कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
४६२ ] [ कल्कि पुराण वैभ्राजके चैत्ररथे सुपुष्पे सुनन्दने मन्दरकन्दरान्ते । रेमे स रामाभिरुदारतेजा रथेन भास्वत्खगमेन कल्किः २० पद्मा ने भी सब श्रृंगार त्याग दिया और धूल मे लेट गई । उस समय उसका कस्तूरी युक्त नील वर्ण हुआ कंठ कामदेव को भस्म करने वाले शिवजी के समान लगने लगा ।१७। तभी उन कातर नेत्र वाली विलासिनी प्रियाओ की इच्छा पूर्ण करने के लिए आर्तजनो के बधु कल्किजी उनके मध्य मे प्रकट हुए ।१८। यूथपति हाथी के पास जिस प्रकार हथनिया जाती हैं, वैसे ही कल्किजी के समीप वे सभी नारियाँ हर्षित हृदय होकर आगईं । वे हृदय के सन्ताप को छोड़ कर पूर्ण कामा हो गईं ।१६। फिर उदार चरित्र वाले एव तेजस्वी कल्किजी श्रेष्ठ गगनगामी रथ पर पद्मा, रमा आदि नारियो के साथ आरूढ होकर पुष्पो से परिपूर्ण वैभ्राजक, चैत्ररथ और नन्दन वन में जाकर विहार-रत हुए ।२०। ततः सरोवर त्वरा स्त्रियो ययुः क्लमज्वराः । प्रियेण तेन कल्किना वनान्तरे विहारिणा ।२१। सरः प्रविश्य पद्मया विमोह रूपया तया । जल ददुर्वराङ्गनाः करेणवो यथा गजम् ।२२। इति ह युवतिलीला लोकनाथः स कल्किः । प्रिययुवतिपरीत पद्मया रामयाद्यः ।२३। निजरमणविनोदै शिक्षयँल्लोकवर्गान् जयति विबुधभर्त्ता शम्भले वासुदेव ।२४। ये शृण्वन्ति वदन्ति भावचतुरा ध्यायन्ति सन्तः सदा कल्केः श्रीपुरुषोत्तमस्य चरित कर्णामृत सादराः । तैंषा नो सुखयत्ययं मुररिपोर्दास्यभिलाषं विना संसारः परिमोचनश्च परमानन्दामृताम्भोनिधेः ।२५। फिर वे श्रमासक्त नारियाँ विहार करने वाले कल्किजी के साथ सरोवर के तीर पर जा पहुंची । जैसे हथिनियां यूथपति हाथी के शरीर.
अष्टदश अध्याय-३ ] [ ४६३ पर जल डालती हैं, वैसे ही वे सब स्त्रिया अद्भुत रूप वाली पद्मा के सहित कल्किजी के देह पर जल की वर्षा करने लगी ।२१-२२। जो कल्किजी युवतियो के साथ लीला करने मे निपुण तथा अपनी प्रिया रमा आदि नारियो के साथ विनोद युक्त विहार करने वाले हैं एव जो कल्किजी देवताओ के भी ईश्वर, आदि पुरुष और जगदीश्वर हैं, उन शम्भल ग्राम निवासी भगवान् वासुदेव की जय हो ।२३-२४। पुरुषोत्तम कल्किजी के इस कानो को अमृत के समान प्रिय लगने वाले चरित्र को जो कोई आदर पूर्वक सुनेगे, कीर्तन या ध्यान करेंगे, उन दास्य भाव की कामना वाले सत्पुरुषो के हृदय में भगवान् की प्रीति के अतिरिक्त अन्य किसी की प्रीति या कामना उत्पन्न नहीं होगी । वे यही अनुभव करेगे कि ससार मोक्ष के अतिरिक्त अन्य कोई परमानन्द नही ।२५।
तृतीयांश— ऊनविंश अध्याय ततो देवगणा सर्वे ब्रह्मणा सहिता रथैः । स्वैः स्वैर्गणैः परिवृता कल्कि द्रष्टुमुपाययुः ॥१॥ महर्षयः सगन्धर्वा किन्नराश्चाप्सरोगणा । समाजग्मुः प्रमुदिताः शम्भल सुरपूजितम् ॥२॥ तत्र गत्वा सभामध्ये कल्किं कमललोचनम् । तेजोनिधि प्रपन्नाना जनानामभयप्रदम् ॥३॥ नीलजीमूतसंकाश दीर्घपीवरबाहुकम् । किरीटेनार्कवर्मेन स्थिरविद्युन्निभेन तम् ॥४॥ शोभमान द्युमणिना कुण्डलेनाभिशोभिना । सहर्षालापविकसद्वदन स्मितशोभिनम् ॥५॥ सूतजी बोले—इसके अनन्तर एक समय सब देवता और ब्रह्मा सयुक्त होकर अपने अपने गणो के सहित रथो पर चढ कर कल्किजी के दर्शनार्थ आये ॥१॥ महर्षिगण, गधर्वगण, किन्नरगण तथा अप्सरागण सभी अत्यंत मुदित हृदय से उस सुरपूजित शभल ग्राम मे एकत्र हुए ॥२॥ फिर सब कल्किजी की सभा में गये और वहाँ पहुँच कर उन्होने देखा कि कमललोचन भगवान् कल्किजी शरणागतो को अभयदाता रूप से विराज- मान हैं ॥३॥ उनकी कान्ति नील मेघ समान थी, दीर्घ और सुपुष्ट भुजाएँ हैं, उनका मस्तक स्थिर विद्युत् अथवा सूर्य के समान तेजोमय किरीट से सुशोभित है ॥४॥ उनका मुख मंडल सूर्य के समान प्रकाश करने वाले ४६४
