कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
प्रस्तावना
बहुत दिनो से मेरे मन में यह अभिलाषा थी कि तमिल-साहित्य के कुछ प्राचीन ग्रन्थो का हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित किया जाय, जिससे हिन्दीभाषा-भाषी जनता को तमिल-भाषा के प्राचीन साहित्य का रसास्वादन करने तथा वहाँ की समृद्ध संस्कृति एवं विचार-धारा को समझने का अवसर मिले। किन्तु, किसी योग्य प्रकाशक के अभाव में यह कार्य संभव नही था। सन् १६५५ ई० में मेरी भेट आदरणीय श्रीशिवपूजन सहायजी से हुई। उस समय वे बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् के संचालक थे। जब मैने उनसे इस विषय की चर्चा की, तब वे बहुत प्रसन्न हुए और परिषद् की ओर से ऐसे ग्रन्थो को प्रकाशित करने का आश्वासन भी किया। उसी वर्ष २७ जुलाई को उनका एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि राष्ट्रभाषा-परिषद् ने दक्षिण भारत की चारो भाषाओ में प्रचलित रामायणो का हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित करने का निश्चय किया है। योग्य अनुवादक चुनने तथा अनुवाद के संशोधन आदि का भार उन्होंने मुझे सौंपा था। मै उस समय दक्षिण भारत हिन्दी-प्रचार-सभा की तमिलनाड-शाखा के मंत्री की हैसियत से कार्य कर रहा था और तिरुच्चिरापल्ली मे रहता था। सहायजी का पत्र पाकर मै उत्साह से भर गया और योग्य अनुवादको की तलाश करने लगा।
दक्षिण में चार प्रधान भाषाएँ बोली जाती हैं, जिनका अपना-अपना साहित्य है। वे हैं—तमिल, तेलुगु, कन्नड और मलयालम। तमिल मद्रास-राज्य में, मद्रास नगर तथा उसके दक्षिण में कन्याकुमारी तक बोली जाती है। तेलुगु आन्ध्रदेश की भाषा है और मद्रास के उत्तर मे विजगापट्टम् तक तथा हैदराबाद में बोली जाती है। कन्नड मैसूर-राज्य की भाषा है और मद्रास-राज्य के पश्चिम मे अरब समुद्र के तट तक बोली जाती है। मलयालम केरल-प्रान्त की भाषा है और दक्षिण मे तिरुवनन्तपुरम् (त्रिवेन्द्रम्) से अरब सागर के किनारे-किनारे कासरगोड तक बोली जाती है। ये चारो भाषाएँ द्रविड़-परिवार की हैं और आर्य-परिवार की भाषाओ से बहुत भिन्न हैं। तमिल को छोड़कर शेष तीन भाषाओ पर संस्कृत का बहुत प्रभाव पड़ा है और उन्होने संस्कृत से बहुत-से शब्द ग्रहण किये हैं। इन चारो भाषाओ में तमिल सबसे प्राचीन है और उसका प्राचीन साहित्य सबसे अधिक समृद्ध है।
उपर्युक्त चारो प्रान्तो मे रामकथा का प्रचार है और चारो भाषाओ मे रामायण की रचना हुई है। किन्तु, मलयालम रामायण एक आधुनिक रचना है और वाल्मीकि रामायण का छायानुवाद-मात्र है। मलयालम रामायण रामानुजन् एऴुत्तच्छन् नामक किसी कवि की रचना है, जो ईसवी-सन् १६वी और १७वी शती के मध्य वर्त्तमान थे। उन्होंने अपनी रामायण अध्यात्मरामायण के आधार पर लिखी है, जिसकी भाषा संस्कृत-गर्भित है। कन्नड की सबसे प्राचीन रामायण 'पप रामायण' के नाम से प्रसिद्ध है और 'पप' नामक एक जैनकवि की रचना है। पंप ने रामकथा मे बहुत हेर-फेर किया है और जैन दृष्टिकोण से
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उसकी रचना की है, अतएव यह निश्चय हुआ कि इस समय उक्त दोनो रामायणो का अनुवाद स्थगित रखा जाय और तेलुगु से रंगनाथ रामायण तथा तमिल से कब रामायण का अनुवाद कराया जाय । ये दोनो रामायण वाल्मीकि रामायण की कथा के आधार पर लिखे गये हैं, किन्तु दोनो की रचना मे पर्याप्त मौलिकता प्रदर्शित की गई है ।
बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् की इसी योजना के अनुसार रंगनाथ रामायण के हिन्दी-अनुवाद का कार्य मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के हिन्दी-अध्यापक श्री ए० सी० कामाक्षिराव, एम्० ए०, बी० ओ० एल्० को सौंपा गया । प्रसन्नता की बात है कि रंगनाथ रामायण का हिन्दी-अनुवाद परिषद् की ओर से प्रकाशित हो चुका है।
कंब रामायण तमिल-भाषा की एक अत्यन्त लोकप्रिय तथा सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है और भारतीय भाषाओ में जितनी रामायणें उपलब्ध हैं, उनमे सबसे प्राचीन है । जनश्रुति के अनुसार कंबन का जन्म ईसा की नवी शताब्दी (कुछ लोग उनका जन्म बारहवी शताब्दी मे मानते हैं) मे हुआ था । उनकी भाषा अत्यन्त प्रवाहपूर्ण, ओजस्विनी तथा आलंकारिक है । वह तमिल की प्राचीन शैली का एक बहुत सुन्दर नमूना है। कवि ने अपनी रचना में संस्कृत तथा तमिल-अलंकारो और मुहावरों का प्रचुर मात्रा मे प्रयोग किया है। अतः, उसके अनुवाद के लिए एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो संस्कृत, तमिल और हिन्दी तीनों भाषाओ का अच्छा ज्ञान रखता हो तथा जो वैष्णव-संप्रदाय की विचारधारा से भी परिचित हो । सौभाग्य से इस कार्य के लिए हमें श्री न० वी० राजगोपालनजी मिल गये, जो संस्कृत में मद्रास-विश्वविद्यालय के शिरोमणि परीक्षोत्तीर्ण हैं, हिन्दी मे 'प्रवीण' हैं तथा तमिल का भी अच्छा ज्ञान रखते हैं। अभी हाल मे उन्होने तमिल में भी एम्० ए० की परीक्षा पास कर ली है । उनके अथक परिश्रम का ही यह फल है कि कंब रामायण का हिन्दी-अनुवाद हिन्दीभाषी जनता के संमुख उपस्थित किया जा रहा है।
एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद का कार्य साधारणतः कठिन होता है और किसी काव्य का अनुवाद करने मे तो यह कठिनाई और भी बढ़ जाती है। कंबन की भाषा नवीं शती की है और प्राचीन तमिल शैली की है, जिसे 'शेन् तमिल' कहते हैं। अनुवादक का लक्ष्य यह था कि जहाँतक हो सके, मूल का सौन्दर्य नष्ट न होने पाये और कंबन की वर्णन-शैली में फर्क न पड़े। स्वतंत्र अनुवाद करने से मूल की विशेषता नष्ट हो जाने का भय था। इसी कारण अनेक स्थानो में अनुवाद की भाषा उलझी हुई और अस्वाभाविक दिखाई देगी । पाठक इसके लिए क्षमा करेंगे ।
अबतक सम्पूर्ण कंब रामायण का अनुवाद किसी भी भाषा मे नही हुआ है । यह प्रसन्नता का विषय है कि ऐसे आदरणीय ग्रन्थ का अनुवाद प्रकाशित करने का सर्व-प्रथम गौरव राष्ट्रभाषा हिन्दी को प्राप्त हो रहा है। बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् भी बधाई का पात्र है, जिसने सर्वप्रथम इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ के प्रकाशन का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेकर उसे सफलतापूर्वक संपन्न किया है।
अवधनन्दन
भूमिका
