भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

६५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) स्वबलरक्षा चतुरङ्गबलप्रतिषेधः संग्रामे ग्रहणं मोक्षणं भिन्नसन्धानमभिन्नभेदनं त्रासनमौदार्यं भीमघोषश्चेति रथकर्माणि ।
(२) सर्वदेशकालशस्त्रवहनं व्यायामश्चेति पदातिकर्माणि ।
(३) शिबिरमार्गसेतुकूपतीर्थशोधनकर्म यन्त्रायुधावरणोपकरणग्रासवहनमायोधनाच्च प्रहरणावरणाप्रतिविद्धापनयनमिति विष्टिकर्माणि ।

(४) कुर्याद्गवाश्वव्यायोगं रथेष्वल्पहयो नृपः ।
खरोष्ट्रशकटानां वा गर्भमल्पगजस्तथा ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे युद्धभूमयः पत्त्यश्वरथहस्तिकर्माणि नाम चतुर्थोऽध्यायः; आदित एकत्रिंशदुत्तरशततमः ।

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(१) अपनी सेना की रक्षा करना, आक्रमण के समय शत्रु सेना को रोकना, शत्रु के बलवान् सैनिकों को पकड़ना, अपने गिरफ्तार सैनिकों को छुड़ाना, अपनी सेना को संगठित करना तथा शत्रु सेना को तितर-बितर करना, भयभीत करके शत्रु की सेना को घबड़ाना, अपनी सेना का महत्त्व प्रकट करना और भयंकर आवाज करना; ये सभी कार्य रथकर्म अर्थात् रथसेना के द्वारा संपादित होते हैं ।

(२) सम-विषम आदि सभी स्थानों और वर्षा-शरद् आदि सभी ऋतुओं में युद्ध के लिए तैयार हो जाना, नियम पूर्वक कवायद करना और अवसर आने पर युद्ध करना; ये सब कार्य पदाति सेना के हैं ।

(३) अस्त्र-शस्त्र न रखकर फौज में कार्य करने वाले कर्मचारियों को विष्टि कहा जाता है । सैनिक शिविर बनाना, सैनिक मार्ग, नदी के पुल, बाँध, कुएँ, घाट आदि तैयार करना, घास आदि उखाड़ कर मैदान साफ करना, युद्ध की मशीनें, अस्त्र-शस्त्र, कवच आदि युद्धोपयोगी सामान तथा हाथी, घोड़ों के लिए घास ढोना, उनकी रक्षा का प्रबन्ध करना, युद्धभूमि में कवच, हथियार तथा घायल आदि सैनिकों को दूसरी जगह ले जाना, ये सभी कार्य विष्टि नामक कर्मचारियों के हैं ।

(४) जिस राजा के पास घोड़ों की तादाद कम हो उसको चाहिए कि वह घोड़ों के साथ रथों में बैलों को भी जोड़ कर काम ले । इसी प्रकार जिस राजा के पास हाथियों का अभाव हो वह अपनी सेना को गधों या ऊँटों द्वारा चलाई जाने वाली गाड़ियों के बीच में सुरक्षित रखे ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में युद्धभूमि-पत्त्यश्वरथहस्तिकर्म नामक चौथा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १५५-१५७## पक्षकक्षोरस्यानां बलाग्रतो व्यूहविभागः सारफल्गुबलविभागः,
अध्याय ५## पत्त्यश्वरथहस्तियुद्धानि च

(१) पञ्चधनुःशतावकृष्टदुर्गमवस्थाप्य युद्धमुपेयाद्, भूमिवशेन वा। विभक्तमुख्यामचक्षुर्विषये मोक्षयित्वा सेनां सेनापतिनायकौ व्यूहेयाताम्।

(२) शमान्तरं पत्तिं स्थापयेत्। त्रिशमान्तरमश्वम्। पञ्चशमान्तरं रथं, हस्तिनं वा। द्विगुणान्तरं त्रिगुणान्तरं वा व्यूहेत। एवं यथासुखम-सम्बाधं युध्येत।

(३) पञ्चारत्नि धनुः, तस्मिन् धन्विनं स्थापयेत्। त्रिधनुष्यश्वम्। पञ्चधनुषि रथं हस्तिनं वा। पञ्चधनुर्नीकसन्धिः पक्षकक्षोरस्यानाम्।


पक्ष, कक्ष तथा उरस्य आदि विशेष व्यूहों का सेना के परिणाम के अनुसार व्यूहविभाग; सार तथा फल्गु-बलों का विभाग; और चतुरंग सेना का युद्ध

( १ ) युद्ध-भूमि से पाँच-सौ धनुष के फासले पर छावनी डालनी चाहिए, अथवा भूमि के अनुसार भी छावनी की दूरी इससे ज्यादा या कम की जा सकती है। मुख्य सैनिकों को अलग-अलग करके उन्हें इस प्रकार छिपाया जाय, जिससे शत्रुओं को कुछ भी पता न लगने पावे। उसके बाद सेनापति और नायक, दोनों उस सेना की व्यूह-रचना को यथोचित ढंग से सम्पन्न करें।

( २ ) पैदल ( पत्ति ) सेना के प्रत्येक सिपाही को एक-एक शम (चौदह अंगुल) के फासले पर खड़ा किया जाय। इसी प्रकार घुड़सवार सिपाहियों को तीन-तीन शम के फासले पर, और रथारोहियों तथा हस्त्यारोहियों को पाँच-पाँच शम के अन्तर पर खड़ा किया जाय अथवा भूमि की सुविधानुसार ही उनका फासला कम या ज्यादा किया जाय। ऐसी व्यूह-रचना करके निर्भीक होकर सुखपूर्वक युद्ध किया जाय।

( ३ ) पाँच अरत्नि ( हाथ ) का एक धनुष होता है। धनुर्धारी योद्धाओं को पाँच हाथ के फासले पर खड़ा किया जाय। तीन धनुष ( पन्द्रह हाथ ) के फासले पर अश्वारोहियों को और पाँच धनुष ( पच्चीस हाथ ) के फासले पर रथारोहियों को तथा हस्त्यारोहियों को खड़ा किया जाय। पक्ष ( आगे बगल में खड़े होकर लड़ने वाली ), कक्ष ( आगे अवान्तर भाग में खड़े होकर लड़ने वाली ) और उरस्य ( बीच में खड़े होकर लड़ने वाली ) पाँचों सेनाओं को पाँच-पाँच धनुष के फासले पर खड़ा किया जाय।

६५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

(१) अश्वस्य त्रयः पुरुषाः प्रतियोद्धारः, पञ्चदश रथस्य, हस्तिनो वा, पञ्च चाश्वाः । तावन्तः पादगोपाः वाजिरथद्विपानां विधेयाः । (२) त्रीणि त्रिकाण्यनीकं रथानामुरस्यं स्थापयेत् । तावत् कक्षं पक्षं चोभयतः । पञ्चचत्वारिंशदेवं रथा व्यूहे भवन्ति । (३) द्वे शते पञ्चविंशतिश्चाश्वाः, षट्शतानि पञ्चसप्ततिश्च पुरुषाः प्रतियोद्धारः । तावन्तः पादगोपा वाजिरथद्विपानाम् । (४) एष समव्यूहः । तस्य द्विरथोत्तरा वृद्धिरा एकविंशतिरथादित्येवमोजा दश समव्यूहप्रकृतयो भवन्ति । (५) पक्षकक्षोरस्यानामतो विषमसंख्याने विषमव्यूहः । तस्यापि द्विरथोत्तरा वृद्धिरा एकविंशतिरथादित्येवमोजा दशविषमव्यूहप्रकृतयो भवन्ति ।


