्वातुभवं फलव्यतिरितं यस्मै समभ्यर्पयत्तस्मै स० ॥ १६ ॥

अमरपुरनिवासी पुरुषो योगदक्षश्चरणकमलमस्याभ्यंचतामा- र्यवर्च्यः ॥ य इह गुरुकवीरं तस्य साप्ताज्यकीर्तिस्तवमखिल- कलादचं पूर्णमभ्यरुप्य पूर्णः ॥ १७ ॥

इति कवीरसाप्ताज्यस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

गुरुस्तुतिः

ध्यानात्मानं परमात्मानं दानं ध्यानं योगं ज्ञानम् ॥ तीर्थज्ञानं इष्टध्यानं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ॥ ११ ॥ प्राणा देहं गेहं राज्यं

(१५०)

कवीरपंथी—

स्वर्ग भोग्यं मोक्षं भक्तिम् ॥ पुत्रं पित्र्यं वित्तकलत्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ॥ २ ॥ वानप्रस्थं पतिविधियर्थं पारमहंस्यं भिक्षोश्चरितम् ॥ साधोः सेवा भूसुरभक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ॥ ३ ॥ विष्णोर्भक्तिं पूजनचरितं वैष्णवसेवा मातरि भक्तिम् ॥ विष्णोः पितॄः सेवनयोग्यं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ॥ ४ ॥ प्रत्याहारं चेन्द्रियजयतां प्राणायामं न्यासविधानम् ॥ इष्टः पूजा जपतपभक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ॥ ५ ॥ मत्स्यः कूर्मः श्रीवाराहो नरहरिरूपो वामनदेवः ॥ त्रिभुवनसारो महिमापारो न गुरोरधिको न गुरोरधिकः ॥ ६ ॥ श्रीभृगुदेवः श्रीरघुनाथः श्रीयदुनाथो बौद्धसुकल्की ॥ अवतारा दश वेदे प्रोक्ता न गुरोरधिका न गुरोरधिकाः ॥ ७ ॥ गंगा काशी काश्ची द्वारा मायाऽयोध्याऽवन्ती मथुरा ॥ यमुना रेवापुष्करतीर्थं न गुरोर- धिकं न गुरोरधिकम् ॥ ८ ॥ गोकुलगमनं गोपुरमथनं श्रीवृन्दावन मधुपूरटनम् ॥ एतत् सर्वं सुमहत्पुण्यं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ९ ॥ तुलसीसेवा हरिहरभक्तिर्गङ्गसागरसंगममुक्तिः ॥ किमपरमधिकं रामे भक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् ॥ १० ॥ काली दुर्गा भुवना बगला श्रीमातंगी धूमा तारा । छिन्ना त्रिपुरा भैरवि कमला न गुरोरधिका न गुरोरधिकाः ॥ एतत् स्तोत्रं पठति च नित्यं मोक्ष- ज्ञानं सोप्यतिधन्यः ॥ ब्रह्माण्डांतर्यद्यहेवं न गुरोरधिकं न गुरोर- धिकम् ॥ १२ ॥

स्तोत्र सर्वमा ।

भूतल काल काल मन पेखि, अभय पद ब्रह्म लखावत कोतो । देखि प्रपंच अनेक लुभावन, जो फिरतो मन ठावन टोतो ॥ आप धनी निर्धार कियो, इतने दिन नाहक ऊसर जोतो । को भवसिन्धु उबारत जीवन, जो कलिनाम कवीर न होतो ॥ १ ॥

शब्दावली

(१५१)

बूडत जो अघ कुंडनमें, यम फन्दन फूँक समूह बधोतो । कर्म अकर्मनके गजरा, शिर पायतलोधर आन खगोतो ॥ ठावन ठान कुठान सबै तजि, कंचन काँच उठाय लयोतो । को भवसिन्धु उबारत जीवन, जो कलि नाम कवीर न हो तो ॥ २ ॥

जो प्रभु स्वर्ग पताल करे सब, जो प्रभु लोक अखंडित छाये ॥ जो प्रभु खान रचे पर चार, वही प्रभु वेद सुवेद बनाये ॥ सो सर्वज्ञ कहे सुखलाल, रमो सबही नर भेद न पाये । सो प्रभु नाम कवीर कहाये, उबारन जीवनको जग आये ॥ ३ ॥

