कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
൵ श्रीकालिका पुराण ൵ २७३ होने पर अग्नि के समान आत्मा वाले श्रीमान् और्व मुनि नृप का अभिनन्दन करने के लिए आये थे । उन मुनिवर का दर्शन करके जो जलती हुई अग्नि के सदृश थे, राजा सगर ने उनका अभ्यर्चन किया था । अर्घ्यपूर्वक पाद्य और आचमनीय देकर उन मुनिश्रेष्ठ को राजा ने श्रेष्ठ आसन पर निवेशित किया था । फिर उस सागर राजा ने महात्मा और्व से समुचित रीति से प्रणाम करके पूछा था कि आपका कुशल तो हैं । और मुनि श्रेष्ठ ने कहा था कि हे नरराज, मेरा सदा ही सर्वत्र कुशल है । मैं आपका दर्शन करने के लिए कुशलता के साथ उत्साह कराता हूँ । आप समस्त राजाओं में कुशाली हैं जिस एक ने ही आने पर बहुत शीघ्र ही समस्त राजाओं को जीत लिया था । हे राज नरोत्तम! आपका कुशल नित्य ही बढ़े । हे भूपते! नीति के अनुसार सद् आचरणों के द्वारा पृथिवी का शासन करिये । आपके समृद्ध होने पर जगत् की वृद्धि है अतएव उसी भाँति आप वृद्धि के लिए ही चेष्टा करिये जैसे चन्द्र की वृद्धि हुआ करती है । हे नृप! सबसे प्रथम सद्गुणों से समन्वित अपनी आत्मा को योजित करिये । इसके उपरान्त उसके गुणों से समन्वित भार्या को महिषी बनाइये । यदि वनिता को नित्य ही संयोजित किया जावे तो वह स्वयं ही अपने गुणों के विषय में प्रवेक्षण करने वाली होती हुई महती और व्रतधारण करने वाली हो जाती है । ऐसा सुना जाता है कि शम्भु में संगम सम वाली होती हुई हिमवान् की पुत्री बहुत सी क्रिया और अभ्युपायों के द्वारा शम्भु के द्वारा प्रायोजित कही गई थी । इसके अनन्तर शम्भु के अत्यधिक प्रेम से सती पार्वती ने उनकी ही अनुमति से उनके आधे शरीर का हरण कर लिया था । तभी से भगवान् शंकर अर्धनारी श्वर हो गये थे । हे नृप शार्दूल! उन्होंने फिर अन्य भार्या का ग्रहण नहीं किया था । इस कारण से, हे राजेन्द्र! आप भी अपनी जाया को उत्तर आत्मा से गुणों के द्वारा संयोजित कीजिये उसके उपरान्त लघु सुत को संयोजित करें । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-राजा सगर भी इस और्व के द्वारा भाषित
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का श्रवण करके हर्ष से समन्वित हो गया और मन्द मुस्कान से संयुक्त होकर उसने मुनि से यह पूछा-उस सती गिरिजा देवी ने शंकर भगवान् के शरीर का आधा भाग कैसे हरण किया था ? हे द्विजश्रेष्ठो! उसे ही मैं श्रवण करना चाहता हूँ । जिस नीति से अपनी आत्मा का अर्थात् अपने आपका भार्या का अथवा सुत का योजन करना चाहिए उस नीति का और सदाचार संहिता का भी मैं श्रवण करना चाहता हूँ । हे द्विज, राजनीति, सत्पुरुषों की नीति और अन्य कृतात्माओं की नीति का मैं पृथक्-पृथक् श्रवण करने की इच्छा वाला हूँ। मैं आपकी प्रार्थना करता हूँ। हे ब्रह्मन्! यदि यह परम गोपनीय हो तो भी मैं सुनना चाहता हूँ। मैं उस भाँति से आपको कोई आज्ञा नहीं दे रहा हूँ और उसके ही समान मैं श्रवण करने का इच्छुक हूँ। कृपा करके आपको मुझे बतलाना चाहिए यदि वह बतलाने के योग्य हो तो हे मुनिवर! आप कहिए। द्विजो में परम श्रेष्ठ और्व ने भी उस राजा पर कृपालु होते हुए उस महान् आत्मा वाले के प्रति कहा। और्व ने कहा-हे राजन् आप श्रवण कीजिए। आपने यहाँ पर जो-जो भी पूछा है उसे मैं आप को बतलाऊँगा। पहले पुराने समय में हिमवान् की पुत्री ने जिस रीति से भगवान् हर के शरीर का आधा भाग का हरण किया था। हे नृपोत्तम! जहाँ पर आपको जैसी नीति करना चाहिए उसे और सबका सदाचार जो भी होना चाहिए इसे क्रम से ही मैं बतलाऊँगा यह आप श्रवण कीजिए। जिस समय में महात्मा शंकर ने हिमवान् की पुत्री के साथ विवाह किया था। वह उस समय कितने काल पर्यन्त वहाँ पर उमा के साथ रहे थे अर्थात् कितना समय व्यतीत किया था। शिखर पर कुन्ज में और पर्वत की दरियों में उसके साथ रमण करते हुए भगवान् हर ने पार्वती को प्रसन्न करते हुए वहाँ पर चिरकाल तक विहार किया था। काल के समाप्त होने पर भगवान् शम्भु अपने गणों के सहित और अपनी भार्या के साथ स्वर्ग के समान कैलास पर्वत पर चले गये थे। उमा के साथ क्रीड़ा करते हुए ध्यान और आत्मा का चिन्तन त्याग दिया
था और उमा के मुखचन्द्र पर ही अपने नेत्रों को चकोर के ही भाँति बना लिया था अर्थात् वे सर्वदा उसके ही मुख का अवलोकन किया करते थे। किसी समय गिरिजा के लिए पुष्पों का समाहरण करके भगवान् शंकर अत्यन्त सुन्दर माला बनाया करते थे जो कि उसके सर्व अंगों में नीचे तक लटकने वाली होवे । किसी समय दर्पण में एक ही साथ अपना मुख और उमा देवी का मुख वृषभध्वज देखा करते थे। किसी अवसर पर कस्तूरिकाओं के द्वारा गन्धपत्रकों के विलेपनों से दोनों स्तनों पर भगवान् शंकर विलेपन किया करते थे। भगवान् शम्भु अम्बिका के शरीर पर गन्धसार का विलेपन करते थे और ललाट पर लगाकर उसे सुन्दर किया करते थे। चन्द्र के सामन घनी सन्धियों वाले उमा देवी के निर्माश से संसक्त केशपाशों में चित्रक लिखा करते थे। चन्दन, अगरु (गूगल), कस्तूरी और कुंकुम के विलोपनों के द्वारा विचित्र कर दिया करते थे। जिससे उन देवी का केशपाश विशेष रूप से शोभायमान हो जाता था। जो केशपाश नृत्य करने के लिए