कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
तृतीय लम्बक १९५
तृतीय लम्बक १९५ वहाँ (उज्जैन में) मन्त्र से उसने उस मकान को एक ग्राम के बाड़े में उतारा और वहाँ से श्मशान में जाकर डाइनियों के साथ क्रीड़ा करने लगी ॥१४२॥ उसी समय भूख लगने पर सागवाड़े में उतर कर सुन्दरक ने वहाँ से उखाड़ी हुई मूलियों से भूख शान्त की ॥१४३॥ भूख मिटाकर सुन्दरक फिर पहले के समान गोबाट में जाकर बैठ गया। कालरात्रि भी रात को आई और पहले के समान शिष्याओं के साथ मन्त्र-सिद्धि के बल से गोबाट को उड़ाकर अपने घर आ गई ॥१४४ १४५॥ गोबाट को पुनः अपने स्थान पर रखकर शिष्याओं को भेजकर वह अपने शयनागार में चली गई ॥१४६॥ विघ्नों से चकित सुन्दरक ने वह रात किसी प्रकार बिताई। प्रातः काल गोबाट को छोड़ कर अपने मित्रों के समीप गया। उनसे अपना वृत्तान्त सुनाकर वह विदेश जाने के लिए तैयार हुआ किन्तु मित्रों के समझाने-बुझाने से उसने वहीं रहना स्वीकार किया ॥१४७-१४८॥ गुरु-गृह को छोड़कर वह मठ (सभामठ) में भोजन करने लगा और मित्रों के साथ स्वतन्त्रतापूर्वक विहार करने लगा ॥१४९॥ एक बार वह कालरात्रि घर का सामान खरीदने के लिए निकली और उसने बाजार में सुन्दरक को देखा और निकट जाकर कहा—'हे सुन्दरक ! काम से पीड़ित मुझे अब भी स्वीकार कर लो मेरा जीवन सदा के लिए तुम्हारे अधीन है' ॥१५०-१५१॥ उसके ऐसा कहने पर वह सज्जन सुन्दरक बोला—'माता ऐसा न कहो। गुरुपत्नी का गमन करना धर्म नहीं है। तुम मेरी माता और गुरुपत्नी हो' ॥१५२॥ कालरात्रि फिर बोली—'यदि तुम धर्म पर ध्यान देते हो तो मेरे प्राणों की रक्षा करना भी महान् धर्म है ॥१५३॥ तब सुन्दरक बोला—'माता हृदय में ऐसी बात न लाओ। गुरुपत्नी का गमन करना कहाँ का धर्म है ? ॥१५४॥ इस प्रकार उससे तिरस्कृत कालरात्रि उस कामाग्नी हुई अपने हाथ से अपनी चादर फाड़कर घर चली गई और पति से बोली—'देखो सुन्दरक ने मेरी यह दशा की है ॥१५५ १५६॥
१९६ कथासरित्सागर
१९६ कथासरित्सागर स च तस्याः पतिः क्रोधाद् गत्वावध्यमुदीर्य च। अग्रे सुन्दरकस्याशु वारयामास भोजनम्॥१५७॥ ततः सुन्दरकः सद्यस्तद्वेश्म त्यक्तुमुद्यतः। जानन्नुत्पतनं व्योम्नि मन्त्रं गोवाटशिक्षितम्॥१५८॥ ततोऽवरोहेऽप्यपरं शिक्षितुं धृतविस्मितम्। सदेवं शून्यगोवाटहर्म्यं निशि पुनर्ययौ॥१५९॥ तत्र तस्मिन् स्थितः प्राग्वत्कालरात्रिरुपेत्य सा। तमथोत्पत्य हर्म्यस्था व्योम्नैवोज्जयिनीं ययौ॥१६०॥ तत्रावतार्य मन्त्रेण गोवाटं चारुवाटके। जगाम रात्रिचर्यायै पुनः सा पितृकाननम्॥१६१॥ तं च सुन्दरको मन्त्रं भूयः श्रुत्वापि नाग्रहीत्। विना हि गुर्वादेशेन सम्पूर्णा सिद्धयः कुतः॥१६२॥ ततोऽन्नं भुक्त्वा कतिचिन्मूलकान्यपराणि च। नेतुं प्रक्षिप्य गोवाटे तत्र तस्थौ स पूर्ववत्॥१६३॥ अथेत्यारूढगोवाटा सा गत्वा नभसा निशि। विवेश काञ्चीं स्वं सद्यः स्थापितवाहना॥१६४॥ सोऽपि सुन्दरकः प्रातर्गोवाटात्रिर्गतस्ततः। ययौ भोजनमूल्यार्थी विपणीमाप्तमूलकः॥१६५॥ विक्रीणानस्य तस्यात्र मूलकं राजसेवकाः। मानणीया विना मूल्यं जहृर्द्दृष्ट्वा स्ववेशजम्॥१६६॥ ततः स कलहं कुर्वञ्जघ्नेऽथ सुहृदनुद्रुतः। पाषाणघातदायीति राजान्तेस्तैरनीयत॥१६७॥ मारुबालकचमानीय क्वायङ्कुब्जोऽत्र मूलकम्। विक्रीणीषे सवेरयेष पृष्टोऽस्माभिर्न जल्पसि॥१६८॥ हन्ति प्रत्युत पाषाणैरित्युक्तस्तं शठं नृपः। तं तदद्भुतमप्राक्षीत्ततस्तत्सुहृदोऽब्रुवन्॥१६९॥ अस्माभिः सह यद्येष प्रासादमधिरोप्यते। तदेतत्कौतुकं देव कृत्स्नं जल्पति नान्यथा॥१७०॥ तथेत्यारोपितो राज्ञा संप्रासादोऽस्य पश्यतः। उत्पपात स मन्त्रेण सद्यः सुन्दरको नभः॥१७१॥
तृतीय लम्बक १९७