दै निज नाम लखाय हिये, सत शब्द गहे सत लोक सिधाये । जीवनको अपनो करिकै, गुरु ज्ञान अखंडित सो दरसाये ॥ हे प्रभु ब्रह्म अपार अगोचर, को बरने गुरुके गुन पाये । सो प्रभु नाम कवीर कहाये, उबारन जीवनको जग आये ॥ ४ ॥

कवित-काशी है सुवश नगर प्रभुको निवास जहाँ, सन्तन शिरताज वास देखो हग मीरको । भारी अघ पुंज कैंपे देखि दयाको सिन्धु, बरने को लोक शोभा गुनके गँभीरको ॥ कहे सुखलाल शुक्र शोभित प्रकाश जाको, ताहिको निशान शुक्ल अति सुख हीरको । कहे सुने शम्भु गौरा जागे नर नाहिँ बौरा, भागे यम जौरा चौरा परसे कवीरको ॥ ५ ॥

सद्गुरु ब्रह्म कवीरको, जप मन बारम्बार ।

विना तपे फल मिले, परे न यमकी धार ॥

अथ कवीरपञ्चाशिकाप्रारम्भ ।

(कवीरमानुप्रकाश पृ० २८०)

तोटक छन्द ।

जय सत्य कवीर कृपाल घनं । दल दुष्ट हनं पय पुष्ट जनं । योगजीत अतीत पुनीत प्रभु । बपु धारन कारण तारन भू ॥१॥

(१५२)

कवीरपंथी—

सत सुकृत सत्य स्वरूप सदा । जन ध्यावत पावत मुक्ति- पदा ॥ मुक्तामनि ते जिव जो जुगता । मृत्यु लोक ससोक न भव जुगता ॥ २ ॥

हम दीन दुखी किमि त्याग चहौं । करुणामय हो करुणामयहो॥ करुणा तन धारि करी करुणा । करुणामय धौं करुणा वरुणा॥३॥

सुर सिद्ध बखानत खान दया । जिव देखि अनाथ सनाथ किया ॥ जेहि ज्वाल जला यम भक्ष करे । विनु देव दयाल को रक्ष करे ॥ ४ ॥

यम जालिम जीवन जेर कियो । सुधि लेन दयानिधि देर कियो॥ सुख लेश न केत क्लेश भरे । जगदीश परे जगदीस परे॥५॥

जिव काल करालके ज्वाल दहे । तर ऊपर भूपर धाय गहे॥ हम जानि दयाल जो काल भजे । गुण ग्राम प्रनाम सो नाम तजे॥६॥

घटवाह मलाह सलाह कहो । फिरि कैलकी गैलकी सैल न हो ॥ वह सिंह समान शिकार करे । पिय पीव विना कहँ जीव तरे ॥ ७ ॥

हरि केहरि देहरि पार करो । सरकार बडे वर कार करो ॥ भय भंजन रंजन दासनको । खल डाटत काटत कासनको ॥८॥

भवसागर झागर काल बली । तहँ जीवकी उक्ति न युक्ति चली ॥ नहिं एक उपाय बनाय बनी । करु काज गरीब निवा- जगनी ॥ ९ ॥

प्रभु पेखतही जिव शीतल है । क्षणमें भवसिन्धुको पार लहे ॥ करुणा दग कोटिन काल हने । सुर सिन्धु कणा गिरि बिन्दु बने॥१०॥

मति धीर कवीर कवीर भजो । हित नाम प्रिया वित वाम तजो ॥ तपखान किरसान शिलादहके । जरते जिव प्रभु मार- गते वहके ॥ ११ ॥

शब्दावली

(१५३)

तलफै तपतीख सभी तलमें । विनु नाथक नेह नहीं पलमें ॥ निज शिष्य निवाज सुदृष्टि लखो । शिरपै समरत्थ जो हृत्थ रखो ॥ १२ ॥

नर बाल बिहाल निहाल मही । दुख द्रन्द दवारि न देह वही ॥ मनभौ मदमोचन लोचन है । जन रक्षक भक्षक पोचन है ॥ १३ ॥