अवतीर्ण मयूर के पुच्छ की समता का धारण करने वाला हो जाया करता था। वृषभ ध्वज सुवर्ण से परिपूर्ण मनोहर कुण्डल आदि अलंकारों को उमादेवी के देह में समाकर्षित किया करते थे। उन सुवर्ण से विनितयोजित अलंकारों से गिरिजा देवी का शरीर जलदों से आपूर्ण तड़ित गणों से कालिका की ही भाँति शोभित हो रहा था। सम्पूर्ण दिव्य अलंकारों, अनेक प्रकार के रत्नों तथा सुन्दर वस्त्रों से पूर्ण रूप से मण्डित हुई काली ने प्रकृति देवी की सदृश्यता को धारण किया था। इस प्रकार से जगत् के पति भगवान् शम्भु सर्वदा उस काली में अनुराग से युक्त हो गये। उन्होंने जगत् के हित के लिए काली के साथ क्रीड़ा की थी। जगतों की माता, महामाया, जगन्माया काली, योगनिद्रा, जगत् की बुद्धि विद्या और अखिलविद्या के स्वरूप वाली थी। वह परमाभूति-प्रकृति और सर्ग-स्थिति और संहार के करने वाली थी। वह जगतों की हित की इच्छा करने वाली इसी कारण के भगवान् शंकर
का सम्मोहन करके सुधांशु के साथ चन्द्रिका की भाँति उनके साथ उस देवी ने रमण किया था।
बेताल भैरव उत्पत्ति
और्व मुनि ने कहा-इसके अनन्तर वे काल क्रम से ही महान् बल वाले प्रवृद्ध हो गये थे। वे शस्त्रों और अस्त्रों के ज्ञान में कुशल थे और शास्त्रों के अर्थों में परिनिष्ठत थे। वे यौवन के सम्प्राप्त करने वाले थे तथा परम दीप्त एवं परिपन्थियों के द्वारा दुर्धर्ष थे अर्थात् शत्रुगण उनके तेज को सहन नहीं कर सकते थे। वे धर्म और अर्थ के ज्ञान में परम प्रवीण थे तथा ब्रह्मण्य एवं सत्यवादी थे। वहाँ पर प्रीति से वेताल और भैरव सर्वदा सहचर थे। अलर्की, दमन और उपरिचर ये तीन थे। चन्द्रशेखर भाई सदा नित्य साथ में चरण करने वाले थे। राजा के तीन पुत्रों में जो उपचार प्रभृति थे उनमें अधिक ममत्व उसका था। किन्तु दो नित्य अधिक प्रीति और स्नेह वाले थे। चन्द्रशेखर नृप की वेताल और भैरव में भी वैसी प्रीति नहीं थी जैसी उनमें होती थी। वह चन्द्रशेखर नृप उन दोनों को देखकर कभी भी निरन्तर आह्लादित नहीं होता था अथवा पुत्र की बुद्धि से चाहता भी नहीं था। वे दोनों वीर धर्म में कुशल थे और महान् बल तथा पराक्रम से समन्वित थे। वे दोनों लोकों के विजय करने में दक्ष थे तथा शास्त्रों एवं अस्त्रों की विद्या में पारगामी थे।
नृप उन दोनों से डरा करता था कि ये दोनों वेताल और भैरव किस समय में मुझे-सुतों को अथवा राज्य को नष्ट कर देंगे। इसी चिन्ता में राजा नित्य ही वेताल और भैरव इन दोनों पुत्रों को भली भाँति प्रणत भी देखा करता था। इसके अनन्तर राजा ने उपरिचर को युवराज्य पद पर अभिषेक कर दिया था। वह सबसे बड़ा और समस्त राजाओं के गुणों से संयुत औरस पुत्र था। जो पीछे नीतियों के द्वारा समस्त राजाओं को योजित करेगा। उपरिचर नाम वाला समस्त शास्त्रों के अर्थों में पारंगत था। राजा ने दमन के लिए तथा अलर्क के लिए
दान दिया जिसमें बहुत धन रत्न थे तथा अधिक आसन और रथ थे। भाग के द्वारा उतना धन, रत्न आदि दास व वित्त उन दोनों के लिए नहीं दिए थे जो कि भैरव के लिए थे। इसके अनन्तर उन दोनों में क्रोध ने प्रवेश कर लिया था वे दोनों की क्रोध से अभिभूत हो गये और दोनों इधर-उधर विचरण करने लग गये। उन दोनों वीरों ने भोगों से उपभोग करने की इच्छा ही नहीं की और तपश्चर्या का समाचरण करने के लिए उद्यत हो गये। उन दोनों ने किसी भार्या से विवाह नहीं किया था अर्थात् वे दोनों अविवाहित थे तथा निरन्तर सदा ही निर्जन वन में वास किया करते थे। उस काल में देव वेताल और भैरव पुत्रों को उस प्रकार से रहने वाले हैं, ऐसा ज्ञान था उस समय में देवी तारावती चिन्ता से समाक्रान्त हो गयी थीं अर्थात् उसे बहुत अधिक चिन्ता समुत्पन्न हो गई थी। वह उपरिचर राजा से और अपने पति चन्द्रशेखर से भयभीत हो गई थी। वह सुन्दरी गुप्त रूप से दोनों का ज्ञान रखती हुई भी कुछ भी नहीं बोली थी। इसी बीच मुनियों में परम श्रेष्ठ और विद्वान कपोत चित्रांगदा के साथ सम्भोग और सुरतोत्सवों के द्वारा परम संतुष्ट होकर उस सहचारिणी एवं पुत्रों से युक्त चित्रांगदा का परित्याग करके उसने वहाँ से गमन करने की इच्छा की थी और उस अवसर पर उसने चित्रांगदा से यह वचन कहा था। मुनि ने कहा- चित्रांगदे! मैं तपस्या का समाचरण करने के लिए अब तपोवन में गमन करूँगा। वहाँ पर मैं तेरा क्या प्रिय कार्य करूँ ? हे मनोहर! उसी को मुझे तुम बतला दो। चित्रांगदा ने कहा- हे सुव्रत! तुम्परु और सुवर्चा ये दो आपके पुत्र हैं। मुनिश्रेष्ठ! आप इन दोनों का जो भी उचित हो वह प्रिय करो। हे द्विज श्रेष्ठ! मुझको भी मेरी भागिनि के घर में संस्थापित करके, हे अनघ! आपको यदि रुचता है तो सभी आप तपोवन में गमन करिये। मुनिश्रेष्ठ कपोत यह उसके वचन का श्रवण करके भली भाँति विचार करके हिरण्य (सुवर्ण) के लिए कुबेर के भवन में गये थे। उसने कुबेर से छः सौ सहस्त्र सुवर्ण के निष्कों की प्रार्थना की थी और
२७८ श्रीकालिका पुराण