तमिल-साहित्य ३००० वर्ष पुराना माना जाता है। ईसा-पूर्व चौथी शती तक उसमें काव्य, नाटक तथा गीति-साहित्य का विस्तृत प्रणयन हो चुका था। इस भाषा का सर्वप्रथम व्याकरण, जो 'तोलकाप्पियम्' के नाम से प्रसिद्ध है, ईस्वी-सन् पूर्व तीसरी शती में लिखा गया था। यह एक बृहदाकार लक्षण-ग्रन्थ है और अब उपलब्ध तमिल-ग्रन्थों में सबसे प्राचीन है। इस ग्रन्थ में तमिल-भाषा के व्याकरण के अतिरिक्त काव्य-पद्धतियों, छन्द, अलंकार एवं काव्य में वर्ण्य विषय-वस्तु (जिसे तमिल में 'पोरुल्' कहते हैं) का विशद विवेचन है। तमिल-व्याकरण में 'पोरुल्' के दो विभाग किये गये हैं—'अहम्' और 'पुरम्'। अहम् में शृंगार-रस का पोषण होता है, और 'पुरम्' में शृंगारेतर रसों का पोषण होता है, विशेष कर वीर रस का। अहम् और पुरम् मनुष्य के जीवन के अन्तरंग एवं बहिरंग पक्ष के प्रतिपादक हैं। यह विभाजन तमिल-काव्यशास्त्र की विलक्षणता है, जो अन्य किसी भाषा के साहित्य में प्राप्त नहीं होता।
तमिल-साहित्य का आदिकाल 'संघम् काल' के नाम से प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि साहित्य की अभिवृद्धि के लिए मदुरा के पांड्य राजाओं ने, एक के पश्चात् एक, तीन 'संघम्' स्थापित किये थे। अपने समय के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् एवं कवि इस संघम् के सदस्य होते थे। संघम् का कार्य कवियों की रचनाओं की समीक्षा करके उनपर प्रामाणिकता एवं श्रेष्ठता की मुहर लगाना होता था। संघम् द्वारा स्वीकृत रचनाओं को ही लोक में प्रतिष्ठा मिलती थी। यह विश्वास प्रचलित है कि इन तीनो संघमों में कुल ६५७ कवि-सदस्य बने थे और हजारों वर्ष तक इन संघमों ने कार्य किया था। इस काल के कुछ कवियों की रचनाएँ पृथक्-पृथक् पुस्तकों में संगृहीत हैं।
ईस्वी-सन् पूर्व तीसरी शती से ईसा की छठी शताब्दी तक तमिल-देश में जैन तथा बौद्ध धर्मों का विस्तार रहा। जैन तथा बौद्ध कवियों ने अनेक सुन्दर ग्रन्थ लिखे और उनके द्वारा अपने धर्म का प्रचार तथा तमिल-भाषा की सेवा की। ईसा की दूसरी और तीसरी शताब्दियों में तमिल में पाँच महाकाव्य रचे गये, जिनके नाम हैं—१ शिलप्पधिकारम्, २ मणिमेखलै, ३ जीवकचिन्तामणि, ४ वलयापति तथा ५ कुंडलकेशी। इनमें से प्रथम दो बौद्ध कवियों की रचनाएँ हैं और तमिल की विशिष्ट कला के परिचायक हैं। 'जीवकचिन्तामणि' किसी जैनकवि की रचना है। इसका छंद संस्कृत के वर्णवृत्तों पर आधृत है और अलंकार भी संस्कृत-साहित्यशास्त्र के अनुकूल बने हैं। अपने काव्य-सौन्दर्य के कारण यह ग्रन्थ अपने समय में बहुत लोकप्रिय बना था। 'कुंडलकेशी' और 'वलयापति'—ये दोनों काव्य अब अनुपलब्ध हैं।
ईसा की छठी शती से तमिल-देश में भक्ति का आन्दोलन जोर पकड़ने लगा और बौद्ध तथा जैनधर्मों का प्रभाव कम होने लगा। छठी तथा तेरहवीं शतियों के मध्य तमिलनाड में अनेक वैष्णव तथा शैव संत उत्पन्न हुए, जिन्होंने अत्यन्त सुन्दर काव्य-रचना
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के साथ-साथ विष्णु तथा शिव-भक्ति की पीयूष-धारा बहाई, जिसने दक्षिण भारत-मात्र को ही नहीं, वरन् सारे भारतवर्ष को प्रभावित किया और हिन्दू-जनता को मुक्ति का एक नवीन मार्ग दिखलाया । पीछे चलकर इन धाराओं ने हिन्दी-जगत् एव हिन्दी-साहित्य को भी आप्लावित कर दिया ।
वैष्णवधर्म के अनुयायी बारह सत हुए, जिन्हें 'आलवार' कहते हैं । आलवार शब्द, का अर्थ होता है 'ज्ञानी' । उन्होने भगवान् विष्णु को परम तत्त्व मानकर उनकी उपासना की और उनकी प्रशंसा मे सहस्रो सुन्दर तथा मधुर गीत गाये । इन गीतों की संख्या चार हजार है, जो तमिल में 'नालायिरप्रबन्धम्' या 'दिव्यप्रबन्धम्' के नाम से प्रसिद्ध हैं । श्रीमद्रामानुजाचार्य इन्हीं आलवारो द्वारा प्रतिपादित वैष्णव धर्म के अनुयायी थे ।
जिस समय वैष्णव संत भगवान् विष्णु को अपना आराध्य देव मानकर उनकी भक्ति का प्रचार कर रहे थे, प्रायः उसी समय शैव सत भगवान् शिव के गुणानुवाद मे अपनी अमृतमय वाणी को सफल बना रहे थे । इस मत में ६३ सत हुए, जिन्हें 'नायनमार' कहते हैं । इन्होने भगवान् शिव की प्रशंसा में हजारो ललित एवं गेय पद रचे, जो आज भी शिवभक्तो की अमूल्य निधि हैं । इनके द्वारा विरचित विपुल साहित्य बारह खंडो में विभाजित है ।
कंबन का स्थान तमिल-साहित्य मे अत्यन्त श्रेष्ठ है और वे कविचक्रवर्त्ती के नाम से प्रसिद्ध हैं । उनकी रचना 'रामायण', जो 'कंब रामायण' के नाम से प्रसिद्ध है, १० हजार से अधिक पद्यों का एक विशाल ग्रन्थ है ।
कंबन का समय निश्चित नहीं है । कुछ विद्वान् उन्हे ईसवी नवी शताब्दी का मानते हैं, किन्तु अधिक प्रामाणिक समय बारहवी शताब्दी है ।$^१$ इस समय तक बारह आलवार हो चुके थे और यामुन, रामानुज आदि आचार्यों की परम्परा भी चल पड़ी थी । इन आचार्यों ने भक्ति एव प्रपत्ति का शास्त्रीय विवेचन किया । कंबन वैष्णव थे, प्रमुख आलवार 'नम्मालवार' की उन्होंने प्रस्तुति की है और उनके काव्य में यत्र-तत्र इन आलवार की श्रीसूक्तियो की छाया दृष्टिगत होती है, तो भी कंबन ने अपने काव्य को केवल साम्प्रदायिक नहीं बनाया है । प्रो० टी० पी० मीनाक्षिसुन्दरम् के अनुसार कंब रामायण केवल वैष्णव सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं है । ग्रन्थालम्भ मे तथा प्रत्येक काड के आदि में मंगलाचरण के जो पद्य हैं, उनसे यह तथ्य प्रकट होता है । कवि ने परमात्मा का वर्णन शिव और विष्णु के रूप से भी अतीत, केवल सृष्टिकर्त्ता के रूप मे किया है । किन्तु, रामचन्द्र को उस परमात्मा का अवतार ही माना है ।
इसका परिणाम यह हुआ कि शैवों और वैष्णवो के मध्य 'कंब रामायण' का आदर हुआ और इन दोनों सम्प्रदायो मे जो वैमनस्य था, उसके दूर होने मे सहायता मिली ।
कंबन का जन्मवृत्त कुछ निश्चित ज्ञात नहीं हुआ है । उनके संबंध मे अनेक किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं, जिनकी प्रामाणिकता संदेहास्पद है । कवि ने कही भी अपना
१. प्रो० टी० पी० मीनाक्षिसुन्दरम्—(तमिल-विभागाध्यक्ष, अन्नामलै-विश्वविद्यालय) इसी को प्रामाणिक मानते हैं ।—अनु०