ऊनविंश अध्याय-३ ] [ ४६५ कुण्डलो से सुशोभित है उनका मुखारविन्द मधुर मुसकान और हर्षालाप से अत्यत शोभा को प्राप्त हो रहा है ॥५॥ कृपाकटाक्षविक्षेपपरिक्षिप्तविपक्षकम् । तारहारोल्लसद्वक्षश्चन्द्रकान्तमणिश्रिया ॥६॥ कुमुद्वतीमोदवह स्फुरच्छक्रायुधाम्बरम् । सर्वदानन्दसन्दोहरसोल्लसितविग्रहम् ॥७॥ नानामणिगणद्योतदीपित रूपमद्भुतम् । ददृशुर्देवगन्धर्वा ये चान्ये समुपागता ॥८॥ भक्त्या परमया युक्ता. परमानन्दविग्रहम् । कल्कि कमलपत्राक्ष तुष्टुवुः परमादरात् ॥६॥ जयाशेषसक्लेशकक्षप्रकीर्णानलोद्दाममकीर्णहीश देवेश विश्वेश भूतेश भावः । त्ववानन्त चान्त-स्थितोऽङ्गाप्तरत्न प्रभाभातपादाजितानन्तशक्ते ॥१०। शत्रु भी उनके कृपा-कटाक्ष-विक्षेप से अनुग्रह को प्राप्त होते हैं । वक्षस्थल पर चन्द्रकान्त मणि की कुमुदिनी को प्रसन्न करने वाली ज्योति से सयुक्त हार सुशोभित है, वस्त्र इन्द्र-धनुष के समान विविध रंगो में शोभा को बढा रहे हैं । आनन्द रस के कारण हृदय उल्लसित हो रहा है ।६-७। देवता गंधर्वादि सभी आगन्तुकोको कल्किजी का अनेक मणियो से सशोभित एव तेजस्वी रूप इस प्रकार अत्यत अद्भुत दिखाई दिया ।८। तब वे सभी परम भक्ति भाव से आदर पूर्वक उन परमानन्द विग्रह कमल लोचन कल्किजी की स्तुति करने लगे ।६। देवताओ ने कहा—हे देवेश ! हे विश्वेश्वर ! हे भूतेश्वर ! हे प्रभो ! आप सभी भावो से युक्त एव अनन्त हैं । आपके प्रचण्ड अग्नि रूप के किंचित् स्पर्श से भी इस ससार भर के क्लेश-पुंज भस्म हो जाते हैं । कान्ति की राशि से सम्पन्न आपके चरणो से लोक प्रकाशित है । हे अनन्तशक्ते ! आपकी जय •हो ।१०।
४६६ ] [ कल्कि पुराण प्रकाशीकृताशेषलोकत्रयात्र वक्षः स्थले भास्वतकौस्तु श्याम मेघौघराजच्छरीरद्विजाधीशतुङ्गानन त्राहि विष्णो स दाराः वय त्वा प्रसन्ना सशेष ।११। यद्यस्त्यनुगृहोऽस्याक व्रज वैकुण्ठमीश्वर । त्यक्त्वाशासितभूखण्ड सत्यधर्माविरोधत ।१२। कल्किस्तेषामिति वचः श्रुत्वा परमहर्षितः । पात्रात्रैः परिवृतश्चकार गमने मतिम् ।१३। पुत्रानाहूय चतुरो महाबलपराक्रमान् । राज्ये निक्षिप्य सहसा धर्मिष्ठाप्रकृतिप्रियान् ।१४। ततः प्रजाः ममाहूय कथयित्व निजः कथाः । प्राह तान्त्रिजनिर्याण देवानामुपरोधत. ।१५। हे प्रभो ! आपके श्याम वर्ण वाले वक्षस्थल मे अत्यन्त ज्योति सम्पन्ना कौस्तुभमाणी सुशोभित है । उस मणि के रश्मिजाल से तीनो लोक प्रकाशित हो रहे है इससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे मेघमाल के मध्य पूर्ण चन्द्र प्रतिष्ठित हो । हे नाथ ! हम सब विपत्ति मे पड़े हुए हैं और अपने नारी, पुत्र, स्वजनादि के सहित आपकी शरण में आते हैं । हे प्रभो ! हम पर प्रसन्न होकर हमारी रक्षा कीजिये ।११। हे नाथ ! अब यह पृथ्वी सत्य और धर्म से अविरोध पूर्वक शासित है । यदि आपकी हम पर कृपा है तो अब इसे त्याग कर वैकुण्ठ के लिए प्रस्थान कीजिये ।१२। देवाताओं के इन वचनों को सुन कर कल्किजी अत्यत प्रसन्न हुए और वे अपने नृपात्र मित्रो के सहित वैकुण्ठ गमन की इच्छा करने लगे ।१३। तब उन्होंने प्रजा वत्सल, महाबली एवं धार्मिक अपने चारो पुत्रो को बुला कर तुरन्त ही राज्याभिषेक कर दिया ।१४। फिर उन्होंने सम्पूर्ण प्रजा को बुला कर अपना वृत्तान्त कहते हुए उसे सूचित कर दिया कि अब हमे देवताओ के अनुरोध पर वैकुण्ठ धाम के लिए जाना है ।१५।