प्राप्त कर लिया था। सौभार रत्नों को लाकर विप्र ने पुत्रों को दे दिया था और विशेष रूप से भार्या को दिया था। इसके उपरान्त पुत्रों तथा बहुत से धनों के साथ चित्रांगदा तथा पुत्रों के भी मत से सुवर्चा और तुम्बरु तथा चित्रांगदा को भी आमन्त्रित करके वह मुनि शार्दूल करवीरपुर में चला था। वहाँ जाकर वह कपोत राजा चन्द्रशेखर से तथा राजा उपरिचर से यह वाक्य बोला था। हे नृप! यह ककुत्स्थ की पुत्री है और यह पहले आपकी भी जानी हुई है। ये परम शुचि व सद्योजात ये दोनों इसके उदर से समुद्भूत मेरे पुत्र हैं। इन धनों के साथ आप मेरे दोनों पुत्रों को प्रतिपालन करें। राजोपरिचर भी यहाँ पर मेरे पुत्रों का परिपालन करें। जो पुत्रहीन होती है उसका पुत्र नृप ही होता है और जो धनहीन होता है उसका धन भी नृप ही हुआ करता है बिना माता वाले की जननी नृप हे और तात से रहित का पिता भी नृप ही हुआ करता है। अनाथ का नृप नाथ और बिना भर्ता वाले का पति नृप है। जिससे कोई भृत्य न होवे उसका भृत्य राजा ही है और नृप ही मनुष्यों में देवता है। इसलिए हे नृप! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। और्व ने कहा-इसके अनन्तर उस राजा ने द्विजोत्तम उस मुनि से इस प्रकार से कहा था कि मैं आपका वचन पूर्ण करूँगा और राजोपरिचर भी करेगा। इसके उपरान्त उस राजा ने मुनि की सम्मति से चित्रांगदा को ग्रहण कर लिया था और उसने दे दिया था। उस परिवार ने सुवर्चा को राज्य का आधा भाग दे दिया था। और उसी भाँति उस अवसर पर तुम्बरु को अपने सचिवों का अध्यक्ष बना दिया था। और कपोत भी पुत्र का अर्धभाग देखकर परम प्रसन्न हुआ और राजा का आमन्त्रण करके वह तप के लिए तपोवन को चला गया था। मार्ग में गमन करते हुए उस कपोत ने अकेले विचरण करते हुए, परम मनोहर और चन्द्र के ही समान भगवान् शम्भु के पुत्रों को देखा था और उन दोनों के मुख में बन्दर की सी-आकृति देखी थी। पूर्व में घटित कथा का स्मरण कर और उन दोनों को देखकर उस तपोधन ने उनसे पूछा था-आप दोनों कौन हैं जो कि देवगर्भ समान आभा वाले
हैं और मार्ग में उस बियाबान में एकाकी विचरण कर रहे हैं। हे नर श्रेष्ठों! यह मेरे कथित का आप उत्तर बताइये। इसके अनन्तर उन दोनों ने इनको प्रणिपात किया था और समजस सम्भाषण किया था अर्थात् समुचित बातचीत की थी। उन शंकर के दोनों पुत्रों ने कपोत नाम वाले मुनि श्रेष्ठ से कहा था-हे मुनि शार्दूल! हम दोनों चन्द्रशेखर के पुत्र हैं और तारावती के उदर से समुत्पन्न हुए हैं। आप हमको जान लीजिए । हम आपके पदों में प्रणाम करते हैं। हम दोनों की राजा से निरन्तर अवज्ञा देखकर क्रोध से संयुक्त होते हुए हम सदा ही अकेले ही निर्जन वनों में भ्रमण करते हैं। सर्वदा प्रणत रहने वाले आत्मज पुत्रों की अवज्ञा करके नृप किसलिए हे महाभाग! दानमात्र को भी देने की इच्छा नहीं करता है। हे द्विज श्रेष्ठ! इसी कारण से हम दोनों तप का समाचरण करने के लिए इच्छा कर रहे हैं यदि आप उपदेश के द्वारा हमारे ऊपर अनुग्रह करते हैं। इसके अनन्तर उन दोनों के वचन का श्रवण करके मुनि श्रेष्ठ बोले। मुनि ने कहा-आप दोनों उस चन्द्रशेखर भूपति के पुत्र नहीं हैं। आप तो तारावती के उदर से समुत्पन्न हुए शंकर के ही पुत्र हैं। आप दोनों महावीर्य सद्योजात हैं और वेतालत्व में समस्त हैं। आप भृंगी और महाकाल नाम वाले हैं। शाप के कारण से ही आप दोनों इस धरणीतल में समागत हुए हैं। तुम दोनों को यहाँ पर उसी कारण से वह प्रिय दान नहीं देना चाहता है। आप अपने पिता वृषभध्वज भगवान् शंकर की शरण में गमन कीजिए। वे ही शम्भु तुम दोनों को भी कुछ देंगे। इस उग्रतप से क्या लाभ है जिसका फल बहुत ही लम्बे समय में प्राप्त होता है। परम आत्मा को धारण करने वाले मुनि शार्दूल कपोत इतना कहकर जिनको अतीत वर्तमान और भविष्य का पूर्ण ज्ञान था, उन दोनों से उन सबने कहा था। जिस प्रकार से भृंगी और महाकाल को शाप प्राप्त हुआ था और वे धरणी पर समागत हुए थे। हे नृप! जैसे भगवान् शम्भु और गौरी पृथिवी पर आगत हुए थे। पहले उस मुनि के द्वारा तारावती को शाप
२८० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ दिया गया था और पुराने समय में जिस तरह से वे दोनों तारावती के उदर से समुत्पन्न हुए थे। अथवा जिस प्रकार से नारदजी के द्वारा नृप के संशय का छेदन हुआ था वह सभी कुछ गिरीश के पुत्रों से कह दिया था। उस समय वे दोनों महात्मा वेताल और भैरव यह श्रवण करके परम हर्ष से संयुक्त हुए थे। उस अवसर पर मोह से पूर्ण होकर सुधा से सिक्त के ही भाँति वे हो गये थे। फिर वेताल और भैरव ने कपोत मुनि से पूछा था। हम दोनों के पिता महादेव हैं-यह आपने सत्य ही कहा है। हे मुनि श्रेष्ठ! वे जिस रीति से हम दोनों के द्वारा आराधना करने योग्य होवें अथवा जिस स्थान पर उनकी आराधना की जावे जिससे हम दोनों को सिद्धि होवे। जिसके द्वारा वे शीघ्र ही प्रसन्नता को प्राप्त होवें। हे महामते! वह ही हमको आप बताने की कृपा करें। हम दोनों परम धन्य हैं कि आपने हम दोनों पर परम अनुग्रह किया है। हे मुनि श्रेष्ठ! आपने यह सब विज्ञापित कर दिया है और हम दोनों के हृदय कृतज्ञ हैं कि आपने हम दोनों पर अनुग्रह किया है। हे मुनि श्रेष्ठ! आपने यह सब विज्ञापित कर दिया है और हम दोनों के हृदय का शल्य आपने उद्धृत कर दिया है। अर्थात् हमारे हृदय का शल्य की ही भाँति जो दुःख था वह दूर कर दिया है। हे मुनीश्वर! आप तो कृपा से परिपूर्ण हैं। पुनः