( १ ) घुड़सवार सैनिक के आगे-आगे सहायतार्थ तीन प्रतियोद्धाओं को नियुक्त किया जाय । इसी प्रकार रथारोहियों या हस्त्यारोहियों के आगे पन्द्रह-पन्द्रह प्रतियोद्धाओं अथवा पाँच-पाँच घुड़सवार सैनिकों को खड़ा किया जाय । हस्ति तथा अश्व के सैनिकों के उतने ही ( पाँच ) खिदमतगार ( पादगोप ) नियुक्त किए जाँय । इसी प्रकार एक-एक रथ के आगे पाँच घोड़े, और एक-एक घोड़े के आगे तीन-तीन आदमी मिलाकर कुल पन्द्रह प्रतियोद्धा आगे चलने वाले और पाँच साईस, उसी तरह, हाथी के साथ भी समझने चाहिए ।

( २ ) व्यूहरचना के मध्यभाग (उरस्य) में इस प्रकार के नौ रथों (३ × ३ = ९) की नियुक्ति करनी चाहिए, अर्थात् तीन-तीन रथों की एक-एक पंक्ति बनाकर, तीन पंक्तियों में नौ रथों को खड़ा किया जाय । इसी प्रकार कक्ष और पक्ष स्थानों में दोनों ओर नौ-नौ रथों को खड़ा किया जाय । इस तरह एक व्यूह-रचना में ( ९ उरस्य, १८ कक्ष और १८ पक्ष = ४५ ) पैंतालीस रथ हो जाते हैं ।

( ३ ) प्रत्येक रथ के आगे पाँच-पाँच घोड़े होने के कारण पैंतालीस रथों के आगे दो सौ-पच्चीस घोड़े होने चाहिए । इसी प्रकार प्रत्येक रथ के आगे पन्द्रह सैनिक होने के कारण पैंतालीस रथों के आगे छः सौ पचहत्तर सैनिक एक-दूसरे की सहायतार्थ नियुक्त होने चाहिए । घोड़े, रथ और हाथियों के उतने ही साईस भी होने चाहिए ।

( ४ ) इस ढंग से तैयार किये गये व्यूह को समव्यूह कहते हैं । ऐसे व्यूह में दो-दो रथ बढ़ाकर इक्कीस रथों तक की वृद्धि की जा सकती है । इस प्रकार के अयुग्म में तीन रथों से लेकर इक्कीस रथों तक दस तरह की समव्यूह रचना की जा सकती है ।

( ५ ) आगे पीछे और बीच के स्थानों में यदि रथों की विषम संख्या हो जाय तो उसको विषमव्यूह कहते हैं । ऐसे व्यूह में भी उक्त रीति से दो-दो रथ बढ़ाकर

प्र० १५५-१५७ : अ० ५ ] व्यूह-बल-विभाग एवं युद्ध ६५७

(१) अतः सैन्यानां व्यूहशेषमावापः कार्यः । रथानां द्वौ त्रिभागावङ्गे- ष्वावापयेत् । शेषमुरस्यं स्थापयेत् । एवं त्रिभागोना रथानामावापः कार्यः । तेन हस्तिनामश्वानामावापो व्याख्यातः । (२) यावदश्वरथद्विपानां युद्धसम्बाधं न कुर्यात्, तावदावापः कार्यः । (३) दण्डबाहुल्यमावापः । पत्तिबाहुल्यं प्रत्यावापः । एकाङ्गबाहुल्य- मन्वावापः । दूष्यबाहुल्यमत्यावापः । (४) परावापात् प्रत्यावापादाचतुर्गुणादाष्टगुणादिति वा विभवतः सैन्यानामावापः कार्यः । (५) रथव्यूहेन हस्तिव्यूहो व्याख्यातः । व्यामिश्रो वा हस्तिरथाश्वा- नाम् । चक्रान्तयोर्हस्तिनः, पार्श्वयोरश्वमुख्याः, रथा उरस्ये । हस्तिनामुरस्यं रथानां कक्षावश्वानां पक्षाविति मध्यभेदी । विपरीतोऽन्तर्भेदी ।

इक्कीस रथों तक की वृद्धि कर अयुग्म रूप से दस विषमव्यूहों की रचना की जा सकती है ।

( १ ) इस प्रकार की व्यूह-रचना करने के बाद जो सेना बची रह जाय उसको भी व्यूह के भीतर इधर-उधर नियुक्त कर देना चाहिए । उस बची हुई सेना का दो-तिहाई भाग तो आगे-पीछे और बाकी एक हिस्सा बीच में रख देना चाहिए । रथसैन्य में यदि कुछ बचे हुए रथ बाद में मिलाने पड़ जायें तो उनकी संख्या, व्यूह की सेना से एक-तिहाई कम होनी चाहिए । इसी तरह बचे हुए हाथी और घोड़ों को मिलाने के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए ।

( २ ) जब तक युद्धकाल में घोड़े, रथ और हाथियों की पर्याप्त भीड़ न हो जाय तब तक उनमें बची हुई सेना को मिलाते रहना चाहिए ।

( ३ ) व्यूह-रचना के बाद बची हुई सेना को फिर से व्यूह में मिला लेने को अवाप कहते हैं । इस प्रकार केवल पैदल सेना ही मिलाई जाय तो उसे प्रत्यावाप कहते हैं । घोड़े, रथ या हाथी, इन तीनों में से किसी एक बचे हुए अंग को व्यूह-रचना के बाद उसमें मिला देने को अन्वावाप कहते है । इसी प्रकार राजद्रोही सैनिकों के द्वारा व्यूहसेना बढ़ाये जाने का नाम अत्यावाप है ।

( ४ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रुसेना की अपेक्षा चौगुने से लेकर अठगुने तक अपनी सेना में सैनिकों का अवाप करे, अथवा अपनी शक्ति के अनुसार अवाप द्वारा ही सेना को बढ़ाये ।

( ५ ) रथों की उक्त व्यूह-रचना के अनुसार ही हाथियों की व्यूह-रचना भी समझ लेनी चाहिए । अथवा हाथी, रथ और घोड़ों को मिलाकर इस प्रकार की व्यूह-रचना की जानी चाहिए : सेना के सामने दोनों ओर हाथियों को खड़ा कर दिया जाय, पीछे के दोनों हिस्सों में बढ़िया घोड़ों को खड़ा किया जाय, और बीच में

४२ कौ०

६५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) हस्तिनामेव तु शुद्धः । सान्नाह्यानामुरस्यम्, औपवाह्यानां जघनं, व्यालानां कोटचाविति । (२) अश्वव्यूहो वर्मिणामुरस्यं शुद्धानां कक्षपक्षाविति । (३) पत्तिव्यूहः पुरस्तादावरणिनः पृष्ठतो धन्विन इति । शुद्धाः । (४) पत्तयः पक्षयोरश्वाः पार्श्वयोः, हस्तिनः पृष्ठतो रथाः पुरस्तात्, परव्यूहवशेन वा विपर्यास इति । द्वयङ्गबलविभागः । तेन त्र्यङ्गबलविभागो व्याख्यातः । (५) दण्डसम्पत् सारबलं पुंसाम् । (६) हस्त्यश्वयोर्विशेषः । कुलं जातिः सत्त्वं वयःस्थता प्राणो वर्ष्म जवस्तेजः शिल्पं स्थैर्यमुदग्रता विधेयत्वं सुव्यञ्जनाचारतेति ।


