माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भाषाटीकासमेत । ( १७३ ) डकार बहुत आवै, मलका अवरोध होय, अन्नमें अरुचि होय, सामर्थ्यका नाश होना, आंत बोले, पेटमें गुडगुड शब्द होय और अफरा होय, मंदाग्नि होना ये लक्षण होयं तो जानना कि, गुल्म ( गोला ) रोग शीघ्र प्रगट होना चाहता है अर्थात् ये गुल्मके पूर्वरूपके लक्षण हैं ॥ गुल्मके साधारण लक्षण । अरुचिः कृच्छ्रविण्मूत्रं वातेनान्त्रविकूजनम् । आनाहश्चोर्ध्ववातत्वं सर्वगुल्मेषु लक्षयेत् ॥ ५ ॥ अरुचि, मल-मूत्र कष्टसे उतरें, वादीसे आंत बोले, पेट फूल आवे, ऊर्ध्ववात होय ये लक्षण सब गुल्मोंमें होते हैं । सब गुल्मरोगमें वात कारण है सो चरक और सुश्रुतमें भी लिखा है ॥ वातगुल्मके कारण और लक्षण । रूक्षान्नपानं विषमातिमात्रं विचेष्टनं वेगविनिग्रहश्च । शोकाभिघातोऽतिमलक्षयश्च निरन्नता चानिलगुल्महेतुः ॥ ६ ॥ यः स्थानसंस्थानरुजा विकल्पं विद्वातसङ्गं गलवक्त्रशोषम् । श्यावारुणत्वं शिशिरज्वरं च हृत्कुक्षिपार्श्वांसशिरोरुजं च ॥ ७॥ करोति जीर्णेऽप्यधिकं च कोपं भुक्ते मृदुत्वं समुपैति पश्चात् । वातात्स गुल्मो न च तत्र रूक्षं कषायतिक्तं कटु चोपशेते ॥ ८॥ रूखा, विषम और अतिमात्र ऐसे अन्नपान सेवन करनेसे, बलवान् पुरुषसे लडना, मल मूत्र आदि वेगोंके धारण करनेसे, शोक और अभिघात ( लकडी आदिकी चोट ) से, विरेचन आदिसे, मलका क्षय करना, उपवास ये सब वात- गुल्मके कारण हैं । जो गुल्म कभी नाभि, बस्ती, पसवाडेमें चला जाय तथा कभी लंबा कभी मोटा गोल अथवा छोटा होय, तथा उसमें पीडा कभी थोडी कभी बहुत होय, तोद भेद ( सुई चुभानेकीसी पीडा ) होय अथवा अनेक प्रकारकी पीडा होय, मलकी और अधोवायुकी अच्छी रीतिसे प्रवृत्ति होय नहीं, गला और मुख सूखै, शरीरका वर्ण नीला अथवा लाल होय, शीतज्वर, हृदय, कूख, पसवाडे, कंधा और मस्तक इनमें पीडा होय और गोला जीर्ण होनेपर अधिक कोप करे १ गुल्मिनामनिलशांतिरुपायैः सर्वशो विविधदाचरणीया । मारुतेऽत्र विजितेऽन्यमुदीर्णं दोषमल्पमपि कर्म निहन्यात् ॥ इति । २ कुपिताऽनिलमूलत्वादगूढमूलोदयादपि । गुल्मवद्वा विशालत्वाद् गुल्म इत्यभिधीयते ॥ इति ।
( १७४ ) माधवनिदान ।
( १७४ ) माधवनिदान । और भोजनके करनेके पिछाडी नरम हो जाय, वह गोला बादीसे प्रगट होय है उसमें रूखा कसैला कडुवा तीखा पदार्थ खानेसे सुख नहीं होय ॥ पित्तगुल्मके कारण और लक्षण । कट्वम्लतीक्ष्णोष्णविदाहिरूक्षं क्रोधातिमद्यार्कहुताशसेवा । आमाभिघातो रुधिरं च दुष्टं पैत्तस्य गुल्मस्य निमित्तमुक्तम् ॥ ९ ॥ ज्वरः पिपासा वदनाङ्गरागः शूलं महज्जीर्यति भोजने च । स्वेदो विदाहो व्रणवच्च गुल्मः स्पर्शासहः पैत्तिकगुल्मरूपम् ॥ १०॥ कटु, खट्टा, तीक्ष्ण रस, दाहकारक (वंशकरीलादिक), रूखा ऐसे भोजन कर- नेसे, क्रोधसे, अति मद्यपानसे, सूर्यकी धूपमें डोलनेसे, अग्निके समीप रहनेसे, विदग्ध अजीर्णसे, दुष्ट भया रस उससे, अभिघात कहिये लकडी आदि लगनेसे रुधिरका बिगडना ये पित्तगुल्मके कारण कहे हैं। ज्वर, प्यास, मुख और अंगोंमें लालपना, अन्न पचनेके समय अत्यन्त शूल होय, पसीना आवे, जलन होय, फोडाके समान स्पर्श सहा न जाय ये पित्तगुल्मके लक्षण हैं ॥ कफके और सन्निपातके गुल्मके कारण और लक्षण । शीतं गुरु स्निग्धमचेष्टनं च संपूर्णं प्रस्वपनं दिवा च । गुल्मस्य हेतुः कफसंभवस्य सर्वस्तु दुष्टो निचयात्मकस्य ॥ ११ ॥ स्तैमित्यशीतज्वरगात्रसादहृल्लासकासारुचिगौरवाणि । शैत्यं रुगल्पा कठिनोन्नतत्वं गुल्मस्य रूपाणि कफात्मकस्य ॥१२॥ शीतल, भारी, चिकने ऐसे पदार्थके सेवनसे, तृप्तिकी अपेक्षा अधिक भोजन करना, दिनमें सोना यह कफोत्पन्न गुल्म होनेके कारण हैं और जो वातजादि तीनों गुल्मके कारण कहे हैं वे सन्निपातगुल्मके कारण जानने । देहका गीलापना, शीतज्वर शरीरकी ग्लानि, सूखी रद् (उबकी), खांसी, भारीपना, शीतका लगना, थोडी पीडा होय गुल्म (गोला) कठिन होय और ऊंचा होय इतने ये सब कफात्मकगुल्मके लक्षण हैं ॥ द्वन्द्वजगुल्मके लक्षण । निमित्तलिङ्गान्युपलभ्य गुल्मे संसर्गजे दोषबलाबलं च । व्यामिश्रलिङ्गानपरांश्च गुल्मांस्त्रीनादिशेदौषधकल्पनार्थम् ॥ १३ ॥ द्वन्द्वज गुल्ममें कारण लक्षण और दोषोंका बलाबल जानकर चिकित्सा कर- नेके वास्ते मिश्र लक्षणसे और तीन गुल्म समझने चाहिये, अर्थात् एक दोष बल-
होयँ तो चिकित्सा न करे ॥
भाषाटीकासमेत । ( १७५ ) वान् होय तो चिकित्सा करनी चाहिये और द्विदोष बलवान् वा त्रिदोष बलवान् होयँ तो चिकित्सा न करे ॥ सन्निपातगुल्मके लक्षण । महारुजं दाहपरीतमश्मवद्घनोन्नतं शीघ्रविदाहदारुणम् । मनःशरीराग्निवलापहारिणं त्रिदोषजं गुल्ममसाध्यमादिशेत् ॥ १४॥ भारी पीडा करनेवाला, दाहकरके व्याप्त, पत्थरके समान कठिन तथा ऊंचा और शीघ्र दाहकरके भयंकर, मन, शरीर, अग्नि और बल इनका नाश करनेवाला अर्थात् मनको विकल करनेवाला, शरीरको कृश करनेवाला और विवर्ण करनेवाला, अग्नि- वैषम्यादिकारक, असामर्थ्य करनेवाला, ऐसा त्रिदोषज गुल्म असाध्य जानना ॥ रक्तगुल्मके लक्षण । नवप्रसूताऽहितभोजना या या चामगर्भं विसृजेदृत्तौ वा । वायुर्हि तस्याः परिगृह्य रक्तं करोति गुल्मं सरुजं सदाहम् ॥ १५ ॥ पैत्तस्य लिङ्गेन समानलिङ्गं विशेषणं चाप्यपरं निबोध । यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैश्चिरात्सशूलः समगर्भलिङ्गः ॥ स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो मासे व्यतीते दशमे चिकित्स्यः॥१६॥ नई प्रसूत भई स्त्रीके अपथ्य सेवन करनेसे, अथवा अपक्व गर्भपात होनेसे अथवा ऋतुकालके समय अपथ्य भोजन करनेसे वायु कुपित होकर उस स्त्रीके रुधिर ( जो ऋतुसमय निकले उस ) को लेकर गुल्म करे । वह गुल्म पीडायुक्त दाहयुक्त होय और पित्तगुल्मके जो लक्षण कहे हैं वे सब इसमें होजाते हैं और इसमें दूसरे विशेष लक्षण होते हैं, उनको कहता हूं सुनो-यह गुल्म बहुत देरमें गोल गोल हिलै, अवयव कहिये हाथ पैरके साथ नहीं हिले शूलयुक्त होय, गर्भके समान सब लक्षण मिले अर्थात् मुखसे पानी छूटे, मुख पीला पडजाय, स्तनका अग्रभाग काला होजाय और दोहदादि लक्षण सब मिलें, ये सब लक्षण व्याधिके प्रभावसे होते हैं । जैसे क्षय रोगवालेको स्त्रीरमणकी इच्छा और काले नख ताल्वादिक होते हैं । यह रक्तजगुल्म स्त्रियोंके होय है, दश महीने व्यतीत होजायँ तब इस रक्तगुल्मकी चिकित्सा करनी चाहिये । कोई कहते हैं कि, यह गर्भ है अथवा रक्तगुल्म है, यह शंका जानकर माधवाचार्यने ( दश महीने व्यतीत होने- पर ) ऐसा कहा है, कारण इसका यह है कि, नववां और दशवां महीना यह प्रसूत होनेका समय है। शंका-क्यों जी ! “ यः स्पन्दते पिंडित एव नांगैः ” इत्यादिक
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १७६ ) माधवनिदान ।
( १७६ ) माधवनिदान । विशेषणोंसे स्पष्ट प्रतीति होय है, क्यों कि गर्भ तो निरंतर प्रत्येक अवयवके साथ शूलरहित फडकता है, और रक्तगुल्मके इससे विपरीत लक्षण हैं फिर दश महीने व्यतीत होनेपर चिकित्सा करनी चाहिये यह क्यों कहा ? उत्तर-इसका कारण इस प्रकार है कि, इस रोगमें जब दश महीने व्यतीत होजायँ तब चिकित्सा करे वो सुखसाध्य होय है, कुछ प्रसवके नियमसे नहीं कहा, क्योंकि प्रसव ग्यारह बारह महीनेमें भी होय है सो चरकमें भी लिखा है-“ तं स्त्री प्रसूते सुचिरेण गर्भ स्पष्टो यदा वर्षगणैरपि स्यात् ” जैसे जीर्ण ज्वर होनेपर दूध पीना और दस्तका लेना हितकारक होय है। इससे ग्रन्थान्तरोंमें भी लिखा है- “ज्वरे तुल्यर्तुदोषत्वं प्रमेहे तुल्यदूष्यता । रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ ” इस रक्तगुल्मको दश महीने व्यतीत होनेपर पुरानपना होय है और जैज्जटने भी कहा है कि दश महीनेके पहिले मर्दनादि क्रिया करनेसे गर्भाशयके विकार होय हैं। क्योंकि, रुधिर उस ठिकानेपर जमा होय है और ग्यारहवें महीनेमें गुल्मका गोला बहुत अच्छा जम जाता है इसीसे ग्यारहवे महीनेमें स्नेहादिकरके सब शरीर मृदु (नरम) करनेसे मर्दन करे तो गर्भाशय भले प्रकार अच्छा रहे ॥ अब कहते हैं कि, बहुत दिनका गुल्मरोग ऐसी अवस्था होनेपर असाध्य हो जाय है उसको कहते हैं- सञ्चितः क्रमशो गुल्मो महावास्तुपरिग्रहः । कृतमूलः शिरानद्धो यदा कूर्म इवोन्नतः ॥ १७॥ दौर्बल्यारुचिहृल्लासकासच्छर्द्यरति- ज्वरैः । तृष्णातन्द्राप्रतिश्यायैर्युज्यते न स सिध्यति ॥ १८ ॥ क्रमक्रमसे बढा गुल्म जब जब उदर (पेट)में फैलजाय और धातुओंमें उसका मूल जाय पहुँचे तथा उसपर नाडियोंका जाल लिपटजाय और कछुएकी पीठके समान गुल्म ऊंचा होय, तब इस रोगीके निःसत्त्वपना, अरुचि, सूखी रह, खांसी, वमन, अरति और ज्वर तथा प्यास, तन्द्रा और पीनस ये लक्षण होयं ऐसा रोगी असाध्य है ॥ असाध्य लक्षण । गृहीत्वा सज्ज्वरः श्वासहृच्छर्द्यतीसारपीडितम् । हृन्नाभिहस्तपादेषु शोथः क्षिपति गुल्मिनम् ॥ १९ ॥ श्वासः शूलं पिपासाऽन्नविद्वेषो ग्रन्थिमूढता । जायते दुर्बलत्वं च गुल्मिनां मरणाय वै ॥ २० ॥ वमन और अतिसार इनसे पीडित ऐसे गुल्मरोगीके हृदय, नाभी, हाथ, पैर इन ठिकाने सूजन होय और ज्वर, दमा जिसके होयं ऐसे लक्षण होनेसे रोगी
भाषाटीकासमेत । ( १७७ ) बचे नहीं । श्वास, शूल, प्यास, अन्नमें अरुचि और गुल्मकी गांठका एकाएकी नष्ट होजाना और दुर्बलता ये लक्षण होनेसे जानना कि, गुल्मरोगवालेकी मृत्यु समीप है। शंका-क्यों जी ! अन्तर्विद्रधि और गुल्मरोग इनमें क्या भेद है। इन दोनोंके स्थान और स्वरूप तौ एकसे हैं फिर भेद क्या है ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है अन्तर्विद्रधि पचता है गुल्म नहीं पचे है इसका कारण यह है कि गुल्म तो निराश्रय है। सो सुश्रुतने कहा भी है-- न निबन्धोऽस्ति गुल्मस्य विद्रधिः सनिबन्धनः । गुल्मस्तिष्ठति दोषे स्वे विद्रधिर्मांसशोणिते ॥ विद्रधिः पच्यते तस्माद्गुल्मश्चापि न पच्यते ॥ २१ ॥ गुल्मका निबंध नहीं और विद्रधिका निबंध है, गुल्म अपने दोषोंमें रहता है और विद्रधिका ठिकाना मांस रुधिरमें है, इसीसे विद्रधिका पाक होय है और गुल्मका पाक नहीं होय ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरी- भाषाटीकायां गुल्मरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ हृद्रोगनिदानम् । अत्युष्णगुर्वम्लकषायतिक्तैः श्रमाभिघाताध्यशनप्रसङ्गैः । संचिन्तनैर्वेगविधारणैश्च हृदामयः पञ्चविधः प्रदिष्टः ॥ १ ॥ अतिगरम, अतिभारी, अतिखट्टा, अतिकषैला, अतिकडुवा ऐसे पदार्थ सेवन करनेसे, श्रम ( धनुष आदिका खैंचना ) अभिघात ( हृदयमें चोट लगना ) और भोजनके ऊपर भोजन नित्य करनेसे, संचिंतन ( राजाके भयसे चिन्ता ), मल मूत्र आदि वेगोंके रोकनेसे, वातादिकके क्षयसे और सन्निपातकरके तथा कृमिसे हृदयका रोग होता है, वह पांच प्रकारका है ॥ हृद्रोगकी सम्प्राप्ति और सामान्य लक्षण । दूषयित्वा रसं दोषा विगुणा हृदयं गताः । हृदि बाधां प्रकुर्वन्ति हृद्रोगं तं प्रचक्षते ॥ २ ॥ कुपित भये दोष रसको ( जो कि हृदयमें रहता है), दुष्ट करके हृदयमें अनेक प्रकारकी पीडा करे उसको हृदयरोग कहते हैं ॥
