भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
आख्यान, सुशीलको हिमालयके 'धर्मपद' नामक वनमें महापाशुपत श्वेताश्वतर मुनिके दर्शन तथा उनसे पाशुपत-व्रतका ग्रहण, दक्षके पूर्वजन्मका वृत्तान्त तथा पुनः दक्ष प्रजापतिके रूपमें आविर्भावकी कथा, दक्षद्वारा शंकरका अपमान, सतीद्वारा देह-त्याग तथा शंकरका दक्षको शाप.................................९१वर प्राप्त करना, अदितिके गर्भमें विष्णुका प्रवेश, विष्णुका वामनरूपमें आविर्भाव, बलिके यज्ञमें वामनका प्रवेश तथा तीन पग भूमिकी याचना, तीसरे पगसे नापते समय ब्रह्माण्ड-भेदन, गङ्गाकी उत्पत्ति तथा भक्तिका वर प्राप्तकर बलि आदिका पातालमें प्रवेश .....................................१२२
१४-हरिद्वारमें दक्षद्वारा यज्ञका आयोजन, यज्ञमें शंकरका भाग न देखकर महर्षि दधीचिद्वारा दक्षकी भर्त्सना तथा यज्ञमें भाग लेनेवाले ब्राह्मणोंको शाप, देवी पार्वतीके कहनेपर शंकरद्वारा रुद्रों, भद्रकाली तथा वीरभद्रको प्रकट करना, वीरभद्रादिद्वारा दक्षके यज्ञका विध्वंस, शंकर-पार्वतीका यज्ञस्थलमें प्राकट्य, भयभीत दक्षद्वारा शंकर तथा पार्वतीकी स्तुति और वर प्राप्त करना, ब्रह्माद्वारा दक्षको उपदेश और शिव-विष्णुके एकत्वका प्रतिपादन तथा दक्षद्वारा शिवकी शरण ग्रहण करना.................................९६१७-बलिपुत्र बाणासुरका वृत्तान्त, दक्ष प्रजापतिकी दनु, सुरसा आदि कन्याओंकी संतानोंका वर्णन ...............................................१२८
१८-महर्षि कश्यप तथा पुलस्त्य आदि ऋषियोंके वंशका वर्णन, रावण तथा कुम्भकर्ण आदिकी उत्पत्ति, वसिष्ठके वंश-वर्णनमें व्यास, शुकदेव आदिकी उत्पत्तिकी कथा, भगवान् शंकरका ही शुकदेवके रूपमें आविर्भूत होना.......१२९
१९-सूर्यवंश-वर्णनमें वैवस्वत मनुकी संतानोंका वर्णन, युवानाश्वको गौतमका उपदेश, महातपस्वी राजा वसुमनाकी कथा, वसुमनाके अश्वमेध-यज्ञमें ऋषियों तथा देवताओंका आगमन, ऋषियोंद्वारा तपस्याकी आज्ञा प्राप्तकर वसुमनाका हिमालयमें जाकर तप करना और अन्तमें उसे शिवपदकी प्राप्ति.........१३१
१५-दक्ष-कन्याओंकी संतति, नृसिंहावतार, हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष-वधका वर्णन, पृथ्वीका उद्धार, प्रह्लाद-चरित, गौतमद्वारा दारुवननिवासी मुनियोंको शाप, अन्धकके साथ महादेवका युद्ध एवं महादेवद्वारा अपने स्वरूपका उपदेश, अन्धकद्वारा महादेवकी स्तुति तथा महादेव (शंकर)-द्वारा अन्धकको गाणपत्य-पदकी प्राप्ति, अन्धकद्वारा देवीकी स्तुति और देवीद्वारा अन्धकको पुत्र-रूपमें ग्रहण करना तथा विष्णुद्वारा उत्पन्न माताओंसे अपनी तीनों मूर्तियोंका प्रतिपादन ....................................१०४२०-इक्ष्वाकु-वंश-वर्णनके प्रसंगमें श्रीराम-कथाका प्रतिपादन, श्रीरामद्वारा सेतु-बन्धन और रामेश्वर-लिंगकी स्थापना, शंकर-पार्वतीका प्रकट होकर रामेश्वर-लिंगके माहात्म्यको बतलाना, श्रीरामको लव-कुश पुत्रोंकी प्राप्ति तथा इक्ष्वाकु-वंशके अन्तिम राजाओंका वंश-वर्णन ..............................................१३७
१६-सनत्कुमारद्वारा आत्मज्ञान प्राप्तकर प्रह्लाद-पुत्र विरोचनका योगमें संलग्न होना, विरोचन-पुत्र बलिद्वारा देवताओंको पराजित करना, देवमाता अदितिका दुःखी होना तथा विष्णुसे प्रार्थनाकर पुत्ररूपमें उनके उत्पन्न होनेका२१-चन्द्रवंशके राजाओंका वृत्तान्त, यदुवंश-वर्णनमें कार्तवीर्यार्जुनके पाँच पुत्रोंका आख्यान, परम विष्णुभक्त राजा जयध्वजकी कथा, विदेह दानवका पराक्रम तथा जयध्वजद्वारा विष्णुके अनुग्रहसे उसका वध, विश्वामित्रद्वारा विष्णुकी आराधनाका जयध्वजको उपदेश करना और

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
जयध्वजको विष्णुका दर्शन .................१४१पुत्रकी प्राप्ति, कंसादिका वध, भृगु आदि महर्षियोंका द्वारकामें आना, भृगु आदि मुनियोंसे श्रीकृष्णद्वारा स्वधामगमनकी बात बताना, शिवसे द्वेष करनेवालोंको नरककी प्राप्तिका वर्णन तथा शिवकी महिमा बताना, नारायणका अपने कुलका संहारकर स्वधामगमन तथा वंश-वर्णनका उपसंहार........................१७२
२२-जयध्वजके वंश-वर्णनमें राजा दुर्जयका आख्यान, महामुनि कण्वद्वारा दुर्जयको वाराणसीके विश्वेश्वर-लिंगका माहात्म्य बतलाना, दुर्जयका वाराणसी जाकर पाप-मुक्त होना तथा सहस्रजित्-वंशका वर्णन.१४७२७-व्यासदेवद्वारा अर्जुनको सत्ययुगादि चारों युगोंके धर्मोंका उपदेश, व्यासद्वारा एक वेद-संहिताका चतुर्धा विभाजन, चारों युगोंमें चतुष्पाद धर्मकी विभिन्न स्थितिका निदर्शन तथा कलियुगमें धर्मके ह्रासका प्रतिपादन .................१७४
२३-यदुवंश-वर्णनमें क्रोष्टुवंशी राजाओंका वृत्तान्त, राजा नवरथकी कथा, सात्त्वतवंश-वर्णनमें अक्रूरकी उत्पत्ति, राजा आनकदुन्दुभिका आख्यान, कंस एवं वसुदेव-देवकीकी उत्पत्ति, वसुदेवका वंश-वर्णन, देवकीके अन्य पुत्रोंकी उत्पत्ति, रोहिणीसे संकर्षण-बलराम तथा देवकीसे श्रीकृष्णका आविर्भाव, वासुदेव कृष्णका वंश-वर्णन ..................१५०२८-कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें शिवपूजनकी विशेष महिमाका ख्यापन, व्यासकृत शिवस्तुति, व्यासप्रेरित अर्जुनका शिवपुरीमें जाना और व्यासद्वारा शिवभक्त अर्जुनकी महिमा ................................१७८
२४-पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या करने-हेतु भगवान् श्रीकृष्णका महामुनि उपमन्युके आश्रममें जाना, महामुनि उपमन्युद्वारा उन्हें पाशुपत-योग प्रदान करना, तपस्यामें निरत कृष्णको शिव-पार्वतीका दर्शन और श्रीकृष्णद्वारा उनकी स्तुति करना, शिवद्वारा पुत्रप्राप्तिका वर देना तथा माता पार्वतीद्वारा अनेक वर देना और शिवके साथ श्रीकृष्णका कैलास-गमन ...................................१५६२९-व्यासजीका वाराणसी-गमन, व्याससे जैमिनि आदि ऋषियोंका धर्मसम्बन्धी प्रश्न, व्यासका उन्हें शिव-पार्वती-संवाद बताना, अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य, वाराणसी-सेवनका विशेष फल ...................................१८४
२५-श्रीकृष्णका कैलास पर्वतपर विहार करना, श्रीकृष्णको द्वारका बुलानेके लिये गरुडका कैलासपर जाना, श्रीकृष्णका द्वारका-आगमन, द्वारकामें श्रीकृष्णका स्वागत तथा उनका दर्शन करनेके लिये देवताओं तथा मार्कण्डेय आदि मुनियोंका आना, कृष्णके द्वारा महर्षि मार्कण्डेयको शिव-तत्त्व तथा लिङ्ग-तत्त्वका माहात्म्य बतलाना तथा स्वयं शिवका पूजन करना, ब्रह्मा-विष्णुद्वारा शिवके महालिङ्गका दर्शन तथा लिङ्गस्तुति, लिङ्गार्चनका प्रवर्तन.........................१६४३०-वाराणसीके ओंकारेश्वर और कृत्तिवासेश्वर लिङ्गोंका माहात्म्य, शंकरके कृत्तिवासा नाम पड़नेका वृत्तान्त .............................१९०
२६-श्रीकृष्णको महेश्वरकी कृपासे साम्ब नामक३१-वाराणसीके कपर्दीश्वर लिङ्गका माहात्म्य, पिशाचमोचन-कुण्डमें स्नान करनेकी महिमा, वहाँ स्नान करनेसे पिशाचयोनिसे मुक्ति प्राप्त करनेका आख्यान, शंकुकर्णकी कथा तथा शंकुकर्णकृत ब्रह्मपार-स्तव ...........१९२
३२-व्यासजीद्वारा वाराणसीके मध्यमेश्वर महादेव तथा मन्दाकिनीकी महिमाका वर्णन.......१९७
३३-वाराणसी-माहात्म्यके प्रसंगमें व्यासजीका शिष्योंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें गमन, ब्रह्मतीर्थका आख्यान, व्यासजीद्वारा विश्वेश्वर

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
लिङ्गका पूजन तथा वहाँ रहते हुए शिवाराधना, एक दिन भिक्षा न मिलनेपर क्रोधाविष्ट व्यासजीका वाराणसीके निवासियोंको शाप देनेके लिये उद्यत होना, उसी समय देवी पार्वतीका प्रकट होना, देवीका व्यासको वाराणसी त्यागनेकी आज्ञा, पुनः स्तुतिसे प्रसन्न देवीके द्वारा चतुर्दशी तथा अष्टमीको वहाँ (वाराणसीमें) रहनेकी अनुमति देना१९९नाड़ियोंका वर्णन तथा उनका कार्य, बारह महीनोंके बारह सूर्योंके नाम तथा छः ऋतुओंमें उनका वर्ण, आठ ग्रहोंका वर्णन, सोमके रथका वर्णन, देवोंद्वारा चन्द्रकलाओंका पान करना, पितरोंद्वारा अमावस्याको चन्द्रमाकी कलाका पान, बुध आदि ग्रहोंके रथका वर्णन ...................................२२१
३४-प्रयागका माहात्म्य, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवाद, प्रयागमें संगम-स्नानका फल .............२०२४२-महः आदि सात लोकों तथा सात पातालोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन, वैष्णवी तथा शाम्भवी शक्तियोंका वर्णन ............२२४
३५-प्रयाग-माहात्म्य, प्रयागके विभिन्न तीर्थोंकी महिमा, त्रिपथगा गङ्गाका माहात्म्य, गङ्गास्नानका फल ............................२०६४३-सात महाद्वीपों और सात महासागरोंका परिमाण, जम्बूद्वीप तथा मेरुपर्वतकी स्थिति, भारत तथा किंपुरुष आदि वर्षोंका वर्णन, वर्षपर्वतोंकी स्थिति, जम्बूद्वीपके नाम पड़नेका कारण, जम्बूद्वीपके नदी एवं पर्वतोंका और वहाँके निवासियोंका वर्णन ............................२२६
३६-प्रयाग-माहात्म्य, माघमासमें संगमस्नानका फल, त्रिमाघीकी महिमा, प्रयागमें प्राण-त्याग करनेका फल ............................२०९४४-ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र, अग्नि, वरुण आदि देवताओंकी पुरियोंका तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, गङ्गाकी चार धाराओं और आठ मर्यादापर्वतोंका वर्णन ...........................२२९
३७-प्रयाग-माहात्म्य, यमुनाकी महिमा, यमुनाके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन, गङ्गामें सभी तीर्थोंकी स्थिति, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादकी समाप्ति................................२१०४५-केतुमाल, भद्राश्व, रम्यकवर्ष तथा वहाँके निवासियोंका वर्णन, हरिवर्षमें स्थित विष्णुके विमानका वर्णन, जम्बूद्वीपके वर्णनमें भारत-वर्षके कुलपर्वतों, महानदियों, जनपदों और वहाँके निवासियोंका वर्णन, भारतवर्षमें चार युगोंकी स्थितिका प्रतिपादन ................२३२
३८-भुवनकोश-वर्णनमें राजा प्रियव्रतके वंशका वर्णन, प्रियव्रतके पुत्र राजा अग्नीध्रके वंशका वर्णन, जम्बू आदि सात द्वीपोंका तथा वर्षोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके नौ वर्षोंमें राजा अग्नीध्रके नाभि, किंपुरुष आदि नौ पुत्रोंका आधिपत्य....२१२४६-विभिन्न पर्वतोंपर स्थित देवताओंके पुरोंका वर्णन तथा वहाँके निवासियों, नदियों, सरोवरों और भवनोंका वर्णन, जम्बूद्वीपके वर्णनका उपसंहार ........................................२३५
३९-‘भू’ आदि सात लोकोंका वर्णन, ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिका वर्णन तथा उनका परिमाप, सूर्यरथका वर्णन, पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित इन्द्रादि देवोंकी अमरावती आदि पुरियोंका नाम-निर्देश, सूर्यकी महिमा.....२१५४७-प्लक्ष आदि महाद्वीपों, वहाँके पर्वतों, नदियों तथा निवासियोंका वर्णन, श्वेतद्वीपमें स्थित नारायणपुरका वर्णन, वहाँ वैकुण्ठमें रहनेवाले लक्ष्मीपति शेषशायी नारायणकी महिमाका ख्यापन ............................................२४०
४०-सूर्य-रथ तथा द्वादश आदित्योंके नाम, सूर्य-रथके अधिष्ठातृ देवता आदिका वर्णन, सूर्यकी महिमा ...................................२१९
४१-सूर्यकी प्रधान सात रश्मियोंके नाम, इनके द्वारा ग्रहोंका आप्यायन, सूर्यकी अन्य हजारों