ऊनविंश अध्याय-३ ] [ ४६७ तच्छ्रुत्वा ता प्रजाः सर्वा रुरुदुर्विस्महान्विताः । त प्राहु प्रणता पुत्रा यथा पितरमीश्वरम् ।१६। भो नाथ मर्वधर्मज्ञ नास्मान्त्यक्तुमिहार्हसि यत्र त्व तत्र तु वय याम प्रणतवत्सल ।१७। प्रिया गृहा धनान्यत्र पुत्रा प्राणास्तवानुगाः । परत्रेह विशोकाय ज्ञात्वा त्वा यज्ञपूरुषम् ।१८। इति तद्वचन श्रुत्वा सान्त्वयित्वा सद्गुक्तिभिः । प्रययौ क्लिन्नहृदयः पत्नीभ्या सहितो वनम् ।१९। हिमालय मुनिगणैराकीर्णं जाह्नवीजलैः । • परिपूर्णं देवगणै सेवित मनस प्रियम् ।२०। गत्वा विष्णु सुरगणैर्वृ तश्चा च्चनुर्भुज । उषित्वा जाह्नवीतीरे सस्मरात्मानमात्मना ।२१। यह सुनकर सम्पूर्ण प्रजा अत्यन्त विस्मयमे पडकर रुदन करने लगी । जैसे पुत्र पिता से निवेदन करता है, वैसे वह प्रणाम करके उनसे बोली ।१६। प्रजा ने कहा—हे नाथ ! आप सभी धर्मों के जानने वाले हैं । आप प्रणतपाल को हम सब का परित्याग नही करना चाहिये । हे नाथ ! हम आपके साथ चलेगे ।१७। इस जगत् मे सभी को अपना धन, सन्तान और घर ही अत्यन्त प्रिय है । आप यज्ञ पुरुष सभी के दुख और शोक का शमन करने मे समर्थ हैं । यह जान कर हमारे प्राण भी आपका अनुगमन करने के लिए इच्छुक हैं ।१८। प्रजा के यह वचन सुन कर कल्किजी ने उन्हे श्रेष्ठ उपदेश देकर सान्त्वना प्रदान की और खेद-युक्त मन से अपनी दोनो पत्नियो को साथ लेकर वन के लिए चल दिये ।१९। वे गंगाजल से सम्पन्न, देवताओं और मुनियो से उपासित हृदय को आनन्द देने वाले हिमालय पर्वत पर पहुँच कर देवताओ के मध्य विराजमान हुए और चतुर्भुज विष्णु स्वरूप धारण करके अपने रूप का स्मरण करने लगे ।२०-२१।
४६८ ] [ कल्कि-पुराण पूर्णज्योतिर्मय साक्षी परमात्मा पुरातनः । बभौ सूर्यसहस्राणां तेजोराशिसमद्युतिः ।२२। शंखचक्रगदापद्मशाङ्गद्यैः समभिष्टुतः । नानालङ्करणानाञ्च समलङ्करणाकृतिः ।२३ ववृषुस्तं सुराः पुष्पैः कौस्तुभामुक्तकन्धरम् । सुगन्धि कुसुमासारैर्देवदुन्दुभिनिःस्वने ।२४। तुष्टुवुर्मुमुहुः सर्वे लोका संस्थाणुजंगमाः । दृष्ट्वा रूपमरूपस्य निर्याणे वैष्णवं पदम् ।२५। तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं पत्युः कल्केर्महात्मनः । रमा पद्मा च दहनं प्रविश्य तमवापतुः ।२६। तब वे पूर्ण ज्योतिमान् सर्वसाक्षी स्वरूप, सनातन पुरुष परमात्मा कल्किजी सहस्रो सूर्य के समान तेज से प्रकाशित हो रहे थे ।२२। विविध अलकारो से युक्त वे स्वयं भी अलकार के समान प्रकाशित हो रहे थे । शंख, चक्र, गदा, पद्म और शाङ्ग धनुष आदि समन्वित उनका वर्ण विग्रह पूजित होने लगा ।२३। उनके वक्षस्थल पर कौस्तुभमणि - सुशोभित थी । देवगण उन पर पुष्पवृष्टि कर रहे थे और सब ओर दुन्दुभिया बज रही थी ।२४। जब वे कल्किजी विष्णुपद में प्रविष्ट हुए, तब उन अरूप जगदीश्वर के रूप-दर्शन से सभी जीव मोह को प्राप्त हो गए ।२५। अपने पति कल्किजी के इस अद्भुत रूप को देख कर रमा और पद्मा अग्नि मे प्रविष्ट होकर उसमें लीन होगई ।२६। धर्म कृतयुगं कल्केराज्ञया पृथिवीतले । निःसपत्नौ सुसुखिनौ भूलोकं चेरतुश्चिरम् २७। देवापिश्च मरुः कामं कल्केरादेशकारिणौ । प्रजाः सपाल्तौ तु भुवं जुगुपतुः प्रभू ।२८। विशाखयूपभूपालः कल्केर्निर्याणमीदृशम् । श्रुत्वा स्वपुत्रं विषये नृप कृत्वा गतो वनम् ।२६।
[Header] ऊनविंश-अध्याय-३ ] [ ४६६
अन्ये नृपतयो ये च कल्केर्विरहकर्शिताः । तद्ध्यायन्तो जजन्तश्च विरक्ताः स्युर्नृपासने ।३०। इति कल्केरननस्तस्य कथां भुवनपावनीम् । कथयित्वा शुकः प्रायान्नरनारायणाश्रमम् ।३१। मार्कण्डेयादयो ये च मुनयः प्रशमायनाः । श्रुत्वानुभावं कल्केस्ते तं ध्यायन्तो जगुर्यशः ।३२
भगवान् कल्किजी की आज्ञा के अनुसार धर्म और सत्युग भार्या- विहीन रह कर सुख पूर्वक भूमडल पर चिरकाल तक विचरण करते रहे ।२७ देवापि और मरु-यह दोनो राजा कल्किजी के आदेशा- नुसार प्रजा-पालन एव पृथिवी के रक्षण में तत्पर हुए ।२८। भगवान् कल्किजी का गमन सुन कर विशालयूप नरेश भी अपने पुत्र को राज्य देकर वन मे चले गये ।२६। अन्यान्य राजागण भी कल्किजी के वियोग को सहन न कर सके । उन्होने अपने-अपने राज्य का त्याग कर दिया और कल्किएजी के रूप का ध्यान करते हुए उन्ही का नाम जपते लगे ।३०। अनन्त प्रभु कल्किजी की इस लोक पावनि कथा का वर्णन करने के पश्चात शुकदेवजी ने नर-नारायण को प्रस्थान किया ।३१। शान्त चित्त वाले मार्कण्डेय आदि मुनिगण भगवान् कल्किजी के इस महा- त्म्य को श्रवण कर उनका ध्यान करते हुए यशोगान मे तत्पर हुए ।३२।