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परिचय नहीं दिया है, किन्तु उन्होंने अपनी रामायण मे तिरुवेण्णेयनल्लूर नामक ग्राम के 'शडयप्पवल्लजर' नामक एक दानी और यशस्वी व्यक्ति का उल्लेख कई स्थानो पर किया है। अनुमान किया जाता है कि इसी उदार व्यक्ति ने महाकवि कंबन को आश्रय दिया था, जिसकी कृतज्ञता मे महाकवि ने अपने काव्य में उस व्यक्ति का स्मरण किया है। यह ज्ञात होता है कि कंबन चोल और चेर राजाओ के दरबार मे गये थे, लेकिन अपनी महान् कृति को किसी राजा को अर्पित नहीं किया।
कंबन की रामायण तमिल-साहित्य की सर्वोत्कृष्ट कृति एव एक बृहद् ग्रन्थ है। १ तमिल, हिन्दी, अँगरेजी आदि के साहित्यो के बड़े विद्वान् श्री वी० वी० एस० अय्यर ने लिखा है कि 'यह (कब रामायण) विश्व-साहित्य में उत्तम कृति है, 'इलियड' और 'पैरेडाइस लास्ट' और महाभारत से ही नही, वरन् मूलकाव्य वाल्मीकि रामायण की तुलना मे भी यह अधिक सुन्दर है। यह केवल आदरातिरेक से कही हुई उक्ति नहीं है, वरन् अनेक वर्षों तक किये गये गहन अध्ययन से धीरे-धीरे पुष्ट हुआ विचार है।' २
कब रामायण वाल्मीकि रामायण का अनुवाद-मात्र नहीं है, उसका छायानुवाद कहना भी सगत नही है। कथानक-मात्र मूल से लिया गया है, लेकिन घटनाओं में सैकड़ों परिवर्त्तन किये गये हैं। प्रत्येक घटना के चित्रण में, परिस्थितियों को उपस्थित करने में, पात्रो के सम्भाषण में, प्राकृतिक दृश्यो के उपस्थापन में एवं पात्रो की मनोभावनाओं की अभिव्यक्ति मे कंबन ने पर्याप्त मौलिकता दिखलाई है। तमिल-भाषा की अभिव्यक्ति की दृष्टि से भी कंबन ने मौलिकता प्रदर्शित की है। छन्दोविधान में, अलकारों के प्रयोग में तथा शब्द-गुम्फन में अपूर्व सौन्दर्य प्रकट किया है। सीता-राम-विवाह, शूर्पणखा-प्रसंग, बालिवध, हनुमान् के द्वारा सीता-सदर्शन, इन्द्रजित् का वध, राम-रावण-युद्ध इत्यादि प्रसंगों में प्रत्येक अपनी विशिष्ट सुन्दरता के कारण अत्यन्त आकर्षक हुआ है। प्रत्येक प्रसंग अपने में सपूर्ण-सा लगता है, प्रत्येक मे काफी नाटकीयता है; प्रत्येक घटना का आरम्भ, विकास और परिसमाप्ति एक निश्चित क्रम से त्रिकसित होते हैं। यह शिल्प-विधान कंबन के काव्य की एक विशिष्टता है।
राम के चरित्र को कंबन ने जिस ढंग से चित्रित किया है, वह विशेष अध्ययन का विषय है। वाल्मीकि के सम्मुख यह प्रश्न था कि लोकोत्तर आदर्श पुरुष कौन हैं ? उन्हे 'पुरुषोत्तम' की खोज थी। नारद तथा ब्रह्मा से उन्हें ऐसे पुरुषोत्तम का परिचय प्राप्त हुआ। रामचरित का गान करके वाल्मीकि ने ससार के सम्मुख 'पुरुष पुरातन' की ही नही, अपितु एक 'महामानव' का चित्र उपस्थित किया था। कंबन के युग तक आते-आते वही आदर्श महामानव परमात्मा के अवतार के रूप मे प्रतिष्ठित हो चुका था। यह विश्वास दृढ हो गया था कि केवल राम-नाम का जप-मात्र अपवर्गप्रद हो सकता है। वैष्णव भक्ति का ज्यो-ज्यों प्रचार समाज में बढ़ा, त्यो-त्यो राम के प्रति आस्था अधिकाधिक बद्धमूल होती गई।
१. डॉ० आर० पी० सेतुपिल्लै, (तमिल-विभागाध्यक्ष, मद्रास-विश्वविद्यालय) का अँगरेजी लेख 'तमिल लिटरेचर'।
२. श्री वी० वी० एस० अय्यर : 'कव रामायणम्—ए स्टडी'।
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कंबन ने समयुगीन भावनाओं को भली भाँति पहचाना था। जनता की भक्तिपूत भावना के कारण राम के चरित्र में जो महत्ता और परम-परिपूर्णत्व उत्पन्न हो गये थे उन्हें इस कुशल कवि ने अपने काव्य के द्वारा परिपुष्ट कर दिया। यह कोई साधारण कार्य नहीं था। केवल यह कहते रहने से कि राम परमात्मा हैं या स्थान-स्थान पर दैवी विशेषणों को जोड़ते रहने से यह ज्ञान हो सकता है कि राम परमात्मा के अवतार हैं, किन्तु उससे पाठकों पर राम के चरित्र का मानवोचित प्रभाव पड़ना सम्भव नहीं है। रस-पोषण के मार्ग में इस प्रकार की पुनरुक्ति से बाधा पड़ने की सम्भावना है। राम के दैवी तत्त्व का साहित्यिक प्रभाव उत्पन्न करना, पूरे काव्य में सब प्रसंगों के मध्य उस दैवी तत्त्व का निर्वाह करना एव साथ ही मानव-जीवन की विविध सुख-दुःखात्मक परिस्थितियों के साथ उस दैवी तत्त्व की संगति बिठाना—यह एक अनन्यसुलभ प्रतिभावान् महाकवि का ही कार्य है। कंबन ऐसे ही कवि थे। कंब रामायण का कोई भी प्रसंग इसका प्रमाण हो सकता है।
कंबन ने बालकांड से युद्धकांड तक छह कांडों की रचना की। पौराणिकों के कारण अनेक प्रक्षेप भी इसमें जुड़ गये हैं। किन्तु इन प्रक्षेपों को पहचानना उतना दुष्कर नहीं है: क्योंकि कंबन की भाषा और प्रतिपादन की शैली विलक्षण होती है, उनका अनुकरण नहीं हो सकता। अब उपलब्ध ग्रन्थ में १०,०५० पद्य हैं। एक उत्तरकांड प्राप्त हुआ है, जो कंबन के समकालिक एक अन्य महाकवि 'ओट्टक्कूत्तन' - विरचित माना जाता है।
तमिलनाडु में ही नहीं, उसके बाहर भी धीरे-धीरे इस रामायण का प्रचार हुआ। तंजाउर जिले में स्थित तिरुपणन्दाल मठ की एक शाखा काशी में है। उस मठ में आज से तीन-साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व कुमारगुरुपर नामक एक तमिल संत रहते थे, जो तुलसीदासजी के समकालीन थे। वे नित्य प्रति संध्या के समय गंगा-तट पर कंब रामायण की व्याख्या हिन्दी में सुनाया करते थे। गोस्वामी तुलसीदासजी उन्हीं दिनों काशी में रामचरित-मानस की रचना कर रहे थे। दक्षिण के लोगों में यह विश्वास प्रचलित है कि तुलसीदासजी ने मानस लिखने में अनेक स्थलों पर कंब रामायण से प्रेरणा प्राप्त की थी। इस कथन की प्रामाणिकता निर्विवाद नहीं है। किन्तु, इतना तो सत्य है कि तुलसी और कंबन की कृतियों में कई घटनाओं में आश्चर्यजनक समानता दिखाई पड़ती है।^१
अनुवाद का काम अनेक कारणों से कठिन होता है। पद्यकाव्य का अनुवाद और भी बहुत श्रमसाध्य है। कंबन की कृति बारहवीं शताब्दी की तमिल-शैली में लिखी गई है, उसका आधुनिक हिन्दी में यह अनुवाद लगभग पाँच वर्ष के अध्यवसाय से सम्पन्न हो सका है। मूल की अभिव्यक्तिगत सौंदर्य को भाषांतर में उसी रूप में प्रस्तुत करना असम्भव है। कंबन के भावगत सौंदर्य की किंचित् झलक-मात्र सम्भव हो सकी है। तमिल-भाषा की एक विशेषता यह है कि उसमें मिश्रवाक्य की रचना नहीं होती। सभी सरल
^१ डॉ० एन० शङ्करराजुनायुडु (हिन्दी-विभागाध्यक्ष मद्रास-विश्वविद्यालय) का प्रबन्ध 'कंबन और तुलसी' पृ० १८७-१८० ।
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वाक्य होते हैं। पूर्वकालिक कृदन्तो के सहारे लम्बे-से-लम्बे वाक्य लिखे जा सकते हैं। हिन्दी मे ऐसा संभव नही है। हिन्दी में कृदन्त-विशेषण के द्वारा भूत और भविष्य काल को स्पष्ट नही किया जा सकता। इस कारण कंबन के कुछ लम्बे वर्णनो का अनुवाद यथामूल प्रस्तुत करने मे बड़ी कठिनाई का अनुभव हुआ।
