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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

'राजेन्द्र! तुम रातके अन्तमें स्वप्नमें उन वृषभध्वज भगवान् शंकरका दर्शन करोगे, जो नीलकण्ठ, भव, स्थाणु, कपाली, त्रिपुरान्तक, उग्र, रुद्र, पशुपति, महादेव, उमापति, हर, शर्व, वृष, शूली, पिनाकी तथा कृत्तिवासा कहलाते हैं।। १३-१४ ।। कैलासकूटप्रतिमं वृषभेऽवस्थितं शिवम् ।
निरीक्षमाणं सततं पितृराजाश्रितां दिशम् ।। १५ ।।
'उन भगवान् शिवकी कान्ति कैलासशिखरके समान उज्ज्वल होगी। वे वृषभपर आरूढ़ हुए सदा दक्षिण दिशाकी ओर देख रहे होंगे ।। १५ ।।
एवमीदृशकं स्वप्नं द्रक्ष्यसि त्वं विशाम्पते ।
मा तत्कृते ह्यनुध्याहि कालो हि दुरतिक्रमः ।। १६ ।।
'राजन्! तुम्हें इस प्रकार ऐसा स्वप्न दिखायी देगा, किंतु उसके लिये तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि काल सबके लिये दुर्लङ्घ्य है ।। १६ ।।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि कैलासं पर्वतं प्रति ।
अप्रमत्तः स्थितो दान्तः पृथिवीं परिपालय ।। १७ ।।
'तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं कैलासपर्वतपर जाऊँगा। तुम सावधान एवं जितेन्द्रिय होकर पृथ्वीका पालन करो' ।। १७ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा स भगवान् कैलासं पर्वतं ययौ ।
कृष्णद्वैपायनो व्यासः सह शिष्यैः श्रुतानुगैः ।। १८ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर भगवान् कृष्ण द्वैपायन व्यास वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले अपने शिष्योंके साथ कैलासपर्वतपर चले गये ।। १८ ।।
गते पितामहे राजा चिन्ताशोकसमन्वितः ।
निःश्वसन्नुष्णमसकृत् तमेवार्थं विचिन्तयन् ।। १९ ।।
कथं नु दैवं शक्येत पौरुषेण प्रबाधितुम् ।
अवश्यमेव भविता यदुक्तं परमर्षिणा ।। २० ।।
अपने पितामह व्यासजीके चले जानेपर चिन्ता और शोकसे युक्त राजा युधिष्ठिर बारंबार गरम साँसें लेते हुए उसी बातका चिन्तन करते रहे। अहो! दैवका विधान पुरुषार्थसे किस प्रकार टाला जा सकता है? महर्षिने जो कुछ कहा है, वह निश्चय ही होगा ।। १९-२० ।।
ततोऽब्रवीन्महातेजाः सर्वान् भ्रातॄन् युधिष्ठिरः ।
श्रुतं वै पुरुषव्याघ्रा यन्मां द्वैपायनोऽब्रवीत् ।। २१ ।।
तदा तद्वचनं श्रुत्वा मरणे निश्चिता मतिः ।
सर्वक्षत्रस्य निधने यद्यहं हेतुरीप्सितः ।। २२ ।।

कालेन निर्मितस्तात को ममार्थोऽस्ति जीवतः ।
एवं ब्रुवन्तं राजानं फाल्गुनः प्रत्यभाषत ॥ २३ ॥

यही सोचते-सोचते महातेजस्वी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे कहा—'पुरुषसिंहो! महर्षि व्यासने मुझसे जो कहा है, उसे तुमलोगोंने सुना है न? उनकी वह बात सुनकर मैंने मरनेका निश्चय कर लिया है। तात! यदि समस्त क्षत्रियोंके विनाशमें विधाताने मुझे ही निमित्त बनानेकी इच्छा की है, कालने मुझे ही इस अनर्थका कारण बनाया है तो मेरे जीवनका क्या प्रयोजन है?' राजाकी ऐसी बातें सुनकर अर्जुनने उत्तर दिया— ॥ २१—२३ ॥

मा राजन् कश्मलं घोरं प्रविशो बुद्धिनाशनम् ।
सम्प्रधार्य महाराज यत् क्षेमं तत् समाचर ॥ २४ ॥

'राजन्! इस भयंकर मोहमें न पड़िये, यह बुद्धिको नष्ट करनेवाला है। महाराज! अच्छी तरह सोच-विचारकर आपको जो कल्याणप्रद जान पड़े, वह कीजिये' ॥ २४ ॥

ततोऽब्रवीत् सत्यधृतिर्भ्रातॄन् सर्वान् युधिष्ठिरः ।
द्वैपायनस्य वचनं ह्येवं समनुचिन्तयन् ॥ २५ ॥

तब सत्यवादी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे व्यासजीकी बातोंपर विचार करते हुए कहा— ॥ २५ ॥

अद्यप्रभृति भद्रं वः प्रतिज्ञां मे निबोधत ।
त्रयोदश समास्तात को ममार्थोऽस्ति जीवतः ॥ २६ ॥

'तात! तुमलोगोंका कल्याण हो, भाइयोंके विनाशका कारण बननेके लिये मुझे तेरह वर्षोंतक जीवित रहनेसे क्या लाभ? यदि जीना ही है तो आजसे मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो— ॥ २६ ॥

न प्रवक्ष्यामि परुषं भ्रातॄन्यांश्च पार्थिवान् ।
स्थितो निदेशे ज्ञातीनां योक्ष्ये तत् समुदाहरन् ॥ २७ ॥

'मैं अपने भाइयों तथा दूसरे राजाओंसे कभी कड़वी बात नहीं बोलूँगा। बन्धु-बान्धवोंकी आज्ञामें रहकर प्रसन्नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ लानेमें संलग्न रहूँगा' ॥ २७ ॥

एवं मे वर्तमानस्य स्वसुतेष्वितरेषु च ।
भेदो न भविता लोके भेदमूलो हि विग्रहः ॥ २८ ॥

'इस प्रकार समतापूर्ण बर्ताव करते हुए मेरा अपने पुत्रों तथा दूसरोंके प्रति भेदभाव न होगा; क्योंकि जगत्में लड़ाई-झगड़ेका मूल कारण भेदभाव ही है ॥ २८ ॥

विग्रहं दूरतो रक्षन् प्रियाण्येव समाचरन् ।
वाच्यतां न गमिष्यामि लोकेषु मनुजर्षभाः ॥ २९ ॥