यस्यानुशासनाद्भूभौ नार्धामुष्ठाप्रजाजनाः । नाल्पायुषो दरिद्राश्च न पाखण्डा न हेतुकाः ।३३ नाधयो व्याधयः क्लेशा दैवभूतात्मसम्भवाः । निर्मत्सराः सदानन्दा बभूवुर्जीवजातयः ।३४। इत्येतत्कथितं कल्केरवतार महोदयम् । धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं परम् ।३५। शोकसन्तापपापघ्नं कलिव्याकुलनाशनम् । सुखदं मोक्षदं लोके वाञ्छितार्थफलप्रदम् ।३६।
५०० ] [ कलिक पुराण
तावच्छास्त्रप्रदीपाना प्रकाशो भुवि रोचते । भाति भानु पुराणाख्यो यावल्लोकेऽति कामधुक् । ३७। श्रुत्वैतद्भृगुवंशजो मुनिगणैः साक सहर्षो वशी ज्ञात्वा सूतममेषबोधविदितं श्रीलोमहर्षात्मजम् । श्रीकल्केरवतारवाक्यममलं भक्तिप्रदे श्रीहरेः शुश्रूषु पुनराह साधुवचसा गंगास्तवं सत्कृत । ३८। जिनके शासनकाल मे इस पृथिवी पर कोई भी धर्म-हीन अल्पायुष्य, दरिद्री, पाखण्डी तथा कपट पूर्ण आचरण वाला व्यक्ति नही रहा और सभी प्राणी आधि-व्याधि से रहित, क्लेश-रहित और मात्सर्य- रहित होकर देवताओ के समान सुखी हो गए, उन्ही के अवतरण का का यह प्रसग कहा गया है। इसके श्रवण मात्र मे धन, यश और आयु की वृद्धि होती और परमानन्द की प्राप्ति होती है तथा अन्तकाल मे स्वर्ग की उपलब्धि हो जाती है । ३३-३५। यह कथा सुनने से शोक, सन्ताप और पाप को नष्ट करती है। कलियुग के उद्वेगो का शमन मोक्ष एव वाञ्छित फल देने मे वह समर्थ हैं । ३६। इच्छित फल को दाता पुराण रूपी सूर्य को उदय जब तक ससार मे नही होता, तभी तक अन्यान्य-शास्त्र दीपक माला का प्रकाश टिक पाता है । ३७। भृगुवश मे उत्पन्न मुनिगण शौनकादि ऋषियो ने इस भक्ति रस से परिपूर्ण कल्कि कथा के श्रवण से अत्यन्त आनन्द प्राप्त किया । वे जान गये कि लोम- हर्षंण के पुत्र सूतजी ज्ञान में इस प्रकार प्रवृत्त हैं । मुनियो के हृदय मे हरि कथा सुनने की इच्छा पुनः जागृत हुई और उन्होने आदर सहित गगास्तोत्र के विषय मे सूतजी से प्रश्न किया । ३८।
तृतीयांश— विंश अध्याय हे सूत ! सर्वधर्मज्ञ यत्वया कथितं पुरा । गङ्गां स्तुत्वा समायाता मुनयः कल्कि सन्निधिम् ।१। स्तवं तं वद गङ्गायाः सर्वपापप्रणाशनम् । मोक्षदं शुभदं भक्त्या शृण्वतां पठता मिह ।२। शृणुध्वमृषयः सर्वे गङ्गास्तव मनूत्तमम् । शोकमोहरं पुंसामृषिभिः परिकीर्त्तितम् ।६। इयं सुरतरगिणी भवनवारिधेस्तारिणी । स्तुता हरिपदाम्बुजादुपगता जगत्संसदः । सुमेरुशिखरामरप्रियजला मलक्षालनी । प्रसन्नवदना शुभा भवभयस्य विद्राविणी ।४। भगीरथमथानुगा मुरकरीन्द्रदर्पापहा महेशमुकुटप्रभा गिरिशिरः पताकासिता । सुरासुरनरोरगैर्जभवाच्छुतैः स स्तुता विमुक्तिफलशालिनी कलुषनाशिनी राजते ।५। शौनकजी बोले— हे सूतजी ! आप सभी धर्मों के जानने वाले हैं। आपने कहा था कि मुनिगण गङ्ग जी का स्तवन करके कल्किजी के पास पहुँचे थे, तो वह स्तव कौन-सा है, जिसके भक्ति-सहित पढ़ने या सुनने से मोक्ष रूपी मङ्गल की प्राप्ति होती हैं और सभी पापों का नाश होता है । उसे हमारे प्रति कहिये ।१-२। है सूतजी ने कहा— हे मुनियो ! उस ५०१
