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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

मा वधीः क्षत्रियांस्तात न लोकान् सप्त पुत्रक ।
दूषयन्तं तपस्तेजः क्रोधमुत्पतितं जहि ॥ २२ ॥
तात! क्षत्रियोंको न मारो। बेटा! भू आदि सात लोकोंका भी संहार न करो। यह जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, वह (तुम्हारे) तपस्याजनित तेजको दूषित करनेवाला है, अतः इसीको मारो ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्ववारणे
अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें और्वक्रोधनिवारण-विषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥

१७९-

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एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

और्व और पितरोंकी बातचीत तथा और्वका अपनी क्रोधाग्निको बडवानलरूपसे समुद्रमें त्यागना

और्व उवाच

उक्तवानस्मि यां क्रोधात् प्रतिज्ञां पितरस्तदा ।
सर्वलोकविनाशाय न सा मे वितथा भवेत् ॥ १ ॥
और्वने कहा—पितरो! मैंने क्रोधवश उस समय जो सम्पूर्ण लोकोंके विनाशकी प्रतिज्ञा कर ली थी, वह झूठी नहीं होनी चाहिये ॥ १ ॥

वृथारोषप्रतिज्ञो वै नाहं भवितुमुत्सहे ।
अनिस्तीर्णो हि मां रोषो देहेदग्निरिवारणिम् ॥ २ ॥
जिसका क्रोध और प्रतिज्ञा निष्फल होते हों, ऐसा बननेकी मेरी इच्छा नहीं है। यदि मेरा क्रोध सफल नहीं हुआ तो वह मुझको उसी प्रकार जला देगा, जैसे आग अरणी काष्ठको जला देती है ॥ २ ॥

यो हि कारणतः क्रोधं संजातं क्षन्तुमर्हति ।
नालं स मनुजः सम्यक् त्रिवर्गं परिरक्षितुम् ॥ ३ ॥
जो किसी कारणवश उत्पन्न हुए क्रोधको सह लेता है, वह मनुष्य धर्म, अर्थ और कामकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं होता ॥ ३ ॥

अशिष्टानां नियन्ता हि शिष्टानां परिरक्षिता ।
स्थाने रोषः प्रयुक्तः स्यान्नृपैः सर्वजिगीषुभिः ॥ ४ ॥
सबको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले राजाओंद्वारा उचित अवसरपर प्रयोगमें लाया हुआ रोष दुष्टोंका दमन और साधु पुरुषोंकी रक्षा करनेवाला हो ॥ ४ ॥

अश्रौषमहमूरुस्थो गर्भशय्यागतस्तदा ।
आस्रवं मातृवर्गस्थ भृगूणां क्षत्रियैर्वधे ॥ ५ ॥
मैं जिन दिनों माताकी एक जाँघमें गर्भ-शय्यापर सोता था, उन दिनों क्षत्रियोंद्वारा भार्गवोंका वध होनेपर माताओंका करुण क्रन्दन मुझे स्पष्ट सुनायी देता था ॥ ५ ॥

संहारो हि यदा लोके भृगूणां क्षत्रियाधमैः ।
आगर्भोच्छेदनात् क्रान्तस्तदा मां मन्युराविशत् ॥ ६ ॥
इन नीच क्षत्रियोंने जब गर्भके बच्चोंतकके सिर काट-काटकर संसारमें भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार आरम्भ कर दिया, तब मुझमें क्रोधका आवेश हुआ ॥ ६ ॥

सम्पूर्णकोशाः किल मे मातरः पितरस्तथा ।

भयात् सर्वेषु लोकेषु नाधिजग्मुः परायणम् ॥ ७ ॥ जिनकी कोख भरी हुई थी, वे मेरी माताएँ और पितृगण भी भयके मारे समस्त लोकोंमें भागते फिरे; किंतु उन्हें कहीं भी शरण नहीं मिली ॥ ७ ॥

तान् भृगूणां यदा दारान् कश्चिन्नाभ्युपपद्यत । माता तदा दधारेयमूरुणैकेन मां शुभा ॥ ८ ॥ जब भार्गवोंकी पत्नियोंका कोई भी रक्षक नहीं मिला, तब मेरी इस कल्याणमयी माताने मुझे अपनी एक जाँघमें छिपाकर रखा था ॥ ८ ॥

प्रतिषेद्धा हि पापस्य यदा लोकेषु विद्यते । तदा सर्वेषु लोकेषु पापकृन्नोपपद्यते ॥ ९ ॥ जबतक जगत्में कोई भी पापकर्मको रोकनेवाला होता है, तबतक सम्पूर्ण लोकोंमें पापियोंका होना सम्भव नहीं होता ॥ ९ ॥

यदा तु प्रतिषेद्धारं पापों न लभते क्वचित् । तिष्ठन्ति बहवो लोकास्तदा पापेषु कर्मसु ॥ १० ॥ जब पापी मनुष्यको कहीं कोई रोकनेवाला नहीं मिलता, तब बहुतेरे मनुष्य पाप करनेमें लग जाते हैं ॥ १० ॥