रथों को खड़ा किया जाय । इसी व्यूह-रचना का एक दूसरा ढंग यह भी है कि मध्य में हाथी, पीछे की ओर रथ और आगे की ओर घोड़े खड़े किए जायँ । इस व्यूह-रचना में हाथियों को मध्य भाग में रखने के कारण मध्यभेदी कहते हैं । इसके विपरीत—पीछे हाथी, बीच में घोड़े और आगे रथों की व्यूह-रचना को अन्तर्भेदी कहते हैं ।

( १ ) केवल हाथियों द्वारा की गई व्यूह-रचना को शुद्ध कहते हैं । ऐसे व्यूह में युद्ध योग्य हाथियों को बीच में रखा जाय और जो उन्मत्त एवं दुष्ट स्वभाव के हों उन्हें आगे के दोनों भागों में नियुक्त किया जाय ।

( २ ) घोड़ों के शुद्ध व्यूह में कवचधारी घोड़ों को बीच में और कवचरहित घोड़ों को आगे-पीछे रखना चाहिए ।

( ३ ) इसी प्रकार पैदल सेना के शुद्ध व्यूह में कवचधारी सैनिकों को आगे के दोनों भागों में और धनुर्धारी सैनिकों को पीछे के दोनों भागों में खड़ा किया जाय ।

( ४ ) मिश्र व्यूहों में सेना के दो-दो अंगों को मिलाकर पैदल सिपाहियों को आगे के दोनों भागों में और घोड़ों को पीछे के दोनों भागों में रखा जाय, अथवा हाथियों को पीछे की ओर और रथों को आगे की ओर नियुक्त किया जाय, या शत्रु की व्यूह-रचना के वैपरीत्य में जैसा भी उचित हो वैसा किया जाय । इस प्रकार सेना के दो अंगों द्वारा तीन प्रकार की व्यूह-रचना की जा सकती है और इसी प्रकार सेना के तीन अंगों को लेकर व्यूह-रचना का विभाग किया जा सकता है ।

( ५ ) जो पैदल सेना वंश-परम्परा से नियमित रूप से चली आ रही हो, जो नित्य तथा वश में रहने वाली हो उसे सारबल कहते हैं ।

( ६ ) कुल, जाति, धैर्य, कार्यक्षमता, आयु, शारीरिक बल, ऊँचाई, चौड़ाई,

प्र० १५५-१५७ : अ० ५ ] व्यूह-बल-विभाग एवं युद्ध ६५९

(१) पत्त्यश्वरथद्विपानां सारत्रिभागमुरस्यं स्थापयेद्, द्वौ त्रिभागौ कक्षं पक्षं चोभयतः । अनुलोममनुसारम् । प्रतिलोमं तृतीयसारम् । फल्गु प्रतिलोमम् । एवं सर्वमुपयोगं गमयेत् । (२) फल्गुबलमन्तेष्ववधाय वेगोऽभिहुतो भवति । सारबलमग्रतः कृत्वा कोटीष्वनुसारं कुर्यात् । जघने तृतीयसारं, मध्ये फल्गुबलमेतत् सहिष्णु भवति । (३) व्यूहं तु स्थापयित्वा पक्षकक्षोरस्यानामेकेन द्वाभ्यां वा प्रहरेत् । शेषैः प्रतिगृह्णीयात् । (४) यत्परस्य दुर्बलं वीतहस्त्यश्वं दूष्यामात्यकं कृतोपजापं वा, तत्प्रभूतसारेणाभिहन्यात् । यद्वा परस्य सारिष्ठं तद्द्विगुणसारेणाभिहन्यात् । यद्-


वेग, पराक्रम, युद्धनैपुण्य, स्थिरता, उन्नतशिर ( उदग्रता ), आज्ञाकारी, अनेक शुभ लक्षणों और शुभ चेष्टाओं आदि विशेष गुणों से युक्त हाथी और घोड़ों की सेना को सारबल कहते हैं ।

( १ ) पैदल, घोड़े, रथ, हाथी के सारभूत बल के एक-तिहाई भाग को बीच में और बाकी दो तिहाई भाग को आगे-पीछे स्थापित किया जाय । यह सर्वोत्तम सेना के खड़े होने का प्रकार है । उत्तम सेना की अपेक्षा जो सेना न्यूनशक्ति हो, उसे अनुसार कहा जाता है, ऐसी सेना के सारबल को पीछे की ओर खड़ा करना चाहिए । इससे भी कुछ न्यूनशक्ति वाली तृतीयसार नामक सेना के सारबल को आगे की ओर खड़ा करना चाहिए । उससे भी निर्बल या वंश-परम्परा से चले आते फल्गुबल को तृतीयसार सेना के आगे खड़ा करना चाहिए । इस प्रकार सभी तरह की सेनाओं को उपयोग में लाना चाहिए ।

( २ ) फल्गुबल को आगे की ओर खड़ा करने से शत्रु के आक्रमण का सारा वेग उसी के ऊपर शान्त हो जाता है । सारबल को आगे, अनुसारबल को बगल ( कोटि ), तृतीयसार को पीछे और फल्गुबल को बीच में करके भी व्यूह की रचना की जा सकती है; यह व्यूह भी शत्रु के आक्रमण को सहन करने वाला होता है ।

( ३ ) आगे, पीछे तथा बीच में व्यूह की यथोचित रचना करके तदनंतर सेना के एक अंग द्वारा या दो अंगों के द्वारा शत्रु पर आक्रमण करना चाहिए और सेना के बाकी अंगों से शत्रु के आक्रमण को रोकना चाहिए ।

( ४ ) शत्रु की दुर्बल, हाथी-घोड़ों से रहित, राजद्रोही अमात्यों से युक्त भेद डाली हुई सेना को सारभूत सेना के द्वारा नष्ट कर डालना चाहिए, और शत्रु की सारभूत सेना को अपनी दुगुनी सारभूत सेना के द्वारा नष्ट कर देना चाहिए । अपनी

६६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

६६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

ङ्गल्पसारमात्मनस्तद्बहुनोपचिनुयात् । यतः परस्यापचयस्ततोऽभ्याशे व्यूहेत, यतो वा भयं स्यात् । (१) अभिसृतं परिसृतमतिसृतमपसृतमुन्मथ्यावधानं वलयो गोमूत्रिका मण्डलं प्रकीर्णिका व्यावृतपृष्ठमनुवंशमग्रतः पाश्र्वाभ्यां पृष्ठतो भग्नरक्षा भग्नानुपातः इत्यश्वयुद्धानि । (२) प्रकीर्णिकावर्जान्येतान्येव, चतुर्णामङ्गानां व्यस्तसमस्तानां वा घातः । पक्षकक्षोरस्यानां च प्रभञ्जनमवस्कन्दः सौप्तिकं चेति हस्तियुद्धानि । (३) उन्मथ्यावधानवर्जान्येतान्येव स्वभूमावभियानापयानस्थितयुद्धानीति रथयुद्धानि । (४) सर्वदेशकालप्रहरणमुपांशुदण्डश्चेति पत्तियुद्धानि ।

सेना के निर्बल अंग की सहायता के लिए अधिक सेना की नियुक्ति की जानी चाहिए । शत्रु सेना का जो निर्बल छोर हो उसी ओर से आक्रमण करना चाहिए; या जिस ओर से अपने ऊपर आक्रमण का भय हो उधर से ही व्यूह-रचना करनी चाहिए ।

