भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

४८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

४८४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ३


दिशाओ का ज्ञान रखता हूँ।' [ शाकल्य-] 'यदि तुम देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंको जानते हो [ तो बताओ ] उस पूर्वदिशामे तुम किस देवतासे युक्त हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वहाँ मै आदित्य (सूर्य) देवतावाला हूँ।' [शाकल्य-] 'वह आदित्य किसमे प्रतिष्ठित है?' [याज्ञवल्क्य-] 'नेत्रमे ।' [ शाकल्य-] 'नेत्र किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'रूपोंमे, क्योंकि पुरुष नेत्रसे ही रूपोंको देखता है।' [ शाकल्य-] 'रूप किसमे प्रतिष्ठित है ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमे, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही रूपोको जानता है, अतः हृदयमे ही रूप प्रतिष्ठित है।' [शाकल्य-] 'हे याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ १९-२० ॥

'इस दक्षिण दिशामे तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'यमदेवतावाला हूँ।' [शाकल्य-] 'वह यमदेवता किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'यज्ञमें।' [ शाकल्य-] 'यज्ञ किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'दक्षिणामे ।' [ शाकल्य-] 'दक्षिणा किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'श्रद्धामे, क्योंकि जब पुरुष श्रद्धा करता है, तभी दक्षिणा देता है, अतः श्रद्धामे ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य-] 'श्रद्धा किसमें प्रतिष्ठित है ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमे, क्योकि हृदयमे ही पुरुष श्रद्धाको जानता है, अत हृदयमे ही श्रद्धा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य-] 'याज्ञवल्क्य । यह बात ऐसी ही है' ॥ २१ ॥

'इस पश्चिम दिशामे तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वरुणदेवतावाला हूँ।' [ शाकल्य-] 'वह वरुण किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जलमें ।' [ शाकल्य-] 'जल किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वीर्यमे । [ शाकल्य-] 'वीर्य किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'हृदयमे, इसीसे पिताके अनुरूप उत्पन्न हुए पुत्रको लोग कहते है कि यह मानो पिताके हृदयसे ही निकला है, मानो पिताके हृदयसे ही बना हे, क्योकि हृदयमें ही वीर्य स्थित रहता है।' [ शाकल्य-] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २२ ॥

'उस उत्तर दिशामे तुम किस देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'सोमदेवतावाला हूँ ।' [ शाकल्य-] 'वह सोम किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'दीक्षा मे ।' [ शाकल्य-] 'दीक्षा किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'सत्यमे, क्योकिदीक्षित पुरुषमे कहते हैं कि सत्य बोलो, क्योंकि सत्यमें ही दीक्षा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य-] 'सत्य किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'हृदयमे ।' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। 'क्योंकि पुरुष हृदयसे ही सत्यको जानता है, अतः हृदयमें ही सत्य प्रतिष्ठित है।' [शाकल्य-] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २३ ॥

'इस ध्रुवा दिशामे तुम कौन देवतावाले हो ?' [याज्ञवल्क्य-] 'अग्निदेवतावाला हूँ ।' [ शाकल्य-] 'वह अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'वाकमें ।' [ शाकल्य-] 'वाक् किसमे प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'हृदयमें ।' [ शाकल्य-] 'हृदय किसमें प्रतिष्ठित है ?' ॥ २४ ॥

याज्ञवल्क्यने 'अहल्लिक ! (प्रेत !) ऐसा सम्बोधन करके कहा-'जिस समय तुम इसे हमसे अलग मानते हो, उस समय यदि यह (हृदय-आत्मा) हमसे अलग हो जाय तो इस शरीरको कुत्ते खा जायँ अथवा इसे पक्षी चोंच मारकर मथ डालें' ॥ २५ ॥

'तुम (शरीर) और आत्मा (हृदय) किसमें प्रतिष्ठित हो ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'प्राणमे ।' [ शाकल्य-] 'प्राण किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'अपानमें ।' 'अपान किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'व्यानमें ।' 'व्यान किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'उदानमें ।' 'उदान किसमे प्रतिष्ठित है ?' 'समानमें।' 'जिसका [मधुकाण्डमें] 'नेति-नेति' ऐसा कहकर निरूपण किया गया है, वह आत्मा अगृह्य है-वह ग्रहण नहीं किया जा सकता, अशीर्य है-वह शीर्ण (नष्ट) नहीं होता, असङ्ग है-वह सक्त नहीं होता, असित है-वह व्यथित और हिंसित नहीं होता। ये आठ (पृथिवी आदि) आयतन हैं, आठ (अग्नि आदि) लोक हैं, आठ (अमृतादि) देव हैं और आठ (शारीरादि) पुरुष हैं। वह जो उन पुरुषोंको निश्चयपूर्वक जानकर उनका अपने हृदयमे उपसहार करके औपाधिक धर्मोका अतिक्रमण किये हुए है, उस औपनिषद पुरुषको मै पूछता हूँ, यदि तुम मुझे उसे स्पष्टतया न बतला सकोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' याज्ञवल्क्यने यो कहा, किंतु शाकल्य उसे नहीं जानता था, इसलिये बता नहीं सका एव उसका मस्तक गिर गया। यही नहीं, अपितु चोरलोग उसकी हड्डियोंको कुछ और समझकर चुरा ले गये ॥ २६ ॥

फिर याज्ञवल्क्यने कहा, 'पूजनीय ब्राह्मणगण ! आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, वह मुझसे प्रश्न करे। अथवा आप सभी मुझसे प्रश्न करें। इसी प्रकार आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, उससे मैं प्रश्न करता हूँ या आप सभीसे मै प्रश्न करता हूँ।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ ॥ २७ ॥

' ब्राह्मण ९] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४८५

' ब्राह्मण ९] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४८५

याज्ञवल्क्यने उनसे इन श्लोकोंद्वारा प्रश्न किया—वनस्पति (विशालता आदि गुणोंसे युक्त) वृक्ष जैसा (जिन धर्मोंसे युक्त) होता है, पुरुष (जीवका शरीर) भी वैसा ही (उन्हीं धर्मोंसे सम्पन्न) होता है—यह बिल्कुल सत्य है। वृक्षके पत्ते होते हैं और पुरुषके शरीरमें पत्तोंकी जगह रोम होते हैं; पुरुषके शरीरमे जो त्वचा (चाम) है, उसकी समतामें इस वृक्षके बाहरी भागमे छाल होती है। पुरुषकी त्वचासे ही रक्त निकलता है और वृक्षकी भी त्वचा (छाल) से ही गोंद निकलता है। वृक्ष और पुरुषकी इस समानताके कारण ही जिस प्रकार आघात लगनेपर वृक्षमे रस निकलता है, उसी प्रकार चोट खाये हुए पुरुष शरीरसे रक्त प्रवाहित होता है। पुरुषके शरीरमे मास होते हैं और वनस्पतिके शकर (छालका भीतरी अग), पुरुषके स्नायु (शिरा) होते हैं और वृक्षमें किनाट (शकरके भी भीतरका अगविशेष)। वह किनाट स्नायुकी ही भाँति स्थिर होता है। पुरुषके स्नायु जालके भीतर जैसे हड्डियाँ होती हैं, वैसे ही वृक्षमें किनाटके भीतर काष्ठ है तथा मज्जा तो दोनोंमें मज्जाके ही समान निश्चित की गयी है। किंतु यदि वृक्षको काट दिया जाता है तो वह अपने मूलसे पुन. और भी नवीन होकर अङ्कुरित हो आता है, इसी प्रकार यदि मनुष्यको मृत्यु काट डाले तो वह (वृक्षकी भाँति) किस मूलसे उत्पन्न होगा ?। वह वीर्यसे उत्पन्न होता है—ऐसा तो मत कहो, क्योंकि वीर्य तो जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है [मृत पुरुषसे नहीं]। वृक्ष भी [केवल तनेसे ही नहीं उत्पन्न होता, ] बीजसे भी उत्पन्न होता है; किंतु बीजसे उत्पन्न होनेवाला वृक्ष भी कट जानेके पश्चात् पुन: अङ्कुरित होकर उत्पन्न होता है, यह प्रत्यक्ष देखा गया है। पर यदि वृक्षको जड़सहित उखाड़ दिया जाय तो वह फिर उत्पन्न नहीं होगा, इसी प्रकार यदि मनुष्यका मृत्यु छेदन कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है ?। [यदि ऐसा माना जाय कि ] पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, अतः फिर उत्पन्न नहीं होता [तो यह ठीक नहीं, क्योकि वह मरकर पुन. उत्पन्न होता ही है ] ऐसी दशामें मृत्युके पश्चात् इसे पुन. कोन उत्पन्न करेगा ? [यह प्रश्न है, ब्राह्मणोंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिये श्रुति स्वय ही उसका निर्देश करती है—] विज्ञान आनन्द ब्रह्म है, वह धनदाता (कर्म करनेवाले यजमान) की परम गति है और ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताका भी परम आश्रय है॥ १-७ ॥॥ २८ ॥

॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥

चतुर्थ अध्याय

यहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक लिप्यंतरण (Transcription) नीचे प्रस्तुत है:

चतुर्थ अध्याय प्रथम ब्राह्मण जनक-याज्ञवल्क्य संवाद


[बायाँ स्तम्भ]

विदेह जनक आसनपर स्थित था। तभी उसके पास याज्ञवल्क्यजी आये। उनसे [जनकने] कहा, 'याज्ञवल्क्यजी ! कैसे पधारे ? पशुओंकी इच्छासे, अथवा सूक्ष्मान्त [प्रश्न श्रवण करने] के लिये ?' 'राजन् ! मैं दोनोंके लिये आया हूँ' ऐसा [ याज्ञवल्क्यने ] कहा ॥ १ ॥

[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो कहा है, वह हम सुनें।' [जनक-] 'मुझसे शिलिनके पुत्र जित्वाने कहा है कि वाक् ही ब्रह्म है।' [याज्ञवल्क्य-] "जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शिलिनके पुत्रने 'वाक् ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न बोलनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?" [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह मुझे आप बतलाइये।' [याज्ञवल्क्य-] "वाक् ही उसका आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है; उसकी 'प्रज्ञा' इस प्रकार उपासना करे।" [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रज्ञता क्या है ?' 'राजन् ! वाक् ही प्रज्ञता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे सम्राट् ! वाक्‌से ही बन्धुका ज्ञान होता है और राजन् ! ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, अनुव्याख्यान, व्याख्यान, इष्ट, हुत, आशित (भूखेको अन्न खिलानेसे होनेवाले धर्म), पायित (प्यासेको पानी पिलानेसे होनेवाले धर्म), यह लोक, परलोक और समस्त भूत वाक्‌से ही जाने जाते हैं। हे सम्राट् ! वाक् ही परब्रह्म है। इस प्रकार उपासना करनेवालेको वाक् नहीं त्यागती, सम्पूर्ण भूत उसको उपहार देते हैं। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' विदेहराज जनकने कहा—'मैं आपको—जिनसे हाथीके समान बैल उत्पन्न हों ऐसी—सहस्र गौएं देता हूँ।' उस याज्ञवल्क्यने कहा—'मेरे पिताजीका सिद्धान्त था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ २ ॥