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
४८-पुष्करद्वीपकी स्थिति तथा विस्तारका वर्णन, संक्षेपमें अव्यक्तसे सृष्टिका प्रतिपादन ......२४५भगवत्ताका और इस ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्तिका निरूपण करना .....................................२७४
४९-स्वारोचिषसे वैवस्वत मन्वन्तरतकके देवता, सप्तर्षि, इन्द्र आदिका वर्णन, नारायणद्वारा ही विभिन्न मन्वन्तरोंमें सृष्टि आदिका प्रतिपादन, भगवान् विष्णुकी चार मूर्तियोंका विवेचन, विष्णुका माहात्म्य .....................२४७-ईश्वर (शंकर)-द्वारा अपनी विभूतियोंका वर्णन तथा प्रकृति, महत् आदि चौबीस तत्त्वों, तीन गुणों एवं पशु, पाश और पशुपति आदिका विवेचन ....................२७८
५०-अट्ठाईस व्यासोंका वर्णन, अट्ठाईसवें कृष्णद्वैपायन-द्वारा वेदसंहिताका विभाजन तथा पुराणेतिहासकी रचना, वेदकी शाखाओंका विस्तार तथा विष्णुके माहात्म्यका कथन ..............................२५०-महेश्वरका अद्वितीय परमेश्वरके रूपमें निरूपण, सांख्य-सिद्धान्तसे तत्त्वोंका सृष्टिक्रम, महेश्वरके छः अङ्ग, महेश्वरके स्वरूपके ज्ञानसे परमपदकी प्राप्ति .......................२८०
५१-कलियुगमें महादेवके अवतारों तथा उनके शिष्योंका वर्णन, भविष्यमें होनेवाले सात मन्वन्तरोंका नाम-परिगणन, कूर्मपुराणके पूर्वविभागका उपसंहार ........................२५३-महादेवके विश्वरूपत्वका वर्णन तथा ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञानका प्रतिपादन .....................२८२
( उपविभाग )१०-ईश्वरद्वारा परम तत्त्व तथा परम ज्ञानके स्वरूपका निरूपण और उसकी प्राप्तिके साधनका वर्णन ...................................२८४
-ईश्वर (शिव) तथा ऋषियोंके संवादमें ईश्वरगीताका उपक्रम...............................२५७११-योगकी महिमा, अष्टाङ्गयोग, यम, नियम आदि योगसाधनोंका लक्षण, प्राणायामका विशेष प्रतिपादन, ध्यानके विविध प्रकार, पाशुपत-योगका वर्णन, वाराणसीमें प्राण-त्यागकी महिमा, शिव-आराधनकी विधि, शिव और विष्णुके अभेदका प्रतिपादन, शिवज्ञान-योगकी परम्पराका वर्णन, ईश्वर-गीताकी फलश्रुति तथा उपसंहार ...........२८६
-आत्मतत्त्वके स्वरूपका निरूपण, सांख्य एवं योगके ज्ञानका अभेद, आत्मसाक्षात्कारके साधनोंका वर्णन...................................२६०१२-ब्रह्मचारीका धर्म, यज्ञोपवीत आदिके सम्बन्धमें विविध विवरण, अभिवादनकी विधि, माता-पिता एवं गुरुकी महिमा, ब्रह्मचारीके सदाचारका वर्णन ................................२९८
-अव्यक्त शिवतत्त्वसे सृष्टिका कथन, परमात्माके स्वरूपका वर्णन तथा प्रधान, पुरुष एवं महदादि तत्त्वोंसे सृष्टिका क्रम-वर्णन, शिवस्वरूपका निरूपण.........................२६५१३-ब्रह्मचारीके नित्यकर्मकी विधि, आचमनका विधान, हाथोंमें स्थित तीर्थ, उच्छिष्ट होनेपर शुद्धिकी प्रक्रिया, मूत्र-पुरीषोत्सर्गके नियम३०४
-शिव-भक्तिका माहात्म्य, शिवोपासनाकी सुगमता, ज्ञानरूप शिवस्वरूपका वर्णन, शिवकी तीन प्रकारकी शक्तियोंका प्रतिपादन, शिवके परम तत्त्वका निरूपण ............२६७१४-ब्रह्मचारीके आचारका वर्णन, गुरुसे अध्ययन आदिकी विधि, ब्रह्मचारीका धर्म, गुरु तथा गुरु-पत्नीके साथ व्यवहारका वर्णन, वेदाध्ययन और गायत्रीकी महिमा, अनध्यायोंका वर्णन,
-ऋषियोंको दिव्य नृत्य करते हुए भगवान् शंकरका आकाशमें दर्शन, मुनियोंद्वारा महेश्वरकी भावपूर्ण स्तुति करना ...........२७०
-ईश्वर (शंकर)-द्वारा ऋषिगणोंको अपना सर्वव्यापी स्वरूप बतलाना तथा अपनी

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
ब्रह्मचारी-धर्मका उपसंहार........................३०९रखना आवश्यक ....................................३८०
१५-गृहस्थधर्म तथा गृहस्थके सदाचारका वर्णन, धर्माचरण एवं सत्यधर्मकी महिमा ........३१८२५-गृहस्थ ब्राह्मणकी मुख्य वृत्ति तथा आपत्कालकी वृत्ति, गृहस्थके साधक तथा असाधक दो भेद, न्यायोपार्जित धनका विभाग एवं उसका उपयोग .....................................३८२
१६-सदाचारका वर्णन.................................३२३
१७-भक्ष्य एवं अभक्ष्य-पदार्थोंका वर्णन ...........३३२
१८-गृहस्थके नित्यकर्मोंका वर्णन, प्रातःस्नानकी महिमा, छः प्रकारके स्नान, संध्योपासनकी महिमा तथा संध्योपासनविधि, सूर्योपस्थानका माहात्म्य, सूर्यहृदयस्तोत्र, अग्निहोत्रकी विधि, तर्पणकी विधि, नित्य किये जानेवाले पञ्च-महायज्ञोंकी महिमा तथा उनका विधान...३३७२६-दानधर्मका निरूपण एवं नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा विमल-चतुर्विध दान-भेद, दानके अधिकारी तथा अनधिकारी, कामना-भेदसे विविध देवताओंकी आराधनाका विधान, ब्राह्मणकी महिमा तथा दानधर्म-प्रकरणका उपसंहार .............................................३८५
२७-वानप्रस्थ-आश्रम तथा वानप्रस्थ-धर्मका वर्णन, वानप्रस्थीके कर्तव्योंका निरूपण ...........३९२
१९-भोजन-विधि, ग्रहणकालमें भोजनका निषेध, शयन-विधि, गृहस्थके नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका महत्त्व ..................................३४८२८-संन्यासधर्मका प्रतिपादन, संन्यासियोंके भेद तथा संन्यासीके कर्तव्योंका वर्णन..........३९५
२०-श्राद्ध-प्रकरण—श्राद्धके प्रशस्त दिन, विभिन्न तिथियों, नक्षत्रों और वारोंमें किये जानेवाले श्राद्धोंका विभिन्न फल, श्राद्धके आठ भेद, श्राद्धके लिये प्रशस्त स्थान, श्राद्धमें विहित तथा निषिद्ध पदार्थ .................................३५१२९-संन्यासाश्रमधर्म-निरूपणमें यतियोंकी भैक्ष्य-वृत्तिका स्वरूप, यतियोंके लिये महेश्वरके ध्यानका प्रतिपादन, व्रतभङ्गमें प्रायश्चित्तविधान तथा पुनः यथास्थितिमें आनेकी विधि, संन्यासधर्म-प्रकरणकी समाप्ति ...............३९८
२१-श्राद्ध-प्रकरणमें निमन्त्रणके योग्य पंक्तिपावन ब्राह्मणों तथा त्याज्य पंक्ति-दूषकोंके लक्षण३५५३०-प्रायश्चित्त-प्रकरणमें प्रायश्चित्तका स्वरूप-निरूपण, पाँच महापातकोंके नाम तथा ब्रह्महत्याके प्रायश्चित्तका संक्षिप्त निरूपण..४०२
२२-श्राद्ध-प्रकरणमें ब्राह्मण निमन्त्रित करनेकी विधि, निमन्त्रित ब्राह्मणके कर्तव्य, श्राद्ध-विधि, श्राद्धमें प्रशस्त पात्र, पितरोंकी प्रार्थना, श्राद्धके दिन निषिद्ध कर्म, वृद्धिश्राद्धका विधान, श्राद्ध-प्रकरणका उपसंहार ........३६१३१-प्रायश्चित्त-प्रकरणमें कपालमोचन-तीर्थका आख्यान ..............................................४०५
२३-आशौच-प्रकरणमें जननाशौच और मरणाशौचकी क्रिया-विधि, शुद्धि-विधान, सपिण्डता, सद्यःशौच, अन्त्येष्टि-संस्कार, सपिण्डीकरण-विधि, मासिक तथा सांवत्सरिक श्राद्ध आदिका वर्णन .......................................३७१३२-प्रायश्चित्त-प्रकरणमें महापातकोंके प्रायश्चित्तका विधान तथा अन्य उपपातकोंसे शुद्धिका उपाय ..................................................४१४
२४-अग्निहोत्रका माहात्म्य, अग्निहोत्रीके कर्तव्य, श्रौत एवं स्मार्तरूप द्विविध धर्म, तृतीय शिष्टाचारधर्म, वेद, धर्मशास्त्र और पुराणसे धर्मका ज्ञान तथा इनपर श्रद्धा३३-प्रायश्चित्त-प्रकरणमें चोरी तथा अभक्ष्य-भक्षणका प्रायश्चित्त, प्रकीर्ण पापोंका प्रायश्चित्त, समस्त पापोंकी एकत्र मुक्तिके विविध उपाय, पतिव्रताको कोई पाप नहीं लगता, पतिव्रताके माहात्म्यमें देवी सीताका आख्यान, सीताद्वारा अग्निस्तुति, ज्ञानयोगकी प्रशंसा तथा प्रायश्चित्त-प्रकरणका उपसंहार .........४१९