विश-अध्याय-३ ] [ ५०२ और मोह के नाशक अत्यंत श्रेष्ठ ऋषि प्रणीत गंगा-स्तोत्र को आपके प्रति कहता हूँ, सुनिये।३। ऋषियों ने कहा - यह सुरतरंगिणी संसार समुद्र से पार करने वाली भगवान् विष्णु के चरणारविन्दो से उद्भुत होकर भूमण्डल पर प्रवाहित हुई । यह भवभय विनाशिनी, पाप नाशिनी, सुमेरु शिखर वासिनी, अमृत जल वाली, प्रसन्नवदना भगवती गंगाजी शुभप्रदायिनी एवं सर्व पूजिता है ।४ यह भगवती राजा भगीरथ के पीछे-पीछे पृथिवी पर चली । इन्होने ऐरावत का गर्व खंडन किया । यह शिवजी के मस्तक मे मुकुट की प्रभा रूप से शोभामयी और हिमा- लय की श्वेत पताका के समान हैं । सभी देवता, दैत्य, मनुष्य और नाग आदि इनके यश का सदा गान करते रहते हैं । यह पापनाशिनी एवं मोक्षदायिनी हैं ।५। पितामहकमण्डलुप्रभवमुक्तिबीजालता श्रुतिस्मृतिगणस्तुता द्विजकुलालवालावृता । सुमेरुशिखराभिदा निपतिता त्रिलोकावृता । सुधर्मफलशालिनी सुखपलाशिनी राजते ।६। वरद्विहगमालिनी सगरवंशमुक्तिप्रदा · मुनीद्रवरनन्दिनी दिवि मता च मन्दाकिनी । सदा दुरितनाशिनी विमलवारिसदर्शन- प्रणामगुणकीर्त्तनादिषु जगत्सु संराजते ।७। महाभिधसुताङ्गना हिमगिरीशकूटस्तनी सफेनजलहासिनी सितमरालसचारिणी । चलल्लहरिसत्करा वरसरोजमालाधरा रसोलसितगामिनी जलधिकामिनी राजते ।८। इस मुक्ति रूपी बीजलताका प्रादुर्भाव ब्रह्म जी के कमण्डलुमे हुआ है । द्विजगण इसके आल-वाल रूप और सुधर्म इसको फल है । यह सुख रूप किसलयो से परिपूर्ण लता सुमेरु पर्वत का भेदन करके प्रगट हो गई । तीनो लोको मे व्याप्त गंगाजी का यह स्तोत्र श्रुति, स्मृति
५०३ ] [ कल्कि-पुराण
आदि सभी धर्म शास्त्रो से सम्मत है ।६। सगरवश को मोक्ष देने वाली यह जान्हवी, देवताओ के लिए मन्दाकिनी स्वरूपा तथा सदैव मगल के देने वाली है । प्रणाम पूर्वक इनका गुणगान करने और इनके निर्मल जल का दर्शन करने से ही संसार मे सुख की प्राप्ति होती है ।७। हिम- लय के शिखर रूपी वक्ष वाली यह भगवती महाराज शान्तनु की रानी हुई थी । इनका फेनो से युक्त जल ही हास है तथा श्वेत वर्ण वाले हम जिनकी गति, खिले हुए कमलोकीपंक्ति जिनकी माला तथा तरगही जिनके हाथ हैं, ऐसी रसवती वह गंगा प्रमुदित गति से समुद्र से मिलने के लिए बढी चली जा रही है ।८। क्वचित्कलकलस्वना क्वचिदधीरयादोगणा- क्वचिन्मुनिगणै स्तुता क्वचिदनन्तसपूजिता । क्वचिद्रविकरोज्ज्वला क्वचिदुदग्रपाताकुला क्वविज्जनविगाहिता जयति भीष्ममातासती ।६। स एव कुशलो जन प्रणमतीह भागीरथी स एव तपसा निधिर्जपति जाह्नवीमादरात् । स० एव पुरुषोत्तमः स्मरति साधु मन्दाकिनी स एव विजयी प्रभुः सुरतरगिणी सेवते ।१०। तवामल जलातित खगशृगालमीनक्षत चलल्लहरि लोलित रुचिर तीर जम्बालितम् । कदानिजवपुर्मुदा सुरनरोरगै सस्तुतोऽ- प्यह त्रिपथगामिनि ! प्रियमतीव पश्याम्यदौ ।११। जिनकी कही मुनिगण स्तुति करते हैं, तो कही अनन्त भगवान् द्वारा पूजी जाती है । जिनके जल मे कही विकराल जीव विचर रहे हैं, कही जिनका जल कल कल-गान कर रहा है, वही जल कही भीषण नाद करता हुआ पतित हो रहा है, उस पर कही सूर्य रश्मियाँ पड कर उसे प्रकाशमय कर रही हैं और कही उस जल मे मनुष्य स्नान कर रहे हैं । ऐसी इन भीष्म की माता सती गंगाजी की जय हो ।६। इन भगवती
त्रिंश-अध्याय-३ ] [ ५०४ गंगा को प्रणाम करने वाले पुरुष कुशल हैं। इनके नाम का जप करने वाले मनुष्य ही वास्तव में तपस्वी हैं। इनका स्मरण करने वाले प्राणी ही श्रेष्ठ हैं। इनकी उपासना करने वाले जीव ही सब को जीतने में समर्थ तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के स्वामी हैं। १०। हे देवि ! हे त्रिपथगे ! आपके निर्मल जल मे हमारा शरीर कब भासित होगा ? इस देह के मृत होने पर पक्षी और शृगाल आदि कब इसे नोचेंगे और फिर कब यह आपकी चंचल तरंगों में उछलता हुआ तट पर स्थित शिवारों से कब सजेगा ? हे माता ! मैं स्वर्ग लोक को कब प्राप्त कर सकूँगा और सुर, नर नाग कब मेरा स्तव करेंगे ? इस प्रकार का अपना सौभाग्य मैं कब देख सकूँगा ? ११। त्वत्तीरे वसतिं तवामलजलस्नानं तव प्रेक्षणं त्वन्नामस्मरणं