कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
३५० ] कल्कि पुराण मे जा पहुचा ।१६। सात योजन विस्तार वाले उस शम्भल ग्राम मे चारो वर्ण निवास करते हैं। वहाँ सूय किरणो के समान चमचमाते हुए सैकडो प्रासाद सुशोभित हैं ।२०। सर्वर्तु सुखद रम्य शम्बल विह्वलोऽविशत् ।२१। गृहाद्गृहान्तर दृष्ट्वा प्रासादपि चाम्बरम् । वनाद्वनातर तत्र वृक्षाद्वृक्षान्तर व्रजन् ।२२। शुक. स विष्णुयशशः सदन मुदितोऽव्रजत् । त गत्वा रुचिरालापै. कथयित्वा प्रिया. कथा. ।२३। कल्केरागमन प्राह सिंहलात्पद्मया सह ।२४। ततस्त्वरन्विष्णुयशाः समानोर्यप्रजाजनान् । विशाखयूपभूपाल कथयामास हर्षित. ।२५। सब ऋतुओ में समान सुख देने वाले सुरम्य शम्भल ग्राम को देखते ही विह्वल हुए शुक ने उसमे प्रवेश किया । वह वहां एक घर से दूसरे में, प्रासाद के आगे से आकाश में, एक उद्यान से अन्य उद्यान मे तथा एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर विचरने लगा ।२१-२२ इस प्रकार ह ष- विह्वल शुक विष्णुयशजी के घर में जाकर अपनी मधुर वाणी में उन्ही सम्पूर्ण प्रिय कथा सुनाने लगा ।२३। तथा पद्मा के सहित भगवान् कल्कि के आगमन का समाचार सुनाया ।२४। यह सुनते ही विष्णुयश हर्ष से पुलकित हो उठे और उन्होने विशाखयूप-नरेश आदि राजाओ और प्रजाजनो को वह सब समाचार सुना दिया ।२५। स राज्ञा कारयामास पुर-ग्रामादि मण्डितम् । स्वर्णकुम्भे. सदम्भोभिः पूरितैश्चन्दनोक्षितंः ।२६। कालागुरुसुगन्धाढ्यैर्दीपलाजाङ्कूरक्षतैः । कुसुमैः सुकुमारैश्च रम्भा-पूग-फलान्वितं । शुशुभे शम्भलग्रामो विबुधाना मनोहरः ।२७। त कल्किः प्राविशद्भीम-सेनागण-विलक्षण ।
षष्ठ अध्याय २ ] [ ३५१ कामिनी-नयनानन्दमन्दिराग कृपानिधिः ।२८। पद्मया सहित पित्रोः पदयोः प्रणतोऽपतत् । सुमतिर्मुदिता पुत्र स्नुषा शक्रं शचीमिव । ददृशे त्वमरावत्या पूर्णकामा दिति सती ।२६। तब विशाखयूप-नरेश ने चन्दन युक्त जल को स्वर्णाकलश मे भरवा कर नगर और ग्राम मे उससे छिड़काव कराया ।२६। उस समय वह शम्भल ग्राम दीपमाल, पुष्पो, अगर आदि सुगंधित द्रव्यो, कदली, पुगीफल, नवीन किसलय, अक्षत तथा ताम्बूल आदि से समन्वित होकर देवताओ की पुरी के समान मनोहर दिखाई देने लगा ।२७। इसी अवसर पर स्त्रियो के नेत्रों को आनन्द देने वाले भगवान् कल्कि अपनी सेना आदि के सहित ग्राम मे प्रविष्ट हुए ।२८। भगवान् कल्कि ने पद्मा के सहित अपने माता पिता के चरणो मे प्रणाम किया । जैसे इन्द्र और शची को प्रणाम करते देख कर दिति को आनन्द हुआ था, वैसे ही सुमति भी अपने पुत्र और पुत्रवधू को देख कर पूर्ण मनोरथ एव अत्यत हर्षित हुई ।२६। शम्भलग्राम नगरी पताका ध्वज-शालिनी अवरोधसुजघना प्रासादविपुलस्तनी । मयूरचूचका हस-सघहारमनोहरा ।३०। पटवासोद्योतधूमवसना कोकिलस्वना । सहासगोपुरमुखी वामनेत्रा यथांगना । कल्कि पति गुणवती प्राप्य रेजे तमीश्वरम् ।३१। स रेमे पद्मया तत्र वर्षपूगानजाश्रयः । शम्भले विह्वलाकारः कल्किः कल्कविनाशनः ।३२। कवेः पत्नी कामकला सुषुवे परमेष्ठिनो । बृहत्कीर्त्तिबृहद्वाहू महाबल पराक्रमौ ।३३। प्राज्ञ य सन्नतिर्भार्या तस्या पुत्रौ बभूवतु ।
३२५ ] [ कल्कि पुराण यज्ञविज्ञौ सर्वलोकपूजितौ विजितेन्द्रियौ ।३४। सुमन्त्रकस्तु मालिन्या जनयामास शासनम् । वेगवन्तञ्च साधूना द्वावेतावुपकारको ।।३५।। शम्बल ग्राम नामक वह नगरी ध्वजा-पताका से युक्त उन्नत प्रासादो वाली, मयूर, हंसादि से सुशोभिता, सुगन्ध-धूम-वसना कोकिल के समान मधुरालाप युक्ता तथा कामिनी के समान सर्व प्रकार सजी हुई थी। वह कल्किजी को पति रूप मे प्राप्त कर अत्यन्त शोभामयी हो गई ।३०-३१। वे अजन्मा, सर्वाश्रय रूप एव कलि-विनाशक कल्किजी अनेक वर्ष तक शम्भल मे रह कर पद्मा के साथ बिहार करते रहे ।३२। तद- नन्तर कवि की पत्नी कामकला ने दो पुत्र उत्पन्न किये जिनके नाम बृहत्कीर्ति और बृहद्बाहु हुए । यह दोनो अत्यन्त बली और पराक्रमी थे ।३३। प्राज्ञ की भार्या सुमति ने जितेन्द्रिय और सर्वलोक पूजित यज्ञ और विज्ञ नामक दो पुत्र उत्पन्न किये ।