[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी [आचार्य] ने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [जनक-] "मुझसे शुल्वके पुत्र उदङ्कने


[दायाँ स्तम्भ]

'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है।" [याज्ञवल्क्य-] "जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस शुल्वके पुत्रने 'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि प्राणक्रिया न करनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किन्तु क्या उसने उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?" [जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'राजन् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] "प्राण ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, उसकी 'प्रिय' इस रूपसे उपासना करे ।" [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! प्रियता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! प्राण ही प्रियता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! प्राणके लिये ही लोग अयाज्यसे यजन कराते हैं, प्रतिग्रह न लेनेयोग्यसे प्रतिग्रह लेते हैं तथा जिस दिशामें जाते हैं, उसमें ही वधकी आशङ्का करते हैं। हे सम्राट् ! यह सब प्राणके लिये ही होता है। हे राजन् ! प्राण ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे प्राण नहीं त्यागता, उसको सब भूत उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ३ ॥

[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [जनक-] "मुझसे वृष्णके पुत्र बर्बुने कहा है कि 'चक्षु ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] "जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस वार्ष्णेने 'चक्षु ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न देखनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?" [जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्यजी ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] "चक्षु ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी 'सत्य' इस रूपसे उपासना करे।" [जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! सत्यता क्या है?' 'हे राजन् ! चक्षु ही सत्यता

ब्राह्मण १ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४५७

है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। “हे सम्राट् ! चक्षुसे देखनेवालेसे ही 'क्या तूने देखा' ऐसा जब कहा जाता है और वह कहता है कि 'मैने देखा' तो वह सत्य होता है। राजन् ! चक्षु ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका चक्षु त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते है और वह देव होकर देवोको प्राप्त होता है। 'मै आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नही ले जाना चाहिये' ॥ ४ ॥ [ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] “मुझसे भारद्वाज-गोत्रोत्पन्न गर्दभीविपीतने कहा है कि 'श्रोत्र ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] “जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि न सुनने- वालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?” [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] “श्रोत्र ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, तथा इसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करे।” [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! अनन्तता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! दिशाएँ ही अनन्तता हैं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इसीसे हे सम्राट् ! कोई भी जिस किसी दिशाको जाता है, वह उसका अन्त नहीं पाता; क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं और हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं। श्रोत्र ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, श्रोत्र उसका त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मै आपको हाथीके समान हृष्ट- पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ५ ॥ [ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] “मुझसे जबालाके पुत्र सत्यकामने कहा है कि 'मन ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] “जैसे मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस जबालके पुत्रने 'मन ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि मनोहीनको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा बतलाये हैं।” [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] “मन ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी 'आनन्द' इस रूपसे उपासना करे।” [ जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! आनन्दता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! मन ही आनन्दता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे राजन् ! मनसे ही स्त्रीकी इच्छा करता है; उसमें अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है, वह आनन्द है। हे सम्राट् ! मन ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसे मन नहीं त्यागता, सब भूत उसका उपकार करते हैं तथा वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मै आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा । याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ६ ॥ [ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है वह हम सुनें।' [ जनक-] “मुझसे विदग्ध शाकल्यने कहा है कि 'हृदय ही ब्रह्म है'।" [ याज्ञवल्क्य-] “जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् पुरुष उपदेश करे, उसी प्रकार उस शाकल्यने 'हृदय ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है, क्योंकि हृदयहीनको क्या मिल सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?” [ जनक-] 'मुझे नहीं बतलाये ।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक पादवाला ही ब्रह्म है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! वह मुझे आप बतलाइये।' [ याज्ञवल्क्य-] “हृदय ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'स्थिति' इस रूपसे उपासना करे।” [जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! स्थितता क्या है?' 'हे सम्राट् ! हृदय ही स्थितता है' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'राजन् ! हृदय ही समस्त भूतोंका आयतन है, हृदय ही सब भूतोंकी प्रतिष्ठा है और हृदयमें ही समस्त भूत प्रतिष्ठित होते हैं। हे सम्राट् ! हृदय ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका हृदय त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार समर्पण करते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' वैदेह जनकने कहा, 'मैं आपको हाथीके समान

द्वितीय ब्राह्मण

४८८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४


हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक सहस्र गौएँ देता हूँ।' उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ७ ॥ याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको


द्वितीय ब्राह्मण

याज्ञवल्क्यका जनकको उपदेश

विदेहराज जनकने कूर्च [ नामक एक विशेष प्रकारके आसन ] से उठकर [ याज्ञवल्क्यके ] समीप जाकर कहा, 'याज्ञवल्क्यजी! आपको नमस्कार है, मुझे उपदेश कीजिये।' उस ( याज्ञवल्क्य ) ने कहा, 'राजन् ! जिस प्रकार लंबे मार्गको जानेवाला पुरुष सम्यक् प्रकारसे रथ या नौकाका आश्रय ले, उसी प्रकार तुम इन उपनिषदों ( उपासनाओं ) से युक्त प्राणादि ब्रह्मोंकी उपासना कर समाहितचित्त हो गये हो। इस प्रकार तुम पूज्य, श्रीमान्, अधीतवेद और उक्तोपनिषदक (जिसे आचार्यने उपनिषद्‌का उपदेश कर दिया है-ऐसे ) हो गये हो। इतना होनेपर भी बताओ तुम इस शरीरसे छूटकर कहाँ जाओगे ?' [ जनक-] 'भगवन् ! मैं कहाँ जाऊँगा, सो मुझे मालूम नहीं है।' [याज्ञवल्क्य-] 'अब मैं तुम्हें वही बतलाऊँगा जहाँ तुम जाओगे।' [ जनक-] 'भगवान् मुझे बतलावें' ॥ १ ॥

'यह जो दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, इन्ध नामवाला है, उसी इस पुरुषको इन्ध होते हुए भी परोक्षरूपसे इन्द्र कहते हैं, क्योंकि देवगण मानो परोक्षप्रिय हैं, प्रत्यक्षसे द्वेष करनेवाले हैं। और यह जो बायें नेत्रमें पुरुषरूप है, वह इस (इन्द्र) की पत्नी विराट् (अन्न) है, उन दोनोंका यह सस्ताव (मिलनका स्थान) है जो कि यह हृदयान्तर्गत आकाश है। उन दोनोंका यह अन्न है जो कि यह हृदयान्तर्गत लाल पिण्ड है। उन दोनोंका यह प्रावरण है जो कि यह हृदयान्तर्गत जाल सा है। उन दोनोंका यह मार्ग—सञ्चार करनेका द्वार है जो कि यह हृदयसे ऊपरकी ओर नाड़ी जाती है। जिस प्रकार सहस्र भागोंमें विभक्त हुआ केश होता है, वैसी ही ये हिता नामकी नाड़ियां हृदयके भीतर स्थित हैं। इन्हींके द्वारा जाता हुआ यह अन्न [ शरीर ] में जाता है; इसीसे इस (स्थूल-शरीराभिमानी वैश्वानर ) से यह (सूक्ष्मदेहाभिमानी तैजस ) सूक्ष्मतर आहार ग्रहण करनेवाला ही होता है ॥ २-३ ॥

उस विद्वान्‌के पूर्वदिशा पूर्व प्राण है, दक्षिणदिशा दक्षिण प्राण है, पश्चिमदिशा पश्चिम प्राण है, उत्तरदिशा उत्तर प्राण है, ऊपरकी दिशा ऊपरके प्राण है, नीचेकी दिशा नीचेके प्राण हैं और सम्पूर्ण दिशाएँ सम्पूर्ण प्राण हैं। वह यह 'नेति नेति' रूपसे वर्णन किया हुआ आत्मा अग्राह्य है—वह ग्रहण नहीं किया जाता, वह अशीर्य है—जीर्ण ( नष्ट ) नहीं होता, असङ्ग है—उसका सङ्ग नहीं होता, वह अबद्ध है—व्यथित नहीं होता और क्षीण नहीं होता। हे जनक ! तू निश्चय अभयको प्राप्त हो गया है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। उस विदेहराज जनकने कहा, 'भगवन् याज्ञवल्क्य! जिन आपने मुझे अभय ब्रह्मका ज्ञान कराया है, उन आपको अभय प्राप्त हो, आपको नमस्कार है, ये विदेह देश और यह मैं आपके अधीन हैं' ॥ ४ ॥


तृतीय ब्राह्मण

याज्ञवल्क्यके द्वारा आत्माके स्वरूपका कथन

विदेहराज जनकके पास याज्ञवल्क्य गये। उनका विचार था मैं कुछ उपदेश नहीं करूँगा। किंतु पहले कभी विदेहराज जनक और याज्ञवल्क्यने अग्निहोत्रके विषयमें परस्पर सवाद किया था, उस समय याज्ञवल्क्यने उसे वर दिया था और उसने इच्छानुसार प्रश्न करना ही माँगा था। यह वर याज्ञवल्क्यने उसे दे दिया था, अतः उनसे पहले राजाने ही प्रश्न किया—॥ १ ॥

'याज्ञवल्क्यजी ! यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ?' 'हे सम्राट् ! यह आदित्यरूप ज्योतिवाला है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'यह आदित्यरूप ज्योतिसे ही बैठता, सब ओर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है'। [ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! आदित्यके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'उस समय चन्द्रमा ही इसकी ज्योति होता है; चन्द्रमारूप ज्योतिके द्वारा ही यह बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।' [ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है। याज्ञवल्क्यजी ! आदित्यके अस्त हो जानेपर तथा चन्द्रमाके अस्त हो जानेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'अग्नि ही इसकी ज्योति होता है। यह अग्निरूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है।'

कल्याण -याज्ञवल्क्य

प्रस्तुत चित्र पूर्णतः रिक्त (खाली/सफेद) है और इसमें कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है। कृपया सही अथवा पाठ्य सामग्री युक्त पृष्ठ की छवि प्रदान करें।

