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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
DevanagariHindipublished707 पृष्ठ
पृष्ठ 696स्थायी लिंक
४३८ | किरातार्जुनीयम्
| न | स० | श्लो० | स० | श्लो० | |
|---|---|---|---|---|---|
| न ज्ञातं तात यत्तस्य | ११ | ४२ | निद्राविनोदितनितान्त | १ | ७५ |
| न तेन सज्यं क्वचिदु | १ | २१ | निपत्तिनेऽधिनिरोध | १८ | ६ |
| न ददाह मुहुर्वनानि | १२ | १६ | निष्पीयमानस्तबका | ८ | ६ |
| न दलति निचये | १० | ३९ | निबद्धनिश्वासविकम्पिता | ४ | १५ |
| ननु हो मथना राधो | १५ | २० | निमीलदाकेकरलोल | ८ | ५३ |
| न नोननुन्नो नुन्नोनो | १५ | २४ | निरञ्जनं साचिविलोकितं | ८ | ५२ |
| न पपात सन्निहित | १२ | ४ | निरत्ययं साम न दान | १ | १२ |
| न प्रसादमुचितं गमिता | १ | २५ | निरास्पदं प्रशनकुतूहलित्व | ३ | ९ |
| न मृगः खलु कोऽप्ययं | १३ | ६ | निरीक्ष्यमाणा इव | ४ | ३ |
| नयनादिव शूलिनः | १३ | २२ | निरीक्ष्यसंरम्भनिरस्त | ३ | ११ |
| न रागि चेतः परमा | १८ | ५१ | निर्याय विधाय दिनादि | ३ | २५ |
| नवपल्लवाञ्जलिभृतः | ६ | २६ | निवृत्तवृत्तोऽपयोधर | ८ | ७ |
| न वर्त्म कस्मैचिदपि | १४ | १४ | निशम्य सिद्धिं द्विषतां | १ | १७ |
| नवविनिद्रजपाकुसुम | ५ | ८ | निशातरोद्रेषु विकासतां | १४ | ३० |
| नवात्तपालोहितमाहितं | ४ | ८ | निशि तामिरितोऽभीको | १५ | २२ |
| न विरोधिनी रूपमियाय | १२ | ४६ | निःशेषं प्रशमितरेण | ७ | ३८ |
| न विसिस्मिये न विषसाद | १२ | ५ | निःशेषं शकलित | १७ | ६२ |
| न समयपरिरक्षणं | १ | ४५ | निःश्वासधूमैः स्थगितां | १६ | ११ |
| न सुखं प्रार्थये नार्थ | ११ | ६६ | निषण्णमापहप्रतिकार | १४ | ३७ |
| न सजो रुचिर | ९ | ३५ | विषादिसन्नाहमणि | १६ | १२ |
| नानारत्नज्योतिषां | ५ | ३६ | निसर्गदुर्बोधमबोध | १ | ६ |
| नाम्तरङ्गाः श्रियो जातु | ११ | २४ | निहते विडम्बित | १२ | ३८ |
| नाभियोक्तुमनुत | १३ | ५८ | निहितसरसयावकै | १० | ३ |
| नासुरोऽयं न वा नागो | १५ | १२ | नीतोच्छ्रायं मुहुरशिशिर | ५ | ३१ |
| निचायिनि लवली | १० | २९ | नीरन्ध्रं पयिषु रजो | ७ | २५ |
| निजह्निरे तस्य हरेषु | १७ | २६ | नीरन्ध्रं परिगमिते | १७ | ६ |
| निजेन नीतं विजितान्य | १४ | ३९ | नीलनौरजनिभेहिम | ९ | १९ |
| नुनोद तस्य स्थलपद्मिनी | ४ | ५ |
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श्लोकानुक्रमणिका
४३९
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| नूनमत्र भवतः शराकृति | १३ | ४५ | पश्चात्क्रिया तूणयुगस्य | १७ | ४२ |
| नृपतिमुनिपरिग्रहंण | १० | ६ | पाणिपल्लवविधूनन | ९ | ५० |
| नृपसुतमभितः | १० | ४४ | पातितोत्तङ्गमहात्म्यैः | १५ | ११ |
| न्यायनिर्णीतसारत्वा | ११ | ३९ | पातुमाहितरतीन्व्यभि | ९ | ५१ |
| प | पार्यवाणाः पशुपते | १५ | ४० | ||