तवोदयकथासंलापनं पावनम् । गंगे मे तव सेवनैकनिपुणोऽप्यानन्दितश्चाहतं स्तुत्वा त्वद्गतपातको भुवि कदा शान्तश्चरिष्याम्यहम् । १२। इत्येतन्नृपिशि प्रोक्तं गङ्गास्तवमनुत्तमम् । स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं पठनाच्छ्रवणादपि । १३। सर्वपापहरं पुंसां बलमायुविवर्द्धनम् । प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने गङ्गासान्निध्यतो भवेत् । १४। इत्येतद्भागर्वाख्यानं शुकदेवान्मया श्रुतम् । पठितं श्रावितं चात्र पुण्यं धन्यं यशस्करम् । १५। अवतारं महाविष्णोः कल्केः परममद्भुतम् । पठतां शृण्वतां भक्त्या सर्वाशुभविनाशनम् । १६। हे गंगे ! आपके तट पर, वास करता हुआ और आपके निर्मल जल में स्नान करता हुआ मैं कब आपके दर्शन करूँगा ? कब आपका नाम स्मरण करता हुआ आपके अवतरण की पुनीत गाथा का गान करूँगा ? आपकी सेवा करने के फल रूप में मेरे हृदय में आपकी भक्ति
४०५ + ३२ = ५३७ ] [ कल्कि-पुराण का सञ्चार कब होगा ? मेरे द्वारा किये हुए पाप कब नष्ट होगे ? कब मैं शान्त चित्त से पृथिवी पर विचरण करता हुआ आदर को प्राप्त हूँगा ? । १२। इस ऋषि प्रोक्त गंगा-स्तव का इस प्रकार पाठ किया गया । इसके पढने और सुनने से यश-लाभ होता तथा आयु की वृद्धि होती है । १३। इस स्तोत्र का प्रातः मध्याह्न और साय—तीनो काल पाठ करने से गंगा जी का सान्निध्य प्राप्त होकर सब पापो का क्षय तथा बल और आयु की वृद्धि होती है । १४। इस भार्गवाख्यान का मैने शुकदेवजी से श्रवण किया था । यह पढन और सुनने से पुण्यप्रद तथा धन और यश के बढाने वाला है ।१५। भगवान् कल्कि के अवतार विषयक अद्भुत उपाख्यान का भक्ति सहित पाठ अथवा श्रवण करने पर सब प्रकार के अमगलो का का नाश हो जाता है ।१६।
तृतीयांश— एकविंश अध्याय अत्रापि शुकसम्बादो मार्कण्डेयेन धीमता । अधर्मवंशकथन कलेर्विवरण तत ।१। देवानाब्रह्मसदन प्रयाण गोभुवा सह । ब्रह्मणो वचनाद्विष्णोर्जन्म विष्णुयशोगृहे ।२। सुमत्यस्वाशकैर्भ्रातृचतुर्भिः शम्भले पुरे । पितुः पुत्रेण सम्बादस्तथोपनयन हरे ।३। पुत्रेण सह सवासो वेदाध्ययनमुत्तमम् । शस्त्रास्त्राणा परिज्ञान शिवसदर्शन तत ।४। कल्के. स्तव शिवपुरो वरलाभ शुकापनम् । शम्भलागमन चक्रे ज्ञातिभ्यो वरकीर्तनम् ।५। सूतजी बोले—इस पुराण मे प्रथम मार्कण्डेयजी और शुकदेवजी का सम्वाद वर्णन हुआ है । फिर अधर्म के वंश का वर्णन और कल्किजी का प्रसंग आया है । इसके अनन्तर गोरूप धारिणी पृथिवी के देवताओ के साथ ब्रह्मलोक गमन और विष्णुयशजी के घर कल्किजी के जन्म लेने की कथा कही गई । तत्पश्चात् भगवान् विष्णु के अंश से चारो भाइयो के शम्भल ग्राम मे अवतरित् होने का उपाख्यान, पिता-पुत्र-संवाद और कल्किजी के उपनयन संस्कार का विवरण है ।१ ३। फिर पिता पुत्री का साथ साथ रहना, कल्किजी का वेद शास्त्रो तथा शस्त्रास्त्र की शिक्षा पाने की और भगवान् शंकर के दर्शन होने की कथा कही गई है ।४। तदनन्तर कल्किजी द्वारा शंकर-स्तवन और वर प्राप्त करना और शिवजी ५०६+३२=५३८
सप्तम अध्याय-३ ] [ ५३६ द्वारा प्रदत्त शुक के सहित उनका शभल ग्राम को लौटना तथा जाति बन्धुओ से वर प्राप्ति का वर्णन किया गया है ।५। वशाख्यूपभूपेन निजसर्वात्मवर्णनम् । महाभाग्याद्ब्राह्मणाना शुकस्यागमन तत. ।६। कल्किना शुकसम्वाद सिंहलाख्यानमुत्तमम् । शिवदत्तवरा पद्मा तस्या भूपस्वयं वरे ।७। दर्शनाद्भूपसघाना स्त्रीभावपरिकीर्त्तनम् । तस्या विषाद, कल्केस्तु विवाहार्थ समुद्यमः ।८। शुकप्रस्थापन दौत्ये तया तस्यापि दर्शनम् । शुकपद्मापरिचयः श्रीविष्णु पूजनदिकम् ।६। पादादिदेहध्यानञ्च केशान्त परिवर्णितम् । शुकभूषादानञ्च पुन शुकसमागम ।