ब्राह्मण ३ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४८९

ब्राह्मण ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४८९ 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है । याज्ञवल्क्यजी ! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर और अग्निके शान्त होने- पर यह पुरुष किस ज्योतिवाला होता है ?' 'वाक् ही इसकी ज्योति होती है । यह वाक्रूप ज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर- उधर जाता, कर्म करता और लौट आता है । इसीसे हे सम्राट् ! जहाँ अपना हाथ भी नहीं जाना जाता, वहाँ ज्यों ही वाणीका उच्चारण किया जाता है कि पास चला जाता है ।' 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है । याज्ञवल्क्यजी ! आदित्यके अस्त होनेपर, चन्द्रमाके अस्त होनेपर, अग्निके शान्त होनेपर और वाक्के भी शान्त होनेपर यह पुरुष किस ज्योतिवाला रहता है ?' 'आत्मा ही इसकी ज्योति होता है । यह आत्मज्योतिके द्वारा ही बैठता, इधर-उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है' ॥ २-६॥ [जनक—] 'आत्मा कौन है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'यह जो प्राणोंमें बुद्धिवृत्तियोंके भीतर रहनेवाला विज्ञानमय ज्योति.- स्वरूप पुरुष है, वह समान (बुद्धिवृत्तियोंके सदृश) हुआ इस लोक और परलोक दोनोंमें सञ्चार करता है। वह [बुद्धिवृत्तिके अनुसार] मानो चिन्तन करता है और [प्राणवृत्तिके अनुरूप होकर] मानो चेष्टा करता है। वही स्वप्न होकर इस लोक (देहेन्द्रिय-सङ्घात) का अतिक्रमण करता है और [शरीर तथा इन्द्रियरूप] मृत्युके रूपोंका भी अतिक्रमण करता है। वह यह पुरुष जन्म लेते समय शरीरको आत्मभावसे प्राप्त होता हुआ पापोंसे (देह और इन्द्रियोंसे) संश्लिष्ट हो जाता है तथा मरते समय—उत्क्रमण करते समय पापोंको त्याग देता है ॥ ७-८ ॥ उस इस पुरुषके दो ही स्थान हैं—यह लोक, परलोक- सम्बन्धी स्थान और तीसरा स्वप्नस्थान सन्ध्यस्थान है। उस सन्ध्यस्थानमें स्थित रहकर यह इस लोकरूप स्थान और परलोकस्थान—इन दोनोंको देखता है। यह पुरुष परलोकस्थानके लिये जैसे साधनसे सम्पन्न होता है, उस साधनका आश्रय लेकर यह पाप (पापका फलरूप दुःख) और आनन्द दोनोंको ही देखता है। जिस समय यह सोता है, उस समय इस सर्ववान् लोककी मात्रा (एकदेश) को लेकर, स्वयं इस स्थूलशरीरको अचेत करके तथा स्वय ही अपने वासनामय देहको रचकर, अपने प्रकाशसे अर्थात् अपने ज्योतिःस्वरूपसे शयन करता है, इस स्वप्न-अवस्थामें यह पुरुष स्वयं ज्योतिःस्वरूप होता है ॥ ९ ॥ उस अवस्थामें न रथ हैं, न रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] हैं और न मार्ग ही हैं। परंतु यह रथ, रथमें जोते जानेवाले [अश्वादि] और रथके मार्गोंकी रचना कर लेता है । उस अवस्थामें आनन्द, मोद और प्रमोद भी नहीं हैं, किंतु यह आनन्द, मोद और प्रमोदकी रचना कर लेता है। वहाँ छोटे-छोटे कुण्ड, सरोवर और नदियाँ नहीं हैं; यह कुण्ड, सरोवर और नदियोंकी रचना कर लेता है—वही उनका कर्ता है ॥ १० ॥ इस विषयमें ये श्लोक हैं—आत्मा स्वप्नके द्वारा शरीरको निश्चेष्ट करके स्वय न सोता हुआ सोये हुए समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करता है। वह शुद्ध—इन्द्रियमात्रारूपको लेकर पुनः जागरित-स्थानमे आता है। हिरण्मय (ज्योतिःस्वरूप) पुरुष अकेला ही [दोनों स्थानोंमें] जानेवाला है। इस निकृष्ट शरीरकी प्राणसे रक्षा करता हुआ वह अमृतधर्मा शरीरसे बाहर विचरता है। वह अकेला विचरनेवाला हिरण्मय अमृत पुरुष, जहाँ वासना होती है, वहीं चला जाता है। वह देव स्वप्ना- वस्थामें ऊँच-नीच भावोंको प्राप्त होता हुआ बहुत से रूप बना लेता है। इसी प्रकार वह स्त्रियोंके साथ आनन्द मानता हुआ, [मित्रोंके साथ] हँसता हुआ तथा [व्याघ्रादि] भय देखता हुआ-सा रहता है। सब लोग उसके आराम (क्रीडाकी सामग्री) को ही देखते हैं, उसे कोई नहीं देखता। उस सोये हुए आत्माको सहसा न जगावे—ऐसा [वैद्यलोग] कहते हैं। जिस इन्द्रिय-प्रदेशमें यह सोया होता है, उसमें प्राप्त न होनेसे इसका शरीर दुश्चिकित्स्य हो जाता है। इसीसे अवश्य ही कोई-कोई ऐसा कहते हैं कि यह (स्वप्नस्थान) इसका जागरित देश ही है; क्योंकि जिन पदार्थोंको यह जागनेपर देखता है, उन्हींको सोया हुआ भी देखता है [किंतु यह ठीक नहीं है], क्योंकि इस अवस्थामें यह पुरुष स्वयंज्योति होता है।' [जनक—] 'वह मैं जनक श्रीमान्‌को सहस्र मुद्रा देता हूँ, अब आगे मुझे मोक्षके लिये उपदेश कीजिये' ॥ ११—१४ ॥ [ याज्ञवल्क्य—] 'वह यह आत्मा इस सुषुप्तिमें रमण और विहार करके पुण्य और पापको केवल देखकर, जैसे आया था और जहाँसे आया था, पुनः स्वप्नस्थानको ही लौट आता है। वहाँ वह जो कुछ देखता है, उससे असम्बद्ध रहता है; क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है।' [जनक—] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है, मैं श्रीमान्‌को सहस्र मुद्रा देता हूँ; इससे आगे भी मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये' ॥ १५ ॥ [ याज्ञवल्क्य—] 'वह यह आत्मा इस स्वप्नावस्थामें रमण और विहार करके तथा पुण्य और पापको देखकर ही फिर जिस प्रकार आया था और जहाँसे आया था, उस जागरित- उ० सं० ६२—

४९० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

४९० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४

स्थानको ही लौट जाता है। वह वहाँ जो कुछ देखता है, उससे असश्लिष्ट रहता है, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है।' [ जनक-] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है। मैं श्रीमान्- को सहस्र मुद्रा भेंट करता हूँ; इससे आगे आप मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'वह यह पुरुष इस जागरित-अवस्थामें रमण और विहार करके तथा पुण्य और पापको देखकर फिर जिस प्रकार आया था, उसी मार्गसे यथास्थान स्वप्नस्थानको ही लौट जाता है' ॥ १६-१७ ॥

जिस प्रकार कोई बड़ा भारी मत्स्य नदीके पूर्व और अपर दोनों तीरोंपर क्रमशः विचरण करता है, उसी प्रकार यह पुरुष स्वप्नस्थान और जागरितस्थान इन दोनों ही स्थानोंमे क्रमशः विचरण करता है। जिस प्रकार इस आकाशमे श्येन (बाज ) अथवा सुपर्ण (तेज उड़नेवाला बाज) सब ओर उड़कर थक जानेपर परोंको फैलाकर घोंसलेकी ओर ही उड़ता है, उसी प्रकार यह पुरुष इस स्थानकी ओर दौड़ता है, जहाँ सोनेपर यह किसी भोगकी इच्छा नहीं करता और न कोई स्वप्न ही देखता है ॥ १८-१९ ॥

उसकी ये वे हिता नामकी नाड़ियाँ, जो सहस्र भागोंमें विभक्त केशके सदृश सूक्ष्मतासे रहती हैं, शुक्ल, नील, पीत, हरित और लाल रंगके रससे पूर्ण हैं। सो जहाँ इस पुरुषको मानो [शत्रु] मारते, मानो अपने वशमे करते और जहाँ मानो इसे हाथी खदेड़ता है अथवा जहाँ यह मानो गड्ढेमें गिरता है, इस प्रकार जो कुछ भी जाग्रदवस्थाके भय देखता है, उसीको इस स्वप्नावस्थामें अविद्यासे मानता-जानता है। और जहाँ यह देवताके समान, राजाके समान अथवा मैं ही यह सब हूँ—ऐसा मानता है, वह इसका परम धाम है ॥ २० ॥

वह इसका कामरहित, पापरहित और अभय रूप है। व्यवहारम जिस प्रकार अपनी प्रिया भार्याको आलिङ्गन करने- वाले पुरुषको न कुछ बाहरका ज्ञान रहता है और न भीतरका, इसी प्रकार यह पुरुष प्राज्ञात्मासे आलिङ्गित होनेपर न कुछ बाहरका विषय जानता है और न भीतरका; यह इस- का आप्तकाम, आत्मकाम, अकाम और शोकशून्य रूप है। इस सुषुप्तावस्थामे पिता अपिता हो जाता है, माता अमाता हो जाती है, लोक अलोक हो जाते हैं, देव अदेव हो जाते हैं और वेद अवेद हो जाते हैं। यहाँ चोर अचोर हो जाता है, भ्रूणहत्या करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है तथा चाण्डाल अचाण्डाल, पौल्कस अपौल्कस, श्रमण अश्रमण और तापस अतापस हो जाते हैं। उस समय यह पुरुष पुण्यसे असम्बद्ध तथा पापसे भी असम्बद्ध होता है और हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार कर जाता है ॥ २१-२२ ॥

