कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
३८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) शूद्रस्य ब्राह्मणवादिनो देवद्रव्यमवस्तृणतो राजद्विष्टमादिशतो द्विनेत्रभेदिनश्च योगाञ्जनेनान्धत्वमष्टशतो वा दण्डः ।
(२) चोरं पारदारिकं वा मोक्षयतो राजशासनमूनमतिरिक्तं वा लिखतः कन्यां दासीं वा सहिरण्यमपहरतः कूटव्यवहारिणो विमांसविक्रयिणश्च वामहस्तद्विपादवधो नवशतो वा दण्डः । मानुषमांसविक्रये वधः ।
(३) देवपशुप्रतिमामनुष्यक्षेत्रगृहहिरण्यसुवर्णरत्नसस्यापहारिण उत्तमो दण्डः शुद्धवधो वा ।
(४)
पुरुषं चापराधं च कारणं गुरुलाघवम् ।
अनुबन्धं तदात्वं च देशकालौ समीक्ष्य च ॥
उत्तमावरमध्यत्वं प्रदेष्टा दण्डकर्मणि ।
राज्ञश्च प्रकृतीनां च कल्पयेदन्तरा स्थितः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे एकाङ्गवधनिष्क्रयो नाम दशमोऽध्यायः; आदितः षडशीतितमः ।
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(१) जो शूद्र अपने को ब्राह्मण बताये और देव-निमित्त द्रव्य का अपहरण करे तथा ज्योतिषी बनकर जो राजा के भावी अनिष्ट को बताये अथवा बगावत करे या किसी की दोनों आँखें फोड़ दे, ऐसे व्यक्ति को औषधियों का सुरमा लगा कर अंधा कर दिया जाय अथवा उस पर आठ-सौ पण जुरमाना किया जाय ।
(२) चोर या व्यभिचारी को छोड़ देने वाले, राजा की आज्ञा को घटा-बढ़ा कर लिखने वाले, आभूषणों सहित कन्या या दासी का अपहरण करने वाले, छल-कपट का व्यवहार करने वाले, अभक्ष्य पशुओं का मांस बेचने वाले, पुरुष का बायाँ हाथ और दोनों पैर काट दिये जाँय, या उस पर नौ-सौ पण दण्ड किया जाय । आदमी का मांस बेचने वाले को प्राण दण्ड की सजा दी जाय ।
(३) देवता के निमित्त पशु, प्रतिमा, मनुष्य, खेत, घर, हिरण्य, सोना, रत्न और अन्न, इन नौ चीजों की जो भी व्यक्ति चोरी करे उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय या उसको पीडारहित प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।
(४) राजा और आमात्यों को साथ लेकर प्रदेष्टा को चाहिए कि वह दण्ड देते समय अपराध को, अपराध के कारणों को, अपराधी की हैसियत को, वर्तमान तथा भावी परिणामों को और देश-काल की स्थिति को भली-भाँति सोच समझ ले, तदनन्तर न्याय के अनुसार प्रथम, मध्यम तथा उत्तम आदि दण्डों की सजा सुनाये ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में एकाङ्गवधनिष्क्रय नामक दशवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ८६ | ## शुद्धश्चित्रश्च दण्डकल्पः |
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| अध्याय ११ |
(१) कलहे घ्नतः पुरुषं चित्रो घातः । सप्तरात्रस्यान्तः मृते शुद्धवधः पक्षस्यान्तरुत्तमः । मासस्यान्तः पञ्चशतः समुत्थानव्ययश्च ।
(२) शस्त्रेण प्रहरत उत्तमो दण्डः । मदेन हस्तवधः । मोहेन द्विशतः । वधे वधः ।
(३) प्रहारेण गर्भं पातयत उत्तमो दण्डः । भैषज्येन मध्यमः । परिक्लेशेन पूर्वः साहसदण्डः ।
(४) प्रसभं स्त्रीपुरुषघातकाभिसारकनिग्राहकावघोषकावस्कन्दकोपवेधकान् पथि वेश्मप्रतिरोधकान् राजहस्त्यश्वरथानां हिंसकान् स्तेनान् वा शूलानारोहयेयुः ।
शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड
( १ ) कोई व्यक्ति यदि लड़ाई-झगड़े में किसी व्यक्ति को जान से मार डाले तो उसको कष्टपूर्वक प्राणदण्ड ( चित्रघात ) की सजा दी जाय । झगड़ा होने के बाद चोट खाया व्यक्ति यदि सात दिन बाद मरे तो मारने वाले को शुद्ध प्राणदण्ड ( कष्टरहित वध ) दिया जाय । यदि पन्द्रह दिन बाद मरे तो उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । एक महीने के बाद मरे तो पाँच-सौ पण जुर्माना और साथ ही मृतक की दवाई-दारू का सारा व्यय भी मरने वाले से वसूल किया जाय ।
( २ ) किसी शस्त्र द्वारा चोट पहुँचाने पर उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । यदि बल के घमंड से चोट पहुँचाये तो उसका हाथ काट दिया जाय । यदि क्रोधावेश में प्रहार करे तो उस पर दो सौ पण दण्ड दिया जाय । यदि जान से मार डाले तो उसको प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।
( ३ ) जो व्यक्ति प्रहार द्वारा गर्भ गिराये उसको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । औषध द्वारा गर्भ गिराने वाले को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय । कठोर काम कराकर गर्भ गिराने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( ४ ) यदि कोई व्यक्ति बलात्कार से किसी स्त्री या पुरुष की हत्या कर डाले, बलात्कार से किसी स्त्री को अपहरण कर ले जाय, बलात्कार से किसी स्त्री की नाक-
| ३९० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
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(१) यश्चैनान् दहेदपनयेद्वा स तमेव दण्डं लभेत, साहसमुत्तमं वा। (२) हिंस्रस्तेनानां भक्तवासोपकरणाग्निमंत्रदानवैयावृत्यकर्मसूत्तमो दण्डः। परिभाषणमविज्ञाने। हिंस्रस्तेनानां पुत्रदारमसमंत्रं विसृजेत्, समंत्रमाददीत। (३) राज्यकामुकमन्तःपुरप्रधर्षकमटव्यमित्रोत्साहकं दुर्गराष्ट्रदण्डकोपकं वा शिरोहस्तप्रादीपकं घातयेत्। (४) ब्राह्मणं तमः प्रवेशयेत्। (५) मातृपितृपुत्रभ्रात्राचार्यतपस्विघातकं वात्वक्छिरःप्रादीपकं घातयेत्। तेषामाक्रोशे जिह्वाच्छेदः। अङ्गाभिरदने तदङ्गान्मोच्यः।