तृतीय लम्बक १९७ यह सुनकर उसके पति ने क्रोध से जाकर उसके वंश की घोषणा की और सत्र में उसका भोजन बन्द करा दिया॥१५७॥ गोबाट में सीखे हुए उड़ने के मन्त्र को जानता हुआ सुन्दरक उस नगर को छोड़कर जाने को उद्यत हुआ किन्तु उतरने का मन्त्र नही जानता था जो सुनने पर भी भूल गया था। उसे पुनः सीखने के लिए वह फिर उसी सूने गौ-बाड़े में गया ॥१५८-१५९॥ जब वह उस बाड़े में छिपकर बैठा था तब पहले के समान कालरात्रि वहां आई और मकान-सहित उड़कर उज्जैन गई॥१६०॥ वहां पर मन्त्र के प्रभाव से बाड़े के गोबाट को उतारकर रात कामृत्य करने के लिए फिर शमशान में गई॥१६१॥ सुन्दरक ने आकाश से उतरने का मन्त्र सुनकर भी याद नहीं किया गुरु के उपदेश के बिना मन्त्र-सिद्धि कैसे पूरी हो सकती है॥१६२॥ वहां पर उसने पहले के समान मूलियां खाई और कुछ ले जाने के लिए वहीं रख ली और पहले के समान छिप गया॥१६३॥ तदनन्तर कालरात्रि उस गोबाट-रूपी वाहन पर चढ़कर अपने नगर में आई और बाहन को वैसे ही रखकर अपने घर चली गई॥१६४॥ वह सुन्दरक भी सबेरे गोबाट से निकलकर मूलियों को बेचकर भोजन का दाम प्राप्त करने के लिए बाजार में गया॥१६५॥ जब वह मूली बेच ही रहा था तब मालवा की मूलियां बताकर मालवा के सिपाहियों ने अपने देश की बताकर उससे मूलियां छीन लीं॥१६६॥ उनसे झगड़ते हुए सुन्दरक को उसके मित्रों के साथ सिपाही उसे राजा के समीप ले गये ॥१६७॥ उन दुष्ट सिपाहियों ने राजा से कहा—'हमलोग उससे पूछते हैं कि तुम मालवा से मूली लाकर वत्रीश में कैसे बेचते हो? हमारे पूछने पर वह उत्तर नहीं देता उल्टे डेंगों और कचहरी से मारता है। तब राजा ने भी उससे उस आश्चर्य के सम्बन्ध में पूछा। तब सुन्दरक के मित्र बोले—'महाराज ! यदि इसको हमलोगों के साथ राजमहल पर चढ़ा दिया जाय तो वह सब आश्चर्य-वृत्तान्त सुना देगा॥१६८-१७०॥ स्वीकार करके राजा ने उसे छत पर चढ़ा दिया और वह सुन्दरक राजा के देखते- देखते मन्त्र के प्रभाव से राजभवन-समेत आकाश में उड़ गया॥१७१॥
१९८ कथासरित्सागर
१९८ कथासरित्सागर समित्रस्तेन गत्वा च प्रयागं प्राप्य च क्रमात्। शान्तं कमपि राजानं स्नान्तं तत्र ददर्श सः ॥१७२॥ संस्तभ्य चाभ्रं प्रासादं गङ्गायां संनिपत्य च। विस्मयोद्ग्रीवमीक्षितः सर्वैस्तं स राजानमभ्यगात् ॥१७३॥ कस्त्त्वं किं चावतीर्णोऽसि गगनादिति दास नः। राज्ञा प्रश्रेश पृष्टः सन्नेव सुन्दरकोऽब्रवीत् ॥१७४॥ अहं मुरजको नाम गणो देवस्य धूर्जटेः। प्राप्तो मानुषभोगार्थी त्वत्सकाशं तदाज्ञया ॥१७५॥ तच्छ्रुत्वा सत्यमाशङ्क्य सस्याढ्यं रत्नपूरितम्। सस्त्रीकं सोपकरणं ददौ तस्मै पुरं नृपः ॥१७६॥ प्रविश्याथ पुरं तस्मिन्नुत्पत्य दिवि सानुगः। चिरं सुन्दरकः स्वेच्छं निर्वेत्य व्यचरत् सः ॥१७७॥ शयानो हेमपर्यङ्के वीज्यमानश्च चामरैः। सेव्यमानो वरस्त्रीभिरिन्द्रं सुखमवाप सः ॥१७८॥ अथैकदा ददौ तस्मै मन्त्रं व्योमावरोहणम्। सिद्धः कोऽपि किलाकाशचारी सञ्जातसंस्तवः ॥१७९॥ प्राप्तावतारमन्त्रः स गत्वा सुन्दरकस्ततः। कान्यकुब्जं निजं देशं व्योममार्गादवातरत् ॥१८०॥ सपुरं पूर्णलक्ष्मीकमवतीर्णं नभस्तलात्। बुद्ध्वा तत्र स्वयं राजा कौतुकात्तमुपाययौ ॥१८१॥ परिज्ञातश्च पृष्टश्च राज्ञाग्रे सोऽथ कालवित्। कालरात्रिकृतं सर्वं स्ववृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥१८२॥ ततश्चानाय्य पप्रच्छ कालरात्रिं महीपतिः। निर्भया साप्यविनयं स्वं सर्वं प्रत्यपद्यत ॥१८३॥ कुपिते च नृपे तस्याः कर्णौ च च्छेत्तुमुद्यते। सा गृहीतापि पश्यत्सु सर्वेष्वेव तिरोदधे ॥१८४॥ ततः स्वराष्ट्रे वासोऽस्यास्तत्र राज्ञा न्यषिध्यत। तत्पूजितः सुन्दरकः सिधिये च नभः पुनः ॥१८५॥ इत्युक्त्वा तम भर्तारमादित्यप्रभभूपतिम्। अभाषत पुनर्हृष्टा राज्ञी कुवलयावली ॥१८६॥ भवन्त्येवंविधा देव डाकिनीमन्त्रसिद्धयः।
तृतीय लम्बक ६९९
तृतीय लम्बक ६९९ मित्रों के साथ उड़कर वह प्रयाग पहुँचा और थक गया। प्रयाग में उसने स्नान करते हुए किसी राजा को देखा ॥१७२॥ वहाँ पर राजभवन को रोककर सातो द्वारा आश्चर्य से देखा जाता हुआ सुन्दरक आकाश से गंगा में कूद पड़ा और राजा की ओर गया ॥१७३॥ राजा ने सभ्यता से पूछा—'तुम कौन हो ? और आकाश से क्यों उतरे हो ? तब सुन्दरक बोला— मैं शिवजी का मूरजक नाम का गण हूँ। मनुष्यों के भोग भोगने के लिए उनकी आज्ञा से तुम्हारे पास आया हूँ। यह सुनकर और उसे सच मानकर राजा ने उसे अन्न धन स्त्री रत्न आदि से भरा हुआ एक नगर मनुष्य-भोग के लिए दे दिया ॥१७४-१७६॥ उस नगर में आकर अपने मित्रों के साथ आकाश में उड़कर सुन्दरक चिरकाल के लिए स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण करने लगा ॥१७७॥ सोने के पलंगों पर सोता हुआ चँवरो से डलावा जाता हुआ एवं सुन्दरी स्त्रियों से सेवित वह इन्द्र के समान सुख भोगने लगा ॥१७८॥ एक बार, किसी आकाशचारी सिद्ध ने उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर उसे आकाश से उतरने का मन्त्र भी दे दिया। उतरने का मन्त्र प्राप्त कर वह सुन्दरक उड़कर अपने देश कान्य- कुब्ज (कन्नौज) में उतरा। उसे नगर के साथ पूर्ण लक्ष्मी से युक्त एवं आकाश से उतरते हुए जानकर कान्यकुब्ज का राजा स्वयं उसके समीप आया। राजा ने उसे पहचानकर पूछा तो उसने अवसर समझकर कालरात्रि का सारा कृत्य उसे सुना दिया। तब राजा ने कालरात्रि को बुलवाकर पूछा। उसने भी निर्भय होकर अपनी दुष्टता बता दी और स्वीकार किया ॥१७९-१८४॥ राजा क्रुद्ध होकर उसके कान काटने के लिए जैसे ही उद्यत हुआ वैसे ही सबके देखते- देखते पकड़ी हुई कालरात्रि गुम हो गई ॥१८०॥ तब राजा ने अपने राज्य से उसके निर्वासन की आज्ञा दे दी और राजा से सम्मानित सुन्दरक फिर आकाश में उड़ गया ॥१८५॥ रानी कुवलयावली राजा आदित्यप्रभ को इस प्रकार कथा सुनाकर बोली—'महाराज ! डाकिनी-तन्त्रों की सिद्धियाँ इसी प्रकार की होती हैं ॥१८६-१८७॥
एतच्च मत्पितुर्देशे वृत्तं सर्वत्र विश्रुतम् ॥१८७॥ बालरात्रेषु धिग्ध्याहमित्यादौ वर्णितं मया। पतिप्रतारणासिद्धिस्तु ततोऽप्यभ्यधिका मम ॥१८८॥ भवता चाद्य दृष्टाहं श्रेयोज्यं त कृताद्यनः। उपहाराम पुरुषं मन्त्रेणाक्रष्टुमुद्यता ॥१८९॥ तदस्मदीयऽत्र नये त्वमपि प्रविशाम्युना। सिद्धियोगजितानां च राज्ञां मूर्ध्नि पदं कुरु ॥१९०॥ तच्छ्रुत्वा क्व महामांसभोजनं डाकिनीनये। क्व च राजत्वमित्युक्त्वा स राजा निनिषेध तत् ॥१९१॥ प्राणत्यागोद्यतायां तु राज्ञ्यां तत्प्रत्यपद्यत। विषयाकृष्यमाणा हि तिष्ठन्ति सुयवे क्वनू ॥१९२॥ तत सा स प्रवेश्यैव मण्डलं पूर्वपूजित । गृहीतसमय सन्तं राजानमिदमब्रवीत् ॥१९३॥ य एष फलभूत्याख्य स्थितो विप्रस्तवान्तिक । स मयात्रोपहारार्थमाक्रष्टुमुपकल्पित ॥१९४॥ आकर्षणं च सामास तत्कश्चित्सूपकृद् वरम्। नयज्ञ स्थाप्यतां यस्त स्वयं हन्ति पचत्यपि ॥१९५॥ न कार्या च घृणा यस्मान्मांसबलिभक्षणात्। समापितेऽश्वने पूर्णा सिद्धि स्यादुत्तमो हि स ॥१९६॥ इत्युक्त प्रियया राजा पापभीतोऽपि तत्पुन । अङ्गीचकार धिग्हो कष्टो स्त्रीष्वनुरोधिताम् ॥१९७॥ आनाम्य सूपकार च शत साहसिकामिधम्। विश्वास्य दीक्षितं कृत्वा दम्पती तौ सहोचतु ॥१९८॥ 'राजा देवीद्वितीयोऽद्य भोक्ष्यत तत्त्वरां कुरु' । आहारस्येति योऽभ्येत्य त्वां ब्रूयात् निपातये ॥१९९॥ तन्मांसेनैव रङ्गं कुर्या प्रातर्नो स्वादु भोजनम्। इति सूपकृतादिष्टस्तथेत्युक्त्वा गृहं ययौ ॥२००॥ प्रातश्च फलभूति तं प्राप्तं राजा जगाद स । गच्छ साहसिक ब्रूहि सूपकारं महानसे ॥२०१॥ 'राजा देवीद्वितीयोऽद्य भोक्ष्यते स्वादुभोजनम् । अतस्त्वरितमाहारमुत्तमं साध्यय'ति ॥२०२॥
तृतीय लम्बक ४०१
तृतीय लम्बक ४०१ यह सारा समाचार मेरे पिता के देश में प्रसिद्ध है। मैं भी उसी कालरात्रि की शिष्या हूँ यह मैंने पहले ही कहा था किन्तु पतिव्रता होने के कारण मेरी सिद्धि उससे भी बढ़ी-चढ़ी है॥१८४-१८८॥ तुम्हारे कल्याण के लिए ही पूजन करते हुए तुमने मुझे आज देख लिया है। मैं बलि देने के लिए उपयुक्त मनुष्य को आकृष्ट करने के लिए तैयार थी॥१८९॥ इसलिए तुम्हीं हमारे सम्प्रदाय में अब प्रवेश करो—आ जाओ। सिद्धियों के प्रभाव से जीते हुए राजाओं के सिर पर पैर रखो॥१९०॥ डाकिनी के मत में आकर कहाँ महामांस का भोजन और कहाँ मैं राजा! यह सम्भव नहीं है—ऐसा कहकर राजा ने निषेध कर दिया॥१९१॥ जब रानी प्राण-त्याग करने के लिए तैयार हो गई, तब राजा ने विवश होकर डाकिनी के मत में जाने की स्वीकृति दे दी। विषयी लोग सुपथ में कैसे रह सकते हैं? ॥१९२॥ तब प्रसन्न रानी ने पहले ही पूजा किये हुए मण्डल में राजा को बुला लिया और बोली—'यह जो तुम्हारे पास फलभूति नाम का ब्राह्मण है, उसे ही मैंने बलिदान के लिए आकृष्ट करने का निश्चय किया था। किन्तु आकृष्ट करने में अत्यन्त परिश्रम होता है, इसलिए अच्छा हो कि तुम रसोइयों में से किसी एक को अपने मत में मिलाओ जो स्वयं मारे भी और पकावे भी॥१९३-१९५॥ तुम्हें उस मांस-भक्षण से घृणा नहीं करनी चाहिए, पूजा समाप्त होने पर सिद्धि अवश्य होगी क्योंकि सफलता ही सर्वोत्तम है॥१९६॥ प्यारी पत्नी से इस प्रकार बाधित राजा ने पाप से डरते हुए भी उसकी बात मान ली। सच है स्त्रियों के प्रति अनुरोध होना दुःसह होता है॥