३४। सुमन्त्र की पत्नी मालिनी ने शासन और वेगवान् नामक दो पुत्रो को जन्म दिया । यह दोनो साधुजनो का उपकार करने वाले हुए ।३५। तद्द्वैतः कल्किश्च पद्मायां जयो विजय एव च । द्वौ पुत्रौ जनयामास लोकख्यातौ महाबलौ ।।३६।। एतै परिवृतोऽमात्यै सर्वसम्पन्समान्वितौ । वाजिमेधविधानार्थ मुद्यत पितर प्रभु ।३७। समीक्ष्य कल्कि प्रोवाच पितामहन्निवेश्वरर. । दिशा पालान्विजित्याह घनान्याहृत इत्युत ।३८। कारयिष्याम्याश्वमेध यामि दिग्विजयोय भो ! ।३६। इति प्रणम्य त प्रीत्या कल्कि पटपुरञ्जयः । सेनागणैः परिवृतः प्रययौ कोकट पुरम् ।४०। कल्किजी की पत्नी पद्मा ने जय, विजय नामक दो पुत्र प्रसव किये । यह दोनो महाबली तीनो लोको में प्रसिद्ध हुए ।३६। इस प्रकार उनका परिवार पुत्रवान् और सर्व ऐश्वर्य सम्पन्न हो गया । फिर कल्कि
षष्ठम अध्याय-२ ] [ ३५३ जी ने अपने पिता को अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान मे ब्रह्माजी के समान तत्पर देखकर कहा— हे पिता जी ! मैं दिक्पालो को जीत कर धन एकत्र करूँगा, जिससे आपका अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न होगा । अब मैं दिग्विजय के लिए प्रस्थान करता हूँ । ३७-३६। शत्रु-पुर पर विजय प्राप्त करने वाले कल्किजी ने यह कह कर प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता को प्रणाम किया और सेना को साथ लेकर कीकटपुर की ओर चल दिये ।४०। बुद्धालय सुविपुल वेदधर्मबहिष्कृतम् । पितृदेवार्चनाहीन परलोकविलोपकम् ।४१। देहात्मवादबहुल कुलजातिविवर्जितम् । धने स्त्रीभिर्भक्ष्यभोज्यै. स्वपराभेददर्शिनम् ।४२। नानाजनैः परिवृत पानभोजनतत्परैः ।४३। श्रुत्वा जिनो निजगणै कल्केरागमन क्रुधा । अक्षौहिणीभ्या सहित. सबभूव पुराद्बहिः ।४४। गजरथतुरगै समाचिता भू कनक विभूषणभूषितैर्वराङ्गै । शत शतरथिभिधृतास्त्रशस्त्रै.। ध्वजपटराजि- निवारितातपर्विभो सा ॥४५॥ अत्यन्त विस्तार वाला कीकटपुर बौद्धों का निवास स्थान था । यहाँ रहने वाले व्यक्ति वैदिक धर्म तथा देवता और पितरो के अर्चन से हीन और परलोक के न मानने वाले थे ।४१। यह लोग देहात्मवादी, कुल धर्म और जाति धर्म के न मानने वाले तथा धन, स्त्री और भोज- नादि मे अभेद देखने वाले थे ।४२। पान एव भोजन मे ही व्यस्त रहने वाले विविध प्रकार के मनुष्यो से ही यह नगर परिपूर्ण था ।४३। वहाँ के अधिपति जिन ने जब युद्ध के अभिप्राय से सेना सहित कल्किजी का आग- मन सुना तो वह प्रतीकारार्थ दो अक्षौहिणी सेना को लेकर नगर से बाहर आया ।४४। असंख्य हाथी, रथ, अश्व स्वर्ण के आभूषणों से भूषित श्रेष्ठ रथी और शस्त्रास्त्रधारी वीरो से पृथिवी ढक गई । सेनाओ के ध्वजो से धूप भी रुक गई ।४५।
द्वितीयांश— सप्तम अध्याय ततो विष्णु : सर्वजिष्णु कल्कि कल्कविनाशनः । कालयामास ता सेना करिणीमिव केसरी ।१। सेनागना ता रतिसगरक्षती रक्ताक्तवस्त्रा विवृतोरुमध्याम् । पलायती चारुविकीर्णकेशा विकूजती प्राह स कल्किनायकः ॥२॥ रे बौद्धा ! मा पलायध्व निवर्त्तध्व रणाङ्कणे । युध्यध्व पौरुष साधु दर्शयध्व पुनर्मम ॥३॥ जिनो हीनबल कोपात्कल्केराकर्ण्य तद्वचः । प्रतियोद्धु वृषारूढः खड्गचर्मधरो ययौ ।४। नाना प्रहरणोपेतो नानायुधविशारद कल्किना युयुधे धीरो देवाना विस्मयावहः ॥५॥ सूतजी बोले—जैसे सिंह हथियो पर आक्रमण करता है, वैसे ही पाप का नाश करने वाले तथा सब विजेता कल्किजी ने उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया ।१। युद्ध रुधिर रूपी वस्त्रो का धारण करने वाली विवृत ऊरु सम्पन्ना, विकीर्ण केशा प्रलाप करती हुई अर्थात हाहाकार करती हुई, रति युद्ध में आहत नारी के समान भागने वाली उस सेना से कल्किजी ने कहा ।२। अरे बौद्धो ! तुम इस युद्ध स्थल से मत भागो । आओ, लौट आओ और अपना पौरुष दिखाने मे पीछे न हटो ।३। कल्कि की बात सुन कर बल से हीन हुआ जिन क्रोध पूर्वक चर्म की तलवार लेकर युद्ध करने के लिए उनके समक्ष आया ।४। विविध प्रकार के युद्धो मे विशारद जिन कल्किजी से युद्ध करने लगा । उसका रणचातुर्य देख कर देवता भी आश्चर्य करने लगे ।५। ३५४