कान काट ले, धमकी देकर हत्या, चोरी की घोषणा करने वाला, बलात्कार से नगर तथा गाँवों का धन ले जाने वाला; भीत तोडकर सेंध लगाने वाला, रास्ते की धर्म-शालाओं तथा प्याउओं की चोरी करने वाला और राजा के हाथी; घोड़े तथा रथों को नष्ट करने, मारने या चुराने वाला, इन सभी प्रकार के अपराधियों को शूली पर लटका दिया जाय।
(१) इन लोगों को जो दाह-संस्कार या क्रिया-कर्म करे या उनको उठा कर गंगा-प्रवाह आदि के लिए ले जाय उसको भी शूली पर चढ़ाया जाय या उत्तम साहस दण्ड दिया जाय।
(२) जो लोग हत्यारों को खाना, रहना, वस्त्र, आग और सलाह दें तथा उनके यहाँ नौकरी करें उन्हें भी उत्तम साहस दण्ड दिया जाय। जिन्हें यह पता नहीं है कि वे हत्यारे या चोर हैं, उन्हें वाक् ताड़ना दी जाय। हत्यारों और चोरों के स्त्री-पुत्र यदि हत्या-चोरी में शामिल न हों तो उन्हें छोड़ दिया जाय, यदि उन्होंने भी किसी प्रकार की सहायता की हो तो उन्हें गिरफ्तार कर यथोचित दण्ड दिया जाय।
(३) राजसिंहासन को हथियाने की इच्छा रखने वाले, अंतःपुर में व्यर्थ का झमेला खड़ा कर देने वाले, आटवी एवं पुलिंद आदि शत्रु राजाओं को उभाड़ने वाले, किले की सेना तथा बाहर की सेना में बगावत फैला देने वाले, पुरुषों के सिर और हाथ में आग लगाकर उनको कत्ल किया जाय।
(४) यदि ऐसा दुष्कर्म करने वाला कोई ब्राह्मण हो तो उसे आजीवन के लिए काल-कोठरी में बंद कर दिया जाय।
(५) जो व्यक्ति माता, पिता, पुत्र, भाई, आचार्य और तपस्वी की हत्या कर डाले, उसके शिर की खाल उतरवा कर उसमें आग लगायी जाय और तब उसको कत्ल कराया जाय। माता-पिता को गाली देने वाले की जीभ कटवा दी जाय। माता-पिता के किसी अंग को कोई जिस अंग से नोचे-खसोटे उसका वही अंग कटवा दिया जाय।
प्र० ८६ : अ० ११ ] शुद्धदण्ड और चित्रदण्ड [ ३९१
(१) यदृच्छाघाते पुंसः, पशुयूथस्तेये च शुद्धवधः । दशावरं च यूथं विद्यात् । (२) उदकधारणं सेतुं भिन्दतस्तत्रैवाप्सु निमज्जनम् । अनुदकमुत्तमः साहसदण्डः । भग्नोत्सृष्टकं मध्यमः । (३) विषदायकं पुरुषं स्त्रियं च पुरुषघ्नीमपः प्रवेशयेद्गर्भिणीम् । गर्भिणीं मासावरप्रजाताम् । (४) पतिगुरुप्रजाघातिकामग्निविषदां सन्धिच्छेदिकां वा गोभिः पादयेत् । (५) विवीतक्षेत्रखलवेश्मद्रव्यहस्तिवनादीपिकमग्निना दाहयेत् । (६) राजाक्रोशकमन्त्रभेदकयोरनिष्टप्रवृत्तिकस्य ब्राह्मणमहानसावलेहिनश्च जिह्वामुत्पाटयेत् । (७) प्रहरणावरणास्तेनमनायुधीयमिषुभिर्घातयेत् । आयुधीयस्योत्तमः ।
( १ ) जो व्यक्ति किसी दूसरे को अचानक ही मार डाले या पशुओं के झुंड की तथा घोड़ों की चोरी करे उसको शुद्ध प्राणदण्ड दिया जाय । कम-से-कम दस पशुओं का एक झुंड समझना चाहिए ।
( २ ) जो व्यक्ति पानी के बाँध को तोड़े, उसको वहीं जल में डुबा कर मार दिया जाय । यदि जल-बाँध में पानी न हो तो तोड़ने वाले को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । यदि वह पहिले ही से टूटा-फूटा हो और तब उसे तोड़ा जाय तो मध्यम साहस दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) विष देकर किसी की हत्या करने वाले स्त्री-पुरुष को जल में डुबाकर खत्म कर दिया जाय, बशर्ते कि वह स्त्री गर्भिणी न हो। यदि गर्भिणी हो तो बच्चा पैदा होने के एक मास बाद उसका ऐसा ही प्राणांत किया जाय ।
( ४ ) अपने पति, गुरु और बच्चे की हत्या करने वाली, आग लगाने वाली, विष देने वाली, सेंध लगाकर चोरी करने वाली, स्त्री को गायों के पैरों के नीचे कुचलवा कर मारा जाय ।
( ५ ) जो व्यक्ति चारागाह, खेत, खलिहान, घर और लकड़ियों तथा हथियारों से सुरक्षित जंगल में आग लगा दे उसको आग में ही जला दिया जाय ।
( ६ ) जो व्यक्ति राजा को गाली दे, गुप्त रहस्य को खोल दे, राजा के अनिष्ट को फैलाये और ब्राह्मण की भोजनशाला से जबर्दस्ती अन्न लेकर खाने लगे उसकी जिह्वा कटवा दी जाय ।
( ७ ) जो आयुधजीवी न होकर भी हथियार और कवच आदि चुराये, उसे सामने खड़ा करके बाणों से मरवा दिया जाय । यदि वह आयुधजीवी हो तो उसको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।
३९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
३९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) मेढ्रफलोपघातिनस्तदेव छेदयेत् । (२) जिह्वानासोपघाते सन्दंशवधः । (३) एते शास्त्रेष्वनुगताः क्लेशदण्डा महात्मनाम् । अक्लिष्टानां तु पापानां धर्म्यः शुद्धवधः स्मृतः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे शुद्धचित्रदण्डकल्पो नाम एकादशोऽध्यायः आदितोः सप्ताशीतितमः ।
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( १ ) यदि कोई व्यक्ति किसी का लिंग और अण्डकोश काट डाले उसका भी लिंग और अण्डकोश कटवा दिया जाय ।
( २ ) किसी की जीभ और नाक काट देने वाले व्यक्ति की कनिष्ठिका और अंगूठा कटवा दिया जाय ।
( ३ ) इस प्रकार के कठोर मृत्युदण्ड मनु आदि महात्माओं के धर्मशास्त्र विषयक ग्रन्थों में प्रतिपादित हैं । इनसे हल्के पापकर्मों के लिए शुद्ध प्राणदण्ड ही धर्मानुकूल समझना चाहिए ।