१९७॥ तब राजा ने साहसिक नामक रसोइये को बुलाकर और विश्वास दिलाकर तथा अपने मत में दीक्षित करके (चेला बनाकर) राजा और रानी दोनों ने उससे साथ ही कहा—॥१९८॥ 'आज राजा रानी के साथ भोजन करेंगे इसलिए जल्दी भोजन तैयार करो'—इस प्रकार का सन्देश जो भी व्यक्ति तुम्हारे पास आकर कहे, उसे तुम मार डालना और उसके मांस से प्रातःकाल एकान्त में हम दोनों के लिए तुम स्वादिष्ट भोजन बनाना। इस प्रकार आज्ञा पाकर रसोइया 'ठीक है'—ऐसा कहकर अपने घर चला गया॥१९९-२००॥ तदनन्तर समीप आये हुए राजा ने फलभूति से कहा कि 'जाओ! साहसिक नामक रसोइये से रसोईघर में जाकर कह दो कि आज राजा रानी के साथ स्वादिष्ट भोजन करेंगे इसलिए शीघ्र ही अच्छा स्वादिष्ट भोजन बनाओ'॥२०१-२०२॥ ५१
४०२ कथासरित्सागर
४०२ कथासरित्सागर
तथेति निर्गतं तं च फलभूतिं बहिस्तदा । एत्य चन्द्रप्रभो नाम राज्ञः पुत्रोऽब्रवीदिदम् ॥२०३॥ अनेन शीघ्रं हेम्ना मे कारयाद्यैव कुण्डल । यादृशं भवता पूर्वमार्य ! तातस्य कारिते ॥२०४॥ इत्युक्तो राजपुत्रेण फलभूतिस्तदैव सः । कृतानुरोधः प्रहितो ययौ कुण्डलयोः कृते ॥२०५॥ राजपुत्रोऽप्यगात्त्वरं वञ्चितं फलभूतिना । राजादेशं गृहीत्वा समकाक्येव महानसम् ॥२०६॥ तत्रोक्तराजादेशं तं स्थितसंवित् स सूपकृत् । राजपुत्रं छुरिकया सद्यः साहसिकोऽवधीत् ॥२०७॥ तन्मांसैः साधितं शेनं भोजनं च कृतार्घनो । अभुञ्जातामजानन्तौ तत्त्वं राज्ञी नृपस्तथा ॥२०८॥ नीत्वा च सानुतापस्तां रात्रिं राजा ददर्श सः । प्राप्तं कुण्डलहस्तं तं फलभूतिमुपागतम् ॥२०९॥ विभ्रान्तः कुण्डलोद्देशात् च पप्रच्छ तत्क्षणम् । तेनाख्यातस्ववृत्तान्तं पपात च भुवस्तले ॥२१०॥ 'हा पुत्रेति' च चक्रन्द निन्दन् भार्यां सहात्मना । पृष्टश्च सचिवैः सर्वं यथातत्त्वमवर्णयत् ॥२११॥ उवाच चेतदुक्तं सत्यमेतद् फलभूतिना । भद्रकृत् प्राप्नुयाद् भद्रमभद्रं पाप्यभद्रकृत् ॥२१२॥ कन्दुको भित्तिनिक्षिप्त इव प्रतिफलन्मुहुः । आपतत्यात्मनि प्रायो दोषोऽन्यस्य चिकीर्षितः ॥२१३॥ पापाचारेयं दस्याभिर्वृद्धाहृत्या चिकीर्षभिः । स्वपुत्रघातनं कृत्वा प्राप्तं सन्मांसभक्षणम् ॥२१४॥ इत्युक्त्वा बोधयित्वा च मन्त्रिणः स्वानथोमुलाम् । तमद्य फलभूतिं च निज राज्येऽभिषिच्य सः ॥२१५॥ राजा प्रदत्तदानः सत्तपुत्रः पापशुद्धये । सभायः प्रविवेशाग्निं दग्धोऽप्यनुशयाग्निना ॥२१६॥ फलभूतिश्च तद्राज्यं प्राप्य पृथ्वीं शशास सः । एवं भद्रमभद्रं वा कृतमात्मनि कल्प्यते ॥२१७॥
तृतीय लम्बक ४०१
तृतीय लम्बक ४०१ 'ऐसा ही होगा' कहकर फलभूति जैसे ही बाहर निकला वैसे ही चन्द्रप्रभ नाम का राज- पुत्र (राजकुमार) आकर उससे बोला कि यह सोना लो और इस सोने से मेरे लिए वैसे ही कानों के कुंडल शीघ्र बनवाकर लाओ जैसे तुमने पिताजी के लिए बनवाये थे ॥२ ५४॥ राजकुमार की आज्ञा से फलभूति सोना लेकर तुरन्त कुंडल बनवाने के लिए चला गया। उधर फलभूति का सन्देश लेकर अकेला ही राजकुमार रसोईघर में साहसिक रसोइये के समीप गया ॥२ ५५॥ रसोईघर में राजा की आज्ञा से रसोइया पहले से ही तैयार बैठा था। उसने छुरी से राज- कुमार का वध कर डाला ॥२ ५७॥ उसके मांस से पकाये हुए भोजन को राजा और रानी ने पूजन करने के अनन्तर खाया क्योंकि वे सच्ची बात नहीं जानते थे कि फलभूति के स्थान पर अपने ही पुत्र का मांस खा रहे हैं ॥२ ५८॥ पश्चात्ताप से पीड़ित राजा ने किसी प्रकार रात बिताकर प्रातः काल हाथ में कुंडल लेकर आये हुए फलभूति को देखा ॥२ ५९॥ घबराये हुए राजा ने कुंडल के बहाने उससे समाचार पूछा। उसके द्वारा सारा समाचार सुनाने पर राजा अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ा फिर होश में आकर अपने साथ रानी को कोसता हुआ 'हाय बेटा!'—'हाय बेटा!' इस प्रकार विलाप लगा। मन्त्रियों के पूछने पर उसने सारा सच्चा समाचार सुना दिया ॥२६०-२६१॥ फलभूति का वह वचन भी बोला जिसे वह प्रतिदिन कहा करता था कि 'भला करनेवाले का भला होता है और बुरा करनेवाले का बुरा ही होता है' ॥२६२॥ जैसे सामने दीवार पर फेंका हुआ गेंद लौटकर फेंकनेवाले पर आकर गिरता है उसी प्रकार दूसरे का बुरा चाहनेवाले का अपना बुरा होता है ॥२६३॥ हम पापियों ने ब्रह्महत्या करनी चाही थी उसी के फलस्वरूप अपने ही पुत्र का मांस खाना पड़ा ॥२६४॥ ऐसा कहकर और शोक एवं आश्चर्य से नीचे मुंह लटकाये हुए मन्त्रियों को समझाकर और अपने राज्य पर उसी फलभूति को बैठाकर तथा शाप देकर अमुक राजा अपने पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए रानी के साथ आग में जल मरा यद्यपि पश्चात्ताप की आग में वह पहले ही जल चुका था ॥२६५ २६६॥ इधर फलभूति राज्य पाकर देश का पालन करने लगा। ठीक है अच्छा या बुरा जो कुछ भी किया जाता है वह अपने ऊपर ही घटित होता है ॥२६७॥
