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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

महर्षि कण्वने आचार्य होकर भरतसे प्रचुर दक्षिणाओंसे युक्त 'गोवितत' नामक अश्वमेध यज्ञका विधिपूर्वक अनुष्ठान करवाया। श्रीमान् भरतने उस यज्ञका पूरा फल प्राप्त किया। उसमें महाराज भरतने आचार्य कण्वको एक सहस्र पद्म स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणारूपमें दीं ॥ १३० ॥

भरताद् भारती कीर्तिर्येनेदं भारतं कुलम् ।
अपरे ये च पूर्वे वै भारता इति विश्रुताः ॥ १३१ ॥

भरतसे ही इस भूखण्डका नाम भारत (अथवा भूमिकाम नाम भारती) हुआ। उन्हींसे यह कौरववंश भरतवंशके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उनके बाद उस कुलमें पहले तथा आज भी जो राजा हो गये हैं, वे भारत (भरतवंशी) कहे जाते हैं ॥ १३१ ॥

भरतस्यान्ववाये हि देवकल्पा महौजसः ।
बभूवुर्ब्रह्मकल्पाश्च बहवो राजसत्तमाः ॥ १३२ ॥
येषामपरिमेयानि नामधेयानि सर्वशः ।
तेषां तु ते यथामुख्यं कीर्तयिष्यामि भारत ।
महाभागान् देवकल्पान् सत्यार्जवपरायणान् ॥ १३३ ॥

भरतके कुलमें देवताओंके समान महापराक्रमी तथा ब्रह्माजीके समान तेजस्वी बहुत-से राजर्षि हो गये हैं; जिनके सम्पूर्ण नामोंकी गणना असम्भव है। जनमेजय! इनमें जो मुख्य हैं, उन्हींके नामोंका तुमसे वर्णन करूँगा। वे सभी महाभाग नरेश देवताओंके समान तेजस्वी तथा सत्य, सरलता आदि धर्मोंमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ १३२-१३३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने
चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक
चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८९३/३ श्लोक मिलाकर कुल २२२ ३/३ श्लोक हैं)


* चक्रके विशेषणोंसे यहाँ यही अनुमान होता है कि भरतके पास सुदर्शन चक्रके समान ही कोई चक्र था।

दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

दक्ष, वैवस्वत मनु तथा उनके पुत्रोंकी उत्पत्ति; पुरूरवा, नहुष और ययातिके चरित्रोंका संक्षेपसे वर्णन

वैशम्पायन उवाच

प्रजापतेस्तु दक्षस्य मनोर्वैवस्वतस्य च ।
भरतस्य कुरोः पूरोरजमीढस्य चानघ ॥ १ ॥
यादवानामिमं वंशं कौरवाणां च सर्वशः ।
तथैव भरतानां च पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् ॥ २ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—निष्पाप जनमेजय! अब मैं दक्ष प्रजापति, वैवस्वत मनु, भरत, कुरु, पूरु, अजमीढ, यादव, कौरव तथा भरतवंशियोंकी कुल-परम्पराका तुमसे वर्णन करूँगा। उनका कुल परम पवित्र, महान् मंगलकारी तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है ।। १-२ १/२ ।।

तेजोभिरुदिताः सर्वे महर्षिसमतेजसः ॥ ३ ॥
दश प्राचेतसः पुत्राः सन्तः पुण्यजनाः स्मृताः ।
मुखजेनाग्निना यैस्ते पूर्वं दग्धा महीरुहाः ॥ ४ ॥

प्रचेताके दस पुत्र थे, जो अपने तेजके द्वारा सदा प्रकाशित होते थे। वे सब-के-सब महर्षियोंके समान तेजस्वी, सत्पुरुष और पुण्यकर्मा माने गये हैं। उन्होंने पूर्वकालमें अपने मुखसे प्रकट की हुई अग्निद्वारा उन बड़े-बड़े वृक्षोंको जलाकर भस्म कर दिया था (जो प्राणियोंको पीड़ा दे रहे थे) ।। ३-४ ।।

तेभ्यः प्राचेतसो जज्ञे दक्षो दक्षादिमाः प्रजाः ।
सम्भुताः पुरुषव्याघ्र स हि लोकपितामहः ॥ ५ ॥

उक्त दस प्रचेताओंद्वारा (मारिषाके गर्भसे) प्राचेतस दक्षका जन्म हुआ तथा दक्षसे ये समस्त प्रजाएँ उत्पन्न हुई हैं। नरश्रेष्ठ! वे सम्पूर्ण जगत्‌के पितामह हैं ।। ५ ।।

वीरिण्या सह संगम्य दक्षः प्राचेतसो मुनिः ।
आत्मतुल्यानजनयत् सहस्रं संशितव्रतान् ॥ ६ ॥

प्राचेतस मुनि दक्षने वीरिणीसे समागम करके अपने ही समान गुण-शीलवाले एक हजार पुत्र उत्पन्न किये। वे सब-के-सब अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले थे ।। ६ ।।

सहस्रसंख्यान् सम्भूतान् दक्षपुत्रांश्च नारदः ।
मोक्षमध्यापयामास सांख्यज्ञानमनुत्तमम् ॥ ७ ॥

एक सहस्रकी संख्यामें प्रकट हुए उन दक्ष-पुत्रोंको देवर्षि नारदजीने मोक्ष-शास्त्रका अध्ययन कराया। परम उत्तम सांख्य-ज्ञानका उपदेश किया ॥ ७ ॥

ततः पञ्चाशतं कन्याः पुत्रिका अभिसंदधे ।
प्रजापतिः प्रजा दक्षः सिसृक्षुर्जनमेजय ॥ ८ ॥
जनमेजय! जब वे सभी विरक्त होकर घरसे निकल गये, तब प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छासे प्रजापति दक्षने पुत्रिकाके द्वारा पुत्र (दौहित्र) होनेपर उस पुत्रिकाको ही पुत्र मानकर पचास कन्याएँ उत्पन्न कीं ॥ ८ ॥

ददौ दश स धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
कालस्य नयने युक्ताः सप्तविंशतिमिन्दवे ॥ ९ ॥
उन्होंने दस कन्याएँ धर्मको, तेरह कश्यपको और कालका संचालन करनेमें नियुक्त नक्षत्रस्वरूपा सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमाको ब्याह दीं ॥ ९ ॥