षष्ठम अध्याय-२ ] [ ३५५ शूलेन तुरगं विद्वा कल्कि बाणेन मोहयन् । क्रोडीकृत्य द्रुतं भूमेर्नाशक्तस्तोलना हत ।५। जिनो विश्वम्भरं ज्ञात्वा क्रोधाकुलितलोचनः । चिच्छेदास्य तनुत्राणं कल्केः शस्त्रञ्च दासवत् ।७। विशाखयूपोऽपि तथा निहत्य गदया जिनम् । मूर्च्छितं कल्किमादाय लीलया रथमारुहत् ।८। लब्धसञ्ज्ञस्तथा कल्किः सेवकोत्साहदायकः । समुत्पत्य रथात्तस्य नृपस्य जिनमाययौ ।६। शूलव्यथां विहायजौ महासत्त्वस्तुरङ्गम रिगणैर्भ्रमणैः पादविक्षेपेहननैर्मुहुः ।१०। दण्डाघातैः सटाक्षेपैर्बौद्धसेनागणान्तरे । निजघान रिपून्कोपाच्छतशोऽथ सहस्रशः ॥११॥ उसने अपने शूल से अश्व को विद्ध कर दिया तथा बाण से कल्किजी को सम्मोहित कर अंक मे भरने लगा, परन्तु उसे सफलता नही मिली ।५। जिन न कल्कि को विश्वंभर रूप जान लिया और क्रोध पूर्वक नेत्रो से उन्हे बदी के समान देखना हुआ, उसने उनके शस्त्रास्त्र और कवच को छिन्न-भिन्न कर दिया ।७। यह देख कर विशाखयूप-नरेश ने अपनी गदा से जिन को आहत कर दिया और लीला पूर्वक मूर्च्छित हुए कल्किजी को लेकर रथ पर चढ गये ।८। जब उन्हे चेत हुआ, तब वे भक्तो को उत्साह देने वाले कल्किजी राजा के रथ से उतर कर जिन के सामने पहुँचे ।६। कल्किजी का अश्व भी शूल की वेदना को भूल कर युद्धभूमि मे कूद पडा और घूमता हुआ पदाघात, दन्ताघात, केशघात आदि के द्वारा बौद्ध सेना के हजारो वीरो को क्रोधपूर्वक मारने लगा ।१०-११। निश्वासवातैरुड्डीय केचिद्द्दीपान्तरेऽपतन् । हस्त्याश्वरथसङ्घाधाः पतिता रणमूर्द्धनि ।१२।
३५६ ] [ कल्कि पुराण गर्ग्यो जघ्नु षष्टिशत भर्ग्य कोटिशतायुतम् । विशालास्तु सहस्राणा पञ्चाविश रणे त्वरन् ।१३। अयुते द्वे जघानाजौ पुत्राभ्या सहितः कवि । दशलक्ष तथा प्राज्ञ पञ्चलक्ष सुमन्त्रक ।१४। जिन प्राह हन्सकल्किस्तिष्ठाग्रे ममदुर्मते ! । दैव मा विद्धि सर्वत्र शुभाशुभफलप्रदम् ।१५। अश्व के भयंकर श्वास से उड कर कोई-कोई वीर तो अन्य द्वीपो मे जाकर गिर गये तथा कुछ वीर गज, अश्व एव रथादि से टक्कर खा कर युद्ध स्थल मे ही धराशायी हो गये ।१२। गर्ग्य ने अपने अनुगामियो को साथ लेकर बौद्धो की छ. हजार सेना का सहार कर दिया। भर्ग्य और उसकी सेना ने दस हजार सेना मार दी तथा विशाल और उसकी सेना ने पच्चीस हजार सेना नष्ट कर डाली ।१३। कवि और उनके दोनो पुत्रो ने बीस सहस्र सैनिक मार डाले । प्राज्ञ ने दस लाख और सुमन्त्रक ने पाँच लाख सेना का सहार कर दिया ।१४। फिर जिन को भागता देख कर कल्किजी ने हँस कर उससे कहा-अरे दुर्मते ! भाग कर न जा । तू मुझे अदृष्ट स्वरूप एव सभी शुभाशुभ फलो का देने वाला समझ कर मेरे सामने आ ।१५। मद्बाणजालभिन्नाङ्गो निःसङ्गो यास्यसि क्षयम् । न यावत्पश्य तावत्व बन्धूना ललित मुखम् ।१६। कल्केरितीरित श्रुत्वा जिन ग्राह हसन्बली । दैव त्वदृश्य शास्त्रे ते वधोऽयमुरीकृतः । प्रत्यक्षवादिनो बौद्धा वय यूय वृथाश्रमाः ।१७ यदि वा दैवरूपस्त्व तथाप्यग्रे स्थिता वयम् । यदि भेत्तासि बाणौघैस्तदा बौद्धैः किमत्र ते ।१८। सोपालम्भ त्वया ख्यातं त्वयेवास्तु स्थिरो भव । इति क्रोधाद्वाणजालै. कल्किं घोरै. समावृणोत् ।१६।
षष्ठम अध्याय-२ ] [ ३५७ स तु बाणमयं वर्षं क्षयं निन्येऽर्कवद्धिमम् ॥२०॥ तू मेरे बाणो से आहत होकर अभी परलोक को प्राप्त होगा । तब तेरा साथ कोई भी नही देगा । इसलिए अब तू अपने बधु-बांधवो का सुन्दर मुख देख ले । १६। कल्किजी के वचन सुन कर वह बली जिन हँसा हुआ बोला--अदृष्ट कभी समक्ष नही हो सकता । हम बौद्ध गण प्रत्यक्षके अतिरिक्त अन्य कुछभी नही मानते । हमारा शास्त्र कहता है कि हम अदृष्ट को नष्ट कर देंगे ।१७। यदि तुम दैव रूप हो तो हम तुम्हारे सामने खडे हैं । यदि तुम हमे बाण से आहत करोगे तो क्या बौद्ध गण तुम्हे छोड देंगे ।१८। जो तुम हमारे प्रति तिरस्कार के वचन कहते हो, वे वचन तुम पर ही लौट जाएँगे, अब तुम सावधान होजाओ । यह कह कर जिन ने अपने तीक्ष्ण बाणो से कल्किजी को समावृत्त कर दिया ।