मूल में अनेक वृक्षो, लताओ, पशुओ, पक्षियो और विविध वस्तुओ का उल्लेख आया है। कही-कहीं मछलियो की अनेक जातियों और स्वभाव का वर्णन आया है। युद्ध-वर्णन मे अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रो तथा विविध व्यापारो का वर्णन हुआ है। इन सबका हिन्दी-अनुवाद यथामूल उपस्थित करने की भरपूर चेष्टा की गई है, फिर भी हिन्दी में उपयुक्त शब्दो के न मिलने के कारण कही कुछ नये शब्द गढ़ने पड़े हैं, कही तमिल का ही नाम देना पड़ा है।
यदि इस अनुवाद से मूल के सौंदर्य की थोड़ी-सी झलक भी पाठक पा सकेगे, तो यह लेखक अपने को कृतार्थ समझेगा।
इस अनुवाद-कार्य मे कई विद्वानो के परामर्श मुझे प्राप्त हुए हैं। पं० अवधनन्दन ने पूरी पांडुलिपि को देखकर उसका संपादन किया और कई सुझाव देने की कृपा की। वे० सु० गोपालकृष्णाचार्य की कंब रामायण-व्याख्या बहुत उपकारक रही। समय-समय पर अनेक तमिल तथा हिन्दी-विद्वानो ने मुझे इस कार्य में मार्गदर्शन प्रदान किया है। इन सबके प्रति मै हृदय से धन्यवाद समर्पित करता हूँ।
बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् ने इस अनुवाद को प्रकाशित करने का भार अपने ऊपर लिया है। इससे न केवल राष्ट्रभाषा हिन्दी की, अपितु तमिल-भाषा की भी सेवा हो रही है। परिषद् को मेरे धन्यवाद हैं।
न० वी० राजगोपालन
ट
| अध्याय | विषय | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| अध्याय | १० | वन-प्रस्थान पटल | २६६ |
| ,, | ११ | गुह पटल | २७५ |
| ,, | १२ | पादुका-पट्टाभिषेक पटल | २८३ |
अरण्यकांड
| अध्याय | विषय | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| मंगलाचरण | २९६ | ||
| अध्याय | १ | विराध-वध पटल | २९६ |
| ,, | २ | शरभंग-देहत्याग पटल | ३०७ |
| ,, | ३ | अगस्त्य-पटल | ३१३ |
| ,, | ४ | जटायु-दर्शन पटल | ३१८ |
| ,, | ५ | शूर्पणखा पटल | ३२२ |
| ,, | ६ | खर-वध पटल | ३३६ |
| ,, | ७ | मारीच-वध पटल | ३५८ |
| ,, | ८ | सीताहरण पटल | ३८६ |
| ,, | ९ | जटायु-मरण पटल | ३९४ |
| ,, | १० | अयोमुखी पटल | ४१० |
| ,, | ११ | कबन्ध पटल | ४२० |
| ,, | १२ | शबरी-मुक्ति पटल | ४२६ |
किष्किन्धाकांड
| अध्याय | विषय | पृष्ठ | |
|---|---|---|---|
| मंगलाचरण | ४३१ | ||
| अध्याय | १ | पंपा पटल | ४३१ |
| ,, | २ | हनुमान् पटल | ४३६ |
| ,, | ३ | सख्य पटल | ४४१ |
| ,, | ४ | सालवृक्ष-छेदन पटल | ४४६ |
| ,, | ५ | दुंदुभि पटल | ४५२ |
| ,, | ६ | आभरण-दर्शन पटल | ४५३ |
| ,, | ७ | वालि वध पटल | ४५८ |
| ,, | ८ | शासन पटल | ४७५ |
| ,, | ९ | वर्षाकाल पटल | ४८० |
| ,, | १० | किष्किन्धा पटल | ४९३ |
| ,, | ११ | सेना-संदर्शन पटल | ५०८ |
| ,, | १२ | अन्वेषणार्थ प्रेषण पटल | ५१२ |
| ,, | १३ | बिल-निष्क्रमण पटल | ५२१ |
| ,, | १४ | मार्ग-गमन पटल | ५२६ |
| ,, | १५ | संपाति पटल | ५३४ |
| ,, | १६ | महेन्द्र-शैल पटल | ५४१ |
कंब रामायण
बालकांड
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मंगलाचरण
काव्य-पीठिका
हम उस भगवान् की ही शरण में हैं, जो समस्त लोको का सर्जन, उनकी रक्षा और उनका विनाश—ये तीनो क्रीडाएँ निरंतर करता रहता है ।
बड़े-बड़े आत्मज्ञानी भी उस परमात्मा के पूर्ण स्वरूप को नही जान सकते, उस परमात्मा (के तत्त्व) को समझाना मेरे जैसे (मंदबुद्धि) व्यक्ति के लिए असंभव है; फिर भी शास्त्रो में प्रतिपादित त्रिगुणो (सत्त्व, रज और तम) मे—जिनका प्रतिरूप बनकर वह परमात्मा त्रिमूर्त्ति के रूप में प्रकट हुआ, उनमें से प्रथम गुण के स्वरूप (विष्णु) भगवान् के कल्याणकारक गुणों के सागर में गोते लगाना तो उत्तम ही है।
जिन ज्ञानियों ने आरंभ तथा समाप्ति में 'हरि: ॐ' कहकर नित्य और अनन्त वेदो को अधिगत (प्राप्त) कर लिया है और जो अपने परिपक्व ज्ञान के कारण संसार-त्यागी बन चुके है, वे महानुभाव उस (विष्णु) भगवान् के उन चरणो को, जो सन्मार्ग पर चलनेवाले भक्तों के उद्धारक हैं, छोड़कर अन्य किसी से प्रेम नहीं करते।
अकलंक विजयश्री से विभूषित (श्रीरामचन्द्र) के गुणो का वर्णन करने की अभिलाषा मैं कर रहा हूँ; यह ऐसा ही है, जैसा कि कोई बिल्ली, घोर गर्जन करनेवाले ऊँची तरंगों से भरे क्षीरसागर के निकट पहुँचकर उसके समस्त क्षीर को पी जाने की अभिलाषा करे।
अभिशाप¹ की वाणी से (उस दिन) सप्त तालवृक्षो को एक साथ भेदन कर देनेवाले (श्रीराम) की महान् गाथा आविर्भूत हो गई थी; उस गाथा को मधुर काव्य के रूप में कहनेवाले (वाल्मीकि) की वाणी जिस देश में सुस्थिर हो चुकी है, वही मैं भी अपने (अर्थगांभीर्य-हीन) सरल तथा दुर्बल शब्दों में दूसरा काव्य रचना चाहता हूँ—यह भी कैसा (बुद्धिहीन) प्रयास है।
१. क्रौंच को मारनेवाले व्याध के प्रति वाल्मीकि के मुँह से जो अभिशाप-वचन निकल पडा था, वही रामायण का प्रथम मंगलाचरण भी हुआ।
२ कंब रामायण
(मेरी इस मूर्खता पर) संसार मेरा उपहास करेगा और इससे मेरा अपयश होगा, फिर भी मैं रामचरित का गान करने लगा हूँ; इसका प्रयोजन यही है कि सत्यज्ञान तथा अलौकिक प्रतिभा से संपन्न (वाल्मीकि महर्षि) के दिव्य काव्य का महत्त्व और भी अधिक प्रकट हो।
जिन (सहृदय व्यक्तियों) के कान विविध प्रकार की रसमय कविता सुनने के आदी हो चुके हैं, उन्हें मेरी कविता उसी प्रकार (कर्कश) लगेगी, जिस प्रकार 'याल्'¹ (वीणा) के मधुर स्वर को सुनते हुए मुग्ध हो खड़े रहनेवाले अशुण² के कानों में 'पटह' (चमड़े के ढोल) की ध्वनि लगे।
(काव्य, नाटक और संगीत-रूपी) त्रिविध तमिल-वाङ्मय का जिन्होंने भली भाँति अध्ययन किया है, उन उत्तम विद्वानों और कवियों से मैं निवेदन करना चाहता हूँ—"क्या उन्मत्तों के वचन, मंद बुद्धिवालों के वचन तथा भक्तजनों के वचन, इनकी परीक्षा करना उचित हो सकता है?"
बालक (खेलते समय) धरती पर घरौंदे बनाते हैं, जिन में कोठरियाँ, आँगन, नृत्यशाला आदि स्थानों को कुछ टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं से दिखाने की चेष्टा करते हैं (उन्हें देखकर) क्या कुशल कारीगर (उन घरौंदों के शिल्प-शास्त्र के अनुकूल न होने से) क्षुब्ध होंगे? किंचित् भी काव्य-ज्ञान से रहित मैं, जो यह क्षुद्र काव्य रचने लगा हूँ, इस पर क्या मर्मज्ञ विद्वान् क्रुद्ध होंगे?