हमारे ऊपर दया कीजिए। जिस रीति से हम शीघ्र ही भर्ग की प्राप्ति कर लेवें उसी भाँति आप हम को बताइए। मुनि ने कहा-आप सुनिए, में आज बताता हूँ कि जहाँ पर आराधना किए हुए भगवान् हर शीघ्र ही आपके समझ में समागत हो जायेंगे। जहाँ पर नित्य ही महादेव निवास करते हुए तुष्टि के लिए होते हैं आप दोनों को उस स्थान को बता दूँगा। वह स्थान गोपनीय है। वाराणसी नाम वाली पुरी है जो परम सुन्दर भागीरथी गंगा के तट पर बसी हुई है वहाँ पर वृषभध्वज स्वयं नित्य ही निवास किया करते हैं। वे योगी सदा ही योगियों की प्रीति के करने वाले हैं। वे स्वयं योगी हैं और अध्यात्म चिन्तन करने वाले हैं। वह पुरी आकाश में संस्थित है और नित्य ही भगवान् भर्ग के योग से धारण की हुई है। वहाँ पर
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २८१ जो भी अपने प्राणों को त्यागकर मृत्यु को प्राप्त करता है तो यह पुरी उसको दिव्य ज्ञान प्रदान किया करती है। उस पुरुष को महादेव स्वयं ही संसार के आवागमन की ग्रन्थि के बन्धन का छुटकारा पाने के लिए कृपा किया करते हैं। वहाँ पर मृत होकर पुरुष दूसरे जन्म में उत्पन्न होकर परम योगी हो जाता है। भगवान् हर के द्वारा सम्मत होता हुआ वह सुलभ उपाय के द्वारा ही वह पुरुष निर्वाण पद को प्राप्त हो जाता है अर्थात् मुक्ति प्राप्त कर लेता है। वहाँ योग से युक्त महादेव सदा पार्वती के सहित निवास किया करते हैं। देव, गन्धर्व यक्षों का और मनुष्यों को नित्य ही हर ज्ञेय (जानने के योग्य) और प्रकाश है और वह क्षेत्र प्रकाशित है। वहाँ पर देव कामनाओं का प्रदान करने वाले नहीं है और शीघ्र ही प्रसन्न नहीं होते हैं। चिरकाल प्रीति से आराधना किए हुए ही निर्वाण के लिए ही प्रसन्न हुआ करते हैं। वह पुरी गौरी के द्वारा विवर्जित है। वह योग का स्थान महाक्षेत्र हैं वहाँ किसी समय में शांकरी देवी गमन नहीं किया करती है। यह वाराणसी है।
कामरूपी पीठ का वर्णन
अत्यन्त तीव्र तप चिरकाल में मोक्ष के प्रदान करने वाला होता है। शीघ्र ही कामनाओं का देने वाला परम पुण्यमय क्षेत्र 'पीठ' कहा जाया करता है। पूर्व में वन्दना करने वालों के द्वारा वह क्षेत्र लोकों में चिरकाल में काम के प्रदान वाले का कहा जाता है। किन्तु जहाँ पर चिरकाल में भी ज्ञान देने वाले देव नहीं हैं। कामरूप महापीठ है जो गुह्य से भी परम गोपनीय है। वहाँ पर देव शंकर पार्वती के सहित सदा ही सन्निहित रहा करते हैं। वहाँ चिरकाल में पूजित हुए देव भी उस पीठ में प्रसन्न नहीं हुआ करते हैं। वहाँ पर शिव के भक्त पर देवी पार्वती निश्चय ही अनुग्रह किया करती है। परमेश्वर अपने भक्त के लिए शीघ्र ही कामना किया करते हैं उस पीठ के विषय में मैं बताऊँगा। अब आप दोनों श्रवण कीजिए। पूर्व में जहाँ तक दिक्कर
२८२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ वासिनी हैं वहाँ पर करतोया नदी है। वह तीस योजन विस्तार वाली हैं और एक शतयोजन आयत है। वह त्रिकोण कृष्ण वर्ण से युक्त तथा बहुत से पर्वतों पूरित हैं। सौ नदियों से समायुक्त है और नाम कामरूप कीर्तित किया गया है। भगवान् शम्भु के नेत्र से भस्मीभूत हुए कामदेव ने भगवान् शम्भु के अनुग्रह से वहाँ पर रूप को प्राप्त किया था इसीलिए तभी से वह कामरूप हो गया था। उसी पीठ के मध्य भाग से वायव्य में, नैर्ऋत्य में, ऐशानी में और आग्नेयी में, मध्य में और पार्श्व में शंकर है। इन छःस्थानों में परम शोभन अपना आश्रम स्थान बना कर वहाँ पर भी पार्वती के साथ सब कार्यों को करते हुए नित्य ही शंकर निवास किया करते हैं। मध्य में देवी का गृह है। वहाँ पर उसी के अधीन शंकर हैं। वहाँ पर नील नामक श्रेष्ठ पर्वत में पार्वती विराजमान रहती हैं। ऐशानी दिशा में त्राटक शैल पर भगवान् शंकर का महान् आश्रम है। वहाँ पर नित्य ही ईश्वर निवास किया करते हैं और उनके अधीन पार्वती रहती हैं। और दूसरे हर तथा गौरी के सनातन आश्रम हैं किन्तु इन दोनों के सदृश कोई भी शंकर का आश्रम नहीं है। हे नर श्रेष्ठो! जहाँ पर आप दोनों के द्वारा महादेव आराधना करने के योग्य हैं उसी स्थान को मन से ग्रहण करके वृषभध्वज को प्रसन्न करिए।
- वेताल और भैरव ने कहा-हे मुनिवर! हम कापरूप को गमन करेंगे जो रहस्य पूर्ण नाटक पर्वत है। जहाँ पर गौरी हैं। जहाँ पर नित्य ही सन्निहित हुए संस्थित रहा करते हैं। हम दोनों को वहाँ पर अवश्य ही भगवान् भूतेश्वर की आराधना करनी चाहिए। हे द्विजोत्तम! जहाँ पर आराधना करेंगे उसी भाँति आप बताइए। ऋषि ने कहा-हे नर श्रेष्ठों! पर्वतों में श्रेष्ठ नाटक पर्वत पर आप जाइए। वहाँ पर नित्य ही महादेवजी अपर्णा के साथ रमण किया करते हैं। वहाँ पर सन्ध्याचल पर ब्रह्माजी के पुत्र वसिष्ठ मुनि भगवान् शंकर की आराधना किया करते हैं आप दोनों ही वहाँ पर चल जाइए और वे ही हर के आराधना के क्रम में तन्त्र के सहित मन्त्र ज्ञापित कर देंगे जबकि आप दोनों वेताल
श्रीकालिका पुराण २८३ और भैरव उनसे पूछेंगे। अब मैं तपश्चर्या करने के लिए जाना चाहता हूँ। यह समय ऐसे बिताना युक्त नहीं हैं। इससे हे वीर श्रेष्ठों! मुझको आप छोड़ दीजिए। इतना कहकर वह मुनिश्रेष्ठ कपोत वन में चला गया था। उन दोनों ने उस मुनि को प्रणाम किया था और फिर वह दोनों अपने भवन को चले गए थे। इसके अनन्तर उस समय में वे दोनों समय करके तपश्चर्या के लिए दीक्षित हुए थे। माता-पिता से अनुज्ञा प्राप्त करके भाइयों को और अन्य बान्धवों को भी ज्ञापित करके उन दोनों महामति वालों ने कामरूप के लिए प्रस्थान किया। उमा देवी के सहित भगवान् शंकर भी उन दोनों का गमन जानकर इन्द्र के सहित समस्त देवों को सान्त्वना देते हुए यह बोले। ईश्वर ने कहा-हे सुरेश्वरो! मेरे दोनों पुत्र तप करने के लिए गए हैं। वे दोनों मेरी आराधना में चित्त वाले हैं। वे सुर श्रेष्ठो! उन पर दया करो। इन दोनों पुत्रों का जो कि वेताल और भैरव नाम वाले हैं, तपस्या से संस्कार करके मैं इनको गाणपत्य में नियोजित करूँगा। हे निर्जरो! आप लोग उन दोनों का संस्कार कर दो। तप से उन दोनों के शरीर मानुषभाव त्याग कर जिस रीति से दोनों सारभाव को प्राप्त हो जावें, मैं वैसा ही करूँगा। इतना कहकर वामदेव भी पार्वती के साथ ही आकाश मार्ग से गमन करते हुए पुत्रों के पीछे स्नेह से गए थे। अपने पुत्रों के पीछे अनुगमन करते हुए भगवान् हर के पीछे-पीछे गमन करने लग गए थे। इसके अनन्तर उन दोनों ने जो इस समय कृष्ण हिरण कें चर्म का धारण करने वाले थे, उनको आगे एक नदी मिली थी। वे दोनों ही तापस के भाव को प्राप्त हुए थे। वह नदी हषद्वती थी जो कि गंगा के ही समान परम पावन थी। भगवान् त्र्यम्बक देव के द्वारा वे दोनों कामरूप नाम वाले आश्रम में समापतित हुए थे। कामरूप पहुँचकर करतोया नदी का जल मिला था। हे नृपोत्तम! उन दोनों ने नदी के जल में आचमन किया। फिर नन्दिकुण्ड पर पहुँचे थे। वहाँ आचमन तथा स्नपन करके फिर जठाद्भवा नदी पर गमन किया था। वहाँ पर दोनों ने उपस्पर्शन किया था और वहाँ पर तप के द्वारा
घृत नन्दिकुण्ड को प्रणाम किया तथा जल्पिश देव को प्रणिपात किया था और फिर नाटक नामक पर्वत पर गमन किया था। वहाँ पर्वत पर पहुँच कर वृषभध्वज को प्रणाम किया और आराधना के उपदेश के लिए कपोत वचन का स्मरण किया था। फिर दोनों दक्षिण दिशा की ओर गए थे जहाँ सन्ध्याचल संस्थित था। वहाँ पर कान्ता नाम की नदी थी जो वशिष्ठ मुनि ने अवतारित की थी। उस नदी के तट पर एक महान शैल था जिस पर छाया वाले वृक्ष और लताएँ थीं क्योंकि ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठ जी ने वहाँ पर सन्ध्या वन्दना की थी। इसीलिए देवगण उस पर्वत का नाम सन्ध्याचल गाया करते हैं वहाँ पर पहुँचकर वशिष्ठ मुनि का दर्शन किया था जो साक्षात् अग्नि के ही तुल्य थे। वे वशिष्ठ मुनि भगवान गिरीश की आराधना कर रहे थे और उनका मन ध्यान में संयुक्त था। वे तपस्या की श्री से देदीप्यमान थे और दूसरे सूर्य के ही समान प्रतीत हो रहे थे। उस अवसर पर उनके समक्ष वेताल और भैरव ने प्रणाम किया था। हे भूप! वे दोनों विनय से अवनत होते हुए हाथों को जोड़े हुए स्थित हो गए थे। उन दोनों ने यह प्रणाम करते हुए विधाता के पुत्र से कहा कि चन्द्रशेखर से हम दोनों तारावती में उत्पन्न हुए हैं। इस क्षेत्र में हम दोनों भर्ग पुत्रों को मनुष्य ही जानिए। हम कार्य की सिद्धि के लिए भगवान् शम्भु की आराधना करने की इच्छा रखते हैं। हे सुब्रत! आप हम दोनों के अभीष्ट के विषय में अनुग्रह करें। उन दोनों के उस वचन का मुनियों में श्रेष्ठ वशिष्ठ जी ने श्रवण किया और उन्होंने कहा था कि मैंने आप दोनों का ज्ञान प्राप्त कर दिया है और सत्य में आप दोनों ही भगवान् शम्भु के आत्मज हैं। हे नरश्रेष्ठ! आप दोनों को भगवान् शम्भु की आराधना करनी चाहिए। परमश्रेष्ठ आप दोनों यहाँ पर मेरा क्या कृत्य है यह बोलिए। वृषभराज की आराधना के लिए आप दोनों का प्रयोजन है। जो उसका निमित्त है वह सिद्ध हो गया है, वह चिन्तन कीजिए। वेताल और भैरव ने कहा-जिस मन्त्र के द्वारा अविलम्ब ही भली-भाँति भगवान् शम्भु की आराधना की गई
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २८५ है। हे महामुने! वह हमारे ऊपर अपनी पृथ्वी में प्रसन्नता को प्राप्त होंगे, यही हमको आप बतलाइए। हे मुनि शार्दूल! जिस रीति से हम आराधना करें, जो तन्त्र है और जैसा भी क्रम है, वह सभी आप उत्तम रूप में बताने के लिए योग्य होते हैं। जिस रीति से शीघ्र ही हर को प्राप्त कर लेवें। हे मुनिश्रेष्ठ! आप अनुशासन कीजिए। हम दोनों आपके प्रणत हैं। वशिष्ठ जी ने कहा-आप दोनों के ऊपर भगवान् वृषकेतु उमादेवी के सहित प्रसन्न हैं। यहाँ पर स्वयं शीघ्र प्रसाद को प्राप्त हो जायेंगे। समस्त देवगणों के साथ अपनी भार्या के साथ वृषभध्वज गृह से अपने पुत्रों का पालन करते हुए आकाश के मार्ग द्वारा समाक्षिप्त हैं। किन्तु आपके मनुष्य के देह का अधिवासन करके अर्थात् तपों व्रतों से संस्कार करके स्वयं ही कैलाश पर ले जायेंगे और गणपत्य दोनों का नियोजन करेंगे और मैं भी उपदेश कर दूँगा। जिससे आप दोनों ही शीघ्र ही भर्ग को प्राप्त कर लेंगे। हे पार्वती पुत्रों! उसे एकाग्रमन से श्रवण कीजिए। वे ध्यान से चिरकाल में प्रसन्न होते हैं और शीघ्र ध्यान पूजन से प्रसन्न होते हैं। इस कारण से आज तात्त्विक रूप से ध्यान और पूजन बतलाता हूँ। वे तेज से परिपूर्ण हैं, सदा