कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
श्रीकालिका पुराण २८३ और भैरव उनसे पूछेंगे। अब मैं तपश्चर्या करने के लिए जाना चाहता हूँ। यह समय ऐसे बिताना युक्त नहीं हैं। इससे हे वीर श्रेष्ठों! मुझको आप छोड़ दीजिए। इतना कहकर वह मुनिश्रेष्ठ कपोत वन में चला गया था। उन दोनों ने उस मुनि को प्रणाम किया था और फिर वह दोनों अपने भवन को चले गए थे। इसके अनन्तर उस समय में वे दोनों समय करके तपश्चर्या के लिए दीक्षित हुए थे। माता-पिता से अनुज्ञा प्राप्त करके भाइयों को और अन्य बान्धवों को भी ज्ञापित करके उन दोनों महामति वालों ने कामरूप के लिए प्रस्थान किया। उमा देवी के सहित भगवान् शंकर भी उन दोनों का गमन जानकर इन्द्र के सहित समस्त देवों को सान्त्वना देते हुए यह बोले। ईश्वर ने कहा-हे सुरेश्वरो! मेरे दोनों पुत्र तप करने के लिए गए हैं। वे दोनों मेरी आराधना में चित्त वाले हैं। वे सुर श्रेष्ठो! उन पर दया करो। इन दोनों पुत्रों का जो कि वेताल और भैरव नाम वाले हैं, तपस्या से संस्कार करके मैं इनको गाणपत्य में नियोजित करूँगा। हे निर्जरो! आप लोग उन दोनों का संस्कार कर दो। तप से उन दोनों के शरीर मानुषभाव त्याग कर जिस रीति से दोनों सारभाव को प्राप्त हो जावें, मैं वैसा ही करूँगा। इतना कहकर वामदेव भी पार्वती के साथ ही आकाश मार्ग से गमन करते हुए पुत्रों के पीछे स्नेह से गए थे। अपने पुत्रों के पीछे अनुगमन करते हुए भगवान् हर के पीछे-पीछे गमन करने लग गए थे। इसके अनन्तर उन दोनों ने जो इस समय कृष्ण हिरण कें चर्म का धारण करने वाले थे, उनको आगे एक नदी मिली थी। वे दोनों ही तापस के भाव को प्राप्त हुए थे। वह नदी हषद्वती थी जो कि गंगा के ही समान परम पावन थी। भगवान् त्र्यम्बक देव के द्वारा वे दोनों कामरूप नाम वाले आश्रम में समापतित हुए थे। कामरूप पहुँचकर करतोया नदी का जल मिला था। हे नृपोत्तम! उन दोनों ने नदी के जल में आचमन किया। फिर नन्दिकुण्ड पर पहुँचे थे। वहाँ आचमन तथा स्नपन करके फिर जठाद्भवा नदी पर गमन किया था। वहाँ पर दोनों ने उपस्पर्शन किया था और वहाँ पर तप के द्वारा
घृत नन्दिकुण्ड को प्रणाम किया तथा जल्पिश देव को प्रणिपात किया था और फिर नाटक नामक पर्वत पर गमन किया था। वहाँ पर्वत पर पहुँच कर वृषभध्वज को प्रणाम किया और आराधना के उपदेश के लिए कपोत वचन का स्मरण किया था। फिर दोनों दक्षिण दिशा की ओर गए थे जहाँ सन्ध्याचल संस्थित था। वहाँ पर कान्ता नाम की नदी थी जो वशिष्ठ मुनि ने अवतारित की थी। उस नदी के तट पर एक महान शैल था जिस पर छाया वाले वृक्ष और लताएँ थीं क्योंकि ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठ जी ने वहाँ पर सन्ध्या वन्दना की थी। इसीलिए देवगण उस पर्वत का नाम सन्ध्याचल गाया करते हैं वहाँ पर पहुँचकर वशिष्ठ मुनि का दर्शन किया था जो साक्षात् अग्नि के ही तुल्य थे। वे वशिष्ठ मुनि भगवान गिरीश की आराधना कर रहे थे और उनका मन ध्यान में संयुक्त था। वे तपस्या की श्री से देदीप्यमान थे और दूसरे सूर्य के ही समान प्रतीत हो रहे थे। उस अवसर पर उनके समक्ष वेताल और भैरव ने प्रणाम किया था। हे भूप! वे दोनों विनय से अवनत होते हुए हाथों को जोड़े हुए स्थित हो गए थे। उन दोनों ने यह प्रणाम करते हुए विधाता के पुत्र से कहा कि चन्द्रशेखर से हम दोनों तारावती में उत्पन्न हुए हैं। इस क्षेत्र में हम दोनों भर्ग पुत्रों को मनुष्य ही जानिए। हम कार्य की सिद्धि के लिए भगवान् शम्भु की आराधना करने की इच्छा रखते हैं। हे सुब्रत! आप हम दोनों के अभीष्ट के विषय में अनुग्रह करें। उन दोनों के उस वचन का मुनियों में श्रेष्ठ वशिष्ठ जी ने श्रवण किया और उन्होंने कहा था कि मैंने आप दोनों का ज्ञान प्राप्त कर दिया है और सत्य में आप दोनों ही भगवान् शम्भु के आत्मज हैं। हे नरश्रेष्ठ! आप दोनों को भगवान् शम्भु की आराधना करनी चाहिए। परमश्रेष्ठ आप दोनों यहाँ पर मेरा क्या कृत्य है यह बोलिए। वृषभराज की आराधना के लिए आप दोनों का प्रयोजन है। जो उसका निमित्त है वह सिद्ध हो गया है, वह चिन्तन कीजिए। वेताल और भैरव ने कहा-जिस मन्त्र के द्वारा अविलम्ब ही भली-भाँति भगवान् शम्भु की आराधना की गई
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २८५ है। हे महामुने! वह हमारे ऊपर अपनी पृथ्वी में प्रसन्नता को प्राप्त होंगे, यही हमको आप बतलाइए। हे मुनि शार्दूल! जिस रीति से हम आराधना करें, जो तन्त्र है और जैसा भी क्रम है, वह सभी आप उत्तम रूप में बताने के लिए योग्य होते हैं। जिस रीति से शीघ्र ही हर को प्राप्त कर लेवें। हे मुनिश्रेष्ठ! आप अनुशासन कीजिए। हम दोनों आपके प्रणत हैं। वशिष्ठ जी ने कहा-आप दोनों के ऊपर भगवान् वृषकेतु उमादेवी के सहित प्रसन्न हैं। यहाँ पर स्वयं शीघ्र प्रसाद को प्राप्त हो जायेंगे। समस्त देवगणों के साथ अपनी भार्या के साथ वृषभध्वज गृह से अपने पुत्रों का पालन करते हुए आकाश के मार्ग द्वारा समाक्षिप्त हैं। किन्तु आपके मनुष्य के देह का अधिवासन करके अर्थात् तपों व्रतों से संस्कार करके स्वयं ही कैलाश पर ले जायेंगे और गणपत्य दोनों का नियोजन करेंगे और मैं भी उपदेश कर दूँगा। जिससे आप दोनों ही शीघ्र ही भर्ग को प्राप्त