कण्टकशोधक नामक चतुर्थ अधिकरण में शुद्धचित्रदण्ड नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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प्रकरण ८७ अध्याय १२
कन्याप्रकर्म
(१) सवर्णामप्राप्तफलां कन्यां प्रकुर्वतो हस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः । मृतायां वधः । (२) प्राप्तफलां प्रकुर्वतो मध्यमाप्रदेशिनीवधो द्विशतो वा दण्डः । पितुश्चावहीनं दद्यात् । (३) न च प्राकाम्यमकामायां लभेत । सकामायां चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । स्त्रियास्त्वर्धदण्डः । (४) परशुल्कावरुद्धायां हस्तवधश्चतुःशतो वा दण्डः शुल्कदानं च । (५) सप्तार्तवप्रजातां वरणादूर्ध्वमलभमानां प्रकृत्य प्राकामी स्यात्, न च पितुरवहीनं दद्यात् । ऋतुप्रतिरोधिभिः स्वाम्यादपक्रामति ।
कुँवारी कन्या से संभोग करने का दण्ड
( १ ) जो व्यक्ति अपनी जाति की रजोधर्म रहित ( अरजस्का ) कन्या को दूषित करे उसका हाथ कटवा दिया जाय अथवा उस पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि वह बलात्कार के कारण मर जाय तो अपराधी को प्राणदण्ड की सजा दी जाय ।
( २ ) यदि कोई व्यक्ति रजस्वला हो चुकी कन्या को दूषित करे तो अपराधी की तर्जनी और मध्यमा उगलियाँ कटवा दी जाँय अथवा उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय और लड़की के पिता को वह हर्जाना ( अवहीन ) दे ।
( ३ ) संभोग के लिए इच्छा न करने वाली कन्या से गमन करने पर इच्छापूर्ति नहीं होती है । संभोग की इच्छा करने वाली स्त्री से गमन करने पर पुरुष को चौवन पण और स्त्री को सत्ताईस पण दण्ड किया जाय ।
( ४ ) जिस लड़की की सगाई हो चुकी हो उसके साथ संभोग करने वाले का हाथ काट दिया जाय या उस पर चार-सौ पण दण्ड किया जाय और सगाई का सारा खर्च उससे वसूल किया जाय ।
( ५ ) सगाई के बाद सात मासिक धर्म होने तक भी यदि लड़की का विवाह न किया जाय तो उसका होने वाला पति लड़की को यथेच्छा भोग सकता है, और लड़की के पिता को वह हर्जाना भी न दे । क्योंकि मासिकधर्म हो जाने के बाद लड़की पर पिता का कोई अधिकार नहीं रह जाता है ।
३९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
३९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) त्रिवर्षप्रजातातार्तवायास्तुल्यो गन्तुमदोषः । ततः परमतुल्योऽप्यनलङ्कृतायाः । पितृद्रव्यादाने स्तेयं भजेत ।
(२) परमुद्दिश्यान्यस्य विन्दतो द्विशतो दण्डः । न च प्राकाम्यमकामायां लभेत ।
(३) कन्यामन्यां दर्शयित्वान्यां प्रयच्छतः शत्यों दण्डस्तुल्यायां, हीनायां द्विगुणः ।
(४) प्रकर्मण्यकुमार्याश्चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । शुल्कव्ययकर्मणी च प्रतिदद्यादवस्थाय तज्जातं पश्चात्कृता द्विगुणं दद्यात् ।
(५) अन्यशोणितोपधाने द्विशतो दण्डः । मिथ्याभिशंसिनश्च पुंसः । शुल्कव्ययकर्मणी च जीयेत । न च प्राकाम्यमकामायां लभेत ।
(६) स्त्री प्रकृता सकामा समाना द्वादशपणं दण्डं दद्यात्, प्रकर्त्री
( १ ) यदि मासिक धर्म होने पर भी कन्या का तीन वर्ष तक विवाह न किया जाय तो उसकी जाति का कोई भी पुरुष उसके साथ संभोग कर सकता है । यदि मासिक धर्म होते हुए तीन वर्ष से अधिक गुजर जाँय तो किसी भी जाति का पुरुष उसको अपनी पत्नी बना सकता है इसमें कोई दोष नहीं, किन्तु वह पुरुष लड़की के पिता के बनवाये आभूषण आदि नहीं ले जा सकता है । यदि वह पुरुष लड़की के पिता के आभूषण आदि वापस न करे तो उसको चोरी का दण्ड दिया जाय ।
( २ ) दूसरे के लिए कही हुई स्त्री को 'वह पुरुष मैं ही हूँ' ऐसा कहकर जो अन्य पुरुष उपभोग करे उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । स्त्री की इच्छा न होने पर कोई भी पुरुष उससे संभोग न करे ।
( ३ ) विवाह से पहिले जिस कन्या को दिखाया गया हो, विवाह में यदि उसी जाति की दूसरी कन्या दी जाय तो उस व्यक्ति पर सौ-पण दण्ड किया जाय । यदि उसकी जगह कोई नीच जाति की कन्या दी जाय तो दो-सौ पण दण्ड किया जाय ।
( ४ ) जो पुरुष क्षतयोनि स्त्री को अक्षतयोनि कहकर दुबारा उसका विवाह कराये उस पर चौवन पण दण्ड किया जाय, और उससे शुल्क तथा अन्य खर्चा भी वसूल किया जाय । यदि वह ऐसा ही कह कर तीसरी बार विवाह कराये तो उस पर दुगुना जुर्माना ( १०८ पण ) किया जाय ।
( ५ ) जो स्त्री अपनी योनि-क्षीणता दिखाने के लिए दूसरे का खून अपने कपड़ों पर लगाये उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार जो पुरुष अक्षतयोनि स्त्री को क्षतयोनि बताये उस पर भी दो-सौ पण दण्ड किया जाय तथा शुल्क एवं विवाह-व्यय भी उससे वसूल किया जाय । स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उससे कोई भी संभोग नहीं कर सकता है ।
( ६ ) संभोग की इच्छा से कोई स्त्री यदि अपने समान जाति वाले पुरुष से
प्र० ८७ : अ० १२ ] कुँवारी कन्या से संभोग का दण्ड ३९५