(१) अभिसृत (अपनी सेना से शत्रु की सेना की ओर जाना), परिसृत (शत्रु की सेना के चारों ओर घूम कर प्रहार करना), अतिसृत (शत्रु की सेना के बीच से सुई की तरह वेध कर निकल जाना), अपसृत (उसी मार्ग से दुवारा निकलना), बहुत से घोड़ों के द्वारा शत्रु सेना का मंथन करके फिर एकत्र हो जाना, दो तरफ से सूई के समान मार्ग बनाकर जाना, गोमूत्र के समान टेढ़ी गति से जाना (गोमूत्रिका), मंडल (शत्रु सेना के बीच से निकल कर उसे घेर लेना), प्रकीर्णिका (सभी तरह की चालों का प्रयोग करना), अनुवंश (शत्रुसेना के सामने गयी हुई अपनी सेना का अनुगमन करना) और भग्नानुपात (छिन्न-भिन्न हुई शत्रुसेना का पीछा करना), ये तेरह प्रकार के अश्वयुद्ध होते हैं ।

(२) घोड़ों की प्रकीर्णिका गति को छोड़ कर शेष सभी युद्ध, बिखरे हुए या इकट्ठा हुए सेना के चारों अंगों का हनन करना, आगे, पीछे तथा मध्य में खड़ी हुई सेना को नष्ट करना, शत्रुसेना की निर्बलता पर प्रहार करना और सोती हुई शत्रुसेना को मार डालना, ये सब हस्तियुद्ध हैं ।

(३) उन्मथ्यावधान (अनेक हाथियों के द्वारा शत्रुसेना को उन्मथित करके फिर उनका एकत्र हो जाना) को छोड़ कर बाकी सभी तरह के हस्तियुद्ध, अनुकूल भूमि में रह कर शत्रु पर आक्रमण करना, शत्रु सेना को पराजित कर भाग जाना, सुरक्षित शत्रुसेना के चारों ओर घेरा डाल कर उससे युद्ध करना, ये सब रथ-युद्ध हैं ।

(४) हर समय तथा हर स्थान में हथियारों को धारण करना और चुपचाप शत्रु सेना को नष्ट करना, ये सब पदाति (पैदल) युद्ध हैं ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।

प्र० १५५-१५७ : अ० ५ ] व्यूह-बल-विभाग एवं युद्ध ६६१

( १ ) एतेन विधिना व्यूहानोजान् युग्मांश्च कारयेत् ।
विभवो यावदङ्गानां चतुर्णां सदृशो भवेत् ॥
( २ ) द्वे शते धनुषां गत्वा राजा तिष्ठेत् प्रतिग्रहे ।
भिन्नसङ्घातनं तस्मान्न युध्येताप्रतिग्रहः ॥

इति साङ्ग्रामिके दशमेऽधिकरणे पक्षकक्षोरस्यानां बलाग्रतो व्यूहविभागः सारफल्गुबलविभागः पत्त्यश्वरथहस्तियुद्धानि चेति पञ्चमोऽध्यायः, आदितो द्वात्रिंशदुत्तरशततमः ।

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( १ ) इस प्रकार विजिगीषु राजा को अयुग्म तथा युग्म व्यूहों की रचना करनी चाहिए । अपने हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल अंगों के अनुसार ही अपने व्यूहों की रचना करनी चाहिए ।

( २ ) राजा को चाहिए कि युद्ध आरंभ हो जाने पर वह युद्धभूमि से दो-सौ धनुष की दूरी पर ठहरे । ऐसी स्थिति में वह शत्रु द्वारा छिन्न-भिन्न अपनी सेना को फिर एकत्र कर सकता है । इसलिए सेना के पृष्ठ भाग का आश्रय लिये बिना राजा को कदापि युद्ध न करना चाहिए ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १५८-१५९ <br> अध्याय ६## दण्डभोगमण्डलासंहतव्यूहव्यूहनं तस्य प्रतिव्यूहस्थापनं च

(१) पक्षावुरस्यं प्रतिग्रह इत्यौशनसो व्यूहविभागः । पक्षौ कक्षावुरस्यं प्रतिग्रहः इति बार्हस्पत्यः ।

(२) प्रपक्षकक्षोरस्या उभयोर्दण्डभोगमण्डलासंहताः प्रकृतिव्यूहाः । तत्र तिर्यग्वृत्तिर्दण्डः । समस्तानामान्वावृत्तिर्भोगः । सरतां सर्वतोवृत्तिर्मण्डलः । स्थितानां पृथगनीकवृत्तिरसंहतः ।

(३) पक्षकक्षोरस्यैः समं वर्तमानो दण्डः । स कक्षाभिक्रान्तः प्रदरः; स एव पक्षाभ्यां प्रतिक्रान्तो दृढकः; स एवातिक्रान्तः पक्षाभ्यामसहाः; पक्षाव-


प्रकृतिव्यूह; विकृतिव्यूह और प्रतिव्यूह की स्थापना

(१) आगे के दो हिस्से, बीच का एक हिस्सा और पीछे का एक हिस्सा—व्यूह के चार विभाग शुक्राचार्य (उशना) ने किये हैं। आगे का एक हिस्सा, पीछे दोनों ओर के दो-दो हिस्से, बीच का एक हिस्सा और पीछे का एक हिस्सा—व्यूह के ये छः विभाग आचार्य वृहस्पति ने किये हैं।

(२) शुक्राचार्य और वृहस्पति दोनों आचार्यों के मत से आगे, पीछे तथा बीच में अलग-अलग खड़ी होने वाली सेनाओं के दण्ड, भोग, मण्डल और असंहत नामों से चार प्रकार के व्यूह हुआ करते हैं। ये व्यूह प्रकृतिव्यूह के नाम से कहे जाते हैं। उनमें से सेना को तिरछे में खड़ा करके जो व्यूह बनाया जाता है उसे दण्डव्यूह कहते हैं। दोनों आचार्यों के उक्त चार और छः विभागों द्वारा लगातार कई बार घुमाव डाल कर जो व्यूह बनाया जाता है उसे भोगव्यूह कहते हैं। शत्रु की ओर जाती हुई सेनाओं का चारों ओर से घिर कर आक्रमण करना मण्डलव्यूह कहलाता है। आक्रमण के लिए छोटी-छोटी सेनाओं को अलग-अलग टुकड़ियों में खड़ा करना असंहतव्यूह कहलाता है।

(३) आगे, पीछे तथा बीच में समानरूप से नियुक्त सेनाओं के व्यूह को दण्डव्यूह कहते हैं। जब आगे के दोनों भागों से शत्रु पर आक्रमण किया जाता है तो उस दण्डव्यूह को प्रदरव्यूह कहते हैं। जब पीछे की सेना मुड़ कर शत्रु पर वार करे तो दण्डव्यूह की वह स्थिति दृढकव्यूह के नाम से कही जाती है। पीछे की सेना जब बड़े वेग से शत्रु-सेना के बीच में घुस जाय तब उस दृढकव्यूह को असह्यव्यूह

प्र० १५८-१५९ : अ० ६ ] व्यूह-प्रतिव्यूह-स्थापना ६६३

वस्थाप्योरस्याभिक्रान्तः श्येनः; विपर्यये चापं चापकुक्षिः प्रतिष्ठः सुप्रतिष्ठश्च । चापपक्षः सञ्जयः; स एवोरस्यातिक्रान्तो विजयः; स्थूलकर्णपक्षः स्थूलकर्णः; द्विगुणपक्षस्थूलो विशालविजयः; त्र्यभिक्रान्तपक्षश्चमूमूखः; विपर्यये झषास्यः । ऊर्ध्वराजिर्दण्डः सूची; द्वौ दण्डौ वलयः; चत्वारो दुर्जयः । इति दण्डव्यूहाः ।

(१) पक्षकक्षोरस्यैर्विषमं वर्तमानो भोगः । स सर्पसारी गोमूत्रिका वा । स युग्मोरस्यो दण्डपक्षः शकटः; विपर्यये मकरः; हस्त्यश्वरथैर्व्यतिकीर्णः शकटः पारिपतन्तकः । इति भोगव्यूहाः ।

(२) पक्षकक्षोरस्यानामेकीभावे मण्डलः । स सर्वतोमुखः सर्वतोभद्रः; अष्टानीको दुर्जयः । इति मण्डलव्यूहाः ।


कहते हैं । आगे-पीछे के उपयुक्त भागों पर सेना को रखकर जब मध्यभाग के द्वारा सेना पर आक्रमण किया जाता है तब उस व्यूह को श्येनव्यूह कहते हैं । इन चार व्यूहों के सर्वथा विपरीत व्यूहों का नाम है क्रमशः चाप, चापकुक्षि, प्रतिष्ठ और सुप्रतिष्ठ । जिस व्यूह के पिछले भाग चाप ( धनुष ) के समान हों वह संजयव्यूह कहलाता है । जब बीच से शत्रु पर आक्रमण करके उसके बीच प्रवेश कर दिया जाता है, दण्डव्यूह की वह स्थिति विजयव्यूह कहलाती है । विजयव्यूह की अपेक्षा जिसके पिछले हिस्से दुगुने बड़े हों वह विशाल विजयव्यूह कहलाता है । जिस व्यूह के अगला, दो पिछले और मध्यभाग, तीनों बराबर हों वह चमूमुखव्यूह कहलाता है । इसके विपरीत होने पर वही चमूमुखव्यूह झषास्य व्यूह कहलाता है । जिस व्यूह की सेना ऊँची होकर शत्रुसेना पर आक्रमण करती है उस दण्डव्यूह को सूचीव्यूह कहते हैं । जब आगे, पीछे और मध्य, तीनों स्थानों में दो दण्डव्यूहों को तिरछा खड़ा किया जाय तब उसको वलय व्यूह कहते हैं । यदि इसी प्रकार चार दण्डव्यूहों को खड़ा कर दिया जाय तो उसको दुर्जयव्यूह कहते हैं । यहाँ तक दण्डव्यूहों का निरूपण हुआ ।

( १ ) आगे-पीछे आदि स्थानों के द्वारा विषम संख्या में रचा हुआ व्यूह भोग-व्यूह कहलाता है । भोगव्यूह दो प्रकार का होता है—एक सर्पहारी और दूसरा गोमूत्रिका । जब उसका मध्य भाग दो भागों में बँटकर दण्डाकार दोनों ओर स्थित हो जाता है उस स्थिति में उसको शकटव्यूह कहा जाता है । इसकी विपरीतावस्था में वही व्यूह मकरव्यूह कहलाता है । हाथी, घोड़े और रथों से युक्त शकटव्यूह को पारिपतन्तकव्यूह कहते हैं । यहाँ तक भोगव्यूहों का निरूपण हुआ ।

( २ ) जिस व्यूह में आगे-पीछे और बीच के सभी विभाग एक साथ मिल जायें उसको मंडलव्यूह कहते हैं । जब चारों ओर से शत्रु पर आक्रमण किया जाय तब वही

६६४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) पक्षकक्षोरस्यानाम् असंहतादसंहतः । स पञ्चानीकानामाकृति-स्थापनाद्वज्रो गोधा वा । चतुर्णामुद्यानकः काकपदी वा । त्रयाणामर्धचन्द्रिकः कर्कटकशृङ्गी वा । इत्यसंहतव्यूहाः । (२) रथोरस्यो हस्तिकक्षोऽश्वपृष्ठोऽरिष्टः । (३) पत्तयोऽश्वा रथा हस्तिनश्चानुपृष्ठमचलः । (४) हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तयश्चानुपृष्ठमप्रतिहतः । (५) तेषां प्रदरं दृढकेन घातयेत्; दृढकमसह्येन, श्येनं चापेन, प्रतिष्ठं सुप्रतिष्ठेन, सञ्जयं विजयेन, स्थूलकर्णं विशालविजयेन, पारिपतन्तकं सर्वतोभद्रेण । दुर्जयेन सर्वान् प्रतिव्यूहेत ।

मण्डलब्यूह की स्थिति सर्वतोभद्रव्यूह कहलाती है और जब उस व्यूह में आठ सेनायें मिलकर शत्रु पर आक्रमण करें तो वही व्यूह दुर्जयव्यूह कहलाता है । यहाँ तक मण्डलब्यूहों का निरूपण हुआ ।

( १ ) आगे-पीछे आदि की सेनाओं को तितर-बितर कर जो युद्ध किया जाता है उसे असंहतव्यूह कहते हैं । उसके दो प्रकार हैं : एक वज्र और दूसरा गोधा । जब आगे-पीछे की सभी सेनाओं को वज्र के आकार में खड़ा कर दिया जाता है तब उसे वज्रव्यूह और जब उन्हें गोह के आकार में खड़ा कर दिया जाता है तब उसे गोधाव्यूह कहते हैं । जब कि आगे के दोनों हिस्से, बीच का एक हिस्सा और अंत का एक हिस्सा इन चार स्थानों में उक्त प्रकार से सेना को खड़ा कर दिया जाता है तब उस असंहत व्यूह को उद्यानकव्यूह या काकपक्षीव्यूह कहते हैं । जब आगे के दोनों हिस्सों और बीच के एक हिस्से में सेना को खड़ा कर दिया जाता है तब उस व्यूह को अर्धचन्द्रिक या कर्कटकशृङ्गीव्यूह कहते हैं । असंहत व्यूह के यही प्रमुख भेद हैं ।

( २ ) व्यूहों के तीन भेद और हैं : अरिष्ट, अचल और अप्रतिहत । जिस व्यूह के मध्य में रथ, अंत में घोड़े और आदि में हाथी हों उसको अरिष्टव्यूह कहते हैं ।

( ३ ) जिस व्यूह में पैदल, हाथी, घोड़े और रथ एक-दूसरे के पीछे हों, उसे अचलव्यूह कहते हैं ।

( ४ ) जिस व्यूह में हाथी, घोड़ा, रथ और पैदल एक-दूसरे के पीछे हों, उसे अप्रतिहतव्यूह कहते हैं ।

( ५ ) उक्त व्यूहों में से प्रदर को दृढक से, दृढक को असह्य से, श्येन को चाप से, प्रतिष्ठ को सुप्रतिष्ठ से, संजय को विजय से, स्थूलकर्ण को विशालविजय से और पारिपतंतक को सर्वतोभद्र से तोड़ा जाना चाहिए । दुर्जयव्यूह के द्वारा सभी व्यूहों को तोड़ा जाना चाहिए ।

प्र० १५८-१५९ : अ० ६ ] व्यूह-प्रतिव्यूह-स्थापना ६६५

(१) पत्त्यश्वरथद्विपानां पूर्वं पूर्वमुत्तरेण घातयेत् । हीनाङ्गमधिकाङ्गेन चेति । (२) अङ्गदशकस्यैकः पतिः पदिकः, पदिकदशकस्यैकः सेनापतिः, तद्दशकस्यैको नायक इति । स तूर्यघोषध्वजपताकाभिर्व्यूहाङ्गानां संज्ञाः स्थापयेद् अङ्गविभागे सङ्घाते स्थाने गमने व्यावर्तने प्रहरणे च । (३) समे व्यूहे देशकालसारयोगात् सिद्धिः । (४) यन्त्रैरुपनिषद्योगैस्तीक्ष्णैर्व्यासक्तघातिभिः । मायाभिर्दैवसंयोगैः शकटैर्हस्तिभूषणैः ॥ (५) दूष्यप्रकोपैर्गोयूथैः स्कन्धावारप्रदीपनैः । कोटीजघनघातैर्वा दूतव्यञ्जनभेदनैः ॥ (६) दुर्गं दग्धं हृतं वा ते कोपः कुल्यः समुत्थितः । शत्रुराटविको वेति परस्योद्वेगमाचरेत् ॥


