कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
चतुर्थ लम्बक ४९७
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चतुर्थ लम्बक ४९७ यहाँ शान्तिकर नाम का हमारा एक पुरोहित रहता है, वह इस देश का नहीं, परदेशी है। मैं समझती हूँ, वह तुम्हारा देवर होगा॥१२५॥ ऐसा कहकर उत्कण्ठित ब्राह्मणी की रात्रि में उसी प्रकार व्यवस्था करके प्रातःकाल ही रानी ने पुरोहित को बुलाकर उसके कुल और देश का पता पूछा॥१२६॥ उसके अपने कुल का पता बताने पर भली भाँति निश्चय कर रानी ने 'यह तुम्हारी भाभी है'—ऐसा कहकर उस ब्राह्मणी को उसे दिखाया॥१२७॥ परिचय होने पर और अपने भाई की मृत्यु का समाचार जानने पर शान्तिकर अपनी भाभी को अपने घर ले गया॥१२८॥ घर जाकर पिता और भाई के लिए समुचित शोक प्रकट करके दोनों बच्चों-सहित भाभी को उसने धैर्य प्रदान किया॥१२९॥ रानी वासवदत्ता ने भी उन दोनों बालकों को उत्पन्न होनेवाले अपने पुत्र का पुरोहित नियुक्त कर दिया॥१३०॥ रानी ने ही उन दोनों पुत्रों में से बड़े का नाम शान्तिसोम और छोटे का नाम वैश्वानर रखा। साथ ही उनके लिए प्रचुर सम्पत्ति प्रदान की॥१३१॥ अन्धे के समान जीव के आगे-आगे चलनेवाला और अपने कर्मों द्वारा फल की ओर ले जानेवाला भाग्य ही होता है, पुरुषार्थ तो एक निमित्तमात्र है॥१३२॥ यही कारण है कि वह ब्राह्मणी दोनों बालक और शान्तिकर इधर-उधर से आकर प्रचुर राज-संपत्ति पाकर परस्पर मिल गये॥१३३॥ इस प्रकार कुछ दिन बीतने पर एक बार एक कुम्हारिन अपने पाँच पुत्रों को साथ लेकर मिट्टी के कुछ पात्रों-सहित वहाँ आई॥१३४॥ उसे अपने भवन में देखकर रानी ने समीप बैठी हुई पुरोहितानी ब्राह्मणी से कहा— 'सखि! देखो इसके पाँच-पाँच लड़के हैं और मुझे अभी तक एक भी नहीं है, वह इतनी पुण्यवती है। गरीब होकर भी यह मेरी जैसी निपूती नहीं है॥१३५-१३६॥ तब पिंगलिका बोली—'महारानी! पाप के फलस्वरूप अधिक सन्तान कष्ट देती है और दरिद्रा के ही होती है॥१३७॥ तुम्हारे समान उच्च लोगों की अल्पकाल सन्तान होती है, वह उत्तम होती है। जल्दी न करो। शीघ्र ही अपने कुल के योग्य सन्तान प्राप्त करोगी॥१३८॥ पिंगलिका के इस प्रकार कहने पर भी पुत्र के लिए उत्कण्ठित रानी चिन्ता करने लगी॥१३९॥
४२८ कथासरित्सागर
४२८ कथासरित्सागर
गिरिशाराधनप्राप्यः पुत्रस्ते नारदोऽभ्यधात् । तद्देवि वरदोऽवश्यमाराध्यः स शिवोऽत्र नः ॥१४०॥ इत्युक्ता वत्सराजेन तत्कालं चागतं सा । देवी सम्भाव्यमेवास्तु चकार व्रतनिश्चयम् ॥१४१॥ तस्यामात्तव्रतायां तु स राजापि समन्त्रिकः । सराष्ट्रश्चापि विदधे शङ्कराराधनव्रतम् ॥१४२॥ त्रिरात्रोपोषितौ तौ च दम्पती स विमुस्ततः । प्रसादप्रकटीभूतः स्वयं स्वप्ने समादिशत् ॥१४३॥ उत्तिष्ठतं स युवयोः कामांशो जनिता सुतः । नाथो विद्याधराणां यो भविता मत्प्रसादतः ॥१४४॥ इति वचनमुदीर्य चन्द्रमौलौ सपदि तिरोहिततां गते प्रबुध्य । अधिगतवरमाशु दम्पती तौ प्रमदमकृत्रिममापतुः कृतार्थौ ॥१४५॥ उत्थाय चोषसि ततः प्रकृतीर्विधाय । तत्स्वप्नकीर्तनसुधारसतर्पितास्ताः । देवी च सा नरपतिश्च सवन्धुभृत्यौ । बद्धोत्सवौ विदधतुर्व्रतपारणामि ॥१४६॥ कतिपयदिबसापगमे तस्याः स्वप्ने जटाधरः पुरुषः । कोऽप्यथ देव्या वासवदत्तायाः फलमुपेत्य ददौ ॥१४७॥ ततः स विनिवेदितस्फुटपवित्रस्वप्नया सह गृहं प्रमुदितस्तया समभिनन्दितो मन्त्रिभिः । विचिन्त्य शशिमौलिनो फलनिभं दत्तं सुतं । मनोरथमदूरगं गणयति स्म वत्सेश्वरः ॥१४८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे नरवाहनदत्तजनन लम्बके प्रथमस्तरङ्गः ।
द्वितीयस्तरङ्गः (पूर्वानुवृत्ता) वत्सराजकथा - मुखबन्धः अथ वासवदत्ताया वत्ससहृदयोत्सवः । सम्बभूवाचिराद् गर्भः कामांगावतरोज्ज्वलः ॥१॥
चतुर्थ लम्बक ४२९
चतुर्थ लम्बक ४२९ उसी समय आये हुए वत्सराज उदयन ने रानी की चिन्ता का कारण जानकर कहा— देवि ! नारद मुनि ने कहा है कि शिवजी की आराधना करने पर तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा' ॥१४०॥ ऐसा कहकर राजा ने शिवजी का व्रत करने का निश्चय किया। रानी के व्रत ग्रहण करने पर राजा ने भी मन्त्रियों और राज्य की प्रजाओं के साथ शंकर की आराधना का व्रत किया ॥१४१ १४२॥ तीन रातों तक उपवास करते हुए राजा और रानी को प्रसन्नता से प्रकट होकर शिवजी ने स्वयं आज्ञा दी—'तुम दोनों उठो ! तुम्हें कामदेव का अंश पुत्र उत्पन्न होगा जो मेरी कृपा से विद्याधरों का राजा होगा ॥१४३ १४४॥ स्वप्न में ऐसा वरदान देकर शिवजी के अन्तर्धान हो जाने पर, प्रातःकाल उठकर वर को पाये हुए राजा और रानी ने हार्दिक आनन्द का अनुभव किया ॥