सब लायक नायक हंसनके । जिव मोषक पोषक अंशनके ॥ सर्वोपर साहब शीवनके । तुम जीवन नाथ हो जीवनके ॥ १४ ॥

प्रभुके भ्रमते जमते बजरे । यहि तत्त शिलापर आनि जरे ॥ तपिया जपिता न पिया परखे । विधि वेदनते हरखे ॥ १५ ॥

जिव काज चले शिरताज सभी । महराज मया सुख साज लभी ॥ भव भार हनो करतार धनी । धरम राय न पाय दुखाय दुनी ॥ १६ ॥

करि नेह विदेह जो देह धृतम् । शब्दावृत जीव भये कृतकृतम् ॥ मृत नायक सायक तीख हते । पद प्रीति प्रतीति सहीत गते ॥ १७ ॥

परमारथि भारथि नाथ सदा । गहते लहते भव पाथ हदा ॥ जन जाय समाय अमान पदा । शुभज्ञान कुरान नसान मदा ॥ १८ ॥

मुनि मानस हंस सुनीन्द्र मता । समता लह पाय पता रमता ॥ तवनाम सुधा वसुधा जो पिया । नक्षुधा युगही युग जीव जिया ॥ १९ ॥

दुखिया हित आय महासुखिया । लखि पीवहि जीव भये सुखिया ॥ कहुँ और न दौर तो पौर परे । शरनी परनी करनी न खरे ॥ २० ॥

पद तीर कवीर शरीर जिते । लहसार भै ब्रह्म अकार तिते ॥ जग योनि जहान महान महा । गुरु देवको भेव न तेब लहा ॥ २१ ॥

कमलापति क्यों कमलापति हो । पद कीरति कीरति कीरति

( १५४ )

कवीरपंथी-

हो ॥ भुगव्याध समाध अगाध गहे । कलयान सिरान न ध्यान लहे ॥ २२ ॥

गुण गाय फणीगणराय निति । नहिं पावत पार अपार गति ॥ लवलौन प्रवीण नवीन जसे । कलि पंक कलंक निशंक नसे ॥ २३ ॥

विषया बन राय भुलाय परे । दुख दौन बिनाकर कौन धरे । कह कौन संदेश अंदेश बडा । मग भूलि गई ठग आनि अडा ॥ २४ ॥

जिन शोककी झोकमें भूलि रहा । करता भरता अम भूलि रहा ॥ तिहुँलोक विलोक लगी अगिनी । यह जामिनि है यमकी भगिनी ॥ २५ ॥

तंक सूरको नूर जहूर हुआ । ममता रजनी दुख दूर हुआ ॥ सगरे पमरे झगरे बगरे । पशुज्ञान गहे डगरे डगरे ॥ २६ ॥

बक चाल सभी न मराल मती । बिन एकरती व न एक रती ॥ जब गर्भमें अर्भक अर्जक करे । तिहि गाढते साहब गाढि धरे ॥ २७ ॥

इत औरहि ढालको ख्याल खिला । बुद्धि खस परे यहि तस शिला ॥ बह औध अचेत सुषोपति सो । कह पाय पराग बनारसको ॥ २८ ॥

निज धामते राम पयान लिया । जगती भगती पद पाय पिया ॥ कितहो झलकी मनसा मलकी । अरु अन्ध अचेतकी भय टलकी ॥ २९ ॥

दुगदानि कि बानि बिहानि इते । मकरन्दको फन्दको जीव जिते ॥ मृत सुंगन बिग बिहार करे । कर्म रेख विशेष न देख परे ॥ ३० ॥

नहिं कोधित अन्धकी गन्ध मिले ॥ जीव दंडक भंडक भीर हिले ॥ गुरु पीर कवीर उजागर है । भव बोहित सो हित सागर है ॥ ३१ ॥

शब्दावली

(१५५)

जग बन्दन भर्म निकन्दन है। शरनी शतलोककी सन्दन है ॥ सतनाम सनेह सुधाम चढे। कलिमां कलिमां कलिमां ह पढे ॥ ३२ ॥

