कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(३८)
कबीरपंथी-
चार वेद अरु किताब पुनि, शास्त्र हदीस पुरान । भुगोल खगोल विज्ञान सब, शब्द प्रमाण ते जान ॥ ५ ॥ विना शब्द जगमें कहूँ, अहै न होवन हार । सतगुरु वचन प्रमाण है, मनमें लेहु विचार ॥ ६ ॥ शब्दे मारा गिर पड़ा, शब्दे छोड़ा राज । जिन जिन शब्द विवेकिया, तिनका सँबरा काज ॥ ७ ॥
इसलिये-
काज संवारे आपनो, वचन गुरुको मान । ८ ॥ “माने वचन सो वंश है” सतगुरु शब्द प्रमान ॥
परन्तु-
शब्द हमारा आदि का, सुनि मत जाहु सरख । जो चाहो निज तत्व को, शब्दे लेहु परख ॥ ९ ॥
इयोंकि-
शब्द विना सुरति आँधरी, कहो कहाँको जाय । द्वार न पावे शब्द का, फिर फिर भटका खाय ॥ १० ॥
किन्तु-
शब्द शब्द बहुअन्तरा, सार शब्द मथि लीजे । कहैं कबीर जहैं सार शब्द नहीं, धिग जीवन सोजीजे ॥ ११ ॥ सार शब्द पाये बिना, जीवहिँ चैन न होय । फन्द काल जेहि लखि पड़े, सार शब्द कहि सोय ॥ १२ ॥ सतगुरु शब्द प्रमान है, कहो सो बारम्बार । धर्मनिते सतगुरु कहै, नहिं बिनु शब्द उबार ॥ १३ ॥
संगलाचरण
(३९)
सतगुण वचन
(आगम संदेश)
धर्मनि सार भेद अव खोलौं । शब्दस्वरूपी घटघट बोलौं ॥ शब्दहिं गहे सो पंथ चलावे । बिना शब्द नहिं मार्ग पावै ॥ प्रगटे वचन चूरामनि अंशु । शब्द रूप सब जगत प्रशंसु ॥ शब्दे पुरुष शब्द गुरुराई । बिना शब्द नहिं जिवसुकताई ॥ जेहिते मुक्त जीव हो भाई । सुकतामनि सो नाम कहाई ॥
इतलिये-
शब्द कहै सो कीजिये, गुरुवा बडे लबार ।
अपने अपने स्वार्थको, ठौर ठौर बटमार ॥
ताते धर्मनिकर परचारा । बिना शब्द नहिं जीव उबारा ॥
शब्द गहे सो पंथ चलावे । बिना शब्द नहिं सत्य लखावे ॥
शब्द गहेसो भौ जलपारा । बिना शब्द नहिं जीव उबारा ॥
याते शब्द सनेही कीजै । जीवन जन्म सुफल करिलीजै ॥
ताते संग्रह कीन्ह यह, शब्दावलि धरि नाम ।
गुरु संतनको वन्दगी, बारबार परनाम ॥
॥ इति भङ्गलाचरण ॥
आगम संदेश जिसको चाहिये. इस पतेसे संग्रह सकता है. इसमें पंथका मविष्य पुरापुरा वर्णन है. मिलनेका पता—स्वामी श्रीगुलानन्द विहारी, कबीराश्रम पो खरसिया स्टेशन जि० विलासपुर. सी. पी. ॥
सत्यमुकृत आदि अदली अजर अचिन्त पुण्य मुनीन्द्र कल्याणमय कबीर सुरति योग सन्तायन धनी धर्मदासकी दया सर्व सन्त महन्तांकी दया ।
अथ कबीरपंथी-शब्दावली
प्रथम खण्ड-प्रथम विभाग :
संज्ञा सुभिरन-प्रारम्भः
साखी
गुरुको कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परनाम । कीट न जाने भुंगको, वह करले आप समान॥
संज्ञा गौरी ( समय सुर्यास्त )
गुरुसों लगन कठिन है भाई ॥ लगत लगे बिनु काज न सरिहै, जिय परलेतर जाई ॥ मृगा नाद शब्दका भेदी, शब्द सुनन को जाई ॥ सो शब्द सुनि प्राण दान दे, नेक न तन को डराई ॥ तजि गृहबार सती एक निकसी, सत् करन को जाई ॥ पावक देख डरे नहिं मनमों, कूदपरे सर माई ॥ पपिहा स्वाति-बुन्द के कारण, पिया पिया रट लाई ॥ च्यासे प्राण जाय क्यों न अबहीं, और नीर नहिं भाई ॥
शब्दावली
(४१)
दोय दल आनि जुरे जब सनमुख, सूरा लेत लड़ाई ॥ टूक टूक है गिरे धरणि में, खेत छाड़ि नहीं जाई ॥ छाडे अपने तन की आशा, निरभय है गुण गाई ॥ कहें कबीर ऐसी लव लावे, सहज मिले गुरु आई ॥ १ ॥
साखी
काल खडा शिर ऊपरे, जागु विराने गीत । जाका घर है गैलमें, सोव कस सोव निचित ॥
॥ गौरी ॥ २ ॥