१९। जैसे सूर्य के दिखाई देने पर हिमपात नाश को प्राप्त होता है, वैसे ही जिन द्वारा की गई बाण-वर्षा कल्किजी के स्पर्श से क्षीण होने लगी ।२०। ब्राह्म वायव्यमाग्नेय पार्जन्यं चान्यदायुधम् । कल्केर्दर्शनमात्रेण निष्फलान्यभवन्क्षणात् ।२१। यथोपरे बीजमुप्त दानमश्रोत्रिये यथा । यथा विष्णौ मता द्वेषाद्भक्तिर्येन कृताप्यहो ।२२। कल्किस्तु तं वृषारूढमवप्लुत्य कचेऽग्रहीत् । ततस्तौ पेततुर्भू मौ ताम्रचूडाविव क्रु धा ।२३। पतित्वा स कल्किकचं जग्राह कट्करं करे ।२४। तत. समुत्थितौ व्यग्रौ यथा चाणूरकेशवौ । धृतहस्तौ धृतकचौ ऋक्षाविव महाबलौ । युयुधाते महावीरो जिनकल्की निरायुधौ ।२५। जिन द्वारा प्रेरित ब्रह्मास्त्र, वायव्या, आग्नेयास्त्र, मेघास्त्र और अन्यान्य सभी अस्त्र कल्किजी के दर्शन मात्र फल-हीन हो गये ।२१। जैसे
३५८ ] [ कल्कि पुराण ऊसर मे बीज बोने पर भी अन्न उत्पन्न नही होता तथा अश्रोत्रिय को दिया हुआ दान निष्फल हो जाता है, अथवा साधुजनो का अनिष्ट चाहने वालो की हरि-भक्ति फलवती नही होती, वैसे ही 'जिन' के सभी अस्त्र निष्फलता को प्राप्त हो गये ।२२। फिर कल्किजी ने उछल कर वृषभ पर चढ़े हुए जिन क केश पकड लिए तथा दोनो ही पृथिवी क्रोधपूर्वक अरुण ज्वाल-शिखा के समान युद्ध मे गुंथ गये ।२३। धरती पर गिरे हुए जिन ने भी अपने एक हाथ मे कल्किजी के केश और दूसरे से हाथ पकड रखे थे ।२४। फिर जैसे चाणूर और श्रीकृष्ण के मध्य युद्ध हुआ था, उसी प्रकार दोनो पृथिवी से उठ कर परस्पर केश और हाथ पकड कर निरस्त्र उसी प्रकार लड़ने लगे, जैसे दो महाबली रीछ परस्पर मे युद्ध करते हैं ।२५। तत कल्की महायोगी पदाघातेन तत्कटिम् । विभज्य पातयामास ताल मत्तगछो यथा ।२६। जिन निपतित दृष्ट्वा बौद्धा हाहेति चक्रुशु । कल्केः सेनागणा विप्रा जहृषुनिहतारयः ।२७। जिने निपतिते भ्राता तस्या शुद्धोदनो बलो । पदाचारी गदापाणि कल्कि हन्तु द्रुत ययौ ।२८। कविस्तु त बाणावर्षै परिवार्य समन्ततः । जगज्ज परवोरघ्नो गजमावृत्य सिहवत् ।२६। गदाहरत नमालोक्य पति स धर्मवित्तकवि । पदातिगो गदापाणिस्तथौ शुद्धोदनाग्रत ।३०। जैसे मदमत्त गजराज ताल के वृक्ष को उखाड कर धराशायी कर देता है, वैसे ही कल्किजी ने पदाघात करके जिन की कमर तोड़ कर उसे धरती पर गिरा दिया ।२६। हे विप्रो ! उसको धराशायी हुआ देख कर बौद्ध सेना हाहाकार कर उठी तथा शत्रु का सहार हुआ देख कर कल्कि-सेना हर्षित हो गई ।२७। जिन को युद्ध स्थल मे गिरा देखते ही उसका भाई बलवान् शुद्धोदन गदा लेकर कल्किजी को मारने के लिए
[Header] सप्तम अध्याय-२ ] [ ३५६
पैदल ही उन पर झपटा ।२८। हाथी पर सवार शत्रु-नाशक कवि ने शुद्धोदन को बाणो से ढक दिया और सिंहवत् गर्जन करने लगे ।२६। धर्मविद् कवि ने शुद्धोदन को गदा लिए पैदल ही युद्ध करते देखा तो वह भी पैदल ही उसके सामने जा डटे ।३०। स तु शुद्धोदनस्तेन युयुधे भीमविक्रमः । गज प्रतिगजेनेव दन्ताभ्यां सगदाबुभौ ।३१। युयुधाते महावीरो गदायुद्ध विशारदौ । कृतप्रतिकृतौ मत्तौ नदन्तौ भैरवान्रवान् ।३२। कविस्तु गदया गुर्व्या शुद्धोदनगदा नदन् । करादपास्याशु तया स्वया वक्षस्यताडयत् ।३३। गदाघातेन निहतो वीरः शुद्धोदनो भुवि । पतित्वा सहसोत्थाय तं जघ्ने गदया पुन ।३४। सताडितेन तेनापि शिरसा स्तम्भित कविः । न पपात स्थितस्तत्र स्थाणुवद्विह्वलेन्द्रिय ।३५। जैसे हाथी शत्रु के हाथी से दाँतो के द्वारा युद्ध करता है, वैसे ही गदाधारी कवि और महापराक्रमी शुद्धोदन गदा-युद्ध मे रत हो गए । युद्ध-मत्त दोनो वीर भयकर शब्द करते हुए परस्पर गदाओ को रोकने लगे ।३१-३२। फिर सिंहनाद करते हुए कवि ने अपने गदाघात द्वारा शुद्धोदन की गदा गिरादी और फिर तुरन्त ही उसके हृदय पर पदाघात किया ।३३। गदाघात को प्राप्त हुआ शुद्धोदन तुरन्त ही पृथिवी पर पडा तथा पुन सहसा उठ कर उसने कवि पर गदाघात किया ।३४। गदा लगने से कवि विकलेन्द्रिय और मूर्च्छित के समान खडे हो गये, परन्तु पृथिवी पर गिरे नही ।३५। शुद्धोदनस्तमालोक्य महासार रथायुतः । प्रावृत तरसा माया-देवीमानेतुमाययौ ।३६। यस्या दर्शनमात्रेण देवासुरनरादयः ।