गुण ग्राम निकास कवीर कवी। यश गावत पावत कोटि छबी ॥ धुरधर्मधरा धर धारक हो। भवतारक पंथ प्रचारक हो ॥ ३३ ॥

नर पामर धामर बुद्धि बिना। यम ज्योति पतंगके ढंग बना ॥ जग व्याधि रु आधि असाध करे। चरणाम्बुज चरण चारु हरे ॥ ३४ ॥

भवतारण हेत निकेत कृपा। पयगाम लियो सुखधाम नृपा ॥ सुर भूप स्वरूप अनूप छिपा। रवि सोम जो कोटिक रोम दिपा ॥ ३५ ॥

गुरु गुप्त कियो धुरको बरनन। भव और भया बन तो शरनन ॥ हमरे उसके पुरवास करौ। निजु दासनको अब दास करो ॥ ३६ ॥

बिन कन्तके भवजल जन्त घने। दुःख द्वन्दक फन्दक फन्द फने ॥ जग नाहकी बाँह निबाह लहे। भ्रम भोडर में भेडर भीर बहे ॥ ३७ ॥

दनुजात बलात निपात भये। रणधीर वहीर गहीर गये ॥ जिहि जानत जाम सुधार धरे। मुनिके मन मंदिरमें विहरे ॥ ३८ ॥

मन मत्त मतंग मते यहि गौ। तुहि रावत होय महावत जौ। चित्त चञ्चर वञ्चर वञ्चक है। सम सञ्च विरञ्च न रञ्चक है ॥ ३९ ॥

यम वंकट संकट जीव महा। दमको गमको रमको न रहा ॥ भव सेत अभै पद देत तुही। कलि कण्टक कोटिन कर्म दही ॥ ४० ॥

चटि सेत पपीलन दील। तहाँ लंघेदीन पयोनिधि पीन महा। न वञ्चको हाड न चाड रहो। मन वाक शरीर कवीर कहो ॥ ४१ ॥

गुरु नेइ नदी सन दीस जिन्हैं। सुख वास न आस है त्रास

(१५६)

कवीरपंथी—

तिन्हैं ॥ तुम दीनन बन्धु न पीननके । नित पास हो दास अधीननके ॥ ४२ ॥

मद मान भला न हिये अर भौ । नर नागर सागर भौ गरभौ ॥ करि पाप कलाप करे दुनिया । विष बीज अभी फलको लुनिया ॥ ४३ ॥

हरिमें हरिमें हमही बरषे । लहरी भव भक्ति हरी हरषे ॥ दुख दारिद वारिद ज्ञान घन । निर्भय करि भय समनं समनं ॥ ४४ ॥

जिव कालके जाल परे बपुरे । सतनाम निकाय सदा जपुरे ॥ गुरु भक्ति निनार किनार गहे । चतुरे लुतरे भवधार बहे ॥ ४५ ॥

भ्रम भूलते भूलते जात भगे । बुध बालन डालन पात लगे ॥ मन वाचक जाचक हौं दरको । तुम छोड़ अजोड़ सभी घरको ॥ ४६ ॥

प्रभु नामको दान निदान चहौं । कोइ आस रु बास विकासन हो ॥ तरनी बरनी तव नाम जहाँ । गहिये लहिये विश्राम तहाँ ॥ ४७ ॥

रसना रस रास रसै रस सो । जस तो वस और सबै कस सो ॥ चढ नाम रथागढ़ बीत विथा । रसना रस ना विन कीर्ति कथा ॥ ४८ ॥

पद पंकज प्यार जो छूटि गया । अरु सूत सनेहको टूटि गया ॥ ठग ठाकुर आनिके जूटि गया । जग जीवनकी बुधि टूटि गया ॥ ४९ ॥

रहगीर मते बड़ी भीर भई । सतपंथ बिहाय कुपंथ लई ॥ गुरु भक्ति विना भव भूलि पडे । शरणागत पाहि कवीर हरे ॥ ५० ॥