‘नररत्न! विग्रह या वैर-विरोधको अपनेसे दूर ही रखकर सबका प्रिय करते हुए मैं संसारमें निन्दाका पात्र नहीं हो सकूँगा’ ॥ २९ ॥ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य वचनं पाण्डवाः संनिशम्य तत् । तमेव समवर्तन्त धर्मराजहिते रताः ॥ ३० ॥ अपने बड़े भाईकी वह बात सुनकर सब पाण्डव उन्हींके हितमें तत्पर हो सदा उनका ही अनुसरण करने लगे ॥ ३० ॥ संसत्सु समयं कृत्वा धर्मराड् भ्रातृभिः सह । पितॄंस्तर्प्य यथान्यायं देवतांश्च विशाम्पते ॥ ३१ ॥ राजन्! धर्मराजने अपने भाइयोंके साथ भरी सभामें यह प्रतिज्ञा करके देवताओं तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण किया ॥ ३१ ॥ कृतमङ्गलकल्याणो भ्रातृभिः परिवारितः । गतेषु क्षत्रियेन्द्रेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥ ३२ ॥ युधिष्ठिरः सहामात्यः प्रविवेश पुरोत्तमम् । दुर्योधनो महाराज शकुनिश्चापि सौबलः । सभायां रमणीयायां तत्रैवास्ते नराधिप ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ जनमेजय! समस्त क्षत्रियोंके चले जानेपर कल्याणमय मांगलिक कृत्य पूर्ण करके भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने मन्त्रियोंके साथ अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया। महाराज! दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि ये दोनों उस रमणीय सभामें ही रह गये ॥ ३२-३३ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरसमये षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिर-प्रतिज्ञाविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2027)

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना

वैशम्पायन उवाच

वसन् दुर्योधनस्तस्यां सभायां पुरुषर्षभ ।
शनैर्ददर्श तां सर्वां सभां शकुनिना सह ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा दुर्योधनने उस सभाभवनमें निवास करते समय शकुनिके साथ धीरे-धीरे उस सारी सभाका निरीक्षण किया ॥ १ ॥

तस्यां दिव्यान्भिप्रायन् ददर्श कुरुनन्दनः ।
न दृष्टपूर्वा ये तेन नगरे नागसाह्वये ॥ २ ॥
कुरुनन्दन दुर्योधन उस सभामें उन दिव्य अभिप्रायों (दृश्यों)-को देखने लगा, जिन्हें उसने हस्तिनापुरमें पहले कभी नहीं देखा था ॥ २ ॥

स कदाचित् सभामध्ये धार्तराष्ट्रो महीपतिः ।
स्फाटिकं स्थलमासाद्य जलमित्यभिशङ्कया ॥ ३ ॥
स्ववस्त्रोत्कर्षणं राजा कृतवान् बुद्धिमोहितः ।
दुर्मना विमुखश्चैव परिचक्राम तां सभाम् ॥ ४ ॥
एक दिनकी बात है, राजा दुर्योधन उस सभाभवनमें घूमता हुआ स्फटिक-मणिमय स्थलपर जा पहुँचा और वहाँ जलकी आशंकासे उसने अपना वस्त्र ऊपर उठा लिया। इस प्रकार बुद्धि-मोह हो जानेसे उसका मन उदास हो गया और वह उस स्थानसे लौटकर सभामें दूसरी ओर चक्कर लगाने लगा ॥ ३-४ ॥

ततः स्थले निपतितो दुर्मना व्रीडितो नृपः ।
निःश्वसन् विमुखश्चापि परिचक्राम तां सभाम् ॥ ५ ॥
तदनन्तर वह स्थलमें ही गिर पड़ा, इससे वह मन-ही-मन दुःखी और लज्जित हो गया तथा वहाँसे हटकर लम्बी साँसें लेता हुआ सभाभवनमें घूमने लगा ॥ ५ ॥

ततः स्फाटिकतोयां वै स्फाटिकाम्बुजशोभिताम् ।
वापीं मत्वा स्थलमिव सवासाः प्रापतज्जले ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् स्फटिकमणिके समान स्वच्छ जलसे भरी और स्फटिकमणिमय कमलोंसे सुशोभित बावलीको स्थल मानकर वह वस्त्रसहित जलमें गिर पड़ा ॥ ६ ॥

जले निपतितं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः ।

जहास जहसुश्चैव किंकराश्च सुयोधनम् ॥ ७ ॥ वासांसि च शुभान्यस्मै प्रददू राजशासनात् । तथागतं तु तं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः ॥ ८ ॥ अर्जुनश्च यमौ चोभौ सर्वे ते प्राहसंस्तदा । नामर्षयत् ततस्तेषामवहासममर्षणः ॥ ९ ॥ उसे जलमें गिरा देख महाबली भीमसेन हँसने लगे। उनके सेवकोंने भी दुर्योधनकी हँसी उड़ायी तथा राजाज्ञासे उन्होंने दुर्योधनको सुन्दर वस्त्र दिये। दुर्योधनकी यह दुरवस्था देख महाबली भीमसेन, अर्जुन और नकुल-सहदेव सभी उस समय जोर-जोरसे हँसने लगे। दुर्योधन स्वभावसे ही अमर्षशील था; अतः वह उनका उपहास न सह सका ॥

आकारं रक्षमाणस्तु न स तान् समुदैक्षत । पुनर्वसनमुत्क्षिप्य प्रतरिष्यन्निव स्थलम् ॥ १० ॥ वह अपने चेहरेके भावको छिपाये रखनेके लिये उनकी ओर दृष्टि नहीं डालता था। फिर स्थलमें ही जलका भ्रम हो जानेसे वह कपड़े उठाकर इस प्रकार चलने लगा; मानो तैरनेकी तैयारी कर रहा हो ॥ १० ॥

आरुरोह ततः सर्वे जहसुश्च पुनर्जनाः । द्वारं तु पिहिताकारं स्फाटिकं प्रेक्ष्य भूमिपः । प्रविशन्नाहतो मूर्ध्नि व्याघूर्णित इव स्थितः ॥ ११ ॥ इस प्रकार जब वह ऊपर चढ़ा, तब सब लोग उसकी भ्रान्तिपर हँसने लगे। उसके बाद राजा दुर्योधनने एक स्फटिकमणिका बना हुआ दरवाजा देखा, जो वास्तवमें बंद था, तो भी खुला दीखता था। उसमें प्रवेश करते ही उसका सिर टकरा गया और उसे चक्कर-सा आ गया ॥

तादृशं च परं द्वारं स्फाटिकोरुकपाटकम् । विघट्टयन् कराभ्यां तु निष्क्रम्याग्रे पपात ह ॥ १२ ॥ ठीक उसी तरहका एक दूसरा दरवाजा मिला, जिसमें स्फटिकमणिके बड़े-बड़े किंवाड़ लगे थे। यद्यपि वह खुला था, तो भी दुर्योधनने उसे बंद समझकर उसपर दोनों हाथोंसे धक्का देना चाहा। किंतु धक्केसे वह स्वयं द्वारके बाहर निकलकर गिर पड़ा ॥ १२ ॥