३६० ] [ कल्कि पुराण निस्साराः प्रतिमाकारा भवन्ति भुवनाश्रया ।३७। बौद्धा शौद्धोदनाद्यग्रे कृत्वा तामग्रतः पुनः । योद्धुं समागता म्लेच्छकोटिलक्षशतैर्वृताः ।३८। सिंहध्वजोत्थितरथा फेरु-काक-गणान्विताम् । सर्वास्त्रशस्त्रजननीं षड्वर्गपरिसेविताम् ।३९। नानारूपां बलवतीं त्रिगुणाव्यक्तिलक्षिताम् । मायां निराक्ष्य पुरतः कल्किसेना समापतत् ।४०। तब शुद्धोदन ने कवि को अत्यन्त पराक्रमी और रथ-सेना से सम्पन्न देख कर कर माया देवी आह्ववानाथ तुरन्त ही वहाँ से प्रस्थान किया ।३६। जिस माया देवी का दर्शन करते ही देवता, दैत्य, मनुष्य आदि सभी सांसारिक जीव तेजहीन और प्रतिमा के समान निश्चेष्ट हो जाते हैं, उसी को साथ लेकर शुद्धोदन आदि बौद्धगण अपने करोड़ो म्लेच्छ वीरो के सहित रणस्थल में पहुँचे ।३७-३८। सिंहध्वजा वाले रथ पर माया देवी आरूढ हुई और उसने अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्र प्रकट किये । कौए और शृगाल उस माया देवी को सब ओर से घेरे हुए थे तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—यह षड्वर्ग उसकी सेवा कर रहे थे ।३९। वह अनेक प्रकार के रूप-धारण में समर्थ, बल- वती, त्रिगुणात्मिका माया देवी जैसे ही कल्कि सेना के समक्ष पहुँची, वैसे ही उसे देख कर कल्कि-सेना क्षीणता को प्राप्त हो गई ।४०। निःसारा प्रतिमाकाराः समस्ता शस्त्रपाणयः ।४१। कल्किसतानालोक्य निजान्भ्रातृज्ञातिसुहृज्जनान् । मायया जायया जीर्णान्विभुुरासीत्तदग्रतः ।४२। तामालोक्य वरारोहा श्रीरूपा हरिरीश्वरः । सा प्रियेव तमालोक्य प्रविष्टा तस्य विग्रहे ॥४३॥ तामनोलोक्य ते बौद्धा मातरं कतिश्चा वराः । रुरुदुः सघशो दीना हीनस्वबलपौरुषाः ॥४४॥
सप्तम अध्याय-२ ] [ ३६१ कल्किजी के शस्त्रवारी वीरगण प्रतिभा के समान चेष्टाहीन तथा बलहीन होगए ।४१। फिर कल्किजी ने जब अपने बन्धु, जाति- बांधव और सुहृदो को मायारूपिणी अपनी पत्नी के द्वारा जीर्ण होते देखा तो वे उसके समक्ष पहुँचे ।४२। जैसे ही उन्होंने श्रीस्वरूपा अपनी उस प्रिया की ओर देखा, वैसे ही वह वरारोहा उनके देह मे प्रविष्ट हो गई ।४३। तब अपनी उस माता माया देवी को न देख कर सभी प्रमुख बौद्ध बल पौरुष से रहित होकर रुदन करने लगे ।४४। विस्मयाविष्टमनस क्व गतेयमथाब्रुवन् । कल्किः समालोकनेन समुत्थाप्य निजाञ्जनान् ।४५। निशतमसिमादाय म्लेच्छांहन्तु मनो दधे । सन्नद्ध तुरगारूढ दृढहस्तधृतत्सरुम् ।४६ धनुर्निषङ्गमनिश्श बाणजालप्रकाशितम् । धृतहस्ततुत्राणगोवाङ्गुलि वराजितम् ।४७। मेधोपर्य्युत्ताराम दशनस्वर्णबिन्दुकम् । किरीटकाटिविन्यस्त-मणिराजिविराजितम् ।४८। कामिनीनयनानन्दसन्दोहरसमन्दिरम् । विपक्षपक्षविक्षेपक्षिप्तस्रक्षकटाक्षकम् ।४६। निजभक्तजनोल्लास-सवासचरणाम्बुजम् । निरीक्ष्य कल्कि ते बौद्धास्तत्रसुर्धर्मनिन्दका ।५०। माया को न देख वे आश्चर्य चकित होकर परस्पर कहने लगे कि माया देवी कहाँ चली गई ? इधर कल्किजी ने अपनी सेना पर दृष्टि डाली यो यह स्वस्थ और सचेत हो गई तथा म्लेच्छो का सहार करने की इच्छा से कल्किजी तीक्ष्ण खग लेकर घोडे पर सवार हुए ।४५-४६। उस समय बाणो से परिपूर्ण तरकश श्रेष्ठ धनुष, कवच एव अगुलित्राण
३६२ ] [ कल्कि पुराण था तथा किरीट के अग्रभाग मे विविध प्रकार की जडी हुई मणियां चमक रही थी ।४८। कामनियो के नयनो को आनन्द देने वाले रस के सदन रूप कल्किजी उस समय शत्रु-पक्ष को विक्षिप्त करने के उद्देश्य से उनकी ओर कटाक्ष करने लगे ।४६। भक्तजन अपने भगवान् कल्किजी के चरणा- रविन्दो का दर्शन करके उल्लसित हो उठे और धर्म-निन्दक बौद्धगण भय से कांपने लगे ।५०। जहृषुः सुरसङ्घाः खे यागाहुतिहुताशनाः ।५१। सुबलमिलनहृषः शत्रुनाशंतकर्ष समरवरविलास साधुसत्कारकाश । स्वजनदुरितहर्त्ता जीवजातस्य भर्त्ता रचयतु कुशल व. कामपूगवतार ।५२। यह देख कर आकाश मे स्थित देवता कहने लगे कि अब युद्ध- भूमि रूपी यज्ञस्थल मे स्थित अग्नि मे पुन आहुति डाली जाने को है ।५१। जो अस्त्रशस्त्रो से सुसज्जित सेनाओ को इकट्ठी करके शत्रुओं को नष्ट करने वाले, लीलापूर्वक सग्राम मे तत्पर साधुओ के सत्कार-कर्त्ता, स्वजनो के दु खो का विनाश एव सब प्राणियो का भरण करने वाले है, वे सतो की अभिलाषा पूर्ण करने वाले भगवान् कल्किजी सब प्रकार कल्याण करे ।५२। ० ॥ द्वितीय अंश समाप्त ॥