१४५॥ तदनन्तर उठकर राजा ने मन्त्रियों तथा प्रजाओं को देखे हुए स्वप्न के समाचार-रूपी अमृत-रस से तृप्त कर दिया और उन दोनों ने अपने बन्धु-बान्धवों और सेवकों के साथ उत्सव मनाते हुए व्रत का पारण (समाप्ति) किया ॥१४६॥ और कुछ दिनों के बीतने पर स्वप्न में रानी वासवदत्ता को किसी जटाधारी पुरुष ने आकर फल प्रदान किया ॥१४७॥ रानी के द्वारा उस स्वप्न का वृत्तान्त जानकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और मन्त्रियों ने उसे बधाइयां दीं। राजा भी फल के समान शिवजी द्वारा दिये गये पुत्र को समझकर शीघ्र ही पूर्ण होने की आशा करने लगा ॥१४८॥ नरवाहनदत्तजनन नामक लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग वत्सराज की कथा—पुत्र-जन्म कुछ दिनों के अनन्तर वासवदत्ता ने शीघ्र ही वत्सराज के हृदय को आनन्द देनेवाले और कामदेव के अंशावतार से उज्ज्वल गर्भ का धारण किया ॥१॥
४६ कथासरित्सागर
४६ कथासरित्सागर सा बभौ सोरुनेत्रेण मुखेनापाण्डुकान्तिना। क्षणार्ङ्गेनेव गर्भस्थकामप्रेमोपगामिना ॥२॥ आसीनाया पतिस्नेहाद्धतिप्रीती इवागते। रेजतु प्रतिमे तस्या मणिपर्यङ्कपाश्वयो ॥३॥ भाविबिद्याधराधीशगमसेवाधमिष्टदा । मूर्त्ता विद्या इवायाता सख्यस्तो पर्युपासत ॥४॥ विनीलपल्लवश्याममुखौ साथ पयोधरौ। सूनोगर्भभिषेकाय बभार कलशाविव ॥५॥ स्वच्छस्फुरितसञ्छायमणिकुट्टिमशोभिनः । सुलक्षभ्यागता मध्य मन्दिरस्य रराज सा ॥६॥ भाविततनयाक्रान्तिन्नाकम्पितवारिभि । उपत्य सेव्यमानेव समन्ताद्रत्नराशिभिः ॥७॥ तस्या विमानमध्यस्थरत्नोत्था प्रतिमा बभौ। विद्याधरश्रीनमसा प्रणामार्थमिवागता ॥८॥ मन्त्रसाधनसन्ना साधकेन्द्रकथासु च। बभूव सा दोहदिनी प्रसङ्गोपगतासु च ॥९॥ सरसारम्भसङ्गीता विद्याधरवराङ्गनाः। स्वप्ने तामम्बरोत्सङ्गमारुढामुपतस्थिरे ॥१ ०॥ प्रवृत्ता सवितुं साक्षाद्देवाभिमन्ताप सा। नभ क्रीडाविलसितं दृश्यभूतरुकोतुकम् ॥११॥ तं च दोहदमेतस्या देव्या यौगन्धरायणः। यन्त्रमन्त्रेन्द्रजालादिप्रयोगै समपूरयत् ॥१२॥ विजहार च सा तैस्तैः प्रयोगैर्गगनस्थिता। पौरनारीजनोत्दमञ्चोचनान्वयदायिभिः ॥१३॥ एकदा वामवन्धायास्तस्यादघ समजायत। हृदि विद्याधरोदारकथाश्रवणकौतुकम् ॥१४॥ ततस्तयायितो देव्या तत्र यौगन्धरायणः। तस्या सर्वेषु गुह्यम्पु भिजगाद कथामिमाम् ॥१५॥
चतुर्थ लम्बक ४५१
चतुर्थ लम्बक ४५१ उस गर्भवती रानी का मुख चन्द्रमा के समान शोभित होने लगा। उस मुख में नेत्र चंचल थे। उसकी आभा कुछ पीलापन लिये हुई थी मानों चन्द्रमा अपने मित्र कामदेव के प्रेम से आकर, रानी के मुँह में निवास करने लगा था॥२॥ उस रानी के मणियम पलंग के दोनों ओर पति 'कामन्द' के प्रेम से आई हुई रति और प्रीति दोनों पत्नियां मानों प्रतिमा के रूप में चमकती थीं॥३॥ ऐसा लगता था कि विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती उस गर्भस्थ बालक की सेवा के लिए आई हुई विद्याएं रानी की सेवा कर रही थीं॥४॥ रानी मानों गर्भस्थ बालक के अभिषेक के लिए गहरे हरे रंग के नवपल्लवों के समान श्याम मुखवाले दो कुचों को कलशों के सदृश वहन करती थी॥५॥ स्वच्छ चमकीले और प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेवाली भूमि से युक्त शयन-गृह में सुखद शय्या पर सोई हुई रानी बहुत ही भली मालूम पड़ती थी॥६॥ वह रानी मानों उत्पन्न होनेवाले बालक की सुन्दर कान्ति से पराजित होने के भय से चंचल पानीवाले रत्नों की राशि से शोभित हो रही थी। (अर्थात् उसके शरीर पर धारण किये हुए बहुमूल्य रत्नों का पानी चंचल हो रहा था झलमल-झलमल कर रहा था) ॥७॥ भवन के मध्य में जल हुए रत्न के अन्दर दीखती हुई छाया ऐसी मालूम होती थी कि मानो गतस्थ चक्रवर्ती को प्रणाम करने के लिए विद्याधरों की राजलक्ष्मी आकाश से उतर रही हो॥८॥ वह गर्भवती रानी मन्त्रसिद्धि में लगे हुए साधकों की कथाओं तथा इसी प्रकार की बातों में रुचि रखती थी॥९॥ मरण बात गाती हुई विद्याधरों की सुन्दर रमणियां स्वप्न में रानी की स्तुति करती हुई दीखती थीं॥१०॥ रानी जागने पर भी आकाश में उड़कर विहार करने और भूमि के कौतुक (तमाशे) देखने की इच्छा करती थी॥११॥ मन्त्री यौगन्धरायण तन्त्र मन्त्र और ऐन्द्रजालिक प्रयोगों से रानी की इच्छा को पूरी करता था॥१२॥ नागरिक स्त्रियों की आँखों को आश्चर्य देनेवाले उन आकाश-विहार के प्रयोगों से वह आकाश में विहार करती थी॥१३॥ एक बार जब अपने भवन में बैठी हुई थी उसके हृदय में विद्याधरों की उदारतापूर्ण कथा सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई॥१४॥ तब उस रानी की प्रार्थना पर सभी लोगों के सामने यौगन्धरायण ने यह कथा कही॥१५॥