( १७८ ) माधवनिदान ।
( १७८ ) माधवनिदान । वातहृद्रोगके लक्षण । आयम्यते मारुतजे हृदयं तुद्यते तथा । निर्मथ्यते दीर्यते च स्फोट्यते पाट्यतेऽपि च ॥ ३ ॥ वातज हृदयरोगमें हृदय ईंचासरीखा, सुईसे टोनेसरीखा, फोडनेसरीखा, दो टुकडा करनेके समान, मथनेके समान, कुल्हाडीसे फोडनेके समान करे है ॥ पित्तके हृद्रोगके लक्षण । तृष्णोष्णदाहमोहाः स्युः पैत्तिके हृदयक्लमः । धूमायनं च मूर्च्छा च स्वेदः शोषो मुखस्य च ॥ ४ ॥ पित्तके हृदयरोगमें प्यास, किंचित् दाह, मोह और हृदयकी ग्लानि, धूआं निक- लतासा मालूम होय, मूर्च्छा, पसीना और मुखका सूखना ये लक्षण होते हैं ॥ कफके हृदयरोगके लक्षण । गौरवं कफसंस्त्रावोऽरुचिः स्तम्भोऽग्निमार्दवम् । माधुर्यमपि चास्यस्य बलासो वर्तते हृदि ॥ ५ ॥ कफसे हृदय व्याप्त होनेसे भारीपना, कफका गिरना, अरुचि, हृदय जकडजाय, मन्दाग्नि, मुखमें मिठास ये लक्षण होते हैं ॥ त्रिदोषजहृद्रोगके लक्षण । विद्यात्त्रिदोषं त्वपि सर्वलिङ्गं- जिसमें सब लक्षण मिलते होंयँ वह त्रिदोषका हृद्रोग जानना इसमें कुछ भी अपथ्य होनेसे गांठ उत्पन्न होती है, उस गांठसे कृमि पैदा होती हैं, ऐसे चरकमें कहा है ॥ कृमिज हृद्रोगके लक्षण । -तीव्रार्तितोदं कृमिजं सकण्डु । उत्क्लेदः ष्ठीवनं तोदः शूलं हृल्लासकस्तमः । अरुचिः श्यावनेत्रत्वं शोषश्च कृमिजे भवेत् ॥ ६ ॥ तीव्र पीडा करके तथा नोचनेकीसी पीडा करके तथा खुजली करके युक्त ऐसा हृद्रोग कृमिजन्य जानना । उत्क्लेद ( ओकारी आनेके समान मालूम हो ), थूकना, तोद ( सुई चुभानेकीसी पीडा ), शूल, हृल्लास, अँधेरा आवे, अरुचि, नेत्र काले पडजायँ और मुखशोष ये लक्षण कृमिज हृदयरोगमें होते हैं । जैज्जटका यह मत १ त्रिदोषजे तु हृद्रोगे यो दुरात्मा निषेवते । तिलक्षीरगुडादींश्चेद्ग्रन्थिस्तस्योपजायते ॥ मर्मैकदेशे संक्लेदं रसश्चाप्युपगच्छति । संक्लेदात् कृमयश्चान्ये भवंत्युपहतात्मनः ॥ * CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १७९ ) है कि, उत्क्लेशसे लेकर तमपर्यन्त त्रिदोषके लक्षण कहे हैं। जैसे तोद, शूल ये वादीसे होयँ । उत्क्लेश, हल्लास और ष्ठीवन ये कफसे और तम यह पित्तसे लक्षण होता है और अरुचिसे लेकर शोषपर्यन्त कृमिज हृद्रोगके लक्षण जानने । इस विषयमें प्रत्येक आचार्योंके भिन्न २ मत हैं ॥ सर्वोके उपद्रव । क्लोम्नः सादो भ्रमः शोषो ज्ञेयास्तेषामुपद्रवाः । कृमिजे कृमिजातीनां श्लैष्मिकाणां च ये मताः ॥ ७ ॥ क्लोम कहिये पिपासा ( प्यास ) के स्थान उसमें ग्लानि होय, भ्रम, शोष ये सब उन हृद्रोगोंके उपद्रव जानने और कफकी कृमिरोगके जो पिछाडी कह आये हैं सोई कृमिज हृद्रोगोंके लक्षण होते हैं । तथा “ हल्लासमास्यस्रवणमविपाकमरोच- कम् ।” इत्यादि ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां हृद्रोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ मूत्रकृच्छ्रनिदानम् ।
व्यायामतीक्ष्णौषधरूक्षमद्यप्रसंगनित्यद्रुतपृष्ठयानात् । आनूपमांसाध्यशनादजीर्णात्स्युर्मूत्रकृच्छ्राणि नृणामिहाष्टौ ॥ १॥ व्यायाम ( दण्डकसरत आदि ), तीक्ष्णौषध ( राई आदि ) रूखा पदार्थ और नित्यप्रति मद्यपान करना इनसे और निरन्तर घोडेपर चढनेसे और जलसमीप रह- नेवाली पक्षी ( हंस, सारस, चकवां, आदि) का मांस खानेसे, भोजनके ऊपर भोजन करनेसे और कच्चे पदार्थ इत्यादिकोंके खानेसे मनुष्योंके आठ प्रकारका मूत्रकृच्छ्र रोग होता है। पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १, चोट लगनेका १, मल रोकनेका १, वीर्य रोकनेका १ और पथरीका १ ये सब मिलकरके आठ भये ॥ मूत्रकृच्छ्रकी सम्प्राप्ति । पृथङ्मलाः स्वैः कुपिता निदानैः सर्वेऽथवा कोपमुपेत्य बस्तौ । मूत्रस्य मार्गं परिपीडयन्ति यदा तदा मूत्रयतीह कृच्छ्रात् ॥ २ ॥ अपने अपने कारणोंसे कुपित भये जो वातादिक सब अलग दोष बस्तीमें कुपित होकर मूत्रके मार्गको पीडित करें, तब मनुष्यके बडे कष्टसे मूत्र उतरे ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
( १८० ) माधवनिदान ।