तृतीयांश- प्रथम अध्याय ततः कल्किम्लेच्छगणान्करवालेन कालितान् । बाणैः सन्ताडितान्याननयद्यमसादनम् ।१। विशाखयूपोऽपि तया कविप्राज्ञसुमन्त्रका । गार्ग्यभाग्र्यविशालाद्या म्लेच्छान्निन्धुयमक्षयम् ।२। कपोतरोमा काकाक्ष काककृष्णादयोऽपरे । बौद्धा. शौद्धोदना याता युयुधु कल्किसैनिकै ।३। तेषा युद्धमभूद्धोर भयदं सर्वदेहिनाम् । भूतेशानन्दजनकं रुधिरारुणकर्द्दमम् ।४। गजाश्वरथसघाना पतता रुधिरस्रवैः । स्रवन्ती केशशैवाला वाजिग्राहा सुगाहिको ।५। सूतजी बोले--फिर कल्किजी ने कुछ म्लेच्छो को बाणो द्वारा बीध दिया और कुछ को तलवार से मार कर यम लोक मे भेज दिया ।१। विशाखयूपनरेश, कवि, प्राज्ञ, सुमन्त्रक, गर्ग्य, भर्ग्य और विशालादि ने भी उन म्लेच्छो को यमपुरी पठाया ।२। फिर कपोतरोमा, काकाक्ष, काककृष्ण और शुद्धोदन आदि बौद्ध योद्धागण कल्किक-सेना से युद्ध मे तत्पर हुए।३। उस घोर सग्राम को देख कर सभी प्राणी भयभीत हुए । रक्त युक्त लाल कीचड से रणभूमि ढक गई, यह देख कर भूतनाथ हर्षित हो उठे ।४। युद्धस्थल मे गिरे हुए हाथियो, अश्वो और रथियो के ३६३
३६४ ] [ कल्कि पुराण रक्तपात से लोहित की नदी बह चली, जिसमें केश सिवार जैसे लगने लगे और अश्व रूपी ग्रह धार मे प्रवाहित होने लगे ।५। धनुस्तरङ्गा दुष्पारा गजरोधः प्रवाहिणी । शिरःकूर्मा रथतरिः पणिमीनासृगापगा ।६। प्रवृत्ता तत्र बहुधा हर्षयन्तो मनस्विनाम् । दुन्दुभेयरवा फेरुशकुनानन्ददायिनी ।७। गजेर्गजा नरैरश्वा. खरैरुष्ट्रा रथे रथाः । निपेतुर्बाणभिन्नाङ्गा' छिन्नबाह्वङ्घ्रिकन्धरा ।८। भस्मना गुण्ठितमुखा रक्तवस्त्रा निवारता. । विकीर्णकेशाः परितो तान्ति सन्यासिनो यथा ।६। व्यग्रा केऽपि पलायन्ते याचन्त्यन्य जलं पुन, । कल्किसेनाशुगक्षुण्णा म्लेच्छा नो शर्म लेभिरे ।१०। उस लोहित नदी मे धनुष तरंग के समान उछलने लगे, हाथी इस नदी मे सेतु के समान लगते थे, कटे हुए शीश कछुआ के समान, रथ नाव के समान और कटे हुए हाथ मछली के समान दिखाई देते थे ।६। लोहित नदी के किनारे गीदडो और बाज पक्षियो की हर्ष ध्वनि दुंदुभि की ध्वनि जैसी लगती थी । उसे देख कर मनस्वी लोग हर्षित हो उठे ।७। युद्ध क्षेत्र मे हाथी सवार हाथी सवार से, अश्वारोही अश्वारोही से, ऊँट वाला ऊँट वाले से, रथ रथी से भिड़ा हुआ था । उस समय बाणो से कट-कट कर हाथ, पाँव और मस्तक धरती पर गिर रहे थे ।८। बहुत से वीरो ने भयभीत होकर गेरुए वस्त्र धारण कर, भस्म रमा ली तथा विकीर्ण केश होकर संन्यासी बन कर रोके जाने पर भी पला- यन कर गये ।६। कोई-कोई विकल होकर भागा, कोई जल माँगता रहा । इस प्रकार कल्कि-सेना के बाणो की मार से कोई म्लेच्छ वीर सकुशल न रहा ।१०।
प्रथम अध्याय-२ ] [ ३६५ तेषा स्त्रियो रथारूढा गजारूढा विहङ्गमा । समारूढा हयारूढा खरोष्ट्रवृषवाहना ॥१। योद्धु समाययुस्त्यक्त्वा पत्यापत्यसुखाश्रयान् । रूपवत्योऽतिबलवत्य पतिव्रता ।१२। नानाभरणाभूषाढ्या सन्नधा विशदप्रभा । खड्गशक्तिधनुर्वाणवलयाक्तकराम्बुजा ।१३। स्वैरिण्योऽप्यतिकामिन्यो पुंश्चल्यश्च पतिव्रता । ययुर्योद्धु कल्किसैन्ये पतीना निधनातुरा ।१४। मृद्भस्मकाष्ठचित्राणा प्रभूताम्नायशासनात् । साक्षात्पतीना निधन कि युवत्योऽपि सेहिरे ।१५। उन म्लेच्छो की रूपवती बलवती, पतिव्रता युवती स्त्रियाँ भी सन्तान-सुख की और उनके आश्रय की कामना छोड कर कोई रथ पर चढ कर, कोई हाथो पर चढ कर, कोई विहग पर चढ कर, कोई घोडे, गधे, ऊँट पर, कोई बैल पर चढ कर युद्ध करने के लिए अपने-अपने पति के पास पहुँची ।