वह जो नहीं देखता सो देखता हुआ ही नहीं देखता। द्रष्टाकी दृष्टिका कभी लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस समय उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे देखे। वह जो नहीं सूँघता सो सूँघता हुआ ही नहीं सूँघता; सूँघनेवालेकी गन्धग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसे वह सूँघे। वह जो रसास्वाद नहीं करता, सो रसास्वाद करता हुआ ही नहीं करता। रसास्वाद करने- वालेकी रसग्रहणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामे उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसका रस ग्रहण करे। वह जो नहीं बोलता सो बोलता हुआ ही नहीं बोलता। वक्ताकी वचन- शक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न दूसरा कुछ है ही नहीं, जिसके विषय- में वह बोले। वह जो नहीं सुनता सो सुनता हुआ ही नहीं सुनता। श्रोताकी श्रवणशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामे उससे भिन्न दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमें वह सुने। वह जो मनन नहीं करता सो मनन करता हुआ ही मनन नहीं करता। मनन करनेवालेकी मननशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं, जिसके विषयमे वह मनन करे। वह जो स्पर्श नहीं करता सो स्पर्श करता हुआ ही स्पर्श नहीं करता। स्पर्श करनेवालेभी स्पर्शशक्तिका सर्वथा लोप नहीं होता; क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ है ही नहीं, जिसे वह स्पर्श करे। वह जो नहीं जानता सो नहीं जानता हुआ ही नहीं जानता। विज्ञाताकी विज्ञाति (विज्ञानशक्ति) का सर्वथा लोप नहीं होता, क्योंकि वह अविनाशी है। उस अवस्थामें उससे भिन्न कोई दूसरा पदार्थ ही नहीं होता, जिसे वह विशेषरूपसे जाने ॥ २३-३० ॥

जहाँ (जागरित या स्वप्नावस्थामें) आत्मासे भिन्न अन्य- सा होता है, वहाँ अन्य अन्यको देख सकता है, अन्य अन्यको सूँघ सकता है, अन्य अन्यको चख सकता है, अन्य अन्यको बोल सकता है, अन्य अन्यको सुन सकता है, अन्य अन्यका मनन कर सकता है, अन्य अन्यका

ब्राह्मण ४] \

ब्राह्मण ४]
* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
४२१


[बायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का ऊपरी भाग]

स्पर्श कर सकता है, अन्य अन्यको जान सकता है । परंतु जैसे जलमें वैसे ही सुषुप्तिमें एक अद्वैत द्रष्टा है । हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने जनकको उपदेश दिया । 'यह इस ( पुरुष ) की परमगति है, यह इसकी परम सम्पत्ति है, यह इसका परमलोक है, यह इसका परमानन्द है । इस आनन्दकी मात्राके आश्रित ही अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं ॥ ३१-३२ ॥

वह जो मनुष्योंमें सब अङ्गोंसे पूर्ण समृद्ध, दूसरोंका अधिपति और मनुष्यसम्बन्धी सम्पूर्ण भोगसामग्रियोंद्वारा सबसे अधिक सम्पन्न होता है, वह मनुष्योंका परम आनन्द है। अब जो मनुष्योंके सौ आनन्द हैं, वह पितृलोकको जीतनेवाले पितृगणका एक आनन्द है। और जो पितृलोकको जीतनेवाले पितरोंके सौ आनन्द हैं, वह गन्धर्वलोकका एक आनन्द है । तथा जो गन्धर्वलोकके सौ आनन्द हैं, वह कर्मदेवोंका, जो कि कर्मके द्वारा देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है। जो कर्मदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह आजान ( जन्मसिद्ध ) देवोंका एक आनन्द है, और जो निष्पाप, निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ]। जो आजानदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह प्रजापति-लोकका एक आनन्द है; और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ]। जो प्रजापतिलोकके सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्मलोकका एक आनन्द है, और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ] तथा यही परम आनन्द है । हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । [ जनक बोले-] 'मैं श्रीमान्को सहस्र [ गौएँ ] देता हूँ, अब आगे भी आप मोक्षके लिये ही उपदेश करें।' यह सुनकर याज्ञवल्क्यजी डर गये कि इस बुद्धिमान् राजाने तो


[दायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का ऊपरी भाग]

मुझे सम्पूर्ण प्रश्नोंके निर्णयपर्यन्त [ उत्तर देनेको ] बाँध लिया ॥३३॥

वह यह पुरुष इस स्वप्नान्तमें रमण और विहार करके तथा पुण्य और पापको देखकर ही पुनः गये हुए मार्गसे ही यथास्थान जागरित-अवस्थाको ही लौट आता है ॥ ३४ ॥

लोकमे जिस प्रकार बहुत अधिक बोझ लदा हुआ छकड़ा शब्द करता हुआ चलता है, उसी प्रकार यह देही आत्मा प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित [हो मरण कालमे] शब्द करता हुआ जाता है, जब कि यह ऊपरके श्वास छोड़नेवाला हो जाता है । वह यह देह जिस समय कृशताको प्राप्त होता है, वृद्धावस्था अथवा ज्वरादि रोगके कारण कृश हो जाता है, उस समय जैसे आम, गूलर अथवा पिप्पल फल बन्धन (डंठल) से छूट जाता है, वैसे ही यह पुरुष इन अङ्गोंसे छूटकर, फिर जिस मार्गसे आया था, उसीसे प्रत्येक योनिमें प्राणकी विशेष अभिव्यक्तिके लिये ही चला जाता है ॥ ३५-३६ ॥

अतः जिस प्रकार आते हुए राजाकी उग्रकर्मा एव पापकर्म-में नियुक्त सूत और गाँवके नेतालोग अन्न, पान और निवासस्थान तैयार रखकर 'ये आये, ये आये' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार इस कर्मफलवेत्ताकी सम्पूर्ण भूत 'यह ब्रह्म आता है, यह आता है' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं ॥ ३७ ॥

जिस प्रकार जानेके लिये तैयार हुए राजाके अभिमुख होकर उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेतालोग जाते हैं, उसी प्रकार जब यह ऊपरके श्वास लेने लगता है तो अन्तकालमें सारे प्राण इस आत्माके अभिमुख होकर इसके साथ जाते हैं ॥ ३८ ॥


चतुर्थ ब्राह्मण कामना-नाशसे ब्रह्म-प्राप्ति


[बायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का निचला भाग]

वह यह आत्मा जिस समय दुर्बलताको प्राप्त हो मानो सम्मोहित हो जाता है, तब ये वागादि प्राण इसके प्रति अभिमुखतासे आते हैं। वह इन [ प्राणोंकी ] तेजोमात्राको सम्यक् प्रकारसे ग्रहण करके हृदयमें ही अनुक्रान्त (अभिव्यक्त ज्ञानवान् ) होता है। जिस समय यह चाक्षुष पुरुष सब ओरसे व्यावृत्त होता है, उस समय मुमूर्षु रूपज्ञानहीन हो जाता है ॥ १ ॥

[ चक्षु-इन्द्रिय लिङ्गात्मासे ] एकरूप हो जाती है तो लोग 'नहीं देखता' ऐसा कहते हैं; [ घ्राणेन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं सूँघता' ऐसा कहते हैं, [ रसनेन्द्रिय ] एक-


[दायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का निचला भाग]

रूप हो जाती है तो 'नहीं चखता' ऐसा कहते हैं, [ वागिन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं बोलता' ऐसा कहते हैं, [ श्रोत्रेन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं सुनता' ऐसा कहते हैं, [ मन ] एकरूप हो जाता है तो 'मनन नहीं करता' ऐसा कहते हैं, [ त्वगिन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'स्पर्श नहीं करता' ऐसा कहते हैं, और यदि [ बुद्धि लिङ्गात्मासे ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं जानता' ऐसा कहते हैं । उस इस हृदयका अग्र ( बाहर जानेका मार्ग ) अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य