दोहा—यह कवीरपंचाशिका, पढि सप्तीति परतीति ।

परम पुरुष पद पावई, काल कष्टको जीति ॥

इति श्रीकबीरमानुप्रकाशान्तर्गत श्रीकबीरपंचाशिका स्तुतिः समाप्ता ।

गुरु स्तोत्र ॥

गुरु दीनदयालं जन-प्रतिपालं, मेट विशालं जमजालं संतन रक्षपालं वचन रसालं, अतिहि कृपालं अतिकालं ॥ अति दुस्तर चालं पंथ करालं, अलमस्त हवालं सुख सालं । जय परमानंद

शब्दावली

(१५७)

पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ १ ॥ गुरु ब्रह्मस्वरूपं पुरुष अन्तृपं, सदा समीपं दिव्य सूरूपं । इच्छा जब कीन्हा जग पग दीन्हा, भगत प्रवीना संतनभूपं ॥ वैराग निधाना ज्ञान विज्ञाना, धुन ध्यान अन्तृपं उर मालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ २ ॥ चारों युग आये संत कहाये, भर्म मिटाये जन केरा । जे जन मन भाये ते अपनाये, सत शब्द हठाये जल बेरा ॥ न पाखंड पूजा देव न दूजा, दिल आतम हेरा लख लालं । जयपरमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ ३ ॥ बंकेज बचाये सहतेजी पाये, चतुरभुज गाये मतभारी । धरमन बुद्ध आगर सबगुण सागर, पंथ उजागर कुलतारी ॥ द्वादश शिष्य सारे पंथ पियारे, सत शब्द बिचारे सुन आलं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं आनंदकंदं जनपालं ॥ ४ ॥ गनिका संग लीना ता रंग भीना, करमें कर दीना हंसि डारी । काशी पुर बासी भये उदासी, देख खवासी मति स्वारी ॥ सब बोल अबोला राव अडोला, पगपर जल डारी बुझि झालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ५ ॥ पातशाह रिसाना अहमक कूँफराना, बेपीर हराना कर डारी । पग डार जंजीरा बोरे नीरा, गंगा तीरा फंद टारी ॥ गयंद झुकाये सिंह दिखाये, बासंदजाली चंद तालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ६ ॥ सिकंदर पीरा भयो अधीरा कह गुरु पीरा बल जाऊँ । तेहि नाम तमाली कही कमाली, मन भई खुश्याली सुधमान् ॥ कमाल जियाये सुरदार उठाये, सत-

(१५८)

कवीरपंथी

शब्द सुनाये हृद रूयालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंद- कंदं जनपालं ॥ ७ ॥ जग जीवन तारे रतन उबारे, जग पग धारे हितकारी । युग युग चलि आये हंस चेताये, भरम मिटाये गुरु चारी ॥ अलमस्त दिवाना सब जग जाना, दे परवाना लिख भालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनंदकंदं जनपालं ॥ ८ ॥ शिव राम अयाना सब जग जाना, नहीं सयाना लघु- बारं । मैं अपत अपावन गुरु पद पावन, अघपुंज जरवन कर छारं ॥ बड धीरज दीना निर्भय कीना, जग किंकर मारं कर ढालं । जय परमानंदं पुरुष अखंडं, आनन्दकंदं जनपालं ॥९॥

( कवीर महिमासे )

साखी ।

गुरु अष्टककू नित जपै, धरे निरन्तर ध्यान । भक्ति शरी- रहि ऊपजै, ज्ञान विज्ञानसुं जान ॥

॥ गुरु अष्टक ॥

सत सुकृतं सीरं सत कवीरं, अमर शरीरं स्थीरं । अजरम चितं रहे निचितं, त्रिगुण अतीतं गुरु पीरं ॥ अवगत अविकारी विषम विडारी, भ्रमतमहारी परकाशी प्रेम प्रकाशी, काशावासी सुखराशी ॥ १ ॥ माया गो पारं तजत असारं, धारत सारं संसारं । करुणा सुखसागर सब गुण आगर, भेष उजागर जग- तारं ॥ सत नाम सनेहा पुरुष विदेहा, करुणागेशा दुखनाशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्रकाशी काशीवासी सुखराशी ॥ २ ॥ उद बुद जग मूलं माया फूलं, सब जग भूलं त्रिय झूलं । संसारं पारं दुख सुख धारं, सदा असारं जग भूलं ॥ सत गुरु सुख सिन्धो दीननबन्धो, माया द्रन्दु तजनाशी । जय जय अवि-