| पतत्सु शस्त्रेण वितत्य | १४ | ४९ | पुरःसरा धामवता | १ | ४३ |
| पतन्ति नास्मिन्विशदाः | ४ | २३ | पुराधिरूढः शयनं | १ | ३८ |
| पातितारिपतजलदाम्न | ६ | २७ | पुरोपनीतं नृप | १ | ३९ |
| पतिं नगानामिव | १७ | ५ | पुंसः पदं मध्यममुत्त | १६ | १९ |
| पयश्च्युतायां समितौ | २ | १५ | पृथग्विधान्यस्त्रविराम | १६ | ३४ |
| पपात पूर्वा जहतो | ४ | १८ | पृथुकदम्बकदम्ब... | ५ | ९ |
| परमास्त्रपरिग्रहोत्सजैः | १३ | २६ | पृथुधाम्नि तत्र परिबोधि | ६ | ४५ |
| परवानयं समिद्धो | ११ | ३३ | पृथूरुपर्यस्तवृहल्लता | १५ | ३४ |
| परस्य भूयान्विवर | १६ | २३ | प्रकृतमनुसार नाभि | १० | ५१ |
| पराहृतध्वस्तशिखे | १६ | ५६ | प्रचलिते चलितं | १८ | १० |
| परिकीर्णमुद्रतभुजस्थ | १२ | ११ | प्रणतिश्रवणान्विहाय | २ | ४४ |
| परिक्षते वक्षसि दन्ति | १६ | ११ | प्रणयिमद्य विधाय | ६ | ४७ |
| परिणामसुखे गरीयसि | २ | ४ | प्रणिधात चित्तमय | ६ | ३९ |
| परिणाहिना तुहिनराशि | १२ | २३ | प्रणिधाय तत्र विधि | ६ | १९ |
| परिभ्रमन्मूर्धजषट्पदा | ४ | १४ | प्रतप्तचामीकरभासुरेण | १६ | ४० |
| परिश्रमह्लोहित | १ | ३४ | प्रतिक्रियायै विधुरः | १७ | ४१ |
| परिमोह्यमानेन | १५ | ३६ | प्रतिघ्नतोभिः कृत | १६ | ४३ |
| परिवीत मंशुभिरदस्त | १२ | १८ | प्रतिदिशमांभगच्छता | १० | २१ |
| परिसरविषयेषु लीढ | ५ | ३८ | प्रतिदिशं प्लवगाधिप | १४ | ६४ |
| परिसुरपतिमनुग्राम | १० | २० | प्रतिबोधजृम्भणविभिन्न | ६ | १२ |
| परिस्फुरन्मीनविवट्टितो | ८ | ४५ | प्रत्यार्द्रीकृततिलकास्तूपार | ७ | १५ |
| परीतनुश्चावजदे | ४ | ११ | प्रत्याह्रतोजाः कृत | १७ | १५ |
| परोऽव जानाति यदज्ञता | १४ | २३ | प्रनृत्तशबवित्रस्त | १५ | २६ |
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४४० | किरातार्जुनोयम्
| स० | श्लो० | स० | श्लो० | ||
|---|---|---|---|---|---|
| प्रपित्सोः किं न ते | ११ | १६ | प्राप्यते यदिह दूर | १८ | २५ |
| प्रबभूव नालमवलोकयितुं | ६ | ६ | प्रियेऽपरा यच्छति | ८ | १५ |
| प्रभवति न तथा परो | १० | ३५ | प्रियेण संप्रथ्य विपक्ष | ८ | ३७ |
| प्रभवः खलु कोष | २ | १२ | प्रियेण सिक्ता चरमं | ८ | ५४ |
| प्रमाष्टुंमयशःपङ्क | ११ | ६७ | प्रियेपु यैः पार्थ विनोप | ३ | ५२ |
| प्रयच्छतोच्चैः कुसुमानि | ८ | १४ | प्रियैर्मनीलं करवारि | ८ | ४९ |
| प्रयुज्य समाचरितं | १४ | ७ | प्रीते पिनाकिना मया | ११ | ८१ |
| प्रलीनभूपालमपि | १ | २३ | प्रेरितः शशधरेण करोधः | ९ | २८ |
| प्रवृत्तेऽथ महाहव | १८ | ८ | प्लुतनालतीसितकपाल | १२ | २४ |
| प्रवालभङ्गारुणपाणि | ८ | २१ | ब | ||
| प्रविकर्षनिनादभिन्न | १३ | १६ | बदरीतपोवननिवास | १२ | ३३ |
| प्रविततशरजालच्छन्न | १४ | ६५ | बद्धकोपकृतोरपि | ९ | ६४ |
| प्रविवेश गामिव | १२ | १० | बभार शून्याकृति | १७ | ३१ |