११-१२। इन्होने अनेक प्रकार के उज्ज्वल आभूषण एव शस्त्रास्त्र धारण कर रखे थे। इनके हाथो मे कडो के साथ ही खड्ग और बाण भी सुशोभित थे ।१३। सुन्दर लावण्यमयी यह स्त्रियाँ कोई स्वैरिणी, कोई वार-विलासिनी अथवा कोई पतिव्रता थी । यह पति- वियोग मे व्याकुल हुई स्त्रियाँ कलिक सेना से युद्ध करने को अग्रसर हुई ।१४। क्योकि मनुष्य मिट्टी, काष्ठ एव राख की वस्तु पर भी प्राण देने मे तत्पर होजाते है, इसी प्रकार अपने प्राण के समान पति का मरण सहन करना युवतियो के लिए भी सम्भव नही होता ।१५। ता स्त्रिय रवपतोन्बाणैर्भिन्नान्व्याकुलेतेन्द्रियान् । कृत्वा पश्चाद्यु युधिरे कल्किसैन्यैधृतायुधा ।१६। ताः स्त्रीरुद्वीक्ष्य ते सर्वे विस्मयस्मितमानसा । कल्किमागत्य ते योधाः कथयामासरादरात् ।१७।
३६६ ] [ कल्कि पुराण स्त्रीणा मेव युयुत्सूना कथा श्रुत्वा महामति । कल्कि समुदित प्रायात्स्वसैन्यै सनुगो रथः ।१८। ता. समालोक्य पद्मेश सर्वशस्त्रास्त्रधारिणी. । नानावाहनसारूढा कृतव्यूहा उवाच सः ।१६। रे स्त्रिय शृणुतास्माक वचन पथ्यमुत्तमम् । स्त्रिया युद्धे न कि पु सा व्यवहारोऽत्र विद्यते ।२०। वे म्लेच्छ स्त्रियाँ अपने पतियो को बाणो मे बिंधे हुए तथा व्या- कुल देख कर उन्हे पीछे हटाती हुई हथियार लेकर कल्कि सेना से युद्ध करने लगी ।१६। उन स्त्रियो को युद्ध मे तत्पर देख कर कल्कि-सेना आश्चर्य में पड़ गई और उसने कल्कि जी के समक्ष जाकर उन्हे सब वृत्तान्त सूचित किया ।१७। युद्ध की इच्छा वाली उन स्त्रियो का युद्ध करना मुन कर प्रसन्न हुए कल्कि जी रथ पर चढ कर सेना और अनुचरो के सहित रणभूमि मे पहुचे ।१८। अनेक शस्त्रास्त्रो से सुसज्जिता, अनेक प्रकार के वाहनो पर चढी हुई, व्यूह रचना करके युद्ध मे तत्पर उन स्त्रियो को देख कर कल्किजी बोले ।१६। कल्किजी ने कहा — हे स्त्रियो ! मैं तुम्हारे हितार्थ श्रेष्ठ वचन कहता हूँ, वह सुनो । स्त्रियो को पुरुषो के साथ युद्ध नही करना चाहिए ।२०। इति कल्केर्वचः श्रुत्वा प्राहस्य प्राहूराहता । अस्माक त्व पतीन् हंसि तेन नष्टा वयं विभो ! । हन्तु गतानामस्त्राणि कराण्येवागतान्युत ।२१। खड्ग-शक्ति धनुर्बाण-शूल तोमर-यष्टय । ताः प्राहुः पुरतो मूर्त्ताः कातंरस्वरविभूषणाः ।२२। यामासाद्य वय नार्यो हिसायामः स्वजेतसा । तमात्मन सर्वमय जानीत कृतनिश्चया ।२३। तमीशमात्मना नार्यः ! चरामो यदनुज्ञया । यत्कृता नामरूपादिभेदेन विदिता वयम् ।२४।
प्रथम अध्याय-३ ] [ ३६७ रूप-गन्ध-रस-स्पर्श-शब्दाद्या भूतपञ्चकाः । चरन्ति यदधिष्ठानात्सोऽद्य कल्कि. परात्मक ।२५। कल्किजी के वचन सुन कर म्लेच्छ-पत्नियां हँस पडी । उन्होने कहा—हे विभो ! जब तुम्हारे द्वारा हमारे पति ही नाश को प्राप्त हो गये, तब हम भी नष्ट हो चुकी । यह कह कर वे नारियाँ कल्किजी की मारने को तत्पर हुई । उन्होने जो अस्त्र छोडने चाहे, वे अस्त्र उनके हाथो मे ही रुके रह गये ।२१। खड्ग, शक्ति, धनुष-बाण, शूल, तोमर, यष्टि आदि शस्त्रास्त्रो के स्वर्ण-सज्जित देवता साक्षात् प्रकट हो कर उन म्लेच्छ-पत्नियो के प्रति बोले ।२२ देव रूपी अस्त्रो ने कहा—हे नारियो । हम जिस तेज के द्वारा जीवो का सहार करते रहते हैं, वह तेज हमे जिनसे प्राप्त हुआ है, वह सर्वमय ईश्वर यही हैं, यह समझ लो ।२३। हे स्त्रियो ! हम इन्ही परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त कर गतिशील होते हैं तथा इनके द्वारा ही हम नाम-रूप को पाकर जाने जाते हैं ।२४। रूप, गन्ध, रस, स्पर्श तथा शब्दादि पचगुण के आश्रय रूप पञ्चभूत जिनके अधिष्ठान से अपने-अपने कार्य मे उद्यत रहते है, यह कल्किजी वही ईश्वर है ।२५। काल स्वभाव-सस्कार-नामाद्या प्रकृति परा । यस्येक्षया सृजत्यण्ड महदहङ्कारकादिकान् ।२६। य-मायया जगद्यात्रा सर्गस्थित्यन्तसञ्जिता । य एवाद्यः स एवान्ते तस्याय सोऽयमीश्वर ।२७। असौ पतिर्मे भार्याहमस्य पुत्राप्तबान्धवाः । स्वप्नोपमास्तु तन्निष्ठा विविधाश्चैन्द्रजालवत् ।२८। स्नेहमोनिबन्धना यातायात्वशा मतम् । न कल्किसेविना रागद्वेषविद्वेषकारिणाम् ।२६। कुतः कालः कुतो मृत्यु क्व यमः क्वास्तिदेवताः स एव कल्किर्भगवान्मायया बहुलीकृत. ।३०।