द्विगुणम् । अकामायाः शत्यो दण्डः, आत्मरागार्थं शुल्कदानं च । स्वयं प्रकृता राजदास्यं गच्छेत् । (१) बहिर्ग्रामस्य प्रकृतायां मिथ्याभिशंसने च द्विगुणो दण्डः । (२) प्रसह्य कन्यामपहरतो द्विशतः, ससुवर्णामुत्तमः । बहूनां कन्यापहारिणां पृथग्यथोक्ता दण्डाः । (३) गणिकादुहितरं प्रकुर्वतश्चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । शुल्कं मातुर्भोगः षोडशगुणः । (४) दासस्य दास्या वा दुहितरमदासीं प्रकुर्वतश्चतुर्विंशतिपणो दण्डः, शुल्काबन्ध्यदानं च । निष्क्रयानुरूपां दासीं प्रकुर्वतो द्वादशपणो दण्डः, वस्त्राबन्ध्यदानं च । (५) साचिव्यावकाशदाने कर्तृसमो दण्डः ।
योनिक्षत कराये तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि वह स्वयं ही अपनी योनि को क्षत करे तो उस पर चौबीस पण दण्ड किया जाय । पुरुष की इच्छा न रखती हुई भी जो स्त्री क्षणिक आनन्द के लिए किसी पुरुष से अपनी योनि क्षीण कराती है उस पर सौ पण दण्ड किया जाय और उस पुरुष को वह संभोग शुल्क दे । जो स्त्री अपनी इच्छा से संभोग कराये, उसको चाहिए कि वह राजदासी बन जाय ।
( १ ) गाँव के बाहर निर्जन स्थान में संभोग कराने वाली स्त्री पर चौबीस पण जुरमाना किया जाय और यदि पुरुष संभोग करके मुकर जाय तो उस पर अठतालीस पण दण्ड किया जाय ।
( २ ) किसी कन्या का बलात् अपहरण करने वाले पुरुष पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । आभूषणों से युक्त कन्या का बलात् अपहरण करने वाले को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । अपहरण में यदि अनेक व्यक्तियों का हाथ हो तो प्रत्येक को यही दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) वेश्या की लड़की के साथ बलात्कार करने वाले पर चौवन पण दण्ड किया जाय । और दंड से सोलह गुनी फीस ( ८६४ पण ) वह लड़की की माता को अदा करे ।
( ४ ) किसी भी दास या दासी की लड़की के साथ संभोग करने वाले पुरुष पर चौबीस पण दण्ड किया जाय और उससे शुल्क तथा आभूषण आदि भी वसूल किये जाँय । दासता से छुड़ाने के बराबर धन देकर जो व्यक्ति किसी दासी से संभोग करे उस पर बारह पण जुरमाना किया जाय और उससे दासी स्त्री के लिए वस्त्र तथा जेवरात भी वसूल कर लिए जाँय ।
( ५ ) कन्या को दूषित करने में जो भी सहायता करे अथवा मौका या जगह दे उसे भी अपराधी के ही समान दण्ड दिया जाय ।
३९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) प्रोषितपतिकामपचरन्तीं पतिबन्धुस्तत्पुरुषो वा संगृह्णीयात् । संगृहीता पतिमाकांक्षेत । पतिश्चेत् क्षमेत, विसृज्येतोभयम् । अक्षमायां स्त्रियाः कर्णनासाच्छेदनम् । वधं जारश्च प्राप्नुयात् ।
(२) जारं चोर इत्यभिहरतः पञ्चशतो दण्डः । हिरण्येन मुञ्चतस्तदष्टगुणः ।
(३) केशाकेशीकं संग्रहणम् । उपलिङ्गनाद्वा शरीरोपभोगानां तज्जातेभ्यः स्त्रीवचनाद्वा ।
(४) परचक्राटवीहतामोघप्रव्यूढामरण्येषु दुर्भिक्षे वा त्यक्तां प्रेतभावोत्सृष्टां वा परस्त्रियं निस्तारयित्वा यथासम्भाषितं समुपभुञ्जीत । जातिविशिष्टामकामामपत्यवतीं निष्क्रयेण दद्यात् ।
(५) चोरहस्तान्नदीवेगाद् दुर्भिक्षाद्देशविभ्रमात् ।
निस्तारयित्वा कान्ताराद्भ्रष्टां त्यक्तां मृतेति वा ॥
( १ ) जिस स्त्री का पति विदेश में हो, यदि वह व्यभिचार कराये तो उसका देवर या नौकर उसको नियंत्रण में रखे । उनके नियन्त्रण में रहकर वह स्त्री अपने पति के आने की प्रतीक्षा करे । यदि पति उसके अपराध को क्षमा कर दे तो, जार सहित उसको दण्ड से बरी किया जाय, यदि क्षमा न करे तो स्त्री के नाक-कान काट दिये जाँय और उसके जार को प्राणदंड की सजा दी जाय ।
( २ ) व्यभिचार छिपाने के लिए यदि कोई रक्षक पुरुष जार को चोर बताये तो उस पर पाँच सौ पण जुरमाना किया जाय । रक्षक पुरुष यदि हिरण्य की रिश्वत लेकर जार को छोड़ दे तो उस पर रिश्वत का अठगुना जुरमाना किया जाय ।
( ३ ) यदि कोई स्त्री किसी पुरुष के साथ फँसी हो तो उसका पता उसकी इन चेष्टाओं से किया जाय : यदि वह रास्ते में चलती हुई दूसरी स्त्री की चुटिया पकड़े, यदि उसके शरीर पर संभोग चिह्न लक्षित हों, यदि कामोत्तेजना के लिए अपने शरीर पर उसने चंदन आदि का लेप किया हो, यदि वह पुरुषों से इशारों से बात करे, यदि वह बात-चीत से स्वयं ही प्रकट कर दे ।
( ४ ) जो पुरुष शत्रुओं से, जंगली लोगों से, नदी के प्रवाह से, जंगलों से, दुर्भिक्ष से रोग या मूर्च्छा से त्यागी हुई पराई स्त्रियों का उद्धार करे, वह उस स्त्री की रजामन्दी से उसके साथ तृप्त होकर संभोग कर सकता है । यदि वह स्त्री कुलीन हो, समान जाति की होने पर भी वह उद्धारकर्ता से संभोग की इच्छा न करे और बाल-बच्चों वाली हो तो उद्धार करने वाला उसको उसके पति के पास सौंप कर उससे यथोचित पुरस्कार प्राप्त करे ।
( ५ ) शत्रुओं से, जंगली लोगों से, नदी के प्रवाह से, जंगलों से, दुर्भिक्ष से,
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में कन्याप्रकर्म नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।
प्र० ८७ : अ० १२ ] कुँवारी कन्या से सम्भोग का दण्ड ३९७
भुञ्जीत स्त्रियमन्येषां यथासम्भाषितं नरः । न तु राजप्रतापेन प्रमुक्तां स्वजनेन वा ॥ न चोत्तमां न चाकामां पूर्वापत्यवतीं न च । ईदृशीं त्वनुरूपेण निष्क्रयेणापवाहयेत् ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे कन्याप्रकर्म नाम द्वादशोऽध्यायः, आदितोऽष्टाशीतितमः ।