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अध्यायविषयपृष्ठ-संख्याअध्यायविषयपृष्ठ-संख्या
३४-तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें प्रयाग, गया, एकास्र तथा पुष्कर आदि विविध तीर्थोंकी महिमाका वर्णन, सप्तसारस्वत-तीर्थके वर्णनमें शिवभक्त मङ्कणक मुनिका आख्यान ................४३२समीपवर्ती तीर्थोंकी महिमा, मार्कण्डेय तथा युधिष्ठिरके संवादकी समाप्ति .........४७१
३५-तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें विविध तीर्थोंका माहात्म्य, कालञ्जर-तीर्थकी महिमाके वर्णनके प्रसंगमें शिवभक्त राजा श्वेतकी कथा .....४३८४१-तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नैमिषारण्य तथा जप्येश्वर-तीर्थकी महिमा, जप्येश्वर-तीर्थमें महर्षि शिलादके पुत्र नन्दीकी तपस्या तथा उनके गणाधिपति होनेका आख्यान ........४७४
३६-तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें विविध तीर्थोंकी महिमा, देवदारु-वन-तीर्थका माहात्म्य .............४४१४२-विविध शैव-तीर्थोंके माहात्म्यका निरूपण, तीर्थोंके अधिकारी तथा तीर्थ-माहात्म्यका उपसंहार .............................................४७८
३७-देवदारु-वनमें स्थित मुनियोंका वृत्तान्त एवं शिवलिङ्गका पतन, मुनियोंको ब्रह्माका उपदेश, शिवको प्रसन्न करने-हेतु ऋषियोंद्वारा तपस्या तथा स्तुति, शिवद्वारा सांख्यका उपदेश .............................................४४६४३-चतुर्विध प्रलयका प्रतिपादन, नैमित्तिक प्रलयका विशेष वर्णन, विष्णुद्वारा अपने माहात्म्यका निरूपण ............................४८०
३८-तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें मार्कण्डेय-युधिष्ठिर-संवादका प्रारम्भ, मार्कण्डेयजीद्वारा नर्मदा तथा अमरकण्टकतीर्थके माहात्म्यका प्रतिपादन.............................................४६०४४-प्राकृत प्रलयका वर्णन, शिवके विविध रूपों और विविध शक्तियोंका वर्णन, शिवकी आराधनाकी विधि, मुनियोंद्वारा कूर्मरूपधारी विष्णुकी स्तुति, कूर्मपुराणकी विषयानुक्रमणिकाका वर्णन, कूर्मपुराणकी फलश्रुति तथा इस पुराणकी वक्तृ-श्रोतृपरम्पराका प्रतिपादन, महर्षि व्यास तथा नारायणकी वन्दनाके साथ पुराणकी पूर्णताका कथन ......................४८५
३९-तीर्थमाहात्म्य-वर्णनके प्रसंगमें नर्मदाके तटवर्ती तीर्थोंका विस्तारसे वर्णन .....................४६३
४०-तीर्थमाहात्म्य-प्रकरणमें नर्मदा तथा उसके

१. पूर्वविभाग (अध्याय १-५३) — सृष्टिक्रम, लक्ष्मी-प्राकट्य, शिव-विष्णु महिमा व काशी-प्रयाग माहात्म्य

॥ श्रीहरिः ॥ ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

कूर्मपुराण

[ पूर्वविभाग ]

पहला अध्याय

सूतजीकी उत्पत्ति, उनके रोमहर्षण नाम पड़नेका कारण, पुराणों तथा उपपुराणोंका नाम-परिगणन, समुद्र-मन्थनसे उत्पन्न विष्णुमायाका वर्णन, इन्द्रद्युम्नका आख्यान और कूर्मपुराणकी महिमा

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।<br>देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥(बदरिकाश्रममें निवास करनेवाले ऋषि) नारायण, नरोंमें उत्तम श्रीनर तथा उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वतीको नमस्कार कर जय (पुराण एवं इतिहास आदि सद्ग्रन्थों)-का पाठ करना चाहिये।
नमस्कृत्याप्रमेयाय विष्णवे कूर्मरूपिणे।<br>पुराणं सम्प्रवक्ष्यामि यदुक्तं विश्वयोनिना॥ १ ॥कूर्मरूप धारण करनेवाले अप्रमेय भगवान् विष्णुको नमस्कार कर मैं उस पुराण (कूर्मपुराण)-को कहूँगा, जो समस्त विश्वके मूल कारण भगवान् विष्णुके द्वारा कहा गया था॥ १॥
सत्रान्ते सूतमनघं नैमिषीया महर्षयः।<br>पुराणसंहितां पुण्यां पप्रच्छू रोमहर्षणम्॥ २ ॥<br><br>त्वया सूत महाबुद्धे भगवान् ब्रह्मवित्तमः।<br>इतिहासपुराणार्थं व्यासः सम्यगुपासितः॥ ३ ॥<br><br>तस्य ते सर्वरोमाणि वचसा हृषितानि यत्।<br>द्वैपायनस्य भगवांस्ततो वै रोमहर्षणः॥ ४॥नैमिषारण्यवासी महर्षियोंने (बारह वर्षतक चलनेवाले) सत्र (यज्ञ)-के पूर्ण हो जानेपर सर्वथा निष्पाप रोमहर्षण सूतजीसे पवित्र पुराण-संहिताके विषयमें प्रश्न किया—<br>महाबुद्धिमान् सूतजी महाराज! आपने इतिहास और पुराणोंके ज्ञानके लिये ब्रह्मज्ञानियोंमें परम श्रेष्ठ भगवान् वेदव्यासजीकी भलीभाँति उपासना की है। चूँकि आपके वचनसे द्वैपायन भगवान् वेदव्यासजीके समस्त रोम हर्षित हो गये थे, इसलिये आप 'रोमहर्षण' कहलाते हैं॥ २—४॥

१२ | * कूर्मपुराण *


भवन्तमेव भगवान् व्याजहार स्वयं प्रभुः।<br>मुनीनां संहितां वक्तुं व्यासः पौराणिकीं पुरा ॥ ५ ॥<br><br>त्वं हि स्वायम्भुवे यज्ञे सुत्याहे वितते हरिः।<br>सम्भूतः संहितां वक्तुं स्वांशेन पुरुषोत्तमः ॥ ६ ॥<br><br>तस्माद् भवन्तं पृच्छामः पुराणं कौर्ममुत्तमम्।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं पुराणार्थविशारद ॥ ७ ॥प्राचीन कालमें स्वयं समर्थ होते हुए भी भगवान् वेदव्यासजीने आपसे ही कहा था कि आप मुनियोंको पुराण-संहिता सुनायें। (सूतजी महाराज!) आप अपने अंशसे उत्पन्न साक्षात् पुरुषोत्तम नारायण हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीके महान् यज्ञमें सोमरस प्रस्तुत करनेके दिन पुराण-संहिताका वाचन करनेके लिये ही आपका आविर्भाव हुआ था। आप पुराणोंके अर्थको ठीक-ठीक जाननेवाले हैं। इसीलिये हम आपसे श्रेष्ठ कूर्मपुराणके विषयमें पूछ रहे हैं। आप हमें वह (कूर्मपुराण) बतायें ॥ ५-७ ॥
मुनीनां वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः।<br>प्रणम्य मनसा प्राह गुरुं सत्यवतीसुतम् ॥ ८ ॥मुनियोंके वचन सुनकर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीने देवी सत्यवतीके पुत्र अपने गुरु (भगवान् वेदव्यास)-को मन-ही-मन प्रणाम कर (इस प्रकार) कहा— ॥ ८ ॥
रोमहर्षण उवाच<br>नमस्कृत्य जगद्योनिं कूर्मरूपधरं हरिम्।<br>वक्ष्ये पौराणिकीं दिव्यां कथां पापप्रणाशिनीम्॥ ९ ॥<br><br>यां श्रुत्वा पापकर्मापि गच्छेत् परमां गतिम्।<br>न नास्तिके कथां पुण्यामिमां ब्रूयात् कदाचन ॥ १० ॥<br><br>श्रद्दधानाय शान्ताय धार्मिकाय द्विजातये।<br>इमां कथामनुब्रूयात् साक्षान्नारायणेरिताम्॥ ११ ॥रोमहर्षण सूतजी बोले—समस्त विश्वके मूल कारण, कूर्मरूप धारण करनेवाले भगवान् नारायण विष्णुको नमस्कार करके कूर्मपुराणकी उस दिव्य कथाको कहता हूँ, जो समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली है और जिसे सुनकर महान्-से-महान् पाप करनेवाला पापी व्यक्ति भी परम गतिको प्राप्त कर लेता है। कूर्मपुराणकी इस पुण्यकथाको नास्तिक व्यक्तिको कभी भी नहीं सुनाना चाहिये। जो अत्यन्त श्रद्धालु हैं, शान्त हैं, धर्मात्मा हैं—ऐसे द्विजातियोंको साक्षात् नारायण भगवान् विष्णुके द्वारा कही गयी इस कूर्मपुराणकी कथाको विशेष रूपसे कहना चाहिये ॥ ९—११ ॥
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।<br>वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ १२ ॥सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय), वंश, वंशानुचरित तथा मन्वन्तर—ये पुराणोंके पाँच लक्षण हैं ॥ १२ ॥
ब्राह्मं पुराणं प्रथमं पाद्मं वैष्णवमेव च।<br>शैव भागवतं चैव भविष्यं नारदीयकम् ॥ १३ ॥<br>मार्कण्डेयमथाग्नेयं ब्रह्मवैवर्तमेव च।<br>लैङ्गं तथा च वाराहं स्कान्दं वामनमेव च ॥ १४ ॥<br>कौर्मं मात्स्यं गारुडं च वायवीयमनन्तरम्।<br>अष्टादशं समुद्दिष्टं ब्रह्माण्डमिति संज्ञितम् ॥ १५ ॥अठारह महापुराणोंमें प्रथम पुराण ब्रह्मपुराण है, द्वितीय पद्मपुराण है। इसी प्रकार क्रमशः विष्णु, शिव, भागवत, भविष्य, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य और गरुडपुराण हैं। भगवान् वायुके द्वारा कहा गया अठारहवाँ पुराण ब्रह्माण्डपुराणके नामसे कहा जाता है ॥ १३—१५ ॥
अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कथितानि तु।<br>अष्टादशपुराणानि श्रुत्वा संक्षेपतो द्विजाः ॥ १६ ॥(सूतजीने पुनः कहा—) ब्राह्मणो! अठारह पुराणोंका नाम सुनकर (अब आप लोग) मुनियोंद्वारा कहे गये अन्य उपपुराणोंका नाम भी संक्षेपमें सुनें— ॥ १६ ॥
आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहमतः परम्।<br>तृतीयं स्कान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम् ॥ १७ ॥(इन उपपुराणोंमें) पहला उपपुराण सनत्कुमारके द्वारा कहा गया सनत्कुमार उपपुराण है। तदनन्तर दूसरा नरसिंहपुराण है। स्कन्दकुमारके द्वारा कथित तीसरा पुराण स्कन्दपुराण कहा गया है ॥ १७ ॥
  • अध्याय १ * १३
चतुर्थं शिवधर्माख्यं साक्षान्नन्दीशभाषितम्।<br>दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदोक्तमतः परम्॥ १८॥<br><br>कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम्।<br>ब्रह्माण्डं वारुणं चाथ कालिकाह्वयमेव च॥ १९॥<br><br>माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसंचयम्।<br>पराशरोक्तमपरं मारीचं भार्गवाह्वयम्॥ २०॥चौथे पुराणका नाम शिवधर्म है जो साक्षात् भगवान् नन्दीश्वर (शिव)-के द्वारा कहा गया है। महर्षि दुर्वासाके द्वारा कहा गया आश्चर्यपुराण पाँचवाँ है और छठा पुराण देवर्षि नारदके द्वारा कहा गया नारदपुराण है। इसी प्रकार (सातवाँ) कपिल, (आठवाँ) मानव और शुक्राचार्यद्वारा प्रोक्त उशना नामक (नवाँ) पुराण है। (दसवाँ) ब्रह्माण्ड, (ग्यारहवाँ) वरुण तथा (बारहवाँ पुराण) कालिकापुराणके नामसे कहा गया है। (तेरहवाँ) माहेश्वरपुराण, (चौदहवाँ) साम्बपुराण तथा सभी प्रकारके अर्थोंसे युक्त (पंद्रहवाँ) सौरपुराण है। (सोलहवाँ) पराशरपुराण महर्षि पराशरके द्वारा कहा गया है। (सत्रहवाँ) मारीचपुराण है और (अठारहवाँ पुराण) भार्गवपुराणके नामसे कहा गया है॥ १८-२०॥
इदं तु पञ्चदशमं पुराणं कौर्ममुत्तमम्।<br>चतुर्धा संस्थितं पुण्यं संहितानां प्रभेदतः॥ २१॥<br><br>ब्राह्मी भागवती सौरी वैष्णवी च प्रकीर्तिताः।<br>चतस्रः संहिताः पुण्या धर्मकामार्थमोक्षदाः॥ २२॥यह कूर्मपुराण पंद्रहवाँ महापुराण है, जो पुराणोंमें श्रेष्ठ है। संहिताओंके भेदसे यह पवित्र पुराण चार भागों (चार संहिताओं)-में विभक्त है। ब्राह्मी, भागवती, सौरी तथा वैष्णवी नामक इस कूर्मपुराणकी चार पवित्र संहिताएँ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—इस प्रकार चतुर्विध पुरुषार्थको देनेवाली कही गयी हैं॥ २१-२२॥
इयं तु संहिता ब्राह्मी चतुर्वेदैस्तु सम्मिता।<br>भवन्ति षट्सहस्राणि श्लोकानामत्र संख्यया॥ २३॥<br><br>यत्र धर्मार्थकामानां मोक्षस्य च मुनीश्वराः।<br>माहात्म्यमखिलं ब्रह्म ज्ञायते परमेश्वरः॥ २४॥<br><br>सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।<br>वंशानुचरितं दिव्याः पुण्याः प्रासंगिक्यः कथाः॥ २५॥<br><br>ब्राह्मणाद्यैरियं धार्या धार्मिकैः शान्तमानसैः।<br>तामहं वर्तयिष्यामि व्यासेन कथितां पुरा॥ २६॥यह ब्राह्मी संहिता है, जो चारों वेदोंद्वारा अनुमोदित है। इसकी श्लोक-संख्या छः हजार है। हे मुनीश्वरो! इसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका अशेष माहात्म्य वर्णित है और (इसके श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पठन-पाठन एवं श्रवण आदिसे) परमेश्वर ब्रह्मका ज्ञान होता है। इसमें सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित और दिव्य एवं पुण्य प्रासंगिक कथाएँ भी कही गयी हैं। यह पुराणसंहिता शान्त-चित्त एवं धर्मात्मा ब्राह्मणादिकोंके द्वारा धारण करने योग्य है। (सूतजी कहते हैं—) मैं उसी पुराणसंहिताका प्रवचन करूँगा, जिसे प्राचीन समयमें वेदव्यासजीने कहा था॥ २३-२६॥
पुरामृतार्थं दैतेयदानवैः सह देवताः।<br>मन्थानं मन्दरं कृत्वा ममन्थुः क्षीरसागरम्॥ २७॥<br><br>मध्यमाने तदा तस्मिन् कूर्मरूपी जनार्दनः।<br>बभार मन्दरं देवो देवानां हितकाम्यया॥ २८॥प्राचीन कालमें अमृतकी प्राप्तिके लिये देवताओंने दितिके पुत्र दैत्यों और दानवोंके साथ मन्दर नामक पर्वतको मथानी बनाकर क्षीरसागरको मथा। उस क्षीरसागरके मन्थन किये जाते समय देवताओंके कल्याणकी कामनासे जनार्दन भगवान् विष्णुने कूर्मरूप धारण करके उस मन्दराचलको ऊपर उठाये रखा॥ २७-२८॥