४०४ कथासरित्सागर
४०४ कथासरित्सागर इति वत्सश्वरस्याग्रे कथयित्वा कथामिमाम्। यौगन्धरायणो भूयो भूपतिं तमभाषत॥२१८॥ तस्मात्तव स राजेन्द्र ! जित्वाप्याचरत शुभम्। ब्रह्मवत्सो विकुर्वीत यदि स्यात्तन्मषेव तम्॥२१९॥ इत्युक्तो मन्त्रिमुख्येन तद्वाक्यमभिनन्द्य सः। उत्थाय दिनकर्त्तव्यं वत्सेशो निरवर्तयत्॥२२ ॥ अथद्युश्च स सम्प्राप्तसर्वदिग्विजयः कृती। लावाणकादुदचलत्कौशाम्बीं स्वपुरीं प्रति॥२२१॥ क्रमेण नगरीं प्राप क्षितीशः सपरिच्छदः। उत्पताकाभुजलतां नृत्यन्तीमुत्सवादिव॥२२२॥ विवेश चैनां पौरस्त्रीनयनोत्पलकानने। वितन्वानः प्रतिपदं प्रवातारम्भविभ्रमम्॥२२३॥ चारणैरुद्गीयमानश्च स्तूयमानश्च बन्दिभिः। नृपैः प्रणम्यमानश्च राजा मन्दिरमाययौ॥२२४॥ ततो विनम्रेष्वधिरोप्य शासनं स वत्सराजोऽखिलवेश्मराजसु। पूर्वं निधानाधिगतं कुलोचितं प्रसङ्ग सिंहासनमारुरोह तत्॥२२५॥ तत्कालमङ्गल समाहृत सारधीर तूर्यारवेप्रतिरवेण नभः पुपूरे। तन्मन्त्रिमुख्य-परितोषित लोकपाल- दत्तैरिव प्रतिदिशं समसाधुवादैः॥२२६॥ विविशमथ वितीर्य वीतलोभो वसु वसुधाविजयार्जितं द्विजेभ्यः। अकृत कृतमहोत्सवः कृतार्थं क्षितिपतिमण्डलमात्ममन्त्रिपदञ्च॥२२७॥ क्षेमेषु वर्षति सवामुगुण नरेन्द्रे रस्मिन्घनस्तनमुदर्कनिनादितायाम् । सम्भाव्य भाविबहुधान्यफलं जनोऽपि। तस्यां पुरि प्रतिगृहं विहितोत्सवोऽभूत् ॥२२८।
तृतीय लम्बक ४५
तृतीय लम्बक ४५ यौगन्धरायण वत्सराज के सम्मुख यह कथा कहकर राजा से फिर बोला— 'हे राजेन्द्र ! जीतकर भी उसकी कल्याण-कामना करते हुए तुम्हारा यदि ब्रह्मदत्त (काशिराज) अपकार करता है, तो तुम उसे दंड दे सकते हो' ॥२१८-२१९॥ मुख्य मन्त्री से इस प्रकार कहे गये राजा ने उसकी सम्मति का अभिनन्दन किया और उठकर प्रातःकालीन कृत्यों से निवृत्त होने में लग गया ॥२२० ॥ और दूसरे दिन वह नीतिकुशल राजा उदयन समस्त दिशाओं को जीतकर लावाणक से अपनी नगरी कौशाम्बी को चला ॥२२१॥ वत्सराज सभी साधनों के साथ क्रमशः चलकर अपनी नगरी पहुँचा। जो (नगरी) पताकारूपी भुजलता को ऊपर उठाकर आनन्द से नाचती-सी मालूम हो रही थी ॥२२२॥ नागरिकों की कमल-कानन जैसी आँखों को पग-पग पर हवा के झोकों के समान झकोरता हुआ (वत्सराज) ने नगरी में प्रवेश किया ॥२२३॥ चरणों से प्रलंबित बन्दियों से अभिनन्दित और राजाओं से प्रणाम किया जाता हुआ राजा अपने भवन में गया ॥२२४॥ तब सभी देशों के विजित राजाओं को अपने शासन में लाकर परम्परा के अनुसार पूवार्जित सिंहासन पर साधिकार बैठा ॥२२५॥ उस समय मांगलिक वाद्यों के धीर-गम्भीर शब्दों से आकाश इस प्रकार गूँज उठा मानो राजा के मुख्य मन्त्रियों द्वारा परितोषित लोकपालों ने प्रत्येक दिशा से एक साथ साधुवाद दिये हों ॥२२६॥ इसके बाद तेजस्वी राजा ने दिग्विजय के क्रम में अर्जित विपुल धन ब्राह्मणों को दिया और महोत्सव मनाकर सभी नरेशों तथा अपने मन्त्रियों को कृतार्थ किया ॥२२७॥ इस प्रकार वह राजा जब अपने गुणों के अनुसार पात्रों में दान कर रहे थे तब बजते हुए मृदंग की मेघ-मन्द्र ध्वनि से प्रतिध्वनित उस नगरी की प्रजा भी अनेक प्रकार के धन-धान्य की संभावना करती हुई अपने घरों में उत्सव मनाने लगी ॥२२८॥
४ ६ कथासरित्सागर
४ ६ कथासरित्सागर एवं विजित्य जगतीं स कृती रुमण्वद् यौगन्धरायणनिवेशितराज्यभारः । तस्थौ यथेच्छमथ वासवदत्तयाम पद्मावती सहितया सह वत्सराजः ॥२२९॥ कीर्त्तिश्रियोरिव तयोरुभयोश्च देव्यो- र्मध्यस्थितः स वरचारणगीयमानः । चन्द्रोदयं निजयशोधवल सिषेवे शत्रुप्रतापमिव सीधु पपौ च शश्वत् ॥२३०॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे लावानकलम्बके षष्ठस्तरङ्गः । समाप्तश्चायं लावानकलम्बकस्तृतीयः ।
तृतीय लम्बक ४७