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परित्यक्ता रोग या मूर्च्छा से त्यागी हुई पराई स्त्रियों को, उद्धार करने वाला व्यक्ति, भोग सकता है; किन्तु राजाज्ञा या स्वजनों से त्यक्त, कुलीन, कामनारहित और बाल-बच्चों वाली स्त्रियों का, आपत्ति से बचाने पर भी; उपभोग नहीं किया जा सकता है; प्रत्युत उचित पुरस्कार प्राप्त कर ऐसी स्त्रियों को उनके घर पहुँचा दिया जाय ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में कन्याप्रकर्म नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ८८ | # अतिचारदण्डः |
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| अध्याय १३ |
(१) ब्राह्मणमपेयमभक्ष्यं वा संग्रासयत उत्तमो दण्डः। क्षत्रियं मध्यमः, वैश्यं पूर्वः साहसदण्डः, शूद्रं चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः। (२) स्वयंग्रसितारो निर्विषयाः कार्याः। (३) परगृहाभिगमने दिवा पूर्वः साहसदण्डः। रात्रौ मध्यमः। दिवा-रात्रौ वा सशस्त्रस्य प्रविशत उत्तमो दण्डः। (४) भिक्षुकवैदेहकौ मत्तोन्मत्तौ बलादापदि चातिसन्निकृष्टाः प्रवृत्तप्रवेशाश्चादण्ड्याः। अन्यत्र प्रतिषेधात्। (५) स्ववेश्मनो विरात्रादूर्ध्वं परिवार्यमारोहतः पूर्वः साहसदण्डः। परवेश्मनो मध्यमः। ग्रामारामवाटभेदिनश्च।
अतिचार का दण्ड
( १ ) जो व्यक्ति, किसी ब्राह्मण को अभक्ष्य या अपेय वस्तु खिलाये-पिलाये उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय। यदि क्षत्रिय को खिलाये-पिलाये तो मध्यम साहस दण्ड, यदि वैश्य को खिलाये-पिलाये तो प्रथम साहस दण्ड और शूद्र को खिलाये-पिलाये तो चौवन पण दण्ड दिया जाय।
( २ ) यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि अभक्ष्य-अपेय वस्तुओं का सेवन करें तो उन्हें देश-निर्वासन का दण्ड दिया जाय।
( ३ ) जो पुरुष दिन में किसी के घर में घुसे उसे प्रथम साहस दण्ड, रात्रि में घुसे तो मध्यम साहस दण्ड और हथियार लेकर रात या दिन में प्रवेश करे तो उसको उत्तम साहस दण्ड दिया जाय।
( ४ ) भिखारी, फेरी वाले, शराबी, उन्मादी, व्यभिचारी, बंधु-बांधव और मित्र आदि एक दूसरे के घर में प्रवेश करें तो दण्डनीय नहीं हैं, बशर्ते कि उनको किसी पारिवारिक व्यक्ति ने रोका न हो।
( ५ ) यदि कोई व्यक्ति एक प्रहर रात बीत जाने पर बाहर से अपने ही घर की दीवार पर चढ़े तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय। यदि इसी हालत में वह दूसरे के घर की दीवार पर चढ़े, और गाँव तथा बगीचों की बाड़ को तोड़े तो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जाय।
प्र० ८८ : अ० १३ ] अतिचार का दण्ड ३९९
(१) ग्रामेष्वन्तः सार्थिका ज्ञातसारा वसेयुः । मुषितं प्रवासितं चैषामनिर्गतं रात्रौ ग्रामस्वामी दद्यात् । ग्रामान्तेषु वा मुषितं प्रवासितं विवीताध्यक्षो दद्यात् । अविवीतानां चोररज्जुकः । तथाप्यगुप्तानां सीमावरोधविचयं दद्युः । असीमावरोधे पञ्चग्रामी दशग्रामी वा । (२) दुर्बलं वेश्म शकटमनुक्तबर्धमूर्ध्वस्तम्भं शस्त्रमनपाश्रयमप्रतिच्छन्नं श्वभ्रं कूपं कूटावपातं वा कृत्वा हिंसायां दण्डपारुष्यं विद्यात् । (३) वृक्षच्छेदने दम्यरश्मिहरणे चतुष्पदानाम्दान्तसेवने वाहने काष्ठलोष्ठपाषाणदण्डबाणबाहुविक्षेपेषु याने हस्तिना च सङ्घट्टने 'अपेहि' इति प्रक्रोशन्नदण्ड्यः । (४) हस्तिना रोषितेन हतो द्रोणान्नं कुम्भं माल्यानुलेपनं दन्तप्रमार्जनं च पटं दद्यात् । अश्वमेधावभृथस्नानेन तुल्यो हस्तिना वध इति पादप्रक्षालनम् । उदासीनवधे यात्तूत्तमो दण्डः ।
(१) यात्रा करते समय यदि कोई व्यापारी किसी गाँव में ठहरे तो अपने पूरे सामान की सूचना गाँव के मुखिया को दे । रात में उसकी यदि कोई चोरी हो जाय या गाँव में उसकी कोई वस्तु छूट जाय तो उस वस्तु को गाँव का मुखिया दे । यदि कोई वस्तु गाँव के बाहर छूट गई या चोरी गई हो तो उसकी पूर्ति चरागाह का अध्यक्ष (विवीताध्यक्ष) करे । यदि वहाँ पर चरागाहों की व्यवस्था न हो तो उस वस्तु को चोर पकड़ने वाले राजपुरुष (चोर-रज्जुक) अदा करें । यदि फिर भी वस्तु सुरक्षित न रह सके तो जिसकी सीमा में उसकी चोरी हुई हो वही सीमाध्यक्ष उसको दे । यदि फिर भी कोई प्रबंध न हो सके तो आस-पास के पाँच-दस गाँवों की पंचायतें उस वस्तु को ढूँढ़ कर व्यापारी को दें ।
(२) मकान की कच्ची दीवार के कारण, गाड़ी की पटरी की कमजोरी के कारण, हथियार को ठीक तरह से न रखने के कारण, गड्ढे न पूरे जाने के कारण और बिना जंगले के कुएँ के कारण यदि कोई व्यक्ति किसी की मृत्यु का कारण बन जाय तो उसे दण्डपारुष्य प्रकरण में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार दण्ड दिया जाय ।
(३) पेड़ काटते समय, मारू जानवरों को खोलते समय, जानवरों को पहिले-पहिले सवारी में जोतते समय, अथवा दो दलों में लकड़ी, ढेला, पत्थर, बाण आदि चलते समय, हाथी की सवारी करते समय और बीच में आने से वारित करते समय यदि किसी का हाथ-टूट जाय तो किसी को दण्ड न दिया जाय ।