१४ | * कूर्मपुराण * |


देवाश्च तुष्टुवुर्देवं नारदाद्या महर्षयः।<br>कूर्मरूपधरं दृष्ट्वा साक्षिणं विष्णुमव्ययम्॥ २९॥कूर्म (कच्छप)-रूप धारण किये हुए सर्वद्रष्टा अविनाशी भगवान् विष्णुको देखकर देवताओं तथा नारदादि महर्षियोंने उन देवकी स्तुति की॥ २९॥
तदन्तरेऽभवद् देवी श्रीर्नारायणवल्लभा।<br>जग्राह भगवान् विष्णुस्तामेव पुरुषोत्तमः॥ ३०॥उसी समय नारायण भगवान् विष्णुकी प्रिया देवी श्रीलक्ष्मीका आविर्भाव हुआ। उन्हें पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने ही ग्रहण किया। लक्ष्मीके तेजसे मोहित हुए इन्द्रसहित नारद आदि महर्षियोंने अव्यक्त भगवान् विष्णुसे यह वचन कहा—॥ ३०-३१॥
तेजसा विष्णुमव्यक्तं नारदाद्या महर्षयः।<br>मोहिताः सह शक्रेण श्रियो वचनमब्रुवन्॥ ३१॥
भगवन् देवदेवेश नारायण जगन्मय।<br>कैषा देवी विशालाक्षी यथावद् ब्रूहि पृच्छताम्॥ ३२॥हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे नारायण! हे जगन्मय! हम पूछनेवालोंको आप ठीक-ठीक बतलायें कि विशाल नेत्रोंवाली यह देवी कौन है?॥ ३२॥
श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं विष्णुर्दानवमर्दनः।<br>प्रोवाच देवीं सम्प्रेक्ष्य नारदादीनकल्मषान्॥ ३३॥उस समय उन देवताओं तथा महर्षियोंका वह वाक्य सुनकर दानवोंका मर्दन करनेवाले भगवान् विष्णु देवी लक्ष्मीकी ओर देखकर नारद आदि परम पवित्र महर्षियोंसे बोले—॥ ३३॥
इयं सा परमा शक्तिर्मन्मयी ब्रह्मरूपिणी।<br>माया मम प्रयानन्ता ययेदं मोहितं जगत्॥ ३४॥<br><br>अनयैव जगत् सर्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>मोहयामि द्विजश्रेष्ठा ग्रसामि विसृजामि च॥ ३५॥<br><br>उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्।<br>विज्ञायान्वीक्ष्य चात्मानं तरन्ति विपुलामिमाम्॥ ३६॥<br><br>अस्यास्त्वंशानधिष्ठाय शक्तिमन्तोऽभवन् द्विजाः।<br>ब्रह्मेशानादयो देवाः सर्वशक्तिरियं मम॥ ३७॥यह मेरी स्वरूपभूता ब्रह्मरूपिणी परम शक्ति है, यही माया है, यही अनन्ता है और यही मेरी वह प्रिया है जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को मोहित कर रखा है। हे श्रेष्ठ द्विजो! इसीके द्वारा मैं देवताओं, असुरों एवं मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण विश्वको मोहित करता हूँ, संहार करता हूँ और पुनः सृष्टि करता हूँ। (ज्ञानीजन जगत्की) उत्पत्ति एवं प्रलयको तथा प्राणियोंके जन्म एवं मोक्षको ठीक-ठीक समझकर और आत्मतत्त्वका दर्शनकर इस महामायाके बन्धनसे पार उतरते हैं। द्विजो! मेरी सब प्रकारकी शक्ति यही है, इसीके अंशोंका आश्रय ग्रहणकर ब्रह्मा तथा शिव आदि देवता शक्तिमान् हुए हैं॥ ३४—३७॥
सैषा सर्वजगत्सूतिः प्रकृतिस्त्रिगुणात्मिका।<br>प्रागेव मत्तः संजाता श्रीकल्पे पद्मवासिनी॥ ३८॥<br><br>चतुर्भुजा शङ्खचक्रपद्महस्ता शुभान्विता।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशा मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥ ३९॥<br><br>नालं देवा न पितरो मानवा वसवोऽपि च।<br>मायामेतां समुत्तर्तुं ये चान्ये भुवि देहिनः॥ ४०॥यही वह सत्त्व-रज तथा तम—तीनों गुणोंसे युक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृति है और यही सारे संसारको उत्पन्न करनेवाली है। प्राचीन कालमें श्रीकल्पमें यह पद्मवासिनीके रूपमें मुझसे ही आविर्भूत हुई थी। ये चार भुजावाली हैं, ये हाथोंमें शंख, चक्र तथा कमल धारण किये रहती हैं, सभी मङ्गलमय गुणोंसे युक्त हैं, करोड़ों सूर्योंके समान इनकी आभा है, ये सभी प्राणियोंको मोहित करनेवाली हैं। देवता, पितर, मनुष्य, वसुगण तथा पृथ्वीपर रहनेवाले जितने भी अन्य देहधारी प्राणी हैं, वे सभी अर्थात् कोई भी ऐसा नहीं है जो इस मायाको पार करनेमें समर्थ हो॥ ३८—४०॥
* अध्याय १ *१५

इत्युक्ता वासुदेवेन मुनयो विष्णुमब्रुवन् ।
ब्रूहि त्वं पुण्डरीकाक्ष यदि कालत्रयेऽपि च ।
को वा तरति तां मायां दुर्जयां देवनिर्मिताम् ॥ ४१ ॥

अथोवाच हृषीकेशो मुनीन् मुनिगणार्चितः ।
अस्ति द्विजातिप्रवर इन्द्रद्युम्न इति श्रुतः ॥ ४२ ॥

पूर्वजन्मनि राजासावधृष्यः शंकरादिभिः ।
दृष्ट्वा मां कूर्मसंस्थानं श्रुत्वा पौराणिकीं स्वयम् ।
संहितां मन्मुखाद् दिव्यां पुरस्कृत्य मुनीश्वरान् ॥ ४३ ॥

ब्रह्माणं च महादेवं देवांश्चान्यान् स्वशक्तिभिः ।
मच्छक्तौ संस्थितान् बुद्ध्वा मामेव शरणं गतः ॥ ४४ ॥
सम्भाषितो मया चाथ विप्रयोनिं गमिष्यसि ।
इन्द्रद्युम्न इति ख्यातो जातिं स्मरसि पौर्विकीम् ॥ ४५ ॥

सर्वेषामेव भूतानां देवानामप्यगोचरम् ।
वक्तव्यं यद् गुह्यतमं दास्ये ज्ञानं तवानघ ।
लब्ध्वा तन्मामकं ज्ञानं मामेवान्ते प्रवेक्ष्यसि ॥ ४६ ॥

अंशान्तरेण भूम्यां त्वं तत्र तिष्ठ सुनिर्वृतः ।
वैवस्वतेऽन्तरेऽतीते कार्यार्थं मां प्रवेक्ष्यसि ॥ ४७ ॥
मां प्रणम्य पुरीं गत्वा पालयामास मेदिनीम् ।
कालधर्मं गतः कालाच्छ्वेतद्वीपे मया सह ॥ ४८ ॥

भुक्त्वा तान् वैष्णवान् भोगान् योगिनामप्यगोचरान् ।
मदाज्ञया मुनिश्रेष्ठा जज्ञे विप्रकुले पुनः ॥ ४९ ॥
ज्ञात्वा मां वासुदेवाख्यं यत्र द्वे निहितेऽक्षरे ।
विद्याविद्ये गूढरूपे यत्तद् ब्रह्म परं विदुः ॥ ५० ॥

सोऽर्चयामास भूतानामाश्रयं परमेश्वरम् ।
व्रतोपवासनियमैर्होमैर्ब्राह्मणतर्पणैः ॥ ५१ ॥


भगवान् वासुदेवके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर मुनियोंने भगवान् विष्णुसे कहा—हे पुण्डरीकाक्ष! उस देवनिर्मित दुर्जय मायाको पार करनेवाला तीनों कालोंमें यदि कोई हुआ हो तो उसे आप बतलायें ॥ ४१ ॥

तदनन्तर मुनियोंद्वारा पूजित भगवान् हृषीकेशने उन मुनियोंसे कहा—इन्द्रद्युम्न नामका द्विजातियोंमें श्रेष्ठ एक ब्राह्मण था, ऐसा सुना गया है। पूर्वजन्ममें वह शंकर आदि देवताओंसे भी अजेय राजा था। 'मैंने कूर्म-अवतार धारण किया है' यह जानकर तथा स्वयं मेरे मुखसे दिव्य पुराण-संहिताको सुनकर वह (राजा इन्द्रद्युम्न) मुनीश्वरोंसहित ब्रह्मा, शिव एवं अपनी-अपनी शक्तियोंके साथ अन्य सभी देवताओंको मेरी ही शक्तिमें प्रतिष्ठित समझकर मुझे देखनेके लिये मेरी शरणमें आया ॥ ४२—४४ ॥

इसके बाद मैंने कहा—(इन्द्रद्युम्न!) तुम ब्राह्मणकी योनिमें उत्पन्न होओगे, तुम्हारा 'इन्द्रद्युम्न' यह नाम प्रसिद्ध होगा और तुम अपने पूर्वजन्मका स्मरण करोगे। हे अनघ! मैं तुम्हें सभी प्राणियों तथा देवताओंके लिये भी अज्ञात एवं जो अत्यन्त गूढ़रूपसे कहने योग्य है, उस ज्ञानको प्रदान करूँगा। उस मेरे ज्ञानको प्राप्तकर तुम अन्त समयमें मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे और अपने ही अंशसे दूसरे रूपमें तुम पृथ्वीपर शान्तिपूर्वक रहो। वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर तुम (अभीष्ट) कार्यके लिये मुझमें ही प्रविष्ट हो जाओगे ॥ ४५—४७ ॥