॥ सकल तजि नाम सुमिर रे भाई ॥ माटी के सँग माटी मिलिहै, पवन में पवन समाई ॥ जतन जतन कर सुत को पाले, काचा दूध पिलाई ॥ सो बेटा रे काल है बैठे, बाबा कहत लजाई ॥ जो तिरिया मुख बिरिया खवाती, सोवत अंग लगाई ॥ सो तिरिया मुख मोरके बैठी, टूटिगयी सगम सगाई ॥ जो देहिया पर नीर पखारे, चोवा चँदन लगाई ॥ सो देहिया पर काग उड़त हैं, देखत लोग घिनाई ॥ झूठी काया झूठी माया, झूठी लोग लुगाई ॥ कहें कबीर सुनो भाइ साधू, झूठ जगत पतियाई ॥ २ ॥
साखी
साधु हमारे आतमा, हम साधुनके जीव । साधुन मध्ये यों रमूँ, ज्यों पय मध्ये घीव ॥
गौरी ॥ ३ ॥
॥ दासपर नाम ध्वजा फहराई ॥ काल जंजाल निकट नहीं आवै, माया देखि डराई ॥ जो कोई दाससे द्रोह विचारे, प्रभु को नाहि सोहाई ॥ हिरण्यकुश की वा गति हो गई, रावण धूर उड़ाई ॥
(४२)
कबीरपंथी—
दुरयोधन परिच्छित राजा, फिर पाछे पछताई॥ सुर पण्डित औ नृपति बादशाह, ऊंची पदवी पाई ॥ भक्ति बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥ का भये वेद पुराण गुन गाये, सत्य दया नहिं आई ॥ अहंकारमें सबहिं भुलाने, अजगर जनम सो पाई ॥ हम तो कान राखी नहिं भाई, ज्यों का त्यों ठहराई ॥ भावे कोई दुख सुख करि माने, भक्ति के पंथ चलाई ॥ योग, यज्ञ, तीरथ, व्रत, संयम, करनी कोटि कराई ॥ नाम बिना सबही है खाली, कहैं कबीर समुझाई ॥ ३ ॥
संगीतरत्नमालामें यही पद इस प्रकार हैं— ध्वनी गौरी वृन्दावनी (समय सूर्यास्त)
॥ दास पर नाम ध्वजा फहराई ॥ काल जाल निकट नहिं आवे, माया देखि डराई ॥ जो कोई दाससो द्रोह विचारे, प्रभुको नाहिं सुहाई ॥ हरनाकुशकी वह गति हो गई, रावण धूर उड़ाई ॥ सुर ब्रह्मा नृप अरु इन्द्रकी, ऊंची पदवी पाई । भक्ति बिना सब तुच्छ बराबर, बांधे यमपुर जाई ॥ कहैं भयो वेद पुरान पढ़े से, घट महे दया न आई । अहंकारसे भवमें डूबे, अजगर तन धरि भाई ॥ हमनहिं कान करी काहू की, ज्यों को त्यों दर्शाई । चाहे कोई सुख कोई दुःख मानो, सत्य कहौं गोहराई ॥ योग यज्ञ तीरथ व्रत संयम, साधन कोटि कराई । विनु गुरु सफल होत नहिं कबहुँ, कहे कबीर समुझाई ॥
साखी ।
नाम लिया तिन सब लिया, सकल वेदका भेद । बिना नाम नरके गये, पढ़ि पढ़ि चारों वेद ॥
गौरी ४ ।
॥ बंदे नाम साहेब का ले रे ॥ एक लख पूत सवा लख नाती, संपति थिर ना रहे रे ॥ लंका ऐसे कोट विनशि गये, छिन
शब्दावली
(४३)
में ऐसो बाव बहे रे ॥ न कोई तेरा तू ना किसी का, पैडोई खलक बहे रे ॥ नदी नाव संयोग जुरो है, ऐसो मिलना हैरे ॥ मातु पिता सुत बंधू तिरिया, कोई न संग चले रे ॥ ये सब हैं स्वारथ के संगी, गुरु विन सुख न लहे रे ॥ छिनकमाहिं तन विनशि जायगा, फिर कछु करिना सके रे ॥ ताते वेग सम्हार अपनपौ, साहेब कबीर कहे रे ॥ ४ ॥
साखी ।
साहब से सब होता है, बन्दे से कछु नाहिं ॥ राई सो परवत करे, परवत राई माहिं ॥
- गौरी ५ ।
॥ अवधू कुदरत की गति न्यारी ॥ रंक निवाज करै वह राजा, भूपति करै भिखारी ॥ एते लौंग फल नहिं लागे, चंदन फूल न फूला ॥ मच्छ शिकारी रमे जँगल में, सिंह समुद्रहिं झूला ॥ रेंड-हख भयो मलयागिर, चहुँदिशि फूटी बासा ॥ तीन लोक ब्रह्मण्ड खण्डमें, अंधा देख तमासा ॥ पंगुल मेरु सुमेर उलंघे, त्रिभुवन मुक्ता डोले ॥ गुंगा ज्ञान विज्ञान प्रकासे, अन-हद बानी बोले ॥ अकाशहिं बांधि पताल पठावै, शेष र्वर्ग पर राजे ॥ कहैं कबीर राम हैं राजा, जो कछु करे सो छाजे ॥ ५ ॥
आरती प्रारम्भ ।
आरती ॥ १ ॥