(४) यदि कोई व्यक्ति क्रुद्ध हाथी के चपेट में आकर मर जाय तो उसके परिवारजनों को यह आवश्यक है कि वे एक द्रोण अन्न, एक घड़ा शराब, माला, चंदन और दाँत साफ करने का वस्त्र उस हाथी को भेंट करें । क्योंकि जितना पुण्य अश्वमेध यज्ञ की समाप्ति पर पवित्र स्नान करने से होता है उतना ही पुण्य हाथी के द्वारा मारे
४०० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) शृङ्गिणा दंष्ट्रिणा वा हिंस्यमानममोक्षयतः स्वामिनः पूर्वः साहसदण्डः । प्रतिक्रुष्टस्य द्विगुणः । (२) शृङ्गिदंष्ट्रिभ्यामन्योन्यं घातयतस्तच्च तावच्च दण्डः । (३) देवपशुभृषभमुक्षाणं गोकुमारीं वा वाहयतः पञ्चशतो दण्डः । प्रवासयत उत्तमः । लोमदोहवाहनप्रजननोपकारिणां क्षुद्रपशूनामादाने तच्च तावच्च दण्डः । प्रवासने च, अन्यत्र देवपितृकार्येभ्यः । (४) छिन्ननस्यं भग्नयुगं तिर्यक्प्रतिमुखागतं च प्रत्यासरद्वा चक्रयुक्तं यानपशुमनुष्यसम्बाधे वा हिंसायामदण्ड्यः । अन्यथा यथोक्तं मानुषप्राणि-हिंसायां दण्डमभ्यावहेत् । अमानुषप्राणिवधे प्राणिदानं च । (५) बाले यातरि यानस्थः स्वामी दण्ड्यः । अस्वामिनि यानस्थः प्राप्तव्यवहारो वा याता । बालाधिष्ठितमपुरुषं वा यानं राजा हरेत् ।
जाने पर होता है; इसीलिए उक्त वस्तुओं द्वारा हाथी के पूजन का विधान बताया गया है । किन्तु यदि कोई व्यक्ति महावत की लापरवाही के कारण मारा जाय तो महावत को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।
( १ ) यदि कोई स्वामी अपने सींग, खुर या दाँत वाले पशुओं द्वारा किसी व्यक्ति को मारते हुए देखकर न छुड़ाये तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । उस व्यक्ति के चिल्लाने पर भी यदि न छुड़ाये तो स्वामी को दुगुना दण्ड दिया जाय ।
( २ ) यदि सींग-दाँत वाले जानवर आपस में लड़कर एक-दूसरे को मार दें तो मारने वाले जानवर का मालिक मरे हुए जानवर की कीमत और उतना ही दण्ड भरे ।
( ३ ) जो कोई व्यक्ति देव निमित्त किसी पशु को, साँड़ को, बैल को या बछड़ी को हल या गाड़ी में जोते तो उस पर पाँच-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि इन्हें कोई घर से निकाले या दूर छोड़ आवे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय । किन्तु उन्हें यदि किसी देवकार्य या पितृकार्य के लिए दूर छोड़ना पड़े तो कोई दोष नहीं है ।
( ४ ) यदि बैल की नाथ टूट जाय या जुआ टूट जाय अथवा जुता हुआ बैल ही तिरछा हो जाय या सामने की ओर उल्टा हो जाय या गाड़ियों एवं पशुओं की भारी भीड़ हो, ऐसे समय यदि किसी पशु को चोट पहुँच जाय तो गाड़ीवान को दोषी न समझा जाय । ऐसी स्थिति न हो और मनुष्य या पशु को कोई चोट पहुँचे तो, चोट पहुँचाने वाले को पूर्वोक्त यथोचित दण्ड दिया जाय । यदि कोई छोटा पशु दबकर मर जाय तो वही पशु लिया जाय ।
( ५ ) यदि गाड़ीवान नाबालिग हो तो उसका मालिक इन सब दण्डों को भुगते । यदि मालिक उपस्थित न हो सवारी अथवा दूसरा बालिग गाड़ीवान दण्डों को भुगते । यदि गाड़ी में बालक के अतिरिक्त कोई न हो तो राजपुरुष उसे जब्त कर लें ।
प्र० ८८ : अ० १३ ] अतिचार का दण्ड ४०१
(१) कृत्याभिचाराभ्यां यत्परमापादयेत्, तदापादयितव्यः । (२) कामं भार्यायामनिच्छन्त्यां कन्यायां वा दारार्थिनां भर्तरि भार्यायां वा संवननकरणम् । अन्यथा हिंसाया मध्यमः साहसदण्डः । (३) मातापित्रोर्भगिनीं मातुलानीमाचार्याणीं स्नुषां दुहितरं भगिनीं वाधिचरतस्त्रिलिङ्गच्छेदनं वधश्च । सकामा तदेव लभेत । दासपरिचारकाहितकभुक्ता च । (४) ब्राह्मण्यामगुप्तायां क्षत्रियस्योत्तमः, सर्वस्वं वैश्यस्य । शूद्रः कटाग्निना दह्येत । सर्वत्र राजभार्यागमने कुम्भीपाकः । (५) श्वपाकीगमने कृतकबन्धाङ्कः परविषयं गच्छेत् । श्वपाकत्वं वा शूद्रः । (६) श्वपाकस्यार्यागमने वधः । स्त्रियाः कर्णनासाच्छेदनम् । (७) प्रव्रजितागमने चतुर्विंशतिपणो दण्डः । सकामा तदेव लभेत ।
( १ ) जो व्यक्ति किसी को कृत्रिम उपायों (कृत्या) या तान्त्रिक प्रयोगों (अभिचार) द्वारा तंग करे उसे गिरफ्तार कर लिया जाय ।
( २ ) पति को न चाहने वाली स्त्री पर उसका पति, कन्या को पत्नी बनाने की इच्छा रखने वाला पुरुष और अपने पति पर उसकी पत्नी, यदि वशीकरण आदि प्रयोग करें तो अपराध न माना जाय । इनके अतिरिक्त तान्त्रिक प्रयोग करने वालों को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) जो पुरुष अपनी मौसी, बूआ, मामी, गुरुपत्नी, पुत्रवधू, लड़की और बहिन के साथ व्यभिचार करे उसका लिंग और अंडकोश काटकर उसको प्राणदण्ड की सजा दी जाय । यदि मासी, बूआ आदि स्वयं ऐसा करायें तो उनके दोनों स्तन काटकर और उनका भग-छेदन कर उन्हें भी प्राणदण्ड की सजा दी जाय । दास और परिचारक यदि व्यभिचार करें तो उन्हें भी यही दण्ड दिया जाय ।
( ४ ) लोक-लाज से रहने वाली ब्राह्मणी के साथ यदि क्षत्रिय व्यभिचार करे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय; यदि वैश्य करे तो उसकी सारी सम्पत्ति हड़प ली जाय, यदि शूद्र करे तो उसको तिनकों की आग में जला दिया जाय । राजा की स्त्री के साथ जो कोई भी व्यभिचार करे उसे तपे भाड़ में भून दिया जाय ।