देववाणी (संस्कृत) में जिन तीन महापुरुषों³ ने रामायण की रचना की है, उनमें प्रथम कवि वाग्मी (वाल्मीकि) महर्षि की रचना के अनुसार ही मैंने तमिल-पद्यों में यह रामायण रची है।
धर्म-रक्षा के लिए, परम पुरुष ने जो अवतार लिये थे, उनमें से रामावतार का वर्णन करनेवाला यह प्रसिद्ध काव्य 'शडैयप्प वल्लल'⁴ के ग्राम 'तिरुवेण्णेय नल्लूर' में निर्मित हुआ। (१-११)
१ 'याल्' एक प्रकार की वीणा। प्राचीन तमिल-साहित्य में याल् का प्रायः उल्लेख हुआ है। यह माना जाता था कि याल् का स्वर सुनकर हिरन मन्त्रमुग्ध-सा हो जाता था और उसके बाद पटह की कर्कश ध्वनि का वह सहन नहीं कर सकता था और कभी-कभी वैसी ध्वनि सुनने पर अपने प्राण भी छोड़ देता था।
२ हिरन की एक जाति।
३ संस्कृत के तीन रामायणकर्त्ता हैं—वाल्मीकि, वसिष्ठ और बोधायन। कुछ विद्वान वसिष्ठ के स्थान पर व्यास का नाम लेते हैं, जिन्होंने 'अध्यात्मरामायण' की रचना की थी। कंब ने भी कई स्थानों में अध्यात्मरामायण का अनुसरण किया है।
४ शडैयप्प वल्लल एक धनी और उदार व्यक्ति थे। उन्होंने महाकवि कंबर को आश्रय दिया था। यद्यपि बाद को महाकवि कंबर चोलराजा के आश्रय में भी रहे थे, तथापि अपने प्रथम आश्रयदाता का हृदयंगम कृतज्ञता के साथ उन्होंने इस ग्रन्थ के आरंभ में कई स्थानों में किया है।
अध्याय १
नदी पटल
[ कोशल देश का वर्णन करने के लिए प्रस्तुत होकर कवि पहले उस देश को हरा-भरा करनेवाली सरयू नदी का वर्णन कर रहा है । ]
कोशल देश में, जहाँ बड़े ही अपराधकर्मी (पुरुषों की ) पंचेन्द्रिय-रूपी बाण एवं रत्नहारों से विभूषित युवतियों के कटाक्ष-रूपी बाण—ये दोनों सन्मार्ग की सीमा को लाँघ-कर कभी नहीं चलते, उस समस्त भूप्रदेश को सुशोभित करती हुई सरयू नदी बहती है।
भस्मधारी (शिव) के रंगवाले मेघ ने, गगनमार्ग से चलकर, समुद्र के जल का पान किया और (जल पीकर ) वक्ष पर लक्ष्मी को धारण करनेवाले विलक्षण कांतिपूर्ण विष्णु का रंग पाकर लौटा।
मेघ उमड़कर उठा और हिमाचल के ऊपर छा गया; मानो सागर ही, यह सोचकर कि शिवजी का ससुर यह (हिमाचल) पर्वत सूर्यातप से संतप्त हो रहा है और उस ताप से उसकी रक्षा करनी चाहिए, हिमाचल पर फैल गया हो।
मेघ ने जलधाराएँ क्या बरसाई, एक महान् दाता के सदृश अपनी समस्त संपत्ति को ही लुटा दिया। (वह दृश्य ऐसा था कि) आकाश ने जब देखा कि यह भारी हिमाचल¹ (पर्वत) स्वर्णमय है, तो उस सोने को खोदकर निकालने के उद्देश्य से अपने चाँदी के बने हथौड़े उस पर मार रहा हो।
वर्षा के जल की धारा बड़े वेग से धरती पर प्रवाहित हो चली और उसने सर्वत्र शीतलता उत्पन्न कर दी, मानो मनु के उपदिष्ट धर्म-मार्ग पर चलनेवाले किसी प्रजावत्सल और गौरव-संपन्न राजा की कीर्त्ति ही सर्वत्र फैल रही हो, अथवा चतुर्वेदों को पूरा अधिगत किये हुए ब्राह्मण के हाथ में प्रदत्त दान (का यश) हो।
हिमाचल के ऊपर से वर्षा की धारा प्रबल वेग के साथ नीचे बह चली और किसी रूपाजीवा (वेश्या) नारी के समान वह (पर्वत की) शिखा, हृदय तथा पाद से संलग्न होती हुई उसकी सीमा से बाहर चली गई : क्षण-भर के लिए वह पर्वत से लगी रही; परन्तु दूसरे ही क्षण वहाँ की सभी वस्तुओं को अपने साथ बहाकर आगे बढ़ गई।
वर्षा का प्रवाह हिमाचल के रत्न, मोर-पंख, हाथियों के दाँत, स्वर्ण, चन्दन आदि अमूल्य पदार्थों को समेटकर ले चला, जिससे वह वाणिज्य करनेवाले व्यक्ति की समानता करने लगा।
वह प्रवाह कभी रंग-बिरंगे पुष्पों से भर जाता : कभी मृदु मकरंद उस पर छा जाते; कभी मधु धारा, कभी हाथियों का मदजल और कभी लोहित धातु उसमें मिले
१. प्राचीन तमिल-साहित्य में हिमाचल और मेरु पर्वत दोनों को कभी-कभी एक ही माना गया है. अतः यहाँ हिमाचल को (मेरु के जैसे) सोने का पहाड़ कहा गया है।
४ | कम्ब रामायण
दिखाई पडत । यो अपने इन विविध रंगों के कारण यह (प्रवाह) गगन पर चमकनेवाले इन्द्र-धनुष की-सी शोभा दिखाने लगा।
वह प्रवाह कभी बड़े-बड़े प्रस्तर-खंडो को लुढकाता हुआ, कभी गगनचुम्बी वृक्षो को उखाड़ता हुआ और कभी अपने समीप-स्थित पत्र-शाखा जैसी सभी वस्तुओ को उठाये हुए चल रहा था, वह प्रवाह भी क्या था ? जब श्रीरामचन्द्र समुद्र पार करके लंका मे पहुँचना चाहते थे, तब (वह प्रवाह) हिल्लोलों से भरे हुए समुद्र में सेतु बाँधने का आयोजन करनेवाली वानर-सेना ही जान पड़ता था। (अर्थात्, पत्थरो तथा वृक्षो से भरा हुआ वह प्रवाह समुद्र पर पुल बाँधनेवाली वानर-सेना के सदृश दीखता था।)
उसके मीठे जल पर भँवरो और मक्खियो का झुण्ड मँडराता हुआ दिखाई पड़ता था, वह प्रवाह किनारो को लाँघकर उद्दाम उमंग के साथ बह चला; उसका अन्तर भाग स्वच्छ नहीं था ओर (वह) सागुवान¹ के बड़े-बड़े वृक्षों को गिराता हुआ दौड़ा जा रहा था, जैसे कोई मद्यप डकार लेते हुए भागा जा रहा हो।
उस प्रवाह मे बड़े-बड़े मृग थे, भारी मुखवाले मत्त गज थे; वह भयकर कोलाहल करता हुआ अपने आगे-आगे ध्वजाओ के समान बहुत-सी लताओं² को बहाता चला जा रहा था, (इन सबसे वह प्रवाह) ऐसा लगता था, मानो समुद्र पर चढ़ाई करने के लिए कोई बड़ी सेना को साथ लिये जा रहा हो।
[वर्षा-प्रवाह का वर्णन करने के पश्चात् अब कवि सरयू नदी का विशेष वर्णन करता है।]
क्षुब्ध जलधि से परिवृत इस धरती पर जीवन धारण करनेवाले जो प्राणी हैं, उनके लिए सरयूनदी मातृस्तन्य-सदृश है। सूर्यवंश के नरेश जिस महान् सद्धर्म का पालन अनादि काल से करते आ रहे थे, उसी धर्म का पालन वह नदी भी कर रही है।
सरयू की धारा, कोशल देश की रमणियों के बनाये सुगन्धपूर्ण, कुंकुम, केसर, कोष्ठ (एक सुगंधित द्रव्य), इलायची, शीतल चंदन, सिन्दूर, नागरमोथा, गुग्गुल, मोम आदि पदार्थो के मिलने से बहुत ही सुगंधित रहती है। (जब स्त्रियाँ नदी में स्नान करती थीं, तब ये वस्तुएँ उसके प्रवाह मे मिल जाती थी और नदी का जल सुगन्धित हो जाता था।)
सरयू की बाढ़, अपने जल-रूपी बाणो के कारण, आसपास रहनेवाले व्याध लोगो के छोटे-बड़े गाँवो मे बड़ी हलचल मचा देती है। वह व्याध-नारियों को अपनी छाती पीटकर रोते-कलपते हुए भागने पर बाध्य कर देती है। ऐसे समय में वह नदी शत्रुओं के लिए भयकर (किसी) वीर नरेश की सेना का दृश्य उपस्थित करती है।
¹ मद्यप और जल-प्रवाह दोनो के समान विशेषण दिये गये हैं। सागुवान पेड को तमिल मे 'तेवकु' कहते है। इस शब्द को क्रिया के रूप मे रखने पर दूसरा अर्थ निकलता है। 'डकार लेते हुए', मद्यप के पक्ष मे, यह अर्थ संगत होता है।
² तमिल मे 'कोडि' शब्द का अर्थ होता ह 'लता'। शब्दश्लेष से उसका दूसरा अर्थ 'ध्वजा' भी होता है। मूल मे इस शब्द का प्रयोग करके कवि ने बड़ा चमत्कार दिखाया है।
बालकाण्ड ५
वह नदी, किनारे के छोटे-छोटे गाँवों में से, जमा हुआ गाढ़ा और सुगंधित दही, दूध, मक्खन और घी को छींकों के साथ ही उठा ले जाती है (वहा ले जाती है), कदंब-वृक्षों को गिरा देती है; हिरनी के समान भीरू नयनवाली ग्वालिनों के दुकूल बहा ले जाती है। प्रबल वेग से बहती हुई वह नदी, कालिय नाग पर, जो अपने फनों और धारियों से भयंकर लगता है—नाचनेवाले कृष्ण की समानता करती है।