त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा ।
मारीचः कश्यपस्त्वस्यामादित्यान् समजीजनत् ॥ १० ॥
इन्द्रादीन् वीर्यसम्पन्नान् विवस्वन्तमथापि च ।
विवस्वतः सुतो जज्ञे यमो वैवस्वतः प्रभुः ॥ ११ ॥
मरीचिनन्दन कश्यपने अपनी तेरह पत्नियोंमेंसे जो सबसे बड़ी दक्ष-कन्या अदिति थीं, उनके गर्भसे इन्द्र आदि बारह आदित्योंको जन्म दिया, जो बड़े पराक्रमी थे। तदनन्तर उन्होंने अदितिसे ही विवस्वान्‌को उत्पन्न किया। विवस्वान्‌के पुत्र यम हुए, जो वैवस्वत कहलाते हैं। वे समस्त प्राणियोंके नियन्ता हैं ॥ १०-११ ॥

मार्तण्डस्य मनुर्धीमानजायत सुतः प्रभुः ।
यमश्चापि सुतो जज्ञे ख्यातस्तस्यानुजः प्रभुः ॥ १२ ॥
विवस्वान्‌के ही पुत्र परम बुद्धिमान् मनु हुए, जो बड़े प्रभावशाली हैं। मनुके बाद उनसे यम नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई, जो सर्वत्र विख्यात हैं। यमराज मनुके छोटे भाई तथा प्राणियोंका नियमन करनेमें समर्थ हैं ॥ १२ ॥

धर्मात्मा स मनुर्धीमान् यत्र वंशः प्रतिष्ठितः ।
मनोर्वंशो मानवानां ततोऽयं प्रथितोऽभवत् ॥ १३ ॥
बुद्धिमान् मनु बड़े धर्मात्मा थे, जिनपर सूर्यवंशकी प्रतिष्ठा हुई। मानवोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह मनुवंश उन्हींसे विख्यात हुआ ॥ १३ ॥

ब्रह्मक्षत्रादयस्तस्मान्मनोर्जातास्तु मानवाः ।
ततोऽभवन्महाराज ब्रह्म क्षत्रेण संगतम् ॥ १४ ॥
उन्हीं मनुसे ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि सब मानव उत्पन्न हुए हैं। महाराज! तभीसे ब्राह्मणकुल क्षत्रियसे सम्बद्ध हुआ ॥ १४ ॥

ब्राह्मणा मानवास्तेषां साङ्गं वेदमधारयन् ।

वेनं धृष्णुं नरिष्यन्तं नाभागेक्ष्वाकुमेव च ॥ १५ ॥
कारूषमथ शर्यातिं तथा चैवाष्टमीमिलाम् ।
पृषध्रं नवमं प्राहुः क्षत्रधर्मपरायणम् ॥ १६ ॥
नाभागारिष्टदशमान् मनोः पुत्रान् प्रचक्षते ।
पञ्चाशत् तु मनोः पुत्रास्तथैवान्येऽभवन् क्षितौ ॥ १७ ॥
उनमेंसे ब्राह्मणजातीय मानवोंने छहों अंगोंसहित वेदोंको धारण किया। वेन, धृष्णु, नरिष्यन्त, नाभाग, इक्ष्वाकु, कारूष, शर्याति, आठवीं इला, नवें क्षत्रिय-धर्मपरायण पृषध्र तथा दसवें नाभागारिष्ट—इन दसोंको मनुपुत्र कहा जाता है। मनुके इस पृथ्वीपर पचास पुत्र और हुए ॥ १५-१७ ॥

अन्योन्यभेदात् ते सर्वे विनेशुरिति नः श्रुतम् ।
पुरूरवास्ततो विद्वानिलायां समपद्यत ॥ १८ ॥
परंतु आपसकी फूटके कारण वे सब-के-सब नष्ट हो गये, ऐसा हमने सुना है। तदनन्तर इलाके गर्भसे विद्वान् पुरूरवाका जन्म हुआ ॥ १८ ॥

सा वै तस्याभवन्माता पिता चैवेति नः श्रुतम् ।
त्रयोदश समुद्रस्य द्वीपान्यश्नन् पुरूरवाः ॥ १९ ॥
सुना जाता है, इला पुरूरवाकी माता भी थी और पिता भी*। राजा पुरूरवा समुद्रके तेरह द्वीपोंका शासन और उपभोग करते थे ॥ १९ ॥

अमानुषैर्वृतः सत्त्वैर्मानुषः सन् महायशाः ।
विप्रैः स विग्रहं चक्रे वीर्योन्मत्तः पुरूरवाः ॥ २० ॥
जहार च स विप्राणां रत्नान्युत्क्रोशतामपि ।
महायशस्वी पुरूरवा मनुष्य होकर भी मानवेतर प्राणियोंसे घिरे रहते थे। वे अपने बल-पराक्रमसे उन्मत्त हो ब्राह्मणोंके साथ विवाद करने लगे। बेचारे ब्राह्मण चीखते-चिल्लाते रहते थे तो भी वे उनका सारा धन-रत्न छीन लेते थे ॥ २० १/२ ॥

सनत्कुमारस्तं राजन् ब्रह्मलोकादुपत्य ह ॥ २१ ॥
अनुदर्शं ततश्चक्रे प्रत्यगृह्णान्न चाप्यसौ ।
ततो महर्षिभिः क्रुद्धैः सद्यः शप्तो व्यनश्यत ॥ २२ ॥
जनमेजय! ब्रह्मलोकसे सनत्कुमारजीने आकर उन्हें बहुत समझाया और ब्राह्मणोंपर अत्याचार न करनेका उपदेश दिया, किंतु वे उनकी शिक्षा ग्रहण न कर सके। तब क्रोधमें भरे हुए महर्षियोंने तत्काल उन्हें शाप दे दिया, जिससे वे नष्ट हो गये ॥ २१-२२ ॥

लोभान्वितो बलमदान्नष्टसंज्ञो नराधिपः ।
स हि गन्धर्वलोकस्थानुर्वश्या सहितो विराट् ॥ २३ ॥
आनिनाय क्रियार्थेऽग्नीन् यथावत् विहितांस्त्रिधा ।

षट् सुता जज्ञिरे चैलादायुर्धीमानमावसुः ॥ २४ ॥ दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः । नहुषं वृद्धशर्माणं रजिं गयमनेनसम् ॥ २५ ॥ स्वर्भानवीसुतानेतानायोः पुत्रान् प्रचक्षते । आयुषो नहुषः पुत्रो धीमान् सत्यपराक्रमः ॥ २६ ॥ राजा पुरूरवा लोभसे अभिभूत थे और बलके घमंडमें आकर अपनी विवेक-शक्ति खो बैठे थे। वे शोभाशाली नरेश ही गन्धर्वलोकमें स्थित और विधिपूर्वक स्थापित त्रिविध अग्नियोंको उर्वशीके साथ इस धरातलपर लाये थे। इलानन्दन पुरूरवाके छः पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम इस प्रकार हैं—आयु, धीमान्, अमावसु, दृढायु, वनायु और शतायु। ये सभी उर्वशीके पुत्र हैं। उनमेंसे आयुके स्वर्भानुकुमारीके गर्भसे उत्पन्न पाँच पुत्र बताये जाते हैं—नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, गय तथा अनेना। आयुर्नन्दन नहुष बड़े बुद्धिमान् और सत्य-पराक्रमी थे ॥ २३-२६ ॥

राज्यं शशास सुमहद् धर्मेण पृथिवीपते । पितॄन् देवानृषीन् विप्रान् गन्धर्वोरगराक्षसान् ॥ २७ ॥ नहुषः पालयामास ब्रह्मक्षत्रमथो विशः । स हत्वा दस्युसंघातानृषीन् करमदापयत् ॥ २८ ॥ पृथिवीपते! उन्होंने अपने विशाल राज्यका धर्मपूर्वक शासन किया। पितरों, देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका भी पालन किया। राजा नहुषने झुंड-के-झुंड डाकुओं और लुटेरोंका वध करके ऋषियोंको भी कर देनेके लिये विवश किया ॥ २७-२८ ॥

पशुवच्चैव तान् पृष्ठे वाहयामास वीर्यवान् । कारयामास चेन्द्रत्वमभिभूय दिवौकसः ॥ २९ ॥ तेजसा तपसा चैव विक्रमेणौजसा तथा । यतिं ययातिं संयातिमायातिमयतिं ध्रुवम् ॥ ३० ॥ नहुषो जनयामास षट् सुतान् प्रियवादिनः । यतिस्तु योगमास्थाय ब्रह्मभूतोऽभवन्मुनिः ॥ ३१ ॥ अपने इन्द्रत्वकालमें पराक्रमी नहुषने महर्षियोंको पशुकी तरह वाहन बनाकर उनकी पीठपर सवारी की थी। उन्होंने तेज, तप, ओज और पराक्रमद्वारा समस्त देवताओंको तिरस्कृत करके इन्द्रपदका उपभोग किया था। राजा नहुषने छः प्रियवादी पुत्रोंको जन्म दिया, जिनके नाम इस प्रकार हैं—यति, ययाति, संयाति, आयाति, अयति और ध्रुव। इनमें यति योगका आश्रय लेकर ब्रह्मभूत मुनि हो गये थे ॥ २९—३१ ॥

ययातिर्नाहुषः सम्राडासीत् सत्यपराक्रमः । स पालयामास महीमीजे च बहुभिर्मखैः ॥ ३२ ॥

तब नहुषके दूसरे पुत्र सत्यपराक्रमी ययाति सम्राट् हुए। उन्होंने इस पृथ्वीका पालन तथा बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान किया ॥ ३२ ॥
अतिभक्त्या पितॄनर्चन् देवांश्च प्रयत: सदा ।
अन्वगृह्णात् प्रजा: सर्वा ययातिरपराजित: ॥ ३३ ॥
तस्य पुत्रा महेष्वासा: सर्वै: समुदिता गुणै: ।
देवयांयां महाराज शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥ ३४ ॥
महाराज ययाति किसीसे परास्त होनेवाले नहीं थे। वे सदा मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर बड़े भक्ति-भावसे देवताओं तथा पितरोंका पूजन करते और समस्त प्रजापर अनुग्रह रखते थे। महाराज जनमेजय! राजा ययातिके देवयानी और शर्मिष्ठाके गर्भसे महान् धनुर्धर पुत्र उत्पन्न हुए। वे सभी समस्त सद्गुणोंके भण्डार थे ॥ ३३-३४ ॥
देवयान्यामजायेतां यदुस्तुर्वसुरेव च ।
द्रुह्युश्चानुश्च पूरुश्च शर्मिष्ठायां च जज्ञिरे ॥ ३५ ॥
यदु और तुर्वसु—ये दो देवयानीके पुत्र थे और द्रुह्यु, अनु तथा पूरु—ये तीन शर्मिष्ठाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे ॥ ३५ ॥
स शाश्वती: समा राजन् प्रजा धर्मेण पालयन् ।
जरामाच्छन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम् ॥ ३६ ॥
राजन्! वे सर्वदा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते थे। एक समय नहुषपुत्र ययातिको अत्यन्त भयानक वृद्धावस्था प्राप्त हुई, जो रूप और सौन्दर्यका नाश करनेवाली है ॥ ३६ ॥
जराभिभूत: पुत्रान् स राजा वचनमब्रवीत् ।
यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्युं चानुं च भारत ॥ ३७ ॥
जनमेजय! वृद्धावस्थासे आक्रान्त होनेपर राजा ययातिने अपने समस्त पुत्रों यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु तथा अनुसे कहा— ॥ ३७ ॥
यौवनेन चरन् कामान् युवा युवतिभि: सह ।
विहर्तुमहमिच्छामि साह्यं कुरुत पुत्रका: ॥ ३८ ॥
‘पुत्रो! मैं युवावस्थासे सम्पन्न हो जवानीके द्वारा कामोपभोग करते हुए युवतियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ। तुम मेरी सहायता करो’ ॥ ३८ ॥
तं पुत्रो दैवयानेय: पूर्वजो वाक्यमब्रवीत् ।
किं कार्यं भवत: कार्यमस्माकं यौवनेन ते ॥ ३९ ॥
यह सुनकर देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुने पूछा—‘भगवन्! हमारी जवानी लेकर उसके द्वारा आपको कौन-सा कार्य करना है’ ॥ ३९ ॥
ययातिरब्रवीत् तं वै जरा मे प्रतिगृह्यताम् ।
यौवनेन त्वदीयेन चरेयं विषयान्हम् ॥ ४० ॥