( ५ ) चाण्डालिनी के साथ व्यभिचार करने वाले पुरुष के माथे पर योनि का निशान दाग कर उसे देश-निर्वासन का दण्ड दिया जाय, यदि ऐसा शूद्र करे तो उसे चाण्डाल बना दिया जाय ।
( ६ ) चांडाल यदि किसी आर्या स्त्री के साथ संभोग करे तो उसे प्राणदण्ड दिया जाय और उस पर स्त्री के नाक-कान काट दिये जाँय ।
( ७ ) संन्यासिनी के साथ संभोग करने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय,
२६ कौ०
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में अतिचारदण्ड नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ।
| ४०२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
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(१) रूपाजीवायाः प्रसह्योपभोगे द्वादशपणो दण्डः ।
(२) बहूनामेकामधिचरतां पृथक् पृथक् चतुर्विंशतिपणो दण्डः ।
(३) स्त्रियमयोनौ गच्छतः पूर्वः साहसद्ण्डः । पुरुषमधिमेहतश्च ।
(४) मैथने द्वादशपणः तिर्यग्योनिष्वनात्मनः ।
दैवतप्रतिमानां च गमने द्विगुणः स्मृतः ॥
(५) अदण्ड्यदण्डने राज्ञो दण्डस्त्रिंशद्गुणोऽम्भसि ।
वरुणाय प्रदातव्यो ब्राह्मणेभ्यस्ततः परम् ॥
(६) तेन तत्पूयते पापं राज्ञो दण्डापचारजम् ।
शास्ता हि वरुणो राज्ञां मिथ्या व्याचरतां नृषु ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे अतिचारदण्डो नाम त्रयोदशोऽध्यायः, आदित एकोननवतितमः ।
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यदि संन्यासिनी कामातुर होकर ऐसा कराये तो उस पर भी चौबीस पण दण्ड किया जाय ।
( १ ) वेश्या के साथ बालात् व्यभिचार करने पर बारह पण दण्ड दिया जाय ।
( २ ) यदि अनेक व्यक्ति एक स्त्री के साथ बारी-बारी से संभोग करें तो एक-एक को चौबीस-चौबीस पण दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) यदि कोई पुरुष किसी स्त्री के गुदा या मुख में संभोग करें तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । लौंडेबाजी करने पर भी यही दण्ड किया जाय ।
( ४ ) गो आदि पशुओं से समागम करने वाले पातकी पर बारह पण और देव-प्रतिमाओं के साथ गमन करने वाले पर चौबीस पण दण्ड किया जाय ।
( ५ ) जो राजा अदण्डनीय व्यक्ति को दण्ड दे, प्रजा को चाहिए कि वह उस दण्ड का तीस गुना दण्ड राजा से वसूल करे । वह अर्थ दण्ड पहिले वरुण देवता के निमित्त पानी में छोड़ दिया जाय और बाद में ब्राह्मणों को बाँट दिया जाय ।
( ६ ) इस प्रकार अनुचित दण्ड के वसूलने से राजा को जो पाप लगा है वह छूट जाता है, क्योंकि मनुष्यों के ऊपर अनुचित व्यवहार करने वाले राजा पर वरुण-देव ही शासन करता है ।
कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में अतिचारदण्ड नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ।
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पाँचवाँ अधिकरण
पाँचवाँ अधिकरण
योगवृत्त
| प्रकरण ८९ | दाण्डकर्मिकम् |
|---|---|
| अध्याय १ |
(१) दुर्गराष्ट्रयोः कण्टकशोधनमुक्तम् । राजराज्ययोर्वक्ष्यामः । (२) राजानमवगृह्योपजीविनः शत्रुसाधारणा वा ये मुख्यास्तेषु गूढपुरुषप्रणिधिः कृत्यपक्षोपग्रहो वा सिद्धिः । यथोक्तं पुरस्तादुपजापोऽपसर्पो वा यथा च पारग्रामिके वक्ष्यामः । (३) राज्योपघातिनस्तु वल्लभाः संहता वा ये मुख्याः प्रकाशमशक्याः प्रतिषेद्धु दूष्याः, तेषु धर्मरुचिरुपांशुदण्डं प्रयुञ्जीत । (४) दूष्यमहामात्रभ्रातरं सत्कृतं सत्त्री प्रोत्साह्य राजानं दर्शयेत् । तं राजा दूष्यद्रव्योपभोगातिसर्गेण दूष्ये विक्रमयेत् । शस्त्रेण रसेन वा विक्रान्तं तत्रैव घातयेत् । भ्रातृघातकोऽयम् इति ।
राजद्रोही उच्चाधिकारियों के सम्बन्ध में दण्डव्यवस्था
(१) दुर्ग और राष्ट्र के अनिष्टकारियों (कंटकों) के दमन (शोधन) के उपाय चौथे अधिकरण में बताये जा चुके हैं। यही बात अब राजा और राज्य के सम्बन्ध में कही जायेगी।
(२) राजा से वेतन-भोजन पाकर भी उसको नीचा दिखाने वाले अथवा राजा के शत्रुओं से मिले हुए जो मन्त्री, पुरोहित आदि प्रधान राजकर्मचारी हों, उन पर सफलता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि उनके पीछे राजा सुयोग्य गुप्त पुरुषों को तैनात कर दे; राज्यभर में जितने लोग राजा के शत्रुओं से खार खाये बैठे है उन्हें भी वह अपनी ओर मिला ले; ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति का ढंग पहिले बताया जा चुका है और उसी के सम्बन्ध में कुछ नई बातें आगे पारग्रामिक प्रकरण में बताई जायेंगी।
(३) धर्मप्राण राजा को चाहिए कि वह ऐसे मुख्य राज्यकर्मचारियों तथा संघ के मुखियों को चुपके से मरवा दे (उपांशुवध), जो राजा के खिलाफ बगावत फैलाते हों और जिन दुष्टों को खुले तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है।
(४) दूषित महामात्र (हस्त्यध्यक्ष) आदि के भाई को, जिसको कि दायभाग न मिला हो, संमानपूर्वक उभार कर सत्त्री नामक गुप्तचर उसे राजा के पास लाये। राजा उसको दूषणीय का निग्रह करने के लिए हथियार आदि देकर दोनों भाइयों के
| ४०६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ पाँचवां अधिकरण |