कर लेंगे। हे पार्वती पुत्रों! उसे एकाग्रमन से श्रवण कीजिए। वे ध्यान से चिरकाल में प्रसन्न होते हैं और शीघ्र ध्यान पूजन से प्रसन्न होते हैं। इस कारण से आज तात्त्विक रूप से ध्यान और पूजन बतलाता हूँ। वे तेज से परिपूर्ण हैं, सदा शुद्ध स्वरूप हैं, ज्ञानामृत से विवर्धित हैं, जगत् से परिपूर्ण, चित् (ज्ञान) और आनन्दरूप हैं, शौरि और ब्रह्मा के सदा महान् योग से संयुत हैं, ये सम्पूर्ण जगत् उनके ही स्वरूप हैं। उनका कथन करने में कौन समर्थ है। किन्तु जिन रूपों से ये भगवान् शंकर विचरण किया करते हैं उनमें से जो मेरे ज्ञान के द्वारा गम्य है उसमें जो भी अभीष्ट है आप दोनों को मैं कहता हूँ। हे नरश्रेष्ठ! सबसे प्रथम मन्त्र का श्रवण करो उसके पश्चात् ध्यान से साक्षात्कार को सुनिए। इसके पश्चात् पूजा का क्रम फिर क्रम से व्रत को सुनिए। समस्त स्वरों में दीर्घ शेष होता है-इस रीति से पाँच मन्त्र कीर्तित किए गए हैं। एक-एक से वहाँ पर एक-एक वक्त्र तो देव का पूजन करना चाहिए अथवा एक को समुदित करके पाँचों से पूजन करें। इसके अनन्तर प्रसाद के द्वारा पंचवक्त्र देव का यजन करना
२८६ श्रीकालिका पुराण चाहिए । सम्पद प्रभृति मन्त्रों प्रसाद परम प्रशस्त कहा गया है । क्योंकि शम्भु के प्रसादन से ही मन्त्र सफल होता है । इसी कारण से मुनियों में श्रेष्ठों के द्वारा यह प्रसाद संज्ञा वाला कहा गया है । इस कारण से समस्त मन्त्रों में प्रसाद परमप्रीति के प्रदान करने वाला है । सम्पद मन्त्र भगवान् शम्भु के आमोद के रहने वाला कहा जाता है । मन की प्रापूर्ति करने ही से सन्दोह कहा गया है । नाद आकर्षण करने वाला नाद होता है । गुरुत्व होने से गौरव नाम वाला है । यह व्यस्त और समस्त अर्थात् अलग-अलग और सब पिताकर भगवान् शम्भु के मन्त्र कीर्तित किए गए । पञ्चाक्षर अर्थात् पाँच अक्षरों वाला जो मन्त्र है वह पञ्चवक्त्र का कहा गया है । आप दोनों उस ही मन्त्र के द्वारा ईश्वर का समाधान करिए । हे वेताल भैरव! मैं उनका ध्यान बतलाऊँगा, उसका भली-भाँति आप श्रवण करिए । अब शम्भु के स्वरूप का ध्यान बतलाया जाता है । शम्भु के पाँच मुख हैं- महान उनका शरीर है, वे जटाजूटों से समलंकृत हैं । सुन्दर चन्द्रमा की कला से समन्वित हैं, मस्तक केवालों से विभूषित हैं, शम्भु की दश वायु हैं और व्याघ्र चर्म ही उनका वस्त्र है । कण्ठ में भगवान् शम्भु के हालाहल कालकूट विष को धारण किए हुए हैं तथा नागों के हार से उनका वक्षःस्थल विभूषित है । भुजङ्ग ही उनके कीरीट का बन्धन है तथा नाग ही बाहुओं के भूषण बने हुए हैं । सम्पूर्ण अंगों में चाँदनी से अर्पित सुन्दर कान्ति के धारण करने वाला हैं । भस्म से सम्पूर्ण अंग संलिप्त हैं । एक-एक मुख में तीन-तीन नेत्र हैं । इस प्रकार से पन्द्रह ज्योतियों वाले नेत्रों से शोभित हैं । वृषभ के ऊपर विराजमान हैं और हाथी के चर्म के परिच्छादन वाले हैं । अब शम्भु के पाँचों मुखों के नाम बतलाये जाते हैं- सद्योजात, वामदेव अघोर, तत्पुरुष, ईशान ये पाँच मुख कीर्तित किए गए हैं । सद्योजात का वर्ण शुक्ल है और वह स्वच्छ स्फटिक के तुल्य है । वामदेव पीतवर्ण वाला सौम्य एवं मनोहर है । अघोर नीलेवर्ण वाला है और उसमें दाढ़ है जो भय को बढ़ाने वाला है । तत्पुरुष देव रक्तवर्ण
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २८७ से युक्त हैं जिसकी मूर्ति परमदिव्य है और वे मनोहर हैं । ईशान श्यामल हैं और सर्वदा ही शिव स्वरूप हैं । आद्य स्वरूप का पश्चिम दिशा में चिन्तन करना चाहिए । उत्तर दिशा में द्वितीय स्वरूप का चिन्तन करें । अघोर देव का दक्षिण में तथा पूर्व दिशा में तत्पुरुष का चिन्तन करना चाहिए । मध्य भाग में ईशान का भक्ति तत्पर होकर चिन्तन करना चाहिए । दक्षिण भाग के हाथों में शक्ति, त्रिशूल, खट्वाङ्ग, वरदान, अभय दान के दाता शिव का चिन्तन करना चाहिए उसी भाँति वाम भाग के हस्तों में अक्ष, सूत्र, बीजपुर, भुजङ्ग, डमरू और शुभ उत्पल का ध्यान करे । आठ ऐश्वर्यों से समायुक्त हृदय में विराजमान शिव का ध्यान करना चाहिए । इस प्रकार से ध्यान में जगत् के स्वामी महादेवजी का चिन्तन करना चाहिए और द्वारपालों का चिन्तन करके गणेश आदि का पूजन करे । इसके अनन्तर पुनः पाँचों भूतों के विशुद्धि का चिन्तन करे । इसके उपरान्त आठ नामों के द्वारा आठ मूर्तियों का अभ्यार्चन करे । भवादि आठ पुष्पों का हृदय के द्वारा ही विनियोजन करना चाहिए और जो समस्त आसन्न हों उनका भी पूजन करे । नाराच मुद्रा से उसका ताड़न परिकीर्तित किया गया है और धेनु मुद्रा दिलाकर विधान से विसर्जन करे । सदा ही वृद्धि से दण्डेश्वर प्रभु का निर्माल्य धारण करना चाहिए । प्रत्येक का पांच मन्त्रों के द्वारा अंगादि प्रमार्जन करे । हे नर श्रेष्ठों! इन पूर्व में वर्णित सम्पद आदि के द्वारा इसका प्रमार्जन करना चाहिए । फिर आठ देवियों का पूजन करे । उनके नाम हैं-बाला, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरणी, देवी, बलप्रमथिनी और सब भूतों की दमनी मनोन्मथिनी । इन आठ देवियों का यजन क्रम से भगवान् शम्भु की प्रीति के लिए करना चाहिए । इस रीति से शम्भु का पूजन करके ध्यान में परायण मन वाला हो जावे । फिर अपने श्री गुरुदेव का और मन्त्र का ध्यान करके माला का आदान कर जप करना चाहिए । एक ही पाँच अक्षरों वाला मन्त्र अथवा एक प्रसाद होवे । उसी में समासक्त मन वाले