४३२ कथासरित्सागर
४३२ कथासरित्सागर जीमूतवाहनकथा¹ अस्त्यम्बिकाजनयिता नगेन्द्रो हिमवानिति। न केवलं गिरीणां यो गुरूणां रीप्सितेरपि॥१६॥ विद्याधरनिवासश्च तस्मिन्विद्याधराधिपः। उवास राजा जीमूतकेतुर्नाम महाबलः॥१७॥ तस्याभूत्कल्पवृक्षश्च गृहे पितृक्रमागतः। नाम्नामर्थेन विख्यातो यो मनोरथदायकः॥१८॥ कदाचिच्च स जीमूतकेतू राजाभ्युपेत्य तम्। उद्याने देवतात्मानं कल्पद्रुममभाषत॥१९॥ सर्वदा प्राप्यतेऽस्माभिस्त्वत्तः सर्वमभीप्सितम्। तदधुनाय मे देहि देव पुत्रं गुणान्वितम्॥२०॥ ततः कल्पद्रुमोऽवादीद्राजन्नुत्पत्स्यते तव। जातिस्मरो दानवीरः सर्वभूतहिते सुतः॥२१॥ तच्छ्रुत्वा स प्रहृष्टः संन्कल्पवृक्षं प्रणम्य तम्। गत्वा निवेद्य तद्राजा निजां देवीमनन्दयत्॥२२॥ अथ तस्याचिरादेव राज्ञः सूनुरजायत। जीमूतवाहन इति नाम्ना स विदधे पिता॥२३॥ ततः सहजया साकं सर्वभूतानुकम्पया। जगाम स महासत्त्वो वृद्धिं जीमूतवाहनः॥२४॥ क्रमाच्च यौवराज्यस्थं परिषर्याप्रसादितम्। लोकानुकम्पी पितरं विजने स व्यजिज्ञपत्॥२५॥ जानामि तात यद्भावा भवऽस्मिन्क्षणभङ्गुराः। स्थिरं तु महतामेकमाकल्पममलं यशः॥२६॥ परोपकृतिसम्भूतं तदेवेह यदि हन्त तत्। किमन्यैस्स्नायुदाराणां धनैः प्राणाधिकप्रियैः॥२७॥ सम्पदश्च विद्युदिव सा लोकलोचनस्वेदकृत्। सोल्ला क्वापि रुजं याति या परानुपकारिणी॥२८॥ १ इयमेव कथा श्रीहर्षप्रणीतस्य नागानन्दनाटकस्याधारभूता।
चतुर्थ लम्बक ४३३
चतुर्थ लम्बक ४३३ जीमूतवाहन¹ की कथा पार्वती का पिता और पर्वतों का राजा हिमालय नाम का पर्वत है, जो गौरी का ही पिता नहीं, गौरीपति शिवजी का भी गृह (श्वशुर) है॥१६॥ उस पर्वत में विद्याधरों² का निवास है। अतः उस महान् पर्वत पर जीमूतकेतु नाम का विद्याधरों का राजा निवास करता था॥१७॥ उसके घर के उद्यान में कुल-परम्परा से एक उद्यान था, जो अपने नाम के अनुसार मनोरथ पूर्ण करने में प्रसिद्ध था॥१८॥ किसी समय राजा जीमूतकेतु ने उद्यान में उस कल्पवृक्ष के समीप जाकर देवता-स्वरूप उस वृक्ष से प्रार्थना की—॥१९॥ 'हे देवस्वरूप, हमलोग सदा से तुम्हारे द्वारा अपना मनोरथ सिद्ध करते आए हैं। इसलिए मुझ पुत्रहीन को पुत्र प्रदान करो'॥२०॥ तब कल्पवृक्ष ने कहा—'हे राजन्! तुम्हें पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाला, प्राणियों का हित करनेवाला और दानवीर पुत्र उत्पन्न होगा'॥२१॥ यह सुनकर प्रसन्न उस राजा ने यह समाचार रानी को सुनाकर उसे भी प्रसन्न किया॥२२॥ तदनन्तर शीघ्र ही राजा जीमूतकेतु के यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ और पिता ने उसका नाम जीमूतवाहन रखा॥२३॥ प्राणियों पर दया के साथ-साथ वह महात्मा बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगा॥२४॥ एक बार युवराज पद को प्राप्त वह परोपकारी जीमूतवाहन एकान्त में सेवा से प्रसन्न पिता से बोला—'पिताजी! इस संसार में जो कुछ भी है, वह सब नश्वर (नाशवान्) है। स्थिर रहनेवाला केवल महान् व्यक्तियों का निर्मल यश ही है॥२५॥ यदि परोपकार से उत्पन्न यह यश है, तो फिर उदारव्यक्तियों के लिए प्राणों से प्यारा धन क्या है? ॥२६॥ सम्पत्ति बिजली के समान चञ्चल तथा आँखों की ज्योति को कष्ट देनेवाली चञ्चल और पुरुष को हानि पहुँचानेवाली वस्तु है॥२७॥
१ यही श्रीहर्ष के नागानन्द नाटक की आधारभूत कथा है। २ मन्त्र-तन्त्र-विद्याओं के द्वारा बने हुए देवताओं की एक जाति। ५५
४३४ कथासरित्सागरे
४३४ कथासरित्सागरे सदैव कल्पविटपी कामदो योऽस्ति न स चेत्। परार्थं विनियुज्येत तदाप्त तत्फलं भवेत् ॥२९॥ तत्सत्वाहं करोमीह यथैतस्य समृद्धिभिः। अदारिद्रा भवेदेषा सर्वापिजनसंहतिः ॥३०॥ इति विज्ञाप्य पितरं तदनुज्ञामवाप्य सः। जीमूतवाहनो गत्वा तं कल्पद्रुममब्रवीत् ॥३१॥ देव ! त्वं शश्वदस्माकमभीष्टफलदायकः। तदेकमिदमद्य त्वं मम पूरय वाञ्छितम् ॥३२॥ अदारिद्रां कुरुष्वैतां पृथिवीमखिलां सखे। स्वस्त्यस्तु ते प्रवृत्तोऽसि लोकाय द्रविणार्थिने ॥३३॥ इत्युक्तस्तेन धीरेण कल्पवृक्षो ववर्ष सः। कनकं भूतले भूरि ननन्दुश्चाखिला प्रजाः ॥३४॥ दयालुर्वोधिसत्त्वांशः कोऽन्यो जीमूतवाहनात्। शक्नुयादर्थिसात्कर्त्तुमपि कल्पद्रुमं कृती ॥३५॥ इति ज्ञातानुरागासु ततो दिक्षु विदिक्ष्वपि। जीमूतवाहनस्योच्चैः पप्रथे विशदं यशः ॥३६॥ ततं पुत्रप्रथावर्द्धमूलं राज्यं समत्सराः। दृष्ट्वा जीमूतकेतोस्तद्गोत्रजा विकृतिं ययुः ॥३७॥ दानोपयुक्तसत्कल्पवृक्षमुक्तास्पदं च तत्। मेनिरे निष्प्रभावत्वाज्जेतुं सुकरमेव ते ॥३८॥ ततः सम्भूय युद्धाय कृतबुद्धिषु तेषु च। पितरं तमुवाचेदं धीरो जीमूतवाहनः ॥३९॥ यथा शरीरमेवेदं जलवुद्बुदसन्निभम्। प्रवातदीपचपलास्तथा कस्य कृते श्रियः ॥४०॥ ता अप्यन्योपमर्द्देन मनस्वी कोऽभिवाञ्छति। तस्मात्तात ! मया नैव योद्धव्यं गोत्रजैः सह ॥४१॥ राज्यं त्यक्त्वा तु गन्तव्यमितः क्वापि वनं मया ॥ मास्तां कृपणा एते मा भूत्स्वकुलसंक्षयः ॥४२॥ इत्युक्तवन्तं जीमूतवाहनं स पिता ततः। जीमूतकेतुरप्येवं जगाद कृतनिश्चयः ॥४३॥