(भगवान्ने पुनः कहा—) मुनिश्रेष्ठो! मुझे प्रणामकर वह राजा अपनी नगरीमें गया और पृथ्वीका पालन-पोषण करने लगा। यथासमय मृत्यु होनेपर वह मेरे स्थान—श्वेतद्वीपको प्राप्त हुआ और वहाँ मेरे साथ योगियोंके लिये भी अलभ्य दिव्य वैष्णव भोगोंको भोगकर पुनः मेरी ही आज्ञासे ब्राह्मण-कुलमें उत्पन्न हुआ ॥ ४८-४९ ॥

जिसमें अविनश्वर गूढ़ स्वरूपवाली विद्या एवं अविद्या—ये दोनों प्रतिष्ठित हैं तथा जिसे ज्ञानीजन परब्रह्मके नामसे जानते हैं, उस वासुदेव नामवाले मुझे जानकर इन्द्रद्युम्नने व्रत, उपवास, नियम, होम तथा ब्राह्मणोंकी संतुष्टि आदि उपायोंद्वारा सभी प्राणियोंके एकमात्र आश्रय परमेश्वरकी आराधना की ॥ ५०-५१ ॥

१६* कूर्मपुराण *

| तदाशीस्तन्नमस्कारस्तन्निष्ठस्तत्परायणः ।<br>आराधयन् महादेवं योगिनां हृदि संस्थितम् ॥ ५२ ॥<br><br>तस्यैवं वर्तमानस्य कदाचित् परमा कला।<br>स्वरूपं दर्शयामास दिव्यं विष्णुसमुद्भवम् ॥ ५३ ॥<br><br>दृष्ट्वा प्रणम्य शिरसा विष्णोर्भगवतः प्रियाम्।<br>संस्तूय विविधैः स्तोत्रैः कृताञ्जलिरभाषत ॥ ५४ ॥<br><div style="text-align:center">इन्द्रद्युम्न उवाच</div>का त्वं देवि विशालाक्षि विष्णुचिह्नाङ्किते शुभे।<br>याथातथ्येन वै भावं तवेदानीं ब्रवीहि मे ॥ ५५ ॥<br><br>तस्य तद् वाक्यमाकर्ण्य सुप्रसन्ना सुमङ्गला।<br>हसन्ती संस्मरन् विष्णुं प्रियं ब्राह्मणमब्रवीत् ॥ ५६ ॥<br><br>न मां पश्यन्ति मुनयो देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>नारायणात्मिका चैका मायाहं तन्मया परा ॥ ५७ ॥<br><br>न मे नारायणाद् भेदो विद्यते हि विचारतः।<br>तन्मयाहं परं ब्रह्म स विष्णुः परमेश्वरः ॥ ५८ ॥<br><br>येऽर्चयन्तीह भूतानामाश्रयं परमेश्वरम्।<br>ज्ञानेन कर्मयोगेन न तेषां प्रभवाम्यहम् ॥ ५९ ॥<br><br>तस्मादनादिनिधनं कर्मयोगपरायणः।<br>ज्ञानेनाराधयानन्तं ततो मोक्षमवाप्स्यसि ॥ ६० ॥<br><br>इत्युक्तः स मुनिश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नो महामतिः।<br>प्रणम्य शिरसा देवीं प्राञ्जलिः पुनरब्रवीत् ॥ ६१ ॥<br><br>कथं स भगवानीशः शाश्वतो निष्कलोऽच्युतः।<br>ज्ञातुं हि शक्यते देवि ब्रूहि मे परमेश्वरि ॥ ६२ ॥<br><br>एवमुक्ताथ विप्रेण देवी कमलवासिनी।<br>साक्षान्नारायणो ज्ञानं दास्यतीत्याह तं मुनिम् ॥ ६३ ॥<br><br>उभाभ्यामथ हस्ताभ्यां संस्पृश्य प्रणतं मुनिम्।<br>स्मृत्वा परात्परं विष्णुं तत्रैवान्तरधीयत ॥ ६४ ॥ | वह उन्हींकी मङ्गलकामना करते हुए उन्हींको नमस्कार करता था, उनमें ही उसकी अनन्य निष्ठा थी तथा वह उन्हींके आश्रित होकर योगियोंके हृदयप्रदेशमें विराजमान रहनेवाले महादेवकी आराधना करने लगा। उसके इसी प्रकार आराधना करते हुए एक दिन वैष्णवी शक्तिने भगवान् विष्णुसे प्रादुर्भूत दिव्य स्वरूप उसे दिखलाया। भगवान् विष्णुकी प्रिया देवी विष्णुप्रियाका दर्शनकर उसने सिर झुकाकर विनीतभावसे उन्हें प्रणाम किया और विविध स्तुतियोंके द्वारा उनकी स्तुतिकर हाथ जोड़कर कहा—॥ ५२-५४॥<br><br>इन्द्रद्युम्नने कहा—वैष्णव चिह्नोंवाली, मङ्गलमयी तथा विशाल नेत्रोंवाली हे देवि ! आप कौन हैं ? आपका जो यथार्थ स्वरूप हो उसे इस समय मुझे बतलायें ॥ ५५ ॥<br><br>इन्द्रद्युम्नके वचन सुनकर अत्यन्त सुप्रसन्ना सुमङ्गला वह देवी विष्णुका स्मरणकर उस प्रिय ब्राह्मणसे हँसती हुई बोली—॥ ५६ ॥<br><br>मैं उन विष्णुकी प्रकृतिस्वरूपा परा माया हूँ। मुझ अद्वितीय नारायणस्वरूपा नारायणीको मुनि तथा इन्द्र आदि देवता भी नहीं देख पाते हैं। सूक्ष्म विचार करनेपर मुझमें और नारायणमें कोई भेद नहीं दीखता। मैं उनकी प्रकृतिरूपा हूँ, वे विष्णु परब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं। समस्त भूत (प्राणियों)-के आश्रयभूत उन परमेश्वरकी जो ज्ञानयोग अथवा कर्मयोगद्वारा यहाँ आराधना करते हैं ऐसे भक्तोंपर मेरा कोई वश नहीं चलता। अतः तुम कर्मयोगका आश्रय लेते हुए ज्ञानके द्वारा उन आदि और अन्तसे रहित अनन्त भगवान् विष्णुकी आराधना करो। इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे ॥ ५७-६०॥<br><br>ऐसा कहे जानेपर अत्यन्त बुद्धिमान् मुनिश्रेष्ठ उस इन्द्रद्युम्नने देवीको विनयपूर्वक प्रणाम किया और हाथ जोड़कर पुनः कहा—हे परमेश्वरी देवि ! शाश्वत, अखण्ड तथा अच्युत सबके स्वामी उन भगवान्‌को किस प्रकार जाना जा सकता है, यह मुझे बतलायें ॥ ६१-६२॥<br><br>ब्राह्मण (इन्द्रद्युम्न)-के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर कमलमें निवास करनेवाली देवीने उस मुनिसे कहा—'साक्षात् नारायण ही तुम्हें (वह) ज्ञान प्रदान करेंगे। तदनन्तर प्रणाम कर रहे उस मुनि (इन्द्रद्युम्न)-को अपने दोनों हाथोंसे भली-भाँति स्पर्श कर (वे देवी) परात्पर विष्णुका स्मरण करती हुई वहीं अन्तर्धान हो गयीं ॥ ६३-६४॥ |

  • अध्याय १ * १७

सोऽपि नारायणं द्रष्टुं परमेण समाधिना।
आराधयद्धृषीकेशं प्रणतार्तिप्रभञ्जनम्॥ ६५॥

ततो बहुतिथे काले गते नारायणः स्वयम्।
प्रादुरासीन्महायोगी पीतवासा जगन्मयः॥ ६६॥

दृष्ट्वा देवं समायान्तं विष्णुमात्मानमव्ययम्।
जानुभ्यामवनिं गत्वा तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ६७॥

इन्द्रद्युम्न उवाच

यज्ञेशाच्युत गोविन्द माधवानन्त केशव।
कृष्ण विष्णो हृषीकेश तुभ्यं विश्वात्मने नमः॥ ६८॥

नमोऽस्तु ते पुराणाय हरये विश्वमूर्तये।
सर्गस्थितिविनाशानां हेतवेऽनन्तशक्तये॥ ६९॥

निर्गुणाय नमस्तुभ्यं निष्कलायामलात्मने।
पुरुषाय नमस्तुभ्यं विश्वरूपाय ते नमः॥ ७०॥

नमस्ते वासुदेवाय विष्णवे विश्वयोनये।
आदिमध्यान्तहीनाय ज्ञानगम्याय ते नमः॥ ७१॥

नमस्ते निर्विकाराय निष्प्रपञ्चाय ते नमः।
भेदाभेदविहीनाय नमोऽस्त्वानन्दरूपिणे॥ ७२॥

नमस्ताराय शान्ताय नमोऽप्रतिहतात्मने।
अनन्तमूर्तये तुभ्यममूर्ताय नमो नमः॥ ७३॥

नमस्ते परमार्थाय मायातीताय ते नमः।
नमस्ते परमेशाय ब्रह्मणे परमात्मने॥ ७४॥

नमोऽस्तु ते सुसूक्ष्माय महादेवाय ते नमः।
नमः शिवाय शुद्धाय नमस्ते परमेष्ठिने॥ ७५॥

त्वयैव सृष्टमखिलं त्वमेव परमा गतिः।
त्वं पिता सर्वभूतानां त्वं माता पुरुषोत्तम॥ ७६॥

त्वमक्षरं परं धाम चिन्मात्रं व्योम निष्कलम्।
सर्वस्याधारमव्यक्तमनन्तं तमसः परम्॥ ७७॥

प्रपश्यन्ति परात्मानं ज्ञानदीपेन केवलम्।
प्रपद्ये भवतो रूपं तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७८॥


इन्द्रद्युम्न भी शरणागतके दुःखोंको सर्वथा दूर कर देनेवाले हृषीकेश भगवान् नारायणका दर्शन करनेके लिये दीर्घकालीन समाधिमें निरत होकर आराधना करने लगा। तत्पश्चात् बहुत समय बीत जानेपर पीताम्बरधारी, जगन्मूर्ति महायोगी भगवान् नारायण उसके सामने स्वयं प्रकट हो गये। अविनाशी परमात्मा भगवान् विष्णुको आया हुआ देखकर घुटनोंके बल पृथ्वीपर स्थित होकर वह गरुडध्वजदेवकी स्तुति करने लगा॥ ६५—६७॥

इन्द्रद्युम्नने कहा— हे यज्ञोंके स्वामी ! अच्युत ! गोविन्द ! माधव ! अनन्त ! केशव ! कृष्ण ! विष्णु ! तथा हृषीकेश ! आप विश्वात्माको नमस्कार है। पुराण-पुरुष ! विश्वमूर्ति हे हरि ! आप सृष्टि, स्थिति तथा प्रलयके मूल कारण हैं, आप अनन्त शक्तिसम्पन्न हैं, आपको नमस्कार है। आप निर्गुण-स्वरूप हैं, निष्कल एवं विमलात्मा हैं, आपको नमस्कार है। हे विश्वरूप पुरुष ! आपको नमस्कार है। विश्वकी योनि, वासुदेव भगवान् विष्णुको नमस्कार है। आप आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित ज्ञानद्वारा जानने योग्य हैं, आपको नमस्कार है। निर्विकार तथा प्रपञ्चरहित आपको नमस्कार है। भेद-अभेदसे रहित आनन्द-स्वरूप आपको नमस्कार है। (संसारसागरसे) पार उतारनेवाले, शान्तस्वरूप आपको नमस्कार है। शुद्धात्मा आपको नमस्कार है। आप अनन्तमूर्तिवाले हैं, अमूर्त हैं, आपको बार-बार नमस्कार है। आप परमार्थरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप मायासे अतीत हैं, आपको नमस्कार है। ईशोंके भी ईश ! आपको नमस्कार है। परमात्मा परब्रह्मरूप आपको नमस्कार है। अत्यन्त सूक्ष्मरूप आपको नमस्कार है। देवोंके भी देव महादेव ! आपको नमस्कार है। विशुद्धस्वरूप शिव ! आपको नमस्कार है। परमेष्ठीस्वरूप आपको नमस्कार है॥ ६८—७५॥

आपने ही सम्पूर्ण सृष्टिकी रचना की है। आप ही परम गति हैं। हे पुरुषोत्तम ! आप ही सभी भूत-प्राणियोंके पिता हैं और आप ही सबकी माता हैं। आप अविनाशी हैं, परम धाम हैं, चित्स्वरूप हैं, व्योम हैं, निष्कल हैं, सबके आधार हैं, अव्यक्त हैं, अनन्त हैं और तमसे सर्वथा रहित नित्य प्रकाशस्वरूप हैं। (ज्ञानीजन) केवल ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा जिस परमात्माका दर्शन करते हैं, मैं आपके उस रूपकी शरण ग्रहण करता हूँ, वह विष्णुका परमपद है॥ ७६—७८॥