२८८ ❧ श्रीकालिका पुराण ❧ होते हुए जप करके शीघ्र ही सिद्धि की प्राप्ति कर लोगे । यह आप दोनों को मन्त्र बतला दिया है तथा इनका ध्यान और पूजा का क्रम भी कह दिया गया है । अब आप लोग नाटक पर्वत पर जाइए और वहाँ पर भगवान् हर की आराधना करिए । वेताल और भैरव दोनों ने कहा-हे मुनिवर! यह पाँच अक्षरों वाला मन्त्र आपकी सम्मति से धारण कर लिया और इसी मन्त्र के द्वारा देवेश्वर शम्भु का आनन्द के साथ हम यजन करेंगे । हे नृप! इतना ही यह कहकर तथा वेताल और भैरव दोनों ने प्रणाम किया था और फिर वशिष्ठ मुनि की अनुमति से नाटक पर्वत पर वे दोनों चले गए थे । वहाँ पर एक परमसुन्दर सरोवर था जिसकी सुन्दरता मन को हरण करने वाली थी । उसमें सर्वदा बहुत ही स्वच्छ जल रहा करता था और सदा विकसित कमल रहते थे । उसी सरोवर के तट पर परम विशाल और अत्यधिक सुन्दर भगवान् शम्भु का आश्रम था । वह आश्रम सर्वदा दानवों, देवों, किन्नरों तथा प्रमथों द्वारा हे नृप शार्दूल! रक्षा किया जाता है । वे रक्षा करने वाले सदा ही नृत्य और वादन में परायण रहा करते हैं । जिस कारण से वहाँ पर ईश कौतुक में तत्पर होकर नित्य नटित हुआ करते हैं । इसी कारण से यह पर्वत इस नाम से जाना जाता है । वह शैलछत्र के आकार के तुल्य आकार वाला था, परम मनोज्ञ था और भगवान शंकर का अतीव प्रिय था । जहाँ पर सरोवर की प्राप्ति की थी । उस समय इन दोनों ने वहाँ पर गमन किया था और उन्होंने परमोत्तम भगवान् हर का आश्रम नहीं देखा था । हे नृप! वे दोनों आश्रम के स्थान पर गमन करने में असमर्थ हो गए थे । इसके अनन्तर उन्होंने भगवान शम्भु को प्रणाम किया था और सरोवर के तट पर स्थित हो गए थे । वहीं पर वशिष्ठ मुनि के द्वारा कथित क्रम से एक सुन्दर स्थण्डिल का निर्माण करके वेताल और भैरव दोनों ने भगवान हर की आराधना करना आरम्भ कर दिया था । उस समय में शंकर के आत्मज उन दोनों को जो कि भूतेश्वर की आराधना कर रहे थे, भगवान् शंकर ने उस पर्वत पर देवगणों के साथ देखकर उस पर्वत की उपत्यका में अपर्णा के साथ
ही में अपने आश्रम में निवास किया था । पर्वत की नीचे की भूमि को उपत्यका कहा जाता है । उसी उपत्यका में भगवान् ने निवास करना शुरू कर दिया । सरोवर में तट पर नीचे के भाग में शंकर के दोनों पुत्र तपश्चर्या कर रहे थे वहाँ पर उन दोनों को स्थित हुए देखकर देवगणों के सहित भगवान् शंकर भी वहीं पर संस्थित हो गए थे । पर निरन्तर भगवान हर का जो नृत्य का शब्द हुआ करता था वे दोनों उस समय में उनका श्रवण किया करता है किन्तु वहाँ पर गमन करना और देखना प्राप्त नहीं होता था । हे भूप! वह पर्वत देवगणों के सहित भगवान् हर के द्वारा अधिष्ठित था । उस समय वे सुधर्मा की भाँति शोभित हो रहे थे । उस समय वहाँ पर भगवान् वृषभध्वज ध्यान करने वाले उनके ध्यान मार्गों में निश्चल हो गए थे । हे भूमिप! वे दोनों ही पूजा करते हुए गमन करते हुए अथवा स्थित होते हुए भगवान् शम्भु को ही ध्यान किया करते हैं और किसी समय भी चित्तों से भगवान् चन्द्रशेखर का त्याग नहीं करते थे । पाँच अक्षरों वाले मन्त्र के द्वारा वृषभध्वज का पूजन करते हुए उन दोनों ने सहस्र वर्षों का व्यक्तितचक्र कर दिया था । बिना आहार वाले, संयत आहार वाले और भगवान् हर में संसक्त मन वाले उन दोनों ने तपश्चर्या के द्वारा सहस्र वर्षों को एक ही वर्श की भाँति बिताया था । एक सहस्र वर्षों के व्यतीत हो जाने पर वृषभध्वज स्वयं ही उन दोनों से प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष उपागत हो गए थे । उस अवसर पर वेताल और भैरव दोनों ने भगवान् शम्भु को प्रत्यक्ष विराजमान पाकर वृषभध्वज का स्तवन किया था । जिस प्रकार हर के स्वरूप का ध्यान किया था और जो तेज के द्वारा उज्जवल हृदय में स्थित थे फिर उन दोनों ने उसी भाँति वसिष्ठ मुनि के अनुमान से उनका दर्शन किया था । वेताल और भैरव ने कहा-पाँच मुखों वाले, महान् विशाल शरीर से समन्वित, सम्पूर्ण ज्ञान से परिपूर्ण, संसाररूपी सागर से परित्राण करने वाले भगवान् वृषभध्वज को हम दोनों प्रणाम करते हैं । आप परमात्मा
२९० ऒ श्रीकालिका पुराण ऒ हैं और आप परेश पुरुषोत्तम हैं, आप कूटस्थ, जगत् में व्याप्त रहने वाले प्रधान परमेश्वर हैं । आप रूपात्मा हैं, आप महातत्त्व हैं, तत्त्व ज्ञान के आलय हैं, प्रभु हैं, आप सांख्य योग के आलय हैं, शुद्ध और तीन गुणों (सत्त्व-रज-तम) के विभाग के ज्ञाता हैं । आप एक और अनेक रूप वाले हैं, शान्त चेष्टा से संयुक्त और जगन्मय हैं । आप विकारों से रहित, निराधार, नित्य ही आनन्द स्वरूप हैं तथा सनातन हैं । आप विष्णु हैं, आप महेन्द्र हैं और आप ब्रह्मा तथा जगत् के स्वामी हैं । जो रूप और रूपेश्वर रत्नों की माता हैं, सम्भूति से भूत और निरवग्रह हैं, जो काक्ष्यावतीर्ण अवगत प्रभा भी हैं, योगेश्वर, ज्ञान के गति वाले और अगम्य अर्थात् न जानने के योग्य हैं । आप प्रेमरूप आत्मा के धराराम हैं, आप भोगीन्द्रों से बद्ध अमृतभोग तन्त्र वालें हैं । आप सूक्ष्म और अक्षर हैं, तत्वों के वेत्ता और अप्रमाथी हैं । आप देवों के भी देव और सुरगणों के रक्षक हैं । आप विकल्प और मान से परिहीन देह वाले हैं, आप शुद्ध अन्तधाम और अनुगतों की एक विद्यारूप हैं । आप वर्धिष्णु, उग्र पुरुष और परमात्मा हैं, आप इन्द्रियों के समूह की विचार बुद्धि हैं । आप नाथों के भी नाथ हैं, परों के प्रभाव अर्थात् उत्पत्ति स्थान हैं, आप मुनिगणों की गति हैं तथा योनियों के द्वारा जानने योग्य हैं । आप भूधर हैं, भागधर और अनन्त हैं । वे विश्वात्मा, आपके बहुत से प्रपञ्च हैं । आप ज्ञानरूपी अमृत के स्पन्दन करने वाले पूर्ण चन्द्रमा हैं और मोहरूपी अन्धकार के परम प्रदीप हैं । आप भक्तों के पुत्रों के परम पिता हैं और कोप में पञ्चानन के रूप को धारण करने वाले हैं । आप समस्तों के समुदायों का विस्तार किया करते हैं । आप ब्रह्मा के रूप से सृष्टि किया करते हैं और आप ही भगवान् विष्णु के रूप के द्वारा परिपालन निरन्तर किया करते हैं । आप ही गुरुदेव के रूप से इस जगत् का अन्त किया करते हैं । इस जगत् में आपसे अन्य कुछ भी वस्तु नहीं हैं । आप चन्द्रमा हैं और आप ही सूर्य हैं । आप ही अग्नि हैं, जल हैं, पवन हैं और आप ही धरित्री हैं । आप ही नभ हैं और आप ही ऋतु के तन्त्र होता हैं, आप
ही अष्टमूर्ति हैं और अष्टमूर्ति के हो जाया करते हैं । हे अनन्त मूर्तियों वाले! आपके रूप की अन्य प्रकार से संख्या कैसे हो सकती है क्योंकि आप अष्टमूर्ति हैं । आप त्र्यम्बक हैं और आप त्रिपुर के अन्त करने वाले हैं । आप शम्भु हैं, शमन हैं और विधाता हैं । आप सहस्रबाहु हैं, हिरण्यबाहु हैं, आप सहस्रमूर्ति हैं और पञ्चवक्त्र अर्थात् पाँच मुखों वाले हैं, आप बहुत नेत्रों वालें हैं और तीन नेत्रों से संयुक्त हैं । आप बहुत बाहुओं से युक्त हैं और ईश आप दश बाहुओं वाले हैं । भोग्यों के अनुसार हैं और अवग्रह से रहित हैं । नित्य और अनित्य स्वरूपों वाले के लिए, नित्यधाम रूपरूपी के लिए, परतत्व स्वरूपों वाले विश्वात्मा आपके लिए नमस्कार है । जिन आपके लिंग का अन्त ब्रह्मा और विष्णु ने भी प्राप्त नहीं किया था । हे वृषभध्वज! उनकी हम दोनों क्या स्तुति करेंगे । जिनके स्वरूप को देवता और दानवगण भी नहीं जानते हैं । हे परमेश्वर! हम दोनों बालक किस प्रकार से आपका स्तवन करेंगे । हे वृषभध्वज! हे देवेश! हम दोनों केवल भक्ति से ही, हे गौरीश! प्रणाम करते हैं । पुनः आपको बारम्बार नमस्कार है । और्व ने कहा-इस प्रकार से महान् आत्मा वाले वेताल द्वारा महादेवजी की स्तुति की गई थी । हे राजेन्द्र! भैरव ने भी स्तवन किया था । उस समय में वे प्रसन्न होकर उन दोनों देवों से बोले-हे पुत्रों! मैं आप दोनों पर परम प्रसन्न हूँ अब अपना वाँछित वरदान माँगिए । मैं तपोव्रतों से परम प्रसन्न हूँ, तुम दोनों का अभीष्ट दे दूँगा । हे सुतो! आपकी स्तुतियों, संयम तथा एकान्त चिंतनों से बार-बार जो किए गए थे उनसे मैं बहुत ही प्रसन्न हो गया हूँ, आप दोनों को जो भी अभीष्ट होगा उसे दे दूँगा । वेताल, भैरव, दोनों ने कहा-यदि सचमुच ही आप हम दोनों के ऊपर प्रसन्न हैं, यदि हम दोनों सचमुच ही आपके पुत्र हैं । हे वृषभध्वज ! यहाँ पर आपका ही जो इष्ट हो वही हम दोनों को वरदान देने की कृपा करो । सुतभाव से जगतों के पति, पिता आपको नित्य ही जैसे हम अवगत करें वैसा ही वरदान हम दोनों को प्रदान कीजिए ।
२९२ श्रीकालिका पुराण हम लोग राज्य की इच्छा नहीं रखते हैं, न धन ही चाहते हैं और न अन्य कुछ ही इच्छा है । हे वृषभध्वज! आपकी भक्ति से आपकी सेवा करना चाहते हैं । आपके चरण कमल के युग्म ही मधुकर की स्वरूपता को प्राप्त होवें । आपके प्रसन्न होने पर नेत्रों का जोड़ा सदा ही सफलता को प्राप्त होगा । यहाँ से आगे अन्य प्रकार से आपके चिन्तनों से, आपके ध्यानों से और आपके पूजनों से हम दोनों के करोड़ों सहस्र कल्प भली भाँति व्यतीत होवें । इसके अनन्तर महादेवजी ने हँसते हुए ही सब देवगणों के साथ उन दोनों को देवत्व कर दिया था । भगवान शंकर ने देवेन्द्र की सम्मति से ही अमृत को लाकर उसको बेताल और भैरव को पिला दिया था । हे नरश्रेष्ठों! भगवान् शिव की शक्ति से अमृत के पी लेने पर उन दोनों ने मृत्युभाव का परित्याग करके अर्थात् मृत्यु के मुँह में जाने के भाव का त्याग करके वे दोनों ही अमर्त्यता को प्राप्त हो गए थे । उस अवसर में स्वपन करते हुए वे दोनों दिव्य ज्ञान और बल से समन्वित हो गए थे । वे दिव्य रूप से सम्पन्न अरियों के दमन करने वाले हो गए । इसी अभिन्न देह के द्वारा देवत्व को प्राप्त हुए उन दोनों से भगवान् शम्भु बोले । भगवान् ने कहा-मैं तो आप दोनों पर परम प्रसन्न हूँ । मेरे दिए हुए काम की इच्छा करते हुए आप दोनों मेरी दयिता पार्वती ईश्वरी की आराधना करो । उनके बिना मैं सनातन अभीष्ट नहीं दे सकता हूँ । उनकी नित्य सेवा करने के लिए शिवा पार्वती देवी की शरण में गमन कीजिए । जिस भाव से शीघ्र ही वह देवी प्रीति को प्राप्त हो जावें वहाँ पर अथवा यहाँ पर गमन करके उसी भाव से उनका समर्चन करिए । अठारह पटल वाला महामाया कल्प और्व मुनि ने कहा-इस प्रकार से भूतेश्वर प्रभु के कथन करने पर उस समय में वेताल भैरव दोनों ही वे हर्ष से प्रफुल्ल लोचनों वाले व्योम केश भगवान् से बोले । वेताल भैरव दोनों ने कहा-हे भगवान् ! हम दोनों देवी पार्वती का ध्यान-मन्त्र और विधि नहीं जानते हैं । हम
൵श्रीकालिका पुराण ൵ २९३ ꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸꣸ उनकी किस प्रकार से आराधना करेंगे, यह भली भाँति बताइए। श्री भगवान ने कहा- हे सुतो! मैं महामाया का मन्त्र और कल्प आप दोनों के उपदेश करूँगा और तात्त्विक रूप से बता दूँगा जिससे यह सब हो जायेगा। और्व ने कहा- हे नृपोत्तम! उन देवेश्वर ने इस प्रकार कहकर फिर माया का ध्यान-मन्त्र और विधि गिरीश प्रभु ने उन दोनों को भली भाँति कह दिए थे। उस भैरव ने अठारह पटलों के द्वारा शिवामृत में निर्णय विधि कल्प के निबन्ध की रचना की थी सगर ने कहा- पहले शम्भु ने उन दोनों को कैसा मन्त्र बोला था जिसके द्वारा आराधना करके वे दोनों गाणपत्य पद को प्राप्त हुए थे। जो अठारह पटलों के द्वारा उन भैरव ने निबद्ध किया था उसे कल्प और रहस्य के साथ श्रवण करने का उत्साह कर रहा हूँ। और्व ने कहा- उसके बहुत होने से बहुत काल में ही कहा जा सकता है। इस कारण से जो भी महादेवजी ने कहा था उसको सद्यः उद्धृत करके उसका तत्व संक्षेप में कहता हूँ ! हे नृपोत्तम! उसका श्रवण कीजिए। उस अवसर पर पार्वती के मन्त्र को पूछते हुए उन बेताल-भैरव को महादेवजी ने बोला था, उस मन्त्र और कल्प को सुनिए। श्री भगवान् ने कहा- आप श्रवण कीजिए में गुह्य से भी परम गोपनीय को बतलाऊँगा। वैष्णवजी का महामाया महोत्सव आठ अक्षरों वाला है। इस श्री वैष्णवजी के मन्त्र का नारद ऋषि है और शम्भु देवता है। इसका अनुष्टुप् छन्द है और इसका सब अर्थों के साधन में विनियोग होता है। हानान्त पूर्व और णान्त उसी भाँति नान्त और णान्त हैं। एकादशाष्टक आदि बाल छटवाँ णान्त है जिसमें विष्णु आगे हैं। इन आठ अक्षरों से मन्त्र होता है जो शोणपत्र की प्रभा के समान होता है। ॐकार पूर्व में लगाकर समस्त प्रभा साधना करने वालों के द्वारा जप करना चाहिए। यह महामन्त्र परम गोपनीय है और वैष्णवी मन्त्र की संज्ञा वाला है। मन्त्र वाले वरगत हैं इसी कारण से अंग कीर्तित किया गया है। महादेवजी का ऊर्ध्व मुख है। यह बीज कहा गया है। ॐकार
२९४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ अक्षर बीज है और यकार शक्ति कही जाती है । हे भैरव! बीज के सहित मन्त्र कह दिया गया है और अब कल्प का श्रवण करो । किसी तीर्थ में, नदी में, देहवात में, गत्र्त आदि में, परकीय से इतर जल में पूर्व में स्नान करे । आचमन करके शुचिता को प्राप्त हुआ होकर आवास का परिग्रह करे । उत्तर दिशा की ओर अभिमुख होकर फिर स्थण्डिल का मार्जन करना चाहिए । जिसको वह स्वयं क्षिति से इस मन्त्र के द्वारा कर से करे । 'ॐ ह्रीं' इस मन्त्र के द्वारा और आशापूरक के जलों के द्वारा भूतों के अपसारण करने में अभ्युक्षण करे । फिर सव्य हाथ से शुचि होकर स्थण्डिल का ग्रहण करके सुवर्ण की लेखनी से अथवा याज्ञिक कुशा से मन्त्र को लिखना चाहिए । अथवा 'ॐ वैष्णव्यैः नमः' इस मन्त्र राज को लिखे फिर उसी से समरेखा से त्रिमण्डल करे । नित्य होने वाली पूजाओं में रज से मण्डल को नहीं लिखना चाहिए । पुरश्चरण कार्यों में और काम्यों में और इनके अनन्तर पश्चिम में फिर इसके पीछे दक्षिण में पीछे, शेष में पूर्व भाग में करे । इसी प्रकार से वर्णों के द्वारों के निहित क्रम होता है । 'ॐ ह्रीं' इस मन्त्र मण्डल के द्वारा फिर दिग्बन्धन करे । यथाक्रम से पूर्व में कथित आशा बन्धन से ही करे । यहाँ पर भी फट् जिसके अन्त में हैं, अपने कर से ही निबन्ध करे । यवों के मण्डलों से और आठों से एक अंगुल होवे । अदीघ्र योजित हाथों से चौबीस अंगुलों से उस भ्रमण वाले हाथ से एक-एक उसका मण्डल होता है । एक बालिस्त मात्र पद्म होता है और उससे आधा कर्णिकार है । इसके दल परस्पर में सक्त होते हैं और आयत हों, ऐसे ही नियोजित करे । न्यूनाधिक भाग में द्वार का न्यास करे । ठीक मध्य भाग में द्वार का न्यास करे न्यून तथा अधिक में न करे और सुबद्ध मण्डल रक्तवर्ण वाला विचिन्तन करें । इससे अन्यथा इसका उग्र मण्डल जो लक्षण और भागरहित किया करता है और न अभीष्ट काम की होता है । इससे यह मण्डल यहाँ पर लिखना चाहिए ।
महामाया कल्प वर्णन
६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२ २९५ महामाया कल्प वर्णन श्री भगवान् ने कहा-इसके उपरांत 'लम्' इस मन्त्र के अर्घ्यपात्र का चतुष्कोण मण्डल शीघ्र ही बनाकर जो कि द्वार पद्म से वर्जित होवे । फिर 'ॐ ह्रीं श्रीं' इस मन्त्र से मण्डल में अर्घ्यपात्र का विन्यास करना चाहिए । प्रथम वहाँ पूजा करके सन्निध्य करे । 'ॐ ह्रीं हौं' इस मन्त्र से गन्ध और पुष्प तथा जल अर्घ्यपात्र में क्षिप्त करे फिर वहाँ पर मण्डल का विन्यास करना चाहिए । पूर्व की ही भांति मण्डल करके अर्घ्यपात्र तीन भागों वाले जलों से पात्र को पूजित करें और उसमें पुष्प का निक्षेप करे । फिर ह्रीं, इस मन्त्र से आसन का जो कि अपना ही यजन करे । फिर बुद्ध पुरुष को चाहिए कि 'क्षौं', इस मन्त्र से आत्मा का पूजन करें । गन्ध, पुष्पों से शिरोदेश में पूजा का समाचरण करना चाहिए । 