(१) पैदल, घोड़ा, रथ तथा हाथी इनको उत्तरोत्तर अंग से नष्ट करना चाहिए और हीन अंग को अधिक बलवान् अङ्ग से नष्ट करना चाहिए ।

(२) दस रथ और दस हाथियों के अधिकारी को पदिक; दस पदिकों के अधिकारी को सेनापति; और दस सेनापतियों के अधिकारी को नायक कहा जाता है । उस सर्वोच्चसत्ताधारी नायक को चाहिए कि वह विशेष वाद्य शब्दों द्वारा अथवा पताका-ध्वजाओं द्वारा व्यूह में खड़ी सेना के लिए सांकेतिक इशारों की व्यवस्था करे । युद्ध में खड़ी सेना को बिखराने के लिए, बिखरी हुई सेना को एकत्र करने के लिए, चलती हुई सेना को रोकने के लिए, रुकी हुई सेना को चलाने के लिए तथा आक्रमण करती हुई सेना को लौट आने के लिए तथा प्रहार करने के लिए यथावसर उक्त संकेतों का प्रयोग किया जाय ।

(३) शत्रु सेना और अपनी सेना में बराबर की व्यूह रचना होने पर देश, काल और योग के अनुसार विजय प्राप्त की जानी चाहिए ।

(४) जामदग्न्य आदि यंत्र, औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपाय, तीक्ष्ण आदि गुप्तचरों, छल, कपट, ज्योतिष और हाथी के योग्य वेषों से ढके हुए रथ आदि के द्वारा शत्रु सेना को उद्विग्न करना चाहिए ।

(५) शत्रु के दूष्यों में कोप पैदा करके, आगे गायों का झुंड खड़ा करके, छावनी में आग लगाकर, सेना के आगे-पीछे छापा मारकर, गुप्तचरों को शत्रु सेना में घुसाकर शत्रु सेना को बेचैन करना चाहिए ।

(६) 'तेरे दुर्ग को आग लगा दी गई है, तेरे दुर्ग को जीत लिया गया है, तेरे कुल का ही कोई व्यक्ति तेरे विरुद्ध उठ खड़ा हुआ है, तेरा सामंत युद्ध के लिए तैयार

६६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुः क्षिप्तो धनुष्मता । प्राज्ञेन तु मतिः क्षिप्ता हन्याद् गर्भगतानपि ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे दण्डभोगमण्डलासंहतव्यूहव्यूहनं तस्य प्रतिव्यूहस्थापनं चेति षष्ठोऽध्यायः; आदितस्त्रयस्त्रिंशदधिकशततमः ।

समाप्तमिदं सांग्रामिकं दशममधिकरणम् ।

—: ० :—


हो गया है, तेरा आटविक तेरे विरुद्ध उठ आया है, आदि अफवाहों को उड़ाकर भी विजिगीषु शत्रु सेना को उद्विग्न कर सकता है ।

(१) धनुर्धारी के धनुष से छोड़ा गया बाण, संभव है किसी एक व्यक्ति को ही मार डाले या न भी मारे; किन्तु बुद्धिमान् व्यक्ति के द्वारा किया गया बुद्धि का प्रयोग गर्भस्थ प्राणियों को भी नष्ट कर देता है । इसलिए युद्ध की अपेक्षा बुद्धि को ही अधिक शक्ति-संपन्न समझना चाहिए ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में व्यूहप्रतिव्यूहस्थापना नामक छठा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

ग्यारहवाँ अधिकरण

ग्यारहवाँ अधिकरण

सङ्घवृत्त

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प्रकरण१६०-१६१
अध्याय

भेदोपादानानि, उपांशुदण्डश्च


(१) सङ्घलाभो दण्डमित्रलाभानामुत्तमः । सङ्घा हि संहतत्वादधृष्याः परेषाम् । ताननुगुणान् भुञ्जीत सामदानाभ्याम् । विगुणान् भेददण्डाभ्याम् ।

(२) काम्बोजसुराष्ट्रक्षत्रियश्रेण्यादयो वार्ताशस्त्रोपजीविनः । लिच्छिविकवृजिकमल्लकद्रककुकुरपाञ्चालादयो राजशब्दोपजीविनः ।

(३) सर्वेषामासन्नाः सत्रिणः सङ्घानां परस्परन्यङ्गद्वेषवैरकलहस्थानान्युपलभ्य क्रमाभिनीतं भेदमुपचारयेयुः—‘असौ त्वा विजलपति’ इति । एवमुभयतः । बद्धरोषाणां विद्याशिल्पद्यूतवैहारिकेष्वाचार्यव्यञ्जना बालककलहानुत्पादयेयुः । वेशशौण्डिकेषु वा प्रतिलोमप्रशंसाभिः सङ्घमुख्यमनुष्याणां तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । कृत्यपक्षोपग्रहेण वा ।


भेदक प्रयोग और उपांशुदण्ड

(१) भेदक प्रयोग : संघलाभ, सेनालाभ और मित्रलाभ, इन तीनों में संघ-लाभ उत्तम है; क्योंकि संगठित होने से संघों को शत्रु दबा नहीं पाता है । इन संघों के अनुकूल होने पर विजिगीषु को साम और दान के द्वारा उनका उपभोग करना चाहिए और प्रतिकूलावस्था में भेद तथा दण्ड के द्वारा उनका उपभोग करना चाहिए ।

(२) कम्बोज और सौराष्ट्र देशों के क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्गों के संघ कृषि, व्यापार और शस्त्र के द्वारा जीविकोपार्जन करते हैं । लिच्छविक, व्रजिक, मल्लक, मद्रक, कुकुर, कुरु और पांचाल देशों के राजाओं के केवल नाममात्र के संघ होते हैं ।

(३) विजिगीषु को चाहिए कि उक्त सभी प्रकार के संघों में अपने सत्री नामक गुप्तचरों को नियुक्त करे और वे सत्री उन संघों के पारस्परिक दोष, द्वेष, वैर और कलह के कारणों को पकड़ कर धीरे-धीरे उन्हें प्रकाश में लाकर उन संघों में इस तरीके से कि 'अमुक संघ आप की ऐसी निंदा करता है' भेद डाल दे । इसी प्रकार दूसरे को भी पहिले के विरुद्ध भड़काने का यत्न करे । परस्पर द्वेष रखने वाले संघों के राजकुमारों के कपटी आचार्य बनकर गुप्तचर विद्या, शिल्प, द्यूत और प्रश्नोत्तर आदि के विषय में कलह उत्पन्न करा दे । अथवा वेश्या तथा सुरापान आदि में आसक्त संघ के मुख्य व्यक्तियों की उल्टी प्रशंसा कराकर तीक्ष्ण गुप्तचर उनमें कलह उत्पन्न करा दें । अथवा संघमुख्यों के प्रति जो कुछ, लुब्ध या भीत आदि भृत्य व्यक्ति हों उनको अपने वश में करके फिर संघों के साथ उनका कलह करा दे ।