जय जय सत्य कबीर । सत्यनाम सत मुक्त; सत रत सत कामी । विगत क्लेश सत धामी, त्रिभुवनपति स्वामी ॥ टेक ॥ जयति जय कबीरम्, नाशक भव भीरम् । धरचो मनुज शरीरम्, शिशु वर सरतीरम् ॥ जय २ ॥ कमल पत्र पर शोभित, शोभाजित कैसे । नीलाचल पर राजित, मुक्तामनि जैसे
- नोट -और बहुतसी गौरी आगे दिया है सो देखना चाहिये सूचीमें देखनेसे पता मिलेगा ।
(४४)
कबीरपंथी—
॥ जय २ ॥ परम मनोहर रूपम्, प्रमुदित सुखरासी । अति अभिनव अविनाशी, काशी पुर वासी ॥ जय २ ॥ हंस उबारन कारन, प्रगटे तन धारी । पारखरूपविहारी, अविचल अधिकारी ॥ जय २ ॥ साहब कबीर की आरति, अगनित अघहारी । धर्मदास बलिहारी, सुद मंगल कारी ॥ जय २ ॥
आरति ॥ २ ॥
जय जय श्रीगुरुदेव ।
पारख रूप कृपालम्, सुदमय त्रैकालम् । मानस साधु मरा- लम्, नाशक भव जालम् ॥ जय २ ॥ कुन्द इन्दु वर सुन्दर, सन्तन हितकारी । शान्ताकार शरीरम्, श्वेताम्बर धारी ॥ जय २ ॥ शुभ्र सुकुट चर्कांकित, मस्तक पर सोहै । विमल तिलक युत भृकुटी, लखि सुनिमन मोहै ॥ जय २ ॥ हीरा मणि सुक्तादिक, भूषित उर देशम् । पद्मासन सिंहासन, स्थित मंगल वेषम् ॥ जय २ ॥ तरुण अरुण कञ्जांघ्रि, त्रिभुवन वश कारी । तम अज्ञान प्रहारी, नख छुति अति भारी ॥ जय २ ॥ सत्य कबीर की आरति, जो कोइ गावै । सुक्ति पदारथ पावै, भवमै नहिं आवै ॥ जय २ ॥
आरती ॥ ३ ॥
संज्ञा आरतीनाम तुम्हारे । अनहद ध्वनि गुरुज्ञान विचारे ॥ ततकर तेल दयाकर दीपा । ब्रह्मअग्नि मन पवन समीपा ॥ पांचो बाती निरमल बारो । सुरति चैँवर ले सनमुख ठारो ॥ प्रेमकर पुहुप धूप धर ध्याना । चित चंदन घसि आगे आना ॥ अविगतरूप अघर परकासा । आरति गावे कविर धर्मदासा ॥
आरती ॥ ४ ॥
संज्ञा आरति करे गुरुसेवा । संपुट खोल मिले गुरुदेवा ॥ तेजपुंजकी ज्योति उजियारा । घंटा झाँझ बजे अधिकारा ॥
शब्दावली
(४५)
अनहद शब्द अखंडित होई । अगवासमें रहे समोई ॥ सुकृत अंश पुरुष को ध्यावे । सतगुरुचीन्ह चरण चितलावे ॥ मनबच कर्म जो आरतिगावे । कहे कबीर सतलोक सिधावे ॥
आरती ॥ ५ ॥
संज्ञाआरति सुकृत कीन्हा । हंस उबरि अपन करलीन्हा ॥ गगनमंडलबिच फुल्य कफुला । तर भी डार उपर भी मूला ॥ गगनमंडलबिच आरति साजे । सोहैं हंसा आन विराजे ॥ तत निहतत मैं जाय समाना । देखहु दीप अघर अस्थाना ॥ कहैं कबीर सुनु साधो भाई । अजर अमर घर रहो समाई ॥
आरती ॥ ६ ॥
संज्ञा आरति करो विचारी । कालहृत जम रहे झखमारी ॥ खुलगइ सुषमन कूंचीतारा । अनहदशब्द उठे झनकारा ॥ सुरत निरत दोय उलटिसमावै । मकरतार जिहिं डोर लगावै ॥ उनसुन शब्द अगम घर होई । अचाह कँवलमें रहे समोई ॥ विगसित कमल होय परगासा । आरतिगावै कविर धर्मदासा ॥
आरती ॥ ७ ॥
संज्ञाआरति सुकृति सँजोई । चरणकमल चित राखु समोई ॥ तिरगुन तेल तत्वकी बाती । ज्योति प्रकाश भरे दिनराती ॥ शून्य शिखर पर झाझर बाजे । महापुरुष घर राज विराजे ॥ शब्दसरूपी आप विराजे । दर्शन होत सकल भ्रम भाजे ॥ प्रेमप्रीति कै सेवा लावै । गुरुगम हो परम पद पावै ॥ सुख अनंद है आरति गावै । कहैं कबीर सतलोक सिधावै ॥
संज्ञासाखी
‘कबीर’ संज्ञासुभिरन आरती, भजन भरोसे दास । मनसा बाचा कर्मना, जबलग घटमें श्वास ॥ १ ॥ श्वास श्वास में नाम ले, बूथा श्वास जनि खोय । ना जानो यहि श्वास को, आवन होय न होय ॥ २ ॥
(४६)
कबीरपंथी—