'ॐ सः'-इस मन्त्र के द्वारा हस्ततल में स्थित पुष्प का समाचरण करके सव्य कर से आघ्राण करके वाम कर के द्वारा कोविद पुरुष को ऐशानी दिशा में इसका पूर्व मन्त्र से ही विनिक्षेप करना चाहिए । रक्त वर्णन के पुष्प का ग्रहण करके दोनों हाथों से पाणिच्छप बाँधकर इसके पीछे दहन प्लवन आदि करे । बाँये हाथ की कनिष्ठका तथा दक्षिण हाथ की तर्जनी में वाम अंगुष्ठ को नियोजित करें । दाहिने उन्नत अंगुष्ठ को वाम कर के पृष्ठ में करना चाहिए । वाम के पितृ से मध्यमा और अनामिका को अधोमुख को और दाहिने कर को दक्षिण पृहस्त से कूर्म के पृष्ठ के समान करें । इस प्रकार से बँधा हुआ पाणिकच्छप सभी सिद्धियों को दे दिया करता है । स्थिर मन वाले बुद्ध पुरुष को चाहिए कि उसको अपने हृदय के समीप में करे और दोनों नेत्रों को मूँद लेवे । अपनी काया, शिर और ग्रीवा को समान रखे । फिर दाह प्लावन पूर्वक देवी के ध्यान का समारम्भ करना चाहिए । अग्नि को वायु में निक्षिप्त करके वायु को जल में और जल को हृदय में निक्षिप्त करे ।
२९६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
हृदय को निश्चल आकाश में देकर स्वप्न का निक्षेप करे । “ॐ हूँ फट्”-इस मन्त्र के द्वारा मस्तक में रन्ध्र का भेदन करके शब्द के सहित जीव को आकाश में स्थापित करे । वायु, अग्नि, यम इन्द्रों का और बीज के द्वारा शेषादि करे । ये परास्थान पर हैं, बिन्दु और अर्द्धचन्द्र के सहित इनसे शेष-दाह तथा उच्छद, परपीयूष का आसेवन यथाक्रम से करना चाहिए । विशुद्ध के लिए चिन्तन मात्र की है । इसके अनन्तर देवी के बीज के द्वारा जाम्बूनद की आकृति वाले अण्ड का पूजन करे । वहाँ पर पहुँचकर ‘ॐ ह्रीं श्रीं' मन्त्रों से द्विधा करना चाहिए । उनके ऊर्ध्व भागों में हृदलोक, स्वर्ग को भूमि तथा आकाश का निष्पादन करके शेष भाग से भू को पाताल के जल में चिन्तन करे । वहाँ पर सबका चिन्तन करना चाहिए । उसके मध्य में रत्नों से निर्मित मण्डल में संस्थित रत्न पर्यंक का चिन्तन करे । आकाश गंगा के जल की राशि से सदा ही सेवित वह शुभ है । उस पर्यंक पर रक्त पद्म है जो प्रसन्न और सर्वदा शिव है । उसका ऐसा चिन्तन करे कि वह स्वर्ण मानांक है, सप्त पातालों का नाम वाला हैं, ब्रह्मलोक से लेकर भुवन का स्पर्श करने वाला है तथा सुवर्णाचल के कर्णिका वाला है । वहाँ पर स्थित महामाया का एकाग्रमन वाला होकर ध्यान करे । वह महामाया शोण पद्म के सदृश है और उसके केश खुले हुए रहकर लटके हुए हैं । वह चलत्कांचना पर समारूढ़ तथा उज्जवल कुण्डलों की शोभा वाली है । सुवर्ण और रत्नों से सम्पन्न दो किरीटों को धारण करने वाली है । शुक्ल, कृष्ण और अरुण वर्णों वाले तीन नेत्रों द्वारा बहुत ही सुन्दर विभूषित है । सन्ध्याकालीन चन्द्र के तुल्य कपोलों से संयुक्त हैं और उनके लोचन चंचल है । पंकरहित दाड़िम के बीजों के समान दाँतों के रखने वाली, सुन्दर भौंहों से योग से उज्जवल, बन्धूक दन्त के वसनों वाली, शिरीष की प्रभा से युक्त, नासिका से संयुत, कम्बु के सदृश ग्रीवा वाली, विशाल नेत्रों से युक्त, करोड़ों सूर्यों की प्रभा से
समन्वित, चार भुजाओं वाली विवसना और पीन तथा उन्नत पयोधरों से शोभित, सिद्धसूत्र को धारण करने वाली और वाम हाथों से अभयदान तथा वरदान को धारण करने वाली निम्न अर्थात् गम्भीर नाभि क्रम से आयात, क्षीण मध्य भाग वाली, मनोहर, आनमित नागपाशों के सदृश ऊरुओं से युक्त, गुप्त, गुल्फों वाली सुन्दर पाणियों से संयुक्त, बद्ध संकल्प वाली, नीवीरासन से राजित, गात्र से रत्न संस्तम्भ को भली भाँति आलम्बन करके संस्थिता । बारम्बार क्या चाहते हो, इस तरह से बोलती हुई, पाँच आननों वाली, पुरः संस्थित का निरीक्षण करती हुई, सुन्दर वाहन वाली, मुक्तावली, स्वर्ण, रत्न हार और किंकणी आदि समस्त आभूषण के समूहों से उज्जवल, स्मित हास्य सहित मुख वाली, करोड़ों सूर्यों के सदृश, समस्त सुलक्षणों से समन्वित नूतन यौवन से सम्पन्न तथा सभी अंग प्रत्यंगों से सुन्दरी, ऐसी अम्बिका देवी का ध्यान करके 'नमः फट्' इस मन्त्र से स्वकीय मस्तक मैं मैं ही हूँ ऐसा चिन्तन करके प्रथम देवे । इसके अनन्तर अंगों का न्यास और करों का न्यास क्रम से करना चाहिए । फिर हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र इनमें क्रम से न्यास करे । इसके अनन्तर मूल मन्त्र का मुख में, पृष्ठ में, उदर में, दोनों बाहुओं में, गुह्य में, दोनों पादों में, दोनों जाघों में क्रम से आठ अक्षरों का विन्यास करे । तथा ओंकार का स्मरण करते रहें । इस प्रकार से अत्यन्त शुद्ध देह वाला होकर पूजा सदा ही उचित होती है । अन्य प्रकार से उचित नहीं होती है । यह शरीर की शुद्धि, मन का निवेश, भूतों का प्रसार किया करती हैं । भगवान् ने कहा-इसके उपरान्त अर्घ्यपात्र में उस मन्त्र को आठ भागों में विभक्त करके भली-भाँति तप्त करे । उससे जल को, पुष्पों को, अपने मण्डल को, आसन को अशोधित करे । इसके पीछे पूजा के उपकरणों का सम करे । 'ओं ऐं ह्रीं' इस मन्त्र के द्वारा शब्द प्रांशु विवर्जित द्वारपाल को और फिर देवी के आसनों का पूजन करना चाहिए । नन्दि, भृंगि, मद्य, काल गणेश, द्वारपाल का उत्तर आदि क्रम