द्वारं तु वितताकारं समापेदे पुनश्च सः । तद्वृत्तं चेति मन्वानो द्वारस्थानादुपारमत् ॥ १३ ॥ आगे जानेपर उसे एक बहुत बड़ा फाटक और मिला; परंतु कहीं पिछले दरवाजोंकी भाँति यहाँ भी कोई अप्रिय घटना न घटित हो इस भयसे वह उस दरवाजेके इधरसे ही लौट आया ॥ १३ ॥

एवं प्रलम्भान् विविधान् प्राप्य तत्र विशाम्पते । पाण्डवेयाभ्यनुज्ञातस्ततो दुर्योधनो नृपः ॥ १४ ॥

अप्रहृष्टेन मनसा राजसूये महाक्रतौ । प्रेक्ष्य तामद्भुतामृद्धिं जगाम गजसाह्वयम् ॥ १५ ॥ राजन्! इस प्रकार बार-बार धोखा खाकर राजा दुर्योधन राजसूय महायज्ञमें पाण्डवोंके पास आयी हुई अद्भुत समृद्धिपर दृष्टि डालकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर-की आज्ञा ले अप्रसन्न मनसे हस्तिनापुरको चला गया ॥ १४-१५ ॥ पाण्डवश्रीप्रतप्तस्य ध्यायमानस्य गच्छतः । दुर्योधनस्य नृपतेः पापा मतिरजायत ॥ १६ ॥ पाण्डवोंकी राजलक्ष्मीसे संतप्त हो उसीका चिन्तन करते हुए जानेवाले राजा दुर्योधनके मनमें पापपूर्ण विचारका उदय हुआ ॥ १६ ॥ पार्थान् सुमनसो दृष्ट्वा पार्थिवांश्च वशानुगान् । कृत्स्नं चापि हितं लोकमाकुमारं कुरुद्वह ॥ १७ ॥ महिमानं परं चापि पाण्डवानां महात्मनाम् । दुर्योधनो धार्तराष्ट्रो विवर्णः समपद्यत ॥ १८ ॥ कुरुश्रेष्ठ! यह देखकर कि कुन्तीके पुत्रोंका मन प्रसन्न है, भूमण्डलके सब नरेश उनके वशमें हैं तथा बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सारा जगत् उनका हितैषी है, इस प्रकार महात्मा पाण्डवोंकी महिमा अत्यन्त बढ़ी हुई देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनका रंग फीका पड़ गया ॥ १७-१८ ॥ स तु गच्छन्ननेकाग्रः सभामेकोऽन्वचिन्तयत् । श्रियं च तामनुपमां धर्मराजस्य धीमतः ॥ १९ ॥ रास्तेमें जाते समय वह नाना प्रकारके विचारोंसे चिन्तातुर था। वह अकेला ही परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरकी अलौकिक सभा तथा अनुपम लक्ष्मीके विषयमें सोच रहा था ॥ १९ ॥ प्रमत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रो दुर्योधनस्तदा । नाभ्यभाषत् सुबलजं भाषमाणं पुनः पुनः ॥ २० ॥ इस समय धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन उन्मत्त-सा हो रहा था। वह शकुनिके बार-बार पूछनेपर भी उसे कोई उत्तर नहीं दे रहा था ॥ २० ॥ अनेकाग्रं तु तं दृष्ट्वा शकुनिः प्रत्यभाषत । दुर्योधन कुतोमूलं निःश्वसन्निव गच्छसि ॥ २१ ॥ उसे नाना प्रकारकी चिन्ताओंसे युक्त देख शकुनि-ने पूछा—‘दुर्योधन! तुम्हें कहाँसे यह दुःखका कारण प्राप्त हो गया, जिससे तुम लंबी साँसें खींचते चल रहे हो’ ॥ २१ ॥

दुर्योधन उवाच

दृष्ट्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां युधिष्ठिरवशानुगाम् । जितामस्त्रप्रतापेन श्वेताश्वस्य महात्मनः ॥ २२ ॥ तं च यज्ञं तथाभूतं दृष्ट्वा पार्थस्य मातुल । यथा शक्रस्य देवेषु तथाभूतं महाद्युतेः ॥ २३ ॥ अमर्षेण तु सम्पूर्णो दह्यमानो दिवानिशम् । शुचिशुक्रागमे काले शुष्येत् तोयमिवाल्पकम् ॥ २४ ॥ दुर्योधनने कहा—मामाजी! मैंने देखा है, श्वेतवाहन महात्मा अर्जुनके अस्त्रोंके प्रतापसे जीती हुई यह सारी पृथ्वी युधिष्ठिरके वशमें हो गयी है। महातेजस्वी युधिष्ठिरका वह राजसूययज्ञ उसी प्रकार सम्पन्न हुआ है, जैसे देवताओंमें देवराज इन्द्रका यज्ञ पूर्ण हुआ था। यह सब देखकर मैं दिन-रात ईर्ष्यासे भरा ठीक उसी प्रकार जलता रहता हूँ, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें थोड़ा-सा जल जल्दी सूख जाता है ॥ २२—२४ ॥ पश्य सात्वतमुख्येन शिशुपालो निपातितः । न च तत्र पुमानासीत् कश्चित् तस्य पदानुगः ॥ २५ ॥ और भी देखिये, यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णने शिशुपालको मार गिराया, परंतु वहाँ कोई भी वीर पुरुष उसका बदला लेनेको तैयार नहीं हुआ ॥ २५ ॥ दह्यमाना हि राजानः पाण्डवोत्थेन वह्निना । क्षान्तवन्तोऽपराधं ते को हि तत् क्षन्तुमर्हति ॥ २६ ॥