श्वासा की कर सुमिरनी, कर अजपा को जाप । परम तत्त्व को ध्यान धर, सोऽहं आपै आप ॥ ३ ॥ सोऽहं पोषा पवन में, बांधा मेरु सुमेर । ब्रह्मगांठ हिरदय धरो, यहि विधि माला फेर ॥ ४ ॥ माला है निज श्वास का, फेरेंगे कोइ दास । चौरासी भरमें नहीं, कटे करमकी फांस ॥ ५ ॥ सदगुरु मोहिं निवाजिये, दीजे अम्मर बोल । शीतल शब्द कबीर का, हंसा करें कलोल ॥ ६ ॥ 'हंसा' मत डरपो काल से कर मेरी परतीत । अमरलोक पहुँचाइहौं, चलो सो भौजल जीत ॥ ७ ॥ भौजल में बहु काग हैं, कोइ कोइ हंस हमार । कहे कबीर धर्मदास सो, खेड़ उतारो पार ॥ ८ ॥ अविनासी की आरती, गावैं सत्य कबीर । कहैं कबीर सुर नर सुनी, कोइ न लागे तीर ॥ ९ ॥ सांझ भये दिन आथवे, चकई दीन्हौं रोय । चल चकवा तहैं जाइये, रैन दिवस ना होय ॥ १० ॥ रैन की बिछुरी चाकई, आन मिली परभात । जो जन बिछुरे नाम से, दिवस मिले नहिं रात ॥ ११ ॥ हौं कबीर विचलों नहीं, शब्द मोर समरत्थ । ताहि लोक पहुँचाइहौं, चढ़ै शब्द के रत्थ ॥ १२ ॥ तर ऊपर धर्मदास है, जती सती को रेख । रहता पुरुष कबीर है, चलता है सब भेष ॥ १३ ॥ भेष बरोबर भेष है, भेद बरोबर नाहिं । तौल बरोबर घूँघची, मोल बरोबर नाहिं ॥ १४ ॥
शब्दावली
(४७)
निर्विकार निर्भय तुही, और सकल भय माहिं । सबपर तेरी साहिबी, तुझ पर साहेब नाहिं ॥ १५ ॥ भय भञ्जन दुख परिहरन, अम्बर करन शरीर । आदि युगादि आप हौ, अदली अदल कबीर ॥ १६ ॥ विनवतहों कर जोरि के सुनु गुरु कृपानिधान । संतन का सुख दीजिये, दया गरीबी जान ॥ १७ ॥ दया गरीबी वन्दगी, समिता शील सुभाव । इतने लक्षण साधुके, कहैं कबीर विभाव ॥ १८ ॥ बहुत दिननसे जोहता, बाट तुम्हारी राम । जिव तरसे तुव मिलनको, मन नाहीं विश्राम ॥ १९ ॥ सो दिन कैसा होगा, गुरु गद्दोगे बांह । अपना कर बैठावगे, चरण कमल की छांह ॥ २० ॥ क्या मुखले विन्ती कहुँ, लाज आवत है मोहि । हमतो औगुन बहु किये, कैसे भावो तोहि ॥ २१ ॥ सुरति करु मोरि साइयाँ, हम हैं भव जल माहिं । आपेही बहिजायँगे जो नहिं पकडो बांहि ॥ २२ ॥ मैं अपराधी जनम का, नख सिख भरा विकार । तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो उबार ॥ २३ ॥ औगुन मेरे बापजी, बखशो गरीब निवाज । जो हौं पूत कपूत हौं, तोहु पिताको लाज ॥ २४ ॥ साहब तुम जनि वीसरो, लाख लोग लगि जाहिं । हम सन तुम्हरे बहुत हैं, तुम सन हमरे नाहिं ॥ २५ ॥ कर जोरे विन्ती कहुँ, भवसागर आपार । बन्दा ऊपर मिहर करी, आवागमन निवार ॥ २६ ॥
(४८)
कबीरपंथी-
अन्तरजामी एक तू, आतम के आधार । जो तू छाडे साथको, कौन उतारे पार ॥ २७ ॥ अबकी जो साई मिले, सब दुख आँखों रोय । चरणों ऊपर शिर धरूँ, कहूँ जो कहना होय ॥ २८ ॥ साहब तुमहिं दयाल हो, तुम लग मेरी दौर । जैसे काग जहाज को, सुझे और न ठौर ॥ २९ ॥ मुझमें अवगुन तुझहि गुन, तुझगुन अवगुन मुझ । जो मैं विसरूँ तुझको, तू नहिं विसरे मुझ ॥ ३० ॥ तेरे विसरे क्यों बने, मैं किस शरने जाँव । शिवविरंचि मुनि नारदा, तिन हृदय नसमाव ॥ ३१ ॥ मैं तो भूल बिगारिया, जनिकर मैला चित्त । साहब गुरुवा चाहिये, नफर विगारे नित्त ॥ ३२ ॥ औगुन किया तो बहु किया, करत न मानी हार । भावे बन्दा बखशिये, भावे गर्दन मार ॥ ३३ ॥ साई केरा बहुत गुन, औगुन एको नाहिं । जो दिल खोजा आपना, सब अवगुनमुझ माहिं ॥ ३४ ॥ मुझमें गुन एको नहीं, जान राय शिर मौर । तेरे नाम प्रतापसे, पाऊँ आदर ठौर ॥ ३५ ॥ मैं खोटा साई खरा, मैं गादा मैं गारि ॥ मैं अपराधी आत्मा, साई सरन उबारि ॥ ३६ ॥ और पतित तो कूप हैं मैं हूँ समुद्र समान । मोहि टेक तोहि नामकी, सुनियो कृपानिधान ॥ ३७ ॥ अवसर बीता अलप तन, पीव रहा परदेश । कलंक उतारो रामजी, भानो भरम संदेश ॥ ३८ ॥
शब्दावली
(४९)
साई मोर सावध अहै, मैही भया अचेत । मन बच कर्म न हरि भजा, ताते निरफल खेत ॥ ३९ ॥ मन परतीत न प्रेमरस, ना कोइ तनमें ढंग । ना जानो वा पीवसो, कयोंकर रहसी रंग ॥ ४० ॥ साई तो जब मिलेंगे, पूछेंगे कुशलात । आदि अन्तकी सब कहूँ, उरअन्तरकी बात ॥ ४१ ॥ अब सागर तो भारी भया, गहरा अगम अथाह । तुम दयाल दयाकरो, तब पाऊँ कछुथाह ॥ ४२ ॥ सतगुरु बडे दयाल हैं, संतनके आधार । भव सागर अथाहसो, खेइ उतारें पार ॥ ४३ ॥
विज्ञानतोत्र
सत्य सत्यके नामसों सत्य सागर भरा, सत्यके नाम तिहुँ लोक छाजा ॥ सन्तजन आरति करें प्रेमतारी भरेँ, ढोलनिश्शान मिरदंग बाजा ॥ भक्ति सांची किया नाम निश्चैलिया, शून्यकी शिखर ब्रह्माण्ड गाजा ॥ सत्य कवीर सर्वज्ञ साहब मिले; भजो सत्यनामका रंक राजा ॥ कबीर, हम दीन दुनी दरवेशा । हम किया सकल परवेशा ॥ हम दुवा सलामत लेखा । हम शब्द सरूपी पेखा ॥ हम रुंध मुंड में फीरा । हम फाका फकर फकीरा ॥ हम रमे कौन की नाल । हम चलैं कौन की चाल ॥ हम सरबझी सहजे रमे, हमरी वार न पार ॥ वार भी हमही पार भी हमही, नाना दरिया तीर ॥ सकल निरंतर हम रमे, हम गहिरे गहर गंभीर ॥ खाली खलक खलक के माँही, यों गुरु कहैं कबीर ॥ सत्यनाम की आरती, निरमल भया शरीर ॥ सत सुकृत लौलीन है, ज्ञान ध्यान लो थीर । “धर्मदास लोके गये गुरु बहिंयां मिले कबीर” धर्मदास लोके गये, छाड़ि सकल
(५०)
कबीरपंथी—
संसार ॥ हंसन पार उतारहीं, गुरु धर्मदास परिवार ॥ अजावन से जावन भया, जावन से भयै मूल ॥ चहुँ दिशि फूटी बासना रही कली में फूल ॥ जब फूले तब गिरि पडे, चरन कमल की धूर ॥ कली फावरी हो रही साहब हाल हजूर ॥ कबीर मिले धर्मदासको, लिख परवाना दीन्ह ॥ आदि अन्त की बीनती, यही लोक को चीन्ह ॥
“ बिना देह साहब निरालम्ब जानी ”
अति लौलीन चीन्हन्त ज्ञानी । शब्देसरूपी सुनाकाशवानी ॥ जानेजनावैकहावैन देवा । ऐसातत्वपुजेपुजावैलगावै न सेवा ॥ सदाध्यानधारी अखंडेनिगसा । सदासिंधुपीवै न जावेपियासा ॥ प्रेमधामधीरा उदासी अकेला । लौलीन योगी गुरु ज्ञान मेला ॥ मिलन्ताचलन्तारहन्ता अपारी । ऐसीदृष्टिदेखोअनंतोविचारी ॥ सदा चेत चेतंत चितवंत सूर। ऐसा रूयाल खेलंत बूझंत पूरा न ज्ञानो न ध्यानो न मान मानों । नहीं चंद्र तारा ऊगे न भानो ॥ आगे न पीछे न मध्ये न कोई । ज्यों काजला ब्रह्म त्यों तत सोई ॥ डारो न मूलो न वृक्षो न छाया । जीवो न शीवो न कालो न काया ॥ दृष्टी न मुष्टी न देवी न देवा । जापो न थापो न पूजा न सेवा ॥ नहीं पौन पानी न चंदे न सूर। अखंडित ब्रह्म सोई सिद्धपूरा । हमनाहीं तुमनाहीं बंधू न भाई । निराधार आधार रंको न राई ॥ गावै न ध्यावै न हेली न हेला । नारी न पुरुषो न खेली न खेला ॥ नहीं पेट पुष्टि न पावों न माथा । न जीवो न शीवो न नाथो अनाथा ॥ शेषो महेशो गनेशो न ग्वालं । गोपी न ग्वाले न कंसे न कालं ॥ आसे न पासे न दासे न देवा । आवै न जावे लगावै न सेवा ॥ नहीं वार पारे न नियरे हजुर। ज्योंका त्यों तत्त गहिरे गंभीरा ॥ यंत्रे न मंत्रे न दरदे
शब्दावली
(५१)
न थोका । नरके न सरगे न संसे शोका ॥ सेते न पीते न सञ्जे न लालं । गोरै न सँवरे न बृद्धे न बालं ॥ भेदा अभेदा न खेदा न कोई । सदा सुरति सोहँग एकै न दोई ॥ जाने जनावे जनावे न झूरा । वारे न पारे न नियरे हजूर ॥ नादे न विंदे न जिदे न जीवा । निरंतर ब्रह्म एकै शक्ती न शीवा ॥ नहींयोगयोगी न भोगी न भुक्ता । सच्चिदानंदसाहब बंधो न मुक्ता ॥ खेले खेलावै खेलावे औ खेले । चेत चेतावे चेतावे औ चेत ॥
“एके अनेके अनेके सो एकै”
चितगुण चित विलास दास सो अंतर नाही । आदि अंत में मध्य गोसाई अगह गहन में नाही ॥ गहनीगहिए सो कैसा, सोहं शब्दसमानआदिब्रह्मजैसेका तैसा ॥ “कहैं कबीर हम खेलैं सहज सुभावा” अकह अडोल अबोल सोहं समिता । तामो आन बसा एकरमिता ॥ वा रमता को लखे जो कोई । ता को आवा- गमन न होई ॥ “ओऽहं सोऽहं सोहं सोई ।”
ओहम्म कीलक सोहम्मवाला । ओऽहं सोऽहम्म बोले रिसाला ॥ किलक कमत कंमोद कंकवत, ये चारों गुरु पीर ॥ धर्मदास को शब्द सुनायो, सतगुरु सत्य कबीर ॥ बाजा नाद भया पर तीत । सतगुरु आये भौजल जीत ॥ बाजबाज साहब का राज मारा कूटा दगाबाज ॥ हाजिरको हजूर गाफिलको दूर हिंदूका गुरुमुसलमानका पीर “सात द्वीत नौखंड में, सोहं सत्यकबीर”
इति श्रीविज्ञानस्तोत्र समाप्तः ।
दयासागरस्तुति ।
गुरु दयासागर ज्ञान आगर, शब्दरूपी सतगुर । तामु चरण मरोज बंदों, सुखदायक सुखसागर ॥ योगजीत अजीत अम्मर,
(५२)
कबीरपंथी—
भाषते सत सुकृतं । दयापाल दयाल स्वामी, ज्ञानदाता इस्थितं । क्षमाशील संतोष समिता, आनंदरूपी हिरदयं । सहजभाव विवेक इस्थिर, निरमाया निहसंशयं ॥ निरमोही निरवैर निरभै, अकथ कथिता अविगतं ॥ उपकार औ उपदेशदाता, मुक्तिमार्ग सत- गुरं ॥ दास भाव की प्रीति बिनती, भक्ति करन करावनं । चौरासी बन्धन कर्म खण्डन, बन्दीछोर कहावनं ॥ त्रिगुणरहिता सत्य बकता, सत्लोक निवासितं । सतपुरुष जहाँ सत्साहब, तहाँ आप विराजितं ॥ युगन युगन सतपुरुष आज्ञा, जीवन कारण पगुधरं । दीन लीन अचान ह्वैके, जगतमें डोलत फिरं ॥ करुणामय कवीर केवल, सुखदायक सर्व लायकं । जम भयंकर मान मरदन, दुखित जीव सहायकं ॥
जीवके उद्धारका मार्ग
धर्मदास करजोर बिनवे, दया करो मन बसकरं । कहूँसेवा गुरुभक्ति अविचल, निसदिनअराधोसुमिरणं ॥ सदगुरु की अधिक महिमा, ज्ञान कुण्ड नहाइये । भ्रमति मन तब होय स्थिर, बहुरि न भौजल आइये ॥ साधुसन्त की अधिक महिमा, रहनि कुण्ड नहाइये ॥ काम कोष विकार परिहरि बहुरि न भौजल आइये । दासतनकी अधिक महिमा, सेवाकुण्ड नहाइये ॥ प्रेमभक्ति पति व्रत हटकरि, बहुरि न भौजल आइये । योगीजन की अधिक महिमा, मुक्तिकुण्ड नहाइये । चन्दसूर मन गगन थिरकरि, बहुरि न भौजल आइये ॥ श्रोता बक्ता की अधिक महिमा, विचारकुण्ड नहाइये । सारशब्दनिवेरि लीजे, बहुरि न भौजल आइये । गुरु साधुसन्त समाज मध्ये, भक्ति मुक्ति हटाइये । सुरतिकर सत्लोक पहुँचे, बहुरि न भौजल आइये ॥ धर्मदास प्रकाश कीन्हो, अकह कुण्ड नहाइये । सकल कलविष धोय
शब्दावली
(५३)
निर्मल, बहुरि न भोजल आइये ॥ साहब कबीर प्रकाश सदगुरु, भली सुमति दिठाइये । सार में ततसार दरसे, सोई अकल कहाइये । धर्मदास पट खोलि देखो, तत्त्व में निहतत्त्व है । कहैं कबीर निहतत्त्व दरसे, आवागमन निवारिये ॥
इति श्रीव्यासागरस्तुति समाप्तः
चेतावनी
नमो ! नमो धर्मनि पातक, पूर रहो मद काम । जिनको लोक बासा दिया, अधम उधारण नाम ॥ अनेक बन्धनते बाँधिया; एक विचारा जीव । अपने बल छूटे नहीं, तुमहिं छुडावहु पीव ॥ मैं अपराधी जनमका, नख शिख भरा विकार । तुम दाता दुख भजना, मेरी करो उबार ॥ अवगुण मेरे बापजी बकसो गरीब निवाज । मैं तो पूत कुपूतहों, तुम्ही पिता कोलाज ॥ विनती है निज दास की, सुनिये दीनदयाल । दास आपनो जानिके, सतगुरु होहु कृपाल ॥ 'कबीर' जम्मन जाय पुकारिया, धर्मराय दरबार । हंस मवासी है रहा, लगे न फाँस हमार ॥ हमरी शंका ना करे, तुम्हरी धरै न धीर । सतगुरु के बल गाजहीं, कहैं कबीर कबीर ॥ कबीर कहंता जानदे, मेरी दसी न जाय । खेवटिया के नाव पर, चढ़े चनोरे आय ॥ बाजा बाजा रहित का, परानगरमें शोर ॥ सदगुरु खसम कबीर है नजरन आवे और ॥
सत्यका शब्द
सत्का शब्द सुन भाई फकीरी अदल बादशाही ॥ साधो बन्दगी दीदार । सहज उतर सायर पार ॥ सोहं शब्दसे कर प्रीति । अनभय अखण्ड घरको जीत ॥ तन में खबर कर भाई जा में नाम रुशनाई ॥ सुरतिनगरमें वस्ती खूब । बेहद उलट चढ महबूब ॥ मूरति नगरामें कर सैल । जामें आतमा को महेल ॥
(५४)
कबीरपंथी—
अमरी मूलसन्धि मिलाव । जापर रखो बाँयाँ पांव ॥ दहिना मध्यमें धरना । आसन अमर यों करना ॥ द्वादश पवन भर पीजे । शशिघर उलट चढ़लीजे ॥ तन मन वारना कीजे । उलट निज नामरस पीजे ॥ तन मन सहित राखो श्वास ॥ इस बिध करो बेहद बास ॥ दोनों नैन के कँर बान । भौरा उलटि कस कमान ॥ परबत छके दरिया जान । करले तिरकुटी अस्नान ॥ सहज परस पद निर्बान । तेरा मिटे आवाजान ॥ जा में गैव का बाजार । सरबर दोह दीसे पार ॥ जा बिच खड़ीकुदरत झार । शोभा कोटि अगम अपार ॥ लागे नौलख तारा फूल । करनी कोटि जरिया मूल ॥ ताको देखना मत भूल । रमता राम आप रमूल ॥ माया भरम की कांची । देखु दिल अन्दरकी सांची ॥ वरषे तूर बिन मोती । चन्दा सूर की जोती ॥ झलके झिलमिला नारी । ताबिच अरूप है कयारी मानो प्रेम की झारी । खुलगई अगम किंवारी ॥ बेडा भरम का खोया । दीपक नामका जोया ॥ जोगी जुगतसे जीवे । प्याला प्रेम का पीवे ॥ मौला पीव को दीजे । तनमनकुरखान करलीजे ॥ परी है प्रेम की फांसी । मनुवां गगनका बासी ॥ बाजे बिना तन्ती तूर । सहजे ऊगे पछिम सूर ॥ भौरा सुगंध का प्यासा । किया है कमलमें बासा ॥ रमता हंस है राजा । सहजे पलक आवाजा ॥ सुन्दर श्याम घन लाया । बादल गगनमें छाया ॥ अमृत बूंद झर लाया । देखि दोह नैन ललचाया ॥ अजब दीदार को पाया । दरिया सहजमें नहाया । दरिया उलट उमगे नीर । ता बिच चले चौसठ छोर ॥ हंसा आन बैठे तीर । सहज जुगे मुक्ता हीर ॥ मिला है प्रेम का प्यारा ॥ नहीं है नैन सों न्यारा ॥ जीवनमृत न व्यापेकाला । जो त्रिकुटीसे पलक न
शब्दावली
(५५)
टाला ॥ पल जब पीव से लाग। धोखा तब दिलों का भागा ॥ चेतावनी चित विलास । जबलग रहे पिंजर श्वास ॥ सोहंशब्द अजपाजाप । साहब कवीरसो आपहिंआप ॥
साखी ।
चेतावनि चितलागि रहे, यह गति लखै न कोय । अगम पन्थ के महल में, अनहद बानी होय ॥ नाम नैन में रमि रहा, जाने बिरला कोय । जाको सतगुरु मीलिया, ताको मालुम होय ॥ झण्डा रोपा गैब का, दोय परवत के सन्ध । साधु पहि- चाने शब्द को, दृष्टि कमल कर बन्ध ॥ झलके जोती झिल- मिला, बिन बाती विन तेल ॥ चहुँदिशि सूरज ऊगिया, ऐसा अदभुत खेल ॥ जागृत रूपी रहत है, सतमत गहिर गंभीर । अजरनाम बिनसे नहीं, सोऽहं सत्य कवीर ॥
॥ इति चेतावनी ॥
ज्ञानगुदरी ।