२९८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ से पूजन करने के योग्य है और मध्य में आसन पूजन के योग्य है । आधार शक्ति आदि हे भैरव! पूजा कल्पों में समस्त तन्त्रों में प्रसिद्ध हेमेन्द्र यन्त्रों का पूजन करे । दश दिक्पालों के सहित धर्मादिकों को मण्डल के अग्नि आदि कोणों में पार्श्वदेश से यजन करना चाहिए । सूर्य, अग्नि, सोम, मरुत, इनके मण्डलों को, पद्मक को, रज, सत्व, तम को, योगपीठ को, गुरुदेव के चरण को नार से आदि लेकर भद्रपीठ के अन्त तक सांगोपाँगों को पूजित करे । फिर ब्रह्माण्ड, स्वर्ण डिम्ब और ब्रह्मा, विष्णु महेश्वरों का पूजन करें । सागरों के सहित सातों द्वीपों का, मण्डल के सहित स्वर्ण द्वीप का, रत्नमय, पर्यंक के सहित रत्न स्तम्भ मण्डप के पञ्चानन का मध्य में अवश्य पूजन करे । 'ह्रीं' मन्त्र से हाथों को निबद्ध करके कूर्मपृष्ठ का यजन करे और पूर्व की ही भाँति उत्तम आसन को प्राप्त करके देवी का ध्यान करना चाहिए । हृदय के मध्य में पर्यंक से संभृत स्वर्ण द्वीप का चिन्तन करे । इसके अनन्तर देखते हुए की भाँति एकाग्र मन से देवी का स्मरण करे । हृदय में प्रत्यक्ष करके मानस उपचारों में अर्थात् मन में कल्पित उपचारों के द्वारा सोलह प्रकारों से हृदय में विराजमान देवी शिवा का भजन करना चाहिए । इसके अनन्तर हे भैरव! हाथ से विनियोग करने पर उस पुष्प से गन्धर्वों के द्वारा देवी का पूजन किया जाता और पूजकों के द्वारा फल की प्राप्ति नहीं की जाती है । इसके उपरान्त शिर के साथ गायत्री मन्त्र के द्वारा आवाहन करना चाहिए । हम महामाया का ज्ञान रखते हैं और चण्डिका नाम वाली का ध्यान करते हैं । इतना कहकर फिर जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करे । हे देवि! आपके लिए 'ॐ ह्रीं श्री नमः' इस मन्त्र से देवि केलि में स्नानीय का समर्पण करे जो लक्षण लक्षित होवे, इसके अनन्तर मूल मन्त्र से दीपक के सहित गन्ध, पुष्प, धूप आदि को अर्पण करे और मोदक तथा पायस देवे । मिश्री, भुज, दधि, क्षीर, घृत और अनेक फलों से यजन करना चाहिए अर्थात् इनको अर्पित करना चाहिए । रक्तपुष्प, पुष्पों की माला, सुवर्ण और रजत (चाँदी) आदिक, उत्तम
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २९९ नैवेद्य, देवी का लांगल, मोदक, सिता ( मिश्री ) शाण्डिल्य कर ताम्र नामक और कूष्माण्ड के फल, हरीत का फल, नारंगी, एलका ( इलायची ) और जो द्रव्य बाल प्रिय हो, कसेरु कविसादिक, नारियल फल का जल, ये सब देवी के लिए प्रयत्नपूर्वक समर्पित करे । देवी पूजा में सदैव लाल वर्ण का रेशमी वस्त्र समर्पित करे और नीला वस्त्र कभी भी नहीं देवे । देवी के परम प्रिय पुष्प जैसे वकुल पुष्प और केशर दे । माध्य, कल्हार, वज्र, करवीर, कुटङ्क, आक के पुष्प, शाल्मल, सुकोमल दूर्वा के अंकुर कुश मञ्जरिका, दर्भ, बन्धूक, कमल ये सभी पुष्पों में उत्तम हैं और पायस तथा मोदक द्रव्य हैं । बन्धूक के पुष्पों की अथवा बकुल के पुष्पों की माला, करवीर और माध्य पुष्पों को एक सहस्र संख्या में जो देवी को अर्पित किया करता है । देवी का कथन है कि वे अपने अभीष्ट कामनाओं की प्राप्ति करके मेरे लोक में आनन्द प्राप्त किया करता है । शीतल चन्दन जो कालीयक से संयुत होवे मुख्य अनुलेपन प्रयत्नपूर्वक देवी के लिए देना चाहिए । कपूर, कुंकुम, कूर्च, कस्तूरी, सुगन्धित, कालीयक में सुगन्धों में देवी को प्रीति करने वाले माने गए हैं । अंगराग जितने भी हैं उनमें देवी का परमाधिक प्रीति करने वाला सिंदूर है । मधु से संयुत सुगन्धिशाली से समुत्पन्न अन्न, अपूप, पायस, क्षीर ये पदार्थ देवी के लिए प्रशस्त हुआ करते हैं । कपूर के सहित रत्नोदक, पिण्डीतक, कुमारक रोचन, ये ही देवी के स्कानीय कहे गए हैं । दीपों में घृत का दीपक प्रशस्त कहा गया है । सब उपचारों को देकर मध्य में इनका पूजन करना चाहिए । अब उन देवियों के नाम बतलाये जाते हैं, कामेश्वरी, गुप्तदुर्गा, विन्ध्याचल की कन्दरा में निवास करने वाली, कोटेश्वरी दीपिका नाम वाली, प्रकटी, भुवनेश्वरी, आकाश गंगा, कामाख्या, दिक्करवासिनी मातंगी, ललिता, दुर्गा, भैरवी, सिद्धिदा, बलप्रथमनी, चण्डी, चण्डोग्र, चण्डनायिका, उग्रा, भीमा, शिवा, शांता, जयंती, कालिका, मंगला, भद्रकाली, शिवा, धात्री, कपालिनी, स्वाहा, स्वधामपर्णा, पंचपुष्पकरिणी, सब भूतों की दमनी, मन के प्रोत्साहन के करने वाली, ये चौंसठ
३०० ६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ योगिनी हैं । इन सबका मध्य में भली-भाँति अभ्यर्चन करके मन के द्वारा अंगों का यजन करना चाहिए । हृदय, शिर, शिखा, कर्ण, नेत्र, बाहु, पाद, इन अंगों का यजन करे । तीन मूल मन्त्रों के अक्षरों से आदि अंग का पूजन करे । पीछे एक-एक का वर्धन करना चाहिए । अंगों के समूह के पूजन में मन्त्रों प्रयोग करें । सिद्धसूत्र और खंग का मूल मन्त्र के द्वारा यजन करे । इसके अनन्तर अष्ट पत्र के मध्य से आठ योगिनियों का पूजन करना चाहिए । पूर्व आदि चारों दिशाओं में शैलपुत्री, चन्द्रघण्टा, स्कन्दमाता और कालरात्रि का पूजन करना चाहिए । चण्डिका, कूष्माण्डी, कात्यायनी, शुभ्रा, महागौरी इनका अग्निकोण में और नैऋत्यादिक में पूजन करे । उसके आगे बलिदान करना चाहिए । हे भैरव! इस प्रकार से जब कल्प के विधान के मानों से देवी की पूजा की जाती है उस समय में स्वयं मंडल में समागमन करके जो भी कुछ देय होता