चतुर्थ लम्बक ४३५
चतुर्थ लम्बक ४३५ इसलिए हमारे यहाँ यह जो वांछित फलदेने वाला कल्पवृक्ष है, उसे यदि परोपकार के लिए प्रयुक्त किया जाय तो उसकी सफलता हो ॥२९॥ इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस वृक्ष की सम्पत्ति से संसार के समस्त याचक धनी हो जायं ॥३०॥ पिता को इस प्रकार निवेदन करके और उनकी आज्ञा प्राप्त करके जीमूतवाहन ने कल्पद्रुम के पास आकर कहा —॥३१॥ 'हे देव ! तुम सर्वथा हमारे अभीष्ट फलों को देते रहे। आज तुम मेरी एक अभिलाषा पूर्ण करो ॥३२॥ हे देव ! तुम इस सारी पृथ्वी को दरिद्रता से रहित कर दो। तुम्हारा कल्याण हो। मैंने तुम्हें धन चाहनेवाले याचकों के लिए दे दिया ॥३३॥ धैर्यशाली जीमूतवाहन द्वारा इस प्रकार प्रार्थित उस कल्पवृक्ष ने भूमि पर प्रचुर स्वर्ण की वर्षा की और सारी प्रजा प्रसन्न हो गई ॥३४॥ दयालु और बोधिसत्त्व के अंश जीमूतवाहन को छोड़कर और कौन ऐसा उदार है, जो कल्पद्रुम को भी याचकों के लिए दे डाले ॥३५॥ इस प्रकार जीमूतवाहन के प्रति दिग्दिगन्त अनुरागपूर्ण हो गये और जीमूतवाहन का उज्ज्वल तथा महान् यश चारों ओर फैल गया ॥३६॥ तब जीमूतकेतु के राज्य को पुत्र-परम्परा से चलनेवाला देखकर, उनके कुटुम्बियों को ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वे राजा के विरुद्ध हो गये ॥३७॥ दान के लिए उत्सर्ग किये गये कल्पवृक्ष के निःसार हो जाने पर, अतएव राजा का प्रभाव हीन समझकर उन्होंने उनपर विजय प्राप्त करना आसान समझा ॥३८॥ तदनन्तर उनके इकट्ठे होकर युद्ध के लिए तैयार हो जाने पर धैर्यशाली जीमूतवाहन ने पिता से कहा— जैसे यह शरीर जल के बुलबुला के समान है, उसी प्रकार जीभों के लोलत्व के समान यह राज्यलक्ष्मी किसके उपभोग में आ सकती है। ऐसी अस्थिर लक्ष्मी के लिए कौन बुद्धिमान् आपस में संघर्ष करना चाहता है। इसलिए पिता ! मैं आज कुटुम्बियों के साथ युद्ध करना नहीं चाहता। सोचता हूँ कि इस राज्य को छोड़कर कहीं वन में चला जाना चाहिए। वे हमारे राज्य भोगें और अपने कुल का भी क्षय न हो ॥३९-४०॥ ऐसा कहते हुए जीमूतवाहन को पिता जीमूतकेतु ने निश्चय करके कहा—'बेटा! मैं भी उसी वन में जाना चाहता हूँ ॥४१-४२॥
४३६ कथासरित्सागर
४३६ कथासरित्सागर
मयापि पुत्र गन्तव्यं का हि वृद्धस्य मे स्पृहा। राज्ये तृण इव त्यक्ते यूनापि कृपया त्वया॥४४॥ एवमुक्तवता सार्धं सभार्येण तथेति सः। पित्रा जगाम जीमूतवाहनो मलयाचलम्॥४५॥ तत्राधिवासे सिद्धानां चन्दनच्छन्ननिर्झरे। स तस्याश्रमपदं परिचर्यापरः पितुः॥४६॥ अथ सिद्धाधिराजस्य बली विश्वावसोः सुतः। मित्रं मित्रावसुर्नाम तस्यात्र समपद्यत॥४७॥ तत्स्वसारं च सोऽपश्यदेकान्ते जातु कन्यकाम्। जन्मान्तरप्रियतमां ज्ञानी जीमूतवाहनः॥४८॥ तस्याश्च स वयोगुर्व्या यूनोरन्योन्यवीक्षणम्। अभून्मनोमृगामन्दाऽनुरागवल्लमाश्रितम् ॥४९॥ ततोऽभ्यागममभ्येत्य त्रिजगत्पूज्यमब्रवीत्। जीमूतवाहनं प्रीतः स मित्रावसुरात्मवान्॥५०॥ मम्या मलयवत्याख्या स्वसा मद्रसिके स्थीयताम्। तामहं ते प्रयच्छामि ममेच्छा मान्यतां कृपा॥५१॥ समाश्रित्य स जीमूतवाहनोऽपि जगाद तम्। यथैषात्र ममाभूत्सा भार्या पूर्वैरपि जन्मनि॥५२॥ इदं च तत्रैव मे ज्ञाता स्थितिं पूर्वं गृहम्। जातिस्मरोऽस्म्यहं सर्वं पूर्ववृत्तं स्मरामि तत्॥५३॥ इत्युक्तेन तदाऽमित्रावसुनाऽथ तम्। वृत्तान्तोऽथया साऽप्युक्ता श्रोतुं हि मे॥५४॥ तज्जिज्ञासया गत्वा तस्मै जीमूतवाहनः।
श्रीजीमूतवाहनस्य पूर्वजन्मकथा
गृहस्थोऽहमतुष्टोऽस्य पूर्वजन्मनिवासिनाम्॥५५॥ अर्थिनां पूर्तिकृत् सोऽहमायुर्विद्वत्त्वयोगवान्। स्थितस्त्वनुकम्पावान् लोकेऽर्थं फलवान्॥५६॥ ततश्चैव पिताऽदात् श्रीमत्यो नैव इव। समन्ताद्बहुदेशेषु रत्नानीव जगौ मम॥५७॥
चतुर्थ लम्बक ४३७