शब्दावली

(१५९)

नाशी प्रेमप्रकाशी, काशी-वासी सुखराशी ॥ ३ ॥ तन मन गत जीतं बचन अभीतं माया अतीतं गत क्रोधं । ममता मद लोभं रहित अछोभं, समता शोभं शुध बोधं ॥ गुरु दीन दयाला जन प्रतिपाला, मेट विशाला चतुराशी । जय जय अविनाशी प्रेम- प्रकाशी, काशीवाशी सुखराशी ॥ ४ ॥ अनवद्य अखंडं सब जग मंडं, अतिहि प्रचंडं गुरु धरमं । सब वर्णाश्रमं भूले भ्रमं. पावन मरमं कर सरमं ॥ थक चारू वेदं न भेदं, ज्योति अछेदं तम- नाशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्रकाशी, काशी-वासी सुख- राशी ॥ ५ ॥ चारों जुगआये हंस चेताये, शब्द लखाये सुख- दाई । मधुवन पग धारे रतन उबारे, चौका सारे गति पाई ॥ धरमनि मन भाये वचन सुहाये, पंथ चलाये तज फांसी । जय जय अविनाशी प्रेम प्रकाशी, काशी-वासी सुखराशी ॥ ६ ॥ सुलतान चपेहू डार जंजीरू गंगातीरू भय पारं ॥ महमंत गयंदा मारत अंधा, गर्जत सिंधा मद डारं ॥ पग पर जल डारे पण्ड उबारे, अचरज सारे नृप काशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्र- काशी काशीबासी सुखराशी ॥ ७ ॥ मगहर स्थाना भई घम- साना, विरसिंध पठाना दल साजी । सत गुरु अलसाना चादर ताना, दोउ दीन मुलाना मनराजी ॥ घटका दोय भेहा खोलो तेहा, भूल विदेहा सुख राशी । जय जय अविनाशी प्रेम प्रकाशी, काशी-वासी सुखराशी ॥ ८ ॥ आत्म सुख धामं लिख शिव- रामं, सदा अरामं गुरु पासं । अघपुंज नसावन गुरु पद पावन परसत जावन सत्य भासं ॥ विनती सुनि लीजै दरसन दीजै, अपना कीजै अघनाशी । जय जय अविनाशी प्रेमप्रकाशी, काशीवासी सुखराशी ॥ ९ ॥ (कवीरमहिमासे)

“कवीर” नाम साहात्म्य ।

श्रीपार्वत्यवाच ।

कवित्त-अहो महादेव तीन अक्षरको एक नाम, कहैं कवीर तासो कहो यह को हैजू । देव उपदेव है कि लोक लोकपाल है कि, यतिकि तपी कि सिद्धि साधक लो सोहैजू । योगी योगध्यानी है कि व्रत है कि संयम है, यंत्र है कि मंत्र किधों तंत्र मन मोहैजू । किधों धाम क्षेत्र कोई तीरथको नाम हैं; कहो कृपाकरि जग योग यज्ञ जो हैजू ? ॥ १ ॥

श्रीमहादेव उवाच ।

कहत ककार जासो केवल सो ब्रह्म जानो, मानो वी-शेष बीज अक्षर जगतको । जेते ब्रह्माण्ड पिण्ड आदि अंत-मध्य तहां सो, रमत रकार ज्ञनकार है भगतिको । भावी भूत भवितव्य तीनों अक्षरते न्यारो, नाही सो यही बात प्रमाण वेदमतिको ॥ ताहिंते कहत है कवीर तीन अंकजोरी, मोरि मोरि औरही कहैगे ते अगतिको ॥ १ ॥

जलमें कवीर और थलमें कवीर पांच, तत्वमें कवीर तीन गुणमें कवीर है । विद्यमान जानो यों विशेष अवशेष नाहीं, रहै कैसे निशि दिन ज्यो दृगन नीर है ॥ स्थावर औ जंगमके जेते जीव जगत मांझ, रह्यो भरपूर जैसे जड़ित जंजीर है । ताही ते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि २ और ही लगावे सो अधीर है ॥ २ ॥