| प्रवृत्तनक्तंदिव | १६ | ४७ | बलवदपि बलं मिथो | १० | ३७ |
| प्रवृद्धसिन्धूमिचय | १६ | ६० | बलवानपि कोपजन्मनः | २ | १७ |
| प्रशान्तधर्माभिभवः | ८ | २८ | बलशालितया यथा | १३ | १२ |
| प्रश्च्योतन्नदसुरभीणि | ७ | ३५ | बहुधा गतां जगति | ६ | ४२ |
| प्रसक्तदावानल | १६ | २६ | बहु बर्हिचन्द्रकनिभं | ६ | ११ |
| प्रसह्य योऽस्मासु परैः | ३ | ४४ | बहुशः कृतसत्कृतंविधातुं | १३ | १० |
| प्रमादरम्यमोजस्वि | १४ | ३८ | वाणच्छिदस्ते विशिखाः | १७ | २० |
| प्रसादलक्ष्मीं दधतं | ३ | २ | विभ्रान्तनूपुररूत | १२ | ४९ |
| प्रसेदिवांसं न समाप | १७ | २३ | वृहदृहत्कलदावि | १२ | ४२ |
| प्रस्थानश्रमजनितां | ७ | ३१ | भ | ||
| प्रस्थिताभिरधिनाथ | ९ | ३६ | भयङ्करः प्राणभृतां | ११ | १७ |
| प्रहीयते कार्यवशा | १६ | २२ | भयादिवाश्लिष्य झषाहते | ८ | ४६ |
| प्राञ्जलावपि जने | ९ | १० | भर्तुभिः प्रणयमन्त्रम | ९ | ५४ |
| प्राप्तोऽभिमानव्यसनाद | ३ | ७५ | भर्तृरूपसखि निशिप | ९ | ६६ |
| प्राप्यते गुणवतापि | ९ | ५८ | भवतः स्मरतां सदा | १८ | ३८ |
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श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० | श्लोक-प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| भवद्भिरक्षुण्णाराति | १५ | १० | मया मृगान्धन्तुमनेन | १४ | २५ |
| भवन्तमेतर्हि मनस्वि | १ | ३२ | मरुतः शिव्रा नवतृणा | ६ | ३३ |
| भवन्ति ते सभ्यतमा | १४ | ४ | महतां पतिः स्विद् | १२ | १५ |
| भवभीतये हतवृहत्सम | ६ | ४१ | महते फलाय तदवेक्ष्य | ६ | २८ |
| भवादृशेषु प्रमदा | १ | २८ | महत्त्वयोगाय महा | ३ | २३ |
| भव्यो भवन्नपि मुने | ५ | ४९ | मध्यैर्यभस्कन्धनतून | १४ | ४० |
| भिस्त्वेव भाभिः सवितु | १६ | ५१ | महानले भिन्नसिताम्र | १६ | ५७ |
| भुजगराजसितेन | ५ | ४ | महारथानां प्रतिदन्त्य | १६ | १४ |
| भूभर्तुः समविकमादधे | ७ | २७ | महास्त्रदुर्गे शिथिल | १६ | २६ |
| भूयः समापान | १७ | ७ | महिषक्षतागुरुतमाल | १२ | ५० |
| भूरिप्रभावेण रणामि | १७ | २ | महीभृता पक्षवतेह | १६ | १३ |
| भूरेणुना रासनधूसरेण | १६ | ७ | महीभृतां सच्चरितं | १ | २० |
| भृशकुसुमशरैषु | १० | ६१ | महेपुजङ्घवी शत्रो | १५ | ३२ |
| भ्रूविलाससुभगाननु | ९ | ५६ | महौजसो मानधना | १ | १९ |
| म | मा जपन्मदविमूढ | ९ | ७० | ||
| मग्नां द्विषच्छद्मनि | ३ | ३९ | मा गश्चित्रांयकचरः | ३ | ५३ |
| मणिमयूखजयांशुक | ५ | ५ | मानिनीजनविलोचन | ९ | २६ |
| मतिभेदतमस्तिरो | २ | ३३ | मा भूवन्नपथहृतस्तवे | ५ | ५० |
| मतिमान्निनयप्रमाथि | २ | ५२ | माया स्विद्देशा मति | १६ | १८ |
| मथिताम्भसो रथविकीर्ण | १२ | ५१ | मार्गणैश्च तत्र | १३ | ५९ |
| मदमानसमुद्धतं | २ | ४९ | मा विहासिष्ट समरं | १५ | ८ |
| मदसिक्तमुखंर्मुगा | ७ | १८ | माहेन्द्र नगमभितः | ७ | २० |
