माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३१२ ) माधवनिदान ।
( ३१२ ) माधवनिदान । असाध्य लक्षण । सर्व एव प्रतिश्याया नरस्याप्रतिकारिणः । दुष्टतां यान्ति कालेन तदासाध्या भवन्ति च ॥ २७॥ मूर्च्छन्ति कृमयश्चात्र श्वेताः स्निग्धास्तथाऽणवः । कृमिजो यः शिरोरोगस्तुल्यं तेनास्य लक्षणम् ॥ २८ ॥ सर्व पीनस औषधी न करनेसे असाध्य होते हैं, इसमें नाकमें कीडे पड जायँ वे कृमि सफेद और चिकने और बारीक होते हैं । कृमिज शिरोरोगोंके सदृश लक्षण होयँ, कृमिज शिरोरोगके लक्षण शिरोरोगमें कह आये हैं ॥ प्रतिश्याय और विकारोंको भी करता है, उनको कहते हैं- बाधिर्यमान्ध्यमघ्रात्वं घोरांश्च नयनामयान् । शोथाग्निससादकासादीन् वृद्धाः कुर्वन्ति पीनसाः ॥ २९ ॥ पीनस बढनेसे बहरा होजाय, मन्द दीखे, वास आवे नहीं, भयंकर नेत्र रोग होय, सूजन मंदाग्नि खांसी इत्यादि विकार होते हैं ॥ सुश्रुतमें नासिकाके ३१ रोग कहे हैं और इस जगह पीनससे लेकर प्रतिश्या- यपर्यन्त १५ रोग कहे हैं, बाकी १६ रोगोंको संख्यापूरणके वास्ते लिखते हैं ॥ अर्बुदं सप्तधा शोथाश्चत्वारोऽर्शश्चतुर्विधम् । चतुर्विधं रक्तपित्तमुक्तं घ्राणेऽपि तद्विदुः ॥ ३० ॥ सात प्रकारके अर्बुद रोग, चार प्रकारके शोथ ( सूजन ), चार प्रकारके अर्श और चार प्रकारके रक्तपित्त ये पूर्वोक्त कहे रोग सोलह होते हैं । वात, पित्त, कफ, रुधिर, मांस, मेदकरके छः हुए और सातवां शालाक्यसिद्धांतके मतसे सन्निपातका ऐसे सात प्रकारके अर्बुदरोग हुए । वात पित्त कफ सन्निपातके भेदसे चार प्रकारकी, ( सूजन ) भई तथा वात पित्त कफ सन्निपातके भेदसे चारही प्रकारकी अर्श ( बवासीर ) और चारही प्रकारका रक्त रक्तपित्तकी समानतासे एक ही जानना पूर्वोक्त पीनससे लेकर प्रतिश्यायपर्यन्त १५ भये और अर्बुदादि १६ हुए ऐसे सब मिलकर नासिकारोग ३१ हुए ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाधुरीभाषाटीकायां नासिकारोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ नेत्ररोगनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( ३१३ ) अथ नेत्ररोगनिदानम् । नेत्ररोगका कारण । उष्णाभितप्तस्य जलप्रवेशाद्दूरेक्षणात्स्वप्नविपर्ययाच्च । स्वेदाद्रजोधूमनिषेवणाच्च छर्देर्विघाताद्वमनातियोगात् ॥ १ ॥ द्रवान्नपानातिनिषेवणाच्च विण्मूत्रवातक्रमनिग्रहाच्च । प्रसक्तसंरोदनशोककोपाच्छिरोभिघातादतिमद्यपानात् ॥ २ ॥ तथा ऋतूनां च विपर्ययेण क्लेशाभिघातादतिमैथुनाच्च । बाष्पग्रहात्सूक्ष्मनिरीक्षणाच्च नेत्रे विकाराञ्जनयंति दोषाः ॥ ३ ॥ गरमीसे तप्त होकर जलमें प्रवेश ( स्नानादि करना ऐसा करनेसे शीतलतासे शरीर व्याप्त होकर शरीरकी गरमी ऊपर चढकर नेत्रके तेजको पराभव करनेसे नेत्ररोग उत्पन्न होता है), दूरकी वस्तुको देखनेसे, दिनमें सोने और रात्रिमें जागनेसे नेत्रमें पसीना जानेसे, बाफ लगनेसे, नेत्रोंमें धूल जानेसे, धुआं जानेसे, वमनके वेगको रोकनेसे, बहुत वमन (रद्द) होनेसे, पतले अन्नपानके अत्यन्त सेवन करनेसे, विष्ठा, मूत्र और अधोवायु इनके वेगको धीरे २ निग्रह (कहिये वेग धारण करने) से, निरन्तर रुदन करनेसे, शोकसे, कोपसे, मस्तकमें चोट लगनेसे, अतिमद्य पान करनेसे, उसी प्रकार ऋतुमें विपर्यय अर्थात् शीत कालमें गरमी और गरमीमें शीतकाल होनेसे, क्लेश कहिये कामादिक दुःख उससे, अभिघात कहिये दुःख होनेसे, अतिमैथुन करनेसे, अश्रुपातके वेग धारण करनेसे और सूक्ष्म पदार्थके अवलोकन करनेसे वातादिदोष नेत्रोंमें रोग पैदा करते हैं ॥ सुश्रुतमें नेत्ररोगकी सम्प्राप्ति इस प्रकार लिखी है- शिरानुसारिभिर्दोषैर्विगुणैरूर्ध्वमाश्रितैः । जायन्ते नेत्रभागेषु रोगाः परमदारुणाः ॥ ४ ॥ १ षट्सप्ततिर्नेत्ररोगा भवन्ति, यदाह सुश्रुतः-ततास्त्रिभिस्त्रिशदुक्तास्ते कफेनाधिकास्त्रयः । रक्तजाः षोडश प्रोक्ताः सर्वजाः पंचविंशतिः । बाह्यौ पुनद्वौ च तथा रोगाः षट्सप्ततिः स्मृताः॥ नेत्रप्रमाणं च सुश्रुतेनोक्तम्-द्विच्यङ्गुलंबाहुल्यं स्वांगुष्ठोदरसम्मितम् । द्वयंगुलं सर्वतः सार्धं भिषङ्नयनबुद्बुदम् ॥
( ३१४ ) माधवनिदान ।
( ३१४ ) माधवनिदान । कुपित हुए वातादि दोष नेत्रोंकी नसोंमें प्राप्त हो नेत्रोंका भाग व्याप्त करनेसे उनमें भयंकर रोग उत्पन्न होता है, ये वात पित्त कफ रुधिर सन्निपात और आगन्तुक इनसे होनेवाले ऐसे नेत्ररोग ( ७६ ) हैं ॥ नेत्ररोगमें प्रायः अभिष्यंद ( नेत्र आना ) होता है इसीसे प्रथम उसको कहते हैं- वातात्पित्तात्कफाद्रक्तादभिष्यन्दश्चतुर्विधः । प्रायेण जायते घोरः सर्वनेत्रामयाकरः ॥ ५ ॥ वात पित्त कफ और रुधिर इनसे चार प्रकारका अभिष्यन्दरोग होता है। इसकी पीडा नष्ट नहीं होय तथा यह अभिष्यन्दरोग सर्व नेत्ररोगों ( अधिमंथादिक ) का उत्पत्तिस्थान जानना । सो सुश्रुतमें लिखा है । ( इस रोगको भाषामें नेत्र दुखना कहते हैं अथवा आंखआई कहते हैं ) ॥ वाताभिष्यन्दके लक्षण । निस्तोदनस्तम्भनरोमहर्षसङ्घर्षपारुष्यशिरोभितापाः । विशुष्कभावः शिशिराश्रुता च वाताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ६ ॥ वादीसे नेत्र दुखने आये होयं उनमें सुई चुभानेकीसी पीडा हो, नेत्रोंके स्तम्भन ( ठहरजाना ), रोमांच नेत्रोंमें रेत गिरनेके समान खटके तथा रूक्ष होय, मस्तकमें पीडा हो, नेत्रोंसे पानी गिरे परन्तु नेत्र सूखेसे रहें और नेत्रोंसे आँसू गिरे वह शीतल हो ॥ पित्ताभिष्यन्दके लक्षण । दाहप्रपाकौ शिशिराभिनन्दा धूमायनं बाष्पसमुच्छ्रयश्च । उष्णाश्रुता पीतकनेत्रता च पित्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ७ ॥ पित्तसे नेत्र दुखने आनेसे उनमें बहुत दाह हो, नेत्र पकजायँ, उनमें शीतल पदार्थ लगानेकी इच्छा हो, नेत्रोंसे धूआं निकले अथवा नेत्रोंमें धूआं जानेकीसी पीडा हो, तथा नेत्रोंसे गरम अश्रु ( आंसू ) बहुत पडें, आंख पीलीसी मालूम पडें ॥ कफजाभिष्यन्दके लक्षण । उष्णाभिनन्दा गुरुताभिशोथः कण्डूपदेहावतिशीतता च । स्रावो बहुः पिच्छिल एव चापि कफाभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ८ ॥ कफसे नेत्र दुखने आये हों उसको गरम वस्तु नेत्रोंमें लगानेसे आराम मालूम हो अर्थात् नेत्रमें सेकसा मालूम हो तथा नेत्र भारी होयँ, सूजन हो, खुजली चले, कीचडसे नेत्र दूषित हों, शीतल हों उनमेंसे स्राव होय, सो गाढा और बहुत होय ॥ १ प्रायेण सर्वे नयनामयास्ते भवन्त्यभिष्यन्दनिमित्तमूलाः । इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३१५ ) रक्ताभिष्यन्दके लक्षण । ताम्राश्रुता लोहितनेत्रता च राज्यः समन्तादतिलोहिताश्च । पित्तस्य लिङ्गानि च यानि तानि रक्ताभिपन्ने नयने भवन्ति ॥ ९ ॥ रक्ताभिष्यन्दसे नेत्रोंसे लाल पानी गिरे, नेत्र लाल होंय, नेत्रोंमें आस पास रेखासी लाललाल दीखे, जो पित्ताभिष्यन्दके लक्षण कहे वे सब लक्षण होवें ॥ अभिष्यन्दसे अधिमन्थकी उत्पत्ति होती है, सो कहते हैं- वृद्धैरेतैरभिष्यन्दैर्नराणामक्रियावताम् । तावन्तस्त्वधिमन्थाः स्युर्नयने तीव्रवेदनाः ॥ १० ॥ इस अभिष्यन्दमें औषधोपचार न करनेसे यह बढकर उतनेही ( चार ) अभि- ष्यन्दरोग नेत्रोंमें प्रगट होंयँ, इससे नेत्रोंमें तीव्र पीडा होय, यह अधिमन्थके सामान्य लक्षण हैं । वेदनाशब्द इस जगह व्यथामात्रका वाचक है, इससे यह प्रगट हुआ कि, वातके अभिष्यन्दसे वातिक अधिमन्थ प्रगट होय, उसमें तीव्र वातज सर्व निस्तोदादि पीडा युक्त होंयँ, इसी प्रकार पित्तकेसे, कफकेसे, रुधिरकेसे पित्त कफ- रुधिरके अधिमन्थ स्वलक्षण करके जानने ॥ उत्पाट्यत इवात्यर्थं नेत्रं निर्मथ्यते तथा । शिरसोऽर्धं च तं विद्यादधिमन्थं स्वलक्षणैः ॥ ११ ॥ दूसरे सामान्य लक्षण-आधे शिरमें उपाडनेकीसी पीडा होय अथवा तोडनेकीसी तथा मथनेकीसी पीडा होय, व्याधिके प्रभावसे आधे शिरमें पीडा हो इसे अधिमन्थ कहते हैं इनके लक्षण वातज अभिष्यन्दके समान जानने ॥ दोषभेदसे कालमर्यादाके लक्षण । हन्याद्दृष्टिं श्लैष्मिकः सप्तरात्राद्योऽधीमन्थो रक्तजः पंचरात्रात् । षड्रात्राद्वा वातिको वै निहन्यान्मिथ्याचारात्पैत्तिकः सद्य एव ॥ १२॥ कफका अधिमन्थ सात दिनमें दृष्टिका नाश करे, रक्तज अधिमन्थ पांच दिनमें, वातिक अधिमन्थ छः ।दिनमें और पैत्तिक अधिमन्थ मिथ्योपचारसे तत्काल ( तीन दिनमें ) दृष्टिका नाशकरे अर्थात् आंख जाती रहे । इस जगह जो कालकी अवधि कही है सो व्याधिके स्वभावसे तथा लंघन प्रलेपादि क्रिया करके तथा अञ्जनानिषे- धके निमित्त कहीं है ॥ नेत्ररोगके सामान्य लक्षण । उदीर्णवेदनं नेत्रं रागोद्रेकसमन्वितम् । घर्षनिस्तोदशूलाश्रुयुक्तमामान्वितं विदुः ॥ १३ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३१६ ) माधवनिदान ।
( ३१६ ) माधवनिदान । जिस नेत्ररोगमें पीडा विशेष होय, लाली बहुत होकर चमका चलें, तथा उसमें घर्ष ( रेत गिरनेसे जैसी पीडा होती है वैसी पीडा ) होय और अर्थात् करकण होय, सुई चुभानेकीसी पीडा होय, शूलसा चले और स्रावयुक्त होवे, उन नेत्रोंको आमयुक्त जानना ॥ अंजन लगानेसे तथा हलका अन्न खानेसे ये लक्षण कहे हैं ॥ निरामके लक्षण । मन्दवेदनता कण्डूः संरम्भाश्रुप्रशान्तता । प्रसन्नवर्णता चाक्ष्णोः संपक्वं दोषमादिशेत् ॥ १४ ॥ नेत्रोंमें पीडा कम होवे, खुजली चले, सूजन मन्द होय, आंसुओंका गिरना होय नेत्रोंका वर्ण स्वच्छ होय, ये दोष पक्क होनेके लक्षण हैं ॥ शोथसहित नेत्रपाकके लक्षण । कण्डूपदेहाश्रुयुतः पक्कोदुम्बरसन्निभः । संरम्भी पच्यते यस्तु नेत्रपाकः स शोफजः । शोथहीनानि लिङ्गानि नेत्रपाके त्वशोथजे ॥ १५ ॥ नेत्रोंमें खुजली तथा लेप और आंसुओंसे युक्त हो और पके गूलरके समान लाल होयँ, ये लक्षण शोथसहित नेत्ररोगके हैं और शोथ ( सूजन ) के बिना जो नेत्र- पाक होय, उसमें शोथको छोडकर सब लक्षण होयँ, यह व्याधि त्रिदोषजन्य होय ॥ हताधिमन्थके लक्षण । उपेक्षणादक्षि यदाऽधिमन्थो वातात्मकः सादयति प्रसह्य । रुजाभिरुग्राभिरसाध्य एष हताधिमन्थः खलु नेत्ररोगः ॥ १६ ॥ वातज अधिमन्थकी उपेक्षा करनेसे वह नेत्रोंको सुखाय देवे, सो मनुष्यके नेत्रोंमें तोद् ( सुईके चुभानेकीसी पीडा ), दाहादि भारी पीडा होय, यह हताधिमंथ नामक नेत्ररोग असाध्य है । इसी रोगको विदेह दृष्टिच्युत्क्षेपणं कहते हैं । अथवा दृष्टिनिर्गम तथा सकलाक्षिशोष भी जानना । यही सुश्रुतकाभी मत है इस रोगसे नेत्र सूखे कम- लके समान हो जाते हैं ॥ १ अन्तर्गतः शिराणां तु यदा तिष्ठति मारुतः । स तदा नयनं प्राप्य शीघ्रं दृष्टिं निरस्यति ॥ तस्यां निरस्यमानायां निर्मथन्निव मारुतः । नयनं निर्वमत्याशु शूलतोदादिमन्थनैः ॥ २ अन्तःशिराणां श्वसनः स्थितो दृष्टिं च प्रक्षिपन् । हताधिमन्थं जनयेत्तमसाध्यं विदुर्बुधाः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ३१७ ) वातपर्ययके लक्षण । वारं वारं च पर्येति भ्रुवौ नेत्रे च मारुतः । रुजश्च विविधास्तीव्रा स ज्ञेयो वातपर्ययः ॥ १७ ॥ वायु क्रमसे कभी कभी भृकुटीमें प्राप्त हो कभी कभी नेत्रोंमें प्राप्त होकर और अनेक प्रकारकी तीव्र पीडा करे उसको वातपर्यय कहते हैं ॥ शुष्काक्षिपाकके लक्षण । यत्कूणितं दारुणरूक्षवर्त्म सन्दह्यते चाविलदर्शनं च । सुदारुणं यत्प्रतिबोधने च शुष्काक्षिपाकोपहतं तदक्षि ॥ १८ ॥ जो नेत्र खुले नहीं अर्थात् संकुचित हो जायँ, जिनकी बाफणी कठिन और रूक्ष होय, जिसकी नेत्रोंमें दाह विशेष होय, यथार्थ दीखे नहीं, जो खोलनेमें बहुत दुःख होय, उन नेत्रोंको शुष्काक्षिपाकनामक रोगसे पीडित जानना । यह रोग रक्तसहित वादीसे होता है सो करालाचार्यने लिखा है ॥ अन्यतोवातके लक्षण । यस्यावटुकर्णशिरोहनुस्थो मन्यागतो वाप्यनिलोऽन्यतो वा । कुर्याद्रुजं वै भ्रुवि लोचने च तमन्यतोवातमुदाहरन्ति ॥ १९ ॥ घाटी ( धार ) कान, मस्तक, ठोढी, मन्या, नाडी इनमें अथवा इतर ठिकाने स्थित जो वायु भृकुटी ( भौंह ) वा नेत्रोंमें तोद भेदादि पीडा करे, इस रोगको अन्यतोवातरोग कहते हैं अर्थात् अन्य स्थानोंमें स्थित होकर अन्य स्थानोंमें पीडा करे इसीसे इसको अन्यतोवातरोग कहते हैं सो विदेहका मत भी है ॥ अम्लाध्युषितके लक्षण । श्यावं लोहितपर्यन्तं सर्वं चाक्षि प्रपच्यते । सदाहशोथं सास्रावमम्लाध्युषितमम्लतः ॥ २० ॥ मध्यमें कुछ नीलवर्ण और आसपास लाल भरा हो ऐसे सर्व नेत्र पकजायँ और उनमें पीले रंगकी फुन्सी होयँ, उनमें दाह होकर सूजन होय, तथा नेत्रोंसे पानी झरे, यह रोग अम्ल खटाई आदि खानेसे होता है । सुश्रुतके मतसे यह रोग पित्तसे होता है, इसको अम्लाध्युषित कहते हैं ॥ १ अथवा शोषयेदक्ष्णोः क्षीणत्तेजोबलादयम् । तत्पद्ममिव संशुष्कमवसीदति लोचनम् ॥ २ कुणितः खरवर्त्माक्षिकृच्छ्रो मीलाविलेक्षणम् । सदाहमस्रजो वाताच्छुष्कपाकान्वितं वदेत् । ३ मन्यानामन्तरे वायुरुत्थितः पृष्ठतोऽपि वा । करोति भेदं निस्तोदं शंखं चाक्ष्णोः स्रवरतथा ॥ तमाहुरन्यतोवातरोगं दृष्टिविदो जनाः ॥ इति ॥
( ३१८ ) माधवनिदान ।
( ३१८ ) माधवनिदान । शिरोत्पातके लक्षण । अवेदना वापि सवेदना वा यस्याक्षिराज्यो हि भवन्ति ताम्राः । मुहुर्विराज्यन्ति च याः सदा दृग्व्याधिः शिरोत्पात इतिप्रदिष्टः ॥२१॥ जिसके नेत्रकी नस पीडासहित अथवा पीडारहित तांबेके समान लाल रंगकी होजायँ और वे सब बराबर अधिकाधिक ( जियादहसे जियादह ) लाल होजायें, इस रोगको शिरोत्पात ( सबलवायु ) कहते हैं। यह रोग रक्तजन्य है ॥ शिराहर्षके लक्षण । मोहाच्छिरोत्पात उपेक्षितस्तु जायेत रोगस्तु शिराप्रहर्षः । ताम्राभमस्रं स्रवति प्रगाढं तथा न शक्नोत्यभिवीक्षितुं च ॥ २२ ॥ अज्ञानकरके शिरोत्पात ( सबल वायु ) की उपेक्षा करनेसे अर्थात् इलाज न करनेसे शिराप्रहर्षरोग होता है उसमें नेत्रोंसे लाल स्वच्छ ऐसे आंसू गिरें और उस रोगीको नेत्रोंसे कुछ दिखाई न देवे ॥ इति सर्वनेत्रगता रोगाः ॥ कृष्णज रोग । अब नेत्रोंके काले रंगका होनेवाले रोग कहते हैं- सव्रणशुक्र लक्षण । निमग्नरूपं तु भवेद्धि कृष्णे सूच्येव विद्धं प्रतिभाति यद्वै । स्रावं स्रवेदुष्णमतीव यच्च तत्सव्रणं शुक्रमुदाहरंति ॥ २३ ॥ नेत्रके काले भागमें शुक्र कहिये फूलसा हो जाय और वह भीतरसे गडासा हो जाय, उसमें सुई चुभानेकीसी पीडा होवे तथा नेत्रोंसे अति गरम और बहुतस स्राव होवे, इस रोगको सव्रणशुक्र कहते हैं, इसमें पीडा बहुत होती है, क्षतमें पीडा होना ठीकही है और नेत्रसरीखे सुकुमार ठिकानेपर तो विशेष पीडा होती है ऐसे भोजविदेहादिकोंका मत है ॥ सव्रणशुक्रके साध्यासाध्य लक्षण । दृष्टेः समीपे न भवेत्त यत्तु न चावगाढं न च संस्रवेद्धि । अवेदनं वा न च युग्मशुक्रं तत्सिद्धिमायाति कदाचिदेव ॥ २४ ॥ जो शुक्र ( फूल ) दृष्टिके समीप होय नहीं और एक त्वचा में होय, बहुत स्रवे ( झरे ) नहीं, जिसम पीडा न होय और एकही स्थानमें दो बूंद ( फूल )