कहत ककार सुखसागर दातारपति, ध्यानके साजन गुरु-ज्ञान बीज बानी है । रटत रकार सो रहित आदि अंत मध्य, कहत चाहत जाकी अकथ कहानी है । गुंगेके सो गुड जोई खाय

श्री १०८ पं० श्री उग्रनाथ साहय

सत्यनाम

कबीरधर्मिन्धर इन्दोरेके भूतपूर्व आचार्य प्रफेसनेश्वर श्री १०८ शंकर सम्प्रदायसमी साहय सत्यनाथसाहारी

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शब्दावली

(१६२)

सोई स्वाद जाने, चुप चाप हूँके कछु बात न बखानी है। ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि और ही कहेंगे ते अज्ञानी है ॥ ३ ॥

थलचर अस्थावर जंगम जगतमांझ, कवीर सबके कायाको अधीश है। विविध विलास हास ममता जपाय यश, छाजत अकाश छाया हगकी कशीस है ॥ राजत रकार रति राग अनु-राग सदा, जगत विभाग केहु तक न ईश है। ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि और भाषे सो तो मूढ विस्वेवीस है ॥ ४ ॥

कंज जैसो फूल्यो इंगला पिंगलाके मांझ पैठि, अज है पवन सो आकाश वाही अंक है। विविध प्रकार ज्ञानी गावत ज्ञान वाही, ध्यानी धरे ध्यान भुक्तिके बीच बंक है ॥ वाही रंकार झनकार करे आठो याम, रसना रटेते नाम कटत कलंक है। ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि औरही कहे ते यमशंक है ॥ ५ ॥

कहत पिथूरसर सागर अधीश वाही, सुखकी लहरि लहरत आठो याम है। वाहि जो विहारी विहरत बंकनाल बीच, तृष्णा मोह जाल ताको अमि निज नाम है ॥ भूआदि लोक पाल-अतल आदि अंक जेते, तेते मांझ रक्षक प्रदक्षक सो धाम है। ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि २ और भाषे ताने जान्यो नहि राम है ॥ ६ ॥

करुणाको सुख सागर अगाध राजे गाजे, दिन रात बाजे दुंदुभी अपार है। विविध प्रकार जो विचारे तकुटीके मांझ, मनसा विस्तार ताने दीसे कर्तार है ॥ वाही जो रकार योग रण

कवीरपंथी शब्दावली ६

(१६२)

कवीरपंथी-

संश्राम सदा, कामादिक बैरिनको करत प्रहार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि २ और भाषे ताने जान्यो नहि सार है ॥ ७ ॥

कक्का कामनाको देनहारो है जगत मांझ, बक्वा त्यों विहंग सब इन्द्री जीतवार है। रमत रकार चारों वेदनमें धार धार, बार बार कही सही वाही कतार है नाद और विदक कशिशा है जोरि देखो, मोरि देखो घोटिक की घाटी घनसार है। ताही ते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि मोरि और ही लगावे सो गँवार है ॥ ८ ॥

कका कंदर्प जासो वीर्य कहत कोऊ, उलटि चढावे जो बढावे यों कपालमें। विविधि विलासके विषयनते विमुख है, डारे अघधोय खोय लोकलाज हालमें ॥ दया युक्त हैके त्यों निरोगी देह पायके, वही रत्न डर लेके रहै रटत हवालमें। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी कहैं सो तो जाय जम जालमें ॥ ९ ॥

हीरा मोती पन्ना और अक्षर निहारो सर्व, वही जो ककार चिंतामणि को अकार है। विविध प्रकार महिमाके जिते जाल, तिन्हे जानत मराल संत वही जो बकार है। रचित रकार सो जटित सब लोक ओक, वाकी कलानि मांझ रटत रकार है। ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी कहे सूझे नहि वार पार है ॥ १० ॥

वेद निज अंकनको नाम गुने अंक जेते, तेते और वृक्ष यों ककार कल्प-तरु है। विविध विशेष भाव साक्षी है जगत मांझि, अगर रस चोआ मांझ जानियो अतरु है ॥ राजित रकार सब अक्षर रहित जैसे, विद्युत प्रकारके अकाश भास भरु है। ताहिंते

शब्दावली

(१६३)

कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी कहै सो तो महा- नीच नरु है ॥ ११ ॥

घटत घटावत बढावत बढत विधु, क कलासेती त्योंही जगत व्यवहार यो । विवेक संबन्धिनि सुबुद्धि जासो कहैं कवि, रसके लहरिकी समूह सो रकारयो ॥ दशो द्वार घेरे पुनि छहु द्वार हेरे घनी, पेटि बीच टेरे निरेहूर दरबार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीनि अंक जोरि, तोरि तितुका सो जग होय भवपार यो ॥ १२ ॥

कर्म उद्धार जो सो ककार थिर चरमांझ, विधिहुकी मुक्ति सो पंथपार प्रमाण यो । रसनाके मूलमें पियूष सिन्धु राजे गाजे, निशिदिन बाजे विनु तार करता यो ॥ इन्द्री दशो घेरे दशो द्वार एक जोरि करि, त्रिकुटके मांझ हेरि गंगाजीकी धार यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि दे स्वास तब दिसै सिर्जनहार यो ॥ १३ ॥

कलनकी कीर्ति सो कलेश बेलि खंडवेको, विपत्ति बिहंडवेको कहत प्रचंड यो । विविध विलास सत्य लोक आस पास मंद, हांसके प्रकाश कोटि भास करै दण्ड यो ॥ सोह रसवंत रस रूपको स्वरूप जानै, तानै जब सो कठिन करालको दण्ड यो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरी, और और कहै ताको सुकृत बिहंड यो ॥ १४ ॥

करुणाको सागर उजागर है काया माझ, क्यों न धसि देखो अवरेखो दशों द्वार वो । विविध भावको विशारद है आठों याम, तजि धनधाम जो विचारे वार पार वो ॥ रमत रमावत रहत दिन रेनि ऐसे, जैसे परमान हैं झरोखाके मझार वो । ताहिते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरि और कहै सो तो भूल्यो निज सार वो ॥ १५ ॥

(१६४)

कवीरपंथी—

कमल ते भयो जे प्रकाशी विधि नाम जाको, जगत् विलासी तासु कहत कर्तार वो । विविध प्रकारके विकार दुख नाशवेकूँ, कामादिक फांसवेकूँ करवत कुहाड वो ॥ तीनों गुण राजत रकार माझ माया बाद, अति अहलाद रस सागर को सार वो । ताहिंते कहत हैं कवीर यह तीन अंक जोरि, मोरि और भाषै सो तो छिति पर भार वो ॥ १६ ॥

कहत ककार कलिमल निस्तार जो पैसो, कामादिक भार छार छार करि डारे जो । दुर्जनके वृक्ष भव कानन विदारवे कूँ, ब्रह्महि विचारवेकूँ क्षमा उर धारे जो ॥ रसना उचारे सत भाव पण पारे हानि, बांधि विदारे काम क्रोधको मेटि डारे जो । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, हंसि मुख मोरि लोक लाज को विडारे जो ॥ १७ ॥

कक्का कैवर्त भवसागर उतारे पार, विविधि प्रकार अघ जारन वकार तो । केशवको केवल जो नाम सो रकार जाने सो, ताहीको बखानै भव होय वार पार तो । दान व्रत तीरथ विधान योग यज्ञ जेते, ते ते कह्यो श्रुति मांझि नामहीको लार तो । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मोरी मोरी और कहै बूढे कारी धार तो ॥ १८ ॥

कहत करार सो कमलको अकार उर, सबही को प्यारो है उजारो ज्ञानी जनको ॥ कहत विचित्र इतिहास किते वेद मांझ, रसकी स्मृति सो मुख दाता तन मनको ॥ ताहि जो न गावै मुख पावै कहो कौन भांति, मुक्तिको धावै नहि पावै सो एक कनको । ताहिंते कहत हैं कवीर तीन अंक जोरि, मेरे ऐसेही कहै सो तो सांचे पनको ॥ १९ ॥

कुमोद प्रगट हूँके सुमिरत विधि जाहि, सोइ ककार निरधार