१८ * कूर्मपुराण *


एवं स्तुवन्तं भगवान् भूतात्मा भूतभावनः।
उभाभ्यामथ हस्ताभ्यां पस्पर्श प्रहसन्निव॥ ७९॥

स्पृष्टमात्रो भगवता विष्णुना मुनिपुंगवः।
यथावत् परमं तत्त्वं ज्ञातवांस्तत्प्रसादतः॥ ८०॥

ततः प्रहृष्टमनसा प्रणिपत्य जनार्दनम्।
प्रोवाचोन्निद्रपद्माक्षं पीतवाससमच्युतम्॥ ८१॥
त्वत्प्रसादादसंदिग्धमुत्पन्नं पुरुषोत्तम।
ज्ञानं ब्रह्मैकविषयं परमानन्दसिद्धिदम्॥ ८२॥

नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय वेधसे।
किं करिष्यामि योगेश तन्मे वद जगन्मय॥ ८३॥

श्रुत्वा नारायणो वाक्यमिन्द्रद्युम्नस्य माधवः।
उवाच सस्मितं वाक्यमशेषजगतो हितम्॥ ८४॥

श्रीभगवानुवाच
वर्णाश्रमाचारवतां पुंसां देवो महेश्वरः।
ज्ञानेन भक्तियोगेन पूजनीयो न चान्यथा॥ ८५॥

विज्ञाय तत्परं तत्त्वं विभूतिं कार्यकारणम्।
प्रवृत्तिं चापि मे ज्ञात्वा मोक्षार्थीश्वरमर्चयेत्॥ ८६॥

सर्वसंगान् परित्यज्य ज्ञात्वा मायामयं जगत्।
अद्वैतं भावयात्मानं द्रक्ष्यसे परमेश्वरम्॥ ८७॥

त्रिविधा भावना ब्रह्मन् प्रोच्यमाना निबोध मे।
एका मद्धिषया तत्र द्वितीया व्यक्तसंश्रया।
अन्या च भावना ब्राह्मी विज्ञेया सा गुणातिगा॥ ८८॥


इस प्रकार स्तुति करते हुए इन्द्रद्युम्नका सभी प्राणियोंके आत्मरूप भूतभावन भगवान् विष्णुने अपने दोनों हाथोंसे किञ्चित् मुसकराते हुए स्पर्श किया॥ ७९॥

भगवान् विष्णुके द्वारा स्पर्श करते ही मुनिश्रेष्ठ (इन्द्रद्युम्न)-को उन भगवान्‌की कृपासे परम तत्त्वका यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो गया। इसके बाद अत्यन्त प्रसन्न मनसे इन्द्रद्युम्नने प्रफुल्लित कमलके समान नेत्रवाले, पीताम्बरधारी अच्युत भगवान् जनार्दनको प्रणाम कर कहा—॥ ८०-८१॥

हे पुरुषोत्तम! आपकी कृपासे मुझे परमानन्दकी प्राप्ति करानेवाला एकमात्र ब्रह्मसम्बन्धी संदेहरहित ज्ञान प्राप्त हो गया है। हे भगवन्! हे वासुदेव! हे वेधा! आपको नमस्कार है। हे योगेश! हे जगन्मय! मैं क्या करूँ, उसे आप मुझे बतलायें॥ ८२-८३॥

इन्द्रद्युम्नके वचन सुनकर माधव भगवान् नारायणने समस्त संसारके कल्याणकी कामनासे मुसकराते हुए यह वचन कहा—॥ ८४॥

श्रीभगवान् बोले— वर्ण एवं आश्रमधर्मका पालन करनेवाले व्यक्तियोंको चाहिये कि वे ज्ञान एवं भक्तियोगके द्वारा भगवान् महेश्वरकी पूजा करें, अन्य साधनसे नहीं। मोक्षार्थीको चाहिये कि उस परम तत्त्व, विभूति एवं कार्यकारणरूपको ठीक-ठीक जानकर साथ ही मेरी प्रवृत्तिको समझकर ईश्वरकी उपासना करे। सभी प्रकारकी आसक्तियोंका सर्वथा परित्याग कर, इस संसारको माया-रूप जानकर अपनेमें अद्वैतकी भावना करे*। (ऐसा करनेसे इन्द्रद्युम्न! तुम) परमेश्वरका दर्शन करोगे॥ ८५-८७॥

ब्रह्मन् इन्द्रद्युम्न! तीन प्रकारकी भावनाएँ कही गयी हैं, उन्हें मैं बताता हूँ, तुम सुनो—उन तीनोंमेंसे पहली भावना है मद्धिषया अर्थात् मेरे सगुण स्वरूपकी भावना। दूसरी है व्यक्तसंश्रया अर्थात् भगवान्‌का जो विराट् स्वरूप है, उसका आश्रय ग्रहण कर उपासनाकी भावना और तीसरी जो भावना है उसे ब्राह्मी अर्थात् ब्रह्मज्ञानविषयक भावना जानना चाहिये, यह तीसरी भावना गुणातीत है (गुणातीतरूपमें ब्रह्मकी उपासना ही ब्राह्मी भावना है।) विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि इन तीनोंमेंसे किसी भी भावनाका आश्रय ग्रहण कर उपासना करे॥ ८८॥


* 'परमात्मासे अतिरिक्त कुछ नहीं है' यह भावना ही यहाँ अद्वैत भावना है।

* अध्याय १ *१९
आसामन्यतमां चाथ भावनां भावयेद् बुधः।<br>अशक्तः संश्रयेदाद्यामित्येषा वैदिकी श्रुतिः॥ ८९ ॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तन्निष्ठस्तत्परायणः।<br>समाराध्य विश्वेशं ततो मोक्षमवाप्स्यसि॥ ९० ॥जो असमर्थ व्यक्ति है उसे चाहिये कि वह प्रथम भावना अर्थात् वैष्णवी भावनाका अवलम्बन ग्रहण करे—ऐसा वेदका मत है। इसलिये (इन्द्रद्युम्न! तुम) समस्त प्रयत्नोंके द्वारा सम्पूर्ण संसारके स्वामी भगवान् विष्णुकी आराधना करो, उनमें ही निष्ठा रखो और उन्हींका आश्रय ग्रहण कर उन्हींके शरणागत हो जाओ, इससे तुम मोक्ष प्राप्त करोगे॥ ८९-९०॥
इन्द्रद्युम्न उवाच<br>किं तत् परतरं तत्त्वं का विभूतिर्जनार्दन।<br>किं कार्यं कारणं कस्त्वं प्रवृत्तिश्चापि का तव॥ ९१ ॥इन्द्रद्युम्न बोले— हे जनार्दन! वह परात्पर तत्त्व क्या है, विभूति क्या है? कार्य क्या है और कारण क्या है? आप कौन हैं? और आपकी प्रवृत्ति क्या है? ॥ ९१ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>परात्परतरं तत्त्वं परं ब्रह्मैकमव्ययम्।<br>नित्यानन्दं स्वयंज्योतिरक्षरं तमसः परम्॥ ९२ ॥<br><br>ऐश्वर्यं तस्य यन्नित्यं विभूतिरिति गीयते।<br>कार्यं जगत्तथाव्यक्तं कारणं शुद्धमक्षरम्॥ ९३ ॥<br><br>अहं हि सर्वभूतानामन्तर्यामीश्वरः परः।<br>सर्गस्थित्यन्तकर्तृत्वं प्रवृत्तिमर्म गीयते॥ ९४ ॥<br><br>एतद् विज्ञाय भावेन यथावदखिलं द्विज।<br>ततस्त्वं कर्मयोगेन शाश्वतं सम्यगर्चय॥ ९५ ॥श्रीभगवान् बोले— वह परसे परतर तत्त्व एकमात्र अखण्ड परम ब्रह्म ही है। वह नित्य आनन्दस्वरूप है, स्वयं प्रकाशमान है, अविनाशी है और तम (अन्धकार)- से सर्वथा परे है। उस परमात्माका जो नित्य रहनेवाला ऐश्वर्य है, वही विभूति नामसे कहा जाता है। यह संसार ही (परमात्माका) कार्यरूप है और अविनाशी विशुद्ध अव्यक्त तत्त्व ही (इस संसारका) कारणरूप है। मैं ही समस्त प्राणियोंमें रहनेवाला अन्तर्यामी ईश्वर हूँ। सृष्टि, पालन और संहार ही मेरी प्रवृत्ति कही जाती है। हे द्विज! इन सभी बातोंको यथार्थरूपसे जानकर तुम कर्मयोगके द्वारा श्रद्धाभावसे (उस) सनातन (ईश्वर)- की भलीभाँति अर्चना करो॥ ९२-९५॥
इन्द्रद्युम्न उवाच<br>के ते वर्णाश्रमाचारा यैः समाराध्यते परः।<br>ज्ञानं च कीदृशं दिव्यं भावनात्रयसंस्थितम्॥ ९६ ॥<br><br>कथं सृष्टमिदं पूर्वं कथं संह्रियते पुनः।<br>कियत्यः सृष्टयो लोके वंशा मन्वन्तराणि च।<br>कानि तेषां प्रमाणानि पावनानि व्रतानि च॥ ९७ ॥<br><br>तीर्थान्यर्कादिसंस्थानं पृथिव्यायामविस्तरे।<br>कति द्वीपाः समुद्राश्च पर्वताश्च नदीनदाः।<br>ब्रूहि मे पुण्डरीकाक्ष यथावदधुनाखिलम्॥ ९८ ॥इन्द्रद्युम्नने कहा— (भगवन्!) वर्णों तथा आश्रमोंके वे कौनसे पालनीय नियम हैं, जिनसे (उस) परतत्त्वकी आराधना की जाती है और वह दिव्य ज्ञान कैसा है जो तीन भावनाओंसे युक्त है? (परमात्माने) पूर्वकालमें इस (संसार)-की सृष्टि कैसे की और फिर कैसे इसका संहार होता है, लोकमें कितनी सृष्टियाँ हैं, कितने वंश हैं, कितने मन्वन्तर हैं। उनके कितने प्रमाण हैं और पवित्र व्रत तथा तीर्थ कौन-से हैं। सूर्य आदि ग्रहोंकी स्थिति कैसी है, पृथ्वीकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है, कितने द्वीप, समुद्र, पर्वत हैं और कितने नद हैं और कितनी नदियाँ हैं, हे पुण्डरीकाक्ष! इस समय यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताइये॥ ९६-९८॥
श्रीकूर्म उवाच<br>एवमुक्तोऽथ तेनाहं भक्तानुग्रहकाम्यया।<br>यथावदखिलं सर्वमवोचं मुनिपुंगवाः॥ ९९ ॥श्रीकूर्मने कहा— हे श्रेष्ठ मुनियो! उस इन्द्रद्युम्नके द्वारा मुझसे इस प्रकार कहे जानेपर भक्तोंपर अनुकम्पा करनेकी कामनासे मैंने वे सभी बातें विस्तारसे ठीक-ठीक उसे बतला दीं॥ ९९॥