अलखपुरुष जब किया बिचारा । लख चौरासीधागा डारा ॥ पांच पत्तव की गुदरी बीनी । तीन गुणनसे ठाढी कीनी ॥ ता में जीव ब्रह्म औ माया । समरथ ऐसा खेल बनाया ॥ सीवन पांच पचीसो लागे । काम क्रोध मोह मद पागे ॥ काया गुदरी का बिस्तारा । देखो सन्तो अमर सिंगरा ॥ चांद सूर दोह पैवैंद लागे । गुरु प्रताप से सोवत जागे ॥ शब्दकी सुई सुरतिकाडोरा । ज्ञानके टोभन सिरजनडोरा ॥ अबगुदरीकी करु हुशियारी । दाग न लागे देखुबिचारी ॥ सुमतकी साबुन सिरजनधोई । कुमत मैलको डारो खोई ॥ जिनगुदरीका कियाविचारा ॥ सोजन भेटे सिरजन हारा ॥ धीरजधुनीध्यान धर आसन । सतकी कोपीनसहज सिंगासन ॥ जुगतकमंडल कर गहि लीन्हा । प्रेम पावडी मुरशद
(५६)
कवीरपंथो-
चीन्हा ॥ सेलीशील बिबेककी माला । दयाकी टोपी तनधर्म- शाला ॥ मिहर मंतंगा मन वैशाखी । मृगछाला मनहीको राखी॥ निहचे धोती पवन जनेउ । अजपा जपे सो जाने भेऊ ॥ रहे निग्नतर सतगुरु दाया । साधु सँगतकर सबकछु पाया ॥ लौकी लकुटी हिरदया झोरी । क्षमा खड़ाऊँ पहिर बहोरी ॥ मुक्ति मेखला सुकृत सुमिरनी । प्रेम पियाला पीवे मौनी ॥ उदास कूबरी कलह निवारी । ममता कुत्तीको ललकारी ॥ जुगतजंजी- रवांथजब लीन्हा । अगम अगोचरखिरकी चीन्हा ॥ विराग- त्याग बिज्ञान निधाना । तत्ततिलकदीन्होनिरबाना ॥ गुरुगम चकमकमनसमतूला । ब्रह्म अगिनपरगटकरमूला ॥ संशय शोक सकल भ्रम जारा । पांच पचीसो परगटमारा ॥ दिलका दरपन दुबिधा खोई । सो बैरागी पक्का होई ॥ शून्य महल में फेरीदेई। अमृतरसकी भिच्छा लेई ॥ दुखसुख मेला जगका भाऊ । तिर- बेनीके घाट नहाऊँ ॥ तनमनशोधि भयाजेहि ज्ञाना । सोलखि पावे पद निर्बाना ॥ अष्ट कमलदल चक्रर सोधे । जोगी आप आपमें बोधे ॥ ईगला पिगलाके घर जाई । सुषमन नीर रहा ठहराई ॥ वोह सोह तत्त्व बिचारा । बंकनालमें किया सँभारा ॥ मनको मार गगन चढिजाई । मानसरोवर पैठि नहाई ॥ अनह- दनाद नामका पूजा । ब्रह्म बैराग देव नहि दूजा ॥ छुटगइ कश- मल कर्मजलेखा । यहि नैनन साहबको देखा ॥ अहंकार अभिमान बिडारा । घटका चौकाकर उजियारा ॥ चितकर चंदन मनसा फूला । हितकर संपुट करले मूला ॥ शरधा चैवर प्रीति कर धूपा । नौतम नाम साहबका रूपा ॥ गुदरी पहिरे आप अलेखा । जिन यह प्रगट चलाई भेखा ॥ साहबकवीरब स्निशजबदीन्हा । सुरनरमुनिसबगुदरी लीन्हा ॥ ज्ञानगूदरी पठे-
शब्दावली
(५७)
प्रभाता । जनम २ के पातक जाता ॥ ज्ञानगुदरी पढे मध्याना सो लखि पावे पद निर्वाना ॥ संज्ञा सुमिरण जो नर करई । जरा मरण भौसागर तरई ॥ कहैं कवीरा सुनो धर्मदासा । ज्ञानगुदरी करचो प्रगासा ॥
साखी
माला टोपी सुमिरनी, सदगुरु दिया बखशीश । पल २ गुरु को बंदगी, चरण नवाऊँ शीश ॥ भौ भंजन दुख परिहरन, अम्बर करन शरीर । आदियुगादि आप हो, चारो युग कव्वीर ॥ बंदी- छोर कहाइया, बलख शहर मंझार । छूटे बंद सब भेष के, धन धन कहे संसार ॥
॥ इति श्रीज्ञानगुदरी सम्पूर्णम् ॥
रतनास्तुति
गुरुध्यानसार भजबारबार ।
सब तजबिकार सतनामसार सों कर यारी ॥ जय जय गुरु- पीरं सत्यकबीरं, अमरशरीरं अधिकारी ॥ निर्गुण निज मूलं धरि अस्थूलं, काटें शूलं भवभारी ॥ सूरति निज सोहं कलिमल- खोहं, जन मनमोहं छबिभारी ॥ अम्बरपुरबासी सब सुखरासी, सदा बिलासी बलिहारी ॥ पीरनके पीरा मतिके धीरा, अलख फकीरा ब्रह्मचारी ॥ हंसन हितकारी जग पगुधारी, गरभप्रहारी उपकारी ॥ काशी आये दास कहाये, हंस बचाये प्रणधारी ॥ रामानंदस्वामी अन्तर्यामी, हैं वड़नामी संसारी ॥ उनको गुरु- कीन्हा मतबुधलीन्हा, उनहुन चीन्हा करतारी ॥ ब्राह्मणसन्यासी कीन्हीहांसी, तब अविनाशी पगुधारी ॥ मगहर स्थाना किया पयाना, दे परवाना जन तारी ॥ तहैं बलबीरा तजे शरीरा,