पाण्डवजनित आगसे दग्ध होनेवाले राजाओंने वह अपराध क्षमा कर दिया। अन्यथा इतने बड़े अन्यायको कौन सह सकता है? ॥ २६॥ वासुदेवेन तत् कर्म यथायुक्तं महत् कृतम् । सिद्धं च पाण्डुपुत्राणां प्रतापेन महात्मनाम् ॥ २७॥ वासुदेव श्रीकृष्णने जैसा महान् अनुचित कर्म किया था, वह महामना पाण्डवोंके प्रतापसे सफल हो गया ॥ २७॥ तथा हि रत्नान्यादाय विविधानि नृपा नृपम् । उपातिष्ठन्त कौन्तेयं वैश्या इव करप्रदाः ॥ २८॥ जैसे कर देनेवाले व्यापारी वैश्य नाना प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर राजाकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार सब राजा अनेक प्रकारके उत्तम रत्न लेकर राजा युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित हुए थे ॥ २८॥ श्रियं तथाऽऽगतां दृष्ट्वा ज्वलन्तीमिव पाण्डवे । अमर्षवशमापन्नो दह्यामि न तथोचितः ॥ २९॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके समीप प्राप्त हुई उस प्रकाश-मयी लक्ष्मीको देखकर मैं ईर्ष्यावश जल रहा हूँ। यद्यपि मेरी यह दुरवस्था उचित नहीं है ॥ २९॥ एवं स निश्चयं कृत्वा ततो वचनमब्रवीत् । पुनर्गान्धारनृपतिं दह्यमान इवाग्निना ॥ ३०॥ ऐसा निश्चय करके दुर्योधन चिन्ताकी आगसे दग्ध-सा होता हुआ पुनः गान्धारराज शकुनिसे बोला ॥ ३०॥ वह्निमेव प्रवेक्ष्यामि भक्षयिष्यामि वा विषम् । अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम् ॥ ३१॥ मैं आगमें प्रवेश कर जाऊँगा, विष खा लूँगा अथवा जलमें डूब मरूँगा, अब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ ३१॥ को हि नाम पुमाँल्लोके मर्षयिष्यति सत्त्ववान् । सपत्नान्मृद्ध्यतो दृष्ट्वा हीनमात्मानमेव च ॥ ३२॥ संसारमें कौन ऐसा शक्तिशाली पुरुष होगा, जो शत्रुओंकी वृद्धि और अपनी हीन दशा होती देखकर भी चुपचाप सहन कर लेगा ॥ ३२॥ सोऽहं न स्त्री न चाप्यस्त्री न पुमान्नापुमानपि । योऽहं तां मर्षयाम्यद्य तादृशीं श्रियमागताम् ॥ ३३॥ मैं इस समय न तो स्त्री हूँ, न अस्त्रबलसे सम्पन्न हूँ, न पुरुष हूँ और न नपुंसक ही हूँ, तो भी अपने शत्रुओंके पास आयी हुई वैसी उत्कृष्ट सम्पत्तिको देखकर भी चुपचाप सहन कर रहा हूँ? ॥ ३३॥ ईश्वरत्वं पृथिव्याश्च वसुमत्तां च तादृशीम् ।

यज्ञं च तादृशं दृष्ट्वा मादृशः को न संज्वरेत् ॥ ३४ ॥
शत्रुओंके पास समस्त भूमण्डलका वह साम्राज्य, वैसी धन-रतनोंसे भरी सम्पदा और उनका वैसा उत्कृष्ट राजसूययज्ञ देखकर मेरे-जैसा कौन पुरुष चिन्तित न होगा? ॥ ३४ ॥
अशक्तश्चैक एवाहं तामाहर्तुं नृपश्रियम् ।
सहायांश्च न पश्यामि तेन मृत्युं विचिन्तये ॥ ३५ ॥
मैं अकेला उस राजलक्ष्मीको हड़प लेनेमें असमर्थ हूँ और अपने पास योग्य सहायक नहीं देखता हूँ, इसीलिये मृत्युका चिन्तन करता हूँ ॥ ३५ ॥
दैवमेव परं मन्ये पौरुषं च निरर्थकम् ।
दृष्ट्वा कुन्तीसुते शुद्धां श्रियं तामहतां तथा ॥ ३६ ॥
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके पास उस अक्षय विशुद्ध लक्ष्मीका संचय देख मैं दैवको ही प्रबल मानता हूँ, पुरुषार्थ तो निरर्थक जान पड़ता है ॥ ३६ ॥
कृतो यत्नो मया पूर्वं विनाशे तस्य सौबल ।
तच्च सर्वमतिक्रम्य संवृद्धोऽप्स्विव पङ्कजम् ॥ ३७ ॥
सुबलपुत्र! मैंने पहले धर्मराज युधिष्ठिरको नष्ट कर देनेका प्रयत्न किया था, किंतु उन सारे संकटोंको लाँघ करके वे जलमें कमलकी भाँति उत्तरोत्तर बढ़ते गये ॥ ३७ ॥
तेन दैवं परं मन्ये पौरुषं च निरर्थकम् ।
धार्तराष्ट्राश्च हीयन्ते पार्था वर्धन्ति नित्यशः ॥ ३८ ॥
इसीसे मैं दैवको उत्तम मानता हूँ और पुरुषार्थको निरर्थक; क्योंकि हम धृतराष्ट्रपुत्र हानि उठा रहे हैं और ये कुन्तीके पुत्र प्रतिदिन उन्नति करते जा रहे हैं ॥ ३८ ॥
सोऽहं श्रियं च तां दृष्ट्वा सभां तां च तथाविधाम् ।
रक्षिभिश्चावहासं तं परितप्ये यथाग्निना ॥ ३९ ॥
मैं उस राजलक्ष्मीको, उस दिव्य सभाको तथा रक्षकोंद्वारा किये गये अपने उपहासको देखकर निरन्तर संतप्त हो रहा हूँ, मानो आगमें जलता होऊँ ॥ ३९ ॥
स मामभ्यनुजानीहि मातुलाद्य सुदुःखितम् ।
अमर्षं च समाविष्टं धृतराष्ट्रे निवेदय ॥ ४० ॥
मामाजी! अब मुझे (मरनेके लिये) आज्ञा दीजिये, क्योंकि मैं बहुत दुःखी हूँ और ईर्ष्याकी आगमें जल रहा हूँ। महाराज धृतराष्ट्रको मेरी यह अवस्था सूचित कर दीजियेगा ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥
४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2034)

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये शकुनि और दुर्योधनकी बातचीत

शकुनिरुवाच

दुर्योधन न तेऽमर्षः कार्यः प्रति युधिष्ठिरम् ।
भागधेयानि हि स्वानि पाण्डवा भुञ्जते सदा ॥ १ ॥
विधानं विविधाकारं परं तेषां विधानतः ।
अनेकैर्भ्युपायैश्च त्वया न शकिताः पुरा ॥ २ ॥
शकुनि बोला—दुर्योधन! तुम्हें युधिष्ठिरके प्रति ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये; क्योंकि पाण्डव सदा अपने भाग्यका ही उपभोग करते आ रहे हैं। तुमने उन्हें वशमें लानेके लिये अनेक प्रकारके उपायोंका अवलम्बन किया, परंतु उनके द्वारा तुम उन्हें अपने अधीन न कर सके ॥

आरब्धाश्च महाराज पुनः पुनररिंदम ।
विमुक्ताश्च नरव्याघ्रा भागधेयपुरस्कृताः ॥ ३ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज! तुमने बार-बार पाण्डवोंपर कुचक्र चलाये, परंतु वे नरश्रेष्ठ अपने भाग्यसे उन सभी संकटोंसे छुटकारा पाते गये ॥ ३ ॥

तैर्लब्धा द्रौपदी भार्या द्रुपदश्च सुतैः सह ।
सहायः पृथिवीलाभे वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥ ४ ॥
उन पाँचोंने पत्नीरूपमें द्रौपदीको तथा पुत्रों-सहित राजा द्रुपद एवं सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्राप्तिमें कारण महापराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको सहायकरूपमें प्राप्त किया है ॥ ४ ॥

(अजितः सोऽपि सर्वैर्हि सदेवासुरमानुषैः ।
तत्तेजसा प्रवृद्धोऽसौ तत्र का परिदेवना ॥)
श्रीकृष्णको सब देवता, असुर और मनुष्य मिलकर भी जीत नहीं सकते। उन्हींके तेजसे राजा युधिष्ठिरकी उन्नति हुई है; इसके लिये शोक करनेकी क्या बात है?