चतुर्थ लम्बक ४३७ मुझ वृद्ध की अब कौन-सी चाह शेष रह गई है। जबकि युवक होकर तुम राज्य को तृण के समान त्याग रहे हो' ॥४४॥ पत्नी के साथ राजा के इस प्रकार कहने पर जीमूतवाहन पिता के साथ मलयपर्वत को चला गया ॥४५॥ चन्दन वृक्षों से आवृत झरनोंवाले और सिद्ध-महात्माओं के निवासस्थान मलयपर्वत में वह आश्रम बनाकर पिता की सेवा में तत्पर हो गया ॥४६॥ वहाँ पर सिद्धों के राजा विश्वावसु का पुत्र मित्रावसु जीमूतवाहन का मित्र बन गया। ज्ञानी जीमूतवाहन ने अपने मित्र विश्वावसु की बहिन को किसी समय एकान्त में देखा जो पूर्वजन्म में उसकी प्यारी पत्नी थी ॥४७-४८॥ उस समय उन दोनों युवकों का परस्पर दर्शन मन-रूपी मृग का दृढ़ बन्धन करने में रस्सी के समान हुआ—अर्थात् दोनों ही दोनों के प्रति प्रेम-बंधन में बँध गये ॥४९॥ कुछ समय के अनन्तर तीनों लोक के पूज्य जीमूतवाहन के समीप आकर मित्रावसु प्रसन्नतापूर्वक बोला—॥५०॥ 'मित्र! मलयवती नाम की मेरी छोटी बहिन है। उसे मैं तुम्हें देता हूँ। तुम मना न करना ॥५१॥ यह सुनते ही जीमूतवाहन भी बोला कि 'युवराज! पूर्वजन्म में भी वह मेरी पत्नी थी और उसी जन्म में तुम मेरे दूसरे हृदय के समान मित्र थे ॥५२॥ मैं पूर्वजन्म का ज्ञानी हूँ। इसलिए अपने तुम्हारे और उसके पूर्वजन्म का वृत्तान्त स्मरण करता हूँ ॥५३॥ इस प्रकार कहते हुए जीमूतवाहन का मित्रावसु ने कहा कि 'पूर्वजन्म की कथा सुनाओ! उसे सुनने की मेरी बहुत इच्छा है' ॥५४॥ जीमूतवाहन के पूर्वजन्म की कथा मित्रावसु से यह सुनकर जीमूतवाहन ने पूर्वजन्म की कथा उसके लिए कहनी प्रारम्भ की ॥५५॥ मैं पूर्वजन्म में आकाश में विचरण करनेवाला विद्याधर था। किसी समय उड़ते-उड़ते मैं हिमालय के शिखर का उल्लंघन कर गया। उस शिखर के नीचे शिवजी पार्वती के साथ विहार कर रहे थे ॥५६॥ इस प्रकार शिखर लंघन से क्रुद्ध शिवजी ने मुझे शाप दिया कि मर्त्ययोनि में तेरा पतन हो' ॥५७॥
४३८ कथासरित्सागर
४३८ कथासरित्सागर
प्राप्य विद्याधरीं भार्या नियोज्य स्वपदे सुतम्। पुनर्विद्याधरीं योनिं स्मृतजातिः प्रपत्स्यते ॥५८॥ एवं निशम्य शापान्तमुक्त्वा शर्वे तिरोहिते। अचिरेणैव जातोऽहं भूतले वणिजां कुले ॥५९॥ नगर्यां वलभीनाम्न्यां महाधनवणिक्सुतः। वसुदत्ताभिधानं संवृद्धिं च गतवानहम् ॥६०॥ कालेन यौवनस्थश्च पित्रा कृतपरिच्छदः। द्वीपान्तरं गतोऽभूवं वणिज्याय तदाज्ञया ॥६१॥ आगच्छन्तं ततोऽटव्यां तस्करा विनिपात्य माम्। हृतस्वमनयन्बद्धा स्वपल्लीं चण्डिकागृहम् ॥६२॥ विलोलदीर्घया घोरं रक्तांशुकपताकया। जिघत्सत्तं पशुप्राणान् कृतान्तस्येव जिह्वया ॥६३॥ तत्राहमुपहारार्थमुपनीतो निजस्य तैः। प्रभोः पुलिन्दकाख्यस्य देवीं पूजयतोऽन्तिकम् ॥६४॥ स दृष्ट्वैवार्द्रहृदयः शबरोऽप्यभवन्मयि। व्यक्तिं जन्मान्तरप्रीति र्मनःस्निग्धवशाद्गतम् ॥६५॥ ततो मां मोचयित्वैव बभासे शबराधिपः। ऐच्छदात्मोपहारेण कर्तुं पूजासमापनम् ॥६६॥ मैवं कृथाः प्रसन्नास्मि तव याचस्व मां वरम्। इत्युक्तो दिव्यया वाचा प्रहृष्टश्च जगाद सः ॥६७॥ त्वं प्रसन्ना वरः कोऽन्यस्त्वत्प्राप्त्यानावयोर्द्वयोः। जन्मान्तरेऽपि मे सख्यमनेन वणिजास्त्विति ॥६८॥ एवमस्त्विति शान्तायां वाचि मां शबरोऽथ सः। प्रदत्तमविगण्यैवं प्रेषियाय निजं गृहम् ॥६९॥ मृत्योर्मुक्तात्प्रवासाच्च शनैः प्रत्यागते मयि। अकरोन्नानशूनाम्नः पिता मम महोत्सवम् ॥७०॥ ज्ञात्वा तत्र चापश्यमहं मार्गावलम्बनात्। बद्धंम्रानायितं राज्ञा समेव शबराधिपम् ॥७१॥ गच्छन् पितुरथ विज्ञप्य च महीपतिम्। मोचितः स्वगलक्षण च मया वधनिग्रहात् ॥७२॥
चतुर्थ लम्बक ४३१
चतुर्थ लम्बक ४३१ 'विद्याधरी पत्नी को प्राप्त करके अपने स्थान पर अपने पुत्र को बैठाकर पूर्वजन्म का स्मरण करते हुए पुनः विद्याधर योनि प्राप्त करोगे' ॥५८॥ इस प्रकार शाप का अन्त कहकर शिवजी के अन्तर्धान होने पर मैं पृथ्वी पर वलभी नाम की नगरी में बड़े ही धनी वैश्यकुल में वसुदत्त नाम से उत्पन्न हुआ और बड़ा हुआ ॥५९-६०॥ कुछ समय के पश्चात् युवावस्था में पिता के तैयार कर देने पर उनकी आज्ञा से व्यापार के लिए दूसरे द्वीप में गया ॥६१॥ वहाँ से लौटते हुए मुझे जंगल में लुटेरों ने घेरकर पकड़ लिया। वे मेरा सब कुछ छीनकर और मुझे बाँधकर अपने गाँव के चण्डिका मन्दिर में ले गये ॥६२॥ उस चण्डिका-गृह में काले रंग की लम्बी-लम्बी झण्डियाँ मानो पशुओं के प्राणों का भक्षण करने की इच्छावाले काल की लपलपाती हुई जीभ के समान मालूम हो रही थीं ॥६३॥ उस मन्दिर में बलिदान करने के लिए, वे लुटेरे, मुझे देवी के पूजक पुलिन्दक नामक अपने सरदार के पास ले गये ॥६४॥ वह पुलिन्दक यद्यपि भिल्ल होते हुए भी मुझे देखते ही दया से पिघल गया। बिना कारण ही स्नेह करनेवाला मन पूर्वजन्म के प्रेम-सम्बन्ध को बताता है ॥६५॥ तब उस भील ने मुझे बलिदान से बचाकर अपनी बलि देकर देवी को प्रसन्न करना चाहा ॥६६॥ 