१०। फिर विशाखयूप नरेशके प्रति कल्किजी द्वाराअपने स्वरूपका और ब्राह्मण-माहात्म्य का वर्णन करना तथा शुक के आगमनकी कथा कही गई है ।३। फिर कल्कि-शुक सवाद, शुक द्वारा सिंहल द्वीप वर्णन, शिव द्वारा पद्मा को वर प्राप्ति का प्रसग पद्मा के स्वयवर मे आये हुए राजाओ को स्त्रीत्व प्राप्ति का वर्णन तथा पद्मा के सताप की चर्चा और विवाह के लिए कल्किजी के उद्यम की कथा कही गई है ।७-८। शुक का दूत- भाव से प्रस्थान, पद्मा और शुक की भेट तथा दोनो के परिचय का प्रसग और विष्णु भगवान् के पूजन की कथा हैं ।६। तदुपरान्त चरण से केश पर्यन्त, भगवान् के ध्यान करने का प्रसग, शुक को आभूषण-दान और शुक का कल्किजी के पास लौटना-यह कथा वर्णित हुई है ।१०। कल्के. पद्माविवाहार्थ गमन दर्शन तयो । जलक्रीडाप्रसङ्गेन विवाहस्तदनन्तरम् ।११। पु स्त्वप्राप्तिश्च भूपाना कल्केदर्शनमात्रत· । अनन्तागमन राज्ञा सम्वादस्तेन ससदि ।१२।
५४० ] [ कल्कि पुराण षण्डत्वादात्मनो जन्म कर्म चात्र शिवस्तवः। मृते पितरि तद्विष्णोः क्षेत्रे माया प्रदर्शनम् ।१३। आख्यानमन्तस्तस्य ज्ञानवैराग्यवैभवम् । राज्ञा प्रयाण क केश्च पद्माया सह शम्भले ।१४। विश्वकर्मविधानञ्च वसति पद्माया सह । ज्ञातिभ्रातृसुहृत्पुत्रै सेनाभिर्बौद्धनिग्रह ।१५। तदनन्तर विवाह के उद्देश्य से कल्किजी का गमन, जल क्रीडा के प्रस ग द्वारा कल्किजी और पद्मा का पारस्परिक परिचय और इनके विवाह का प्रस ग कहा गया है ।११। फिर स्त्रीत्व को प्राप्त हुए राजा- गण का कल्कि-दर्शन से पुन. पुरुषत्व की प्राप्ति, अनन्त मुनि का सभा मे आगमन और राजाओ से सम्वाद की कथा का वर्णन है ।१२। षण्ड रूप से अनन्त मुनि के जन्म का वर्णन, शिवजी की स्तुति और अनन्त मुनि के पिता के परलोक-गमन के पश्चात् विष्णु क्षेत्र मे भगवती माया के दर्शन का प्रस ग कहा गया है ।१३। तदनन्तर अनन्त का आख्यान, ज्ञान एंव वैराग्य रूप एश्वर्य का प्रस ग, फिर राजाओ का प्रयाण और पद्मा सहित कल्किजी के शम्बल-गमन की कथा कही है ।१४। फिर विश्वकर्मा द्वारा शम्बलपुरी का निर्माण और उसमे पद्मा, जाति-बांधव, भ्रात गण, सुहृद्जन, पुत्रादि तथा सेना के सहित कल्किजी का निवास और बौद्धो के निग्रह की कथा वर्णन की गई है ।१५।
- कथितश्चात्र तेषाञ्च स्त्रीणां सयोधनाश्रयः । नतऽत्रो बालखिलीना मुनीना रवानिवेदनम् ।१६। सपुत्राया. कुथोदर्या वधश्चात्र प्रकीर्त्ततः । हरिद्वारगतस्यापि कल्केर्मु निसमागम ।१७। सूर्य्यवंशस्य कथेन सोमस्य च विधानत. । श्रीरामचरित चारुसूर्य्यवंशानुवर्णने ।१८। देवापेरच मरो सद्यो युद्धयात्र प्रकीर्तित. ।
एकविश अध्याय-३ ] [ ५४१ महाघोरवनेकोक विकोकविनिपातनम् ।१६। भल्लाटगमन तत्र शय्याकरणादिभि सह । युद्ध शशिध्वजेनालु सुशान्ता भक्तिकीर्तनम् ।२०। तदुपरान्त बौद्धो की नारियो का रणक्षेत्र मे युद्ध के उद्देश्य से श्रागमन, बालखिल्य मुनियो का श्रागमन और अपने वृत्तान्त का वर्णन ।१३। फिर कुथोदरी नाम की राक्षसी का अपने पुत्र के सहित मारा जाना तथा हरिद्वार मे कल्किजी से मुनियो का मिलना कहा गया है ।१७। फिर सूर्यवंश और चन्द्रवंश का वर्णन तथा सूर्यवंश के प्रस ग में भगवान् श्री राम का चरित्र-वर्णन हुआ है ।१८। फिर मरु और देवापि का युद्ध के लिए आगमन, अत्यन्त विकराल कोक-विकोक का वध, कल्किजी की भल्लाट नगर-यात्रा, शय्याकरण आदि से युद्ध, शशिध्वज-कल्किजी का स ग्राम और सुशांता द्वारा भक्ति एव कीर्तन की कथा कही गई है ।१६-२०। युद्धे कल्केरानयन धर्मस्य च कृतस्य च । सुशान्तायाः स्तवस्तत्र रमोद्वाहस्तु कल्किना ।२१। सभाया पूर्वकथन निजगृहत्वकारणम् । मोक्ष शशिध्वजस्यात्र भक्तिप्रार्थयितुर्विभो ।२२। विषकन्यामोचनञ्च नृपाणामभिषेचनम् । मायास्तव, शम्भलेषु नानायज्ञादि साधनम् । नारदाद्विष्णुयशसो मोक्षश्चात्र प्रकीर्तितः । कृतधर्म प्रवृत्तिश्च रुक्मिणी व्रतकथनम् ।२४। ततो विहारः कल्केश्च पुत्रपौत्रादि सम्भवः । कथितो देवगन्धर्वगणागमनमत्रहि ।२५। फिर युद्ध क्षेत्र से कल्किजी, धर्म और सत्युग का शशिध्वज द्वारा अपने घर लाना, रानी सुशान्ता द्वारा कल्किजी का स्तव और कल्कि-रमा विवाह का प्रस ग कहा गया है ।२१। फिर राजा शशिध्वज