| मदसुतिश्यामित | १६ | २ | मित्रमिष्टमुपकारि | १३ | ५१ |
| मधुरैरवशानि | २ | ५५ | मुकुलितमतिशय्य | १० | २७ |
| मध्यमोपलनिश्रे लसदंशा | ९ | २ | मुक्तमूललघुरज्जित | ९ | ५ |
| मनसा जप्यैः प्रणतिभिः | ६ | २२ | मुखैरसौ विद्रुमभङ्ग | ४ | ३६ |
| मनःशिलाभञ्जनिभेन | १६ | ४५ | मुञ्चतीशे शराञ्छिष्णो | १५ | ३४ |
| मनोरमं प्रापितमन्तरं | ४ | ७ | मुमितमधुलिहो वितानो | १८ | २० |
| मन्दमस्यत्रिशुलतां | १५ | १३ |
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४४२ किरातार्जुनीयम्
| पाद | स० | श्लो० | पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| मुनयस्ततोऽभिमुख | १२ | २५ | यशोऽधिगन्तुं सुख | ३ | ४० |
| मुनिदनुततयान्विलोम्य | १० | १६ | यष्टुमिच्छसि पितॄन् | १३ | ६५ |
| मुनिमभिमुखतां | १० | ४० | यस्मिन्ननैश्वर्यकृत | ३ | १९ |
| मुनिरहिम निरागसः | १३ | ७ | यः करोति वचोदर्का | १२ | १९ |
| मुनिरूपतोऽनुरूपेण | ११ | २ | यः सर्वपामावरोधा | १८ | ४० |
| मुनिपुदहनातप्ता | १५ | ३० | या गम्याः सत्सहायानां | ११ | २२ |
| मुनेविचित्रैरिविभिः | १७ | १९ | यातस्य ग्रन्थ्यततरंग | ७ | १६ |
| मुनेः शरोघेण तदुग्र | १४ | ५९ | युक्तः प्रमाद्यसि हिता | ११ | २९ |
| मुहुरनुपतता विध्य | १० | ३३ | युक्ताः स्वशक्त्या मुनयः | ८ | २१ |
| मुहुश्चलत्पल्लवलोहिनी | १८ | ५३ | युयुत्सुरिव कवचं | ११ | १५ |
| मूलं दोषस्य हिंसादे | ११ | २० | येनापविद्धसलिलः | ५ | ३० |
| मृगान्धिनिघ्नन्मृगयुः | १४ | ५ | योगं च तं योग्यतमाय | ३ | २६ |
| मृणालिनीनामनुरञ्जितं | ४ | ७२ | योषितः पुलकरोधि | ९ | ४१ |
| मृदितकिसलयः सुराङ्गना | १० | ९ | योषिदुद्धतमनोभव | ९ | ६६ |
| य | र | ||||
| यच्छति प्रतिमुखं | ९ | १० | रक्षोभिः सुरमनुजैः | १८ | ३६ |
| यथा निजे वर्त्मनि | १३ | ५७ | रजनीषु राजतनयस्य | १३ | १२ |
| ययाप्रतिज्ञं द्विषतां | ११ | ७४ | रञ्जिता नु विविधा | ९ | १५ |
| यथायथं ताः सहिता | ८ | २ | रणाय जैत्रः प्रदिशन्निव | १४ | २८ |
| यथास्वमार्गंसित | १४ | ४३ | रथांगसंकीडितमश्व | १६ | ८ |
| यदवोचत वीक्ष्य | २ | २ | रम्या नवद्युतिरुपैति | ५ | ३७ |
| यदात्थ कामं भवता | १४ | १८ | रयेण सा संनिदधे | १७ | ५० |
| यदा विगृह्णाति हतं | १६ | २४ | रहितरत्नचयानशिलो | ५ | १० |
| यदि प्रमाणीकृतमार्य | १४ | १९ | रागकान्तनयनेषु | ९ | ६३ |
| यदि मनसि शमः | १० | ५५ | राजद्भिः पथि मरुता | ७ | ६ |
| यमनियमकृशीकृत | १० | १० | रात्रिरागमलिनानि | ९ | १६ |
| यथा समासादित | ३ | २२ | रामानामवजितमाल्य | ७ | ७ |
| यशसेव तिरोधधन्मुहु | ३ | ५८ | रिक्ते सविभ्रम्भमथा | १७ | ३६ |
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श्लोकानुक्रमणिका
४४३