शुद्ध स्वरूप हैं, ज्ञानामृत से विवर्धित हैं, जगत् से परिपूर्ण, चित् (ज्ञान) और आनन्दरूप हैं, शौरि और ब्रह्मा के सदा महान् योग से संयुत हैं, ये सम्पूर्ण जगत् उनके ही स्वरूप हैं। उनका कथन करने में कौन समर्थ है। किन्तु जिन रूपों से ये भगवान् शंकर विचरण किया करते हैं उनमें से जो मेरे ज्ञान के द्वारा गम्य है उसमें जो भी अभीष्ट है आप दोनों को मैं कहता हूँ। हे नरश्रेष्ठ! सबसे प्रथम मन्त्र का श्रवण करो उसके पश्चात् ध्यान से साक्षात्कार को सुनिए। इसके पश्चात् पूजा का क्रम फिर क्रम से व्रत को सुनिए। समस्त स्वरों में दीर्घ शेष होता है-इस रीति से पाँच मन्त्र कीर्तित किए गए हैं। एक-एक से वहाँ पर एक-एक वक्त्र तो देव का पूजन करना चाहिए अथवा एक को समुदित करके पाँचों से पूजन करें। इसके अनन्तर प्रसाद के द्वारा पंचवक्त्र देव का यजन करना
२८६ श्रीकालिका पुराण चाहिए । सम्पद प्रभृति मन्त्रों प्रसाद परम प्रशस्त कहा गया है । क्योंकि शम्भु के प्रसादन से ही मन्त्र सफल होता है । इसी कारण से मुनियों में श्रेष्ठों के द्वारा यह प्रसाद संज्ञा वाला कहा गया है । इस कारण से समस्त मन्त्रों में प्रसाद परमप्रीति के प्रदान करने वाला है । सम्पद मन्त्र भगवान् शम्भु के आमोद के रहने वाला कहा जाता है । मन की प्रापूर्ति करने ही से सन्दोह कहा गया है । नाद आकर्षण करने वाला नाद होता है । गुरुत्व होने से गौरव नाम वाला है । यह व्यस्त और समस्त अर्थात् अलग-अलग और सब पिताकर भगवान् शम्भु के मन्त्र कीर्तित किए गए । पञ्चाक्षर अर्थात् पाँच अक्षरों वाला जो मन्त्र है वह पञ्चवक्त्र का कहा गया है । आप दोनों उस ही मन्त्र के द्वारा ईश्वर का समाधान करिए । हे वेताल भैरव! मैं उनका ध्यान बतलाऊँगा, उसका भली-भाँति आप श्रवण करिए । अब शम्भु के स्वरूप का ध्यान बतलाया जाता है । शम्भु के पाँच मुख हैं- महान उनका शरीर है, वे जटाजूटों से समलंकृत हैं । सुन्दर चन्द्रमा की कला से समन्वित हैं, मस्तक केवालों से विभूषित हैं, शम्भु की दश वायु हैं और व्याघ्र चर्म ही उनका वस्त्र है । कण्ठ में भगवान् शम्भु के हालाहल कालकूट विष को धारण किए हुए हैं तथा नागों के हार से उनका वक्षःस्थल विभूषित है । भुजङ्ग ही उनके कीरीट का बन्धन है तथा नाग ही बाहुओं के भूषण बने हुए हैं । सम्पूर्ण अंगों में चाँदनी से अर्पित सुन्दर कान्ति के धारण करने वाला हैं । भस्म से सम्पूर्ण अंग संलिप्त हैं । एक-एक मुख में तीन-तीन नेत्र हैं । इस प्रकार से पन्द्रह ज्योतियों वाले नेत्रों से शोभित हैं । वृषभ के ऊपर विराजमान हैं और हाथी के चर्म के परिच्छादन वाले हैं । अब शम्भु के पाँचों मुखों के नाम बतलाये जाते हैं- सद्योजात, वामदेव अघोर, तत्पुरुष, ईशान ये पाँच मुख कीर्तित किए गए हैं । सद्योजात का वर्ण शुक्ल है और वह स्वच्छ स्फटिक के तुल्य है । वामदेव पीतवर्ण वाला सौम्य एवं मनोहर है । अघोर नीलेवर्ण वाला है और उसमें दाढ़ है जो भय को बढ़ाने वाला है । तत्पुरुष देव रक्तवर्ण
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २८७ से युक्त हैं जिसकी मूर्ति परमदिव्य है और वे मनोहर हैं । ईशान श्यामल हैं और सर्वदा ही शिव स्वरूप हैं । आद्य स्वरूप का पश्चिम दिशा में चिन्तन करना चाहिए । उत्तर दिशा में द्वितीय स्वरूप का चिन्तन करें । अघोर देव का दक्षिण में तथा पूर्व दिशा में तत्पुरुष का चिन्तन करना चाहिए । मध्य भाग में ईशान का भक्ति तत्पर होकर चिन्तन करना चाहिए । दक्षिण भाग के हाथों में शक्ति, त्रिशूल, खट्वाङ्ग, वरदान, अभय दान के दाता शिव का चिन्तन करना चाहिए उसी भाँति वाम भाग के हस्तों में अक्ष, सूत्र, बीजपुर, भुजङ्ग, डमरू और शुभ उत्पल का ध्यान करे । आठ ऐश्वर्यों से समायुक्त हृदय में विराजमान शिव का ध्यान करना चाहिए । इस प्रकार से ध्यान में जगत् के स्वामी महादेवजी का चिन्तन करना चाहिए और द्वारपालों का चिन्तन करके गणेश आदि का पूजन करे । इसके अनन्तर पुनः पाँचों भूतों के विशुद्धि का चिन्तन करे । इसके उपरान्त आठ नामों के द्वारा आठ मूर्तियों का अभ्यार्चन करे । भवादि आठ पुष्पों का हृदय के द्वारा ही विनियोजन करना चाहिए और जो समस्त आसन्न हों उनका भी पूजन करे । नाराच मुद्रा से उसका ताड़न परिकीर्तित किया गया है और धेनु मुद्रा दिलाकर विधान से विसर्जन करे । सदा ही वृद्धि से दण्डेश्वर प्रभु का निर्माल्य धारण करना चाहिए । प्रत्येक का पांच मन्त्रों के द्वारा अंगादि प्रमार्जन करे । हे नर श्रेष्ठों! इन पूर्व में वर्णित सम्पद आदि के द्वारा इसका प्रमार्जन करना चाहिए । फिर आठ देवियों का पूजन करे । उनके नाम हैं-बाला, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरणी, देवी, बलप्रमथिनी और सब भूतों की दमनी मनोन्मथिनी । इन आठ देवियों का यजन क्रम से भगवान् शम्भु की प्रीति के लिए करना चाहिए । इस रीति से शम्भु का पूजन करके ध्यान में परायण मन वाला हो जावे । फिर अपने श्री गुरुदेव का और मन्त्र का ध्यान करके माला का आदान कर जप करना चाहिए । एक ही पाँच अक्षरों वाला मन्त्र अथवा एक प्रसाद होवे । उसी में समासक्त मन वाले