४९२ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ४ भागसे बाहर निकलता है। उसके उत्क्रमण करनेपर उसके साथ ही प्राण उत्क्रमण करता है, प्राणके उत्क्रमण करनेपर सम्पूर्ण प्राण (इन्द्रियवर्ग) उत्क्रमण करते हैं। उस समय यह आत्मा विशेष विज्ञानवान् होता है और विज्ञानयुक्त प्रदेशको ही जाता है। उस समय उसके साथ-साथ ज्ञान, कर्म और पूर्वप्रज्ञा (अनुभूत विषयोंकी वासना) भी जाते हैं ॥ २ ॥ वह दृष्टान्त है—जिस प्रकार जोंक एक तृणके अन्तमें पहुँचकर दूसरे तृणरूप आश्रयको पकड़कर अपनेको सकोड़ लेती है,उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको मारकर— अविद्या (अचेतनावस्था) को प्राप्त कराकर दूसरे आधारका आश्रय ले अपना उपसंहार कर लेता है। उसमें दृष्टान्त— जिस प्रकार सुनार सुवर्णका भाग लेकर दूसरे नवीन और कल्याणतर (अधिक सुन्दर) रूपकी रचना करता है, उसी प्रकार यह आत्मा इस शरीरको नष्टकर—अचेतनावस्थाको प्राप्त करके दूसरे पितर, गन्धर्व, देव, प्रजापति, ब्रह्मा अथवा अन्य भूतोंके नवीन और सुन्दर रूपकी रचना करता है॥ ३-४॥ वह यह आत्मा ब्रह्म है। वह विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय, चक्षुर्मय, श्रोत्रमय, पृथिवीमय, जलमय, वायुमय, आकाशमय, तेजोमय, अतेजोमय, काममय, अकाममय, क्रोध- मय, अक्रोधमय, धर्ममय, अधर्ममय और सर्वमय है । जो कुछ इदमय (प्रत्यक्ष) और अदोमय (परोक्ष) है, वह वही है । वह जैसा करनेवाला और जैसे आचरणवाला होता है, वैसा ही हो जाता है । शुभ कर्म करनेवाला शुभ होता है और पापकर्मी पापी होता है । पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यात्मा होता है और पापकर्मसे पापी होता है । कोई-कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है; वह जैसी कामनावाला होता है वैसा ही सङ्कल्प करता है, जैसे सङ्कल्पवाला होता है वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त करता है ॥ ५ ॥ उस विषयमें यह मन्त्र है—इसका लिङ्ग अर्थात् मन जिसमें अत्यन्त आसक्त होता है, उसी फलको यह साभिलाष होकर कर्मके सहित प्राप्त करता है । इस लोकमे यह जो कुछ करता है, उस कर्मका फल प्राप्तकर उस लोकसे कर्म करनेके लिये पुनः इस लोकमें आ जाता है; अवश्य ही कामना करने- वाला पुरुष ही ऐसा करता है । अब जो कामना न करनेवाला पुरुष है [उसके विषयमें कहते हैं]—जो अकाम, निष्काम, आप्तकाम और आत्मकाम होता है, उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता, वह ब्रह्म ही रहकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ उसी अर्थमे यह मन्त्र है—जिस समय इसके हृदयमें आश्रित सम्पूर्ण कामनाओंका नाश हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमृत हो जाता है और यहीं (इसी शरीरमें) उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इसमें दृष्टान्त—जिस प्रकार सर्पकी केंचुली बाँबीके ऊपर मृत और सर्पद्वारा परित्याग की हुई पड़ी रहती है, उसी प्रकार यह शरीर पड़ा रहता है और यह अशरीर अमृत प्राण तो ब्रह्म ही है—तेज ही है ।' तब विदेहराज जनकने कहा, 'वह मैं जनक श्रीमान्‌को सहस्र गौएँ देता हूँ' ॥ ७ ॥ उस विषयमें ये मन्त्र हैं—यह ज्ञानमार्ग सूक्ष्म, विस्तीर्ण और पुरातन है । वह मुझे स्पर्श किये हुए है और मैने ही उसका फलसाधक ज्ञान प्राप्त किया है । धीर ब्रह्मवेत्ता पुरुष इस लोकमें जीते-जी ही मुक्त होकर शरीर त्यागके बाद उसी मार्गसे स्वर्गलोक अर्थात् मोक्षको प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥ उस मार्गके विषयमें मतभेद है । कोई उसमे शुक्ल और कोई नीलवर्ण बतलाते हैं तथा कोई पिङ्गलवर्ण, कोई हरित और कोई लाल कहते हैं, किंतु यह मार्ग साक्षात् ब्रह्मद्वारा अनुभूत है। इस मार्गसे पुण्य करनेवाला परमात्मतेजःस्वरूप ब्रह्मवेत्ता ही जाता है ॥ ९ ॥ जो (भोगसक्त मनुष्य) अविद्या (भोगोंके साधनरूप कर्म) की उपासना करते हैं, वे अज्ञानस्वरूप घोर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं और जो (मिथ्याज्ञानी) विद्या (कर्तव्य- कर्मका त्याग करके केवल ज्ञानके अभिमान) में रत हैं, वे उससे भी अधिकतर अन्धकारमें प्रवेश करते हैं। वे आनन्द (असुख) नामके निकृष्ट योनि और नरकरूप लोक अज्ञान और दुःख-क्लेशरूप महान् अन्धकारसे आच्छादित हैं; वे अविद्वान् और अज्ञानीलोग मरकर उन्हींको प्राप्त होते हैं। यदि पुरुष आत्माको 'मैं यह हूँ' इस प्रकार विशेषरूपसे जान जाय तो फिर क्या इच्छा करता हुआ और किस कामनासे शरीरके पीछे सन्तप्त हो ? जिस पुरुषको इस अनेकों अनर्थों- से पूर्ण और विवेक विज्ञानके विरोधी विषम शरीरमें प्रविष्ट हुआ आत्मा प्राप्त और ज्ञात हो गया है, वही कृतकृत्य है। वही सर्व [शुभों] का कर्ता है, उसीका लोक (मोक्षधाम) है और स्वयं वही लोक (मोक्षरूप) भी है। हम इस शरीरमें रहते हुए ही यदि उसे जान लेते हैं [तो कृतार्थ हो गये ], यदि उसे नहीं जाना तो बड़ी हानि है। जो उसे जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं; किंतु दूसरे लोग तो दुःखको ही प्राप्त होते हैं। जब भूत और भविष्यत्‌के स्वामी इस

ब्राह्मण ४] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४९३

ब्राह्मण ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४९३ प्रकाशमान अथवा कर्म-फलदाता आत्माको मनुष्य साक्षात् जान लेता है तो वह उससे अपनी रक्षा करनेकी इच्छा नहीं करता *॥ १०-१५ ॥ जिसके नीचे संवत्सरचक्र अहोरात्रादि अवयवोंके सहित चक्कर लगाता रहता है, उस आदित्यादि ज्योतियोंके ज्योतिः- स्वरूप अमृतकी देवगण 'आयु' इस प्रकार उपासना करते हैं। जिसमें पाँच पञ्चजन और [ अव्याकृतसंज्ञक ] आकाश भी प्रतिष्ठित है, उस आत्माको ही मैं अमृत ब्रह्म मानता हूँ । उस ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ ॥ १६-१७ ॥ जो उसे प्राणका प्राण, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र तथा ' मनका मन जानते हैं, वे उस सनातन और मुख्य ब्रह्मको जानते हैं । ब्रह्मको आचार्योपदेशपूर्वक मनसे ही देखना चाहिये । इसमें नानात्व कुछ भी नहीं है। जो इसमें नानाके समान देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है। उस ब्रह्मको [ आचार्योपदेशके ] अनन्तर एक प्रकारसे ही देखना चाहिये। यह ब्रह्म अप्रमेय, ध्रुव, निर्मल, [ अव्याकृतरूप ] आकाशसे भी सूक्ष्म, अजन्मा, आत्मा, महान् और अविनाशी है । बुद्धिमान् ब्राह्मणको उसे ही जानकर उसीमें प्रज्ञा करनी चाहिये । बहुत शब्दोंका अनुध्यान ( निरन्तर चिन्तन ) न करे; वह तो वाणीका श्रम ही है ॥ १८-२१ ॥ वह यह महान् अजन्मा आत्मा, जो कि यह प्राणोंमें विज्ञानमय है, जो यह हृदयमें आकाश है, उसमें शयन करता है । वह सबको वशमें रखनेवाला, सबका शासन करनेवाला

  • अन्ध तम प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रता ॥ अनन्दा नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता । तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्त्यविद्वा सोऽबुधो जना ॥ आत्मान चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुष । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसञ्जरेत् ॥ यस्यानुवित्त प्रतिबुद्ध आत्मास्मिन् संदेहे गहने प्रविष्ट । स विश्वकृत्स हि सर्वस्य कर्ता तस्य लोका सउ लोक एव ॥ इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वय न चेदवेदिर्महती विनष्टि । ये तद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दु खमेवापियन्ति ॥ यदैतमनुपश्यत्यात्मान देवमञ्जसा । ईशान भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ॥ (बृह० ४ । ४ । १०-१५) और सबका अधिपति है । वह शुभ कर्मसे बढ़ता नहीं और अशुभ कर्मसे छोटा नहीं होता । यह सर्वेश्वर है, यह भूतोंका अधिपति और भूतोंका पालन करनेवाला है । इन लोकोंकी मर्यादा भङ्ग न हो—इस प्रयोजनसे वह इनको धारण करनेवाला सेतु है । [ उपनिषदोंमें जिसके स्वरूपका दिग्दर्शन कराया गया है ] उस इस आत्माको ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्याय, यज्ञ, दान और निष्काम तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं । इसीको जानकर मुनि होता है । इस आत्मलोककी ही इच्छा करते हुए त्यागी पुरुष सब कुछ त्यागकर चले जाते ( सन्यासी हो जाते ) हैं। इस सन्यासमें कारण यह है— पूर्ववर्ती विद्वान् सन्तान [ तथा सकाम कर्म आदि ] की इच्छा नहीं करते थे । [ वे सोचते थे—] हमें सन्तानसे क्या लेना है, जिन हमको कि यह आत्मलोक अभीष्ट है । अतः वे पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणासे व्युत्थान कर फिर भिक्षाचर्या करते थे । जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही लोकैषणा है। ये दोनों एषणाएँ ही हैं । वह यह 'नेति-नेति' इस प्रकार-निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है, वह ग्रहण नहीं किया जाता; वह अशीर्य है, उसका नाश नहीं होता; वह असङ्ग है, कहीं आसक्त नहीं होता, बँधा नहीं है, इसलिये व्यथित नहीं होता तथा उसका क्षय नहीं होता । इस आत्मज्ञको ये दोनों ( पाप- पुण्यसम्बन्धी शोक-हर्ष ) प्राप्त नहीं होते । अतः इस निमित्तसे मैंने पाप किया है [ ऐसा पश्चात्ताप ] और इस निमित्तसे मैंने पुण्य किया है [ ऐसा हर्ष ] इन दोनोंको ही वह पार कर जाता है । इसे किया हुआ और न किया हुआ नित्यकर्म [ फलप्रदान और प्रत्यवायके द्वारा ] ताप नहीं देता ॥ २२ ॥ यही बात ऋचाद्वारा कही गयी है—यह ब्रह्मवेत्ताकी नित्य महिमा है, जो कर्मसे न तो बढ़ती है और न घटती ही है । उस महिमाके ही स्वरूपको जाननेवाला होना चाहिये, उसे जानकर पापकर्मसे लिप्त नहीं होता । अतः इस प्रकार जाननेवाला शान्त, दान्त, उपरत, तितिक्षु और समाहित होकर आत्मामें ही आत्माको देखता है, सभीको आत्मा देखता है । उसे [ पुण्य-पापरूप ] पापकी प्राप्ति नहीं होती, वह सम्पूर्ण पापोंको पार कर जाता है । इसे पाप ताप नहीं पहुँचाता, यह सारे पापोंको सन्तप्त करता है। यह पापरहित, निष्काम, निःसंशय ब्राह्मण हो जाता है । सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है, तुम इसे पहुँचा दिये गये हो'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ।

४९४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

४९४ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४ [ तब जनकने कहा—] 'वह मैं श्रीमान्‌को विदेह देश देता और कर्मफल देनेवाला है। जो ऐसा जानता है, उसे सम्पूर्ण हूँ, साथ ही आपकी दासता (सेवा) करनेके लिये अपने- कर्मोंका फल प्राप्त होता है। वही यह महान् अजन्मा आत्मा आपको भी समर्पण करता हूँ' ॥ २३ ॥ अजर, अमर, अमृत एव अभय ब्रह्म है। अभय ही ब्रह्म है; वह यह महान् अजन्मा आत्मा अन्न भक्षण करनेवाला जो ऐसा जानता है, वह अभय ब्रह्म ही हो जाता है ॥ २४-२५ ॥