६७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

६७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

(१) कुमारकान् विशिष्टच्छन्दिकया हीनच्छन्दिकानुत्साहयेयुः । (२) विशिष्टानां चैकपात्रं विवाहं हीनेभ्यो वारयेयुः । हीनान् वा विशिष्टैरेकपात्रे विवाहे वा योजयेयुः । अवहीनान् वा तुल्यभावोपगमने कुलतः पौरुषतः स्थानविपर्यास्तो वा । व्यवहारमवस्थितं वा प्रतिलोम-स्थापनेन निशामयेयुः । विवादपदेषु वा द्रव्यपशुमनुष्याभिघातेन रात्रौ तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । सर्वेषु च कलहस्थानेषु हीनपक्षं राजा कोश-दण्डाभ्यामुपगृह्य प्रतिपक्षवधे योजयेत्, भिन्नानपवाहयेद्वा । एकदेशे सम-स्तान् वा निवेश्य भूमौ चेषां पञ्चकुलीं दशकुलीं वा कृष्यां निवेशयेत् । एकस्था हि शस्त्रग्रहणसमर्थाः स्युः । समवाये चैषामत्ययं स्थापयेत् । (३) राजशब्दिभिरवरुद्धमवक्षिप्तं वा कुल्यमभिजातं राजपुत्रत्वे स्था-


( १ ) संघ के राजकुमारों में जो अधिक साधनसंपन्न होकर सुखपूर्वक रहते हों उनके मुकाबले में असंपन्न राजकुमारों को भड़का दे ।

( २ ) गुप्तचरों को चाहिए कि वे संघ के विशिष्ट व्यक्तियों को उनकी अपेक्षा हीन व्यक्तियों के साथ एक पंक्ति में बैठ कर भोजन करने तथा विवाहादि संबंध करने, से वर्जित करें । अथवा हीन व्यक्तियों को विशिष्ट व्यक्तियों के साथ एक पंक्ति में भोजन करने तथा विवाहादि संबंध के लिए प्रेरित करें । अथवा छोटी हैसियत के व्यक्तियों को बड़ी हैसियत के व्यक्तियों के बराबर खानदानी या बहादुरी या स्थानां-तर के लिए उत्साहित करें । अथवा संघ द्वारा किसी विवादास्पद विषय का निर्णय किये जाने पर जो निर्णय हुआ हो उसके विपरीत ही वादी को जाकर सुनायें । अथवा रात में तीक्ष्ण गुप्तचर स्वयं ही किसी संघ के द्रव्य, पशु तथा मनुष्यों को नष्ट कर उसको दूसरे संघ वालों का कार्य बताकर प्रचार करे और इस प्रकार के विवादास्पद विषयों को उठाकर उनको आपस में लड़ा दे । जब इस प्रकार के कलह संघों में उत्पन्न हों, तो विजिगीषु को चाहिए कि वह किसी पक्षपात रहित संघ के व्यक्ति को कोष तथा दण्ड के द्वारा अपने वश में कर उससे अपने शत्रु का वध करा डाले । अथवा संघ के विरुद्ध हुए उन व्यक्तियों को संघ से अलग करा दे । अथवा उनको किसी एक प्रदेश में इकट्ठा कर पाँच-पाँच, दस-दस समूहों के छोटे-छोटे गाँवों में बसा दे । क्योंकि यदि उन्हें एक साथ ही बसा दिया जायगा तो संभव है वे लोग फिर कभी अवसर आने पर विजिगीषु के विरुद्ध हथियार उठाने में समर्थ हो सकें, इसलिए उनकी आबादी के बीच में थोड़ी-थोड़ी सेना नियुक्त कर दे ।

( ३ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह नाममात्र को राजा कहलाने वाले लिच्छिवी आदि क्षत्रिय-संघों से अवरुद्ध या तिरस्कृत, उच्चकुलोत्पन्न गुणी व्यक्ति को राजपुत्र

प्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७१

पयेत् । कार्तान्तिकादिश्चास्य वर्गो राजलक्षण्यतां सङ्घेषु प्रकाशयेत् । सङ्घ-मुख्यांश्च धर्मिष्ठानुपजपेत्—'स्वधर्मममुष्य राज्ञः पुत्रे भ्रातरि वा प्रतिपद्य-ध्वम्' इति । प्रतिपन्नेषु कृत्यपक्षोपग्रहार्थमर्थं दण्डं च प्रेषयेत् । (१) विक्रमकाले शौण्डिकव्यञ्जनाः । पुत्रदारप्रेतापदेशेन 'नैषेच-निकम्' इति मदनरसयुक्तान् मद्यकुम्भान् शतशः प्रयच्छेयुः । (२) चैत्यदैवतद्वाररक्षास्थानेषु च सत्रिणः समयकर्मनिक्षेपं सहिरण्या-भिज्ञानमुद्राणि हिरण्यभाजनानि च प्ररूपयेयुः, दृश्यमानेषु च सङ्घेषु 'राज-कीयाः' इत्यावेदयेयुः । अथावस्कन्दं दद्यात् । (३) सङ्घानां वा वाहनहिरण्ये कालिके गृहीत्वा संघमुख्याय प्रख्यातं द्रव्यं प्रयच्छेत् । तदेषां याचिते 'दत्तममुष्मै मुख्याय' इति ब्रूयात् ।


के रूप में नियुक्त करे और संबंधित ज्योतिषी तथा सामुद्रिक लिच्छवी-संघों में जाकर उस राजपुत्र को राज-लक्षणों से युक्त प्रकाशित करें । उन संघों के जो मुख्य धार्मिक व्यक्ति हैं उनको इस प्रकार बहकाया जाय कि 'अमुक राजपुत्र या राजमाता को संघ के लोग कैद में डाल कर बहुत कष्ट दे रहे हैं; आप ही इस बीच धर्मात्मा व्यक्ति हैं, इसलिए आप ही उस निर्दोष राजपुत्र की रक्षा करें ।' जब संघ के मुख्य लोग इस बात को स्वीकार कर लें तब क्रुद्ध, लुब्ध एवं भीत कृत्य व्यक्तियों को अपने अनुकूल बनाने के लिए संघ के मुख्य व्यक्तियों के पास सहायतार्थ धन तथा सेना भेजी जाय ।

( १ ) जब युद्ध की तैयारी हो जाय; तब शराब बेचने वाले छद्मवेष गुप्तचर अपने स्त्री-पुत्रों के मर जाने का बहाना बनाकर 'यह नैषेचनिक मद्य है, अपने दिवंगत स्त्री-पुत्रों के निमित्त इसको हम आप लोगों के लिए भेंट करते हैं' ऐसा कह कर विष-रस से भरे हुए सैकड़ों घड़े लाकर उन्हें थमा दें ।

( २ ) देवालय तथा अन्य पवित्र स्थानों के दरवाजों पर और रक्षास्थानों के सभी गुप्तचर संघ के मुखिया के साथ शर्त के तौर पर अमानत के रूप में दिया जाने वाला धन, अभिज्ञात सुवर्ण मुद्रा सहित तथा अन्य सुवर्ण के पात्र आदि वस्तुओं को संघ के अन्य व्यक्तियों के समक्ष इस प्रकार प्रकट करें कि वे इस बात को जान लें । बात के खुल जाने पर जब संघ के लोग यह पूछें कि 'यह सुवर्ण का सामान किसका है ?' तब उनको उत्तर दिया जाय कि 'यह राजा का है ।' इस प्रकार संघों में पारस्परिक फूट पड़ जाने के बाद विजिगीषु फौरन उन पर धावा बोल दे ।

( ३ ) अथवा सभी गुप्तचर किसी बहाने से संघ के लोगों से घोड़े, सवारी तथा हिरण्य आदि को नियत समय पर वापिस कर देने के वायदे पर ले ले, और समय आने पर सब लोगों के सामने उस सामान को संघ के मुखिया को वापिस कर दे ।

६७२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

(१) एतेन स्कन्धावाराटवीभेदो व्याख्यातः । (२) सङ्घमुख्यपुत्रमात्मसंभावितं वा सत्त्री ग्राहयेत्—'अमुष्य राज्ञः पुत्रस्त्वं शत्रुभयादिह न्यस्तोऽसि' इति । प्रतिपन्नं राजा कोशदण्डाभ्यामुपगृह्य सङ्घेषु विक्रमयेत्; अवाप्तार्थस्तमपि प्रवासयेत् । (३) बन्धकीपोषकाः प्लवकनटनर्तकसौभिका वा प्रणिहिताः स्त्रीभिः परमरूपयौवनाभिः सङ्घमुख्यानुन्मादयेयुः । जातकामानामन्यतमस्य प्रत्ययं कृत्वाऽन्यत्र गमनेन प्रसभहरणेन वा कलहानुत्पादयेयुः । कलहे तीक्ष्णाः कर्म कुर्युः–हतोऽयमित्थं कामुकः' इति । (४) विसंवादितं वा मर्षयमाणमभिसृत्य स्त्री ब्रूयात्—असौ मां मुख्यस्त्वयि जातकामां बाधते, तस्मिन् जीवति नेह स्थास्यामि' इति घातमस्य प्रयोजयेत् ।


जब वे लोग उससे अपना सामान माँगे तो कह दे कि 'वह सामान मुखिया को वापिस कर दिया गया है।' इस रीति से सभी गुप्तचर, संघ के लोगों और मुखिया के बीच भेद डाल दें ।

( १ ) अपनी छावनी में प्रविष्ट आटविक लोगों को परस्पर फोड़ने के लिए भी उक्त उपायों को ही उपयोग में लाना चाहिए ।

( २ ) उपांशुवध : संघमुख्य के अभिमानी पुत्र को सभी गुप्तचर यह कह कर बहकायें कि 'तू अमुक राजा का पुत्र है, शत्रु भय से यहाँ रख दिया गया है'। यदि संघ मुख्य का पुत्र इस बात को मान जाय तो उसको कोष और सेना की सहायता देकर संघों के ऊपर आक्रमण के लिए भेज दिया जाय । उसके द्वारा जब अपने कार्य की सिद्धि हो जाय तो बाद में उसको भी प्रवासित कर दिया जाय या मार दिया जाय ।

( ३ ) कुलटा स्त्रियों का पालन-पोषण करने वाले या प्लवक, नट, नर्तक और सौभिक वेष में रहने वाले गुप्तचर अत्यंत सुन्दरी यौवन-संपन्न स्त्रियों के द्वारा संघमुख्यों को प्रमादी बनायें । जब स्त्रियों में बहुत से संघमुख्यों की आसक्ति हो जाय तो उनमें से किसी एक को किसी सांकेतिक स्थान पर स्त्री से मिलने का वायदा कर, ठीक समय पर उस स्त्री को वहाँ से किसी दूसरे संघमुख्य के द्वारा अन्यत्र भिजवा दें या उसके द्वारा अपहरण करा दें और बाद में इसी निमित्त उन संघमुख्यों का परस्पर झगड़ा करा दें । झगड़ा होने पर तीक्ष्ण गुप्तचर उनमें से किसी एक संघ मुख्य को मार डालें और बाद में यह अफवाह उड़ा दें कि एक कामी पुरुष ने दूसरे कामी पुरुष का वध कर डाला है ।

( ४ ) यदि उन संघमुख्यों में एक व्यक्ति स्त्री के लिए झगड़ा न करना चाहे तो

प्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७३

(१) प्रसह्यापहृता वा वनान्ते क्रीडागृहे वापहर्तारं रात्रौ तीक्ष्णेन घातयेत् । स्वयं वा रसेन । ततः प्रकाशयेद्—'अमुना मे प्रियो हतः' इति । (२) जातकामं वा सिद्धव्यञ्जनः सांवननिकीभिरोषधीभिः संवास्य रसेनातिसन्धायोपगच्छेत् । तस्मिन्नपक्रान्ते सत्रिणः परप्रयोगमभिशंसेयुः । (३) आढ्यविधवा गूढाजीवा योगस्त्रियो वा दायनिक्षेपार्थं विवदमानाः संघमुख्यानुन्मादयेयुः इति । अदितिकौशिकस्त्रियो नर्तकीगायना वा प्रतिपन्नान् गूढवेश्मसु रात्रिसमागमप्रविष्टांस्तीक्ष्णा हन्युर्बद्ध्वा हरेयुर्वा । (४) सत्री वा स्त्रीलोलुपं सङ्घमुख्यं प्ररूपयेत्—'अमुष्मिन् ग्रामे दरिद्रकुलमपसृतं, तस्य स्त्री राजार्हा, गृहाणैनाम्' इति । गृहीतायामर्धमासान्तरं


उसके पास जाकर वह स्त्री कहे 'आपके प्रति मेरी दिली ख्वाहिश होने पर भी अमुक संघमुख्य मुझे आपके पास आने से रोकता है। उसके जीवित रहते मैं आपके पास न आ सकूँगी', इस प्रकार दूसरे संघमुख्य के वध का आयोजन किया जाय।

(१) अथवा बलात् अपहृत स्त्री तीक्ष्ण गुप्तचर द्वारा अपने अपहरण करने वाले व्यक्ति को मरवा डाले, अथवा स्वयं ही उसे विष देकर मार डाले। तदनन्तर यह अफवाह फैलाये कि 'अमुक संघमुख्य कामुक व्यक्ति ने मेरे प्रियतम को मार डाला है।'

(२) अथवा संघमुख्य जब उस स्त्री पर आसक्त हो जाय तो सिद्ध के वेष में रहने वाला गुप्तचर उस स्त्री पर वशीकरण मन्त्र प्रयोग करने के बहाने संघमुख्य व्यक्ति को विषमिश्रित औषधियाँ देकर मार डाले और स्वयं वहाँ से भाग जाय। उसके भाग जाने पर सभी गुप्तचर इस अफवाह को उड़ायें कि 'प्रतिद्वंद्वी किसी कामी पुरुष की प्रेरणा से ही सिद्ध-पुरुष के द्वारा इसको विष देकर मारा है।'

(३) कोई धनी विधवा, गूढाजीवा (गरीबी के कारण व्यभिचार करने वाली सधवा), या स्त्री का कपटवेष धारण करने वाले पुरुष दायभाग या अमानत आदि का विवाद लेकर निर्णय के बहाने संघमुख्यों के पास जाकर उन्हें अपने वश में कर ले। अथवा अदिति (तरह-तरह के देवताओं के चित्र दिखाकर जीविका कमाने वाली) स्त्रियाँ, या कौशिक स्त्रियाँ (सँपेरों की स्त्रियाँ) या नाचने-गाने वाली स्त्रियाँ ही संघमुख्यों को अपने वश में करें। जब संघमुख्य उन स्त्रियों के जाल में फँस जायें और उनसे सम्भोग करने के लिए किसी निश्चित स्थान का संकेत कर दें, तब एकान्त में उन स्थानों पर रात में संभोग करते हुए संघमुख्यों को तीक्ष्ण गुप्तचर मार डाले या बांध कर उनका अपहरण कर लें।

(४) अथवा स्त्रीलोलुप संघमुख्य को सभी गुप्तचर यह कह कर बहकायें कि 'अमुक गाँव का एक गरीब व्यक्ति जीविकोपार्जन के लिए विदेश चला गया है।

४३ कौ०