लब्धश्चानभिभूतार्थैः पित्र्योऽंशः पृथिवीपते ।
विवृद्धस्तेजसा तेषां तत्र का परिदेवना ॥ ५ ॥
पृथिवीपते! पाण्डवोंने अपने उद्देश्यसे विचलित न होकर निरन्तर प्रयत्न करके राज्यमें अपना पैतृक अंश प्राप्त किया है और वह पैतृक सम्पत्ति आज उन्हींके तेजसे बहुत बढ़ गयी है, अतः उसके लिये चिन्ता करनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ ५ ॥

धनंजयेन गाण्डीवमक्षय्यौ च महेषुधी । लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तोषयित्वा हुताशनम् ॥ ६ ॥ तेन कार्मुकमुख्येन बाहुवीर्येण चात्मनः । कृता वशे महीपालास्तत्र का परिदेवना ॥ ७ ॥ अर्जुनने अग्निदेवको संतुष्ट करके गाण्डीव धनुष, अक्षय तरकस तथा कितने ही दिव्य अस्त्र प्राप्त किये हैं। उस श्रेष्ठ धनुषके द्वारा तथा अपनी भुजाओंके बलसे उन्होंने समस्त राजाओंको वशमें किया है, अतः इसके लिये शोककी क्या आवश्यकता है? ॥ ६-७ ॥ अग्निदाहान्मयं चापि मोक्षयित्वा स दानवम् । सभां तां कारयामास सव्यसाची परंतपः ॥ ८ ॥ सव्यसाची परंतप अर्जुनने मय दानवको आगमें जलनेसे बचाया और उसीके द्वारा उस दिव्य सभाका निर्माण कराया ॥ ८ ॥ तेन चैव मयेनोक्ताः किंकरा नाम राक्षसाः । वहन्ति तां सभां भीमास्तत्र का परिदेवना ॥ ९ ॥ यच्चासहायतां राजन्नुक्तवानसि भारत । तन्मिथ्या भ्रातरो हीमे तव सर्वे वशानुगाः ॥ १० ॥ उस मयके ही कहनेसे किंकरनामधारी भयंकर राक्षसगण उस सभाको एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाते हैं। अतः इसके लिये भी शोक-संताप क्यों किया जाय? भारत! तुमने जो अपनेको असहाय बताया है, वह मिथ्या है; क्योंकि तुम्हारे ये सब भाई तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं ॥ द्रोणस्तव महेष्वासः सह पुत्रेण वीर्यवान् । सूतपुत्रश्च राधेयो गौतमश्च महारथः ॥ ११ ॥ अहं च सह सोदर्यैः सौमदत्तिश्च पार्थिवः । एतैस्त्वं सहितः सर्वैर्जय कृत्स्नां वसुंधराम् ॥ १२ ॥ महान् धनुर्धर और पराक्रमी द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ तुम्हारी सहायताके लिये उद्यत हैं। राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण, महारथी कृपाचार्य, भाइयोंसहित मैं तथा राजा भूरिश्रवा—इन सबके साथ तुम भी सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त करो ॥ ११-१२ ॥

दुर्योधन उवाच

त्वया च सहितो राजन्नेतैश्चान्यैर्महारथैः । एतानेव विजेष्यामि यदि त्वमनुमन्यसे ॥ १३ ॥ एतेषु विजितेष्वद्य भविष्यति मही मम । सर्वे च पृथिवीपालाः सभा सा च महाधना ॥ १४ ॥

दुर्योधनने कहा— राजन्! यदि तुम्हारी अनुमति हो, तो तुम्हारे और इन द्रोण आदि अन्य महारथियोंके साथ इन पाण्डवोंको ही युद्धमें जीत लूँ। इनके पराजित हो जाने-पर अभी यह सारी पृथ्वी, समस्त भूपाल और वह महाधन-सम्पन्न सभा भी हमारे अधीन हो जायगी ॥ १३-१४ ॥

शकुनिरुवाच

धनंजयो वासुदेवो भीमसेनो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च द्रुपदश्च सहात्मजैः ॥ १५ ॥
नैते युधि पराजेतुं शक्या देवगणैरपि ।
महारथा महेष्वासाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः ॥ १६ ॥
शकुनि बोला— राजन्! अर्जुन, श्रीकृष्ण, भीमसेन, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव तथा पुत्रोंसहित द्रुपद—इन्हें देवता भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते। ये सब-के-सब महारथी, महान् धनुर्धर, अस्त्रविद्यामें निपुण तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले हैं ॥ १५-१६ ॥
अहं तु तद् विजानामि विजेतुं येन शक्यते ।
युधिष्ठिरं स्वयं राजंस्तन्निबोध जुषस्व च ॥ १७ ॥
राजन्! मैं वह उपाय जानता हूँ, जिससे युधिष्ठिर स्वयं पराजित हो सकते हैं। तुम उसे सुनो और उसका सेवन करो ॥ १७ ॥

दुर्योधन उवाच

अप्रमादेन सुहृदामन्येषां च महात्मनाम् ।
यदि शक्या विजेतुं ते तन्ममाचक्ष्व मातुल ॥ १८ ॥
दुर्योधनने कहा— मामाजी! यदि मेरे सगे-सम्बन्धियों तथा अन्य महात्माओंकी सतत सावधानीसे किसी उपायद्वारा पाण्डवोंको जीता जा सके तो वह मुझे बताइये ॥ १८ ॥

शकुनिरुवाच

द्यूतप्रियश्च कौन्तेयो न स जानाति देवितुम् ।
समाहूतश्च राजेन्द्रो न शक्ष्यति निवर्तितुम् ॥ १९ ॥
शकुनि बोला— राजन्! कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको जुएका खेल बहुत प्रिय है, किंतु वे उसे खेलना नहीं जानते। यदि महाराज युधिष्ठिरको द्यूतक्रीड़ाके लिये बुलाया जाय तो वे पीछे नहीं हट सकेंगे ॥ १९ ॥
देवने कुशलश्चाहं न मेऽस्ति सदृशो भुवि ।
त्रिषु लोकेषु कौरव्य तं त्वं द्यूते समाह्वय ॥ २० ॥
मैं जूआ खेलनेमें बहुत निपुण हूँ। इस कलामें मेरी समानता करनेवाला पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है। केवल यहीं नहीं, तीनों लोकोंमें मेरे-जैसा द्यूतविद्याका जानकार नहीं है। अतः

कुरुनन्दन! तुम द्यूतक्रीड़ाके लिये युधिष्ठिरको बुलाओ ।। २० ।। तस्याक्षकुशलो राजन्नादास्येऽहमसंशयम् । राज्यं श्रियं च तां दीप्तां त्वदर्थं पुरुषर्षभ ।। २१ ।। नरश्रेष्ठ! मैं पासा फेंकनेमें कुशल हूँ; अतः युधिष्ठिरके राज्य तथा देदीप्यमान राजलक्ष्मीको तुम्हारे लिये अवश्य प्राप्त कर लूँगा, इसमें संशय नहीं है ।। २१ ।। इदं तु सर्वं त्वं राज्ञे दुर्योधन निवेदय । अनुज्ञातस्तु ते पित्रा विजेष्ये तान् न संशयः ।। २२ ।। दुर्योधन! तुम ये सारी बातें पिताजीसे कहो। उनकी आज्ञा मिल जानेपर मैं निःसंदेह पाण्डवोंको जीत लूँगा ।।

दुर्योधन उवाच त्वमेव कुरुमुख्याय धृतराष्ट्राय सौबल । निवेदय यथान्यायं नाहं शक्ष्ये निवेदितुम् ।। २३ ।। **दुर्योधनने कहा—**सुबलनन्दन! आप ही कुरुकुलके प्रधान महाराज धृतराष्ट्रसे इन सब बातोंको यथोचित रूपसे कहिये। मैं स्वयं कुछ नहीं कह सकूँगा ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसन्तापे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसन्तापविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २४ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 2038)

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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रके पूछनेपर दुर्योधनका अपनी चिन्ता बताना और द्यूतके लिये धृतराष्ट्रसे अनुरोध करना एवं धृतराष्ट्रका विदुरको इन्द्रप्रस्थ जानेका आदेश

वैशम्पायन उवाच

अनुभूय तु राज्ञस्तं राजसूयं महाक्रतुम् ।
युधिष्ठिरस्य नृपतेर्गान्धारीपुत्रसंयुतः ॥ १ ॥
प्रियकृन्मतमाज्ञाय पूर्वं दुर्योधनस्य तत् ।
प्रज्ञाचक्षुषमासीनं शकुनिः सौबलस्तदा ॥ २ ॥
दुर्योधनवचः श्रुत्वा धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ।
उपगम्य महाप्राज्ञं शकुनिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! गान्धारीपुत्र दुर्योधनके सहित सुबलनन्दन शकुनि राजा युधिष्ठिरके राजसूय महायज्ञका उत्सव देखकर जब लौटा, तब पहले दुर्योधनके अपने अनुकूल मतको जानकर और उसकी पूरी बातें सुनकर सिंहासनपर बैठे हुए प्रज्ञाचक्षु महाप्राज्ञ राजा धृतराष्ट्रके पास जाकर इस प्रकार बोला ॥ १—३ ॥

शकुनिरुवाच

दुर्योधनो महाराज विवर्णो हरिणः कृशः ।
दीनश्चिन्तापरश्चैव तं विद्धि मनुजाधिप ॥ ४ ॥

शकुनिने कहा—महाराज! दुर्योधनकी कान्ति फीकी पड़ती जा रही है! वह सफेद और दुर्बल हो गया है। उसकी बड़ी दयनीय दशा है। वह निरन्तर चिन्तामें डूबा रहता है। नरेश्वर! उसके मनोभावको समझिये ॥ ४ ॥

न वै परीक्षसे सम्यगसह्यं शत्रुसम्भवम् ।
ज्येष्ठपुत्रस्य हृच्छोकं किमर्थं नावबुध्यसे ॥ ५ ॥

उसे शत्रुओंकी ओरसे कोई असह्य कष्ट प्राप्त हुआ है। आप उसकी अच्छी तरह परीक्षा क्यों नहीं करते? दुर्योधन आपका ज्येष्ठ पुत्र है। उसके हृदयमें महान् शोक व्याप्त है। आप उसका पता क्यों नहीं लगाते? ॥ ५ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

दुर्योधन कुतोमूलं भृशमार्तोऽसि पुत्रक ।
श्रोतव्यश्चेन्मया सोऽर्थो ब्रूहि मे कुरुनन्दन ॥ ६ ॥

धृतराष्ट्र दुर्योधनके पास जाकर बोले—बेटा दुर्योधन! तुम्हारे दुःखका कारण क्या है? सुना है, तुम बड़े कष्टमें हो। कुरुनन्दन! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो वह बात मुझे बताओ॥ ६॥
अयं त्वां शकुनिः प्राह विवर्णं हरिणं कृशम्।
चिन्तयंश्च न पश्यामि शोकस्य तव सम्भवम्॥ ७॥
यह शकुनि कहता है कि तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है। तुम सफेद और दुबले हो गये हो; परंतु मैं बहुत सोचनेपर भी तुम्हारे शोकका कोई कारण नहीं देखता॥
ऐश्वर्यं हि महत् पुत्र त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
भ्रातरः सुहृदश्चैव नाचरन्ति तवाप्रियम्॥ ८॥
बेटा! इस सम्पूर्ण महान् ऐश्वर्यका भार तुम्हारे ही ऊपर है। तुम्हारे भाई और सुहृद् कभी तुम्हारे प्रतिकूल आचरण नहीं करते॥ ८॥
आच्छादयसि प्रावारानश्नासि विशदौदनम्।
आजानेया वहन्त्यश्वाः केनासि हरिणः कृशः॥ ९॥
तुम बहुमूल्य वस्त्र ओढ़ते-पहनते हो, बढ़िया विशुद्ध भात खाते हो तथा अच्छी जातिके घोड़े तुम्हारी सवारीमें रहते हैं; फिर किस दुःखसे तुम सफेद और दुबले हो गये हो?॥ ९॥
शयनानि महार्हाणि योषितश्च मनोरमाः।
गुणवन्ति च वेश्मानि विहाराश्च यथासुखम्॥ १०॥
देवानाभिव ते सर्वं वाचि बद्धं न संशयः।
स दीन इव दुर्धर्ष कस्माच्छोचसि पुत्रक॥ ११॥
बहुमूल्य शय्याएँ, मनको प्रिय लगनेवाली युवतियाँ, सभी ऋतुओंमें लाभदायक भवन और इच्छानुसार सुख देनेवाले विहारस्थान—देवताओंकी भाँति ये सभी वस्तुएँ निःसंदेह तुम्हें वाणीद्वारा कहनेमात्रसे सुलभ हैं। मेरे दुर्धर्ष पुत्र! फिर तुम दीनकी भाँति क्यों शोक करते हो?॥ १०-११॥
(उपस्थितः सर्वकामैस्त्रिदिवे वासवो यथा।
विविधैरन्नपानैश्च प्रवरैः किं नु शोचसि॥
जैसे स्वर्गमें इन्द्रको सम्पूर्ण मनोवांछित भोग सुलभ हैं, उसी प्रकार समस्त अभिलषित भोग और खाने-पीनेकी विविध उत्तम वस्तुएँ तुम्हारे लिये सदा प्रस्तुत हैं। फिर तुम किसलिये शोक करते हो?
निरुक्तं निगमं छन्दः सषडङ्गार्थशास्त्रवान्।
अधीतः कृतविद्यस्त्वमष्टव्याकरणैः कृपात्॥
तुमने कृपाचार्यसे निरुक्त, निगम, छन्द, वेदके छहों अंग, अर्थशास्त्र तथा आठ प्रकारके व्याकरणशास्त्रोंका अध्ययन किया है।