तृतीय लम्बक ४७ इस प्रकार वह नीतिनिपुण राजा वत्सराज समस्त संसार को जीतकर रुमन्वन् और यौगन्धरायण को राज्य का भार सौंपकर पद्मावती और वासवदत्ता के साथ स्वच्छन्द बिहार करने लगा ।।२२ ॥ कीर्ति और श्री के समान उन दोनों देवियों के बीच में बैठा वह वत्सराज श्रेष्ठ चारणों से प्रशंसित अपने यश के समान उज्ज्वल चन्द्रोदय का आनन्द लेता हुआ शत्रु के प्रताप के समान मद्य का निरन्तर पान करने लगा ॥२३ ॥ छठा तरंग समाप्त कथासरित्सागर का लावानक नामक तृतीय लम्बक समाप्त
नरवाहनदत्तजननं नाम चतुर्थो लम्बकः
नरवाहनदत्तजननं नाम चतुर्थो लम्बकः इह गुरुगिरीन्द्रजाप्रणयमन्दरान्दोलना- त्पुरा किल कथामृतं हरमुखात्सुधेशोद्गतम् । प्रसह्य रसयन्ति ये विगतविघ्नलब्धर्द्धयो धुरं दधति वैबुधीं भुवि भवप्रसादेन ते ॥ प्रथमस्तरङ्गः उदयनराज्ञः कथा (पूर्वानुवृत्ता) कर्णतालचलाघातसीमन्तितककुभाञ्चलः । पन्थानमिव सिद्धीनां दिक्षु जयति विघ्नजित् ॥१॥ ततो वत्सेश्वरो राजा स कौशाम्ब्यामवस्थितः । एकातपत्रां बुभुजे जितामुदयनो महीम् ॥२॥ विधाय सहमन्त्येव भारं यौगन्धरायणे । बिहारकरसश्चाभूद् वसन्तकसखः सुखी ॥३॥ स्वयं स वादयन् वीणां दभ्या वासवदत्तया । पद्मावत्या च सहितः सङ्गीतकमसचत ॥४॥ देवीकाकलिगीतस्य तद्वीणानिन्दस्य च । अभेदे वादनाङ्गुष्ठकम्पोऽभूद् भवसूचकः ॥५॥ हर्म्याग्रे निजकीर्त्येव ज्योत्स्नया धवले च सः । धाराविगलितं सीधु पपौ मदमिव द्विषाम् ॥६॥ आनिन्युः स्वर्णकलशैस्तस्य वाराङ्गना रहः । स्मरराज्याभिषेकाम्भ इव रागोञ्ज्वलं मधु ॥७॥ मारकतरसुरत्नस्वच्छमन्तस्फुरित मुखम् । उपनिन्यु र्व्योममध्य स स्वबिम्बिमिवासवम् ॥८॥ ईर्ष्याश्यामाभावमपि भङ्गुरभ्रूणि रागिणि । न मुग्धे वतयो राज्योस्तदृष्टिरतृप्तिमाययौ ॥९॥
नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक
नरवाहनदत्तजनन नामक चतुर्थ लम्बक (मंगल-श्लोक का अर्थ प्रथम लम्बक के प्रथम तरंग के प्रारम्भ में देखें।) प्रथम तरंग राजा उदयन की कथा (क्रमशः) कर्णताल के प्रबल आघातों से दुःस्वप्नों को एक ओर करके मानों सफलता का मार्ग प्रदर्शन कर रहे हों ऐसे विघ्नराज गणेश की जय हो॥१॥ तदनन्तर कौशाम्बी में रहता हुआ राजा उदयन विजित पृथ्वी का एकच्छत्र राज्यभोग कर रहा था॥२॥ वह राजा सेनापति रुमण्वान् के साथ मुख्यमन्त्री यौगन्धरायणपर समस्त राज्य-शासन का भार देकर, अपने नर्मसचिव वसन्तक के साथ सुखपूर्वक सांसारिक भोग-विलास का आनन्द लेने लगा॥३॥ वह स्वयं वीणा बजाता हुआ रानी वासवदत्ता और पद्मावती के साथ संगीत का सेवन करता था॥४॥ वासवदत्ता के सूक्ष्म और मधुर संगीत-स्वर उसकी वीणा के स्वर की एकता (समता) होने पर बजाने के लिए चलते हुए अँगूठे से ही दोनों का भेद लक्षित होता था। अर्थात् गायन और वादन का स्वर एक साथ मिलने पर यह प्रतीत नहीं होता था कि रानी गा रही है या वीणा बज रही है॥५॥ राजमहल के सामने अपनी कीर्ति के समान शुभ चाँदनी से धवल बरामदे में बैठकर वह राजा प्याला में अनवरत धारा से गिरते हुए मद्य का समुद्र के मद के समान पान करता था॥६॥ उस एकान्त स्थान में बैठे हुए राजा के लिए सुन्दरियाँ मद्य के घड़ा में रूप से उज्ज्वल मद्य को ऐसे पहुँचा रही थीं मानों कामदेव के राज्याभिषेक के लिए स्वर्ण के कलशों में तीर्थों का जल लाया जा रहा हो॥७॥ वह राजा दोनों रानियों के बीच में बैठकर अपने रागपूर्ण चित्त के समान रक्तवर्ण स्वादु, स्वच्छ और रानियों के मुखों से प्रतिबिम्बित मद्य का प्रसन्नपूर्वक पान करता था॥८॥ ईर्ष्या और कोष के बिना भी (मद्य के नशे में) टेढ़ी भौंहोंवाले एवं प्रेमपूर्ण रानियों के मुखों को निरन्तर देखते हुए राजा को तृप्ति नहीं होती थी॥९॥ ९२
४१ कथासरित्सागर