सरयू का वह प्रबल प्रवाह अपने मार्ग में (बाँधों) के किवाड़ों को ढकेलकर आगे बढ़ जाता है; कृषक उसे देखते ही आनन्दित हो जाते हैं और हाथ उठा-उठाकर आनन्द-रव करने लगते हैं, नदी का पूरा भरा हुआ अग्रभाग किनारों से उमड़ता हुआ आगे बढ़ जाता है, उसके ऊपर भौंरे झुण्ड-के-झुण्ड मँडराते जाते हैं; वह यत्र-तत्र मोतियों और रत्नों को बिखेर देता है, बाढ़ को रोकने के लिए जहाँ-तहाँ गड़े हुए खूंटों को वीचि-रूपी अपने विशाल हाथों से उखाड़ता हुआ, लहलहाते हुए खेतों से भरे 'मरुदम्' १ (कहलाने-वाले) प्रदेश में ऐसे आ पहुँचता, जैसे कोई मत्तगज मदजल बहाता हुआ आया हो।
हिमाचल के ऊपर से आया हुआ वह प्रवाह, पर्वत (कुरिंजि) के पदार्थों को पर्वत की तलहटी पर के अरण्य (मुल्लै) प्रदेश में बहा ले जाता है और अरण्य के पदार्थों को खेतों और बगीचों से भरे हुए (मरुदम्) प्रदेश में लाकर फैला देता है तथा समुद्री तट (नेयदल) प्रदेश को अपनी उपजाऊ मिट्टी के द्वारा लहलहाते खेतों में परिवर्तित कर देता है। इस प्रकार, वह पर्वत अरण्य, खेतों आदि की वस्तुओं को अपने-अपने स्थानों से हटा-हटाकर दूसरे स्थानों पर रख देता है। देव, मनुष्य, पशु-पक्षी तथा स्थावर—इन चार प्रकार की योनियों में भ्रमण करते रहनेवाले प्राणियों के साथ जिस प्रकार उनके संचित कर्म (पाप और पुण्य) लगे चलते हैं और उन्हें भिन्न-भिन्न योनियों में उत्पन्न होने के लिए बाध्य करते हैं, उसी प्रकार यह नदी भी विभिन्न भू-प्रदेशों के पदार्थों को स्थानान्तरित करती हुई आगे बढ़ती है।
नदी की बाढ़ को बढ़ते हुए देखकर कृषकजन आनन्दित हो उठते हैं और 'पटह' २ बजाकर उसकी सूचना देते हैं। वह नदी अपनी वीचियों से जल-बिंदुओं तथा स्वर्ण और मोतियों को बिखेरती हुई, धरती को चीरती हुई, नालों की शाखा-प्रशाखाओं में बँटकर बहती हुई इस प्रकार दौड़ चलती है, जिस प्रकार किसी पुण्यवान् मनुष्य की वंशावली विभक्त होकर विकसित हो रही हो।
सरयू का प्रवाह हिमाचल पर उत्पन्न हुआ; वहाँ से चलकर वह समुद्र में जा मिला। वह आरंभ में एक ही रहा, परन्तु धीरे-धीरे असंख्य नालों, नहरों, तालाबों और
१. तमिल-लाक्षणकार भूमि को पाँच प्रकारों में विभाजित करते हैं— (१) कुरिंजि—पार्वतीय प्रदेश, (२) मुल्लै—अरण्य-प्रदेश, (३) मरुदम्—नदियों के जल से सिंचित समतल प्रदेश, (४) नेयदल—समुद्री तट और (५) पालै--वालूमय प्रदेश या मरूभूमि ।
२. प्राचीन तमिल देश में नहरों और नालों की रखवाली करने के लिए 'मल्ल' नामक लोग नियुक्त थे; नदी में जब पानी आता था, तब वे पटह-वाद्यों को बजाकर लोगों को सूचना देते थे, जिससे तट पर के गाँवों के लोग सूचना पाकर सावधान हो जाते थे।
| ८ | कम्ब रामायण |
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रूपों में बँट गया ; अनन्त वेदों के द्वारा प्रतिपाद्यमान जो अप्रमेय परब्रह्म है, वह एक और अद्वितीय होकर भी विभिन्न मतवादियों के सिद्धान्तों के द्वारा बहुधा प्रतिपादित है और तद्विषयक ज्ञान अनेक मतों में विभक्त हो गया है। उसी प्रकार सरयू नदी भी अनेक धाराओं में विभक्त हो गई है।
सरयू का प्रवाह मकरन्द उगलनेवाले उपवनों में, घने बग़ीचों में, कमल-भरी वापियों में, सुगन्धिमय तड़ागों में, मछली-सदा-कूँदों से भरे प्रचुर (पुष्कल) वनों में, एवं लहलहाते खेतों में, सर्वत्र होता बह चला, जैसे प्राणियों के नाना प्रकार के शरीरों में प्राण बहा करता है। (१-२०)
अध्याय २
कोशलदेश पटल
महर्षि वाल्मीकि ने अतिपरिष्कृत और सुन्दर श्लोकों में रामायण की रचना की है, जो देवताओं के लिए भी कर्णामृत के समान है। उस काव्य में वर्णित कोशल देश की महिमा, प्रेम से विवश होकर मैं गा रहा हूँ; किन्तु यह कार्य मेरे लिए वैसा ही दुष्कर है, जैसा गूँगे व्यक्ति के लिए बोलने का प्रयास करना।
वह कोशल देश बड़ा ही वैभवपूर्ण है; वहाँ के खेतों की मेड़ों पर मोती और शंखों के ढेर के झुंड बिखरे रहते हैं; तीव्र जल-धाराओं के किनारों पर सोने के ढेले पड़े रहते हैं; उन गर्तों में जहाँ भैंसें गोता लगाये पड़ी रहती हैं, कमलों के रक्त-पुष्प बड़े ही सुन्दर दृश्य उपस्थित करते हैं; जोतने के उपरान्त जब खेत समतल बना दिये जाते हैं, तब वहाँ मणियाँ चमकने लगती हैं; इतना ही नहीं, शालि-धान के खेतों में जहाँ निरन्तर जल का निकास होता रहता है, हंस आकर विश्राम करने लगते हैं; गन्ने के खेतों में रसभरा लाल-लाल मीठा मधु बहता रहता है और पुष्प-वाटिकाओं में झुण्ड-के-झुण्ड भौरें मँडराते रहते हैं।
वहाँ जीवन का कोलाहल खूब सुनाई पड़ता है: एक ओर गन्ने पेरने से ईख का रस, झरने के जल के समान, शब्द करता हुआ प्रवाहित होता है, तो दूसरी ओर नदियों के तट पर रहनेवाले शंख-कीटों के बोलने की ध्वनि सुनाई पड़ती है: एक ओर बड़े-बड़े बैल आपस में टकराकर बड़ा क्षोभ उत्पन्न करते हैं, तो दूसरी ओर तालाबों में महाकाय भैंसों के उतरने से उत्ताल-तरंग का शब्द होता है। इस प्रकार, नाना प्रकार की ध्वनियों का एक विचित्र कोलाहल उस 'मरुदम्' प्रदेश में सदा होता रहता है।
लहलहाते खेतों और सुन्दर वृक्षों का वह प्रदेश भी वैसा गंभीर है, मानो कोई राजा दरबार में सिंहासन पर आसीन हों और उसके सामने भाँट नाच रहे हों; कमल-कलिकाएँ दीप लिये खड़ी हों; मेघ मर्दल बजाते हों, भ्रमर गुंजार करके मधुर वीणा का नाद सुनाते हों, नदी के जल पर उठ-उठकर थिरकनेवाली चंचल लहरें यवनिका का दृश्य उपस्थित
बालकाण्ड ७
करती हो और कुवलय-पुष्पों का समुदाय अपने विशाल नयनों (पंखुड़ियों) को खोलकर इस सुमधुर दृश्य को मंत्र-मुग्ध होकर देखता खड़ा है।
वहाँ के विकसित कमल-पुष्पों पर भ्रमर तथा लक्ष्मी देवी विश्राम करती हैं, पुष्पमालाओं से अलंकृत रसिक-जनों पर रमणियों के कटाक्ष तथा कामदेव के बाण आह्वान करते हैं; बड़ी-बड़ी मेघराशियों से गिरनेवाली जलधाराएँ प्रवाल तथा मोतियों की संपदा उत्पन्न करती हैं; वहाँ के निगमियों की जिह्वा पर सदा सत्यवचन तथा शास्त्र-चर्चा निवास करती है।
शंख-कीट तालाबों में (निर्भय होकर) विश्राम करते हैं, (क्योंकि) भैंसे (उन्हें कष्ट न देकर) वृक्षों की शीतल छाया में विश्राम कर रही हैं; भ्रमर (नगर-निवासिनियों की पुष्पमालाओं पर) विश्राम करते हैं (क्योंकि) लक्ष्मी देवी कमल-पुष्प पर विश्राम कर रही हैं; सीपियाँ (खेत की) मेड़ों पर विश्राम करती हैं; (क्योंकि) कछुए कीचड़ में विश्राम कर रहे हैं; हंस धान के अग्रभागों पर विश्राम करते हैं; (क्योंकि) मोर (उन्हें कष्ट न देकर) उपवनों में विश्राम कर रहे हैं।
(उस देश के वैभव की कितनी प्रशंसा करूँ?) वहाँ खेतों में हल जोतने पर सोना निकल पड़ता है, उसको समतल बनाने पर रत्न बिखर जाते हैं; शंख मोती उगलते हैं; धान की सुनहली बालियाँ हैं; मछलियाँ हैं और कोमल पत्तेवाले गन्ने हैं; भ्रमरों, कमल-पुष्पों एवं कृषकों के हर्षोत्फुल्ल मुखों से परिपूर्ण वह देश कितना नयनाभिराम है?