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(१) तेन पारशवः परिचारिकापुत्रश्च व्याख्यातौ । (२) दूष्यं महामात्रं वा सत्रिप्रोत्साहितो भ्राता दायं याचेत । तं दूष्य-गृहप्रतिद्वारि रात्रावुपशयानमन्यत्र वा वसन्तं तीक्ष्णो हत्वा ब्रूयात्—हतोऽयं दायकामुकः इति । ततो हतपक्षं परिगृह्येतरं निगृह्णीयात् । (३) दूष्यसमीपस्थां वा सत्रिणो भ्रातरं दायं याचमानं घातेन परि-भर्त्सयेयुः । तं रात्राविति समानम् । (४) दूष्यमहामात्रयोर्वा यः पुत्रः पितुः पिता वा पुत्रस्य दारानधि-चरति भ्राता वा भ्रातुस्तयोः कापटिकमुखः कलहः पूर्वेण व्याख्यातः । (५) दूष्यमहामात्रपुत्रमात्मसम्भावितं वा सत्त्री—‘राजपुत्रस्त्वं शत्रु-भयादिह न्यस्तोऽसि ।’ इत्युपचरेत् । प्रतिपन्नं राजा रहसि पूजयेत्—‘प्राप्त-
बीच झगड़ा करवा दे । जब वह शस्त्र या विष आदि से अपने भाई की हत्या कर डाले तो इस पर भ्रातृ-घात का अपराध लगा कर राजा उसको भी मरवा दे ।
( १ ) यही व्यवहार पारशव ( महामात्र द्वारा नीच वर्ण की स्त्री से पैदा हुआ पुत्र ) और परिचारिका पुत्र ( दासी पुत्र ) के साथ किया जाय ।
( २ ) या तो सत्री द्वारा उभड़ा हुआ भाई दूषणीय महामात्र से अपने दायभाग की मांग करे फिर तीक्ष्ण नामक गुप्तचर दूषणीय के घर के दरवाजे के बाहर सोते या अन्यत्र निवास करते हुए रात में उसको मार कर जनता में यह प्रचार करे कि ‘यह अपना दायभाग माँगता था इसलिए इसके महामात्र भाई ने इसको मरवा डाला’ । इसके बाद राजा उस मृतक के बन्धु-बांधव, लड़के, मामा आदि को बुलवा कर उनको उकसायें कि यह महामात्र ही भाई का घातक है । ऐसी युक्ति से राजा उसको मरवा डाले ।
( ३ ) अथवा राजद्रोही महामात्र के आसपास रहने वाले लोग दायभाग माँगने वाले उसके भाई को ‘हम तुझे मार डालेंगे’ कहकर धमकायें । फिर पूर्वोक्त रीति से तीक्ष्ण द्वारा उसको मरवा कर यह प्रचारित करवा कर उसको भी मरवा दे कि ‘यह महामात्र भाई का हत्यारा है ।’
( ४ ) यदि दूष्य और महामात्र का पुत्र अपने पिता की स्त्रियों के साथ; पिता, पुत्रों की स्त्रियों के साथ और भाई, भाई की स्त्री के साथ व्यभिचार करे तो कापटिक गुप्तचर द्वारा उनका आपस में झगड़ा करा दिया जाय और तदनन्तर पूर्वोक्त विधि से उनका काम-तमाम करा दिया जाय ।
( ५ ) अपने आप को बहादुर तथा उदार समझने वाले महामात्र के पुत्र के पास जाकर सत्री कहें कि ‘तुम तो युवराज हो सकते हो; व्यर्थ ही शत्रु के भय से यहाँ पड़े हो’ । सत्री के वचनों पर विश्वास करके जब वह राजा के पास आवे तो
प्र० ८६ : अ० १ ] राजद्रोही अधिकारियों हेतु दण्ड-विधि ४०७
यौवराज्यकालं त्वां महामात्रभयान्नाभिषिञ्चामि' इति । तं सत्री महामात्र-वधे योजयेत् । विक्रान्तं तत्रैव घातयेत्—'पितृघातकोऽयम्' इति ।
(१) भिक्षुकी वा दूष्यभार्यां सांवननिकीभिरोषधिभिः संवास्य रसेना-तिसन्दध्यात् । इत्याप्यप्रयोगः ।
(२) दूष्यमहामात्रमटवीं परग्रामं वा हन्तुं कान्तरव्यवहिते वा देशे राष्ट्रपालामन्तपालं वा स्थापयितुं नागरस्थानं वा कुपितमवग्रहीतुं सार्था-तिवाह्यं प्रत्यन्ते वा सप्रत्यादेयमादातुं फल्गुबलं तीक्ष्णयुक्तं प्रेषयेत् । रात्रौ दिवा वा युद्धे प्रवृत्ते तीक्ष्णाः प्रतिरोधकव्यञ्जना वा हन्युः—'अभियोगे हतः' इति ।
(३) यात्राविहारगतो वा दूष्यमहामात्रान् दर्शनायाह्वयेत् । ते गूढ-शस्त्रैस्तीक्ष्णैः सह प्रविष्टा मध्यमकक्ष्यायामात्मविचयमन्तःप्रवेशार्थं दद्युः । ततो दौवारिकाभिगृहीतास्तीक्ष्णा 'दूष्यप्रयुक्ताः स्म' इति ब्रूयुः । ते तदभि-विख्याप्य दूष्यान् हन्युः । तीक्ष्णस्थाने चान्ये वध्याः ।
एकान्त में ले जाकर राजा उसका अच्छा सत्कार करे और तदनन्तर कहे 'तुम्हें युवराज पद मिलने का समय आ गया है । महामात्र के भय से मैं तुम्हारा अभिषेक नहीं कर पा रहा हूँ ।' फिर सत्री उस लड़के को उसके पिता महामात्र की हत्या करने के लिए तैयार करें । जब वह महामात्र की हत्या कर डाले तो पितृघातक का लांछन लगाकर राजा उसको भी मरवा दे ।
( १ ) अथवा भिक्षुकी नामक गुप्तचर स्त्री दूष्य आदि की स्त्री से कहे कि 'मैं वशीकरण की औषधि को जानती हूँ । तुम इस औषधि को अपने पति को खिलाना' । इस प्रकार औषधि की जगह विष देकर राजद्रोहियों को मारा जाय । इस कार्य को आप्य-प्रयोग कहते हैं ।
( २ ) राजा को चाहिए कि वह दूष्य महामात्र, जङ्गल के निरीक्षक और बगा-वती गाँव को मारने के लिए तीक्ष्ण पुरुषों के साथ थोड़ी-सी सेना इस उद्देश्य या बहाने से भेज दे कि अमुक-अमुक्त स्थान-नगरों में अन्तपाल या राष्ट्रपाल की स्थापना करनी है; या अमुक नगर की प्रजा विरुद्ध हो गई है उसको वश में करना है; अथवा सेना भेजने का यह बहाना बताये कि अमुक राज्य की सीमा पर दूसरे राज्य के कृषकों ने हमारी भूमि अपने कब्जे में कर ली है । तदनन्तर रात या दिन में लड़ाई लगाकर चोर या डाकुओं के वेष में तीक्ष्ण पुरुष अभीष्ट लोगों को मार डालें, और मारने के बाद यह प्रचारित करें लड़ाई में मारा गया है ।
( ३ ) तीर्थयात्रा या बिहार के लिए प्रस्तुत राजा दूष्य महामात्रों को देखने के लिए अपने पास बुलाये । शस्त्र छिपाये तीक्ष्ण पुरुष भी उन महामात्रों के साथ-साथ राजा के पास भीतर जाय । राजभवन की दूसरी ड्योढ़ी पर तलाशी लेकर द्वारपाल