४१ कथासरित्सागर शमपुष्किरिणीतल्पमध्यास्ते तस्य पादपम् । बभौ चातपताम्राक्षसितपक्षेव पद्मिनी ॥१०॥ वत्सराजस्य मृगयावर्णनम् अन्तरा च विन्ध्याटाप पलालयामकुन्दुरैः । स मदान्धगजां भेजे व्याधैर्मृगवाननम् ॥११॥ जघान पद्मकुम्भान्धगहनिबहोग्गरैः । तिमिरोधनविराद्धं बरैर्दिग्य मरीचिमान् ॥१२॥ विध्वस्तदृगुतामन्द्रिभृष्णगाग प्रधाविनः । बभुः पूर्वाभिभूतानो वराहा मघुभामिव ॥१३॥ रेजुः खड्गिणा भाग्ग मही मण्विणानिनः । गतागत्यं तक्षान्दुगगमयुक्ता वनान्त्रिनी ॥१४॥ ध्यासस्तत्रपतद्रायग्रागण्पि मृगाग्निषु । गामन्तस्त्रिनिष्पक्षान्तत्रावितुषु सन्तण ग ॥१५॥ दवान इवथ्रे वन तम्मिरन्ध्रस्य बन्धन बागृग । गा व्याधपतित्द्रभार्यात्रया मृगयारग ॥१६॥ वत्सराजं प्रति शारदोपदेशः एव मनाशभोग्य वर्त्तमानं तमत्रतः । रात्रानपाग्यानन्तं नान्दा पूर्विम्दगारु ॥१७॥ निरु दप्रमावडर्रणः प्रह्लद निरुः । कृतार्थारम्भसंस्याभित्रा यान्तमालि ॥१८॥ स मने गर्वभार्यान्त्या तृणमप्रय भभताः । प्रात राज्ञिध विष्वत रात्रान ततमन्तत ॥१९॥ रुमण्डतकथा शृणु यत्नभवम्य वमन्धरः समाद्रम यः । बभूव राजसिंहस्य स मन्त्री पूर्वजन्मसु ॥ सस्य गदः सुहृद् व्यास प्रास भन्म वभवतुः । एता दृश्य निष्पाप च ब्रह्मा सत्य सुरोत्तमः ॥ स चात्र गूर्भदामापि विप्रगोपाङ्गसम्भूतः । तस्य वत्सेश्वरोऽभूत् कृतकृत्यः सहायवान् ।
चतुर्थ लम्बक ४११
चतुर्थ लम्बक ४११ सुरापूर्ण अनेक स्फटिक के प्यालों से भरी हुई राजा की पानभूमि प्रभातकालीन सूर्य की लाल किरणों से रक्त और श्वेत कमलों से युक्त कनक-लता के समान सुशोभित हो रही थी॥१०॥ वत्सराज का मृगया-वर्णन इसी विलास-क्रीड़ा के बीच कभी-कभी राजा बहेलिया के साथ हरे पत्तों का-सा वेष धारण किये हुए और धनुष लिये हुए मृगवनों का भी सेवन करता था (अर्थात् शिकार खेलने के लिए भी जाता था) ॥११॥ इस क्रीड़ा में कीचड़ से सने हुए सूकरों के मुखों को वह बाणों से बेधकर मार देता था। उसके पीछा करने पर भय से इधर-उधर भागे हुए कृष्णसार मृग ऐसे मालूम होते थे जैसे मानों पूर्वकाल में विजय की हुई दिशाएँ उसपर कटाक्षपात कर रही हों॥१२-१३॥ जंगली भैंसों को मारने के कारण उनके रक्त से रंजित वनभूमि ऐसी मालूम होती थी कि माना वन-कमलिनी राजा की सेवा के लिए उपस्थित हुई हो॥१४॥ मुँह फाड़े हुए, अतएव भालों में बिधे (पिरोय) हुए मुखोंवाले सिंहों को देखकर राजा प्रसन्न होता था॥१५॥ अपने शस्त्र पर विश्वास रखनेवाले उस राजा की मृगया-क्रीड़ा में गड्ढों में छिपे हुए शिकारी कुत्ते और मार्ग में बिछे हुए जाल—यह परिस्थिति थी॥१६॥ वत्सराज को नारदजी का उपदेश इस प्रकार के आनन्द के दिनों में एक बार नारद मुनि सभा (दरबार) में बैठे हुए राजा के समीप आये—॥१७॥ अपनी देह के कान्ति-मंडल से आवृत वे ऐसे मालूम होते थे मानों तेजस्वी राजा के प्रेम से तेजस्वी सूर्य अवतार धारण करके आये हों॥१८॥ सादर प्रणाम करते हुए राजा से समुचित सत्कार प्राप्त करने पर प्रसन्नचेता मुनि कुछ ठहरकर बोले॥१९॥ राजा पाण्डु की कथा हे वत्सराज ! संक्षेप में ही कहता हूँ सुनो। पहले समय में पांडु नाम का राजा था जो तेरा पहला पितामह (परदादा) था॥२०॥ तुम्हारे ही समान उस महान् प्रतापी राजा के दो पत्नियां थीं—एक कुन्ती और दूसरी माद्री॥२१॥ अपने अतुल बल से सातोद्वीप पृथ्वी को विजय करके एक बार शिकार का व्यसनी होने के कारण वह पांडु वन को गया॥२२॥
तत्र किन्दमनामानं स मुनिं मुक्तसायकः। जघान मृगरूपेण सम्भार्यं सुरतस्थितम्॥२३॥ स मुनिर्मृगरूपं तत्त्यक्त्वा कण्ठविवर्तिभिः। प्राणैः शशाप तं पाण्डुं विषण्णं मुक्तकार्मुकम्॥२४॥ स्वैरन्ध्यो निर्विमर्षेण हतोऽहं यत्त्वया ततः। भार्यासंभोगकाले ते मद्धव मृत्युर्भविष्यति॥२५॥ इत्याप्तशापस्तद्भीत्या त्यक्तभोगस्पृहोऽथ सः। पत्नीभ्यामन्वितः पाण्डुस्तस्थौ शान्ते तपोवने॥२६॥ तत्रस्थोऽपि स शापेन प्रेरितेनेव नैकदा। अकस्माच्चकमे माद्रीं प्रियां प्राप च पञ्चताम्॥२७॥ तदेवं मृगया नाम प्रमादो भूप भूभृताम्। क्षपिता ह्यनयाऽयेऽपि नृपास्तं ते मृगा इव॥२८॥ घोरनाषामिषव्याप्ता रुक्षा भूत्राश्वंमूर्खता। कुलदन्ता कथं कुर्यात्प्राज्ञस्त्रीय हि सा क्षिवम्॥२९॥ तस्माद् विफळभाभास जहीहि मृगयारसम्। वन्यवाहनहन्तॄणां समानं प्राणसंक्षयः॥३०॥ त्वं च त्वत्पूर्वजप्रीत्या प्रिय कल्याणपात्र ! मे। पुत्रश्च तव कामांशो यथा भावी तथा शृणु॥३१॥ पुरानङ्गाङ्गसम्भूत्य रत्या स्तुतिभिरर्चितः। तुष्टो रहसि सङ्घपमिव तस्याः शिवोऽभ्यधात्॥३२॥ अवतीर्य निजांशेन भूमावागच्छ मां स्वयम्। गौरी पुषायिनी कामं जनयिष्यत्यसाविति॥३३॥ अतरचण्डमहासेनसुता देवी नरेन्द्र सा। माता वासवदत्तेयं सम्पन्ना महिषी च ते॥३४॥ तदेषा शम्भुमाराध्य कामांशा सोष्यते सुतम्। सर्वविद्याधराणां यश्चक्रवर्ती भविष्यति॥३५॥ इत्युक्तेनादृतवचा राजा पृथ्वीं तदर्पिताम्। प्रत्यर्प्य तस्मै स ययो मन्दारगिरिवर्धनम्॥३६॥ तस्मिन्गते धरमराजं स तद्वासवदत्तया। जातपुत्रच्छया साकं निन्ये तच्चिन्तया दिनम्॥३७॥