है उसका ग्रहण किया करती है और कामना को भली भाँति प्रदत्त किया करती है । इसके अनन्तर पूर्व की ही भाँति ध्यान में स्थित होकर जप का समारम्भ करना चाहिए । हाथ से माला ग्रहण करके मन के द्वारा शिवा का चिंतन करे । गुरुदेव का चिंतन करके मूर्धा में जैसा भी वर्ण आदि होवे मंत्र को कण्ठ से ध्यान करके जो सित वर्ण हिरण्यमय है और हृदय में महामाया की और आत्मा को गुरुदेव के चरणों में देखें । इसके अनन्तर गुरु के मन्त्र का, आत्मा का और देवी की एकता का ध्यान करना चाहिए । फिर सुषुम्ना के मार्ग के द्वारा एकतत्व स्वरूप को षट्चक्र की ओर अवलम्बित करें । उस षट्चक्र में भी एक क्षण के लिए प्रयत्नपूर्वक महामाया का ध्यान करे । सोलह चक्रों में स्थित, साधकों के आनन्द को करने वाली देवी का चिंतन करता हुआ साधक अपने कर्म का आरम्भ करे । भौहों के ऊपर तीनों नाड़ियों का प्रांत कहा जाता है । वह प्रांत विषय का स्थान है, वह षट्कोण और चार अंगुल प्रमाण वाला है । उसका वर्ण रक्त है और योग के ज्ञाताओं के द्वारा वह आज्ञाचक्र नाम से कहा जाता है । मनुष्यों के कण्ठ में तीन
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३०१ नाड़ियों का वेष्टन विद्यमान हुआ करता है । सुषुम्ना, इडा और पिंगलाओं का षट्कोण है वह छः अँगुली का होता है । वह कंठ के मध्य में स्थित शुक्ल वर्णन वाला, षट्चक्र इस नाम से बताया गया है । तीनों नाड़ियों की हृदय में एकता हो जाती है । वही स्थान सोलह अरों वाला होता है जिसका प्रमाण सात अंगुल है । उसको योग के जानने वालों द्वारा आदि षोडष चक्र के नाम से प्रयोग किया गया है । मन्त्रों के ध्यानों का चिन्तन का और जप का क्योंकि आद्य होता है इसी कारण से वह आदि इस नाम से कहा जाता है । जप के आदि में यत्न से जल से अभ्युक्षण करके माला का पूजन करना चाहिए उसे मण्डल के अन्दर रखकर अथवा सव्य हस्त में रखकर करे । हे माले! आप महामाया हैं और सब शक्तियों के स्वरूप वाली हैं, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये चारों का वर्ग आप में ही न्यस्त रहते हैं । इस कारण से मेरी सिद्धि को प्रदान करने वाली हो जाओ ।
जप विधि और माला का वर्णन
इसके अनन्तर माला का अभ्यर्चन करके अपने दाहिने हाथ में उसका ग्रहण करना चाहिए । मध्यमा अंगुलि के मध्य भाग में उसको रखे और तर्जनी अंगुलि को वर्जित कर देना चाहिए । जपकाल में तर्जनी अंगुलि को सर्वथा दूर ही रखे । अनामिका और कनिष्ठिका अँगुलीयों से युतकर के अग्रभाग से वहाँ पर स्थापित करके अंगुष्ठ के अग्रभाग के द्वारा माला को रखे और उसमें स्थित प्रत्येक बीज (मानिका) को लेकर, हे भैरव! अर्थ से जप करना चाहिए । प्रत्येक बार मन्त्र को पढ़े और ओष्ठ को चलित करे । माला के बीच (मानिया) पर जप करना चाहिए ये मानिया परस्पर स्पर्श नहीं करे ऐसा ध्यान रखे । हे भैरव! पूर्व बीज का जप करता हुआ पर बीज का संस्पर्श करता है और अंगुष्ठा से उसका स्पर्श होता है वह जप सर्वथा निष्फल हो जाया करता है । दाहिने हाथ से माला को धारण करके अपने हृदय के समीप में रखे । देवी का चिन्तन करते हुए ही जप करना
४७९ श्रीकालिका पुराण ४७९ ३०३ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ है और उसके टूट जाने पर तो मारण ही हो जाता है इस प्रकार से जो जप करने का पण्डित जीप किया करता है वह अपनी अभीष्ट कामना की प्राप्ति किया करता है और हीन होने पर इसका उलटा हो जाता है । देव का मन हरण करने वाला जप अन्यत्र भी माला का जप करे । वैसा ही साधन करने वाला करे अन्यथा कभी भी नहीं करना चाहिए । अपनी शक्ति के ही अनुसार जप करे और प्रयत्न के साथ संख्या से ही जप करना चाहिए । बिना संख्या से जो भी जप किया जाता है उसका वह किया हुआ जप निष्फल ही जाता है । माला से जप करके फिर उस माला को मस्तक में अथवा प्रांशु स्थान में विन्यास करना चाहिए । इसके अनन्तर स्तुति का पाठ करे और जो भी कामना हो उसका निवेदन करे । स्तुति भी एक महामन्त्र की ही भाँति है जो कि समस्त कर्मों का साधन होता है । हे महाभागे! आप दोनों को मैं बताऊँगा जो कि सब सिद्धियों का प्रदायक होता है । समस्त मंगलों की मंगल करने वाली या मंगल स्वरूप है । हे शिवे! आप सभी अर्थों की साधिका हैं । हे शरण्ये! अर्थात् शरणागति में आ जाने वाले की रक्षा करने वाला है । हे गौरि! आपकी सेवा में नमस्कार है । सात बार आवृत्ति करके साधक इस स्तुति को करे । 'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं' इस मन्त्र के द्वारा पाँच प्रणाम करे । अन्य अन्यों के आगे अधिकार भी अपनी इच्छा के अनुसार करे । इसके पीछे योनि मुद्रा को दिखा कर विसर्जन करना चाहिए । दोनों हाथों को प्रसृत करके अर्थात् फैलाकर और उत्तम अञ्जलि करके दोनों अंगुष्ठों के अग्रभाग को दोनों कनिष्ठिकाओं के अग्रभाग का दोनों कनिष्ठिकाओं के अग्रभाग को वाम हाथ की अनामिका में उनकी कनिष्ठका न्यास आगे करें । दाहिने हाथ की अनामिका में दक्षिण की कनिष्ठिका का और अनामिका के पृष्ठभाग में दोनों मध्यमाओं का निवेश करना चाहिए । दोनों तर्जनियों को कनिष्ठा के अग्रभाग में उसके अग्रभाग से ही योजित करना चाहिए । यह योनि मुद्रा कही गई है जो कि देवी की प्रीति के