तब ययातिने उससे कहा—तुम मेरा बुढ़ापा ले लो और मैं तुम्हारी जवानीसे विषयोपभोग करूँगा॥ ४० ॥ यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्चोशनसो मुनेः । कामार्थः परिहीणोऽयं तप्येयं तेन पुत्रकाः ॥ ४१ ॥ ‘पुत्रो! अबतक तो मैं दीर्घकालीन यज्ञोंके अनुष्ठानमें लगा रहा और अब मुनिवर शुक्राचार्यके शापसे बुढ़ापेने मुझे धर दबाया है, जिससे मेरा कामरूप पुरुषार्थ छिन गया। इसीसे मैं संतप्त हो रहा हूँ’ ॥ ४१ ॥ मामकेन शरीरेण राज्यमेकः प्रशास्तु वः । अहं तन्वाभिनवया युवा काममवाप्नुयाम् ॥ ४२ ॥ ‘तुममेंसे कोई एक व्यक्ति मेरा वृद्ध शरीर लेकर उसके द्वारा राज्यशासन करे। मैं नूतन शरीर पाकर युवावस्थासे सम्पन्न हो विषयोंका उपभोग करूँगा’ ॥ ४२ ॥ ते न तस्य प्रत्यगृह्णन् यदुप्रभृतयो जराम् । तमब्रवीत् ततः पूरुः कनीयान् सत्यविक्रमः ॥ ४३ ॥ राजंश्चराभिनवया तन्वा यौवनगोचरः । अहं जरां समादाय राज्ये स्थास्यामि तेऽऽज्ञया ॥ ४४ ॥ राजाके ऐसा कहनेपर भी वे यदु आदि चार पुत्र उनकी वृद्धावस्था न ले सके। तब सबसे छोटे पुत्र सत्यपराक्रमी पूरुने कहा—‘राजन्! आप मेरे नूतन शरीरसे नौजवान होकर विषयोंका उपभोग कीजिये। मैं आपकी आज्ञासे बुढ़ापा लेकर राज्यसिंहासनपर बैठूँगा’ ॥ ४३-४४ ॥ एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाश्रयात् । संचारयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि ॥ ४५ ॥ पूरुके ऐसा कहनेपर राजर्षि ययातिने तप और वीर्यके आश्रयसे अपनी वृद्धावस्थाका अपने महात्मा पुत्र पूरुमें संचार कर दिया ॥ ४५ ॥ पौरवेणाथ वयसा राजा यौवनमास्थितः । यायातेनापि वयसा राज्यं पूरुरकारयत् ॥ ४६ ॥ ययाति स्वयं पूरुकी नयी अवस्था लेकर नौजवान बन गये। इधर पूरु भी राजा ययातिकी अवस्था लेकर उसके द्वारा राज्यका पालन करने लगे ॥ ४६ ॥ ततो वर्षसहस्राणि ययातिरपराजितः । स्थितः स नृपशार्दूलः शार्दूलसमविक्रमः ॥ ४७ ॥ तदनन्तर किसीसे परास्त न होनेवाले और सिंहके समान पराक्रमी नृपश्रेष्ठ ययाति एक सहस्र वर्षतक युवावस्थामें स्थित रहे ॥ ४७ ॥ ययातिरपि पत्नीभ्यां दीर्घकालं विहृत्य च । विश्वाच्या सहितो रेमे पुनश्चैत्ररथे वने ॥ ४८ ॥

उन्होंने अपनी दोनों पत्नियोंके साथ दीर्घकालतक विहार करके चैत्ररथ वनमें जाकर विश्वाची अप्सराके साथ रमण किया ।। ४८ ।।

नाध्यगच्छत् तदा तृप्तिं कामानां स महायशाः । अवेत्य मनसा राजन्निमां गाथां तदा जगौ ।। ४९ ।।

परंतु उस समय भी महायशस्वी ययाति काम-भोगसे तृप्त न हो सके। राजन्! उन्होंने मनसे विचारकर यह निश्चय कर लिया कि विषयोंके भोगनेसे भोगेच्छा कभी शान्त नहीं हो सकती। तब राजाने (संसारके हितके लिये) यह गाथा गायी— ।। ४९ ।।

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्धते ।। ५० ।।

‘विषय-भोगकी इच्छा विषयोंका उपभोग करनेसे कभी शान्त नहीं हो सकती। घीकी आहुति डालनेसे अधिक प्रज्वलित होनेवाली आगकी भाँति वह और भी बढ़ती ही जाती है’ ।। ५० ।।

पृथिवी रत्नसम्पूर्णा हिरण्यं पशवः स्त्रियः । नालमेकस्य तत् सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् ।। ५१ ।।

‘रत्नोंसे भरी हुई सारी पृथिवी, संसारका सारा सुवर्ण, सारे पशु और सुन्दरी स्त्रियाँ किसी एक पुरुषको मिल जायँ, तो भी वे सब-के-सब उसके लिये पर्याप्त नहीं होंगे। वह और भी पाना चाहेगा। ऐसा समझकर शान्ति धारण करे—भोगेच्छाको दबा दे ।। ५१ ।।

यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु कर्हिचित् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।। ५२ ।।

‘जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी किसी भी प्राणीके प्रति बुरा भाव नहीं करता, तब वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है’ ।। ५२ ।।

यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति । यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।। ५३ ।।

‘जब सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि होनेके कारण यह पुरुष किसीसे नहीं डरता और जब उससे भी दूसरे प्राणी नहीं डरते तथा जब वह न तो किसीकी इच्छा करता है और न किसीसे द्वेष ही रखता है, उस समय वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है’ ।। ५३ ।।

इत्यवेक्ष्य महाप्राज्ञः कामानां फल्गुतां नृप । समाधाय मनो बुद्ध्या प्रत्यगृह्णाज्जरां सुतात् ।। ५४ ।।

जनमेजय! परम बुद्धिमान् महाराज ययातिने इस प्रकार भोगोंकी निःसारताका विचार करके बुद्धिके द्वारा मनको एकाग्र किया और पुत्रसे अपना बुढ़ापा वापस ले लिया ।।

दत्त्वा च यौवनं राजा पूरुं राज्येऽभिषिच्य च । अतृप्त एव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह ।। ५५ ।।

पूरुको उसकी जवानी लौटाकर राजाने उसे राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और भोगोंसे अतृप्त रहकर ही अपने पुत्र पूरुसे कहा— ।। ५५ ।।
त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः ।
पौरवो वंश इति ते ख्यातिं लोके गमिष्यति ।। ५६ ।।
‘बेटा! तुम्हारे-जैसे पुत्रसे ही मैं पुत्रवान् हूँ। तुम्हीं मेरे वंश-प्रवर्तक पुत्र हो। तुम्हारा वंश इस जगत्में पौरव वंशके नामसे विख्यात होगा' ।। ५६ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततः स नृपशार्दूल पूरुं राज्येऽभिषिच्य च ।
ततः सुचरितं कृत्वा भृगुतुङ्गे महातपाः ।। ५७ ।।
कालेन महता पश्चात् कालधर्ममुपेयिवान् ।
कारयित्वा त्वनशनं सदारः स्वर्गमाप्तवान् ।। ५८ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर पूरुका राज्याभिषेक करनेके पश्चात् राजा ययातिने अपनी पत्नियोंके साथ भृगुतुंग पर्वतपर जाकर सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए वहाँ बड़ी भारी तपस्या की। इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेके बाद स्त्रियोंसहित निराहार व्रत करके उन्होंने स्वर्गलोक प्राप्त किया ।। ५७-५८ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ययात्युपाख्याने
पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ययात्युपाख्यानविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७५ ।।


* वास्तवमें इला माता ही थी। जन्मदाता पिता चन्द्रमाके पुत्र बुध थे, परंतु इला जब पुरुषरूपमें परिणत हुई तो उसका नाम सुद्युम्न हुआ। सुद्युम्नने ही पुरूरवाको राज्य दिया था, इसलिये वे पिता भी कहे जाते हैं।

अध्याय (पृष्ठ 573)

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षट्सप्ततितमोऽध्यायः

कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या प्राप्त करना

जनमेजय उवाच

ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः ।
कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम् ॥ १ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन ।
आनुपूर्व्या च मे शंस राज्ञो वंशकरान् पृथक् ॥ २ ॥
**जनमेजयने पूछा—**तपोधन! हमारे पूर्वज महाराज ययातिने, जो प्रजापतिसे दसवीं पीढ़ीमें उत्पन्न हुए थे, शुक्राचार्यकी अत्यन्त दुर्लभ पुत्री देवयानीको पत्नीरूपमें कैसे प्राप्त किया? मैं इस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझसे सभी वंश-प्रवर्तक राजाओंका क्रमशः पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये ॥ १-२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ययातिरासीन्नृपतिर्देवराजसमद्युतिः ।
तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राते वै यथा पुरा ॥ ३ ॥
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छते जनमेजय ।
देवयान्याश्च संयोगं ययातेर्नाहुषस्य च ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**जनमेजय! राजा ययाति देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। पूर्वकालमें शुक्राचार्य और वृषपर्वाने ययातिका अपनी-अपनी कन्याके पतिके रूपमें जिस प्रकार वरण किया, वह सब प्रसंग तुम्हारे पूछनेपर मैं तुमसे कहूँगा। साथ ही यह भी बताऊँगा कि नहुषनन्दन ययाति तथा देवयानीका संयोग किस प्रकार हुआ ॥ ३-४ ॥

सुराणामसुराणां च समजायत वै मिथः ।
ऐश्वर्यं प्रति संघर्षस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ ५ ॥
एक समय चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीके ऐश्वर्यके लिये देवताओं और असुरोंमें परस्पर बड़ा भारी संघर्ष हुआ ॥ ५ ॥

जिगीषया ततो देवा वव्रिरेऽऽङ्गिरसं मुनिम् ।
पौरोहित्येन याज्यार्थे काव्यं तूशनसं परे ॥ ६ ॥
ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यस्पर्धिनौ भृशम् ।
तत्र देवा निजघ्नुर्यान् दानवान् युधि संगतान् ॥ ७ ॥

तान् पुनर्जीवयामास काव्यो विद्याबलाश्रयात् । ततस्ते पुनरुत्थाय योधयांचक्रिरे सुरान् ॥ ८ ॥ उसमें विजय पानेकी इच्छासे देवताओंने अंगिरा मुनिके पुत्र बृहस्पतिका पुरोहितके पदपर वरण किया और दैत्योंने शुक्राचार्यको पुरोहित बनाया। वे दोनों ब्राह्मण सदा आपसमें बहुत लाग-डाट रखते थे। देवताओंने उस युद्धमें आये हुए जिन दानवोंको मारा था, उन्हें शुक्राचार्यने अपनी संजीवनी विद्याके बलसे पुनः जीवित कर दिया। अतः वे पुनः उठकर देवताओंसे युद्ध करने लगे ॥ ६-८ ॥ असुरास्तु निजघ्नुर्यान् सुरान् समरमूर्धनि । न तान् संजीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः ॥ ९ ॥ परंतु असुरोंने युद्धके मुहानेपर जिन देवताओंको मारा था, उन्हें उदारबुद्धि बृहस्पति जीवित न कर सके ॥ ९ ॥ न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेत्ति वीर्यवान् । संजीविनीं ततो देवा विषादमगमन् परम् ॥ १० ॥ क्योंकि शक्तिशाली शुक्राचार्य जिस संजीविनी विद्याको जानते थे, उसका ज्ञान बृहस्पतिको नहीं था। इससे देवताओंको बड़ा विषाद हुआ ॥ १० ॥ ते तु देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा । ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः ॥ ११ ॥ इससे देवता शुक्राचार्यके भयसे उद्विग्न हो उस समय बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र कचके पास जाकर बोले— ॥ ११ ॥ भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु नः साह्यमुत्तमम् । या सा विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि ॥ १२ ॥ शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागभाङ् नो भविष्यसि । वृषपर्वसमीपे हि शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः ॥ १३ ॥ 'ब्रह्मन्! हम आपके सेवक हैं। आप हमें अपनाइये और हमारी उत्तम सहायता कीजिये। अमिततेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्यके पास जो मृतसंजीवनी विद्या है, उसे शीघ्र सीखकर यहाँ ले आइये। इससे आप हम देवताओंके साथ यज्ञमें भाग प्राप्त कर सकेंगे। राजा वृषपर्वाके समीप आपको विप्रवर शुक्राचार्यका दर्शन हो सकता है' ॥ १२-१३ ॥ रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान् । तमाराधयितुं शक्तो भवान् पूर्ववयाः कविम् ॥ १४ ॥ 'वहाँ रहकर वे दानवोंकी रक्षा करते हैं। जो दानव नहीं हैं, उनकी रक्षा नहीं करते। आपकी अभी नयी अवस्था है, अतः आप शुक्राचार्यकी आराधना (करके उन्हें प्रसन्न) करनेमें समर्थ हैं' ॥ १४ ॥ देवयानीं च दयितां सुतां तस्य महात्मनः ।

त्वमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते ॥ १५ ॥ 'उन महात्माकी प्यारी पुत्रीका नाम देवयानी है, उसे अपनी सेवाओंद्वारा आप ही प्रसन्न कर सकते हैं। दूसरा कोई इसमें समर्थ नहीं है' ॥ १५ ॥

शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च । देवयान्यां हि तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम् ॥ १६ ॥ 'अपने शील-स्वभाव, उदारता, मधुर व्यवहार, सदाचार तथा इन्द्रियसंयमद्वारा देवयानीको संतुष्ट कर लेनेपर आप निश्चय ही उस विद्याको प्राप्त कर लेंगे' ॥ १६ ॥

तथेत्युक्त्वा ततः प्रायाद् बृहस्पतिसुतः कचः । तदाभिपूजितो देवैः समीपे वृषपर्वणः ॥ १७ ॥ तब 'बहुत अच्छा' कहकर बृहस्पतिपुत्र कच देवताओंसे सम्मानित हो वहाँसे वृषपर्वाके समीप गये ॥ १७ ॥

स गत्वा त्वरितो राजन् देवैः सम्प्रेषितः कचः । असुरेन्द्रपुरे शुक्रं दृष्ट्वा वाक्यमुवाच ह ॥ १८ ॥ राजन्! देवताओंके भेजे हुए कच तुरंत दानवराज वृषपर्वाके नगरमें जाकर शुक्राचार्यसे मिले और इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥

ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद् बृहस्पतेः । नाम्ना कचमिति ख्यातं शिष्यं गृह्णातु मां भवान् ॥ १९ ॥ 'भगवन्! मैं अंगिरा ऋषिका पौत्र तथा साक्षात् बृहस्पतिका पुत्र हूँ। मेरा नाम कच है। आप मुझे अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण करें' ॥ १९ ॥

ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरौ । अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन् सहस्रं परिवत्सरान् ॥ २० ॥ 'ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं। मैं आपके समीप रहकर एक हजार वर्षोंतक उत्तम ब्रह्मचर्यका पालन करूँगा। इसके लिये आप मुझे अनुमति दें' ॥ २० ॥

शुक्र उवाच

कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः । अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः ॥ २१ ॥ शुक्राचार्यने कहा—कच! तुम्हारा भलीभाँति स्वागत है; मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे लिये आदरके पात्र हो, अतः मैं तुम्हारा सम्मान एवं सत्कार करूँगा। तुम्हारे आदर-सत्कारसे मेरे द्वारा बृहस्पतिका आदर-सत्कार होगा ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच

कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद् व्रतम् । आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम् ॥ २२ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तब कचने 'बहुत अच्छा' कहकर महाकान्तिमान् कविपुत्र शुक्राचार्यके आदेशके अनुसार स्वयं ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया ॥ २२ ॥
व्रतस्य प्राप्तकालं स यथोक्तं प्रत्यगृह्णत ।
आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीं च भारत ॥ २३ ॥
नित्यमाराधयिष्यंस्तौ युवा यौवनगोचरे ।
गायन् नृत्यन् वादयंश्च देवयानीमतोषयत् ॥ २४ ॥
जनमेजय! नियत समयतकके लिये व्रतकी दीक्षा लेनेवाले कचको शुक्राचार्यने भलीभाँति अपना लिया। कच आचार्य शुक्र तथा उनकी पुत्री देवयानी दोनोंकी नित्य आराधना करने लगे। वे नवयुवक थे और जवानीमें प्रिय लगनेवाले कार्य—गायन और नृत्य करके तथा भाँति-भाँतिके बाजे बजाकर देवयानीको संतुष्ट रखते थे ॥ २३-२४ ॥
स शीलयन् देवयानीं कन्यां सम्प्राप्तयौवनाम् ।
पुष्पैः फलैः प्रेषणैश्च तोषयामास भारत ॥ २५ ॥
भारत! आचार्यकन्या देवयानी भी युवावस्थामें पदार्पण कर चुकी थी। कच उसके लिये फूल और फल ले आते तथा उसकी आज्ञाके अनुसार कार्य करते थे। इस प्रकार उसकी सेवामें संलग्न रहकर वे सदा उसे प्रसन्न रखते थे ॥ २५ ॥
देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतधारणम् ।
गायन्ती च ललन्ती च रहः पर्यचरत् तथा ॥ २६ ॥
देवयानी भी नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले कचके ही समीप रहकर गाती और आमोद-प्रमोद करती हुई एकान्तमें उनकी सेवा करती थी ॥ २६ ॥
पञ्चवर्षशतान्येवं कचस्य चरतो व्रतम् ।
तत्रातीयुरथो बुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम् ॥ २७ ॥
गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येकममर्षिताः ।
जघ्नुर्बृहस्पतेर्द्वेषाद् विद्यारक्षार्थमेव च ॥ २८ ॥
इस प्रकार वहाँ रहकर ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करते हुए कचके पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो गये। तब दानवोंको यह बात मालूम हुई। तदनन्तर कचको वनके एकान्त प्रदेशमें अकेले गौएँ चराते देख बृहस्पतिके द्वेषसे और संजीवनी विद्याकी रक्षाके लिये क्रोधमें भरे हुए दानवोंने कचको मार डाला ॥ २७-२८ ॥
हत्वा शालावृकेभ्यश्च प्रायच्छँल्लवशः कृतम् ।
ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वं निवेशनम् ॥ २९ ॥
उन्होंने मारनेके बाद उनके शरीरको टुकड़े-टुकड़े कर कुत्तों और सियारोंको बाँट दिया। उस दिन गौएँ बिना रक्षकके ही अपने स्थानपर लौटीं ॥ २९ ॥
सा दृष्ट्वा रहिता गाश्च कचेनाभ्यागता वनात् ।
उवाच वचनं काले देवयान्यथ भारत ॥ ३० ॥

जनमेजय! जब देवयानीने देखा, गौएँ तो वनसे लौट आयीं पर उनके साथ कच नहीं हैं, तब उसने उस समय अपने पितासे इस प्रकार कहा ।। ३० ।।

देवयान्युवाच आहुतं चाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो ।
अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते ।। ३१ ।।

अध्याय (पृष्ठ 578)

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शुक्राचार्य और कच

**देवयानी बोली—**प्रभो! आपने अग्निहोत्र कर लिया और सूर्यदेव भी अस्ताचलको चले गये। गौएँ भी आज बिना रक्षकके ही लौट आयी हैं। तात! तो भी कच नहीं दिखायी देते हैं ॥ ३१ ॥ व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति । तं विना न च जीवेयमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ३२ ॥ पिताजी! अवश्य ही कच या तो मारे गये हैं या मर गये हैं। मैं आपसे सच कहती हूँ, उनके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी ॥ ३२ ॥

शुक्र उवाच

अयमेहीति संशब्द्य मृतं संजीवयाम्यहम् । ततः संजीवनीं विद्यां प्रयुज्य कचमाह्वयत् ॥ ३३ ॥ शुक्राचार्यने कहा—(बेटी! चिन्ता न करो।) मैं अभी 'आओ' इस प्रकार बुलाकर मरे हुए कचको जीवित किये देता हूँ। ऐसा कहकर उन्होंने संजीवनी विद्याका प्रयोग किया और कचको पुकारा ॥ ३३ ॥ भित्त्वा भित्त्वा शरीराणि वृकाणां स विनिर्गतः । आहूतः प्रादुरभवत् कचो हृष्टोऽथ विद्यया ॥ ३४ ॥ फिर तो गुरुके पुकारनेपर कच विद्याके प्रभावसे हृष्ट-पुष्ट हो कुत्तोंके शरीर फाड़-फाड़कर निकल आये और वहाँ प्रकट हो गये ॥ ३४ ॥ कस्माच्चिरायितोऽसीति पृष्टस्तामाह भार्गवीम् । समिधश्च कुशादीनि काष्ठभारं च भामिनि ॥ ३५ ॥ गृहीत्वा श्रमभारार्तो वटवृक्षं समाश्रितः । गावश्च सहिताः सर्वा वृक्षच्छायामुपाश्रिताः ॥ ३६ ॥ उन्हें देखते ही देवयानीने पूछा—'आज आपने लौटनेमें विलम्ब क्यों किया?' इस प्रकार पूछनेपर कचने शुक्राचार्यकी कन्यासे कहा—'भामिनि! मैं समिधा, कुश आदि और काष्ठका भार लेकर आ रहा था। रास्तेमें थकावट और भारसे पीड़ित हो एक वटवृक्षके नीचे ठहर गया। साथ ही सारी गौएँ भी उसी वृक्षकी छायामें आकर विश्राम करने लगीं ॥ ३५-३६ ॥ असुरास्तत्र मां दृष्ट्वा कस्त्वमित्यभ्यचोदयन् । बृहस्पतिसुतश्चाहं कच इत्यभिविश्रुतः ॥ ३७ ॥ 'वहाँ मुझे देखकर असुरोंने पूछा—'तुम कौन हो?' मैंने कहा—मेरा नाम कच है, मैं बृहस्पतिका पुत्र हूँ ॥ ३७ ॥ इत्युक्तमात्रे मां हत्वा पेषीकृत्वा तु दानवाः । दत्त्वा शालावृकेभ्यस्तु सुखं जग्मुः स्वमालयम् ॥ ३८ ॥

‘मेरे इतना कहते ही दानवोंने मुझे मार डाला और मेरे शरीरको चूर्ण करके कुत्ते-सियारोंको बाँट दिया। फिर वे सुखपूर्वक अपने घर चले गये॥ ३८॥ आहूतो विद्यया भद्रे भार्गवेण महात्मना । त्वत्समीपमिहायातः कथंचित् समजीवितः ॥ ३९ ॥ ‘भद्रे! फिर महात्मा भार्गवने जब विद्याका प्रयोग करके मुझे बुलाया है, तब किसी प्रकारसे पूर्ण जीवन लाभ करके यहाँ तुम्हारे पास आ सका हूँ’॥ ३९॥ हतोऽहमिति चाचख्यौ पृष्टो ब्राह्मणकन्यया । स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाहारो यदृच्छया ॥ ४० ॥ इस प्रकार ब्राह्मणकन्याके पूछनेपर कचने उससे अपने मारे जानेकी बात बतायी। तदनन्तर पुनः देवयानीने एक दिन अकस्मात् कचको फूल लानेके लिये कहा॥ ४०॥ वनं ययौ कचो विप्रो ददृशुर्दानवाश्च तम् । पुनस्तं पेषयित्वा तु समुद्राम्भस्यमिश्रयन् ॥ ४१ ॥ विप्रवर कच इसके लिये वनमें गये। वहाँ दानवोंने उन्हें देख लिया और फिर उन्हें पीसकर समुद्रके जलमें घोल दिया॥ ४१॥ चिरं गतं पुनः कन्या पित्रे तं संन्यवेदयत् । विप्रेण पुनराहूतो विद्यया गुरुदेहजः । पुनरावृत्य तद् वृत्तं न्यवेदयत तद् यथा ॥ ४२ ॥ जब उसके लौटनेमें विलम्ब हुआ, तब आचार्यकन्याने पितासे पुनः यह बात बतायी। विप्रवर शुक्राचार्यने कचका पुनः संजीवनी विद्याद्वारा आवाहन किया। इससे बृहस्पतिपुत्र कच पुनः वहाँ आ पहुँचे और उनके साथ असुरोंने जो बर्ताव किया था, वह बताया॥ ४२॥ ततस्तृतीयं हत्वा तं दग्ध्वा कृत्वा च चूर्णशः । प्रायच्छन् ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तदा ॥ ४३ ॥ तत्पश्चात् असुरोंने तीसरी बार कचको मारकर आगमें जलाया और उनकी जली हुई लाशका चूर्ण बनाकर मदिरामें मिला दिया तथा उसे ब्राह्मण शुक्राचार्यको ही पिला दिया॥ ४३॥ देवयान्यथ भूयोऽपि पितरं वाक्यमब्रवीत् । पुष्पाहारः प्रेषणकृत् कचस्तात न दृश्यते ॥ ४४ ॥ अब देवयानी पुनः अपने पितासे यह बात बोली—‘पिताजी! कच मेरे कहनेपर प्रत्येक कार्य पूर्ण कर दिया करते हैं। आज मैंने उन्हें फूल लानेके लिये भेजा था, परंतु अभीतक वे दिखायी नहीं दिये॥ ४४॥ व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति । तं विना न च जीवेयं कचं सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४५ ॥

‘तात! जान पड़ता है वे मार दिये गये या मर गये। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उनके बिना जीवित नहीं रह सकती हूँ’ ॥ ४५ ॥

शुक्र उवाच

बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः ।
विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम् ॥ ४६ ॥
मैवं शुचो मा रुद देवयानि
न त्वादृशी मर्त्यमनुप्रशोचते ।
यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च
सेन्द्रा देवा वसवोऽथाश्विनौ च ॥ ४७ ॥
सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्व-
मुपस्थाने संनमन्ति प्रभावात् ।
अशक्योऽसौ जीवयितुं द्विजातिः
संजीवितो बध्यते चैव भूयः ॥ ४८ ॥

शुक्राचार्यने कहा— बेटी! बृहस्पतिके पुत्र कच मर गये। मैंने विद्यासे उन्हें कई बार जिलाया, तो भी वे इस प्रकार मार दिये जाते हैं, अब मैं क्या करूँ। देवयानी! तुम इस प्रकार शोक न करो, रोओ मत। तुम-जैसी शक्तिशालिनी स्त्री किसी मरनेवालेके लिये शोक नहीं करती। तुम्हें तो वेद, ब्राह्मण, इन्द्रसहित सब देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, दैत्य तथा सम्पूर्ण जगत्के प्राणी मेरे प्रभावसे तीनों संध्याओंके समय मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं। अब उस ब्राह्मणको जिलाना असम्भव है। यदि जीवित हो जाय, तो फिर दैत्योंद्वारा मार डाला जायगा (अतः उसे जिलानेसे कोई लाभ नहीं है) ॥ ४६—४८ ॥

देवयान्युवाच

यस्याङ्गिरा वृद्धतमः पितामहो
बृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः ।
ऋषेः पुत्रं तमथो वापि पौत्रं
कथं न शोचेयमहं न रुद्याम् ॥ ४९ ॥

देवयानी बोली— पिताजी! अत्यन्त वृद्ध महर्षि अंगिरा जिनके पितामह हैं, तपस्याके भण्डार बृहस्पति जिनके पिता हैं, जो ऋषिके पुत्र और ऋषिके ही पौत्र हैं; उन ब्रह्मचारी कचके लिये मैं कैसे शोक न करूँ और कैसे न रोऊँ ॥ ४९ ॥

स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च
सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः ।
कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये
प्रियो हि मे तात कचोऽभिरूपः ॥ ५० ॥

तात! वे ब्रह्मचर्यपालनमें रत थे, तपस्या ही उनका धन था। वे सदा ही सजग रहनेवाले और कार्य करनेमें कुशल थे। इसलिये कच मुझे बहुत प्रिय थे। वे सदा मेरे मनके अनुरूप चलते थे। अब मैं भोजनका त्याग कर दूँगी और कच जिस मार्गपर गये हैं, वहीं मैं भी चली जाऊँगी ।। ५० ।।

वैशम्पायन उवाच

स पीडितो देवयान्या महर्षिः समाह्वयत् संरम्भाच्चैव काव्यः । असंशयं मामसुरा द्विषन्ति ये मे शिष्यानागतान् सूदयन्ति ।। ५१ ।।

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! देवयानीके कहनेसे उसके दुःखसे दुःखी हुए महर्षि शुक्राचार्यने कचको पुकारा और दैत्योंके प्रति कुपित होकर बोले—'इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि असुरलोग मुझसे द्वेष करते हैं। तभी तो यहाँ आये हुए मेरे शिष्योंको ये लोग मार डालते हैं ।। ५१ ।।

अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा- स्ते मां यथा व्यभिचरन्ति नित्यम् । अप्यस्य पापस्य भवेदिहान्तः कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम् ।। ५२ ।।

'ये भयंकर स्वभाववाले दैत्य मुझे ब्राह्मणत्वसे गिराना चाहते हैं। इसीलिये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। इस पापका परिणाम यहाँ अवश्य प्रकट होगा। ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हो? ।। ५२ ।।

गुरोर्हि भीतो विद्यया चोपहूतः शनैर्वाक्यं जठरे व्याजहार ।

जब गुरुने विद्याका प्रयोग करके बुलाया, तब उनके पेटमें बैठे हुए कच भयभीत हो धीरेसे बोले।

(कच उवाच

प्रसीद भगवन् मह्यं कचोऽहमभिवादये । यथा बहुमतः पुत्रस्तथा मन्यतु मां भवान् ॥)

**कचने कहा—**भगवन्! आप मुझपर प्रसन्न हों, मैं कच हूँ और आपके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। जैसे पुत्रपर पिताका बहुत प्यार होता है, उसी प्रकार आप मुझे भी अपना स्नेहभाजन समझें।

वैशम्पायन उवाच

तमब्रवीत् केन पथोsystem- स्त्वं चोदरे तिष्ठसि ब्रूहि विप्र ।। ५३ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**उनकी आवाज सुनकर शुक्राचार्यने पूछा—'विप्र! किस मार्गसे जाकर तुम मेरे उदरमें स्थित हो गये? ठीक-ठीक बताओ' ।। ५३ ।।

कच उवाच

तव प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः स्मरामि सर्वं यच्च यथा च वृत्तम् । न त्वेवं स्यात् तपसः संक्षयो मे ततः क्लेशं घोरमिमं सहामि ।। ५४ ।। **कचने कहा—**गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरी स्मरणशक्तिने साथ नहीं छोड़ा है। जो बात जैसे हुई है, वह सब मुझे याद है। इस प्रकार पेट फाड़कर निकल आनेसे मेरी तपस्याका नाश होगा। वह न हो, इसीलिये मैं यहाँ घोर क्लेश सहन करता हूँ ।। ५४ ।।

असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य । ब्राह्मीं मायां चासुरीं विप्र मायां त्वयि स्थिते कथमेवातिवर्तेत् ।। ५५ ।। आचार्यपाद! असुरोंने मुझे मारकर मेरे शरीरको जलाया और चूर्ण बना दिया। फिर उसे मदिरामें मिलाकर आपको पिला दिया! विप्रवर! आप ब्राह्मी, आसुरी और दैवी तीनों प्रकारकी मायाओंको जानते हैं। आपके होते हुए कोई इन मायाओंका उल्लंघन कैसे कर सकता है? ।। ५५ ।।

शुक्र उवाच

किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से वधेन मे जीवितं स्यात् कचस्य । नान्यत्र कुक्षैर्मम भेदनेन दृश्येत् कचो मद्गतो देवयानि ।। ५६ ।। **शुक्राचार्य बोले—**बेटी देवयानी! अब तुम्हारे लिये कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? मेरे वधसे ही कचका जीवित होना सम्भव है। मेरे उदरको विदीर्ण करनेके सिवा और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मेरे शरीरमें बैठा हुआ कच बाहर दिखायी दे ।। ५६ ।।

देवयान्युवाच

द्वौ मां शोकाग्निकल्पौ दहेतां कचस्य नाशतस्तव चैवोपघातः ।