'ऐसा न करो मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। वर माँग। इस प्रकार आकाशवाणी ने कहा तब वह भीलराज बोला-'हे देवि तू प्रसन्न है तो और क्या वर माँगू इस वैश्य के साथ अगले जन्म में भी मेरी मित्रता बनी रहे यही वर दो' ॥६७-६८॥ 'ऐसा ही हो'—इस प्रकार वर देकर वाणी के बन्द हो जाने पर उस भील ने मेरे धन से भी अधिक धन देकर मुझे अपने घर भेज दिया ॥६९॥ इस प्रकार लम्बी यात्रा और मृत्यु के मुख से मेरे लौटकर आने पर समस्त वृत्तान्त जानकर मेरे पिता ने प्रसन्नता से भारी उत्सव किया ॥७०॥ कुछ समय के अनन्तर मैंने अपने नगर में व्यापारियों को लूट लेने के कारण राजा द्वारा पकड़वाकर लाये गये उस लुटेरों के सरदार भीलराज को देखा ॥७१॥ उसी समय मैंने पिता से कहकर और राजा को सूचित कर उस भीलराज का सब दण्ड स्वयं-सहा देकर उसे प्राणदण्ड से बचा लिया ॥७२॥
प्राणदानोपकारस्य कुर्व्वन् प्रत्युपक्रियाम्। आनीय च गृहं प्रीत्या पूर्णं सम्भावितद्विजम्॥७३॥ सत्कृत्य प्रपितक्षाध हृदयं प्रमपेक्षरम्। निधाय मयि पत्नीं स्वां प्रायात्स शबराधिप ॥७४॥ तत्र प्रत्युपकारार्थं चिन्तयन्प्राभृतं मम। स्वल्पं स मेने स्वाधीन मुक्ताकस्तूरिकाद्यपि॥७५॥ तत सातिशय प्राप्तं मुक्तासारं स मत्कृते। धनुद्वितीयः प्रययौ गजान् हन्तु हिमाचलम्॥७६॥ भ्रमश्च तत्र तीरन्यद्ववागार महत्तर । प्राप तुल्य कृतप्रीतिस्तदम्भोजिन्नरागिभिः॥७७॥ तत्राणक्ष्यम्बुपानायैमागम वन्यहस्तिनाम्। छन्नः स तस्थावेकान्ते समापस्सज्जिघांसया॥७८॥ तावत्तत्र सरस्तीरगतं पूजयितु हरम्। आगतामद्भुताकारां कुमारीं सिंहवाहनाम्॥७९॥ स ददर्श तुषाराद्रिराजपुत्रीमिवापराम्। परिचर्यापरां शम्भोः कन्यकामाववर्तिनीम्॥८०॥ दृष्ट्वा च विस्मयाक्रान्तः शबरः स व्यचिन्तयत्। केयं स्याद्यदि मर्त्यस्त्री तत्कथं सिंहवाहना॥८१॥ अथ दिव्या कथं दृश्या मादृशस्त्विय ध्रुवम्। चक्षुषो पूर्वपुण्यानां मूर्त्ता परिणतिर्मम॥८२॥ अन्यथा यदि मित्रं त योजयेयमहं शत । वाप्यन्यत्र मया तस्य कृता स्यात्प्रत्युपक्रिया॥८३॥ तदेतामुपसर्पामि तावज्जिज्ञासितुं वरम्। इत्यालोच्य स मित्रं मे शवरस्तामुपाययौ॥८४॥ तावच्च सावतीयैव निष्ठाच्छायानिवारिम । कन्यागस्य सरः पद्मान्यवचतु प्रचक्रमे॥८५॥ तं च दृष्ट्वान्तिकप्राप्तं शबरं सा कृतानतिम्। अपूर्वमतिथिप्रीतया स्वागते मान्वरञ्जयत्॥८६॥ कस्त्वं किं चागतोऽस्येतां भूमिमत्यन्तदुर्गमाम्। इति पृष्टवतीं तां च शवरः प्रत्युवाच सः॥८७॥
चतुर्थ लम्बक ४४१
चतुर्थ लम्बक ४४१ मैंने अपने प्राणदान का बदला इस प्रकार चुकाकर और प्रेम से भीलराज को अपने घर लाकर उसका बहुत दिनों तक स्वागत-सत्कार किया॥७३॥ अन्त में उसका समुचित सत्कार करके उसे घर भेज दिया। वह भीलराज भी अपना प्रेमपूर्ण हृदय देकर अपने गाँव की ओर गया॥७४॥ घर जाकर मेरा प्रत्युपकार करने (बदला देने) के लिए अपने समीप के मोती कस्तूरी आदि को भी उसने पर्याप्त नहीं समझा॥७५॥ इसलिए मेरे लिए बहुमूल्य और दुर्लभ गजमुक्ता¹ प्राप्त करने के लिए वह धनुष-बाण के साथ हिमाचल को गया॥७६॥ वहाँ घूमते हुए उसने देवमन्दिर के साथ एक बड़े तालाब को देखा जहाँ मित्र अर्थात् सूर्य से प्रीति रखनेवाले खिले कमलों को देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ॥७७॥ उस तालाब में पानी पीने के लिए आनेवाले हाथियों की आशा से उन्हें मारने के लिए धनुष लिये हुए वह एकान्त में वहीं छिप गया॥७८॥ छिपकर उसने देखा कि एक अद्भुत सुन्दरी कुमारी शिव-पूजन के लिए सिंह पर सवार होकर तालाब पर आई॥७९॥ वह भीलराज शिवजी की पूजा के लिए कन्या के रूप में आई हुई दूसरी हिमाचल- नन्दिनी पार्वती के समान उसे देखकर आश्चर्यचकित हो मन में सोचने लगा कि 'यह कौन कन्या है यदि मानव-कन्या है, तो वह सिंहवाहिनी कैसे यदि देवकन्या है तो मुझ-जैसे लोग इसे कैसे देख सकते हैं।' अतः अवश्य ही यह मेरी आँखों के पूर्व-पुण्यों की शरीरधारिणी मूर्ति है॥८०-८२॥ यदि इस सुन्दरी से मैं अपने मित्र वसुदत्त का सम्बन्ध करादूँ तो यह उसका समुचित प्रत्युपकार हो सकता है॥८३॥ 'इसलिए इसकी इच्छा जानने के लिए मैं इसके समीप जाता हूँ'—यह सोचकर वह मित्र उसके पास गया॥८४॥ तब वह कन्या छाया में बैठे हुए शेर से उतरकर पूजा के लिए पुष्प-चयन करने तालाब उतरी॥८५॥ उस कन्या ने पास आकर प्रणाम करते हुए, प्रथम बार ही देखे हुए भिल्लराज को अतिथि-प्रेम के कारण स्वागत करते हुए प्रसन्न किया—और पूछा 'तू कौन है तथा इस दुर्गम भूमि में कैसे आया है? उसके इस प्रकार पूछने पर भीलराज बोला—॥८६-८७॥ १ गज-हाथी मुक्ता=मोती। हाथी के मस्तक से निकला मोती बहुमूल्य और कल्याणकारी होता है। ५६
४४२ कथासरित्सागर
४४२ कथासरित्सागर