हलायुधात् कृपाद् द्रोणादस्त्रविद्यामधीतवान् ।
प्रभुस्त्वं भुञ्जसे पुत्र संस्तुतः सूतमागधैः ।।
तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम् ।
लोकेऽस्मिञ्ज्येष्ठभागी त्वं तन्ममाचक्ष्व पुत्रक ।।

हलायुध, कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्यसे तुमने अस्त्रविद्या सीखी है। बेटा! तुम इस राज्यके स्वामी होकर इच्छानुसार सब वस्तुओंका उपभोग करते हो। सूत और मागध सदा तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम्हारी बुद्धिकी प्रखरता प्रसिद्ध है। तुम इस जगत्में ज्येष्ठ पुत्रके लिये सुलभ समस्त राजोचित सुखोंके भागी हो। फिर भी तुम्हें कैसे चिन्ता हो रही है? बेटा! तुम्हारे इस शोकका कारण क्या है? यह मुझे बताओ।

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा मन्दः क्रोधवशानुगः ।
पितरं प्रत्युवाचेदं स्वमतिं सम्प्रकाशयन् ॥)
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**पिताका यह कथन सुनकर क्रोधके वशीभूत हुए मूढ़ दुर्योधनने उन्हें अपना विचार बताते हुए इस प्रकार उत्तर दिया।

दुर्योधन उवाच

अश्नाम्याच्छादये चाहं यथा कुपुरुषस्तथा ।
अमर्षं धारये चोग्रं निनीषुः कालपर्ययम् ।। १२ ।।
**दुर्योधन बोला—**पिताजी! मैं अच्छा खाता-पहनता तो हूँ, परंतु कायरोंकी भाँति। मैं समयके परिवर्तनकी प्रतीक्षामें रहकर अपने हृदयमें भारी ईर्ष्या धारण करता हूँ ।। १२ ।।

अमर्षणः स्वाः प्रकृतीरभिभूय परं स्थितः ।
क्लेशान् मुमुक्षुः परजान् स वै पुरुष उच्यते ।। १३ ।।
जो शत्रुओंके प्रति अमर्ष रख उन्हें पराजित करके विश्राम लेता है और अपनी प्रजाको शत्रुजनित क्लेशसे छुड़ानेकी इच्छा करता है, वही पुरुष कहलाता है ।। १३ ।।

संतोषो वै श्रियं हन्ति ह्याभिमानं च भारत ।
अनुक्रोशभये चोभे यैर्वृतो नाश्नुते महत् ।। १४ ।।
भारत! संतोष लक्ष्मी और अभिमानका नाश कर देता है। दया और भय—ये दोनों भी वैसे ही हैं। इन (संतोषादि)-से युक्त मनुष्य कभी ऊँचा पद नहीं पा सकता ।।

न मां प्रीणाति मद्भुक्तं श्रियं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे ।
अति ज्वलन्तीं कौन्तेये विवर्णकरणीं मम ।। १५ ।।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी वह अत्यन्त प्रकाशमान राजलक्ष्मी देखकर मुझे भोजन अच्छा नहीं लगता। वही मेरी कान्तिको नष्ट करनेवाली है ।। १५ ।।

सपत्नानृध्यतोऽऽत्मानं हीयमानं निशम्य च।

अदृश्यामपि कौन्तेयश्रियं पश्यन्निवोद्यताम् ।। १६ ।। तस्मादहं विवर्णश्च दीनश्च हरिणः कृशः। शत्रुओंको बढ़ते और अपनेको हीन दशामें जाते देख तथा युधिष्ठिरकी उस अदृश्य लक्ष्मीपर भी प्रत्यक्षकी भाँति दृष्टिपात करके मैं चिन्तित हो उठा हूँ। यही कारण है कि मेरी कान्ति फीकी पड़ गयी है तथा मैं दीन, दुर्बल और सफेद हो गया हूँ ।। १६१/२ ।।

अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः ।। १७ ।। त्रिंशद्दासीक एकैको यान् बिभर्ति युधिष्ठिरः। राजा युधिष्ठिर अपने घरमें बसनेवाले अट्ठासी हजार स्नातकोंका भरण-पोषण करते हैं। उनमेंसे प्रत्येककी सेवाके लिये तीस-तीस दासियाँ प्रस्तुत रहती हैं ।। १७१/२ ।।

दशान्यानि सहस्राणि नित्यं तत्रान्नमुत्तमम्। भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ।। १८ ।। इसके सिवा युधिष्ठिरके महलमें दस हजार अन्य ब्राह्मण प्रतिदिन सोनेकी थालियोंमें भोजन करते हैं ।। १८ ।।

कदलीमृगमोकानि कृष्णश्यामारुणानि च। काम्बोजः प्राहिणोत् तस्मै पराघ्या॑नपि कम्बलान्। काम्बोजराजाने काले, नीले और लाल रंगके कदलीमृगके चर्म तथा अनेक बहुमूल्य कम्बल युधिष्ठिरके लिये भेंटमें भेजे थे ।। १८१/२ ।।

गजयोषिद्गवाश्वस्य शतशोऽथ सहस्रशः ।। १९ ।। त्रिशतं चोष्ट्रवामीनां शतानि विचरन्त्युत। राजन्या बलिमादाय समेता हि नृपक्षये ।। २० ।। उन्हींकी भेजी हुई सैकड़ों हथिनियाँ, सहस्रों गायें और घोड़े तथा तीस-तीस हजार ऊँट और घोड़ियाँ वहाँ विचरती थीं। सभी राजालोग भेंट लेकर युधिष्ठिरके भवनमें एकत्र हुए थे ।। १९-२० ।।

पृथग्विधानि रत्नानि पार्थिवाः पृथिवीपते। आहरन् क्रतुमुख्येऽस्मिन् कुन्तीपुत्राय भूरिशः ।। २१ ।। पृथ्वीपते! उस महान् यज्ञमें भूपालगण कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके लिये भाँति-भाँतिके बहुत-से रत्न लाये थे ।। २१ ।।