( १८० ) माधवनिदान । वातिक मूत्रकृच्छ्रके लक्षण । तीव्रार्तिरुग्वंक्षणबस्तिमेढ्रे स्वल्पं मुहुर्मूत्रयतीह वातात् । वातके मूत्रकृच्छ्रसे वंक्षण ( जंघा और ऊरु इनकी सन्धि ), मूत्राशय और इंद्रिय इनमें पीडा और मूत्र बारम्बार थोडा २ उतरे ॥ पैत्तिकमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । पीतं सरक्तं सरुजं सदाहं कृच्छ्रं मुहुर्मूत्रयतीह पित्तात् ॥ ३ ॥ पैत्तिकमें पीला, कुछ लाल, पीडायुक्त, जलनके साथ बारम्बार कष्टसे मूत्र उतरे ॥ कफमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । बस्तेः सलिङ्गस्य गुरुत्वशोथौ मूत्रं सपिच्छं कफमूत्रकृच्छ्रे । कफके मूत्रकृच्छ्रमें लिंग और मूत्राशय भारी हो, सूजन और मूत्र चिकना होय ॥ सन्निपातमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । सर्वाणि रूपाणि तु सन्निपाताद्भवन्ति तत्कृच्छ्रतमं हि कृच्छ्रम् ॥ ४ ॥ सन्निपातके मूत्रकृच्छ्रमें सर्व लक्षण होते हैं। यह मूत्रकृच्छ्र कष्टसाध्य है ॥ शल्यजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । मूत्रवाहिषु शल्येन क्षतेष्वभिहतेषु च । मूत्रकृच्छ्रं तदाघाताज्जायते भृशदारुणम् ॥ वातकृच्छ्रेण तुल्यानि तस्य लिङ्गानि लक्षयेत् ॥ ५ ॥ मूत्र बहानेवाले स्रोत (मार्ग) शल्य (तीर आदि) से बिंधजायँ अथवा पीडित होयँ तो उस घातसे भयंकर मूत्रकृच्छ्र होय है, इसके लक्षण वातमूत्रकृच्छ्रके समान होयँ ॥ मलके मूत्रकृच्छ्रके लक्षण । शकृतस्तु प्रतीघाताद्वायुर्विगुणतां गतः । आध्मानं वातसङ्गं च मूत्रसङ्गं करोति च ॥ ६ ॥ मल ( विष्ठा ) के अवरोध होनेसे वायु विगुण ( उलटा ) होकर अफरा वात- शूल और मूत्रनाश करे तब मूत्रकृच्छ्र प्रगट होय ॥ अश्मरीजन्य मूत्रकृच्छ्र । अश्मरीहेतु तत्पूर्वं मूत्रकृच्छ्रमुदाहरेत् ॥ ७ ॥ पथरीके योगसे जो मूत्रकृच्छ्र होय उसको पथरीका मूत्रकृच्छ्र कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १८१ ) शुक्रजमूत्रकृच्छ्रके लक्षण । शुक्रे दोषैरुपहते मूत्रमार्गे विधारिते । सशुक्रं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्वस्तिमेहनशूलवान् ॥ ८ ॥ दोषोंके योगसे शुक्र ( वीर्य ) दुष्ट होकर मूत्रमार्गमें गमन करे, तब उस मनुष्यके मूत्राशय और लिङ्ग इनमें शूल होय और मूतते समय मूत्रके सङ्ग वीर्य पतन होय ॥ अश्मरी और शर्करा इनके साम्य और अवान्तरभेद । अश्मरी शर्करा चैव तुल्यसम्भवलक्षणे । विशेषणं शर्करायाः शृणु कीर्त्तयतो मम ॥ ९ ॥ पच्यमानाऽश्मरी पित्ताच्छोष्यमाणा च वायुना । विमुक्तकफसन्धाना क्षरन्ती शर्करा मता ॥ १० ॥ हृत्पीडा वेपथुः शूलं कुक्षावग्निश्च दुर्बलः। तया भवति मूर्च्छा च मूत्रकृच्छ्रं च दारुणम् ॥ ११ ॥ अश्मरी ( पथरी ) और शर्करा इन दोनोंकी संप्राप्ति और लक्षण समान हैं परन्तु इनमें थोडासा भेद है उसको कहता हूं सुनो, पित्तसे पकनेवाली और वायुसे शुष्क होनेवाली ऐसी पथरी कफसंबन्धी न होय, तब मूत्रके मार्गसे रेतके समान झरने लगे, उसको शर्करा कहते हैं । उस शर्करायोगसे हृदयमें पीडा, कम्प, कूखमें शूल, मन्दाग्नि, मूर्च्छा और भयंकर मूत्रकृच्छ्र ये रोग होयें ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकायां मूत्रकृच्छ्रनिदानं समाप्तम् ॥ अथ मूत्राघातनिदानम् । जायन्ते कुपितैर्दोषैर्मूत्राघातास्त्रयोदश । प्रायो मूत्रविघाताद्यैर्वातकुण्डलिकादयः ॥ १ ॥ मूत्रके वेग रोकनेसे ( आदिशब्दसे मल शुक्रादि वेग रोकना और रूक्ष भोजन आदि जानना ) कुपित भये दोषोंसे वातकुण्डलिकादि तेरह प्रकारके मूत्रा- घातरोगको करे ॥ वातकुण्डलिकाके लक्षण । रौक्ष्याद्वेगविघाताद्वा वायुर्बस्तौ सवेदनः ।
( १८२ ) माधवनिदान ।
( १८२ ) माधवनिदान । मूत्रमाविश्य चरति विगुणः कुण्डलीकृतः ॥ २ ॥ मूत्रमल्पमल्पमथवा सरुजं संप्रवर्तते । वातकुण्डलिकां तां तु व्याधिं विद्यात्सुदारुणम् ॥ ३ ॥ रूखे पदार्थ खानेसे अथवा मलमूत्रादिवेगोंके धारण करनेसे कुपित भई जो वायु सो बस्ती ( मूत्राशय ) में प्राप्त हो पीडा करे और मूत्रसे मिलकर मूत्रके वेगको विगुण ( उलटा ) करके वहां आय कुण्डलके आकार ( गोलाकार ) मूत्राशयमें विचरे तब मनुष्य उस वातसे पीडित हो मूत्रको बारंबार थोडा थोडा पीडाके साथ त्याग करे, इस दारुण व्याधिको वातकुण्डलिकारोग कहते हैं ॥ अष्ठीलाके लक्षण । आध्मापयन्बस्तिगुदं रुध्वा वायुश्चलोन्नताम् । कुर्यात्तीव्रातिमष्ठीलां मूत्रमार्गावरोधिनीम् ॥ ४ ॥ बस्ति ( मूत्राशय ) और गुदा इनमें यह वायु अफरा करे तथा बस्ति और गुदाकी वायुको रोककर चञ्चल और उन्नत ( ऊंची ) ऐसी अष्ठीला ( पत्थरकी पिण्डीके सदृश ) को प्रगट करे, यह मूत्रके मार्गको रोकनेवाली और भयंकर पीडा करनेवाली है ॥ वातबस्तिके लक्षण । वेगं विधारयेद्यस्तु मूत्रस्याकुशलो नरः । निरुणद्धि मुखं तस्य बस्तेर्बस्तिगतोऽनिलः ॥ ५ ॥ मूत्रसङ्गो भवेत्तेन बस्तिकुक्षिनिपीडितः । वातबस्तिः स विज्ञेयो व्याधिः कृच्छ्रप्रसाधनः ॥ ६ ॥ जो मनुष्य अड ( जिद्द ) से मूत्रबाधाको रोके उसके बस्ति ( मूत्राशय ) का वायु बस्तिके मुखको बन्द करदे तब उसका मूत्र बंद होजाय और वह वायु बस्तिमें और कूंखमें पीडा करे, उस व्याधिको वातबस्ति ऐसे कहते हैं । यह बडे कष्टसे साध्य होय ॥ मूत्रातीतके लक्षण । चिरं धारयतो मूत्रं त्वरया न प्रवर्तते । मेहमानस्य मन्दं वा मूत्रातीतः स उच्यते ॥ ७ ॥ मूत्रको बहुत देर रोकनेसे पीछे वह जल्दी नहीं उतरे । मूतते समय धीरे धीरे उतरे इस रोगको मूत्रातीत कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १८३ ) मूत्रजठरके लक्षण । मूत्रस्य वेगेऽभिहते तदुदावर्त्तहेतुकः । अपानः कुपितो वायु- रुदरं पूरयेद् भृशम् ॥ ८ ॥ नाभेरधस्तादाध्मानं जनयेत्तीव्र- वेदनम् । तन्मूत्रजठरं विद्यादधोबस्तिनिरोधजम् ॥ ९ ॥ मूत्रके वेग रोकनेसे मूत्रवेगधारणजनित, उदावर्त्तका कारणभूत ऐसी अपान वायु कुपित होकर पेट बहुत फूलजाय और नाभिके नीचे तीव्र वेदनासंयुक्त अफरा करे, अधोबस्तिका रोध करनेवाला ऐसे इस रोगको मूत्रजठर कहते हैं ॥ मूत्रोत्संगके लक्षण । बस्तौ वाप्यथवा नाले मणौ वा यस्य देहिनः । मूत्रं प्रवृत्तं सज्जेत सरक्तं वा प्रवाहतः ॥ १० ॥ स्रवेच्छनैरल्पमल्पं सरुजं वाथ नीरुजम् । विगुणानिलजो व्याधिः स मूत्रोत्सङ्गसंज्ञितः ॥ ११ ॥ प्रवृत्त भया मूत्र बस्तिमें अथवा शिश्न ( लिंग ) में अथवा शिश्नके अग्रभागमें अटक जाय और बलसे मूत्रको करे भी तो वादीसे बस्तिको फाडकर जो मूत्र निकले वह मंद मंद थोडा थोडा पीडाके साथ अथवा पीडारहित रुधिरसहित निकले ऐसे विगुणवायुसे उत्पन्नहुई इस व्याधिको मूत्रोत्संग कहते हैं ॥ मूत्रक्षयके लक्षण । रूक्षस्य क्लान्तदेहस्य बस्तिस्थौ पित्तमारुतौ । मूत्रक्षयं सरुग्दाहं जनयेतां तदाह्वयम् ॥ १२ ॥ रूखा भया अथवा श्रांत ( थकगया ) देह जिसका ऐसे पुरुषके बस्ति ( मूत्रा- शय ) में स्थित जो पित्त और वायु सो मूत्रको क्षय करे और पीडा तथा दाह होता है उसको मूत्रक्षय ऐसे कहते हैं ॥ मूत्रग्रन्थिके लक्षण । अन्तर्बस्तिमुखे वृत्तं स्थिरोऽल्पः सहसा भवेत् । अश्मरीतुल्यरुग्ग्रन्थिर्मूत्रग्रन्थिः स उच्यते ॥ १३ ॥ बस्तिके मुखमें गोल स्थिर छोटीसी गांठ अकस्मात् होय उसमें पथरीके समान पीडा होय इस रोगको मूत्रग्रन्थि कहते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १८४ ) माधवनिदान ।
( १८४ ) माधवनिदान । मूत्रशुक्रके लक्षण । मूत्रितस्य स्त्रियं यातो वायुना शुक्रमूद्धतम् । स्थानाच्च्युतं मूत्रयतः प्राक्पश्चाद्वा प्रवर्तते ॥ १४ ॥ भस्मोदकप्रतीकाशं मूत्रशुक्रं तदुच्यते । मूत्रबाधाको रोकके जो मनुष्य स्त्रीसंग करे उसके वायु शुक्रको उडाय स्थानसे भ्रष्ट करे, तब मूतनेके पहिले अथवा मूतनेके पीछे शुक्र गिरे और उसका वर्ण राख मिले पानीके समान होय, उसको मूत्रशुक्र कहते हैं ॥ उष्णवातके लक्षण । व्यायामाध्वातपैः पित्तं बस्तिं प्राप्यानिलायुतम् ॥ १५ ॥ बस्तिं मेढ्रं गुदं चैव प्रदहेत्स्त्रावयेदधः । मूत्रं हारिद्रमथवा सरक्तं रक्तमेव च ॥ कृच्छ्रात्पुनःपुनर्जन्तोरुष्णवातं वदन्ति तम् ॥ १६ ॥ व्यायाम ( दण्ड कसरत ), अति मार्गका चलना और धूपमें डोलना इन कार- णोंसे कुपितभया जो पित्त सो बस्तिमें प्राप्त हो वायुसे मिल बस्ति, लिंग और गुदा इनमें दाह करे और हलदीके समान अथवा कुछ रक्तसे युक्त वा लाल ऐसा मूत्रका स्राव बारम्बार कष्टसे होय, उसको उष्णवात रोग कहते हैं । यही रोग सुजाकके नामसे भाषामें बोला जाता है ॥ मूत्रसादके लक्षण । पित्तं कफो द्वावपि वा संहन्येतेऽनिलेन चेत् । कृच्छ्रान्मूत्रं तदा पीतं रक्तं श्वेतं घनं सृजेत् ॥ १७ ॥ सदाहं रोचनाशङ्खचूर्णवर्णं भवेत्तु तत् । शुष्कं समस्तवर्णं वा मूत्रसादं वदन्ति तम् ॥ १८ ॥ पित्त अथवा कफ वा दोनों वायुकरके बिगडे हुए होयें, तब मनुष्य पीला, लाल, सफेद, गाढा ऐसा कष्टसे मूते और मूतनेके समय दाह होय और जब वह मूत्र पृथ्वीमें सूख जाय तब गोरोचन, शंखका चूर्ण ऐसा वर्ण होय अथवा सर्व वर्णका होय इस रोगको मूत्रसाद कहे हैं ॥ विड्विघातके लक्षण । रूक्षदुर्बलयोर्वातेनोदावर्त्तं शकृद्यदा ॥ १९ ॥ मूत्रस्रोतोऽनुपद्येत विट्सृष्टं तदा नरः । विड्गन्धं मूत्रयेत्कृच्छ्राद्विड्विघातं विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
द्रुताध्वलङ्घनायासैरभिघातात्प्रपीडनात् । स्वस्थानाद्वस्ति-
भाषाटीकासमेत । ( १८५ ) रूक्ष और दुर्बल पुरुषके शकृत् ( मल ) जब वायुकरके प्रेरित उदावर्तको प्राप्त हो तब वह मल मूत्रके मार्गमें आवै उस समय मनुष्य मूतने लगे तौ बड़े कष्टसे मूत्र उतरे और उसके मूत्रमें विष्ठाकीसी दुर्गंध आवै, उसको विड्विघात कहते हैं ॥ बस्तिकुण्डलरोगके लक्षण । द्रुताध्वलङ्घनायासैरभिघातात्प्रपीडनात् । स्वस्थानाद्वस्ति- रुद्वृत्तः स्थूलस्तिष्ठति गर्भवत् ॥ २१ ॥ शूलस्पन्दनदाहार्तो बिन्दुं बिन्दुं स्रवत्यपि । पीडितस्तु सृजेद्धारां संरम्भोद्वेष्ट- नार्तिमान् ॥ २२ ॥ बस्तिकुण्डलमाहुस्तं घोरं शस्त्रविषोप- मम् । पवनप्रबलं प्रायो दुर्निवारमबुद्धिभिः ॥ २३ ॥ जल्दी चलनेसे, लंघन करनेसे, परिश्रमसे, लकड़ी आदिकी चोट लगनेसे पीडासे वस्ति अपने स्थानको छोड़ ऊपर जाय मोटी होकर गर्भके समान कठिन रहे उससे शूल, कम्प और दाह ये होयँ । मूतकी एक एक बून्द गिरे, यदि वास्त जोरसे पीडित होय तो बड़ी धार पड़े, वेगसे हटनेके समान पीडा होय । इस रोगको बस्तिकुण्डल ऐसे कहते हैं । यह शस्त्रके समान जल्दी प्राणनाशक और विषके समान कालांतरमें प्राणका नाशकर्त्ता भयंकर है । इसमें प्रायः वायु प्रबल है, मन्द बुद्धिवाले वैद्योंसे इसका निवारण ( चिकित्सा ) करना कठिन है ॥ इसको अन्य दोषोंके सम्बन्ध होनेसे जो लक्षण होते हैं उनको कहता हूँ- तस्मिन्पित्तान्विते दाहः शूलं मूत्रविवर्णता । श्लेष्मणा गौरवं शोथः स्निग्धं मूत्रं घनं सितम् ॥ २४ ॥ वही बस्तिकुण्डल पित्तयुक्त होनेसे दाह और मूत्रका बुरा रंग होय और कफयुक्त होनेसे जडत्व, सूजन, मूत्र चिकना, गाढा, सफेद ऐसा होय ॥ साध्यासाध्यके लक्षण । श्लेष्मरुद्धबिलो बस्तिः पित्तोदीर्णो न सिध्यति । अविभ्रान्तबिलः साध्यो न च यः कुण्डलीकृतः ॥ २५ ॥ कफ करके जिसका मुख बन्द होय ऐसी और पित्तकरके व्याप्तभई ऐसी वस्ति साध्य नहीं होय और जिस बस्तिका मुख खुला होय तथा कुण्डलीकृत होय सो साध्य नहीं है ॥ कुण्डलीभूतके लक्षण । स्याद्बस्तौ कुण्डलीभूते तृण्मोहः श्वास एव च ॥ २६ ॥ बस्ति कुण्डलीभूत होनेसे प्यास मूर्च्छा और श्वास ये लक्षण होयँ ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्यदीपिकायां माथुरीभाषा- टीकायां मूत्राघातनिदानं समाप्तम् ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १८६ ) माधवनिदान ।
( १८६ ) माधवनिदान । अथाश्मरीरोगनिदानम् । वातपित्तकफैस्तिस्रश्चतुर्थी शुक्रजाऽपरा । प्रायः श्लेष्माश्रयाः सर्वा अश्मर्यः स्युर्यमोपमाः ॥ १ ॥ वात, पित्त, कफ इनसे ३, चौथी शुक्रसे अश्मरी (पथरी) रोग होय है यह पथरी विशेषकरके कफाश्रित है । " यमोपमा" कहिये अच्छी चिकित्सा न होय तो ये अवश्य प्राणनाशक हैं ॥ अश्मरीकी सम्प्राप्ति । विशोषयेद्वस्तिगतं सशुकं मूत्रं सपित्तं पवनः कफं वा । यदा तदाऽश्मर्युपजायते च क्रमेण पित्तेष्विव रोचना गोः ॥२॥ जिस मनुष्योंका वायु बस्तिमें प्राप्त हुआ, शुक्रयुक्त अथवा पित्तयुक्त मूत्र अथवा कफको सुखावे तब उस स्थानमें पथरी प्रगट होती है, जैसे गऊके पित्तमें गोरोचन जमे है उसी प्रकार बस्तिमें वीर्यसे पथरी होय ॥ अश्मरीका पूर्वरूप । नैकदोषाश्रयाः सर्वा अश्मर्याः पूर्वरक्षणम् । बस्त्याध्मानं तदासन्नदेशेषु परितोऽतिरुक्॥ मूत्रे बस्तसगन्धत्वं मूत्रकृच्छ्रं ज्वरोऽरुचिः ॥ ३ ॥ सब अश्मरी ( पथरी ) एक दोषके आश्रय नहीं हैं अर्थात् अनेक दोषाश्रित हैं बस्तिका फूलना, बस्तिके आसपास अत्यन्त पीडा होनी, मूत्रमें बकरेके पेशाबकीसी दुर्गन्ध आवे, मूत्रकृच्छ्र, ज्वर, अरुचि ये पथरीके पूर्वरूप जानने ॥ पथरीके सामान्य लक्षण । सामान्यलिङ्गं रुङ्नाभिसेवनीबस्तिमूर्धसु । विशीर्णधारं मूत्रं स्यात्तया मार्गे निरोधिते ॥ ४ ॥ तद्व्यपायात्सुखं मेहेदच्छगोमेद- कोपमम् । तत्संक्षोभात्क्षते सास्त्रमायासाच्चातिरुग्भवेत् ॥ ५ ॥ नाभि सेवनी (अण्डकोशके समीपका सीमनका भाग) और बस्तिका अग्र- भाग इनमें शूल होय, पथरीके योगसे मूत्रमार्ग रुकनेसे मूत्रकी धार फटी निकले, पथरी मूत्रमार्गके पाससे हट जाय तौ मूत्र अच्छी रीतिसे उतरे और स्वच्छ गोमेद मणिके समान होय, अश्मरी (पथरी) के योगसे बस्तिमें घाव होनेसे रुधिर मिला मूत्र उतरे, और मूतते समय जोर करनेसे बडा क्लेश और पीडा होय ये सामान्य लक्षण जानने ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( १८७) वातकी पथरीके लक्षण । तत्र वाताद् भृशं चार्तो दन्तान्खादति वेपते । मथ्नाति मेहनं नाभिं पीडयत्यनिशं क्वणन् ॥ ६ ॥ सानिलं मुञ्चति शकृन्मुहुर्मेहति बिन्दुशः । श्यावा रूक्षाऽश्मरी चास्य स्याच्चिता कण्टकैरिव ॥ ७ ॥ वायुकी पथरीसे रोगी अत्यन्त पीडा करके व्याप्त होय, दांतोंको चबावे, कांपे, लिंगको हाथसे रगडे, नाभिको रगडे और रातदिन दुःखसे रोवे और मूत्र आनेके समय पीडा होनेके कारण अधोवायुका परित्याग करे, मूत्र वारम्वार टपक २ गिरे, उसके पथरीका रंग नीला और रूखा होय, उसके ऊपर कांटे होयँ ॥ पित्तकी पथरीके लक्षण । पित्तेन दह्यते बस्तिः पच्यमान इवोष्मवान् । भल्लातकास्थिसंस्थाना रक्ता पीता सिताऽश्मरी ॥ ८ ॥ पित्तकी पथरीके रोगीके बस्तिमें दाह होवे और क्षारसे जैसा दाह होय ऐसी वेदना होय, बस्तिके ऊपर हाथ धरनेसे गरम मालूम होय और भिलावेकी मींगीके समान होय, लाल, पीली, काली होय ॥ कफकी पथरीके लक्षण । बस्तिर्निस्तुद्यत इव श्लेष्मणा शीतलो गुरुः । अश्मरी महती श्लक्ष्णा मधुवर्णाथवा सिता ॥ ९ ॥ कफकी पथरीसे वस्तिमें सुई चुभनेकीसी पीडा होय, शीतलपना होय और पथरी बडी मुर्गीके अण्डेसमान, चिकनी और मद्य ( दारू ) के रंगकीसी अर्थात् कुछ पीली सफेद हुईसी होय ॥ यह कफकी पथरी बहुधा बालकोंके होती हैं सो कहे हैं- एता भवन्ति बालानामेषामेव च भूयसा । आश्रयोपच्याल्पत्वादग्रहणाहरणे सुखा ॥ १० ॥ पूर्वोक्त त्रिदोषज अश्मरी ( पथरी ) विशेषकरके बालकोंके होती है, भूयसा इस षद्के कहनेसे त्रिदोषज अश्मरी बालकोंके अतिरिक्त वडोंके भी होती है, कारण उनका भारी मीठा शीतल चिकना आहार है और उनकी वस्ति छोटी तथा पुष्टता थोडी होय है, इसीसे वैद्योंको उसका चीरना फाडना काटना निकालना कठिन नहीं होय सो सुश्रुतने भी कहा है ॥
( १८८ ) माधवनिदान ।