२० * कूर्मपुराण *


व्याख्यायाशेषमेवेदं यत्पृष्टोऽहं द्विजेन तु।<br>अनुगृह्य च तं विप्रं तत्रैवान्तर्हितोऽभवम्॥ १००॥इस प्रकार उस ब्राह्मण इन्द्रद्युम्नने जो-जो भी मुझसे पूछा था, वह सब विस्तारसे बतलाकर और उसपर कृपा करके मैं वहीं अन्तर्धान हो गया॥ १००॥
सोऽपि तेन विधानेन मदुक्तेन द्विजोत्तमः।<br>आराधयामास परं भावपूतः समाहितः॥ १०१॥उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने भी मेरे द्वारा बताये गये विधानसे अत्यन्त पवित्र भावनासे समाहित-चित्त होकर परम तत्त्वकी उपासना की। उसने अपने स्त्री-पुत्र आदिका मोह छोड़ दिया, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित हो गया, किसी भी वस्तुका संग्रह करना सर्वथा त्याग कर अपरिग्रही हो गया और सभी कर्मोंका परित्याग कर उसने परम वैराग्यका आश्रय ग्रहण किया। अपनी आत्मामें ही परमात्माका दर्शन करके और अपनी आत्मामें ही सम्पूर्ण विश्वका अनुभव कर अक्षर-तत्त्व-सम्बन्धी अन्तिम ब्राह्मी भावनाको प्राप्त किया, जिसके कारण उसे उस दुर्लभ परम योगकी प्राप्ति हुई। इस योगसे ही उस अद्वितीय तत्त्वका साक्षात्कार होता है जिसकी अभिलाषा निद्रात्यागी, श्वासजयी, मोक्षार्थी पुरुष भी करते हैं॥ १०१-१०४॥
त्यक्त्वा पुत्रादिषु स्नेहं निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः।<br>संन्यस्य सर्वकर्माणि परं वैराग्यमाश्रितः॥ १०२॥
आत्मन्यात्मानमन्वीक्ष्य स्वात्मन्येवाखिलं जगत्।<br>सम्प्राप्य भावनामन्त्यां ब्राह्मीमक्षरपूर्वकाम्॥ १०३॥
अवाप परमं योगं येनैकं परिपश्यति।<br>यं विनिद्रा जितश्वासाः कांक्षन्ते मोक्षकांक्षिणः॥ १०४॥
ततः कदाचिद् योगीन्द्रो ब्रह्माणं द्रष्टुमव्ययम्।<br>जगामादित्यनिर्देशान्मानसोत्तरपर्वतम् ।<br>आकाशेनैव विप्रेन्द्रो योगैश्वर्यप्रभावतः॥ १०५॥इसके बाद किसी दिन वह ब्राह्मणश्रेष्ठ योगीन्द्र इन्द्रद्युम्न भगवान् सूर्यके निर्देशसे अव्यय ब्रह्मका दर्शन करनेके लिये अपनी योग-सिद्धिके प्रभावसे प्रादुर्भूत सूर्यके समान प्रकाशमान श्रेष्ठ विमानमें चढ़कर आकाशमार्गसे मानसरोवरके उत्तरमें स्थित पर्वतपर गया। उस योगिराज इन्द्रद्युम्नको आकाशमार्गमें जाते हुए देखकर देवों, गन्धर्वों तथा अप्सराओंका समूह भी उसके पीछे-पीछे गया और अन्य सिद्ध तथा ब्रह्मर्षियोंने भी उसका अनुसरण किया॥ १०५-१०६॥
विमानं सूर्यसंकाशं प्रादुर्भूतमनुत्तमम्।<br>अन्वगच्छन् देवगणा गन्धर्वाप्सरसां गणाः।<br>दृष्ट्वान्ये पथि योगीन्द्रं सिद्धा ब्रह्मर्षयो ययुः॥ १०६॥
ततः स गत्वा तु गिरि विवेश सुरवन्दितम्।<br>स्थानं तद् योगिभिर्जुष्टं यत्रास्ते परमः पुमान्॥ १०७॥तदनन्तर वहाँ जाकर इन्द्रद्युम्नने देवताओंद्वारा वन्दित तथा योगियोंद्वारा सेवित पर्वतके उस स्थानपर प्रवेश किया, जहाँ परम पुरुष परमात्मा प्रतिष्ठित रहते हैं। दस हजार सूर्योंके प्रकाशके समान प्रकाशित उस श्रेष्ठ स्थानपर पहुँचकर (इन्द्रद्युम्नने) देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य (उस स्थानके) अन्तर्गृहमें प्रवेश किया॥ १०७-१०८॥
सम्प्राप्य परमं स्थानं सूर्यायुतसमप्रभम्।<br>विवेश चान्तर्भवनं देवानां च दुरासदम्॥ १०८॥
विचिन्तयामास परं शरण्यं सर्वदेहिनाम्।<br>अनादिनिधनं देवं देवदेवं पितामहम्॥ १०९॥(वहाँ पहुँचकर उसने) सभी प्राणियोंके परम शरणदाता, आदि-अन्तसे रहित, देवाधिदेव पितामह ब्रह्मदेवका ध्यान किया। इसके बाद उसके ध्यान करते ही वहाँ परमात्माका प्रकाश प्रादुर्भूत हुआ। इन्द्रद्युम्नने
ततः प्रादुर्भूत् तस्मिन् प्रकाशः परमात्मनः।<br>तन्मध्ये पुरुषं पूर्वमपश्यत् परमं पदम्॥ ११०॥
* अध्याय १ *२१
महान्तं तेजसो राशिमगम्यं ब्रह्मविद्विषाम्।<br>चतुर्मुखमुदाराङ्गमर्चिभिरुपशोभितम् ॥ १११॥उस प्रकाशपुञ्जके मध्यमें महान् तेजकी राशिके रूपमें ब्रह्मविद्वेषियोंके लिये अगम्य, परमपदस्वरूप पूर्व पुरुषका दर्शन किया, जो चार मुखवाले थे, जिनके सभी अङ्ग शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे और प्रकाशकी किरणोंसे सुशोभित थे॥ १०९—१११॥
सोऽपि योगिनमन्वीक्ष्य प्रणमन्तमुपस्थितम्।<br>प्रत्युद्गम्य स्वयं देवो विश्वात्मा परिषस्वजे ॥ ११२॥समीपमें आये प्रणाम करते हुए योगी इन्द्रद्युम्नको देखकर वह विश्वात्मा ब्रह्मदेव स्वयं भी उसके समीपमें गये और उसको अपने हृदयसे लगाया।
परिष्वक्तस्य देवेन द्विजेन्द्रस्याथ देहतः।<br>निर्गत्य महती ज्योत्स्ना विवेशादित्यमण्डलम्।<br>ऋग्यजुःसामसंज्ञं तत् पवित्रममलं पदम्॥ ११३॥ब्रह्मदेवके द्वारा आलिङ्गन करते ही उस ब्राह्मणश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नके शरीरसे एक महान् प्रकाश निकला, जो आदित्य-मण्डलमें प्रविष्ट हो गया। वह पवित्र निर्मल पद (आदित्य-मण्डल) ऋक्-यजुः एवं साम नामवाला है। जिस स्थानमें हव्य (देवताओंको प्राप्त होनेवाला हवनीय द्रव्य) तथा कव्य (पितरोंको प्राप्त कराया जानेवाला श्राद्धीय पदार्थ)-का उपभोग करनेवाले
हिरण्यगर्भो भगवान् यत्रास्ते हव्यकव्यभुक्।<br>द्वारं तद् योगिनामाद्यं वेदान्तेषु प्रतिष्ठितम्।<br>ब्रह्मतेजोमयं श्रीमन्निष्ठा चैव मनीषिणाम्॥ ११४॥भगवान् हिरण्यगर्भ निवास करते हैं। वह (स्थान) वेदान्तमें प्रतिपादित योगी जनोंका आद्य प्रवेश-द्वार है, ब्रह्मतेजसे सम्पन्न है, श्रीयुक्त है और वह मनीषियोंकी निष्ठा भी है॥ ११२—११४॥
दृष्टमात्रो भगवता ब्रह्मणार्चिर्मयो मुनिः।<br>अपश्यदैश्वरं तेजः शान्तं सर्वत्रगं शिवम्॥ ११५॥भगवान् ब्रह्माके देखते ही देखते वह मुनि इन्द्रद्युम्न तेजसे सम्पन्न हो गया और उसने सर्वत्र व्याप्त, परम कल्याणकारी, अत्यन्त शान्त स्वात्मस्वरूप, अक्षर,
स्वात्मानमक्षरं व्योम तद् विष्णोः परमं पदम्।<br>आनन्दमचलं ब्रह्म स्थानं तत्पारमेश्वरम्॥ ११६॥व्योम उस परमेश्वर-सम्बन्धी तेजको देखा। वह विष्णुका परम पद है। केवल आनन्दरूप, अचल वह ब्रह्मका स्थान परमेश्वररूप है। सभी प्राणियोंको अपनी ही आत्मा
सर्वभूतात्मभूतः स परमैश्वर्यमास्थितः।<br>प्राप्तवानात्मनो धाम यत्तन्मोक्षाख्यमव्ययम्॥ ११७॥समझनेवाला वह योगी इन्द्रद्युम्न परम ऐश्वर्यमें प्रतिष्ठित हो गया और उसने 'मोक्ष' पदसे कहे जानेवाले उस अव्यय परमात्मधामको प्राप्त कर लिया॥ ११५—११७॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वर्णाश्रमविधौ स्थितः।<br>समाश्रित्यान्तिमं भावं मायां लक्ष्मीं तरेद् बुधः ॥ ११८॥इसलिये सभी प्रयत्नोंसे वर्ण एवं आश्रमके नियमोंका पालन करते हुए अन्तिम भावका आश्रय ग्रहण कर विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि वह लक्ष्मीरूप मायासे पार उतरे॥ ११८॥
सूत उवाच<br>व्याहता हरिणा त्वेवं नारदाद्या महर्षयः।<br>शक्रेण सहिताः सर्वे पप्रच्छुर्गुरुडध्वजम् ॥ ११९॥सूतजी बोले—हरिके द्वारा इस प्रकार कहनेपर इन्द्रसहित नारद आदि सभी महर्षियोंने गरुडध्वज भगवान् विष्णुसे पूछा— ॥ ११९॥
ऋषय ऊचुः<br>देवदेव हृषीकेश नाथ नारायणामल।<br>तद् वदाशेषमस्माकं यदुक्तं भवता पुरा॥ १२०॥<br>इन्द्रद्युम्नाय विप्राय ज्ञानं धर्मादिगोचरम्।<br>शुश्रूशुश्राप्ययं शक्रः सखा तव जगन्मय॥ १२१॥ऋषियोंने कहा—हे देवाधिदेव! हे हृषीकेश! हे नाथ! हे अमलरूप नारायण! जो आपने पूर्वकालमें ब्राह्मण इन्द्रद्युम्नसे धर्मादि-सम्बन्धी ज्ञान कहा था, वह सब आप हमें बतलायें। हे जगन्मूर्त्ति! ये आपके सखा इन्द्र भी सुननेके लिये इच्छुक हैं॥ १२०-१२१॥
२२* कूर्मपुराण *

ततः स भगवान् विष्णुः कूर्मरूपी जनार्दनः ।
रसातलगतो देवो नारदाद्यैर्महर्षिभिः ॥ १२२ ॥

पृष्टः प्रोवाच सकलं पुराणं कौर्ममुत्तमम् ।
संनिधौ देवराजस्य तद् वक्ष्ये भवतामहम् ॥ १२३ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं मोक्षप्रदं नृणाम् ।
पुराणश्रवणं विप्राः कथनं च विशेषतः ॥ १२४ ॥

श्रुत्वा चाध्यायमेवैकं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
उपाख्यानमथैकं वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १२५ ॥

इदं पुराणं परमं कौर्मं कूर्मस्वरूपिणा ।
उक्तं देवाधिदेवेन श्रद्धातव्यं द्विजातिभिः ॥ १२६ ॥ | इसके बाद (सूतजीने कहा—) रसातलमें स्थित कूर्मरूपी जनार्दन भगवान् विष्णुदेवने नारदादि महर्षियोंके द्वारा (इस प्रकार) पूछे जानेपर जिस श्रेष्ठ सम्पूर्ण कूर्मपुराणको देवराज इन्द्रके समीप सुनाया था, मैं उसे आप लोगोंको सुनाता हूँ॥ १२२-१२३॥
हे ब्राह्मणो! (इस कूर्म) पुराणका सुनना मनुष्योंके लिये यशकी प्राप्ति करानेवाला, दीर्घ आयु प्रदान करानेवाला, पुण्य प्रदान करानेवाला, कृतकृत्य करानेवाला तथा मोक्ष प्रदान करानेवाला है। इस पुराणके वाचन करनेकी तो और भी विशेष महिमा है। इसके मात्र एक अध्यायके सुननेसे ही सभी प्रकारके पापोंसे (व्यक्ति) मुक्त हो जाता है। अधिक क्या कहा जाय, केवल एक उपाख्यानके श्रवणमात्रसे ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। इस श्रेष्ठ कूर्मपुराणको कूर्मरूपधारी देवाधिदेव स्वयं भगवान् विष्णुने कहा है, द्विजातियोंको इसपर अवश्य श्रद्धा रखनी चाहिये॥ १२४—१२६॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें पहला अध्याय समाप्त हुआ॥ १ ॥


दूसरा अध्याय

विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माका प्रादुर्भाव, रुद्र तथा लक्ष्मीका प्राकट्य, ब्रह्माद्वारा नौ मानस पुत्रों तथा चार वर्णोंकी सृष्टि, वेदज्ञानकी महिमा, ब्रह्म-सृष्टिका वर्णन, वर्ण और आश्रमोंके सामान्य तथा विशेष धर्म, गृहस्थाश्रमका माहात्म्य, चतुर्विध पुरुषार्थोंमें धर्मकी महिमा, आश्रमोंका द्वैविध्य, त्रिदेवोंका पूजन, त्रिपुण्ड्र, तिलक तथा भस्म-धारणकी महिमा