चतुर्थ लम्बक ४१३
चतुर्थ लम्बक ४१३ वन में किन्दम नाम का एक मुनि मृग का रूप धारण करके अपनी पत्नी के साथ आनन्द कर रहा था॥२३॥ राजा ने उसे मृग समझकर और बाण चलाकर मार डाला। उस मुनि ने प्राणों का परित्याग करते हुए, धनुष छोड़कर विप्र बैठ राजा को शाप दिया—हे राजन् ! बिना विचारे तुमने मुझे मार डाला। अत पत्नी का समागम करने पर मेरे ही समान तुम्हारी भी मृत्यु होगी॥२४-२५॥ इस प्रकार शापित और शाप के भय से सांसारिक भोगों से विरक्त राजा पांडु अपनी दोनों पत्नियों के साथ प्रशान्त तपोवन में रहने लगा॥२६॥ तपोवन में रहते हुए कन्दर्प से प्रेरित राजा ने अकस्मात् छोटी पत्नी माद्री के साथ समागम किया और मर गया॥२७॥ इसलिए हे राजन् ! यह शिकार राजाओं में प्रमाद करानेवाला बुरा व्यसन है। इसने और भी अनेक राजाओं का मृदा के समान नाश कर दिया है॥२८॥ यह शिकार राक्षसी के समान है। इससे किसका कल्याण हो सकता है? यह पार शब्द के साथ मांस पिशाचिनी है, रूखी है, धूलिधूसर हुए बाणोंवाली है और भाले इसके दाँत हैं, अर्थात् शिकारी दौड़ते-दौड़ते धूल में रंगा हो जाता है। उसके धूल में भरे बाण हवा में ऊपर उठे रहते हैं ॥२९॥ इसलिए व्यर्थ परिश्रमवाले इस शिकार के प्रेम को छोड़ दो। इसमें शिकार, शिकारी और वाहन तीनों के प्राणों का सन्देह मात्र ही रहता है॥३०॥ तुम्हारे पूर्वज मेरे मित्र थे उन्हीं के प्रेम से तुम भी मेरे प्यारे हो। साथ ही तुम्हारा पुत्र कामदेव के अनुरूप में उत्पन्न होनेवाला है। मूर्ता—॥३१॥ प्राचीन समय में काम का दहन होने पर उसकी पत्नी रति ने शिवजी की स्तुति द्वारा आराधना की। उनसे प्रसन्न होने पर शिवजी ने गगन से उससे कहा—पार्वती अपने अंश से पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर और पुत्र की कामना से स्वयं मेरी आराधना करके उस अपने गर्भ में जन्म देगी॥३२-३३॥ इसलिए हे राजन् ! वहमहासेन की पुत्री यह वासवदत्ता गौरी के अंश से उत्पन्न हुई है और तुम्हारी महारानी है॥३४॥ यह रानी शिवजी की आराधना करके कामदेव के अनुरूप बालक का जन्म देगी जो सब विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा बनेगा॥३५॥ ऐसा सुनकर मुनि के वचन का आदर करके राजा ने गन्धर्ववृत्त्या मुनिको दान कर दी। नारद मुनि उस पुत्र उत्पन्न के लिए राजा को सौंपकर अन्तर्धान हो गए॥३६॥ मुनि के चले जाने पर राजा ने पुत्र की इच्छावाली रानी वासवदत्ता के साथ पुत्र की चिन्ता में ही दिन व्यतीत किया॥३७॥
४१४ कथासरित्सागर
४१४ कथासरित्सागर
पिङ्गलिकाब्राह्मणीकथा
अथैकद्युस्तं स वत्सपामुपेत्यास्थानवर्त्तिनम् । नित्योत्क्षिप्तस्य प्रवरः प्रतीहारो व्यजिज्ञपत् ॥३८॥ शिशुद्वयसमुद्भूता ब्राह्मणी कापि दुर्गता । द्वारि स्थिता महाराज देवदर्शनकांक्षिणी ॥३९॥ तच्छ्रुत्वाभ्यनुज्ञाते तत्क्षणं महीभृता । ब्राह्मणी सा विवेशात्र कृशपाण्डुरधूसरा ॥४०॥ माननव विशीर्णेन वाससा विधुरीकृता । दुर्दैव्यनिभावङ्के बिभ्रती बालकावुभौ ॥४१॥ कृतोचितप्रणामा च सा राजानं व्यजिज्ञपत् । ब्राह्मणी कुलजा चाहमीदृशीं दुर्गतिं गता ॥४२॥ दैवायुगपदेतौ च जातौ द्वौ तनयौ मम । तच्च नास्ति मे स्तन्यमतयोर्भोजनं बिना ॥४३॥ तनेह कृपणा माद्य शरणागतवत्सलम् । प्राप्तास्मि देवं शरणं प्रमाणमधुना प्रभुः ॥४४॥ तच्छ्रुत्वा सद्यो राजा स प्रतीहारमादिक्षत् । इयं वासवदत्तायै देव्यै नीत्वाप्यतामिति ॥४५॥ सतद्द कर्मणा स्वेन शुभेनेवाग्रयायिना । नीताऽभून्निकटं देव्याः प्रतीहारेण तेन सा ॥४६॥ राज्ञा विसृष्टां दृष्ट्वा तां प्रतीहारानुपागताम् । देवी वासवदत्ता सा ब्राह्मणीं श्लघ्नतराम् ॥४७॥ युग्मापत्यां च पश्यन्ती दीनामतां व्यचिन्तयत् । अहो वामकबुद्धित्वं किमप्येतत्प्रजापतेः ॥४८॥ अहो ! वस्तुनि मारम्यमहो भक्तिरवस्तुनि । नाद्याप्येकोऽपि मे जाता जातौ त्वस्या यमाविमौ ॥४९॥ एवं सचिन्तयन्ती च सा देवी स्नानकांक्षिणी । ब्राह्मण्याश्चेटिकास्तस्याः स्नपनादौ समादिशत् ॥५०॥ स्नपिता दत्तवस्त्रा च ताभिः स्वादु च भोजिता । ब्राह्मणी गाम्बुसिक्तेव तप्ता भूः समुदश्वसत् ॥५१॥