अहं भवानीपादैकशरणः शबराधिपः। आगतोऽस्मि च मातङ्गमक्ताहेतोरिदं वनम् ॥८८॥ त्वां च दृष्ट्वाधुनारम्यो देवि प्राणप्रयः सुहृत्। सार्थवाहसुतः श्रीमान् वसुदत्तो मया स्मृतः ॥८९॥ स हि त्वमिव रूपेण यौवनेन च सुन्दरि!। अद्वितीयोऽस्य विश्वस्य नयनामृतनिर्भरः ॥९०॥ सा धन्या कन्यका लोके यस्यास्तेनेह युज्यते। मैत्रीदानदयाधैर्यनिविग्ना कङ्कणी करः ॥९१॥ तत्त्वदाकृतिरेषा चेत्तादृशेन न युज्यते। व्यर्थं वहति तन्कामः कोदण्डमिति मे व्यथा ॥९२॥ इति व्याधभटवचनैः सद्योऽपहृतमानसा। सामूत्कुमारी कन्दर्पमोहमन्त्राक्षरैरिव ॥९३॥ उवाच तं च शयरं प्रेर्यमाणा मनोभुवा। क्व स ते सुहृदानीय सान्त्व मे दश्यतामिति ॥९४॥ तच्छ्रुत्वा च तथेत्युक्त्वा सामामन्त्र्य सत्वरं सः। कृतार्थमानी मुदितः प्रतस्थे शबरस्ततः ॥९५॥ प्राप्य स्वपल्लीमादाय मुक्तामृगमदादिकम्। भूरि भारशतैर्हायमस्मद्गृहमथाययौ ॥९६॥ सर्वं पुरस्कृतस्तत्र प्रविश्य प्रामृतं च तत्। मल्पित्रे म बहुस्वर्णलक्षमूल्यं न्यवेदयत् ॥९७॥ उत्सवेन च यातेऽस्मिन्दिने रात्रौ स मे रहः। कन्यादानवृत्तान्तं तमामूलाद्व्यवर्णयत् ॥९८॥ एहि तत्रैव गच्छाव इत्यक्त्वा च समुत्सुकम्। मामादाय निशि स्वरं स प्रायाच्छ्बगधिपः ॥९९॥ प्रातश्च मां गतं क्वापि बुद्धवा महावराधिपम्। तत्प्रीतिप्रत्ययात्सम्पौ धृतिमालम्ब्य मन्पिता ॥१००॥ अहूं च प्रापितोऽभूव क्रमात्तंन तरस्विना। शबरं तुषाराद्रिं शून्याम्बरशिखर्मणा ॥१०१॥ तच्च प्राप्य मरे माथ स्नात्वा स्वादुफलाशनी। अहूं च स च तामेकां वने तत्रोषितो निशाम् ॥१०२॥ स्तनामि शीजकुसुमं भृङ्गीमञ्जीरसुन्दरम्। गुमगन्धबहं हारि ज्वलितौषधिदीपकम् ॥१०३॥
चतुर्थ लम्बक ४४५
चतुर्थ लम्बक ४४५ मैं भवानीभक्त शबरराज हूँ। गजमुक्ता लेने के हेतु इस जंगल में आया हूँ तुम्हें देखकर मुझे अपना एक जीवनाधार आत्मीय मित्र स्मरण आ गया जो एक बड़े व्यापारी और धनी का पुत्र है उसका नाम वसुदत्त है ॥८८-८९॥ हे सुवदि! वह रूप और यौवन में तुम्हारे ही समान सुन्दर है। आँखों के लिए मानों अमृत का झरना है ऐसा पुरुष इस विश्व में दूसरा नहीं है॥९०॥ इस संसार में वह लड़की धन्य होगी जिसका वह पाणिग्रहण करेगा। वह मित्रता दया दान और धैर्य का समुद्र है॥९१॥ यदि तुम्हारी ऐसी सुन्दर आकृति उसे न मिली तो कामदेव का धनुष-बाण धारण करना ही व्यर्थ हो जायगा। इसका मुझे दुःख है॥९२॥ इस प्रकार कामदेव के मोहन-मन्त्रों के समान भीलराज के वचनों से वह कुमारी तुरन्त अन्यमनस्क हो उठी॥९३॥ साथ ही कामदेव से प्रेरित हो उस भील से बोली कि 'तुम्हारा वह मित्र कहाँ है उसे लाकर दिखाओ ॥९४॥ यह सुनकर और अच्छा लाता हूँ—कहकर वह भील अपने को सफल समझता हुआ प्रसन्नता से चला ॥९५॥ तदनन्तर अपने घर जाकर मोती कस्तूरी आदि के सैकड़ों बोझे लदवाकर वह वसुदत्त के घर पहुँचा ॥९६॥ वहाँ सभी लोगों द्वारा स्वागत किये गये भीलराज ने कई लाख मुद्राओं के मूल्य के उस उपहार को वसुदत्त के पिता को भेंट किया ॥९७॥ हँसी-खुशी में दिन व्यतीत होने पर रात्रि में एकान्त के समय भीलराज ने मेरे पास आकर कन्या को देखने का समस्त वृत्तान्त प्रारम्भ से सुनाया और कहा कि 'चलो वहीं चलें'—ऐसा कहकर रात्रि में ही मुझे साथ लेकर भीलराज चल पड़ा॥ ९८ ॥ प्रातःकाल ही भीलराज के साथ मुझे कहीं चला गया जानकर मेरे पिता ने भीलराज में विश्वस्त होकर धैर्यपूर्वक दिन व्यतीत किये ॥९९॥ शीघ्र चलनेवाले उस भीलराज ने मार्ग में मेरी सहायता करते हुए मुझे हिमाचल पर पहुँचा दिया॥१००॥ मैं और वह दोनों सायंकाल उस तालाब पर पहुँचे और स्नान करके स्वादिष्टफल खाकर उस रात वहीं सो गये। वह सुन्दर स्थान खिले हुए विविध पुष्पों से सुगन्धित भ्रमरियों के संगीत से आकर्षक और रात्रि में जलनेवाली औषधियों से आलोकित था॥१०१-१०२॥
रतेस्तद्वासवेश्मेव विधात्र्यै गिरिकाननम् । आवयोरभवल्लक्ष्म पिवतोस्तत्सरोजलम् ॥१४॥ ततोऽन्येषु प्रतिपदं तत्तत्पुरुकलिकामृता । प्रत्युद्गतेव मनसा मम तन्मार्गभाविना ॥१५॥ चक्षुषा दक्षिणेनापि सूचितागमनामूना । दिवुक्षयेव स्फुरता सा कन्यात्रागताभवत् ॥१०६॥ सटारुत्सिंहपृष्ठस्था सुभ्रूदृष्टा मया च सा । शरव्यम्भोघरोत्सङ्गसङ्गिनीवन्द्यवी कला ॥१०७॥ विलसद्विस्मयौत्सुक्यसाध्वसं पश्यतश्च ताम् । ममावर्तत तत्काल न जाने हृदय कथम् ॥१०८॥ अथावतीर्य सिंहात्सा पुष्पाण्युच्चित्य कन्यका । स्नात्वा सरसि तत्तीरगत हरमपूजयत् ॥१०९॥ पूजावसाने चोपैत्य स सखा शबरो मम । प्रणम्यात्मानमावेद्य तामबोचत् कृतादराम् ॥११०॥ आनीतः स मया देवी सुहृद्योग्यो वरस्तव । मन्यस यदि तत्तुभ्य दर्शयाम्यधुनैव तम् ॥