( १८८ ) माधवनिदान । शुक्राश्मरीके लक्षण । शुक्राश्मरी तु महतां जायते शुक्रधारणात् ॥ ११ ॥ स्थाना- च्च्युतममुक्तं हि मुष्कयोरन्तरेऽनिलः । शोषयत्युपसंहृत्य शुक्रं तच्छुष्कमश्मरी ॥ १२ ॥ बस्तिरुक्कूच्छ्रमूत्रत्वं मुष्क- श्वयथुकारिणी । तस्यामुत्पन्नमात्रायां शुक्रमेति विली- यते ॥ १३ ॥ पीडिते त्ववकाशोऽस्मिन्नश्मर्येव च शर्करा । शुक्राश्मरी पथरी यह शुक्र ( वीर्य ) के रोकनेसे बडे मनुष्योंको ही होती है । मैथुन करनेके समय अपने स्थानसे चलायमान होगया वह वीर्य उस समय मैथुन न करे तब शुक्र (वीर्य) बाहर नहीं निकले, भीतर ही रहे तब वायु उस शुक्रको उठाकर सुखा देता है। उसीको शुक्रजाश्मरी कहते हैं। इस करिके अंडकोषोंमें सूजन, वस्तिमें पीडा और मूत्रकृच्छ्रता होती है। शुक्राश्मरीकी आदिमें लिंग और अंडकोष पेडु इनमें पीडा होती है। वीर्यके नाश होनेके कारण पथरीकी नाईं शर्करा उत्पन्न होती है ॥ पथरीशर्कराके उपद्रव । अणुशो वायुना भिन्ना सा तस्मिन्ननुलोमगे ॥ १४ ॥ निरेति सह मूत्रेण प्रतिलोमे विबध्यते । मूत्रस्रोतःप्रवृत्ता सा सक्ता कुर्यादुपद्रवान् ॥ १५ ॥ दौर्बल्यं सदनं कार्श्यं कुक्षिशूल- मथारुचिम् । पाण्डुत्वमुष्णवातं च तृष्णां हृत्पीडनं वमिम् ॥ १६॥ वायु बस्तिमें अनुलोमगतिसे प्रवेश होय तौ वह शर्करा वायुकरके छोटी २ इकट्ठी होकर मूत्रके साथ बाहर निकले, और यदि वायु प्रतिलोम होय तो मूत्रमार्गको रोक दे, यदि मूत्रमार्गमें प्राप्त होय तो मूत्रके बहनेवाले छिद्रोंको रोक दे, फिर इतने उपद्रवोंको प्रगट करे । दुर्बलता, ग्लानि, कृशता, कूखमें शूल, अरुचि, पाण्डुरोग, उष्णवात, प्यास, हृदयमें पीडा, वमन ये सब उपद्रव होयँ ॥ असाध्य लक्षण । प्रशूननाभिवृषणं बद्धमूत्रं रुजान्वितम् । अश्मरी क्षपयत्याशु शर्करा सिकतान्विता ॥ १७ ॥ जिसकी नाभि और वृषण सूजजाय, मूत्र उतरे नहीं, शूलसे पीडित होय ऐसे पुरुषके शर्करा और सिकतायुक्त पथरी प्राणनाश करै ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनिमाथुरीभाषा- टीकायामश्मरीनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
माधवनिदानम् ।
ॐ श्रीशं वन्दे । 189 माधवनिदानम् । भाषाटीकासमेतम् । उत्तर भाग । अथ प्रमेहनिदानम् । आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि । नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ॥ १ ॥ बैठनेके सुखसे, निद्राके सुखसे अथवा स्वप्नसुख कहिये स्वप्नमें स्त्रीप्रसंग आदि सुखसे, दही, ग्रामके संचारी जीव भेड बकरी आदि, जलके संचारी जीव मच्छी कछुआ आदि, अनूप ( जलसमीप ) के रहनेवाले जीव हंस चकवा आदि प्राणियोंके मांसरस, दूध, नया अन्न और नया जल तथा शर्करा आदि गुडके पदार्थ अथवा गुडके विकार ये और जितने कफकारक पदार्थ हैं सो सब प्रमेह होनेके कारण हैं ॥ कफपित्तवातप्रमेहोंकी क्रमसे सम्प्राप्ति । मेदश्च मांसं च शरीरजं च क्लेदं कफो बस्तिगतः प्रदूष्य । करोति मेहान्समुदीर्णमुष्णैस्तानेव पित्तं परिदूष्य चापि ॥ २ ॥ क्षीनेषु दोषेष्ववकृष्य धातून्संदूष्य मेहान्कुरुतेऽनिलश्च । साध्याः कफोत्था दश पित्तजाः षड् याप्या न साध्याः पवनाच्चतुष्काः॥ समक्रियत्वाद्विषमक्रियत्वान्महात्ययत्वाच्च यथाक्रमं ते ॥ ३ ॥ बस्ति ( मूत्रस्थान ) गत कफ मेद मांस और शरीरके क्लेदको बिगाडकर प्रमे- हको उत्पन्न करे है, उसी प्रकार गरम पदार्थसे पित्त कुपित होकर पूर्वोक्त मेद मांसको बिगाडकर प्रमेहको उत्पन्न करे है और लंघन रूक्षादि पदार्थोंके सेवनसे कुपित भया वायु दोष ( पित्तकफ ) के क्षीण होनेसे धातु ( वसा मज्जा ओज लसीका ) को ईंचकर वस्तिके मुखपर लाकर प्रमेहको प्रगट करे है । कफसे प्रगट दश प्रमेह साध्य हैं । कारण इसका यह है कि, कफ दोष और मेदःप्रभृति दूष्य इनपर कटुतिक्तादि क्रिया समान है अर्थात् कटु तिक्तादिकोंसे विकृत कफ तथा मेद मांसादि शांत होते हैं । इस रोगमें रोगका ही प्रभाव ऐसा है कि, इसमें तुल्यं दूष्यको साध्य कहा है और प्रमेहके बिना और रोगोंको अतुल्य ( असमान १ ज्वरे तुल्यर्तुदोषत्वं प्रमेहे तुल्यदूष्यता । रक्तगुल्मे पुरातनत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥
( १९० ) माधवनिदान ।
( १९० ) माधवनिदान । दूष्यत्व साध्य ) का हेतु होय है । पित्तकी छः प्रमेह विषम चिकित्सा करनेसे याप्य होय हैं अर्थात् पित्त हरण करनेवाले जो शीत मधुर आदि द्रव्य वह मेदको बढाने- वाले हैं और मेद हरणकर्त्ता उष्ण कटुकादि द्रव्य वह पित्तकर्त्ता है ऐसी क्रिया विषम है। वादीसे प्रगट चार प्रमेह मज्जादि गम्भीर धातुके आकर्षण करनेसे अत्यन्त पीडा कर्त्ता है और इनकी ( महात्यय ) बडी कठिन क्रिया है । कोई कोई चकारसे विषमक्रिया ही कहते हैं इसीसे ये चार असाध्य हैं ॥ प्रमेहका दोषदूष्यसंग्रह । कफः सपित्तं पवनश्च दोषा मेदोऽस्रशुक्राम्बुवसालसीकाः । मज्जारसौजः पिशितं च दूष्याः प्रमेहिनां विंशतिरेव मेहाः ॥ ४ ॥ कफ पित्त और वादी ये दोष और मेद रुधिर शुक्र जल मांस स्नेह ( चर्बी) लसीका ( मांसका जल ) मज्जारस ओज और मांस ये दूष्य जानने । इन दोष और दूष्य दोनोंसे बीस प्रकारके प्रमेह होते हैं ॥ प्रमेहका पूर्वरूप । दन्तादीनां मलाढ्यत्वं प्राग्रूपं पाणिपादयोः । दाहश्चिक्कणता देहे तृट्श्वासश्चोपजायते ॥ ५ ॥ दांतोंमें आदिशब्दसे जिह्वा तालु आदिका ग्रहण जानना इनमें मैल बहुत रहे, हाथ पैरमें दाह, अङ्गका चिकनापना, प्यास, श्वास, चकारसे केशों ( बालों ) का आपसमें लिपट जाना और नखोंका बढना ये प्रमेहके पूर्वरूप होते हैं ॥ सामान्य लक्षण । सामान्यं लक्षणं तेषां प्रभूताविलमूत्रता ॥ ६ ॥ बहुत और गाढा मूत्र उतरे ये प्रमेहके सामान्य लक्षण हैं। प्रमेहके कारण । दोषदूष्यविशेषेऽपि तत्संयोगविशेषतः । मूत्रवर्णादिभेदेन भेदो मेहेषु कल्प्यते ॥ ७ ॥ दोष और दूष्य इनके भेद न होनेसे परन्तु दोष और दूष्य इनके संयोगभेदसे मूत्र वर्णादि भेद करके प्रमेहमें भेद होते हैं । दश छः चार इत्यादिक दोष ( वात पित्त कफ ) दूष्य ( मांस मेद मज्जादि ) जैसे सफेद पीला काला तांबेके रंगका और श्याम इन पांच रंगोंके संयोग करनेसे पिंगल पाटलादि अनेक वर्णभेद होते हैं इसी प्रकार दोषादिकोंके संयोगसे नानाप्रकारके प्रमेह होते हैं ॥ १ यत्तु मांसत्वगन्तरे उदकं तल्लसीकासञ्ज्ञं लभते ।
भाषाटीकासमेत । ( १९१ ) संयोग भेदकी कैसे प्रतीति हो ऐसे कोई पूछे तो उसके वास्ते कहते हैं-मूत्रके वर्णादिभेदसे समान कारणोंके भेद कल्पना करने चाहिये जैसे-घट (घडा) बनानेके समय मृत्तिकादि कारण सामग्रीमें भेद नहीं है परन्तु कुम्भकारादि (कुम्हार आदि) प्रयत्नभेद करके घडा सरवा मटकना आदि अनेक जातिभेद हो जाते हैं और यह तो तत्तत् (उन उन) आहारादिकोंका जो अदृष्ट फल है वेही संयोगभेदके हेतु हैं ॥ कफकी १० प्रमेहके लक्षण । अच्छं बहु सितं शीतं निर्गन्धमुदकोपमम् । मेहत्युदकमेहेन किंचिदाविलपिच्छिलम् ॥ ८ ॥ इक्षो रसमिवात्यर्थं मधुरं चेक्षु- मेहतः। सान्द्रीभवेत्पर्युषितं सान्द्रमेहेन मेहति ॥९॥ सुरामेही सुरातुल्यमुपर्यच्छमधो घनम् । संहृष्टरोमा पिष्टेन पिष्टवद्ब- हुलं सितम्॥१०॥ शुक्राभं शुक्रमिश्रं वा शुक्रमेही प्रमेहति । मूत्राणूसिकतामेही सिकतारूपिणो मलान्॥११॥ शीतमेही सुबहुशो मधुरं भृशशीतलम् । शनैः शनैः शनैर्मेही मन्दं मन्दं प्रमेहति ॥ लालातन्तुयुतं मूत्रं लालामेहेन पिच्छिलम् ॥ १२ ॥ १-उदकप्रमेहकरके स्वच्छ बहुत सफेद शीतल गन्धरहित पानीके समान कुछ गाढा और चिकना मूते है। २-इक्षुप्रमेहसे ईखके रससमान अत्यन्त मीठा ऐसा मूत्र होय । ३-सांद्रप्रमेहसे रात्रिमें पात्रमें धरनेसे जैसा होवे ऐसा मूत्र होय । ४-सुरा- प्रमेहसे-दारूके समान ऊपर निर्मल और नीचे गाढा ऐसा मूते । ५-पिष्टप्रमेहसे पिसे चावलोंके पानीसमान सफेद और बहुत मूते तथा मूतते समय रोमांच होय । ६-शुक्रप्रमेहसे शुक्र (वीर्य) के समान अथवा शुक्रमिला मूत्र होय । ७-सिकता- मेहसे मूत्रके कण और बालूरेतके समान मलके रवा गिरे । ८-शीतमेहसे मधुर तथा अत्यन्त शीतल ऐसा बारबार बहुत मूते । ९-शनैर्मेहसे धीरे २ और मन्द मन्द मूते । १०-लालाप्रमेहसे लारके समान तारयुक्त और चिकना मूत्र होय है ॥ पित्तकी ६ प्रमेहकं लक्षण । गन्धवर्णरसस्पर्शैः क्षारेण क्षारतोयवत् ॥ १३ ॥ नीलमेहेन नीलाभं कालमेही मषीनिभम् । हारिद्रमेही कटुकं हरिद्रा- सन्निभं दहेत् ॥ १४ ॥ विस्रं माञ्जिष्ठमेहेन मञ्जिष्ठासलिलोप- मम् । विस्रमुष्णं सलवणं रक्ताभं रक्तमेहतः ॥ १५ ॥ ११-क्षारप्रमेहसे खारी जलके समान गन्ध वर्ण रस और स्पर्श ऐसा मूत्र होता है । १२-नीलप्रमेहसे नीले रंगका अर्थात् पपैया पक्षीके पंखके सदृश मूते ।
( १९२ ) माधवनिदान ।
( १९२ ) माधवनिदान । १३-कालप्रमेहसे स्याईके समान काला मूते । १४-हारिद्रप्रमेहसे तीक्ष्ण हल्दीके समान और दाहयुक्त मूते। १५-मांञ्जिष्ठप्रमेहसे आम दुर्गंध और मंजीठके समान मूते । १६-रक्तप्रमेहसे दुर्गंधयुक्त गरम खारी और रुधिरके समान लाल मूत्र करे ॥ वातकी ४ प्रमेहके लक्षण । वसामेही वसामिश्रं वसाभं मूत्रयेन्मुहुः । मज्जाभं मज्जामिश्रं वा मज्जमेही मुहुर्मुहुः ॥ १६ ॥ कषायमधुरं रूक्षं क्षौद्रमेहं वदेद् बुधः । हस्ती मत्त इवाजस्रं मूत्रं वेगविवर्जितम् ॥ साल- सीकं विबद्धं च हस्तिमेही प्रमेहति ॥ १७ ॥ १७-वसाप्रमेही वसा ( चर्बी ) युक्त अथवा वसाके समान मूते । १८-मज्जा- प्रमेही मज्जाके समान अथवा मज्जा मिला बारम्बार मूते । १९-क्षौद्रप्रमेही कसैला मीठा और चिकना ऐसा मूते । २०-हस्तिममेही मस्त हाथीके समान निरन्तर वेग- रहित जिसमें तार निकले और ठहर ठहरके मूते ॥ कफप्रमेहके उपद्रव । अविपाकोऽरुचिश्छर्दिर्ज्वरः कासः सपीनसः । उपद्रवाः प्रजायन्ते मेहानां कफजन्मनाम् ॥ १८ ॥ अन्नका परिपाक न होय, अरुचि, वमन, ज्वर, खांसी, पीनस ये कफप्रमेहके उपद्रव हैं ॥ पित्तप्रमेहके उपद्रव । बस्तिमेहनयोः शूलं मुष्कावदरणं ज्वरः । दाहस्तृष्णाम्लिकामूर्च्छा विड्भेदः पित्तजन्मनाम् ॥ १९ ॥ बस्ति और लिंगमें पीडा होय, अण्डकोशोंका पककर फटना, ज्वर, प्यास, खट्टी डकार, मूर्च्छा और पतला दस्त होय ये पित्तप्रमेहके उपद्रव हैं ॥ वातप्रमेहके उपद्रव । वातजानामुदावर्तकण्ठहृद्ग्रहलोलताः । शूलमुन्निद्रता शोषः कासः श्वासश्च जायते ॥ २० ॥ उदावर्त, गला, हृदय इनका रुकना, लोलता ( सर्वरसभक्षणेच्छा ), शूल, निद्रा- नाश, शोष, सूखी खांसी, श्वास ये वातप्रमेहके उपद्रव हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA