महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तब तक्षक पीड़ित हृदयसे आकाशमें उसी प्रकार ठहर गया, जैसे कोई मनुष्य आकाश और पृथ्वीके बीचमें लटक रहा हो ॥ ६ ॥
ततो राजाब्रवीद् वाक्यं सदस्यैश्चोदितो भृशम् ।
काममेतद् भवत्वेवं यथाऽऽस्तीकस्य भाषितम् ॥ ७ ॥
तदनन्तर सभासदोंके बार-बार प्रेरित करनेपर राजा जनमेजयने यह बात कही—‘अच्छा, आस्तीकने जैसा कहा है, वही हो ॥ ७ ॥
समाप्यतामिदं कर्म पन्नगाः सन्त्वनामयाः ।
प्रीयतामयमास्तीकः सत्यं सूतवचोऽस्तु तत् ॥ ८ ॥
‘यह यज्ञकर्म समाप्त किया जाय। नागगण कुशलपूर्वक रहें और ये आस्तीक प्रसन्न हों। साथ ही सूतजीकी कही हुई बात भी सत्य हो’ ॥ ८ ॥
ततो हलहलाशब्दः प्रीतिदः समजायत ।
आस्तीकस्य वरे दत्ते तथैवोपरराम च ॥ ९ ॥
स यज्ञः पाण्डवेयस्य राज्ञः पारिक्षितस्य ह ।
प्रीतिमांश्चाभवद् राजा भारत्तो जनमेजयः ॥ १० ॥
जनमेजयके द्वारा आस्तीकको यह वरदान प्राप्त होते ही सब ओर प्रसन्नता बढ़ानेवाली हर्षध्वनि छा गयी और पाण्डववंशी महाराज जनमेजयका वह यज्ञ बंद हो गया। ब्राह्मणको वर देकर भरतवंशी राजा जनमेजयको भी प्रसन्नता हुई ॥ ९-१० ॥
ऋत्विग्भ्यः ससदस्येभ्यो ये तत्रासन् समागताः ।
तेभ्यश्च प्रददौ वित्तं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ११ ॥
उस यज्ञमें जो ऋत्विज् और सदस्य पधारे थे, उन सबको राजा जनमेजयने सैकड़ों और सहस्रोंकी संख्यामें धन-दान किया ॥ ११ ॥
लोहिताक्षाय सूताय तथा स्थपतये विभुः ।
येनोक्तं तस्य तत्राग्रे सर्पसत्रनिवर्तने ॥ १२ ॥
निमित्तं ब्राह्मण इति तस्मै वित्तं ददौ बहु ।
दत्त्वा द्रव्यं यथान्यायं भोजनाच्छादनान्वितम् ॥ १३ ॥
प्रीतस्तस्मै नरपतिरप्रमेयपराक्रमः ।
ततश्चकारावभृथं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ १४ ॥
लोहिताक्ष, सूत तथा शिल्पीको, जिसने यज्ञके पहले ही बता दिया था कि इस सर्पसत्रको बंद करनेमें एक ब्राह्मण निमित्त बनेगा, प्रभावशाली राजा जनमेजयने बहुत धन दिया। जिनके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है, उन नरेश्वर जनमेजयने प्रसन्न होकर यथायोग्य द्रव्य और भोजन-वस्त्र आदिका दान करनेके पश्चात् शास्त्रीय विधिके अनुसार अवभृथ-स्नान किया ॥ १२—१४ ॥
आस्तीकं प्रेषयामास गृहानेव सुसंस्कृतम् ।
राजा प्रीतमनाः प्रीतं कृतकृत्यं मनीषिणम् ॥ १५ ॥
पुनरागमनं कार्यमिति चैनं वचोऽब्रवीत् ।
भविष्यसि सदस्यो मे वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ १६ ॥
आस्तीक शुभ-संस्कारोंसे सम्पन्न और मनीषी विद्वान् थे। अपना कर्तव्य पूर्ण कर लेनेके कारण वे कृतकृत्य एवं प्रसन्न थे। राजा जनमेजयने उन्हें प्रसन्नचित्त होकर घरके लिये विदा दी और कहा—‘ब्रह्मन्! मेरे भावी अश्वमेध नामक महायज्ञमें आप सदस्य हों और उस समय पुनः पधारनेकी कृपा करें' ॥ १५-१६ ॥
तथेत्युक्त्वा प्रदुद्राव तदाऽऽस्तीको मुदा युतः ।
कृत्वा स्वकार्यमतुलं तोषयित्वा च पार्थिवम् ॥ १७ ॥
आस्तीकने प्रसन्नतापूर्वक ‘बहुत अच्छा’ कहकर राजाकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और अपने अनुपम कार्यका साधन करके राजाको संतुष्ट करनेके पश्चात् वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया ॥ १७ ॥
स गत्वा परमप्रीतो मातुलं मातरं च ताम् ।
अभिगम्योपसंगृह्य तथावृत्तं न्यवेदयत् ॥ १८ ॥
वे अत्यन्त प्रसन्न हो घर जाकर मामा और मातासे मिले और उनके चरणोंमें प्रणाम करके वहाँका सब समाचार सुनाया ॥ १८ ॥
सौतिरुवाच
एतच्छ्रुत्वा प्रीयमाणाः समेता
ये तत्रासन् पन्नगा वीतमोहाः ।
आस्तीके वै प्रीतिमन्तो बभूवु-
रूचुश्चैनं वरमिष्टं वृणीष्व ॥ १९ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनक! सर्पसत्रसे बचे हुए जो-जो नाग मोहरहित हो उस समय वासुकि नागके यहाँ उपस्थित थे, वे सब आस्तीकके मुखसे उस यज्ञके बंद होनेका समाचार सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। आस्तीकपर उनका प्रेम बहुत बढ़ गया और वे उनसे बोले—‘वत्स! तुम कोई अभीष्ट वर माँग लो' ॥ १९ ॥
भूयो भूयः सर्वशस्तेऽब्रुवंस्तं
किं ते प्रियं करवामाद्य विद्वन् ।
प्रीता वयं मोक्षिताश्चैव सर्वे
कामं किं ते करवामाद्य वत्स ॥ २० ॥
वे सब-के-सब बार-बार यह कहने लगे—‘विद्वान्! आज हम तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करें? वत्स! तुमने हमें मृत्युके मुखसे बचाया है; अतः हम सब लोग तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो, तुम्हारा कौन-सा मनोरथ पूर्ण करें?' ॥ २० ॥
आस्तीक उवाच
सायं प्रातर्ये प्रसन्नात्मरूपा
लोके विप्रा मानवा ये परेऽपि ।
धर्माख्यानं ये पठेयुर्ममेदं
तेषां युष्मन्नैव किंचिद् भयं स्यात् ॥ २१ ॥
आस्तीकने कहा— नागगण! लोकमें जो ब्राह्मण अथवा कोई दूसरा मनुष्य प्रसन्नचित्त होकर मेरे इस धर्ममय उपाख्यानका पाठ करे, उसे आपलोगोंसे कोई भय न हो ॥ २१ ॥
तैश्चाप्युक्तो भागिनेयः प्रसन्नै-
रेतत् सत्यं काममेवं वरं ते ।
प्रीत्या युक्ताः कामितं सर्वशस्ते
कर्तारः स्म प्रवणा भागिनेय ॥ २२ ॥
यह सुनकर सभी सर्प बहुत प्रसन्न हुए और अपने भानजेसे बोले—'प्रिय वत्स! तुम्हारी यह कामना पूर्ण हो। भगिनीपुत्र! हम बड़े प्रेम और नम्रतासे युक्त होकर सर्वथा तुम्हारे इस मनोरथको पूर्ण करते रहेंगे ॥ २२ ॥
असितं चार्तिमन्तं च सुनीथं चापि यः स्मरेत् ।
दिवा वा यदि वा रात्रौ नास्य सर्पभयं भवेत् ॥ २३ ॥
'जो कोई असित, आर्तिमान् और सुनीथ मन्त्रका दिन अथवा रातके समय स्मरण करेगा, उसे सर्पोंसे कोई भय नहीं होगा ॥ २३ ॥
यो जरत्कारुणा जातो जरत्कारौ महायशाः ।
आस्तीकः सर्पसत्रे वः पन्नगान् योऽभ्यरक्षत ।
तं स्मरन्तं महाभागा न मां हिंसितुमर्हथ ॥ २४ ॥
'(मन्त्र और उनके भाव इस प्रकार हैं—) जरत्कारु ऋषिसे जरत्कारु नामक नागकन्यासे जो आस्तीक नामक यशस्वी ऋषि उत्पन्न हुए तथा जिन्होंने सर्पसत्रमें तुम सर्पोंकी रक्षा की थी, उनका मैं स्मरण कर रहा हूँ। महाभाग्यवान् सर्पो! तुमलोग मुझे मत डँसो ॥ २४ ॥
सर्पापसर्प भद्रं ते गच्छ सर्प महाविष ।
जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचनं स्मर ॥ २५ ॥
'महाविषधर सर्प! तुम भाग जाओ! तुम्हारा कल्याण हो! अब तुम जाओ। जनमेजयके यज्ञकी समाप्तिमें आस्तीकको तुमने जो वचन दिया था, उसका स्मरण करो ॥ २५ ॥
आस्तीकस्य वचः श्रुत्वा यः सर्पो न निवर्तते ।
शतधा भिद्यते मूर्ध्नि शिंशवृक्षफलं यथा ॥ २६ ॥
'जो सर्प आस्तीकके वचनकी शपथ सुनकर भी नहीं लौटेगा, उसके फनके शीशमके फलके समान सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे' ॥ २६ ॥
सौतिरुवाच
स एवमुक्तस्तु तदा द्विजेन्द्रः समागतैस्तैर्भुजगेन्द्रमुख्यैः । सम्प्राप्य प्रीतिं विपुलां महात्मा ततो मनो गमनायाथ दध्रे ॥ २७ ॥ मोक्षयित्वा तु भुजगान् सर्पसत्राद् द्विजोत्तमः । जगाम काले धर्मात्मा दिष्टान्तं पुत्रपौत्रवान् ॥ २८ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**विप्रवर शौनक! उस समय वहाँ आये हुए प्रधान-प्रधान नागराजोंके इस प्रकार कहनेपर महात्मा आस्तीकको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई। तदनन्तर उन्होंने वहाँसे चले जानेका विचार किया। इस प्रकार सर्पसत्रसे नागोंका उद्धार करके द्विजश्रेष्ठ धर्मात्मा आस्तीकने विवाह करके पुत्र-पौत्रादि उत्पन्न किये और समय आनेपर (प्रारब्ध शेष होनेसे) मोक्ष प्राप्त कर लिया ॥ २७-२८ ॥
इत्याख्यानं मयाऽऽस्तीकं यथावत् तव कीर्तितम् । यत् कीर्तयित्वा सर्पेभ्यो न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २९ ॥
इस प्रकार मैंने आपसे आस्तीकके उपाख्यानका यथावत् वर्णन किया है; जिसका पाठ कर लेनेपर कहीं भी सर्पोंसे भय नहीं होता ॥ २९ ॥
यथा कथितवान् ब्रह्मन् प्रमतिः पूर्वजस्तव । पुत्राय रुरवे प्रीतः पृच्छते भार्गवोत्तम ॥ ३० ॥ यद् वाक्यं श्रुतवांश्चाहं तथा च कथितं मया । आस्तीकस्य कवेर्विप्र श्रीमच्चरितमादितः ॥ ३१ ॥
ब्रह्मन्! भृगुवंशशिरोमणे! आपके पूर्वज प्रमतिने अपने पुत्र रुरुके पूछनेपर जिस प्रकार आस्तीकोपाख्यान कहा था और जिसे मैंने भी सुना था, उसी प्रकार विद्वान् महात्मा आस्तीकके मंगलमय चरित्रका मैंने प्रारम्भसे ही वर्णन किया है ॥ ३०-३१ ॥
श्रुत्वा धर्मिष्ठमाख्यानमास्तीकं पुण्यवर्धनम् । यन्मां त्वं पृष्टवान् ब्रह्मञ्छ्रुत्वा डुण्डुभभाषितम् । व्येतु ते सुमहद् ब्रह्मन् कौतूहलमरिन्दम ॥ ३२ ॥
आस्तीकका यह धर्ममय उपाख्यान पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है। काम-क्रोधादि शत्रुओंका दमन करनेवाले ब्राह्मण! कथाप्रसंगमें डुण्डुभकी बात सुनकर आपने मुझसे जिसके विषयमें पूछा था, वह सब उपाख्यान मैंने कह सुनाया। इसे सुनकर आपके मनका महान् कौतूहल अब निवृत्त हो जाना चाहिये ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सर्पसत्रे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें सर्पसत्रविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५८ ।।
(अंशावतरणपर्व)
(अंशावतरणपर्व)
एकोनषष्टितमोऽध्यायः
महाभारतका उपक्रम
शौनक उवाच
भृगुवंशात् प्रभृत्येव त्वया मे कीर्तितं महत् ।
आख्यानमखिलं तात सौते प्रीतोऽस्मि तेन ते ॥ १ ॥
**शौनकजी बोले—**तात सूतनन्दन! आपने भृगुवंशसे ही प्रारम्भ करके जो मुझे यह सब महान् उपाख्यान सुनाया है, इससे मैं आपपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १ ॥
वक्ष्यामि चैव भूयस्त्वां यथावत् सूतनन्दन ।
याः कथा व्याससम्पन्नास्ताश्च भूयो विचक्ष्व मे ॥ २ ॥
सूतपुत्र! अब मैं पुनः आपसे यह कहना चाहता हूँ कि भगवान् व्यासने जो कथाएँ कही हैं, उनका मुझसे यथावत् वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
तस्मिन् परमदुष्पारे सर्पसत्रे महात्मनाम् ।
कर्मान्तरेषु यज्ञस्य सदस्यानां तथाध्वरे ॥ ३ ॥
या बभूवुः कथाश्चित्रा येष्वर्थेषु यथातथम् ।
त्वत्त इच्छामहे श्रोतुं सौते त्वं वै प्रचक्ष्व नः ॥ ४ ॥
जिसका पार होना कठिन था, ऐसे सर्पयज्ञमें आये हुए महात्माओं एवं सभासदोंको जब यज्ञकर्मसे अवकाश मिलता था, उस समय उनमें जिन-जिन विषयोंको लेकर जो-जो विचित्र कथाएँ होती थीं उन सबका आपके मुखसे हम यथार्थ वर्णन सुनना चाहते हैं। सूतनन्दन! आप हमसे अवश्य कहें ॥ ३-४ ॥
सौतिरुवाच
कर्मान्तरेष्वकथयन् द्विजा वेदाश्रयाः कथाः ।
व्यासस्त्वकथयच्चित्रमाख्यानं भारतं महत् ॥ ५ ॥
**उग्रश्रवाजीने कहा—**शौनक! यज्ञकर्मसे अवकाश मिलनेपर अन्य ब्राह्मण तो वेदोंकी कथाएँ कहते थे, परंतु व्यासदेवजी अति विचित्र महाभारतकी कथा सुनाया करते थे ॥ ५ ॥
शौनक उवाच
महाभारतमाख्यानं पाण्डवानां यशस्करम् ।
जनमेजयेन पृष्टः सन् कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ ६ ॥
श्रावयामास विधिवत् तदा कर्मान्तरे तु सः ।
तामहं विधिवत् पुण्यां श्रोतुमिच्छामि वै कथाम् ॥ ७ ॥
**शौनकजी बोले—**सूतनन्दन! महाभारत नामक इतिहास तो पाण्डवोंके यशका विस्तार करनेवाला है। सर्पयज्ञके विभिन्न कर्मोंके बीचमें अवकाश मिलने-पर जब राजा जनमेजय प्रश्न करते, तब श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासजी उन्हें विधिपूर्वक महाभारतकी कथा सुनाते थे। मैं उसी पुण्यमयी कथाको विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ ६-७ ॥
मनःसागरसम्भूतां महर्षेर्भावितात्मनः ।
कथयस्व सतां श्रेष्ठ सर्वरत्नमयीमिमाम् ॥ ८ ॥
यह कथा पवित्र अन्तःकरणवाले महर्षि वेद-व्यासके हृदयरूपी समुद्रसे प्रकट हुए सब प्रकारके शुभ विचाररूपी रत्नोंसे परिपूर्ण है। साधुशिरोमणे! आप इस कथाको मुझे सुनाइये ॥ ८ ॥
सौतिरुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम् ।
कृष्णद्वैपायनमतं महाभारतमादितः ॥ ९ ॥
**उग्रश्रवाजीने कहा—**शौनक! मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ महाभारत नामक उत्तम उपाख्यानका आरम्भसे ही वर्णन करूँगा, जो श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासको अभिमत है ॥ ९ ॥
शृणु सर्वमशेषेण कथ्यमानं मया द्विज ।
शंसितुं तन्महान् हर्षो ममापीह प्रवर्तते ॥ १० ॥
विप्रवर! मेरे द्वारा कही जानेवाली इस सम्पूर्ण महाभारत-कथाको आप पूर्णरूपसे सुनिये। यह कथा सुनाते समय मुझे भी महान् हर्ष प्राप्त होता है ॥ १० ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि कथानुबन्धे
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें कथानुबन्धविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥
जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथा राजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत-कथा सुनानेके लिये कहना
षष्टितमोऽध्यायः
जनमेजयके यज्ञमें व्यासजीका आगमन, सत्कार तथा राजाकी प्रार्थनासे व्यासजीका वैशम्पायनजीसे महाभारत-कथा सुनानेके लिये कहना
सौतिरुवाच
श्रुत्वा तु सर्पसत्राय दीक्षितं जनमेजयम् ।
अभ्यगच्छदृषिर्विद्वान् कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनक! जब विद्वान् महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायनने यह सुना कि राजा जनमेजय सर्पयज्ञकी दीक्षा ले चुके हैं, तब वे वहाँ आये ॥ १ ॥
जनयामास यं काली शक्तेः पुत्रात् पराशरात् ।
कन्यैव यमुनाद्वीपे पाण्डवानां पितामहम् ॥ २ ॥
वेदव्यासजीको सत्यवतीने कन्यावस्थामें ही शक्तिनन्दन पराशरजीसे यमुनाजीके द्वीपमें उत्पन्न किया था। वे पाण्डवोंके पितामह हैं ॥ २ ॥
जातमात्रश्च यः सद्य इष्ट्या देहमवीवृधत् ।
वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् सेतिहासान् महायशाः ॥ ३ ॥
यन्नैति तपसा कश्चिन्न वेदाध्ययनेन च ।
न व्रतैर्नोपवासैश्च न प्रशान्त्या न मन्युना ॥ ४ ॥
जन्म लेते ही उन्होंने अपनी इच्छासे शरीरको बढ़ा लिया तथा उन महायशस्वी व्यासजीको (स्वतः ही) अंगों और इतिहासोंसहित सम्पूर्ण वेदों और उस परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो गया, जिसे कोई तपस्या, वेदाध्ययन, व्रत, उपवास, शम और यज्ञ आदिके द्वारा भी नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ३-४ ॥
विव्यासैकं चतुर्धा यो वेदं वेदविदां वरः ।
परावरज्ञो ब्रह्मर्षिः कविः सत्यव्रत शुचिः ॥ ५ ॥
वे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ थे और उन्होंने एक ही वेदको चार भागोंमें विभक्त किया था। ब्रह्मर्षि व्यासजी परब्रह्म और अपरब्रह्मके ज्ञाता, कवि (त्रिकालदर्शी), सत्यव्रतपरायण तथा परम पवित्र हैं ॥ ५ ॥
यः पाण्डुं धृतराष्ट्रं च विदुरं चाप्यजीजनत् ।
शान्तनोः संततिं तन्वन् पुण्यकीर्तिर्महायशाः ॥ ६ ॥
उनकी कीर्ति पुण्यमयी है और वे महान् यशस्वी हैं। उन्होंने ही शान्तनुकी संतान-परम्पराका विस्तार करनेके लिये पाण्डु, धृतराष्ट्र तथा विदुरको जन्म दिया था ॥ ६ ॥
जनमेजयस्य राजर्षेः स महात्मा सदस्तदा । विवेश सहितः शिष्यैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ७ ॥ उन महात्मा व्यासने वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् शिष्योंके साथ उस समय राजर्षि जनमेजयके यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया ॥ ७ ॥ तत्र राजानमासीनं ददर्श जनमेजयम् । वृतं सदस्यैर्बहुभिर्देवैरिव पुरन्दरम् ॥ ८ ॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने सिंहासनपर बैठे हुए राजा जनमेजयको देखा, जो बहुत-से सभासदोंद्वारा इस प्रकार घिरे हुए थे, मानो देवराज इन्द्र देवताओंसे घिरे हुए हों ॥ ८ ॥ तथा मूर्धाभिषिक्तैश्च नानाजनपदेश्वरैः । ऋत्विग्भिर्ब्रह्मकल्पैश्च कुशलैर्यज्ञसंस्तरे ॥ ९ ॥ जिनके मस्तकोंपर अभिषेक किया गया था, ऐसे अनेक जनपदोंके नरेश तथा यज्ञानुष्ठानमें कुशल ब्रह्माजीके समान योग्यतावाले ऋत्विज् भी उन्हें सब ओरसे घेरे हुए थे ॥ ९ ॥ जनमेजयस्तु राजर्षिर्दृष्ट्वा तमृषिमागतम् । सगणोऽभ्युद्ययौ तूर्णं प्रीत्या भरतसत्तमः ॥ १० ॥ भरतश्रेष्ठ राजर्षि जनमेजय महर्षि व्यासको आया देख बड़ी प्रसन्नताके साथ उठकर खड़े हो गये और अपने सेवकगणोंके साथ तुरंत ही उनकी अगवानी करनेके लिये चल दिये ॥ १० ॥ काञ्चनं विष्टरं तस्मै सदस्यानुमतः प्रभुः । आसनं कल्पयामास यथा शक्रो बृहस्पतेः ॥ ११ ॥ जैसे इन्द्र बृहस्पतिजीको आसन देते हैं, उसी प्रकार राजाने सदस्योंकी अनुमति लेकर व्यासजीके लिये सुवर्णका विष्टर दे आसनकी व्यवस्था की ॥ ११ ॥ तत्रोपविष्टं वरदं देवर्षिगणपूजितम् । पूजयामास राजेन्द्रः शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥ १२ ॥ देवर्षियोंद्वारा पूजित वरदायक व्यासजी जब वहाँ बैठ गये, तब राजेन्द्र जनमेजयने शास्त्रीय विधिके अनुसार उनका पूजन किया ॥ १२ ॥ पाद्यमाचमनीयं च अर्घ्यं गां च विधानतः । पितामहाय कृष्णाय तदर्हाय न्यवेदयत् ॥ १३ ॥ उन्होंने अपने पितामह श्रीकृष्णद्वैपायनको विधि-विधानके साथ पाद्य, आचमनीय, अर्घ्य और गौ भेंट की, जो इन वस्तुओंको पानेके अधिकारी थे ॥ १३ ॥ प्रतिगृह्य तु तां पूजां पाण्डवाज्जनमेजयात् । गां चैव समनुज्ञाप्य व्यासः प्रीतोऽभवत् तदा ॥ १४ ॥
पाण्डववंशी जनमेजयसे वह पूजा ग्रहण करके गौके सम्बन्धमें अपना आदर व्यक्त करते हुए व्यासजी उस समय बड़े प्रसन्न हुए ॥ १४ ॥
तथा च पूजयित्वा तं प्रणयात् प्रपितामहम् । उपोपविश्य प्रीतात्मा पर्यपृच्छदनामयम् ॥ १५ ॥ पितामह व्यासजीका प्रेमपूर्वक पूजन करके जनमेजयका चित्त प्रसन्न हो गया और वे उनके पास बैठकर कुशल-मंगल पूछने लगे ॥ १५ ॥
भगवानपि तं दृष्ट्वा कुशलं प्रतिवेद्य च । सदस्यैः पूजितः सर्वैः सदस्यान् प्रत्यपूजयत् ॥ १६ ॥ भगवान् व्यासने भी जनमेजयकी ओर देखकर अपना कुशल-समाचार बताया तथा अन्य सभासदोंद्वारा सम्मानित हो उनका भी सम्मान किया ॥ १६ ॥
ततस्तु सहितः सर्वैः सदस्यैर्जनमेजयः । इदं पश्चाद् द्विजश्रेष्ठं पर्यपृच्छत् कृताञ्जलिः ॥ १७ ॥ तदनन्तर सब सदस्योंसहित राजा जनमेजयने हाथ जोड़कर द्विजश्रेष्ठ व्यासजीसे इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १७ ॥
जनमेजय उवाच
कुरुणां पाण्डवानां च भवान् प्रत्यक्षदर्शिवान् । तेषां चरितमिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज ॥ १८ ॥ जनमेजयने कहा—ब्रह्मन्! आप कौरवों और पाण्डवोंको प्रत्यक्ष देख चुके हैं; अतः मैं आपके द्वारा वर्णित उनके चरित्रको सुनना चाहता हूँ ॥ १८ ॥
कथं समभवद् भेदस्तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । तच्च युद्धं कथं वृत्तं भूतान्तकरणं महत् ॥ १९ ॥ वे तो राग-द्वेष आदि दोषोंसे रहित सत्कर्म करनेवाले थे, उनमें भेद-बुद्धि कैसे उत्पन्न हुई? तथा प्राणियोंका अन्त करनेवाला उनका वह महायुद्ध किस प्रकार हुआ? ॥ १९ ॥
पितामहानां सर्वेषां दैवेनानिष्टचेतसाम् । कात्स्न्र्यैनैतन्ममाचक्ष्व यथावृत्तं द्विजोत्तम ॥ २० ॥ द्विजश्रेष्ठ! जान पड़ता है, प्रारब्धने ही प्रेरणा करके मेरे सब प्रपितामहोंके मनको युद्धरूपी अनिष्टमें लगा दिया था। उनके इस सम्पूर्ण वृत्तान्तका आप यथावत् रूपसे वर्णन करें ॥ २० ॥
सौतिरुवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनस्तदा । शशास शिष्यमासीनं वैशम्पायनमन्तिके ॥ २१ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**जनमेजयकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने पास ही बैठे हुए अपने शिष्य वैशम्पायनको उस समय इस प्रकार आदेश दिया ।। २१ ।।
व्यास उवाच
कुरूणां पाण्डवानां च यथा भेदोऽभवत् पुरा ।
तदस्मै सर्वमाचक्ष्व यन्मत्तः श्रुतवानसि ।। २२ ।।
**व्यासजी बोले—**वैशम्पायन! पूर्वकालमें कौरवों और पाण्डवोंमें जिस प्रकार फूट पड़ी थी; जिसे तुम मुझसे सुन चुके हो, वह सब इस समय इन राजा जनमेजयको सुनाओ ।। २२ ।।
गुरोर्वचनमाज्ञाय स तु विप्रर्षभस्तदा ।
आचचक्षे ततः सर्वमितिहासं पुरातनम् ।। २३ ।।
राज्ञे तस्मै सदस्येभ्यः पार्थिवेभ्यश्च सर्वशः ।
भेदं सर्वविनाशं च कुरुपाण्डवयोस्तदा ।। २४ ।।
उस समय गुरुदेव व्यासजीकी यह आज्ञा पाकर विप्रवर वैशम्पायनने राजा जनमेजय, सभासद्गण तथा अन्य सब भूपालोंसे कौरव-पाण्डवोंमें जिस प्रकार फूट पड़ी और उनका सर्वनाश हुआ, वह सब पुरातन इतिहास कहना प्रारम्भ किया ।। २३-२४ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि कथानुबन्धे षष्टितमोऽध्यायः ।। ६० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें कथानुबन्धविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६० ।।
अध्याय (पृष्ठ 415)
एकषष्टितमोऽध्यायः
कौरव-पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका सूत्ररूपमें निर्देश
वैशम्पायन उवाच
गुरवे प्राङ्नमस्कृत्य मनोबुद्धिसमाधिभिः ।
सम्पूज्य च द्विजान् सर्वांस्तथान्यान् विदुषो जनान् ॥ १ ॥
महर्षेर्विश्रुतस्येह सर्वलोकेषु धीमतः ।
प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यास्य महात्मनः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! मैं सबसे पहले श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्तसे अपने गुरुदेव श्रीव्यासजी महाराजको साष्टांग नमस्कार करके सम्पूर्ण द्विजों तथा अन्यान्य विद्वानोंका समादर करते हुए यहाँ सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात महर्षि एवं महात्मा इन परम बुद्धिमान् व्यासजीके मतका पूर्णरूपसे वर्णन करता हूँ ॥ १-२ ॥
श्रोतुं पात्रं च राजंस्त्वं प्राप्येमां भारतीं कथाम् ।
गुरोर्वक्त्रपरिस्पन्दो मनः प्रोत्साहतीव मे ॥ ३ ॥
जनमेजय! तुम इस महाभारतकी कथाको सुननेके लिये उत्तम पात्र हो और मुझे यह कथा उपलब्ध है तथा श्रीगुरुजीके मुखारविन्दसे मुझे यह आदेश मिल गया है कि मैं तुम्हें कथा सुनाऊँ, इससे मेरे मनको बड़ा उत्साह प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
शृणु राजन् यथा भेदः कुरुपाण्डवयोरभूत् ।
राज्यार्थे द्यूतसम्भूतो वनवासस्तथैव च ॥ ४ ॥
यथा च युद्धमभवत् पृथिवीक्षयकारकम् ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि पृच्छते भरतर्षभ ॥ ५ ॥
राजन्! जिस प्रकार कौरव और पाण्डवोंमें फूट पड़ी, वह प्रसंग सुनो। राज्यके लिये जो जुआ खेला गया, उससे उनमें फूट हुई और उसीके कारण पाण्डवोंका वनवास हुआ। भरतश्रेष्ठ! फिर जिस प्रकार पृथिवीके वीरोंका विनाश करनेवाला महाभारत-युद्ध हुआ, वह तुम्हारे प्रश्नके अनुसार तुमसे कहता हूँ, सुनो ॥ ४-५ ॥
मृते पितरि ते वीरा वनादेत्य स्वमन्दिरम् ।
नचिरादेव विद्वांसो वेदे धनुषि चाभवन् ॥ ६ ॥
अपने पिता महाराज पाण्डुके स्वर्गवासी हो जानेपर वे वीर पाण्डव वनसे अपने राजभवनमें आकर रहने लगे। वहाँ थोड़े ही दिनोंमें वे वेद तथा धनुर्वेदके पूरे पण्डित हो गये ॥ ६ ॥
तांस्तथा सत्त्ववीर्यौजः सम्पन्नान् पौरसम्मतान् ।
नाम्ऋष्यन् कुरवो दृष्ट्वा पाण्डवाञ्छ्रीयशोभृतः ॥ ७ ॥
सत्त्व (धैर्य और उत्साह), वीर्य (पराक्रम) तथा ओज (देहबल)-से सम्पन्न होनेके कारण पाण्डवलोग पुरवासियोंके प्रेम और सम्मानके पात्र थे। उनके धन, सम्पत्ति और यशकी वृद्धि होने लगी। यह सब देखकर कौरव उनके उत्कर्षको सहन न कर सके ॥ ७ ॥
ततो दुर्योधनः क्रूरः कर्णश्च सहसौबलः ।
तेषां निग्रहनिर्वासान् विविधांस्ते समारभन् ॥ ८ ॥
तब क्रूर दुर्योधन, कर्ण और शकुनि तीनोंने मिलकर पाण्डवोंको वशमें करने या देशसे निकाल देनेके लिये नाना प्रकारके यत्न आरम्भ किये ॥ ८ ॥
ततो दुर्योधनः शूरः कुलिङ्गस्य मते स्थितः ।
पाण्डवान् विविधोपायै राज्यहेतोरपीडयत् ॥ ९ ॥
शकुनिकी सम्मतिसे चलनेवाले शूरवीर दुर्योधनने राज्यके लिये भाँति-भाँतिके उपाय करके पाण्डवोंको पीड़ा दी ॥ ९ ॥
ददावथ विषं पापो भीमाय धृतराष्ट्रजः ।
जरयामास तद् वीरः सहान्नेन वृकोदरः ॥ १० ॥
उस पापी धृतराष्ट्रपुत्रने भीमसेनको विष दे दिया, किंतु वीरवर भीमसेनने भोजनके साथ उस विषको भी पचा लिया ॥ १० ॥
प्रमाणकोट्यां संसुप्तं पुनर्बद्ध्वा वृकोदरम् ।
तोयेषु भीमं गङ्गायाः प्रक्षिप्य पुरमाव्रजत् ॥ ११ ॥
फिर दुर्योधनने गङ्गाके प्रमाणकोटि नामक तीर्थपर सोये हुए भीमसेनको बाँधकर गङ्गाजीके गहरे जलमें डाल दिया और स्वयं चुपचाप नगरमें लौट आया ॥ ११ ॥
यदा विबुद्धः कौन्तेयस्तदा संछिद्य बन्धनम् ।
उदतिष्ठन्महाबाहुर्भीमसेनो गतव्यथः ॥ १२ ॥
जब कुन्तीनन्दन महाबाहु भीमकी आँख खुली, तब वे सारा बन्धन तोड़कर बिना किसी पीड़ाके उठ खड़े हुए ॥ १२ ॥
आशीविषैः कृष्णसर्पैः सुप्तं चैनमदंशयत् ।
सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा ॥ १३ ॥
एक दिन दुर्योधनने भीमसेनको सोते समय उनके सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंगोंमें काले साँपोंसे डँसवा दिया, किंतु शत्रुघाती भीम मर न सके ॥ १३ ॥
तेषां तु विप्रकारेषु तेषु तेषु महामतिः ।
मोक्षणे प्रतिकारे च विदुरोऽवहितोऽभवत् ॥ १४ ॥
कौरवोंके द्वारा किये हुए उन सभी अपकारोंके समय पाण्डवोंको उनसे छुड़ाने अथवा उनका प्रतीकार करनेके लिये परम बुद्धिमान् विदुरजी सदा सावधान रहते थे ॥ १४ ॥
स्वर्गस्थो जीवलोकस्य यथा शक्रः सुखावहः ।
पाण्डवानां तथा नित्यं विदुरोऽपि सुखावहः ॥ १५ ॥
जैसे स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले इन्द्र सम्पूर्ण जीव-जगत्को सुख पहुँचाते रहते हैं, उसी प्रकार विदुरजी भी सदा पाण्डवोंको सुख दिया करते थे ॥ १५ ॥
यदा तु विविधोपायैः संवृतैर्विवृतैरपि ।
नाशकद् विनिहन्तुं तान् दैवभाव्यर्थरक्षितान् ॥ १६ ॥
ततः सम्मन्त्र्य सचिवैर्वृषदुःशासनादिभिः ।
धृतराष्ट्रमनुज्ञाप्य जातुषं गृहमादिशत् ॥ १७ ॥
भविष्यमें जो घटना घटित होनेवाली थी, उसके लिये मानो दैव ही पाण्डवोंकी रक्षा कर रहा था। जब छिपकर या प्रकटरूपमें किये हुए अनेक उपायोंसे भी दुर्योधन पाण्डवोंका नाश न कर सका, तब उसने कर्ण और दुःशासन आदि मन्त्रियोंसे सलाह करके धृतराष्ट्रकी आज्ञासे वारणावत नगरमें एक लाहका घर बनानेकी आज्ञा दी ॥ १६-१७ ॥
सुतप्रियैषी तान् राजा पाण्डवानम्बिकासुतः ।
ततो विवासयामास राज्यभोगबुभुक्षया ॥ १८ ॥
अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र अपने पुत्रका प्रिय चाहनेवाले थे। अतः उन्होंने राज्यभोगकी इच्छासे पाण्डवोंको हस्तिनापुर छोड़कर वारणावतके लाक्षागृहमें रहनेकी आज्ञा दे दी ॥ १८ ॥
ते प्रतिष्ठन्त सहिता नगरान्नागसाह्वयात् ।
प्रस्थाने चाभवन्मन्त्री क्षत्ता तेषां महात्मनाम् ॥ १९ ॥
तेन मुक्ता जतुगृहान्निशीथे प्राद्रवन् वनम् ।
मातासहित पाँचों पाण्डव एक साथ हस्तिनापुरसे प्रस्थित हुए। उन महात्मा पाण्डवोंके प्रस्थानकालमें विदुरजी सलाह देनेवाले हुए। उन्हींकी सलाह एवं सहायतासे पाण्डवलोग लाक्षागृहसे बचकर आधीरातके समय वनमें भाग निकले थे ॥ १९½ ॥
ततः सम्प्राप्य कौन्तेया नगरं वारणावतम् ॥ २० ॥
न्यवसन्त महात्मानो मात्रा सह परंतपाः ।
धृतराष्ट्रेण चाज्ञप्ता उषिता जातुषे गृहे ॥ २१ ॥
पुरोचनाद् रक्षमाणाः संवत्सरमतन्द्रिताः ।
सुरुङ्गां कारयित्वा तु विदुरेण प्रचोदिताः ॥ २२ ॥
आदीप्य जातुषं वेश्म दग्ध्वा चैव पुरोचनम् ।
प्राद्रवन् भयसंविग्ना मात्रा सह परंतपाः ॥ २३ ॥
धृतराष्ट्रकी आज्ञासे शत्रुओंका दमन करनेवाले कुन्तीकुमार महात्मा पाण्डव वारणावत नगरमें आकर लाक्षागृहमें अपनी माताके साथ रहने लगे। पुरोचनसे सुरक्षित हो सदा सजग रहकर उन्होंने एक वर्षतक वहाँ निवास किया। फिर विदुरकी प्रेरणा (विदुरके भेजे हुए
आदमियों)-से पाण्डवोंने एक सुरंग खुदवायी। तत्पश्चात् वे शत्रुसंतापी पाण्डव उस लाक्षागृहमें आग लगा पुरोचनको दग्ध करके भयसे व्याकुल हो मातासहित सुरंगद्वारा वहाँसे निकल भागे ॥ २०—२३ ॥
ददृशुर्दारुणं रक्षो हिडिम्बं वननिर्झरे ।
हत्वा च तं राक्षसेन्द्रं भीताः समवबोधनात् ॥ २४ ॥
निशि सम्प्राद्रवन् पार्था धार्तराष्ट्रभयार्दिताः ।
प्राप्ता हिडिम्बा भीमेन यत्र जातो घटोत्कचः ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् वनमें एक झरनेके पास उन्होंने एक भयंकर राक्षसको देखा, जिसका नाम हिडिम्ब था। राक्षसराज हिडिम्बको मारकर पाण्डवलोग प्रकट होनेके भयसे रातमें ही वहाँसे दूर निकल गये। उस समय उन्हें धृतराष्ट्रके पुत्रोंका भय सता रहा था। हिडिम्ब-वधके पश्चात् भीमको हिडिम्बा नामकी राक्षसी पत्नीरूपमें प्राप्त हुई, जिसके गर्भसे घटोत्कचका जन्म हुआ ॥ २४-२५ ॥
एकचक्रां ततो गत्वा पाण्डवाः संशितव्रताः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नास्तेऽभवन् ब्रह्मचारिणः ॥ २६ ॥
तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले पाण्डव एकचक्रा नगरीमें जाकर वेदाध्ययनपरायण ब्रह्मचारी बन गये ॥ २६ ॥
ते तत्र नियताः कालं कंचिदूषुर्नरर्षभाः ।
मात्रा सहैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ २७ ॥
उस एकचक्रा नगरीमें वे नरश्रेष्ठ पाण्डव अपनी माताके साथ एक ब्राह्मणके घरमें कुछ कालतक टिके रहे ॥ २७ ॥
तत्राससाद क्षुधितं पुरुषादं वृकोदरः ।
भीमसेनो महाबाहुर्बकं नाम महाबलम् ॥ २८ ॥
उस नगरके समीप एक मनुष्यभक्षी राक्षस रहता था, जिसका नाम था बक। एक दिन महाबाहु भीमसेन उस क्षुधातुर महाबली राक्षस बकके समीप गये ॥ २८ ॥
तं चापि पुरुषव्याघ्रो बाहुवीर्येण पाण्डवः ।
निहत्य तरसा वीरो नगरान् पर्यसान्त्वयत् ॥ २९ ॥
नरश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन वीरवर भीमने अपने बाहुबलसे उस राक्षसको वेगपूर्वक मारकर वहाँके नगरनिवासियोंको धैर्य बँधाया ॥ २९ ॥
ततस्ते शुश्रुवुः कृष्णां पञ्चालेषु स्वयंवराम् ।
श्रुत्वा चैवाभ्यगच्छन्त गत्वा चैवालभन्त ताम् ॥ ३० ॥
ते तत्र द्रौपदीं लब्ध्वा परिसंवत्सरोषिताः ।
विदिता हास्तिनपुरं प्रत्याजग्मुररिंदमाः ॥ ३१ ॥
वहीं सुननेमें आया कि पांचाल देशकी राजकुमारी कृष्णाका स्वयंवर होनेवाला है। यह सुनकर पाण्डव वहाँ गये और जाकर उन्होंने राजकुमारीको प्राप्त कर लिया। द्रौपदीको प्राप्त करनेके बाद पहचान लिये जानेपर भी वे एक वर्षतक पांचाल देशमें ही रहे। फिर वे शत्रुदमन पाण्डव पुनः हस्तिनापुर लौट आये॥ ३०-३१॥
ते उक्ता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च ।
भ्रातृभिर्विग्रहस्तात कथं वो न भवेदिति ॥ ३२ ॥
अस्माभिः खाण्डवप्रस्थे युष्मद्वासोऽनुचिन्तितः ।
तस्माज्जनपदोपेतं सुविभक्तमहापथम् ॥ ३३ ॥
वासाय खाण्डवप्रस्थं व्रजध्वं गतमत्सराः ।
तयोस्ते वचनाज्जग्मुः सह सर्वैः सुहृज्जनैः ॥ ३४ ॥
नगरं खाण्डवप्रस्थं रत्नान्यादाय सर्वशः ।
तत्र ते न्यवसन् पार्थाः संवत्सरगणान् बहून् ॥ ३५ ॥
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान् महीभृतः ।
एवं धर्मप्रधानास्ते सत्यव्रतपरायणाः ॥ ३६ ॥
अप्रमत्तोत्थिताः क्षान्ताः प्रतपन्तोऽहितान् बहून् ।
वहाँ आनेपर राजा धृतराष्ट्र तथा शान्तनुनन्दन भीष्मजीने उनसे कहा—'तात! तुम्हें अपने भाई कौरवोंके साथ लड़ने-झगड़नेका अवसर न प्राप्त हो इसके लिये हमने विचार किया है कि तुमलोग खाण्डवप्रस्थमें रहो। वहाँ अनेक जनपद उससे जुड़े हुए हैं। वहाँ सुन्दर विभागपूर्वक बड़ी-बड़ी सड़कें बनी हुई हैं। अतः तुमलोग ईर्ष्याका त्याग करके खाण्डवप्रस्थमें रहनेके लिये जाओ।' उन दोनोंके इस प्रकार आज्ञा देनेपर सब पाण्डव अपने समस्त सुहृदोंके साथ सब प्रकारके रत्न लेकर खाण्डवप्रस्थको चले गये। वहाँ वे कुन्तीपुत्र अपने अस्त्र-शस्त्रोंके प्रतापसे अन्यान्य राजाओंको अपने वशमें करते हुए बहुत वर्षोंतक निवास करते रहे। इस प्रकार धर्मको प्रधानता देनेवाले, सत्यव्रतके पालनमें तत्पर, सदा सावधान एवं सजग रहनेवाले, क्षमाशील पाण्डव वीर बहुत-से शत्रुओंको संतप्त करते हुए वहाँ निवास करने लगे ॥ ३२—३६ ½ ॥
अजयद् भीमसेनस्तु दिशं प्राचीं महायशाः ॥ ३७ ॥
उदीचीमर्जुनो वीरः प्रतीचीं नकुलस्तथा ।
दक्षिणां सहदेवस्तु विजिग्ये परवीरहा ॥ ३८ ॥
महायशस्वी भीमसेनने पूर्व दिशापर विजय पायी। वीर अर्जुनने उत्तर, नकुलने पश्चिम और शत्रु वीरोंका संहार करनेवाले सहदेवने दक्षिण दिशापर विजय प्राप्त की॥ ३७-३८॥
एवं चक्रुरिमां सर्वे वशे कृत्स्नां वसुन्धराम् ।
पञ्चभिः सूर्यसंकाशैः सूर्येण च विराजता ॥ ३९ ॥
षट्सूर्येवाभवत् पृथ्वी पाण्डवैः सत्यविक्रमैः ।
ततो निमित्ते कस्मिंश्चिद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४० ॥
वनं प्रस्थापयामास तेजस्वी सत्यविक्रमः ।
प्राणेभ्योऽपि प्रियतरं भ्रातरं सव्यसाचिनम् ॥ ४१ ॥
अर्जुनं पुरुषव्याघ्रं स्थिरात्मानं गुणैर्युतम् ।
(धैर्यात् सत्याच्च धर्माच्च विजयाच्चाधिकप्रियः ।
अर्जुनो भ्रातरं ज्येष्ठं नात्यवर्तत जातुचित् ॥)
स वै संवत्सरं पूर्णं मासं चैकं वने वसन् ॥ ४२ ॥
इस तरह सब पाण्डवोंने समूची पृथिवीको अपने वशमें कर लिया। वे पाँचों भाई सूर्यके समान तेजस्वी थे और आकाशमें नित्य उदित होनेवाले सूर्य तो प्रकाशित थे ही; इस तरह सत्यपराक्रमी पाण्डवोंके होनेसे यह पृथ्वी मानो छः सूर्योंसे प्रकाशित होनेवाली बन गयी। तदनन्तर कोई निमित्त बन जानेके कारण सत्यपराक्रमी तेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने अपने प्राणोंसे भी अत्यन्त प्रिय, स्थिर-बुद्धि तथा सद्गुणयुक्त भाई नरश्रेष्ठ सव्यसाची अर्जुनको वनमें भेज दिया। अर्जुन अपने धैर्य, सत्य, धर्म और विजयशीलताके कारण भाइयोंको अधिक प्रिय थे। उन्होंने अपने बड़े भाईकी आज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं किया था। वे पूरे बारह वर्ष और एक मासतक वनमें रहे ॥ ३९—४२ ॥
(तीर्थयात्रां च कृतवान् नागकन्यामवाप्य च ।
पाण्ड्यस्य तनयां लब्ध्वा तत्र ताभ्यां सहोषितः ॥)
ततोऽगच्छद्धृषीकेशं द्वारवत्यां कदाचन ।
लब्धवांस्तत्र बीभत्सुर्भार्यां राजीवलोचनाम् ॥ ४३ ॥
अनुजां वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीम् ।
सा शचीव महेन्द्रेण श्रीः कृष्णेनेव संगता ॥ ४४ ॥
सुभद्रा युयुजे प्रीत्या पाण्डवेनार्जुनेन ह ।
उसी समय उन्होंने निर्मल तीर्थोंकी यात्रा की और नागकन्या उलूपीको पाकर पाण्ड्यदेशीय नरेश चित्रवाहनकी पुत्री चित्रांगदाको भी प्राप्त किया और उन-उन स्थानोंमें उन दोनोंके साथ कुछ कालतक निवास किया। तत्पश्चात् वे किसी समय द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णके पास गये। वहाँ अर्जुनने मंगलमय वचन बोलनेवाली कमललोचना सुभद्राको, जो वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी छोटी बहिन थी, पत्नीरूपमें प्राप्त किया। जैसे इन्द्रसे शची और भगवान् विष्णुसे लक्ष्मी संयुक्त हुई हैं, उसी प्रकार सुभद्रा बड़े प्रेमसे पाण्डुनन्दन अर्जुनसे मिली ॥ ४३-४४ ½ ॥
अतर्पयच्च कौन्तेयः खाण्डवे हव्यवाहनम् ॥ ४५ ॥
बीभत्सुर्वासुदेवेन सहितो नृपसत्तम ।
नातिभारो हि पार्थस्य केशवेन सहाभवत् ॥ ४६ ॥
व्यवसायसहायस्य विष्णोः शत्रुवधेष्विव ।
तत्पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुनने खाण्डवप्रस्थमें भगवान् वासुदेवके साथ रहकर अग्निदेवको तृप्त किया। नृपश्रेष्ठ जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका साथ होनेसे अर्जुनको इस कार्यमें ठीक उसी तरह अधिक परिश्रम या भारका अनुभव नहीं हुआ, जैसे दृढ़ निश्चयको सहायक बनाकर देवशत्रुओंका वध करते समय भगवान् विष्णुको भार या परिश्रमकी प्रतीति नहीं होती है ॥ ४५-४६ १/२ ॥
पार्थायाग्निर्ददौ चापि गाण्डीवं धनुरुत्तमम् ॥ ४७ ॥
इषुधी चाक्षयैर्बाणै रथं च कपिलक्षणम् ।
मोक्षयामास बीभत्सुर्मयं यत्र महासुरम् ॥ ४८ ॥
तदनन्तर अग्निदेवने संतुष्ट हो अर्जुनको उत्तम गाण्डीव धनुष, अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तूणीर और एक कपिध्वज रथ प्रदान किया। उसी समय अर्जुनने महान् असुर मयको खाण्डव वनमें जलनेसे बचाया था ॥ ४७-४८ ॥
स चकार सभां दिव्यां सर्वरत्नसमाचिताम् ।
तस्यां दुर्योधनो मन्दो लोभं चक्रे सुदुर्मतिः ॥ ४९ ॥
इससे संतुष्ट होकर उसने अर्जुनके लिये एक दिव्य सभाभवनका निर्माण किया, जो सब प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था। खोटी बुद्धिवाले मूर्ख दुर्योधनके मनमें उस सभाको ले लेनेके लिये लोभ पैदा हुआ ॥ ४९ ॥
ततोऽक्षैर्वञ्चयित्वा च सौबलेन युधिष्ठिरम् ।
वनं प्रस्थापयामास सप्त वर्षाणि पञ्च च ॥ ५० ॥
अज्ञातमेकं राष्ट्रे च ततो वर्षं त्रयोदशम् ।
ततश्चतुर्दशे वर्षे याचमानाः स्वकं वसु ॥ ५१ ॥
तब उसने शकुनिकी सहायतासे कपटपूर्ण जुएके द्वारा युधिष्ठिरको ठग लिया और उन्हें बारह वर्षतक वनमें और तेरहवें वर्ष एक राष्ट्रमें अज्ञात-रूपसे वास करनेके लिये भेज दिया। इसके बाद चौदहवें वर्षमें पाण्डवोंने लौटकर अपना राज्य और धन माँगा ॥ ५०-५१ ॥
नालभन्त महाराज ततो युद्धमवर्तत ।
ततस्ते क्षत्रमुत्साद्य हत्वा दुर्योधनं नृपम् ॥ ५२ ॥
राज्यं विहतभूयिष्ठं प्रत्यपद्यन्त पाण्डवाः ।
एवमेतत् पुरावृत्तं तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।
भेदो राज्यविनाशाय जयश्च जयतां वर ॥ ५३ ॥
महाराज! जब इस प्रकार न्यायपूर्वक माँगनेपर भी उन्हें राज्य नहीं मिला, तब दोनों दलोंमें युद्ध छिड़ गया। फिर तो पाण्डव-वीरोंने क्षत्रियकुलका संहार करके राजा दुर्योधनको भी मार डाला और अपने राज्यको, जिसका अधिकांश भाग उजाड़ हो गया था, पुनः अपने अधिकारमें कर लिया। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! अनायास महान् कर्म करनेवाले
पाण्डवोंका यही पुरातन इतिहास है। इस प्रकार राज्यके विनाशके लिये उनमें फूट पड़ी और युद्धके बाद उन्हें विजय प्राप्त हुई ।। ५२-५३ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि भारतसूत्रं नामैकषष्टितमोऽध्यायः ।। ६१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें भारतसूत्र नामक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 423)
द्विषष्टितमोऽध्यायः
महाभारतकी महत्ता
जनमेजय उवाच
कथितं वै समासेन त्वया सर्वं द्विजोत्तम ।
महाभारतमाख्यानं कुरूणां चरितं महत् ॥ १ ॥
**जनमेजयने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! आपने कुरुवंशियोंके चरित्ररूप महान् महाभारत नामक सम्पूर्ण इतिहासका बहुत संक्षेपसे वर्णन किया है ॥ १ ॥
कथां त्वनघ चित्रार्थां कथयस्व तपोधन ।
विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ॥ २ ॥
निष्पाप तपोधन! अब उस विचित्र अर्थवाली कथाको विस्तारके साथ कहिये; क्योंकि उसे विस्तारपूर्वक सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ २ ॥
स भवान् विस्तरेणेमां पुनराख्यातुमर्हति ।
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥ ३ ॥
विप्रवर! आप पुनः पूरे विस्तारके साथ यह कथा सुनावें। मैं अपने पूर्वजोंके इस महान् चरित्रको सुनते-सुनते तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ ३ ॥
न तत् कारणमल्पं वै धर्मज्ञा यत्र पाण्डवाः ।
अवध्यान् सर्वशो जघ्नुः प्रशस्यन्ते च मानवैः ॥ ४ ॥
सब मनुष्योंद्वारा जिनकी प्रशंसा की जाती है, उन धर्मज्ञ पाण्डवोंने जो युद्धभूमिमें समस्त अवध्य सैनिकोंका भी वध किया था, इसका कोई छोटा या साधारण कारण नहीं हो सकता ॥ ४ ॥
किमर्थं ते नरव्याघ्राः शक्ताः सन्तो ह्यनागसः ।
प्रयुज्यमानान् संक्लेशान् क्षान्तवन्तो दुरात्मनाम् ॥ ५ ॥
नरश्रेष्ठ पाण्डव शक्तिशाली और निरपराध थे तो भी उन्होंने दुरात्मा कौरवोंके दिये हुए महान् क्लेशोंको कैसे चुपचाप सहन कर लिया? ॥ ५ ॥
कथं नागायुतप्राणो बाहुशाली वृकोदरः ।
परिक्लिश्यन्नपि क्रोधं धृतवान् वै द्विजोत्तम ॥ ६ ॥
द्विजोत्तम! अपनी विशाल भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले भीमसेनमें तो दस हजार हाथियोंका बल था। फिर उन्होंने क्लेश उठाते हुए भी क्रोधको किसलिये रोक रखा था? ॥ ६ ॥
कथं सा द्रौपदी कृष्णा क्लिश्यमाना दुरात्मभिः ।
शक्ता सती धार्तराष्ट्रान् नादहत् क्रोधचक्षुषा ॥ ७ ॥