१११॥ तच्छ्रुत्वा दर्शयेत्युक्ते तया स शबरस्ततः । आगत्य निकटं नीत्वा मां तस्याः समदर्शयत् ॥११२॥ सापि मां तिर्यगालोक्य चक्षुषा प्रणयलुठता । मदनावेशसन्नगा शबरेश तमभ्यधात् ॥११३॥ सखा ते मानुषो नाय कामः कोऽप्ययमागतः । मद्गच्छनाय देवोऽस्य मर्त्यस्याप्याकृति कृतः ॥११४॥ तदाकर्ण्योक्तवानस्मि तां प्रत्याययितुं स्वयम् । सत्यं सुवरि ! मर्त्योऽहं किं व्याजनाजने जने ॥११५॥ अह हि सार्थवाहस्य वल्मीकासिनः सुतः । महाधनाभिधानस्य महेश्वरवराजितः ॥११६॥ तपस्यन्स हि पुत्रार्थमुद्दिश्य शशिशेखरम् । समादिष्टस्ततस्तेन स्वप्ने देवेन तुष्यता ॥११७॥ उत्तिष्ठोत्तस्यते कोऽपि महात्मा तनयस्तव । रहस्यं परमं यत्तत्सम्प्रवक्ष्याम विस्तरम् ॥११८॥
चतुर्थ लम्बक ४४५
[Header] चतुर्थ लम्बक ४४५
वह पर्वतीय प्रदेश उस सरोवर के निर्मल जल को पीते हुए सोयों के विश्राम के लिए रति के निवास-स्थान के समान सुखद हुआ॥१४॥ दूसरे दिन प्रातःकाल विविध प्रकार की उत्कंठाओं के कारण उछलते हुए और उस कन्या के मार्ग पर दौड़ते हुए मन से तथा उसे देखने की इच्छा से फड़कते हुए दाहिने नेत्र से उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि इतने में वह वहाँ आ गई। लहराते अयालवाले सिंह की पीठ पर बैठी उस शुभ्रू को मैंने देखा जो शरद् के मेघ की गोद में चमकती चञ्चलका की तरह लग रही थी। विस्मय उत्सुकता और भय से उसे देखते हुए मेरा हृदय जाने क्यों धड़कने लगा ॥१५-१८॥ वह कन्या वहाँ आकर, तालाब में स्नान कर पुष्प चयन करने लगी। और, तत्पश्चात् वह उस तालाब के तीर पर स्थित शिवजी के मन्दिर में जाकर उनका पूजन करने लगी॥१९॥ पूजा समाप्त होने पर वह मेरा मित्र भील उसके समीप जाकर प्रणामपूर्वक अपना परिचय देने के पश्चात् स्वागत करती हुई उस कन्या से बोला- ॥११॥ 'हे देवि मैं तुम्हारे अनुरूप वर उस मित्र को लाया हूँ। यदि तुम चाहो तो उसे अभी तुम्हें दिखा दूँ' ॥१११॥ यह सुनकर 'दिखाओ' - उसके ऐसा कहने पर वह भील मेरे पास आया और उसने मुझे ले जाकर उसे दिखाया ॥११२॥ परिणामस्वरूप वह भी मुझे प्रेम बरसाती हुई तिरछी आँखों से देखकर काम के वशीभूत होकर भीलराज से बोली - ॥११३॥ यह तुम्हारा मित्र मनुष्य नहीं कोई देवता है, जो मुझे ठगने के लिए आया है; क्योंकि मनुष्य की ऐसी आकृति नहीं हो सकती है ॥११४॥ यह सुनकर उसे विश्वास दिलाने के लिए मैंने स्वयं ही कहा- 'हे सुन्दरि ! मैं सचमुच मनुष्य हूँ। तुम्हारे समान सरल मनुष्य से ठगी करने से क्या लाभ है। मैं वलभी के रहनेवाले महाधन नामक व्यापारी का पुत्र हूँ जो शिवजी की आराधना से उत्पन्न हुआ हूँ ॥११५-११६॥ मेरे पिता ने पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की तपस्या की थी और स्वप्न में शिवजी ने प्रसन्न होकर आदेश दिया था कि 'तुम वलभी में उठो, तुम्हें एक महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा यही मेरी उत्पत्ति का रहस्य है और अधिक कहना व्यर्थ है ॥११७-११८४॥
एतच्छ्रुत्वा प्रबुद्धस्य तस्य कालेन चात्मजः। अहमेव समुत्पन्नो वसुदत्त इति श्रुतः ॥११९॥ अयं च प्लवगाधीशः स्वयंवरसुहृन्मया। देशान्तरगतैन प्राप्तप्राप्तः कृच्छ्रैकबान्धवः ॥१२०॥ एष मे तत्त्वसंक्षेप इत्युक्त्वा विरते मयि। अभाषताथ कन्या सा लज्जयावनतानना ॥१२१॥ अस्येतेमां च जानेऽद्य स्वप्नेऽर्जितवती हरः। प्रातः प्राप्स्यसि भर्तारमिति तुष्टः किलादिशत् ॥१२२॥ तस्मात्त्वमद्य मे भर्त्ता भ्रातायं च गवत्सखः। इति वाक्सुधया सा मामानन्द्य विरताभवत् ॥१२३॥ सम्मन्त्र्याथ तया साकं विवाहाय यथाविधि। अकार्यं निश्चय गन्तु समिन्धोऽहं निज गृहम् ॥१२४॥ [L13: तत सा सिंहमाहूय वाहनं तं स्वसज्ञया। अत्रारोहायंपुत्रेति मामभाषत सुन्दरी ॥१२५॥ अथाहुं तेन सुहृदानुयात शबरण तम्। सिंहमारुह्य दयितामुत्सङ्गे स्वां गृहीतवान् ॥१२६॥ तत प्रस्थितवानस्मि कृतकृत्यो निजं गृहम्। कान्त्या सह सिंहस्थो मित्रे तस्मिन्पुरःसरे ॥१२७॥ तपीयस्तरनिमिशहरिणानिवृत्तय । क्रमेण ते वयं सर्वे सम्प्राप्ता वरुणी पुरीम् ॥१२८॥ तत्र मामागतं दृष्ट्वा सिंहारूढं सवल्लभम्। साश्चर्यस्तद्द्रुतं गत्वा मम पित्रेऽब्रवीज्जनः ॥१२९॥ सोऽपि प्रत्युद्गतो हर्षादवतीर्णं मृगेन्द्रतः। पादानतं दृष्ट्वा मामभ्यनन्दत् सविस्मयः ॥१३०॥ अनन्यसदृशीं तां च कृतपादामिवन्दनाम्। पश्यन्ममोचितां भार्या न माति स्म मुदा क्वचित् ॥१३१॥ प्रवेश्य मन्दिर चास्मान् वृत्तान्त परिपृच्छ्य च। प्रशंस शबराधीशसौहार्दं सोत्सव व्यधात् ॥१३२॥ ततो मौहूर्तिकापद्यावन्त्येधुर्वंरकन्यका। सा मया परिणीताऽभून्मिस्तारिम्बन्युना ॥१३३॥