पञ्चम
याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद
यह प्रसिद्ध है कि याज्ञवल्क्यकी मैत्रेयी और कात्यायनी—ये   प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके
दो पत्नियां थीं। उनमें मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी और कात्यायनी   लिये क्षत्रिय प्रिय होता है, लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय
साधारण स्त्रियोंकी सी बुद्धिवाली ही थी। तब याज्ञवल्क्यने   नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते हैं;
दूसरे प्रकारकी चर्चाका आरम्भ करनेकी इच्छासे [कहा—]   देवोंके प्रयोजनके लिये देव प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके
'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा—'मैं इस स्थान   लिये देव प्रिय होते हैं, वेदोंके प्रयोजनके लिये वेद प्रिय नहीं
(गार्हस्थ्य-आश्रम) से अन्यत्र सब कुछ त्यागकर जानेवाला   होते, अपने ही प्रयोजनके लिये वेद प्रिय होते हैं, भूतोंके
हूँ, अर्थात् मेरा सन्यास लेनेका विचार है। इसलिये [मैं तेरी   प्रयोजनके लिये भूत प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये
अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ] इस कात्यायनीके साथ   भूत प्रिय होते हैं, सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते,
तेरा बँटवारा कर दूँ'। उस मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि   अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं, अतः अरी
यह धनसे सम्पन्न सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं   मैत्रेयि ! आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और
उससे अमर हो सकती हूँ, अथवा नहीं ?' याज्ञवल्क्यने कहा,   निदिध्यासन (ध्यान) करनेयोग्य है। अरी मैत्रेयि ! निश्चय ही
'नहीं, भोग सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है,   आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान हो जानेपर इस
वैसा ही तेरा भी जीवन हो जायगा, धनसे अमृतत्वकी तो आशा   सबका ज्ञान हो जाता है' ॥ ६ ॥
है ही नहीं।' उस मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो   ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको
सकती, उसे लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्व-   आत्मासे भिन्न समझता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती
का साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें।' उन याज्ञवल्क्यजीने   है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। लोक उसे
कहा, 'निश्चय ही तू पहले भी मेरी प्रिया रही है और इस   परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न जानता है।
समय भी तूने मेरे प्रिय (प्रसन्नता) को बढ़ाया है। अतः   देवता उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे भिन्न
देवि ! मैं प्रसन्नतापूर्वक तेरे प्रति इस (अमृतत्वके साधन)   समझता है। वेद उसे परास्त कर देते हैं, जो वेदोंको आत्मासे
की व्याख्या करूँगा। तू मेरे व्याख्या किये हुए विषयका   भिन्न जानता है। भूत उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको
चिन्तन करना' ॥ १-५ ॥                                आत्मासे भिन्न समझते हैं। सब उसे परास्त कर देते हैं, जो
उन्होंने कहा—'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके   सबको आत्मासे भिन्न जानता है। यह ब्राह्मणजाति, यह
प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके   क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देव, ये वेद, ये भूत और ये सब
लिये पति प्रिय होता है, स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं   जो कुछ भी हैं, यह सब आत्मा ही है। वह दृष्टान्त ऐसा है
होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है, पुत्रोंके   कि जिसपर लकड़ी आदिसे आघात किया जाता है, उस
प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये   दुन्दुभि (नक्कारे) के बाह्य शब्दोंको जिस प्रकार कोई ग्रहण
पुत्र प्रिय होते हैं, धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता,   नहीं कर सकता, किन्तु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको
अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है, पशुओंके प्रयोजनके   ग्रहण करनेसे उसका शब्द भी गृहीत हो जाता है। वह
लिये पशु प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये पशु प्रिय   [दूसरा] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे मुँहसे फूँके जाते हुए
होते हैं, ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता,   शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें कोई समर्थ नहीं होता,
अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके   किन्तु शङ्ख या शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी

ब्राह्मण ६ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४९५

ब्राह्मण ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४९५ ग्रहण हो जाता है । वह [ तीसरा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जैसे बजायी जाती हुई वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमे कोई समर्थ नहीं होता, किन्तु वीणा या वीणाके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ७–१० ॥ वह [ चौथा ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धूएँ निकलते हैं, उसी प्रकार हे मैत्रेयि ! ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक (ब्राह्मण-मन्त्र), सूत्र (वैदिक वस्तुसंग्रहवाक्य), सूत्रोंकी व्याख्या, मन्त्रोंकी व्याख्या, इष्ट (यज्ञ), हुत (हवन किया हुआ), आशित (खिलाया हुआ), पायित (पिलाया हुआ), यह लोक, परलोक और सम्पूर्ण भूत हैं—सब इसीके निःश्वास हैं। वह [ पाँचवाँ ] दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन (आश्रयस्थान) है, इसी प्रकार समस्त स्पशोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन हैं, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त संकल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओंका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका दोनों हाथ एक अयन हैं, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मागोंका दोनों चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोंका वाक् एक अयन है ॥ ११-१२ ॥ उसमें [ छठा ] दृष्टान्त इस प्रकार है—जिस प्रकारनमकका डला भीतर और बाहरसे रहित सम्पूर्ण रसघन ही है, हे मैत्रेयि ! उसी प्रकार यह आत्मा अन्तर-बाह्य भेदसे शून्य सम्पूर्ण प्रज्ञानघन ही है। यह इन भूतोंसे [ विशेषरूपसे ] उत्थित होकर उन्हींके साथ नष्ट हो जाता है। इस प्रकार मर जानेपर इसकी संज्ञा नहीं रहती। हे मैत्रेयि ! इस प्रकार मैं कहता हूँ'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १३ ॥ वह मैत्रेयी बोली, 'यहाँ श्रीमान्ने मुझे मोहको प्राप्त करा दिया है। मैं इसे विशेषरूपसे नहीं समझती।' उन्होंने कहा, 'अरी मैत्रेयि ! मैं मोहकी बात नहीं कह रहा हूँ। अरी ! यह आत्मा निश्चय ही अविनाशी और अनुच्छेदरूप धर्मवाला है ॥ १४ ॥ जहाँ [ अविद्यावस्था में ] द्वैत-सा होता है, वहीं अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यका रसास्वादन करता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका मनन करता है, अन्य अन्यका स्पर्श करता है और अन्य अन्यको विशेषरूपसे जानता है। किन्तु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसका रसास्वादन करे, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका मनन करे, किसके द्वारा किसका स्पर्श करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा पुरुष इस सबको जानता है, उसे किस साधनसे जाने ? वह यह 'नेति नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया आत्मा अगृह्य है—उसका ग्रहण नहीं किया जाता; अशीर्य है—उसका विनाश नहीं होता, असङ्ग है—आसक्त नहीं होता; असद्ध है—वह व्यथित और क्षीण नहीं होता। हे मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? इस प्रकार तुझे उपदेश कर दिया गया। अरी मैत्रेयि ! निश्चय जान, इतना ही अमृतत्व है।' ऐसा कहकर याज्ञवल्क्यजी परिव्राजक (सन्यासी) हो गये ॥ १५ ॥ षष्ठ ब्राह्मण याज्ञवल्कीय काण्डकी परम्परा अब [ याज्ञवल्कीय काण्डका ] वंश बतलाया जाता है— पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने कौशिकसे, कौशिकने कौण्डिन्यसे, कौण्डिन्यने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे, तथा गौतमने अग्निवेश्यसे, अग्निवेश्यने गार्ग्यसे, गार्ग्यने गार्ग्यसे, गार्ग्यने गौतमसे, गौतमने सैतवसे, सैतवने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने गार्ग्यायणीसे, गार्ग्यायणीने उद्दालकायनसे, उद्दालकायनने जाबालायनसे, जाबालायनने

४९६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४

४९६ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ४ माध्यन्दिनायनसे, माध्यन्दिनायनने सौकरायणसे, सौकरायणने कौण्डिन्यसे, विदर्भीकौण्डिन्यने वत्सनपाद् बाभ्रवसे, वत्सनपाद् काषायणसे, काषायणने सायकायनसे, सायकायनने कौशिकायनि- बाभ्रवने पन्था सौभरसे, पन्था सौभरने अयास्य आङ्गिरससे, से, कौशिकायनिने घृतकौशिकसे, घृतकौशिकने पाराशर्यायण- अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाष्ट्रसे, आभूति त्वाष्ट्रने विश्वरूप से, पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, पाराशर्यने जातूकण्र्यसे, जातू- त्वाष्ट्रसे, विश्वरूप त्वाष्ट्रने अश्विनीकुमारोंसे, अश्विनीकुमारोंने कण्र्यने आसुरायणसे और यास्कसे, आसुरायणने त्रैवणिसे, दध्यङ्ङाथर्वणसे, दध्यङ्ङाथर्वणने अथर्वा दैवसे, अथर्वा दैवने त्रैवणिने औपजङ्घनिसे, औपजङ्घनिने आसुरिसे, आसुरिने मृत्यु प्राध्वंसनसे, मृत्यु प्राध्वंसनने प्रध्वंसनसे, प्रध्वंसनने भारद्वाजसे, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने माण्टिसे, एकर्षिसे, एकर्षिने विप्रचित्तिसे, विप्रचित्तिने व्यष्टिसे, व्यष्टिने माण्टिने गौतमसे, गौतमने गौतमसे, गौतमने वात्स्यसे, वात्स्यने सनारुसे, सनारुने सनातनसे, सनातनने सनगसे, सनगने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे, कैशोर्य काप्यने परमेष्ठीसे, परमेष्ठीने ब्रह्मासे [ यह विद्या प्राप्त की ] । ब्रह्मा कुमारहारितसे, कुमारहारितने गालवसे, गालवने विदर्भी- स्वयम्भू है; ब्रह्माको नमस्कार है ॥ १-३ ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥

पञ्चम अध्याय

ॐ पञ्चम अध्याय प्रथम ब्राह्मण आकाशकी ब्रह्मरूपमें उपासना वह परब्रह्म पूर्ण है और यह (जगत् भी) पूर्ण [परमात्मा] है। 'जिसमें वायु रहता है, वह आकाश ही है। उस पूर्णब्रह्मसे ही यह पूर्ण उत्पन्न होता है। इस पूर्णके ख है'—ऐसा कौरव्यायणीपुत्रने कहा है। यह ओङ्कार पूर्णको निकाल लेनेपर भी पूर्ण ही बच रहता है। आकाश- वेद है—ऐसा ब्राह्मण जानते हैं, क्योंकि जो ज्ञातव्य है, ब्रह्म ॐकार है। आकाश [यहाँ जड नहीं,] सनातन उसका इसीसे ज्ञान होता है ॥ १ ॥ द्वितीय ब्राह्मण 'द-द-द' से दम-दान और दयाका उपदेश देव, मनुष्य और असुर-प्रजापतिके इन तीन पुत्रोंने पिता फिर प्रजापतिसे असुरोंने कहा—'आप हमें उपदेश प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्यवास किया। ब्रह्मचर्यवास कर चुकनेपर कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और देवोंने कहा—'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे प्रजापतिने पूछा, 'समझ गये क्या ?' असुरोंने कहा, "समझ गये, आपने 'द' यह अक्षर कहा और पूछा, 'समझ गये क्या ?' इसपर हमसे 'दया करो' ऐसा कहा है।" तब प्रजापतिने 'हाँ, समझ 'उन्होंने कहा, "समझ गये, आपने हमसे 'दमन करो' ऐसा गये' ऐसा कहा। इस प्रजापतिके अनुशासनकी मेघगर्जनारूपी कहा है।" तब प्रजापतिने कहा, 'ठीक है, तुम समझ गये' ॥१॥ दैवी वाणी आज भी द द-द—इस प्रकार अनुवाद करती है, फिर प्रजापतिसे मनुष्योंने कहा—'आप हमें उपदेश अर्थात् भोगप्रधान देवो ! इन्द्रियोंका दमन करो, सङ्ग्रहप्रधान कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और मनुष्यो ! भोगसामग्रीका दान करो, क्रोध-हिंसाप्रधान असुरो ! पूछा, 'समझ गये क्या ?' मनुष्योंने कहा, "समझ गये, आपने जीवोंपर दया करो—यों कहती है। अतः दम, दान और हमसे 'दान करो' ऐसा कहा है।" तब प्रजापतिने 'हाँ, समझ दया—इन तीनोंको सीखे ॥ ३ ॥ गये' ऐसा कहा ॥ २ ॥ तृतीय ब्राह्मण हृदयकी ब्रह्मरूपसे उपासना जो हृदय है, वह प्रजापति है। यह ब्रह्म है, यह सर्व है, बलि समर्पण करते हैं। 'द' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता यह हृदय तीन अक्षरवाला नाम है। 'हृ' यह एक अक्षर है, उसे स्वजन और अन्यजन देते हैं। 'यम्' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, उसके प्रति स्वजन और अन्यजन है। जो ऐसा जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है ॥ १ ॥ चतुर्थ ब्राह्मण सत्यकी ब्रह्मरूपसे उपासना वही-वह हृदय-ब्रह्म ही वह था—जो कि सत्य ही है। जो भी हो जाता है,। जो इस प्रकार इस महत्, यक्ष (पूजनीय), इस महत्, यक्ष (पूज्य), सर्वप्रथम उत्पन्न होनेवालेको यह प्रथम उत्पन्न होनेवालेको 'सत्य ब्रह्म'—इस प्रकार जानता 'सत्य ब्रह्म है' ऐसा जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है। है [उसे उपर्युक्त फल मिलता है], क्योंकि ब्रह्म सत्य [उसका शत्रु] उसके अधीन हो जाता है—असत् (अभावरूप) ही है ॥ १ ॥ उ० अ० ६३—

४९८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

४९८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ५ पञ्चम ब्राह्मण सत्यकी आदित्यरूपमें उपासना यह [व्यक्त जगत्] पहले आप (जल) ही था ! उस लगता है, उस समय यह इस मण्डलको शुद्ध ही देखता है। आपने सत्यकी रचना की । अतः सत्य ब्रह्म है । ब्रह्मने प्रजापति फिर ये रश्मियाँ इसके पास नहीं आतीं ॥ १-२ ॥ (विराट्) को और प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया। इस मण्डलमे जो यह पुरुष है, उसका 'भूः' यह सिर है; वे देवगण सत्यकी ही उपासना करते हैं । वह यह 'सत्य' तीन सिर एक है और यह अक्षर भी एक है । 'भुवः' यह भुजा अक्षरवाला नाम है । 'स' यह एक अक्षर है, 'ति' यह एक है, भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । 'स्वः' यह प्रतिष्ठा अक्षर है और 'यम्' यह एक अक्षर है । इनमें प्रथम और (चरण) है, प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये अक्षर भी दो अन्तिम अक्षर सत्य है और मध्यका अनृत है । वह यह अनृत हैं । 'अहर्' यह उसका उपनिषद् (गूढ नाम) है; जो ऐसा दोनों ओरसे सत्यसे परिगृहीत है । इसलिये यह सत्य-बहुल ही जानता है, वह पापको मारता है और उसे त्याग देता है। जो है । इस प्रकार जाननेवालेको अनृत नहीं मारता । वह जो सत्य यह दक्षिण नेत्रमे पुरुष है, उसका 'भूः' यह सिर है, सिर है, सो यह आदित्य है । जो इस आदित्यमण्डलमें पुरुष है एक है और यह अक्षर भी एक है। 'भुवः' यह भुजा है; और जो भी यह दक्षिण नेत्रमें पुरुष है, वे ये दोनों पुरुष भुजाएँ दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं । 'स्वः' यह प्रतिष्ठा है, एक दूसरेमें प्रतिष्ठित हैं । आदित्य रश्मियोंके द्वारा चाक्षुष प्रतिष्ठा (चरण) दो हैं और ये अक्षर भी दो हैं। 'अहम्' पुरुषमें प्रतिष्ठित है और चाक्षुष पुरुष प्राणोंके द्वारा उसमें यह उसका उपनिषद् (गूढ नाम) है, जो ऐसा जानता है, प्रतिष्ठित है । जिस समय यह (चाक्षुष पुरुष) उत्क्रमण करने वह पापको मारता और त्याग देता है ॥ ३-४ ॥ षष्ठ ब्राह्मण मनोमय पुरुषकी उपासना प्रकाश ही जिसका सत्य (स्वरूप) है, ऐसा यह है । वह यह सबका स्वामी और सबका अधिपति है; पुरुष मनोमय है । वह उस अन्तर्हृदयमें जैसा व्रीहि तथा यह जो कुछ है, सभीका प्रकर्षतया शासन करता (धान) या यव (जौ) होता है, उतने ही परिमाणवाला है ॥ १ ॥ सप्तम ब्राह्मण विद्युत्की ब्रह्मरूपमें उपासना विद्युत् ब्रह्म है-ऐसा कहते हैं । विदान (खण्डन या जानता है, वह इस आत्माके प्रतिकूलभूत पापोंका नाश कर विनाश) करनेके कारण विद्युत् है । जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा देता है, क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥ अष्टम ब्राह्मण वाक्की धेनुरूपमें उपासना वाक्रूप धेनुकी उपासना करे । उसके चार स्तन देवगण हैं, हन्तकारके भोक्ता मनुष्य हैं और स्वधाकारके / हैं-स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार । पितृगण । उस धेनुका प्राण वृषभ है और मन उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्कारके भोक्ता बछड़ा है ॥ १ ॥ नवम ब्राह्मण अन्तरस्थ वैश्वानर अग्नि जो यह पुरुषके भीतर है, यह अग्नि वैश्वानर जिसे पुरुष कानोंको मूँदकर सुनता \ है । जिस समय है, जिससे कि यह अन्न; जो कि भक्षण किया जाता पुरुष उत्क्रमण करनेवाला होता है, उस समय इस घोषको है, पकाया जाता है । उसीका यह घोष होता है, नहीं सुनता ॥ १ ॥

दशम ब्राह्मण

ब्राह्मण १३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४९९ दशम ब्राह्मण मरणोत्तर ऊर्ध्वगतिका वर्णन जिस समय यह पुरुष इस लोकसे मरकर जाता है, उस होता है । उसमें होकर वह ऊपरकी ओर चढता है । वह समय वह वायुको प्राप्त होता है । वहाँ वह वायु उसके लिये चन्द्रलोकमें पहुँच जाता है । वहाँ चन्द्रमा भी उसके लिये छिद्रयुक्त हो जाता—मार्ग दे देता है, जैसा कि रथके पहियेका छिद्रयुक्त हो मार्ग देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र होता है । छिद्र होता है । उसके द्वारा वह ऊर्ध्व होकर चढता है । वह उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढता है । वह अशोक (शारीरिक सूर्यलोकमें पहुँच जाता है। वहाँ सूर्य उसके लिये वैसा ही दुःखसे रहित ) और अधिम ( मानसिक दुःखशून्य ) लोकमें छिद्ररूप मार्ग देता है, जैसा कि लम्बर नामके बाजेका छिद्र पहुँच जाता है और उसमें सदा—अनन्त कालतक अर्थात् ब्रह्माके अनेक कल्पोंतक निवास करता है ॥ १ ॥ एकादश ब्राह्मण व्याधिमें और मृत पुरुषके श्मशान-गमन आदिमें तपकी फल व्याधियुक्त पुरुषको जो ताप होता है, वह निश्चय जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है । मरे ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम हुए मनुष्यको सब प्रकार जो अग्निमें रखते हैं, यह लोकको ही जीत लेता है । मृत पुरुषको जो वनको निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम ले जाते हैं, यह निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा लोकको ही जीत लेता है ॥ १ ॥

द्वादश अन्न एवं प्राणकी ब्रह्मरूपसे उपासना कोई कहते हैं कि अन्न ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है। सकता है और न अशुभ ही । ]' पिताने हाथसे निवारण करते हुए क्योंकि प्राणके बिना अन्न सड़ जाता है । कोई कहते हैं— कहा—'प्रातृद ! ऐसा मत कहो। इन दोनोंकी एकरूपताको प्राण ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है । क्योंकि अन्नके बिना प्राप्त होकर कौन परमताको प्राप्त होता है ?' अतः उससे उस प्राण सूख जाता है । परंतु ये दोनों देव एकरूपताको प्राप्त ( प्रातृदके पिता ) ने 'वि' ऐसा कहा । 'वि' यही अन्न है । होकर परम भावको प्राप्त होते हैं—ऐसा निश्चयकर प्रातृद वि-रूप अन्नमें ही ये सब भूत प्रविष्ट हैं । 'रम्' यह प्राण है, स्ट्रपिने अपने पितासे कहा था—'इस प्रकार जाननेवालेका क्योंकि र अर्थात् प्राणमें ही ये सब भूत रमण करते हैं । मैं क्या शुभ करूँ अथवा क्या अशुभ करूँ ? [ क्योंकि जो ऐसा जानता है, उसमें ये सब भूत प्रविष्ट होते हैं और कृतकृत्य हो जानेके कारण उसका तो न कोई शुभ किया जा सभी भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥

त्रयोदश प्राणकी विविध रूपोंमें उपासना 'उक्थ' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण ही सलोकताको प्राप्त होता है । 'साम' इस प्रकार प्राणकी उपासना उक्थ है, क्योंकि प्राण ही सब इन्द्रियोंको उत्थापित करता है । करे । प्राण ही साम है, क्योंकि प्राणमें ही ये सब भूत सुसङ्गत इस उपासकसे उक्थवेत्ता पुत्र उत्पन्न होता है । जो ऐसी होते हैं । समस्त भूत उसके लिये सुसङ्गत होते हैं, तथा उपासना करता है, वह प्राणके सायुज्य और सालोक्यको उसकी श्रेष्ठतामें कारण होते हैं । जो इस प्रकार उपासना प्राप्त करता है । 'यजुः' इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । करता है, वह सामके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता प्राण ही यजु है, क्योंकि प्राणमें ही इन सब भूतोंका योग होता है । प्राण 'क्षत्र' है—इस प्रकार प्राणकी उपासना करे । प्राण है । सम्पूर्ण भूत इसकी श्रेष्ठताके कारण इससे संयुक्त होते हैं । ही क्षत्र है । प्राण ही क्षत्र है—यह प्रसिद्ध है । प्राण इस जो ऐसी उपासना करता है, वह यजुके सायुज्य और

चतुर्दश ब्राह्मण

५०० - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ ५ देहनी शस्त्रादिजनित क्षतसे रक्षा करता है। अनन्य-जन्य किसीसे त्राण न पानेवाले क्षत्र (प्राण) को प्राप्त होता है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको जीत (प्राप्त कर) लेना है ॥ १-४॥ चतुर्दश ब्राह्मण गायत्री-उपासना 'भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ'—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (प्रथम) पाद है। यह (भूमि आदि) ही इस गायत्रीका प्रथम पाद है। इस प्रकार इसके इस पदको जो जानता है वह इस त्रिलोकीमें जितना कुछ है, उस सबको जीत (प्राप्त कर) लेता है। 'ऋचः यजूंषि, सामानि'—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (द्वितीय) पाद है। यह (ऋक् आदि) ही इस गायत्रीका द्वितीय पाद है। जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है वह जितनी यह त्रयीविद्या है (अर्थात् त्रयीविद्या- का जितना फल है,) उस सभीको जीत लेता है। प्राण, अपान, व्यान—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाल ही गायत्रीका एक (तृतीय) पाद है। यह प्राणादि ही इस गायत्रीका 'तृतीय' पाद है। जो गायत्रीके इस पदको इस प्रकार जानता है, वह जितना यह प्राणिसमुदाय है, सबको जीत लेता है। और यह जो तप्ता (प्रकाशित होता) है वही इसका तुरीय, दर्शत, परोरजा पद है। जो चतुर्थ होता है, वही 'तुरीय कहलाता है। 'दर्शत पदम्' इसका अर्थ है-मानो [यह आदित्मण्डलस्थ पुरुष] दीखता है। 'परोरजा इसका अर्थ है-यह सभी रज (यानी लोको) के ऊपर-ऊपर रहकर प्रकाशित होता है। जो गायत्री- के इस चतुर्थ पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार शोभा और कीर्तिसे प्रकाशित होता है। वह यह गायत्री इस चतुर्थ दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है। वह पद सत्यमें प्रतिष्ठित है। चक्षु ही सत्य है चक्षु ही सत्य है—यह प्रसिद्ध है। इसीसे यदि दो पुरुष 'मैंने देखा है' 'मैंने सुना है' इस प्रकार विवाद करते हुए आयें तो जो यह कहता होगा कि 'मैंने देखा है' उसीका हमे विश्वास होगा। वह तुरीय पादका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है। प्राण ही बल है, वह सत्य प्राणमें प्रतिष्ठित है। इसीसे कहते हैं कि सत्यकी अपेक्षा बल ओजस्वी है। इस प्रकार यह गायत्री अध्यात्म प्राणमे प्रतिष्ठित है। इस पूर्वोक्त गायत्रीने गयोंका त्राण किया था। प्राण ही गय हैं, उन प्राणोंका इसने त्राण किया। इसने गयोंका त्राण किया था, इसीसे इसका 'गायत्री' नाम हुआ। आचार्यने आठ वर्षके बटुके प्रति उपनयनके समय जिस सावित्रीका उपदेश किया था, वह यही है। वह जिस जिस बटुको इसका उपदेश करता है वह उसके-उसके प्राणोंकी रक्षा करती है ॥ १-४ ॥ कोई शाखावाले इस पूर्वोक्त अनुष्टुप् छन्दवाली सावित्रीका उपदेश करते हैं (गायत्रीछन्दवाली सावित्रीका उपदेश न करके अनुष्टुप्छन्दकी सावित्रीका उपदेश करते हैं)। वे कहते हैं कि वाक् अनुष्टुप् है, इसलिये हम वाक्का ही उपदेश करते हैं। किंतु ऐसा नहीं करना चाहिये। गायत्रीछन्दवाली सावित्री- का ही उपदेश करे। ऐसा जाननेवाला जो बहुत सा भी प्रतिग्रह करे तो भी वह गायत्रीके एक पदके बराबर भी नहीं हो सकता ॥ ५ ॥ जो इन तीन पूर्ण लोकोंका प्रतिग्रह करता है, उसका वह (प्रतिग्रह) इस गायत्रीके इस प्रथम पादसे व्याप्त करता है। और जितनी यह त्रयीविद्या है, उसका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस द्वितीय पादने व्याप्त करता है। और जितने ये प्राणी हैं, उनका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस तृतीय पदको व्याप्त करता है। और यही इसका तुरीय दर्शत परोरजा पद है, जो कि यह तरता है; यह किसीके द्वारा प्राप्य नहीं है, क्योंकि इतना प्रतिग्रह कोई कहाँसे कर सकता है? ॥ ६ ॥ उस गायत्रीका उपस्थान— हे गायत्रि ! तू [ त्रैलोक्यरूप प्रथम पादसे ] एकपदी है, [ तीनों वेदरूप द्वितीय पादसे ] द्विपदी है, [ प्राण, अपान और व्यानरूप तीसरे पादसे ] त्रिपदी है [ और तुरीय पादसे ] चतुष्पदी है। [ इन सबसे परे निरुपाधिक स्वरूपसे तू ] अपद है, क्योकि तू जानी नहीं जाती। अतः व्यवहारके अविषयभूत एव समस्त लोकोंसे ऊपर विराज- मान तेरे दर्शनीय तुरीय पदको नमस्कार है। यह पादरूपी शत्रु १. अनुष्टुप्छन्द चार पादोंका होता है और गायत्रीछन्द तीन पादोंका। दोनोंके पाद आठ-आठ अक्षरके ही होते हैं। अनुष्टुप्छन्दमें जो मन्त्र उपलब्ध होता है, उसका भी देवता सविता ही है, इसलिये कुछ लोग उसे ही सावित्री कहते हैं। अनुष्टुप्छन्दवाला मन्त्र इस प्रकार है— 'तत्संवितुर्वृणीमहे वय देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठ सर्वधानम तुरं भाम धीमहि।'

१५] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०१ इस [ विश्वाचरणरूप ] कार्यमें सफलता नहीं प्राप्त करे । इस कहा था, तो फिर [ प्रतिग्रहके दोषसे ] हाथी होकर भार क्यों प्रकार यह (विद्वान् ) जिससे द्वेष करता हो, 'उसकी कामना ढोता है ?' इसपर उसने 'सम्राट् ! मे इसका मुख ही नहीं पूर्ण न हो' ऐसा कहकर उपस्थान करे । जिसके लिये इस जानता था' ऐसा कहा । [ तब जनकने कहा-] 'इसका प्रकार उपस्थान किया जाता है, उसकी कामना पूर्ण नहीं होती । अग्नि ही मुख है। यदि अग्निमे लोग बहुत-सा ईंधन रख दें अथवा 'मैं इस वस्तुको प्राप्त करूँ' ऐसी कामनासे उपस्थान तो वह उस सभीको जला डालता है। इसी प्रकार ऐसा जानने- करे ॥ ७ ॥ वाला बहुत सा पाप करता रहा हो, तो भी वह उस सबको उस विदेह जनकने बुडिल अश्वतराश्विसे यही बात कही भक्षण करके शुद्ध, पवित्र, अजर, अमर हो जाता है ॥ ८ ॥ थी कि 'तूने जो अपनेको गायत्रीविद् (गायत्री तत्त्वका ज्ञाता) पञ्चदश ब्राह्मण अन्तसमयकी प्रार्थना हे सबका भरण-पोषण करनेवाले परमेश्वर ! आप सत्य- इन्द्रियाँ अविनाशी समष्टि वायुतत्त्वमें [ प्रविष्ट हो जायँ ], यह स्वरूप सर्वेश्वरका श्रीमुख ज्योतिर्मय सूर्यमण्डलरूप पात्रसे ढका स्थूलशरीर अग्निमे जलकर भस्मरूप [ हो जाय ] । हे हुआ है । आपकी भक्तिरूप सत्यधर्मका अनुष्ठान करनेवाले सच्चिदानन्दघन यज्ञमय भगवन् ! [ आप मुझ भक्तका ] स्मरण मुझको अपने दर्शन करानेके लिये आप उस आवरणको हटा करें, मेरे द्वारा किये हुए (भक्तिरूप ) कर्मोंका स्मरण करें । लीजिये । हे भक्तोंका पोषण करनेवाले ! मुख्य ज्ञानस्वरूप ! हे यज्ञमय भगवन् ! [ आप मुझ भक्तको ] स्मरण करें, सबके नियन्ता ! भक्तों और ज्ञानियोंके परम लक्ष्य ! प्रजापतिके (मेरे) कर्मोंको स्मरण करें । हे अग्नि ! (अग्निके अधिष्ठातृ प्रिय ! इन रश्मियोंको एकत्र कीजिये-हटा लीजिये, इस देवता ) हमें परम वनरूप परमेश्वरकी सेवामें पहुँचानेके लिये तेजको समेट लीजिये । आपका जो अतिशय कल्याणमय सुन्दर शुभ (उत्तरायण) मार्गसे ले चलिये । हे देव ! दिव्यस्वरूप है, उसको मै आपकी कृपासे [ ध्यानके द्वारा ] [ आप हमारे ] सम्पूर्ण कर्मोंको जाननेवाले हैं, अतः हमारे इस देख रहा हूँ। वह जो (सूर्यका आत्मा) है, वह परम पुरुष मार्गके प्रतिबन्धक पापको दूर कर दीजिये । आपको हम [ आपका स्वरूप है, ] वही मैं भी हूँ। अब ये प्राण और बार-बार नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥ - ॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