५४२ [ कल्कि-पुराण का अपने पूर्व-जन्मो का वृत्तान्त-कथन, गृद्ध देह प्राप्ति का प्रस ग, कल्किजी के प्रति भक्ति का निवेदन और और राजा शशिश्वज को मोक्ष की प्राप्ति का वर्णन हुआ है ।२२। विषकन्या का उद्धार, राजाओ का राज्याभिषेक, भगवती माया का स्तव तथा शम्भल ग्राम मे विविध यज्ञो का अनुष्ठान ।२३। तदनन्तर विष्णुयश जी का नारदजी से मोक्ष-विषयक प्रश्न, लोक मे सत्युग का स्थापन और रुक्मिणी व्रत का प्रम ग ।२४। फिर कल्किजी का विहार-वर्णन, पुत्र-पौत्रादि की उत्पत्ति और देव- ताओ तथा गधर्वो के शम्भल ग्राम मे आगमन की कथा कही गई है ।२५। ततो वैकुण्ठगमन विष्णो. कल्केरिहादितम् । शुकप्रस्थान मुचित कथयित्वा कथां शुभा ।२६। गंगास्तोत्रनिह प्रोक्त पुराणे मुनिसमतम् । जगतामानन्दकर पुराण पच लक्षणम् ।२७। चतुवर्ग प्रद कल्कि पुराण परिकीर्तितम् । प्रलयान्ते हरिमुखान्निः सृत लोक विस्तृतम् ।२८। अहोव्यासेन कथित द्विजरूपेणभूतले । विष्णोः कल्केर्भगवत. प्रभाव परमाद्भु तम् ।२९। येभक्त्यात्र पुराणसारममल श्रीविष्णु भावाप्लुत । शृण्वन्तीह वदन्ति वदन्ति साधुसदसि क्षेत्रे सुतीर्थाश्रमे । दत्त्वागा तुरगज गजवर स्वर्णां द्विजायादरात् वस्त्रालङ्करणै प्रपज्यविधिवन्मुक्तास्त एवोत्तमाः ।३०। फिर कल्किजी के वैकुण्ठ-गमन का वर्णन करके शुकदेव जी का कथा समाप्त करके चले जाना कहा गया है ।२६। फिर इस पुराण में मुनियो द्वारा कथित गंगास्तोत्र का वर्णन हुआ है । स सार को आनन्द देने वाला यह पुराण पांच लक्षणो से सम्पन्न है ।२७। यह कल्किपुराण, कीर्तन करने से, चतुवर्ग के देने वाला है । प्रलय के अन्त
एकविंश अध्याय ] [ ५४३ मे यह भगवान् श्रीहरि के मुख से निसृत होकर ससार मे विस्तार को . को प्राप्त हुआ है ।२८। फिर इस पुराण को ब्राह्मण रूप मे पृथिवी पर अवतरित होकर भगवान् वेदव्यासजी ने कहा । इसमे कल्कि स्वरूप भगवान् विष्णु के अत्यन्त अद्भुत प्रभाव का वर्णन किया गया हैं ।२६। सभी पुराणो के सार रूप इस कल्कि पुराण का जो साधुजन भगवान् विष्णु के भक्ति भाव मे मग्न होकर किसी आश्रम या पुण्यतीर्थ मे स्थिति होकर वस्त्रा भूषणो द्वारा ब्राह्मणो का सत्कार करते हुए तथा उन्हे गज, अश्व, गो, आदि धन दान देते हुए श्रवण अथवा कीर्तन करेगे उनको अवश्य ही मोक्ष की प्राप्ति हो जायगी ।३०। श्रुत्वा विधान विधिवद्ब्राह्मणो वेद पारग । क्षत्रियो भूपतिर्वैश्यो धनीशूद्रो महान्भवेत् ।३१। पुत्रार्थी लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम् । विद्यार्थी लभते विद्या पठनाच्छ्रवणादपि ।३२। इत्येतत्पुण्यमाख्यान लोमहर्षण जो मुनि । श्रावयित्वामुनीन्भक्त्या ययौ तीर्थाटनादृतः ।३३। शौनको मुनिभिः सार्द्धं सूतमामन्त्र्यधर्मवित् । पुण्यारण्ये हरि ध्यात्वा ब्रह्म प्राप सहर्षिभि ।३४। लोमहर्षणज सर्वपुराणज्ञ यतव्रतम् । व्यासशिष्य मुनिवर त सूत प्रणमाम्यहम् ।३५। इस पुराण के विधी पूर्व क श्रवण करने वाला ब्राह्मण वेद मे पारगत होता है, क्षत्रिय को राज्य की प्राप्ति होती है, वैश्य धनी और शूद्र महान् हो जाता है ।६१। यदि पुत्र की कामना से इसका श्रवण करे तो पुत्र-लाभ, धन की इच्छा वाले को धन लाभ और विद्या के अभिला- षियो को विद्या की प्राप्ति होती है ।३२। लोमहर्षणसुत मुनिवर सूतजी ने भक्ति भाव सहित यह पुण्य आख्यान शौनकादि मुनियो को सुनाया