श्रीकूर्म उवाचश्रीकूर्मने कहा—समस्त ऋषिगणो! संसारके कल्याणके लिये आप लोगोंने जो कुछ मुझसे पूछा है और इन्द्रद्युम्नके प्रति मैंने जो कुछ कहा है, वह सब मैं बतला रहा हूँ, आप लोग सुनें॥ १ ॥
शृणुध्वमृषयः सर्वे यत्पृष्टोऽहं जगद्धितम् ।<br>वक्ष्यमाणं मया सर्वमिन्द्रद्युम्नाय भाषितम् ॥ १ ॥
भूतैर्भव्यैर्भविष्यद्भिश्चरितैरुपबृंहितम् ।<br>पुराणं पुण्यदं नृणां मोक्षधर्मानुकीर्तनम् ॥ २ ॥इस (कूर्म) पुराणमें भूत, वर्तमान एवं भविष्यकालमें हुए वृत्तान्तोंको विस्तारसे बतलाया गया है। यह पुराण मनुष्योंको पुण्य प्रदान करनेवाला और मोक्षधर्मका वर्णन करनेवाला है॥ २॥
अहं नारायणो देवः पूर्वमासं न मे परम् ।<br>उपास्य विपुलां निद्रां भोगिशय्यां समाश्रितः ॥ ३ ॥मैं ही नारायण देवरूपसे पूर्वकालमें विद्यमान था। मेरे अतिरिक्त और कोई दूसरा न था॥ ३॥
  • अध्याय २ * २३

चिन्तयामि पुनः सृष्टिं निशान्ते प्रतिबुध्य तु।<br>ततो मे सहसोत्पन्नः प्रसादो मुनिपुंगवाः॥ ४ ॥मैं प्रगाढ़ योगनिद्राका आश्रय लेकर शेष-शय्यामें पड़ा था। मुनिश्रेष्ठो! रात्रिके बीत जानेपर जागकर मैं पुनः सृष्टिविषयक चिन्तन करने लगा। उसी समय अकस्मात् मुझे प्रसन्नता प्राप्त हुई॥ ४॥
चतुर्मुखस्ततो जातो ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>तदन्तरेऽभवत् क्रोधः कस्माच्चित् कारणात् तदा॥ ५॥तदुपरान्त समस्त संसारके पितामह चतुर्मुख ब्रह्माका आविर्भाव हुआ। इसी बीच किसी कारणसे अकस्मात् उस समय क्रोध उत्पन्न हुआ। हे मुनिश्रेष्ठो! (उस समय) क्रोधात्मज अपने तेजके द्वारा मानो त्रैलोक्यका संहार करनेके लिये हाथमें त्रिशूल धारण किये, तीन नेत्रोंवाले सूर्यके समान प्रकाशमान महेश्वर रुद्रदेव वहाँ उत्पन्न हुए॥ ५-६॥
आत्मनो मुनिशार्दूलास्तत्र देवो महेश्वरः।<br>रुद्रः क्रोधात्मजो जज्ञे शूलपाणिस्त्रिलोचनः।<br>तेजसा सूर्यसंकाशस्त्रैलोक्यं संहरन्निव॥ ६ ॥
ततः श्रीरभवद् देवी कमलायतलोचना।<br>सुरूप सौम्यवदना मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥ ७ ॥तदनन्तर कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली, सुन्दर रूप एवं प्रसन्न मुखवाली तथा सभी प्राणियोंको मोहित करनेवाली देवी लक्ष्मी उत्पन्न हुईं। पवित्र मुस्कानवाली, अत्यन्त प्रसन्न, मङ्गलमयी, अपनी महिमामें प्रतिष्ठित, दिव्य कान्तिसे सुसम्पन्न, दिव्य माल्य आदिसे सुशोभित, अविनाशिनी महामाया मूलप्रकृतिरूपा वे नारायणी अपने तेजसे इस (संसार)-को आपूरित करती हुईं मेरे समीपमें आकर बैठ गयीं। उन्हें देखकर संसारके स्वामी भगवान् ब्रह्मा मुझसे कहने लगे—हे माधव! सम्पूर्ण प्राणियोंको मोहित करनेके लिये इन सुरूपिणी (देवी)-को नियुक्त करो, जिससे यह मेरी सृष्टि और भी अधिक बढ़ने लगे॥ ७-१०॥
शुचिस्मिता सुप्रसन्ना मङ्गला महिमास्पदा।<br>दिव्यकान्तिसमायुक्ता दिव्यमाल्योपशोभिता॥ ८ ॥
नारायणी महामाया मूलप्रकृतिरव्यया।<br>स्वधाम्ना पूरयन्तीदं मत्पार्श्वं समुपाविशत् ॥ ९ ॥
तां दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा मामुवाच जगत्पतिः।<br>मोहायाशेषभूतानां नियोजय सुरूपिणीम्।<br>येनेयं विपुला सृष्टिर्वर्धते मम माधव॥ १०॥
तथोक्तोऽहं श्रियं देवीमब्रुवं प्रहसन्निव।<br>देवीदमखिलं विश्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>मोहयित्वा ममादेशात् संसारे विनिपातय॥ ११॥ब्रह्माके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मैंने मुसकराते हुए देवी लक्ष्मीसे कहा—हे देवि! मेरे आदेशसे तुम देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसे युक्त सम्पूर्ण विश्वको (अपनी मायासे) मोहित कर संसारमें प्रवृत्त करो। (किंतु) जो ज्ञानयोगमें निरत हैं, जितेन्द्रिय हैं, ब्रह्मनिष्ठ हैं, ब्रह्मवादी हैं, क्रोधशून्य हैं तथा सत्यपरायण हैं—ऐसे लोगोंको दूरसे ही छोड़ देना॥ ११-१२॥
ज्ञानयोगरतान् दान्तान् ब्रह्मनिष्ठान् ब्रह्मवादिनः।<br>अक्रोधनान् सत्यपरान् दूरतः परिवर्जय॥ १२॥
ध्यायिनो निर्ममान् शान्तान् धार्मिकान् वेदपारगान्।<br>जापिनस्तापसान् विप्रान् दूरतः परिवर्जय॥ १३ ॥ध्यान करनेवाले, ममतारहित, शान्त, धार्मिक, वेदमें पारंगत, जप-परायण और तपस्वी विप्रोंको दूरसे ही छोड़ देना। वेद एवं वेदान्तके विशेष ज्ञानसे जिनके सम्पूर्ण संशय सर्वथा दूर हो गये हैं ऐसे तथा बड़े-बड़े यज्ञोंमें परायण द्विजॉंको दूरसे ही छोड़ देना। जो जप, होम, यज्ञ एवं स्वाध्यायके द्वारा देवाधिदेव महेश्वरका यजन करते हैं, उनका प्रयत्नपूर्वक दूरसे ही परित्याग कर देना॥ १३-१५॥
वेदवेदान्तविज्ञानसंछिन्नाशेषसंशयान् ।<br>महायज्ञपरान् विप्रान् दूरतः परिवर्जय॥ १४॥
ये यजन्ति जपैर्होमैर्देवदेवं महेश्वरम्।<br>स्वाध्यायेनेज्यया दूरात् तान् प्रयत्नेन वर्जय॥ १५॥

२४ * कूर्मपुराण *

भक्तियोगसमायुक्तानीश्वरार्पितमानसान् ।<br>प्राणायामादिषु रतान् दूरात् परिहरामलान् ॥ १६ ॥जो भक्तियोगमें लगे हुए हैं, जिन्होंने अपना चित्त भगवान्‌को अर्पण कर दिया है और जो प्राणायाम (धारणा, ध्यान तथा समाधि) आदिमें निरत हैं, ऐसे अमलात्माओंका दूरसे ही त्याग कर देना। जिनका मन
प्रणवासक्तमनसो रुद्रजप्यपरायणान् ।<br>अथर्वशिरसोऽध्येतॄन् धर्मज्ञान् परिवर्जय ॥ १७ ॥प्रणवोपासनामें आसक्त है, जो रुद्र (मन्त्रों)-का जप करनेवाले हैं और जो अथर्वशिरस्‌के अध्येता हैं, उन धर्मज्ञ व्यक्तियोंको छोड़ देना। और अधिक क्या कहा जाय, जो अपने धर्मका पालन करनेवाले हैं, ईश्वरकी
बहुनात्र किमुक्तेन स्वधर्मपरिपालकान् ।<br>ईश्वराराधनरतान् मन्नियोगान्न मोहय ॥ १८ ॥आराधनामें सतत रत हैं, (हे देवि!) उन्हें मेरे आदेशसे कदापि मोहित न करना ॥ १६–१८ ॥
एवं मया महामाया प्रेरिता हरिवल्लभा ।<br>यथादेशं चकारासौ तस्माल्लक्ष्मीं समर्चयेत् ॥ १९ ॥इस प्रकार मेरे द्वारा प्रेरित हरिप्रिया महामायाने जैसी मेरी आज्ञा थी, उसी प्रकार किया, इसलिये (उन) लक्ष्मीकी आराधना करनी चाहिये। भगवत्पत्नी (देवी महालक्ष्मी) पूजा किये जानेपर विपुल ऐश्वर्य, पुष्टि,
श्रियं ददाति विपुलां पुष्टिं मेधां यशो बलम् ।<br>अर्चिता भगवत्पत्नी तस्माल्लक्ष्मीं समर्चयेत् ॥ २० ॥मेधा, यश एवं बल प्रदान करती हैं, इसलिये लक्ष्मीकी भलीभाँति पूजा करनी चाहिये ॥ १९-२० ॥
ततोऽसृजत् स भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।<br>चराचराणि भूतानि यथापूर्वं ममाज्ञया ॥ २१ ॥तदनन्तर लोकपितामह भगवान्‌ने मेरी आज्ञासे पूर्वकी भाँति ही समस्त चराचर भूत—प्राणियोंकी सृष्टि की। योगविद्याके प्रभावसे ब्रह्माजीने मरीचि, भृगु,
मरीचिभृग्वङ्गिरसः पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ।<br>दक्षमत्रिं वसिष्ठं च सोऽसृजद् योगविद्यया ॥ २२ ॥अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठको उत्पन्न किया ॥ २१–२२ ॥
नवैते ब्रह्मणः पुत्रा ब्रह्माणो ब्राह्मणोत्तमाः ।<br>ब्रह्मवादिन एवैते मरीच्याद्यास्तु साधकाः ॥ २३ ॥हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! ब्रह्माके मरीचि आदि ये नौ ‘ब्रह्माण’–संज्ञक पुत्र साधक हैं, ब्रह्मवादी हैं। पितामह विभु देव (ब्रह्मा)–ने मुखसे ब्राह्मणों तथा भुजासे
ससर्ज ब्राह्मणान् वक्त्रात् क्षत्रियांश्च भुजाद् विभुः ।<br>वैश्यानूरुद्वयाद् देवः पादाच्छूद्रान् पितामहः ॥ २४ ॥क्षत्रियोंकी सृष्टि की। दोनों जंघाओंसे वैश्योंको तथा पैरसे शूद्रोंको उत्पन्न किया। ब्रह्माने यज्ञकी निष्पत्ति एवं सभी वेदोंकी रक्षाके लिये शूद्रके अतिरिक्त (अन्य सभी
यज्ञनिष्पत्तये ब्रह्मा शूद्रवर्जं ससर्ज ह ।<br>गुप्तये सर्ववेदानां तेभ्यो यज्ञो हि निर्बभौ ॥ २५ ॥वर्णोंकी) सृष्टि की, क्योंकि उनसे यज्ञका निर्वाह होता है ॥ २३–२५ ॥
ऋचो यजूंषि सामानि तथैवाथर्वणानि च ।<br>ब्रह्मणः सहजं रूपं नित्यैषा शक्तिरव्यया ॥ २६ ॥ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्ववेद ब्रह्माके सहज स्वरूप हैं और यह नित्य अव्यय शक्ति हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रारम्भमें आदि और अन्तसे रहित वेदमयी
अनादिनिधना दिव्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।<br>आदौ वेदमयी भूता यतः सर्वाः प्रवृत्तयः ॥ २७ ॥दिव्य वाग्रूपी शक्तिको उत्पन्न किया, जिसके द्वारा सभी व्यवहार होते हैं। पृथ्वीपर इन (वेदों)-से भिन्न जो कोई भी शास्त्र हैं उनमें धीर पुरुषका मन नहीं
अतोऽन्यानि तु शास्त्राणि पृथिव्यां यानि कानिचित् ।<br>न तेषु रमते धीरः पाषण्डी तेन जायते ॥ २८ ॥लगता क्योंकि ऐसे वेदातिरिक्त ग्रन्थोंके अध्ययनसे मनुष्य पाखंडी हो जाता है ॥ २६–२८ ॥