२८८ ❧ श्रीकालिका पुराण ❧ होते हुए जप करके शीघ्र ही सिद्धि की प्राप्ति कर लोगे । यह आप दोनों को मन्त्र बतला दिया है तथा इनका ध्यान और पूजा का क्रम भी कह दिया गया है । अब आप लोग नाटक पर्वत पर जाइए और वहाँ पर भगवान् हर की आराधना करिए । वेताल और भैरव दोनों ने कहा-हे मुनिवर! यह पाँच अक्षरों वाला मन्त्र आपकी सम्मति से धारण कर लिया और इसी मन्त्र के द्वारा देवेश्वर शम्भु का आनन्द के साथ हम यजन करेंगे । हे नृप! इतना ही यह कहकर तथा वेताल और भैरव दोनों ने प्रणाम किया था और फिर वशिष्ठ मुनि की अनुमति से नाटक पर्वत पर वे दोनों चले गए थे । वहाँ पर एक परमसुन्दर सरोवर था जिसकी सुन्दरता मन को हरण करने वाली थी । उसमें सर्वदा बहुत ही स्वच्छ जल रहा करता था और सदा विकसित कमल रहते थे । उसी सरोवर के तट पर परम विशाल और अत्यधिक सुन्दर भगवान् शम्भु का आश्रम था । वह आश्रम सर्वदा दानवों, देवों, किन्नरों तथा प्रमथों द्वारा हे नृप शार्दूल! रक्षा किया जाता है । वे रक्षा करने वाले सदा ही नृत्य और वादन में परायण रहा करते हैं । जिस कारण से वहाँ पर ईश कौतुक में तत्पर होकर नित्य नटित हुआ करते हैं । इसी कारण से यह पर्वत इस नाम से जाना जाता है । वह शैलछत्र के आकार के तुल्य आकार वाला था, परम मनोज्ञ था और भगवान शंकर का अतीव प्रिय था । जहाँ पर सरोवर की प्राप्ति की थी । उस समय इन दोनों ने वहाँ पर गमन किया था और उन्होंने परमोत्तम भगवान् हर का आश्रम नहीं देखा था । हे नृप! वे दोनों आश्रम के स्थान पर गमन करने में असमर्थ हो गए थे । इसके अनन्तर उन्होंने भगवान शम्भु को प्रणाम किया था और सरोवर के तट पर स्थित हो गए थे । वहीं पर वशिष्ठ मुनि के द्वारा कथित क्रम से एक सुन्दर स्थण्डिल का निर्माण करके वेताल और भैरव दोनों ने भगवान हर की आराधना करना आरम्भ कर दिया था । उस समय में शंकर के आत्मज उन दोनों को जो कि भूतेश्वर की आराधना कर रहे थे, भगवान् शंकर ने उस पर्वत पर देवगणों के साथ देखकर उस पर्वत की उपत्यका में अपर्णा के साथ
ही में अपने आश्रम में निवास किया था । पर्वत की नीचे की भूमि को उपत्यका कहा जाता है । उसी उपत्यका में भगवान् ने निवास करना शुरू कर दिया । सरोवर में तट पर नीचे के भाग में शंकर के दोनों पुत्र तपश्चर्या कर रहे थे वहाँ पर उन दोनों को स्थित हुए देखकर देवगणों के सहित भगवान् शंकर भी वहीं पर संस्थित हो गए थे । पर निरन्तर भगवान हर का जो नृत्य का शब्द हुआ करता था वे दोनों उस समय में उनका श्रवण किया करता है किन्तु वहाँ पर गमन करना और देखना प्राप्त नहीं होता था । हे भूप! वह पर्वत देवगणों के सहित भगवान् हर के द्वारा अधिष्ठित था । उस समय वे सुधर्मा की भाँति शोभित हो रहे थे । उस समय वहाँ पर भगवान् वृषभध्वज ध्यान करने वाले उनके ध्यान मार्गों में निश्चल हो गए थे । हे भूमिप! वे दोनों ही पूजा करते हुए गमन करते हुए अथवा स्थित होते हुए भगवान् शम्भु को ही ध्यान किया करते हैं और किसी समय भी चित्तों से भगवान् चन्द्रशेखर का त्याग नहीं करते थे । पाँच अक्षरों वाले मन्त्र के द्वारा वृषभध्वज का पूजन करते हुए उन दोनों ने सहस्र वर्षों का व्यक्तितचक्र कर दिया था । बिना आहार वाले, संयत आहार वाले और भगवान् हर में संसक्त मन वाले उन दोनों ने तपश्चर्या के द्वारा सहस्र वर्षों को एक ही वर्श की भाँति बिताया था । एक सहस्र वर्षों के व्यतीत हो जाने पर वृषभध्वज स्वयं ही उन दोनों से प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष उपागत हो गए थे । उस अवसर पर वेताल और भैरव दोनों ने भगवान् शम्भु को प्रत्यक्ष विराजमान पाकर वृषभध्वज का स्तवन किया था । जिस प्रकार हर के स्वरूप का ध्यान किया था और जो तेज के द्वारा उज्जवल हृदय में स्थित थे फिर उन दोनों ने उसी भाँति वसिष्ठ मुनि के अनुमान से उनका दर्शन किया था । वेताल और भैरव ने कहा-पाँच मुखों वाले, महान् विशाल शरीर से समन्वित, सम्पूर्ण ज्ञान से परिपूर्ण, संसाररूपी सागर से परित्राण करने वाले भगवान् वृषभध्वज को हम दोनों प्रणाम करते हैं । आप परमात्मा
२९० ऒ श्रीकालिका पुराण ऒ हैं और आप परेश पुरुषोत्तम हैं, आप कूटस्थ, जगत् में व्याप्त रहने वाले प्रधान परमेश्वर हैं । आप रूपात्मा हैं, आप महातत्त्व हैं, तत्त्व ज्ञान के आलय हैं, प्रभु हैं, आप सांख्य योग के आलय हैं, शुद्ध और तीन गुणों (सत्त्व-रज-तम) के विभाग के ज्ञाता हैं । आप एक और अनेक रूप वाले हैं, शान्त चेष्टा से संयुक्त और जगन्मय हैं । आप विकारों से रहित, निराधार, नित्य ही आनन्द स्वरूप हैं तथा सनातन हैं । आप विष्णु हैं, आप महेन्द्र हैं और आप ब्रह्मा तथा जगत् के स्वामी हैं । जो रूप और रूपेश्वर रत्नों की माता हैं, सम्भूति से भूत और निरवग्रह हैं, जो काक्ष्यावतीर्ण अवगत प्रभा भी हैं, योगेश्वर, ज्ञान के गति वाले और अगम्य अर्थात् न जानने के योग्य हैं । आप प्रेमरूप आत्मा के धराराम हैं, आप भोगीन्द्रों से बद्ध अमृतभोग तन्त्र वालें हैं । आप सूक्ष्म और अक्षर हैं, तत्वों के वेत्ता और अप्रमाथी हैं । आप देवों के भी देव और सुरगणों के रक्षक हैं । आप विकल्प और मान से परिहीन देह वाले हैं, आप शुद्ध अन्तधाम और अनुगतों की एक विद्यारूप हैं । आप वर्धिष्णु, उग्र पुरुष और परमात्मा हैं, आप इन्द्रियों के समूह की विचार बुद्धि हैं । आप नाथों के भी नाथ हैं, परों के प्रभाव अर्थात् उत्पत्ति स्थान हैं, आप मुनिगणों की गति हैं तथा योनियों के द्वारा जानने योग्य हैं । आप भूधर हैं, भागधर और अनन्त हैं । वे विश्वात्मा, आपके बहुत से प्रपञ्च हैं । आप ज्ञानरूपी अमृत के स्पन्दन करने वाले पूर्ण चन्द्रमा हैं और मोहरूपी अन्धकार के परम प्रदीप हैं । आप भक्तों के पुत्रों के परम पिता हैं और कोप में पञ्चानन के रूप को धारण करने वाले हैं । आप समस्तों के समुदायों का विस्तार किया करते हैं । आप ब्रह्मा के रूप से सृष्टि किया करते हैं और आप ही भगवान् विष्णु के रूप के द्वारा परिपालन निरन्तर किया करते हैं । आप ही गुरुदेव के रूप से इस जगत् का अन्त किया करते हैं । इस जगत् में आपसे अन्य कुछ भी वस्तु नहीं हैं । आप चन्द्रमा हैं और आप ही सूर्य हैं । आप ही अग्नि हैं, जल हैं, पवन हैं और आप ही धरित्री हैं । आप ही नभ हैं और आप ही ऋतु के तन्त्र होता हैं, आप
ही अष्टमूर्ति हैं और अष्टमूर्ति के हो जाया करते हैं । हे अनन्त मूर्तियों वाले! आपके रूप की अन्य प्रकार से संख्या कैसे हो सकती है क्योंकि आप अष्टमूर्ति हैं । आप त्र्यम्बक हैं और आप त्रिपुर के अन्त करने वाले हैं । आप शम्भु हैं, शमन हैं और विधाता हैं । आप सहस्रबाहु हैं, हिरण्यबाहु हैं, आप सहस्रमूर्ति हैं और पञ्चवक्त्र अर्थात् पाँच मुखों वाले हैं, आप बहुत नेत्रों वालें हैं और तीन नेत्रों से संयुक्त हैं । आप बहुत बाहुओं से युक्त हैं और ईश आप दश बाहुओं वाले हैं । भोग्यों के अनुसार हैं और अवग्रह से रहित हैं । नित्य और अनित्य स्वरूपों वाले के लिए, नित्यधाम रूपरूपी के लिए, परतत्व स्वरूपों वाले विश्वात्मा आपके लिए नमस्कार है । जिन आपके लिंग का अन्त ब्रह्मा और विष्णु ने भी प्राप्त नहीं किया था । हे वृषभध्वज! उनकी हम दोनों क्या स्तुति करेंगे । जिनके स्वरूप को देवता और दानवगण भी नहीं जानते हैं । हे परमेश्वर! हम दोनों बालक किस प्रकार से आपका स्तवन करेंगे । हे वृषभध्वज! हे देवेश! हम दोनों केवल भक्ति से ही, हे गौरीश! प्रणाम करते हैं । पुनः आपको बारम्बार नमस्कार है । और्व ने कहा-इस प्रकार से महान् आत्मा वाले वेताल द्वारा महादेवजी की स्तुति की गई थी । हे राजेन्द्र! भैरव ने भी स्तवन किया था । उस समय में वे प्रसन्न होकर उन दोनों देवों से बोले-हे पुत्रों! मैं आप दोनों पर परम प्रसन्न हूँ अब अपना वाँछित वरदान माँगिए । मैं तपोव्रतों से परम प्रसन्न हूँ, तुम दोनों का अभीष्ट दे दूँगा । हे सुतो! आपकी स्तुतियों, संयम तथा एकान्त चिंतनों से बार-बार जो किए गए थे उनसे मैं बहुत ही प्रसन्न हो गया हूँ, आप दोनों को जो भी अभीष्ट होगा उसे दे दूँगा । वेताल, भैरव, दोनों ने कहा-यदि सचमुच ही आप हम दोनों के ऊपर प्रसन्न हैं, यदि हम दोनों सचमुच ही आपके पुत्र हैं । हे वृषभध्वज ! यहाँ पर आपका ही जो इष्ट हो वही हम दोनों को वरदान देने की कृपा करो । सुतभाव से जगतों के पति, पिता आपको नित्य ही जैसे हम अवगत करें वैसा ही वरदान हम दोनों को प्रदान कीजिए ।
२९२ श्रीकालिका पुराण हम लोग राज्य की इच्छा नहीं रखते हैं, न धन ही चाहते हैं और न अन्य कुछ ही इच्छा है । हे वृषभध्वज! आपकी भक्ति से आपकी सेवा करना चाहते हैं । आपके चरण कमल के युग्म ही मधुकर की स्वरूपता को प्राप्त होवें । आपके प्रसन्न होने पर नेत्रों का जोड़ा सदा ही सफलता को प्राप्त होगा । यहाँ से आगे अन्य प्रकार से आपके चिन्तनों से, आपके ध्यानों से और आपके पूजनों से हम दोनों के करोड़ों सहस्र कल्प भली भाँति व्यतीत होवें । इसके अनन्तर महादेवजी ने हँसते हुए ही सब देवगणों के साथ उन दोनों को देवत्व कर दिया था । भगवान शंकर ने देवेन्द्र की सम्मति से ही अमृत को लाकर उसको बेताल और भैरव को पिला दिया था । हे नरश्रेष्ठों! भगवान् शिव की शक्ति से अमृत के पी लेने पर उन दोनों ने मृत्युभाव का परित्याग करके अर्थात् मृत्यु के मुँह में जाने के भाव का त्याग करके वे दोनों ही अमर्त्यता को प्राप्त हो गए थे । उस अवसर में स्वपन करते हुए वे दोनों दिव्य ज्ञान और बल से समन्वित हो गए थे । वे दिव्य रूप से सम्पन्न अरियों के दमन करने वाले हो गए । इसी अभिन्न देह के द्वारा देवत्व को प्राप्त हुए उन दोनों से भगवान् शम्भु बोले । भगवान् ने कहा-मैं तो आप दोनों पर परम प्रसन्न हूँ । मेरे दिए हुए काम की इच्छा करते हुए आप दोनों मेरी दयिता पार्वती ईश्वरी की आराधना करो । उनके बिना मैं सनातन अभीष्ट नहीं दे सकता हूँ । उनकी नित्य सेवा करने के लिए शिवा पार्वती देवी की शरण में गमन कीजिए । जिस भाव से शीघ्र ही वह देवी प्रीति को प्राप्त हो जावें वहाँ पर अथवा यहाँ पर गमन करके उसी भाव से उनका समर्चन करिए । अठारह पटल वाला महामाया कल्प और्व मुनि ने कहा-इस प्रकार से भूतेश्वर प्रभु के कथन करने पर उस समय में वेताल भैरव दोनों ही वे हर्ष से प्रफुल्ल लोचनों वाले व्योम केश भगवान् से बोले । वेताल भैरव दोनों ने कहा-हे भगवान् ! हम दोनों देवी पार्वती का ध्यान-मन्त्र और विधि नहीं जानते हैं । हम