प्रथम अध्याय-३ ] [ ३६८ इन्ही की आज्ञा से काल, स्वभाव, सस्कार तथा सजा आदि की आश्रयभूता परा प्रकृति, महत्तत्त्व और अहकार आदि को उत्पन्न करने मे समर्थ होती है ।२६। सर्ग, स्थिति और प्रलयात्मक यह सम्पूर्ण विश्व जिनकी माया ही है, यह वही सबके आदि-रूप ईश्वर है । इनके द्वारा ही लोक मे शुभाशुभ का प्रवर्तन होता है ।२७। यह मेरा पति है और मै इसकी भार्या हूँ, यह मेरा पुत्र अथवा बान्धव है । ऐसे स्वप्न अथवा इन्द्रजाल के समान विविध प्रकार के व्यवहार की उत्पत्ति इन्ही के द्वारा होती है ।२८। स्नेह और मोहादि के बन्धन मे पड़े रह कर जो प्राणी इस विश्व के आवागमन मे रहे आते हैं अथवा जो राग, द्वेष एव विद्वे- षादि के आश्रय रहने वाले जीव तथा भगवान कल्कि की सेवा में अनु- राग न रखने वाले हैं, वही इस जगत को सत्य मानते हैं ।२६। काल कहा से आया ? मृत्यु कहाँ से उत्पन्न हुई ? यम तथा देवगण कौन हैं ? यह कल्किजी के अतिरिक्त अन्य कोई नही है, यही अपनी माया के द्वारा बहुरूप हो गए हैं ।३०। न शस्त्राणि वय नार्थः सप्रहार्या न च क्वचित् । शस्त्र प्रहर्तृ भेदोऽयमविवेक परात्मन. ।३१। कल्किदासस्यापि वय हन्तु नार्हा कथोद्भुनम् । हनिष्यामो दैत्यपते प्रह्लादस्य यथा हरिम् ।३२। इत्यस्त्राणा वच. श्रुत्वा स्त्रियो विस्मितमानसा. । स्नेहमोहविनिर्मुक्तास्त कल्कि शरण ययुः ॥३३॥ ताः समालोक्य पद्मेशः प्रणता ज्ञाननिष्ठया । प्रोवाच प्रहसन् भक्ति-योग कल्मषनाशनम् ।३४। हे स्त्रियो ! हम शस्त्र नहीं हैं, हम किसी पर आघात करने मे भी समर्थ नही हैं । यही परमात्मा स्वय शस्त्र हैं और यही आघात करने की शक्ति से सम्पन्न हैं । इनमे जो भेद प्रतीत होता है, वह सब इनकी माया ही है ।३१। दैत्यराज प्रह्ल.द की प्रार्थना पर जब भगवान् विष्णु,
३६६ ] कल्कि पुराण विष्णु नृसिंह रूप हुए थे, उस समय हम जैसे उन पर आघात करने मे समर्थ नही हो सके थे, वैसे ही इन कल्किजी और उनके सेवको पर भी आघात करने मे पूर्णतया असमर्थ हैं।३२। अस्त्रो के यह वचन सुनकर स्त्रिया अत्यन्त विस्मित हुईं और तब वे स्नेह और मोह से युक्त होकर कल्किजी की शरण मे पहुँची । ३३। भगवान कल्कि म्लेच्छ-नारियो को ज्ञाननिष्ठा मे स्थित देखकर उनके प्रति पापो का नाश करने वाला भक्ति- योग हँसते हुए कहने लगे । ३४। कर्मयोगञ्चात्मनिष्ठं ज्ञानयोगं भिदाश्रयम् । नैष्कर्म्यलक्षणं तासा कथयामास माधवः ३५। ताः स्त्रियः कल्कि गदित ज्ञानेन विजितेन्द्रियाः । भक्त्या परमवापुस्तद्योगिना दुर्लभं पदम् । ३६। दत्वा मोक्ष म्लेच्छबौद्धपियारण कृत्वा युद्ध भैरव भीमकर्मा । हत्वा बौद्धान् म्लेच्छ सघाश्च कल्किस्तेषा ज्योति स्थानापूर्ण रेजे । ३७। येशृण्वन्ति वदन्ति बौद्धनिधन म्लेच्छक्षय सादराल्लोकाः शोकहर सदा शुभकर भक्तिप्रदं माधवे । तेषामेव पुनर्न जन्ममरण सर्वार्थसम्पत्कर माया मोहविनाशन प्रतिदिन ससारतापच्छिदम् ।३८। तदनन्तर उन्होने उन नारियो को कर्मयोग, आत्मनिष्ठात्मक ज्ञान- योग, भेदाश्रय, निष्कर्मत्व के लक्षण आदि का प्रसग सुनाया ।३५। इस प्रकार जब वे म्लेच्छ रमणियां कल्कि-प्रदत्त ज्ञानोपदेश से सचेत होकर इन्द्रियो का दमन करके, भक्ति करती हुई, योगियो को भी दुर्लभ मोक्ष पद को प्राप्त हो गई ।३६। इस प्रकार उन भीमकर्मा कल्किजी घोर युद्धमे बौद्ध और म्लेच्छो का सहार कर दिया, और उनकी स्त्रियो को मोक्षपद प्रदान करके मरे हुए म्लेच्छो और बौद्धो को ज्योतिर्मय स्थान में स्थित कर विराजमान हुए । ३७। जो इस बौद्धो के निधन एव म्लेच्छो के क्षीण होने की कथा को सुनेगे, वे सभी शोको से मुक्त होकर कल्याण को प्राप्त होगे । भगवान के प्रति उनके हृदय मे भक्ति का संचार होगा और वे जन्म- मरण के चक्र से छूट जाँयगे । इस कथा के सुनने से सर्व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और माया-मोह का विनाश होता है, तथा संसार के ताप का सदा उच्छेद करने मे समर्थ होता है ।३८। —❀—