भाषाटीकासमेत । (३१९) न होयँ ऐसा शुक्र कदाचित् अच्छा भी हो जाय परन्तु इनसे विपरीत लक्षण दृष्टिके समीप होना, दूसरी त्वचा में होय, बहुत स्रवे, पीडा होय, एक स्थानमें दो बूंद होयँ यह शुक्र अच्छा नहीं होय ॥ अव्रणशुक्र लक्षण । स्यन्दात्मकं कृष्णगतं सचोषं शंखेन्दुकुन्दप्रतिमावभासम् । वैहायसाभ्रप्रतनु प्रकाशमथाव्रणं साध्यतमं वदंति ॥ २५ ॥ अभिष्यन्दसे उत्पन्न होकर नेत्रोंके काले भागमें चोष कहिये सींग तुमडीकी पीडा युक्त, शंख, चन्द्र, कुन्दपुष्प इनके समान सफेद, आकाशके समान पतला ऐसा जो व्रणरहित शुक्र होय उसको सुखसाध्य कहते हैं ॥ अव्रणशुक्र अवस्थाविशेष करके साध्य होय है, सो कहते हैं- गम्भीरजातं बहलं च शुक्रं चिरोत्थितं वापि वदंति कृच्छ्रम् ॥ २६ ॥ जो शुक्र गंभीर हो अर्थात् दो तीन त्वचाके भीतर हुआ हो तथा मोटा हो उसको कृच्छ्रसाध्य कहते हैं ॥ अव्रण अवस्थाभेद करके असाध्य होता है, उसको कहते हैं- विच्छिन्नमध्यं पिशितावृतं वा चलं शिरासूक्ष्ममदृष्टिकृच्च । द्वित्वग्गतं लोहितमन्ततश्च शिरोत्थितं चापि विवर्जनीयम् ॥ २७ ॥ जो शुक्रके बीचका मांस गिर जाय, इसीसे शुक्रके स्थानमें गडेला हो जाय अथवा इसके विपरीत कहिये पिशितावृत अर्थात् उसके चारों ओर मांस होय, चंचल कहिये एक ठिकाने न रहे, शिराओं करके व्याप्त हों, बारीक हो गया हो, दृष्टि नाश करनेवाला यह 'दृष्टेःसमीपेन भवेत्' इसका उलटा है, दो पटल कहिये पर- दोंके भीतर भया हो, चारों ओरसे लाल हो और बीचमें सफेद और बहुत दिनका शुक्र हो ऐसेको वैद्य त्याग दे ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । उष्णाश्रुपातः पिडिका च नेत्रे यस्मिन्भवेन्मुद्गनिभं च शुक्रम् । तदप्यसाध्यं प्रवदंति केचिदन्यच्च यत्तित्तिरिपक्षतुल्यम् ॥ २८ ॥ जिसके नेत्रोंसे गरम अश्रुपात (आँसू) गिरकर पिडिका उत्पन्न होवे (दो पटलमें शुक्र जानेसे ये लक्षण होते हैं) तथा जिसमें मूंगकी बराबर शुक्र होवे ऐसा नेत्रका शुक्र असाध्य है और जो तीतरके पंखके समान (काले रंगका) होवे उसकी भी कोई २ असाध्य कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३२० ) माधव निदान ।
( ३२० ) माधव निदान । अक्षिपाकात्ययके लक्षण । श्वेतः समाक्रामति सर्वतो हि दोषेण यस्यासितमण्डलं तु । तमक्षिपाकात्ययमक्षिपाकं सर्वात्मकं वर्जयितव्यमाहुः ॥ २९ ॥ नेत्रके कृष्णभागमें दोषोंके योगसे चारों ओर सफेद ( शुक्र ) फैल जावे यह सन्निपातजन्य अक्षिपाकात्ययनामक रोग त्याज्य है ऐसा कहा है ॥ अजकाजातके लक्षण । अजापुरीषप्रतिमो रुजावान् सलोहितो लोहितपिच्छलाश्रु । विगृह्य कृष्णं प्रचयोऽभ्युपैति तच्चाजकाजातमिति व्यवस्येत् ॥३०॥ काले भागमें बकरीके शुष्क विष्ठाके समान, दुखनेवाली, लाल हो और गाढा कुछ कालेंसे आंसू वहे उसको अजकाजात ऐसे जानना चाहिये ॥ इतिकृष्णजरोग ॥ दृष्टिके रोग । पहले पटलमें दोष जानेसे उसके लक्षण । प्रथमे पटले यस्य दोषो दृष्टिं व्यवस्थितः । अव्यक्तानि च रूपाणि कदाचिदथ पश्यति ॥ ३१ ॥ प्रथम पटलमें दोष स्थित होनेसे वह पुरुष अव्यक्तरूप ( घटपटादि पदार्थ ) देखे । दृष्टिका प्रमाण सुश्रुतमें कहा है, यथा- मसूरदलमात्रं तु पंचभूतप्रसादजम् । आधे मसूरदलके समान पञ्चभूत ( पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश ) से प्रगट है । शंका-इस श्लोकमें तो मसूरदलके समान लिखा है फिर आधे मसूरके समान ऐसा अर्थ आपने कैसे किया ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है परन्तु यह अर्थ हमने निमि आचार्य्यके मतसे लिखा है। यथा-" पंचभूतात्मिका दृष्टिर्मसूरार्द्ध- दलोन्मिता " इति । अब कहते हैं कि मण्डल चार हैं सो सुश्रुतमें लिखा है, यथा- तेजोजलाश्रितं बाह्ये तेष्वन्यत्पिशिताश्रितम् । मेदस्तृतीयं पटलमाश्रितं त्वस्थि चापरम् ॥ पञ्चमांशसमं दृष्टेस्तेषां बाहुल्यमिष्यते ॥ ३२ ॥ १ अजकाजातका भेद विदेह दूसरा कहता है । यथा-कृष्णैरक्षणोर्भवेच्छुक्रं छागलीविट्- समप्रभम् । सांद्रपिच्छिलरक्तास्रात्रित्वग्गा त्वजकेति सः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत। (३२१) प्रथम पटल रुधिर और जलाश्चित है, दूसरा पटल पिशित (मांस) के आश्रित है, तीसरा पटल मेदके आश्रित है, चौथा पटल अस्थि (हड्डी) के आश्रित है, इन चारों पटलोंकी बहुलता दृष्टिके पञ्चमभागके समान होती है ॥ द्वितीयपटलस्थित दोषके लक्षण । दृष्टिर्भृशं विह्वलति द्वितीयं पटलं गते । मक्षिका मशकांन्केशाञ्जालकानि च पश्यति ॥ ३३ ॥ मण्डलानि पताकाश्च मरीचीन्कुण्डलानि च । परिप्लवांश्च विविधान्वर्षमभ्रं तमांसि च ॥ ३४ ॥ दूरस्थानि च रूपाणि मन्यते स समीपतः । समीपस्थानि दूरे च दृष्टेर्गोचरविभ्रमात् ॥ यत्नवानपि चात्यर्थं सूचीपाशं न पश्यति ॥ ३५ ॥ दूसरे पटलमें दोषके जानेसे दृष्टि विह्वल होजाय अर्थात् पदार्थोंके देखनेमें असमर्थ होय, उसी प्रकार नेत्रोंके आगे मक्खी मच्छर बाल जाली मंडल पताका किरण कुण्डल मंडूक आदि अनेक प्रकारके जलके समूह वर्षा मेघ (बादल) अन्धकार ये नहीं दीखें, ये दृष्टि विह्वल होनेसे होते हैं और विषयभ्रान्तिसे दूरकी वस्तु समीप दीखे समीपकी दूर दीखे अनेक यत्न करनेसेभी सुईका छिद्र न दीखे ॥ तृतीयपटलगत दोषके लक्षण । ऊर्ध्वं पश्यति नाधस्तात्तृतीयं पटलं गते ॥ ३६ ॥ महांत्यपि च रूपाणि च्छादितानीव चांबरैः । कर्णनासाक्षिहीनानि विकृतानि च पश्यति ॥ ३७ ॥ यथादोषं च रज्येत दृष्टिर्दोषे बलीयसि । अधःस्थे तु समीपस्थं दूरस्थं चोपरिस्थिते ॥ ३८ ॥ पार्श्वस्थिते पुनर्द्दोषे पार्श्वस्थं नैव पश्यति । समंततः स्थिते दोषे सङ्कुलानीव पश्यति ॥ ३९ ॥ दृष्टिमध्यस्थिते दोषे महद् ह्रस्वं च पश्यति । द्विधा स्थिते द्विधा पश्येद्बहुधा वाऽनवस्थिते ॥ दोषे दृष्टिस्थिते तिर्यगेकं वै मन्यते द्विधा ॥ ४० ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३२२ ) माधवनिदान ।
( ३२२ ) माधवनिदान । तीसरे पटलमें दोष जानेसे ऊपरकी वस्तु दीखे, नीचेकी वस्तु नहीं दीखे, जो वस्तु बडी और भव्य होवे, वह वस्त्रसे ढकीसी दीखे, कान नाक और नेत्र इन करके रहित पुरुषोंको देखें, टेढे बांके दीखे और जिस वातादि दोषका रुधिर मांस मेदादिकोंके सहाय होनेसे उनमें जो दोष बलवान् होय उसका जैसा रूप ( रंग ) होवे उसी प्रकारका दीखे अर्थात् जिस जिस दोषका जैसा वर्ण होय वैसा दीखे, दोष नीचे स्थित होयें सो समीपस्थ वस्तु नहीं दीखे और ऊपर दोष स्थित होयें तो दूरकी वस्तु न दीखे और दोष पार्श्व ( पसवाडे ) में स्थित होनेसे पसवाडेकी वस्तु नहीं दीखे और दोष दृष्टिमें सर्वत्र स्थित होवें तो उस पुरुषको सब चीज मिलीसी दीखे, दृष्टिके मध्यमें दोष जानेसे बडी वस्तु छोटी दीखे, दो ठिकाने दोष रहनेसे एक वस्तुकी दो दीखे और दोष अव्यवस्थित अर्थात् एकही स्थानमें स्थित न होनेसे एक वस्तुके दो टुकडेसे दिखलाई देवें, दृष्टिगत दोष तिरछे स्थित होनेसे एक वस्तुके दो टुकडे दिखाई देवे यह स्वरूपोंका दीखना तीसरे ( पटल ) से प्रारम्भ होता है सो विदेहने लिखा भी है ॥ चतुर्थपटलगत तिमिरलक्षण । तिमिराख्यः स वै रोगश्चतुर्थपटलं गतः ॥ ४१ ॥ रुणद्धि सर्वतो दृष्टिं लिङ्गनाशमतः परम् । अस्मिन्नपि तमोभूते नातिरूढे महागदे ॥ ४२ ॥ चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रावन्तरिक्षे च विद्युतः । निर्मलानि च तेजांसि भ्राजिष्णूनि च पश्यति ॥ ४३ ॥ वह तिमिररोग चौथे पटल ( परदे ) में पहुँचनेसे दृष्टिको चारों ओरसे रोकदे इसको कोई आचार्य लिंगनाश कहते हैं और कोई तिमिर कहते हैं । यह अन्धकार- मय रोग अति बढजाय तब उस मनुष्यको आकाशमें चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, बिजली और निर्मल तेज भी यथार्थ नहीं दीखे, तेजके पुंजसे दीखे, लिंगनाशकी निरुक्ति- “ लिंग्यते ज्ञायते अनेनेति लिंगमिन्द्रियशक्तिस्तस्य नाशो यस्मिन्निति लिंगनाशः ” अर्थात् जिसकरके जाने सो कहिये लिंग ( इन्द्रिय ) उसका नाश जिसमें होय उसको लिंगनाश कहते हैं और इसीरोगको लौकिकमें मोतियाबिंदु भी कहते हैं ॥ तृतीयपटलाश्रित काचदोषकी दूसरी संज्ञा । स एव लिंगनाशस्तु नीलिकाकाचसंज्ञितः । १ यथास्वं रज्यते दृष्टिर्दोषैस्त्रिपटलस्थितैः । चतुर्थं पटलं प्राप्य मण्डलं रज्यते तु तैः ॥ इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३२३ ) तीसरे पटलगत काच ( मोतियाबिन्दु की ) उपेक्षा करनेसे वही फिर चौथे पटलमें पहुँचता है, तब उसे लिंगनाश और नीलिका कहते हैं, यह रोग असाध्य है, सो निमि'आचार्य लिखते हैं, परन्तु गदाधर आचार्य कहते हैं कि, विशेष काचको नीलिकाकाच कहते हैं ॥ दोषविशेषकरके रूपका दीखना कैसा होता है ? तत्र वातेन रूपाणि भ्रमन्तीव हि पश्यति । आविलान्यरुणाभानि व्याविद्धानीव मानवः ॥ ४४ ॥ पित्तेनादित्यखद्योतशक्रचापत्तडिद्रुणान् । नृत्यतश्चैव शिखिनः सर्वं नीलं च पश्यति ॥ ४५ ॥ कफेन पश्येद्रूपाणि स्निग्धानि च सितानि च । सलिलप्लावितानीव परिजाड्यानि मानवः ॥ ४६ ॥ पश्येद्रक्तेन रक्तानि तमांसि विविधानि च । ससितान्यथ कृष्णानि पीतान्यपि च मानवः ॥ ४७ ॥ सन्निपातेन चित्राणि विप्लुतानि च पश्यति । बहुधा च द्विधा वापि सर्वाण्येव समंततः ॥ हीनांगान्यधिकांगानि ज्योतींष्यपि च पश्यति ॥ ४८ ॥ बादीसे रोगीको मलीन, कुछ लाल, तिरछी और भ्रमती ऐसी वस्तु दीखे । पित्तसे सूर्य, खद्योत ( पटबीजना ) इन्द्रधनुष, बिजली इनको और नाचनेवाले मोर तथा सर्व वस्तु नीली दीखे। कफसे चिकना और सफेद तथा पानीमें डुबोया हुआ निकालनेके समान और भारी ऐसा रूप दीखे । रुधिरसे लाल और अनेकप्रकारका अन्धकार तथा किंचित् सफेद काली और पीली ऐसी वस्तु दीखे । सन्निपातसे अनेक प्रकारके विपरीत अर्थात एककी अनेक तथा दो अथवा अनेक प्रकारके रूप दीखें, हीन अंगके अथवा अधिक अंगके रूप रोगी देखे और ज्योतिस्वरूपसे सब पदार्थ दीखे॥ पित्तसे दूसरा परिम्लायिसंज्ञक तिमिर होय है । पित्तं कुर्यात्परम्लायि मूर्च्छितं रक्ततेजसा । पीता दिशस्तथोद्द्योतान्नवीनपि स पश्यति । विकीर्यमाणान्खद्योतैवॄक्षांस्तेजोभिरेव च ॥ ४९ ॥ १ काच इत्येष किजयो याप्यस्त्रिपटलस्यितैः । चतुर्थपटलं प्राप्तो लिङ्गनाशः सः उच्यते ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३२४ ) माधवनिदान ।
( ३२४ ) माधवनिदान । रक्तके तेजसे मिश्रित हुए परिम्लायीरोग होय, इसके योगसे रोगीको दिशा आकाश और सूर्य ये पीले दीखें और सर्वत्र सूर्य उगेसे दीखे तथा वृक्ष भी तेज- स्वरूपसे दीखे, परिम्लायी पित्तको नील कहते हैं सो सात्यकिने लिखा है, इस रोगको कोई आचार्य रक्तपित्तसे होता है ऐसे कहते हैं सो भी लिखा है ॥ रागभेदसे लिंगनाशको षड्विधत्व कहते हैं- वक्ष्यामि षड्विधं रागैर्लिङ्गनाशमतः परम् ॥ ५० ॥ रागोऽरुणो मारुतजः प्रदिष्टो म्लायी च नीलश्च तथैव पित्तात् । कफात्सितः शोणितजः सरक्तः समस्तदोषप्रभवो विचित्रः ॥ ५१ ॥ इसके अनन्तर रागभेदसे छः प्रकारका लिंगनाश होता है, सो इस प्रकार है-वात- जन्य रंग लाल होय है, पित्तसे म्लायी पीला, नीला अथवा नीलाही रंग होय, कफसे सफेद और रुधिरसे लाल तथा सब दोषोंसे अनेक प्रकारका रंग होता है ॥ वातिकरोगके विशेष लक्षण । अरुणं मण्डलं दृष्ट्यां स्थूलकाचारुणप्रभम् । परिम्लायिनि रोगे स्यान्म्लायि नीलं च मण्डलम् ॥ दोषक्षयात्कदाचित्स्यात्स्वयं तत्र प्रदर्शनम् ॥ ५२ ॥ परिम्लायि रोगमें दृष्टिके ऊपर मोटा कांचके समान लाल मण्डल होता है, वह म्लान लाल पीला अथवा नील होता है, उसमें दोष घटनेसे कदाचित् देखनेकी शक्ति होय । इस जगह दोषशब्दकरके कोई कर्मका ग्रहण करते हैं ॥ दृष्टिमण्डलगत रोगके लक्षण । अरुणं मण्डलं वाताच्चंचलं परुषं तथा । पित्तान्मण्डलमानीलं कांस्याभं पीतमेव च ॥ ५३ ॥ श्लेष्मणा बहलं स्निग्धं शंखकुन्देन्दुपाण्डुरम् । चलत्पद्मपलाशस्थः शुक्लो बिन्दुरिवांभसः ॥ ५४ ॥ मर्द्यमाने च नयने मण्डलं तद्विसर्पति । प्रवालपद्मपत्राभं मण्डलं शोणितात्मकम् ॥ ५५ ॥ १ एवमेव तु विज्ञेया नीलाः पित्तसमुद्भवाः । रक्तपित्तोत्थिताः पीताः ॥ इति ॥ २ विदधाति परिम्लायि पित्तं रक्तेन संगतम् । तेन पीता दिशः पश्येद्युद्यन्तमिव भास्करम् ॥ इति ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३२६ ) दृष्टिरागो भवेच्चित्रो लिंगनाशे त्रिदोषजे । यथास्वं दोषलिङ्गानि सर्वेष्वेव भवंति हि ॥ ५६ ॥ वादीसे दृष्टिमण्डल लाल, चञ्चल और खरदरा होता है । पित्तसे दृष्टिमण्डल किञ्चित् नीला तथा काँसेके समान पीला होवे । कफसे भारी चिकना शंख कुन्द- फूल और चन्द्र इनके समान सफेद होय और उसके नेत्रमें हलनेवाली कमलपत्रके ऊपर पानीकी बूँदके समान टेढी तिरछी सफेद बून्द फैलीसी दिखलाई दे । रुधिरसे दृष्टिमण्डल मूंगाके समान अथवा लाल कमलके समान लाल होवे और त्रिदोषज लिंगनाशमें तरह तरहके मण्डल होयँ तथा सर्व दोषोंके लिंगमण्डलमें वातादि दोषोंके न्यारे २ लक्षण होयँ ॥ आगे कहेगये और पीछे कहे ऐसे दृष्टिरोगोंकी संख्या । षड्लिङ्गनाशाः षडिमे च रोगा दृष्ट्याश्रयाः षट् च षडेव च स्युः ५७ पूर्व कहे लिंगनाश रोग छः और आगे विदग्धदृष्ट्यादि कहे गये वे छः ऐसे मिल- कर बारह दृष्टिरोग होते हैं ॥ पित्तविदग्धके लक्षण । पित्तेन दुष्टेन गतेन वृद्धिं पीता भवेद्यस्य नरस्य दृष्टिः । पीतानि रूपाणि च तेन पश्येत्स वै नरः पित्तविदग्धदृष्टिः ॥ ५८ ॥ पित्त दुष्ट होकर बढनेसे जिस मनुष्यकी दृष्टि पीली होय तथा उसके योगसे उस मनुष्यको सब पदार्थ पीले रंगके दीखें, उस दृष्टिको पित्तविदग्ध कहते हैं ॥ दिवांध्यके लक्षण । प्राप्ते तृतीयं पटलं च दोषे दिवा न पश्येन्निशि वीक्षते सः । रात्रौ स शीतानुगृहीतदृष्टिः पित्ताल्पभावादपि तानि पश्येत् ॥ ५९ ॥ तीसरे पटलमें दोष ( पित्त ) जानेसे दिनमें रोगीको नहीं दीखे, रात्रिमें शीतल- ताके कारण पित्त कम होनेसे दीखे ॥ कफविदग्धदृष्टिके लक्षण । तथा नरः श्लेष्मविदग्धदृष्टिस्तान्येव शुक्लानि हि मन्यते तु । इसी प्रकार कफविदग्ध पुरुषको सफेद रूप दीखे ॥ नक्तांध्य ( रतौंध ) के लक्षण । त्रिषु स्थितो यः पटलेषु दोषो नक्तांध्यमापादयति प्रसय । दिवा स सूर्यानुगृहीतदृष्टिः पश्येत्तु रूपाणि कफाल्पभावात् ॥ ६० ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३२६ ) माधवनिदान ।
( ३२६ ) माधवनिदान । जो दोष ( कफ ) तीनों पटलोंमें रहे वह नक्तांध्य ( रतौंध ) उत्पन्न करे वह कफ दिवस ( दिन ) में सूर्यके तेजसे कम होनेसे दीखे ॥ धूमदर्शीके लक्षण । शोकज्वरायासशिरोऽभितापैरभ्याहता यस्य नरस्य दृष्टिः । धूम्रांस्तथा पश्यति सर्वभावान्स धूमदर्शीति नरः प्रदिष्टः ॥ ६१ ॥ शोक, ज्वर, परिश्रम और मस्तकताप इन कारणोंसे पित्त कुपित होकर जिसकी दृष्टिमें विकार होवे उससे उस मनुष्यको सर्व पदार्थ धूएँके रंगके दीखें, इस रोगको धूमदर्शी वा शोकविदग्धदृष्टि कहते हैं, इसमें दिनको धूएँके रंगके पदार्थ दीखें, इसका कारण यह है कि, रात्रिमें पित्तका तेज घटनेसे निर्मल दीखे ॥ ह्रस्वदृष्टिके लक्षण । यो ह्रस्वजाड्यो दिवसेषु कृच्छ्राद् ह्रस्वानि रूपाणि च तेन पश्येत् ॥ ६२ ॥ जो ह्रस्वजाड्य पुरुष होता है उसको दिनमें बडे पदार्थ छोटे दीखें इसका कारण यह है कि उस समय दृष्टिके मध्यगत दोष होता है, यह रोग भी पित्तजन्य है॥ नकुलांध्यके लक्षण । विद्योतते यस्य नरस्य दृष्टिर्दोषामिपन्ना नकुलस्य यद्वत् । चित्राणि रूपाणि दिवा स पश्येतस वै विकारो नकुलांध्यसंज्ञः॥६३॥ जिस पुरुषकी दृष्टि दोषोंसे व्याप्त होकर नैलेकी दृष्टिके समान चमके वह पुरुष दिनमें अनेक प्रकारके रूप देखे, इस विकारको नकुलांध्य कहते हैं ॥ गम्भीरदृष्टिके लक्षण । दृष्टिर्विरूपा श्वसनोपसृष्टा संकोचमभ्यंतरतश्च याति । रुजावगाढं च तमक्षिरोगं गम्भीरिकेति प्रवदंति तज्ज्ञाः ॥ ६४ ॥ जो दृष्टि वायुसे विकृत होंकर भीतरको संकुचित होवे तथा उसमें पीडा होवे, उसको गम्भीरदृष्टि कहते हैं ॥ आगन्तुज लिंगनाशके लक्षण । बाह्यो पुनर्द्विविह संप्रदिष्टौ निमित्ततश्चाप्यनिमित्ततश्च । निमित्ततस्तत्र शिरोऽभितापाज्ज्ञेयस्त्वभिष्यंदनिदर्शनः सः ॥६५॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ३२७ ) अभिघातज लिंगनाश दो प्रकारका है-एक निमित्तजन्य, दूसरा अनिमित्तजन्य, तिनमें शिरोभितापकरके ( विषवृक्षके फलसे मिले पवनका मस्तकमें स्पर्श होनेसे ) होय उसको निमित्तजन्य कहते हैं, इसमें रक्ताभिष्यंदके लक्षण होते हैं ॥ अनिमित्तके लक्षण । सुरर्षिगंधर्वमहोरगाणां सन्दर्शनेनापि च भास्करस्य । हन्येत दृष्टिर्मनुजस्य यस्य स लिंगनाशस्त्वनिमित्तसंज्ञः ॥ तत्राक्षि विस्पष्टमिवावभाति वैदूर्यवर्णा विमला च दृष्टिः ॥ ६६ ॥ देव, ऋषि, गंधर्व, महासर्प और सूर्य इनके संमुख दृष्टिको लगाकर ( टकटकी लगाकर ) देखनेसे जिस मनुष्यकी दृष्टि नष्ट होय, उसको अनिमित्तलिंगनाश कहते हैं, इस रोगमें नेत्र स्वच्छ दीखते हैं और दृष्टि वैदूर्यमणिके समान स्वच्छ कहिये श्यामवर्ण होय । अब कहते हैं कि, देवादिक भौतिक इन्द्रियोंको नहीं बिगाड़ें, परन्तु उनकी शक्तिका नाश करते हैं, सो चरकमें लिखा है ॥ अर्मरोग ५ प्रकारका है । प्रस्तार्यर्म तनु स्तीर्णं श्यावं रक्तनिभं सिते । सश्वेतं मृदु शुक्रार्म शुक्रे तद्वर्द्धते चिरात् ॥ ६७ ॥ पद्माभं मृदु रक्तार्म यन्मांसं चीयते सिते । पृथु मृद्धधिमांसार्म बहलं च यकृन्निभम् । स्थिरं प्रस्तारि मांसाढ्यं शुष्कं स्नाव्यर्म पंचमम् ॥ ६८ ॥ नेत्रोंके सफेद भागमें पतला विस्तीर्ण श्यामवर्ण तथा लाल ऐसा जो मांस बढ़े उसको प्रस्तारि अर्मरोग कहते हैं । शुक्लभागमें सफेद मृदुमांस बहुत दिनमें बढ़े उसको शुक्रार्म कहते हैं । कमलके समान लाल तथा मृदु मांस जो बढ़े उसको रक्तार्म कहते हैं । जो मांस विस्तीर्ण स्थूल कलेजाके समान ( कुछ काला लाल ) दीखे उसको अधिमांसार्म कहते हैं । जो कठिन तथा फैलनेवाले स्त्रावरहित मांस बढ़े, उसको स्नाव्यर्म कहते हैं । विदेहने कहा भी है ॥ १ देवादयोऽष्टौ हि महाप्रभावा न दूषयेयुः पुरुषस्य देहम् । विशंत्यदृश्यास्तरसा यथैव च्छाया तयोर्द्पणसूर्यकांतौ ॥ २ प्रस्तारिणोऽर्मणः स्रावं निरुणद्धि यथाऽनिलः । विना स्रावं विशुष्यं यत्स्नाव्यर्मेतीति तद्विदः ॥
( ३२८ ) माधवनिदान ।
( ३२८ ) माधवनिदान । शुक्तिरोगके लक्षण । श्यावाः स्युः पिशितनिभास्तु बिंदवो ये शुक्त्याभाः सितनियताः स शुक्तिसंज्ञः ॥ नेत्रके सफेद भागमें श्यामवर्ण मांसतुल्य सीपीके समान जो बिन्दु होय उसको शुक्ति कहते हैं ॥ अर्जुनके लक्षण । एको यः शशरुधिरोपमश्च बिन्दुः शुक्लस्थो भवति तदर्जुनं वदंति ॥ ६९ ॥ शुक्लभागमें शश (खरगोश) के रुधिरके समान जो बिन्दु (बून्द) नेत्रमें उत्पन्न होय उसको अर्जुन कहते हैं ॥ पिष्टकके लक्षण । श्लेष्ममारुतकोपेन शुक्ले मांसं समुन्नतम् । पिष्टवत्पिष्टकं विद्धि मलाक्तादर्शसन्निभम् ॥ ७० ॥ कफ वायुके कोपसे शुक्लभागमें पिष्ट (पिसासा) जो मांस बढे उसको पिष्टक कहते हैं, वह मलसे मिले आदर्श (ऐनक) के समान होता है ॥ जालके लक्षण । जालाभः कठिनशिरो महान् सरक्तः संतानः स्मृत इह जालसंज्ञितस्तु ॥ नेत्रके सफेद भागमें शिरा (नस) का समूह जालीके समान होय और वह कठिन तथा रुधिरके समान लाल होवे उसको जाल कहते हैं ॥ शिराजपिडिकाके लक्षण । शुक्लस्थाः सितपिडिकाः शिरावृता या- स्ता ब्रूयादसितसमीपजाः शिराजाः ॥ ७१ ॥ नेत्रके शुक्लभागमें शिरा (नसों) से व्याप्त ऐसी सफेद फुन्सी होय, उसको शिराजपिडिका कहते हैं वह कृष्णभागके समीप होती है ॥ बलासके लक्षण । कांस्याभोऽमृदुरथ वारिबिन्दुकल्पो विज्ञेयो नयनसिते बलाससंज्ञः ॥ ७२ ॥ १ मारुता पीडितः श्लेष्मा शुक्लभागे व्यवस्थितः । जलबिन्दुरिवोच्छूनोऽमृदुः स कफसम्भवः ।१ वलासग्रथितं नाम त शाफ दृष्टमादिशेत् ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३२९ ) नेत्रके शुक्लभागमें कांसेके समान कठिन अथवा पानीकी बूँदके समान ऊंची जो गांठ होय उसको बलास कहते हैं ॥ इति शुक्लरोग ॥ नेत्रकी सन्धिके रोग । पूयालसके लक्षण । पक्वः शोथः संधिजो यः सतोदः स्रवेत्पूयं पूति पूयालसाख्यः । नेत्रकी सन्धिमें सूजन होवे और पककर फूट जाय, उसमेंसे दुर्गन्धि राध बहे तथा तोद ( सुई छेदनेकीसी पीडा ) होय, उसको पूयालस कहते हैं ॥ उपनाहके लक्षण । ग्रन्थिर्नाल्पो दृष्टिसंधावपाकी कंडूप्रायो नीरुजस्तूपनाहः ॥ ७३ ॥ नेत्रकी संधिमें बडी गांठ होवे, वह थोडी पके, उसमें खुजली बहुत हो, दूखे नहीं उसको उपनाह कहते हैं ॥ स्राव अथवा नेत्रनाडीके लक्षण । गत्वा संधीनश्रुमार्गेण दोषाः कुर्युः स्रावाँल्लक्षणैः स्वैरुपैतान् । तं हि स्रावं नेत्रनाडीति चैके तस्या लिङ्गं कीर्तयिष्ये चतुर्धा ॥७४॥ वातादि दोष अश्रुमार्गसे सन्धियोंमें प्राप्त होकर स्वकीयलक्षणयुक्त स्राव उत्पन्न करे उस स्रावको कोई नेत्रनाडी कहते हैं । यह रोग चार प्रकारका है, उसके लक्षण कहते हैं । शंका-क्योंजी ! वातका स्राव क्यों नहीं कहा ? उत्तर-वातमें स्राव नहीं होता है इसीसे विदेहने चारही प्रकारके स्राव कहे हैं ॥ पाकः संधौ संस्रवेद्यस्तु पूयं पूयास्रावोऽसौ गदः सर्वजस्तु । श्वेतं सान्द्रं पिच्छिलं संस्रवेद्धि श्लेष्मस्रावोऽसौ विकारो मतस्तु॥७५॥ रक्तस्रावः शोणिताद्यो विकारः स्रवेदुष्णं तत्र रक्तं प्रभूतम् । हारिद्राभं पीतमुष्णं जलं वा पित्तास्रावः संस्रवेत्संधिमध्यात् ॥ ७६ ॥ पूयास्राव नेत्रकी संधिमें सूजन होकर पके तथा उसमेंसे राध बहे, यह रोग सन्निपातात्मक है । श्लेष्मस्राव जिसमें सफेद, गाढी और चिकनी राध बहे । रक्त- स्राव-जिस विकारमें विशेष गरम रुधिर बहे उसको रक्तस्राव कहते हैं । पित्तास्राव- जिसकी सन्धिमें हल्दीके समान पीला गरम जल बहे उसको पित्तास्राव कहते हैं ॥ १ सन्निपातात्कफाद्रक्तात्पित्तात्स्रावोऽक्षिसंधिषु ॥ इति । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३१० ) माधवनिदान । पर्वणी व अलजीके लक्षण । ताम्रा तन्वी दाहपाकोपपन्ना ज्ञेया वैद्यैः पर्वणी वृत्तशोथा । जाता सन्धौ शुक्लकृष्णेऽलजी स्यात्तस्मिन्नेव ख्यापिता पूर्वलिंगैः७७ नेत्रकी सफेद काली सन्धियोंमें तांबेके समान छोटी गोल जो फुन्सी होवे और वह फुन्सी दाह होकर पके उसको पर्वणी कहते हैं और उसी ठिकाने पूर्वरूप संयुक्त बडी फुन्सी उठे उसको अलजी कहते हैं । पर्वणी और अलजीमें इतनाही अन्तर है कि, अलजी बडी फुन्सी होती है और पर्वणी छोटी फुन्सी होती है यह विदेहका मत है ॥ कृमिग्रन्थिके लक्षण । कृमिग्रंथिवर्त्मनः पक्ष्मणश्च कण्डूं कुर्युः कृमयः संधिजाताः । नानारूपा वर्त्मशुक्लांतसंधौ चरंत्यंतर्नयनं दूषयंतः ॥ ७८ ॥ जिसके नेत्रके शुक्लभागकी संधिमें और पलकोंकी संधिमें उत्पन्न हुई अनेक प्रका- रकी कृमि खुजली और गांठ उत्पन्न करे और नेत्रके पलक और सफेदी भागकी संधिमें प्राप्त होकर नेत्रके भीतरके भागको दूषित करे, भीतर फिरे, उसको कृमि- ग्रन्थि कहते हैं; यह सन्निपातात्मक कहते हैं, सो विदेहका भी मत है ॥ वर्त्म ( मर्मस्थान ) के रोग । उत्संगपिडिकाके लक्षण । अभ्यन्तरमुखी ताम्रा बाह्यतो वर्त्मतश्च या । सोत्संगोत्संगपिडिका सर्वजा स्थूलकण्डुरा ॥ ७९ ॥ नेत्रके ढकनेवाली बाफणी अर्थात् कोयमें फुन्सी होय और उसका मुख भीतर होय वह बडी तथा लाल खुजली संयुक्त होय उसको उत्संगपिडिका कहते हैं यह सन्नि- पातसे होती है । गदाधर और विदेहके मतसे पलकोंके कोयके बाहर भी यह रोग होता है । इस श्लोकमें ‘ च ’ लिखा है उसका यह प्रयोजन है कि, इस जगह भी मुर्गीके अंडेकासा रस स्राव जानना ॥ १ पर्वणीपिडिका तत्र जायते त्वंकुरोपमा । शुक्लकृष्णांतसंधौ च जनयेद्रोस्तनाकृतिम् । पिडिकामलर्जी तां तु विद्धि तोदाश्रुसंकुलाम् ॥ २ ततः पूयममृक्कृष्णाः पतंति कृमयस्तथा । लक्षणैर्विविधैर्युक्ताः सन्निपातसमुत्थिताः ॥ कृमिग्रंथिं तु तं विद्याद्देहिनां नेत्रदूषणम् ॥ इति ॥ ३ वर्त्मोत्संगादधो जन्तोः सन्निपातात्प्रजायते । अभ्यन्तरमुखी स्थूला बाह्यतश्चापि दृश्यते ॥ पिडिका पिडिकाभिश्च चिताम्याभिः समन्ततः। उत्संगपिडिका नाम कठिना मन्दवेदना॥इति॥
भाषाटीकासमेत । ( ३३१ ) कुंभिकाके लक्षण। वर्त्मान्ते पिडिका ध्माता भिद्यन्ते च स्रवंति च । कुंभीकबीजसदृशाः कुंभीकाः सन्निपातजाः ॥ ८० ॥ पलकोंके समीप कुंभिकाके बीजके समान अर्थात् जमालगोटेके समान फुन्सी होय वह पककर फूटकर बहे उसको कुंभिका कहते हैं। कोई आचार्य कहते हैं कि, कच्छदेशमेंके दाडिम ( अनार ) के बीजके आकार कुंभिका होती है ॥ पोथकीके लक्षण । स्राविण्यः कण्डुरा गुर्व्यो रक्तसर्षपसन्निभाः । रुजावन्त्यश्च पिडिकाः पोथक्य इति कीर्तिताः ॥ ८१ ॥ जिसके कोएमें लाल सरसोंके समान रुधिरस्राव हो, खुजलीसंयुक्त भारी तथा पीडासंयुक्त फुन्सी होय, उसको पोथकी कहते हैं ॥ वर्त्मशर्कराके लक्षण । पिडिका या खरा स्थूला सूक्ष्माभिरभिसंवृता । वर्त्मस्था शर्करा नाम स रोगो वर्त्मदूषकः ॥ ८२ ॥ जिसके कोएमें जो पिडिका कठिन और बडी होकर सर्वत्र छोटी २ फुन्सियोंसे व्याप्त होय, उसको वर्त्मशर्करा कहते हैं, इससे कोए बिगड जाते हैं ॥ अर्शोवर्त्मके लक्षण । उर्वारुबीजप्रतिमाः पिडिका मंदवेदनाः । श्लक्ष्णाः खराश्च वर्त्मस्थास्तदर्शोवर्त्म कीर्त्यते ॥ ८३ ॥ ककडीके बीजके बराबर, मन्द पीडा पृथकू २ कठिन ऐसी फुन्सी कोएमें उठें उनको अर्शोवर्त्म कहते हैं । निमि (विदेहँ) के मतसे यह सन्निपातात्मक है ॥ शुष्कार्शके लक्षण । दीर्घाङ्कुरः खरः स्तब्धो दारुणोऽभ्यन्तरोद्भवः । व्याधिरेषोऽतिविख्यातः शुष्कार्शो नाम नामतः ॥ ८४ ॥ नेत्रके कोएमें लंबे खरदरे कठिन दुःखदायक ऐसे जो मांसांकुर होयँ उस व्याधिको शुष्कार्श कहते हैं, यह भी सन्निपातज है ॥ अंजनाके लक्षण । दाहतोदवती ताम्रा पिडिका वर्त्मसंभवा । मृद्वी मंदरुजा सूक्ष्मा ज्ञेया साऽञ्जनामिका ॥ ८५ ॥ १नीरुजा कठिना वर्त्मपक्ष्मान्तर्बाह्यतोऽपि वा। पिडिका सन्निपातेन तदर्शोवर्त्म कीर्त्यते॥ इति॥