प्रभात के समय मधुर स्वरवाले 'याल्'-वाद्य (एक प्रकार की वीणा) को हाथ में लेकर, मृदंग की ध्वनि के साथ जब मधु-पान से मस्त गवैये गाने लगते हैं, तब उस संगीत-लहरी को सुनकर रजत-प्रासादों में, सुनहली धूप की छटा बिखेरनेवाले स्वर्ण-पर्यंकों पर निद्रामग्न मयूर-पंख के जैसे नयनवाली तरुणियाँ, जाग उठती हैं।
वहाँ एक ओर कोल्हुओं से गन्ने का रस निर्झर के रूप में बहता है, तो दूसरी ओर नारियल के कटे हुए घौंदों से मीठा रस प्रवाहित होता है। कहीं उपवनों में पके हुए फलों का मीठा रस चू रहा है, तो कहीं पुष्पों से मकरन्द झरकर नीचे गिर रहा है। ये सभी रस मिलकर, लहराती हुई धारा बनकर, जब समुद्र में जा गिरते हैं, तब समुद्र के मीन उन रसों को पीकर मस्त हो जाते हैं।
मधु पीकर मस्त हुए कृषक लोग खेत निराने जाते हैं; वहाँ वे खेतों में पौधों के साथ उगे हुए कमल, कुमुद आदि पुष्पों में, मधुर स्वरवाली कृषक-बालाओं के नयन, कर, चरण आदि अंगों की छटा देखते हुए निराना भूल जाते हैं और यों ही इधर-उधर फिरते रहते हैं। नीच जन जब स्त्रियों पर आसक्त हो जाते हैं, तब उस आसक्ति को किसी भी अवस्था में नहीं छोड़ते।
वहाँ की रमणियों के सौन्दर्य का क्या कहना? उनके मधुर स्वर, मनोहर कटाक्ष, जो कटार के जैसे पैने हैं, पुरुषों के मन को हर लेते हैं; उनकी विद्युत् की-सी छटा अवर्णनीय है, उनके केश पुष्प, कस्तूरी आदि सुगंधित द्रव्यों से सुवासित हैं; जब वे नदियों में स्नान करती हैं तो नदी का जल उनके केशों की सुगंधि से सुवासित हो जाता है;
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तना ही नहीं, जब वह जल समुद्र में जाकर गिरता है, तब सारे समुद्र की दुर्गन्ध को अपनी उस सुगंधि से मिटा देता है।
यहाँ पुरुष अतिरूपवान् हैं, उनके कानों और अन्य अंगों में कुण्डल आदि आभूषण शोभा देते हैं, उनके शरीर चन्दन, कर्पूर आदि से लिप्त रहते हैं; जब वे नदियों में स्नान करते हैं, तब नदियाँ उन सुगंधित द्रव्यों से भर जाती हैं और जिन खेतों को वे सींचती हैं, उनकी मिट्टी भी सुवासित होकर कर्पूर आदि की गंध बिखेरती है, जिस कारण से भौंरों के झुण्ड सदा उस मिट्टी पर ही मँडराते रहते हैं।
मीन के समान नेत्रवाली कृषक-बालाओं के पीछे-पीछे राजहंसिनियाँ, उनकी चाल का अनुकरण करती हुईं, भटक जाती हैं, तो कमल की सेज पर सोये हुए अपने बच्चों को भी भूल जाती हैं; हंस-शिशु निद्रा से उठकर भूख से चिल्ला उठते हैं, उन्हें देखकर भैंसों को अपने बछड़ों की याद आ जाती है और उनके स्तनों से दूध स्रवित होने लगता है, उस दूध को पीकर हंस-शिशु तृप्त हो जाते हैं, फिर हरे-हरे मेंढक लोरियाँ गाकर उन्हें सुला देते हैं।
वहाँ के उद्यानों में कहीं कोयल का जोड़ा, एक दूसरे को प्यार करता हुआ बैठा है; कहीं सुन्दर मयूर नाच रहे हैं; उन उद्यानों की शोभा, विशालनयन नर्तकियों की नृत्यशालाओं के लिए भी शृंगार है; प्रातःकाल के समय, मधुपान से मत्त भ्रमर भी संध्या-गीत गा उठते हैं (प्रभात-गीत गाने की सुध उन्हें नहीं रहती) : पद्म-पर्यंको में सोये हुए राजहंस उस ध्वनि को सुनकर अचानक जाग उठते हैं।
कोशल देश के निवासी मनोविनोदों में अपना समय व्यतीत करते हैं। कहीं सभी गुणों से सम्पन्न अपने-अपने योग्य सुन्दरियों के साथ युवक विवाह-संबंध करते हैं; कहीं लोग चील के साथ उड़नेवाली परछाईं के जैसे संगीत का रसास्वादन करते हुए मस्त होते हैं (अर्थात, संगीत साहित्य का उसी प्रकार अनुसरण करता है, जिस प्रकार छाया उड़नेवाले पक्षी का अनुसरण करती है), कहीं रसिकजन अमृत से भी श्रेष्ठ काव्य-माधुर्य का पान करने में संलग्न हैं; कहीं अतिथि-सत्कार हो रहे हैं, जहाँ गृहस्थजन अतिथियों की मुखाकृति को देखकर ही उनके मनोभाव समझ लेते हैं और उन्हें उचित उपचार से संतुष्ट कर आनन्द प्राप्त करते हैं।
कहीं लोग एकत्र होकर मुर्गों का युद्ध देखते हैं, पूर्व-वैर न होने पर भी, ये कुक्कुट एक दूसरे पर बड़ा क्रोध दिखाते हैं, उनके मन में रोष भरा है, सिर पर की कलँगी उनकी लाल-लाल आँखों से भी अधिक रक्तिम होकर चमकती है, टाँगों में बँधी छोटी-छोटी पेनी छुरियों से वे एक दूसरे पर चोट करते हुए अमन्द उत्साह से घनघोर युद्ध करते हैं, वे कुक्कुट यदि अपने वीरता-पूर्ण जीवन में कोई कमी रखते हैं, तो यही कि वे जीवन की सार्थकता को नहीं पहचानते।
कहीं लोग भैंसों को लड़ाकर उसका तमाशा देखते हैं, लाल आँखवाले वे भैंसे बड़े रोष के साथ एक दूसरे पर आघात करते हैं और एक दूसरे को ढकेलने की चेष्टा करते हैं; ऐसा प्रतीत होता है, मानो विश्व के नाना पदार्थों को एक रूप बना देनेवाला घोर
बालकाण्ड ९
अंधकार अत्र दो पक्षों में विभक्त होकर इन भैसों के भयंकर रूप में आ गया हो और लड़ रहा हो; उस युद्ध को देखनेवाले दर्शक जब प्रसन्नता से अट्टहास कर उठते हैं और सिर हिलाने लगते हैं, तब उनके सिर के फूलों पर बैठे हुए भ्रमर गूँजते हुए उड़ जाते हैं वहाँ जो कोलाहल होता है, उसका शब्द मेघ-मंडल तक गूँज उठता है।