न क्वचिद्धि मया तादृग् दृष्टपूर्वो न च श्रुतः। यादृग् धनागमो यज्ञे पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ।। २२ ।। बुद्धिमान् पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके यज्ञमें धनकी जैसी प्राप्ति हुई है, वैसी मैंने पहले कहीं न तो देखी है और न सुनी ही है ।। २२ ।।

अपर्यन्तं धनौघं तं दृष्ट्वा शत्रोरहं नृप। शमं नैवाभिगच्छामि चिन्तयानो विशाम्पते ।। २३ ।।

महाराज! शत्रु की वह अनन्त धनराशि देखकर मैं चिन्तित हो रहा हूँ; मुझे चैन नहीं मिलता ॥ २३ ॥

ब्राह्मणा वाटधानाश्च गोमन्तः शतसङ्घशः ।
त्रिखर्वं बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥ २४ ॥
ब्राह्मणलोग तथा हरी-भरी खेती उपजाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और बहुत-से गाय-बैल रखनेवाले वैश्य सैकड़ों दलोंमें इकट्ठे होकर तीन खर्व भेंट लेकर राजाके द्वारपर रोके हुए खड़े थे ॥ २४ ॥

कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयाञ्छुभान् ।
एतद् धनं समादाय प्रवेशं लेभिरे न च ॥ २५ ॥
वे सब लोग सोनेके सुन्दर कलश और इतना धन लेकर आये थे, तो भी वे सभी राजद्वारमें प्रवेश नहीं कर पाते थे अर्थात् उनमेंसे कोई-कोई ही प्रवेश कर पाते थे ॥

यथैव मधु शक्राय धारयन्त्यमरस्त्रियः ।
तदस्मै कांस्यमाहार्षीद् वारुणं कलशोदधिः ॥ २६ ॥
देवांगनाएँ इन्द्रके लिये कलशोंमें जैसा मधु लिये रहती हैं, वैसा ही वरुणदेवताका दिया हुआ और काँसके पात्रमें रखा हुआ मधु समुद्रने युधिष्ठिरके लिये उपहारमें भेजा था ॥ २६ ॥

शैक्यं रुक्मसहस्रस्य बहुरत्नविभूषितम् ।
शङ्खप्रवरमादाय वासुदेवोऽभिषिक्तवान् ॥ २७ ॥
वहाँ छींकेपर रखकर लाया हुआ एक हजार स्वर्ण-मुद्राओंका बना हुआ कलश रखा था, जिसमें अनेक प्रकारके रत्न जड़े हुए थे। उस पात्रमें स्थित समुद्रजलको उत्तम शंखमें लेकर श्रीकृष्णने युधिष्ठिरका अभिषेक किया था ॥ २७ ॥

दृष्ट्वा च मम तत् सर्वं ज्वररूपमिवाभवत् ।
गृहीत्वा तत् तु गच्छन्ति समुद्रौ पूर्वदक्षिणौ ॥ २८ ॥
तथैव पश्चिमं यान्ति गृहीत्वा भरतर्षभ ।
उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्रिणः ॥ २९ ॥
तत्र गत्वार्जुनो दण्डमाजहारामितं धनम् ।
तात! वह सब देखकर मुझे ज्वर-सा आ गया। भरतश्रेष्ठ! वैसे ही सुवर्णकलशोंको लेकर पाण्डवलोग जल लानेके लिये पूर्व, दक्षिण, पश्चिम समुद्रतक तो जाया करते थे, किंतु सुना जाता है कि उत्तर समुद्रके समीप, जहाँ पक्षियोंके सिवा मनुष्य नहीं जा सकते, वहाँ भी जाकर अर्जुन अपार धन करके रूपमें वसूल कर लाये ॥

इदं चाद्भुतमासीत् तन्मे निगदतः शृणु ॥ ३० ॥
युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें एक यह अद्भुत बात और भी हुई थी, वह मैं बताता हूँ; सुनिये ॥ ३० ॥

पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां परिविष्यताम् । स्थापिता तत्र संज्ञाभूच्छङ्खो ध्मायति नित्यशः ॥ ३१ ॥ जब एक लाख ब्राह्मणोंको रसोई परोस दी जाती, तब उसके लिये एक संकेत नियत किया गया था; प्रतिदिन लाखकी संख्या पूरी होते ही बड़े जोरसे शंख बजाया जाता था ॥ ३१ ॥

मुहुर्मुहुः प्रणदतस्तस्य शङ्खस्य भारत । अनिशं शब्दमश्रौषं ततो रोमाणि मेऽहृषन् ॥ ३२ ॥ भारत! ऐसा शंख वहाँ बार-बार बजता था और मैं निरन्तर उस शंख-ध्वनिको सुना करता था; इससे मेरे शरीरमें रोमांच हो आता था ॥ ३२ ॥

पार्थिवैर्बहुभिः कीर्णमुपस्थानं दिदृक्षुभिः । अशोभत महाराज नक्षत्रैर्दौरिवामला ॥ ३३ ॥ महाराज! वहाँ यज्ञ देखनेके लिये आये हुए बहुत-से राजाओंद्धारा भरी हुई यज्ञमण्डपकी बैठक ताराओंसे व्याप्त हुए निर्मल आकाशकी भाँति शोभा पाती थी ॥ ३३ ॥

सर्वरत्नान्युपादाय पार्थिवा वै जनेश्वर । यज्ञे तस्य महाराज पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ॥ ३४ ॥ जनेश्वर! बुद्धिमान् पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके उस यज्ञमें भूपालगण सब रत्नोंकी भेंट लेकर आये थे ॥ ३४ ॥

वैश्या इव महीपाला द्विजातिपरिवेषकाः । न सा श्रीर्देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च । गुह्यकाधिपतेर्वापि या श्री राजन् युधिष्ठिरे ॥ ३५ ॥ राजालोग वैश्योंकी भाँति ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे। राजा युधिष्ठिरके पास जो लक्ष्मी है, वह देवराज इन्द्र, यम, वरुण अथवा यक्षराज कुबेरके पास भी नहीं होगी ॥ ३५ ॥

तां दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रस्य श्रियं परमिकामहम् । शान्तिं न परिगच्छामि दह्यमानेन चेतसा ॥ ३६ ॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी उस उत्कृष्ट लक्ष्मीको देखकर मेरे हृदयमें जलन पैदा हो गयी है; अतः मुझे क्षणभर भी शान्ति नहीं मिलती ॥ ३६ ॥

(अप्राप्य पाण्डवैश्वर्यं शमो मम न विद्यते । अवाप्स्ये वा रणं बाणैः शयिष्ये वा हतः परैः ॥ एतादृशस्य मे किं नु जीवितेन परंतप । वर्धन्ते पाण्डवा राजन् वयं हि स्थितवृद्धयः ॥)