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| रुचिकरमपि नार्थं | १० | ६२ | वाससां शिथिलतामुर | ९ | ६५ |
| रुचिरपल्लवपुष्पलता | ५ | १९ | विकचवारिरुह दधतं | ५ | १३ |
| रुचिराकृतिः कनकसानु | ६ | १ | विकसितकुसुमाधारं | १० | ३२ |
| रुजन्महेतुम्बहुधा | १५ | ५१ | विकामुंकः कर्ममु शोच | १३ | ५३ |
| रून्धतो नयनवायव | ९ | ६७ | विकाशमोदूजंगनांण | १५ | ५२ |
| ल | विकोशनिधौततनो | १७ | ४९ | ||
| लघ्वसितया निशां | २ | ५३ | विगणय्य कारकमनेक | ६ | ३७ |
| लभ्यमेकप्रकृतेन | १३ | ५२ | विगाढमात्रे रमणीभि | ८ | ३१ |
| लब्धा चरित्रे तव | ३ | १७ | विचकर्ष च संहितेषु | १३ | १८ |
| लिलिखुस्तेऽथ शरकाल | १६ | ५४ | विचित्रया चित्रपतेव | १६ | ३ |
| लेखया विमलदृग् | ९ | २२ | विच्छिन्नाभ्रविलायं | ११ | ७९ |
| लोकं विधात्रा विहितस्य | ३ | ४१ | विजहीहि रणोत्साहं | ११ | ३१ |
| लोचनाञ्चलकृता | ९ | ६० | विजिगीषते यदि जगन्ति | १२ | ३० |
| लोलदृष्टि वदन | ९ | ५७ | विजित्य यः प्राज्य | १ | ३५ |
| व | विततशीकरराशिभिः | ५ | १५ | ||
| वदनेन पुष्पितलतान्तः | १२ | ४१ | वितन्वतांस्तस्य शरा | १७ | २० |
| वनान्तशय्याऽठिनौ | १ | ३६ | विदिताः प्रविश्य विहिता | ६ | ३० |
| वनाश्रयाः कस्य मृगाः | १४ | १३ | विदूरपातेन निदामुपेयुः | ८ | १० |
| वनेऽवने वनसदां | १५ | १० | विधाय रक्षाम्यरतः | १ | १२ |
| वपुरिन्द्रगोपतपनेषु | १२ | ३ | विधाय विध्वंसमनात्मन | ३ | १६ |
| वपुषा परमेण भूधरा | १३ | १ | विधिसमयनिगोगा | १ | ४६ |
| वयं क्व वर्णाश्रमरक्षणो | १४ | २२ | विधुरं किमतः परं | २ | ७ |
| वरं कृतघ्नस्तगुणा | १५ | १५ | विधूतकेशाः परि | ८ | ३३ |
| वरोधभिवारणहस्त | ८ | २२ | विधूनयन्ती गहनानि | १४ | ४७ |
| वसूनि वाञ्छन्न वशी | १ | १३ | विनम्रशालिप्रसवोव | ४ | २ |
| वंशलक्ष्मीमनुद्घृत्य | ११ | ६९ | विनयं गुणा इव विवेक | १२ | १८ |
| वंशोचितत्वादभिमान | १७ | ४ | विनिर्यतीनां गुरुखेद | ८ | २६ |
| वाजिभूमिरिभराज | १३ | ५५ | विपक्षचित्तोन्मथना | ८ | ३४ |
पृष्ठ 702स्थायी लिंक
४४४
किरातार्जुनीयम्
| प्रतीक | स० | श्लो० | प्रतीक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| विपत्रलेखा निरक्तका | ८ | ४० | विहस्य पाणौ विधृते | ८ | ५० |
| विपदेति तावदवसाद | १८ | २३ | विहाय वाञ्छामुदिते | ४ | २५ |
| विपदोऽभिभवन्त्य | २ | १४ | विहाय शान्तिं नृप | १ | ४२ |
| विपाण्डुभिर्म्लानतया | ४ | २४ | विहारभूमेरभिघोष | ४ | ३० |
| विपाण्डु संध्यानमिव | ४ | २८ | विहितां प्रियया | २ | १ |
| विफलीकृतयत्नस्य | १३ | ४६ | वीक्ष्य रत्नचयके | ९ | ५२ |
| विद्रावितस्य ध्वनिना | १७ | ४६ | वीक्ष्य रन्तुमनसः | ९ | १ |
| विमिश्रपर्यन्तगभीर | ८ | ३० | वीतजन्मजरसं परं | ५ | २२ |
| विमिश्रपातिताश्वीय | १५ | २४ | वीतप्रभावतनुरुप्य | १६ | ६४ |
| विभेदमन्तः पदवी | १७ | २७ | वीतौजसः सन्निधि | ३ | ४९ |
| विमुक्तमाशंसित | १४ | ५१ | वीर्यप्रदानेषु कृता | ३ | ५३ |
| विमुच्यमानैरपि तस्य | ४ | १२ | वेत्रशाककुजे | १५ | १८ |
| वियद्वि वेगपरिप्लुत | १८ | १२ | व्यक्तोदितस्मितमयूख | २ | ५९ |
| विरचय्य काननविभाग | १२ | ४४ | व्यथितमपि भृशं मनो | १० | २२ |
| विरोधि सिद्धेरिति | १४ | ८ | व्यथितसिन्धुमनीरशनैः | ५ | ११ |
| विलङ्घ्य पत्रिणां | १५ | ४४ | व्यधत्त यस्मिन्पुरमुच्च | ५ | ३५ |
| विलम्बमानाकुलकेश | ८ | १८ | व्यपोहितुं लोचनतो | ८ | १९ |
| विवरेऽपि नैवमनिगूढ | १२ | ३७ | व्यानशे शशधरेण | ९ | १७ |
| विवस्वदंशुसंश्लेष | १५ | ९ | व्याहृत्य महतां पत्या | ११ | ६७ |
| विविक्तवर्णभरणा | १४ | ३ | व्रज जय रिपुलोक | १८ | ८८ |
| विविक्तेऽस्मिन्मगे | ११ | ३६ | व्रजति शुचि पदं त्वयि | १८ | २६ |
| विशङ्कमानो भवतः | १ | ७ | व्रजतोऽस्य बृहत्पतन | १३ | २१ |
| विशदभ्रूयुगच्छन्त | ११ | ४ | व्रजन्ति ते मूढधियः | १ | ३० |
| विषमोऽपि विगाह्यते | २ | ३ | व्रजाजिरेष्वम्बुदनाद | ४ | १६ |
| विस्तारिताश्ममणि | ८ | २३ | व्रणमुखच्युतशोणित | १८ | ४ |
| विस्फारिताङ्गस्य ततो | १७ | २४ | व्रीडानतैरासजनोप | ३ | ४२ |
| विस्मयः क इव वा | १३ | ४० | श | ||
| विशिखतः सपदि तेन | १८ | १३ | शक्तिरर्थपतिषु स्वयं | १३ | १६ |
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श्लोकानुक्रमणिका
४४५
| श्लोक | स० | श्लो० | श्लोक | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| शक्तिवैकल्यनम्रस्य | ११ | ५९ | श्रद्धेया विप्रलम्भारः | ११ | ६५ |
| शङ्किताय कृतबाष्प | ९ | ४६ | श्रियः कुरुणामधिपस्य | १ | १ |
| शतशो विशिखानवयते | १५ | ४८ | श्रियं विकल्पत्यपहस्त्य | ३ | ७ |
| शमयन्घृतेन्द्रियशमैक | ६ | २० | श्रिया हसद्भिः कमलानि | ८ | ४४ |
| शरणं भवन्तमति | १८ | २२ | श्रीमद्भिनियमितकन्धरा | ७ | ३७ |
| शरदम्बुधरच्छाया | ११ | १२ | श्रीमद्भिः प्ररयगजैः | ७ | १ |
| शरवृष्टि विषूयोर्वी | १५ | ४१ | श्रीमल्लताभवनमोषधयः | ५ | २८ |
| शरानवद्यन्ननवद्य | १७ | ५६ | श्रुतमप्यधिगम्य | २ | ४१ |
| शशधर इव लोचनाभि | १० | ११ | श्रुतिसुखमुपवीणितं | १० | ३८ |
| शाम्भोर्धनुर्मण्डलतः | १५ | ४९ | श्रेयसों तव सम्प्राप्ता | ११ | ११ |
| शाखावसक्तकमनीय | ७ | ४० | श्रेयसोऽप्यस्य ते तात | ११ | ४४ |
| शान्तता विनययोगि | १३ | ३७ | श्लिष्यतः प्रियवधूरूप | ९ | ६७ |
| शारतां गमितया शशि | ९ | २९ | श्वसनचलितपल्लवा | १० | ३४ |
| शिरसा हरिमणिप्रभः | ६ | २३ | श्वस्त्वया मुखसंवित्तिः | १० | ३४ |
| शिलाघनेनीकसदा | ८ | ३२ | स | ||
| शिवध्वजिन्यः प्रतियोध | १४ | ५८ | स किंसखा साधु न | १ | ५ |
| शिवप्रणुन्नेन शिली | १७ | ५८ | सक्ति जवानपनयत्य | ५ | ४६ |
| शिवभुजाहूतिभिन्न | १८ | ३ | स क्षत्रियस्त्राणसहः | ३ | ४८ |