किसान खेतों को हल से जोतते हैं, वे बड़े-बड़े बलवान् बैलों को जोर-जोर से हाँक लगाते हुए ललकारते हैं; उनकी ललकारों की गंभीर ध्वनि से कमल के नाल टूट-टूटकर गिर जाते हैं; मोती और सोना धरती से फूट निकलते हैं; मणियाँ बिखर जाती हैं : ‘चलंचल’ नामक सीप मुँह खोलकर रो उठते हैं; हल की धारियों में तैरती हुई मछलियाँ छटपटाती हुई उछल पड़ती हैं; कछुए अपने पैरों और सिर को अपने पेट में समेटकर निःस्तब्ध हो पड़ जाते हैं और मीन खेतों से भागकर नालों के गहरे जल में छिप जाते हैं।
बड़ी-बड़ी नौकाएँ, जो अमूल्य वस्तुओं को लेकर विदेशों में गई थीं और वहाँ अपने बोझ उतारकर वापस लौट आई हैं, समुद्र-तट पर पड़ी हैं, मानो भारी बोझ ढोने से दुखती हुई अपनी लंबी पीठ को आराम दे रही हों। ये नौकाएँ भी उस पृथ्वी के ही समान दीखती हैं, जो मनु-नीति का अनुसरण करनेवाले, उचित स्थान पर क्रोध दिखानेवाले, दंड का भी उचित प्रयोग करनेवाले, इच्छारहित, धर्मज्ञ और प्रजावत्सल राजा के द्वारा सुरक्षित होने के कारण पाप-भार से मुक्त हो गई हो।
धान की कटी बालियों का ढेर आसमान को छूता हुआ पड़ा हैं : कृषक लोग, (हाँकनेवाले के) संकेतों को समझकर चलनेवाले बैलों के द्वारा उन बालियों की दौनी करके धान निकाल लेते हैं; दरिद्रों को दान देने के बाद बचा हुआ धान गाड़ियों में लादकर अपने घर ले जाते हैं, जिससे अतिथियों तथा कुटुम्ब के संग वे भरपेट भोजन कर सकें। गाड़ियाँ जब धान लादकर चलती हैं, तब भार के मारे पहिये धँस जाते हैं, मानों धरती भी उस बोझ के आगे अपनी पीठ मरोड़ रही हो।
उस देश में सभी आवश्यक पदार्थ उपजते हैं; धान के खेतों में धान, महँकते बागों में पके फल, बाँगर भूमि में चना आदि अनाज, लताओं में फल, कंद-मूल—जो मिट्टी के भीतर से खोदकर निकाले जाते हैं—आदि वहाँ पर होते हैं, जिन्हें कृषक उसी प्रकार बटोर लेते हैं, जिस प्रकार भ्रमर पुष्पों से मधु को एकत्र कर लेते हैं।
उस देश के सभी प्रान्तों में अन्न का सदाव्रत बड़ी धूम से चलता है; ब्राह्मणों को भोजन देने के उपरान्त गृहस्थजन अपने अतिथियों तथा बंधुओं के साथ स्वयं भोजन करते हैं. भोजन के पदार्थ में तीन श्रेष्ठ फल १ (आम, कटहल और केला), विविध रसमय दाल, उस दाल को डुबो देनेवाला घी, लाल-लाल दही के टुकड़े, खाँड़ इत्यादि होते हैं और इन व्यंजनों से घिरा हुआ भात होता है।
भ्रमर उस प्रदेश में निरन्तर निवास करते हैं, क्योंकि वहाँ की कामिनियों के
१. तमिल देश के तीन प्रधान फल हैं—आम, कटहल और केले। इन्हीं तीन फलों का वर्णन तमिल-साहित्य में प्रायः मिलता है।
| १० | कंब रामायण |
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पंकज समान मुख-मंडल पर जो काजल-अंकित रमणीय नयन हैं, उन्हें वे भ्रमरियाँ समझ लेते हैं और उन्ही की संगति की कामना करते हुए सदा वहीं मँडराते रहते हैं ।
कामदेव जिन पुरुषों को विचलित नहीं कर सकता, उन्हें भी वहाँ की युवतियों का दृष्टि-पात अधीर बना देता है, उनके मनोज्ञ स्तन, सामने आनेवाले पुरुषों का सिर इस तरह झुका देते हैं, जैसे मालिक अपने नौकरों पर क्रोध करके उनका सिर नीचे कर देता है । उधर नारियल के घौदों से जो मधु-धारा बहती है, उसे पीकर मोटे मीन मस्त पड़े रहते हैं।
धरती पर चलनेवाले काले बादलों जैसी भैंसें, नदी के ठंडे जल में गोता लगाती हुई अपने बछड़ों को याद करती हैं, तो उनके थनों से दूध स्रवित होने लगता है; जब वह दूध नदी के जल से मिलकर खेतों मेप हुँचता है, तब उसी दुग्ध-धारा से सिंचकर धान का शस्य बढ़ता है ।
वहाँ की अति समृद्ध पाक-शालाओ में बडे-बडे भांडों में चावल पकाया जाता है, चावल धोने का पानी कल-कल शब्द करता हुआ वहाँ से बहकर क्रमुक-वन में होकर लाल धान के खेतो में पहुँचता है और अंकुरो को पुष्ट करता है।
कूडे के ढेरो पर बैठे हुए और सिर पर कलँगी से शोभायमान लाल मुर्गे जब अपने नखों से कूडे को कुरेदते हैं, तब उसमें से चमकती हुई मणियाँ बिखर जाती हैं; चिडियाँ उन्हें जुगनू समझकर अपने घोंसलों में लाकर रखती हैं।
अहीर तरुणियाँ उज्ज्वल और गाढे दही को अपने सुन्दर करो से हिला-हिलाकर मथती हैं, तब मथानी की ध्वनि रह-रहकर जोर से उमड़ पड़ती है; उनके हाथो में पडे शख के नक्काशीदार सफेद कगन बोल उठते हैं, और उनकी पतली कमर आगे बढ़-बढ़कर लचक जाती है ।
फुलबारियो में तोते बोलते हैं; पुष्पो में भ्रमर गाते हैं, जलाशयों में पक्षियो का मधुर कलरव होता है, दानी लोगो के घरों में अतिथियों के भोजन के लिए धान कूटनेवाली औरतें गृहस्थ की प्रशंसा के गीत गाती रहती हैं ।
भोली और काली आँखोंवाली बालिकाएँ नदी से मोतियों को अपने चुल्लू मे भर-भरकर ले आती हैं और घर के आँगन मे उनसे घरौंदे बनाकर खेलती हैं; इस तरह बिखरे हुए मोती गुवाक (सुपारी) के फलो में मिल जाते हैं; और गुवाक साफ करनेवाले लोग उन मोतियों को असार वस्तु समझकर फेंक देते हैं ।
दृढ़ सींगो और कठोर कपालवाले भेड़ों के बलवान् जोड़े जब परस्पर भिड़कर लड़ते हैं, तब उनके टकराने की कर्कश ध्वनि से दूरस्थ पर्वत-शृंगो पर रहनेवाले मेघो में बिजली कौंध जाती है ।
पर्वतों के बीच अरण्यो में जंगली हाथियों को फँसानेवाले धीर शिकारी कठघरे बनाकर उनमे हाथियों के झुण्ड को—बच्चोंवाली हथनियों से उन्हें अलग करके-फँसा लेते हैं; और फिर उन मस्त हाथियों को सुदृढ श्रृंखलाओं में वे वीर बाँधने लगते हैं, तब वहाँ बड़ा विकट कोलाहल होता है; उस कोलाहल को सुनकर गैरिकूट में हंसिनी के साथ क्रीडा करनेवाले मराल (हंस) उड़कर भाग खड़े होते हैं।