| शिवमौपयिकं गरी | २ | ३५ | स खण्डनं प्राप्य पराद | १७ | ६० |
| शीधुपानविधुरासु | ९ | ४२ | सखा स युक्ताः कथितः | १४ | २१ |
| शीधुपानविधुरेष | ९ | ७३ | सखि दयितमिहानयेति | १० | ४७ |
| शुष्वितेर्मूलनिचयै | ५ | ४२ | सखीजनं प्रेम गुरुकृता | ८ | ११ |
| शुचि भूषयति श्रुतं | २ | ३२ | सखीनिव प्रीतियुजो | १ | १० |
| शुचिरप्सु विद्रुमलता | ६ | १३ | स गतः क्षितिमूष्ण | १३ | ३१ |
| शुचिवल्कवीततनुरम्य | ६ | ६१ | सचकितमिव विस्मया | १० | ७ |
| शुभाननाः साम्बुरुहेषु | ८ | ४२ | स जगाम विस्मयमुदीक्ष्य | ६ | १५ |
| शून्यामाकीर्णतामेति | ११ | २७ | सजलजलधरं नभो | १० | १९ |
| श्योतन्मयूखेऽपि हिम | ३ | ८ | सजनोऽसि विजहीहि | १३ | ६६ |
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४४६ | किरातार्जुनीयम्
| पद / पाद | स० | श्लो० | पद / पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| सज्यं धनुर्वहति यो | १३ | ७१ | समुज्झिता यावदराति | १४ | ५६ |
| स ततार संकटवतो | ६ | १६ | समुन्नतः काशदुकूल | ८ | ९ |
| स तदोजसा विजित | १२ | २९ | समुल्लसत्प्रासमहोभि | १६ | ४ |
| स तमालनिभे रिपो | १३ | २४ | स यौवराज्ये नवयौवन | १ | २२ |
| स तमाससाद घननील | १२ | ५३ | सरजसमपहाय | १० | २६ |
| सदृशमतनुमाकृतेः | १० | १३ | सरभसमवलम्ब्य | १० | ५४ |
| सद्मनां विरचनाहित | ९ | ३४ | सरोजपत्रे नु विलीन | ८ | ३५ |
| सद्भावितेवाभिनिविष्ट | १७ | ११ | सललितचलित | १० | ५२ |
| स धनुर्महेषुधि | १२ | २७ | सलोलयासक्तलता | ८ | १६ |
| स ध्वानं निपतितनिर्झरासु | ७ | २२ | सलेनमुल्लिङ्गितशात्रवे | १४ | २ |
| सनादक्वनितं नितम्ब | ५ | २७ | स वशस्यावदातस्य | ११ | ७५ |
| सपदि प्रियरूपमंवरखः | १३ | २५ | सविनयमपरानिसृत्य | १० | ५७ |
| सपदि हरिसखैवधू | ११ | १८ | सवृषध्वजसायकावभिन्नं | १३ | २८ |
| स पिङ्गलः श्रीमान् | १८ | ४५ | सव्यलीकमवधोरित | ९ | ४५ |
| स विशङ्कजटावलिः | १५ | ४७ | सव्यासव्यध्वनितो | १७ | २५ |
| स पुमानर्थवज्जन्मा | ११ | ६२ | सब्रीडमन्दैरिव | ३ | ४६ |
| स प्रच्छदनयाम्बुदनादि | १७ | १० | ससस्वरतिदे नित्यं | १५ | २७ |
| स प्रयुज्य तनये | १३ | ३६ | स समुद्धरता विचित्त्य | १३ | ३४ |
| स बभार रणापेता | १५ | ३३ | स सम्प्रधायैवमहार्य | १६ | २५ |
| सविभति भीषण | ६ | ३२ | स सायकान्साध्वस | १७ | २१ |
| स भवस्य भवक्षयैक | १३ | १९ | स सासिः सासुसूः | १५ | ५ |
| स भोगिसंघः शम | १६ | ४८ | ससुरचापमनेकमणि | ५ | १२ |
| समदशिखिरुतानि | १० | २५ | सहशरधि निजं तथा | १८ | १६ |
| स मन्थरावलित | ४ | १७ | सहसा विदधीत | २ | ३० |
| समवृत्तिरुपैति | २ | १८ | सहसोपगतः स | २ | ५६ |
| समस्य सम्पादयता | १४ | ६ | संक्रान्तचन्दनरसा | ८ | ५७ |
| समानकान्तीनि तुषार | ८ | २५ | सन्ततं निशमयन्त | १३ | ४७ |
| समुच्छ्वसत्पङ्कजकोश | ८ | २४ | सन्निबद्धमपहर्तुं | १८ | ३० |
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श्लोकानुक्रमणिका
| प्रथम पाद | स० | श्लो० | प्रथम पाद | स० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|
| सम्पश्यतमिति | १९ | ५३ | सुरकृत्यमेतदवगम्य | १२ | ३६ |
| सम्प्रति लब्धजन्म | ५ | ४३ | सुरसरिति परं तपो | १० | १२ |
| सम्प्रीयमाणोऽनुबभूव | १७ | १३ | सुलभैः सदा नयवता | ५ | २० |
| सम्भिन्नामविरलपातिभिः | ७ | २३ | सृजन्तमाजविषु | ३ | २० |
| सम्भिन्नैरिव तुरगावगाह | ७ | ११ | सुहृदः सहजा | २ | ४५ |
| सम्भोगजमगहनामयो | ७ | २६ | सेतुत्वं दधति पयोमुचां | ७ | १९ |
| सम्मूर्च्छतां रजतभित्ति | ५ | ४१ | सोढवान्नो दशामन्त्यां | ११ | ५३ |
| संरम्भवेगोज्झित | १७ | ४९ | सोढावगीतप्रयमा | १३ | २८ |
| संवाता मुहुरनिलेन | ७ | १४ | सोत्कण्ठेरमरगणैः | ७ | २ |
| संविधातुमभिषेक | ९ | ३२ | स्तुवन्ति गुर्वीमभिधेय | १४ | ५ |
| संसिद्धावितिकरणोय | ७ | १५ | स्थितमुन्नते तुहिन | १२ | २१ |
| संसेवन्ते दानशीला | १८ | २४ | स्थितं विशुद्धे नभसीव | १७ | ४८ |
| संस्कारवत्त्वादप्रयत्सु | १७ | ६ | स्थित्यतिक्रान्तिभीरूणि | ११ | ५४ |
| साचि लोचनयुगं | ९ | ४४ | स्नपितनवलतातह | ५ | ४४ |
| सादृश्यं गतमपनिद्र | ५ | २६ | स्पृहणीयगुणेर्महा | २ | ३४ |
| सादृश्यं दधति गभीर | ७ | ३१ | स्फुटता न पदैरपा | २ | २७ |
| साफल्यमश्नुते रिपु | १६ | ४९ | स्फुःपौरुषमापपात | १३ | ३२ |
| सामोदं कुसुमतरो | ७ | २८ | स्फुटबद्धस्तटोन्नति | १३ | २ |
| साम्यं गतेनाशनिना | १७ | ५१ | स्फुरतिषङ्गमोर्वीकं | १५ | ०९ |
| सावलेपमुपलिप्सिते | १३ | ५६ | स्मर्यते तनुभृतां सनातनं | १३ | ४२ |
| सितच्छदानांमपदिश्य | ४ | ३० | स्यन्दना नो चतुरगाः | ०५ | १६ |
| सितवाजिने निजगाद् | ६ | ९ | स्वकेतुभिः पाण्डुर | १६ | ५८ |
| सिन्दूरैः कृतचयः | ७ | ८ | स्वगोचरे सत्यपि चित्त | ८ | १३ |
| सिषिचुरवनिम्बुवाहाः | १८ | १७ | स्वधर्ममनुरुन्धन्ते | ११ | ७८ |
| सुकुमारमेकमणु मर्म | ६ | ४० | स्वयं संराध्यैवं शतमख | १० | ६३ |
| सुखेन लभ्या दधतः | १ | १७ | स्वदितः स्वयमथैधित | ९ | ५५ |
| सुगेषु दुर्गेषु च तुल्य | १४ | ३२ | ह | ||
| सुता न यूयं किमु | ३ | ५३ | हताहतेत्युद्धतभीम | १६ | ५ |
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४४८ किराताजुंनीयम्
| स० | श्लो० | स० | श्लो० | ||
|---|---|---|---|---|---|
| हरपृथासुतयो | १८ | २ | हृतोत्तरीयां प्रसभं | ११ | ४१ |
| हरसैनिकाः प्रतिभये | १२ | ४८ | ह्रदाम्भसि व्यस्तवधू | ८ | ४३ |
| हरिन्मणीयाममुदग्र | १४ | ४१ | ह्रीतया गलितनीवि | ९ | ४८ |
| हंसा बुहन्तः सुरसद्म | १८ | १९ | ह्रेपयन्नहिमतेजसं | १३ | १५ |
| हता गुणैरस्य भयेन | १४ | ६१ |
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