जानन्नपि च यः पापं शक्तिमान् न नियच्छति । ईशः सन् सोऽपि तेनैव कर्मणा सम्प्रयुज्यते ॥ ११ ॥ जो मनुष्य शक्तिमान् एवं समर्थ होते हुए भी जान-बूझकर पापको नहीं रोकता, वह भी उसी पापकर्मसे लिप्त हो जाता है ॥ ११ ॥

राजभिश्चेश्वरैश्चैव यदि वै पितरो मम । शक्तैर्न शकितास्त्रातुमिष्टं मत्वेह जीवितम् ॥ १२ ॥ अत एषामहं क्रुद्धो लोकानामीश्वरो ह्यहम् । भवतां च वचो नालमहं समभिवर्तितुम् ॥ १३ ॥ इस लोकमें अपना जीवन सबको प्रिय है, यह समझकर सबका शासन करनेवाले राजालोग सामर्थ्य होते हुए भी मेरे पिताओंकी रक्षा न कर सके, इसीलिये मैं भी इन सब लोकोंपर कुपित हुआ हूँ। मुझमें इन्हें दण्ड देनेकी शक्ति है। अतः (इस विषयमें) मैं आपलोगोंका वचन माननेमें असमर्थ हूँ ॥ १२-१३ ॥

ममापि चेद् भवेदेवमीश्वरस्य सतो महत् । उपेक्षमाणस्य पुनर्लोकानां किल्बिषाद् भयम् ॥ १४ ॥ यदि मैं भी शक्ति रहते हुए लोगोंके इस महान् पापाचारको उदासीनभावसे चुपचाप देखता रहूँ, तो मुझे भी उनलोगोंके पापसे भय हो सकता है ॥ १४ ॥

यश्चायं मन्युजो मेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति । दहेदेष च मामेव निगृहीतः स्वतेजसा ॥ १५ ॥

मेरे क्रोधसे उत्पन्न हुई जो यह आग (सम्पूर्ण) लोकोंको अपनी लपटोंसे लपेट लेना चाहती है, यदि मैं इसे रोक दूँ तो यह मुझे ही अपने तेजसे जलाकर भस्म कर डालेगी ॥ १५ ॥

भवतां च विजानामि सर्वलोकहितेप्सुताम् ।
तस्माद् विधध्वं यच्छ्रेयो लोकानां मम चेश्वराः ॥ १६ ॥
मैं यह भी जानता हूँ कि आपलोग समस्त जगत्‌का हित चाहनेवाले हैं। अतः शक्तिशाली पितरो! आपलोग ऐसा करें, जिससे इन लोकोंका और मेरा भी कल्याण हो ॥ १६ ॥

पितर ऊचुः

य एष मन्युजस्तेऽग्निर्लोकानादातुमिच्छति ।
अप्सु तं मुञ्च भद्रं ते लोका ह्याप्सु प्रतिष्ठिताः ॥ १७ ॥
**पितर बोले—**और्व! तुम्हारे क्रोधसे उत्पन्न हुई जो यह अग्नि सब लोकोंको अपना ग्रास बनाना चाहती है, उसे तुम जलमें छोड़ दो, तुम्हारा कल्याण हो; क्योंकि (सभी) लोक जलमें प्रतिष्ठित हैं ॥ १७ ॥

आपोमयाः सर्वरसाः सर्वमापोमयं जगत् ।
तस्मादप्सु विमुञ्चेमं क्रोधाग्निं द्विजसत्तम ॥ १८ ॥
सभी रस जलके परिणाम हैं तथा सम्पूर्ण जगत् (भी) जलका परिणाम माना गया है। अतः द्विजश्रेष्ठ! तुम अपनी इस क्रोधाग्निको जलमें ही छोड़ दो ॥ १८ ॥

अयं तिष्ठतु ते विप्र यदीच्छसि महोदधौ ।
मन्युजोऽग्निर्दहन्नापो लोका ह्यापोमयाः स्मृताः ॥ १९ ॥
विप्रवर! यदि तुम्हारी इच्छा हो तो यह क्रोधाग्नि जलको जलाती हुई समुद्रमें स्थित रहे; क्योंकि सभी लोक जलके परिणाम माने गये हैं ॥ १९ ॥

एवं प्रतिज्ञा सत्येयं तवानघ भविष्यति ।
न चैवं सामरा लोका गमिष्यन्ति पराभवम् ॥ २० ॥
अनघ! ऐसा करनेसे तुम्हारी प्रतिज्ञा भी सच्ची हो जायगी और देवताओंसहित समस्त लोक भी नष्ट नहीं होंगे ॥ २० ॥

वसिष्ठ उवाच

ततस्तं क्रोधजं तात और्वोऽग्निं वरुणालये ।
उत्ससर्ज स चैवाप उपयुङ्क्ते महोदधौ ॥ २१ ॥
महद्द्वयशिरो भूत्वा यत् तद् वेदविदो विदुः ।
तमग्निमुद्गिरद् वक्त्रात् पिबत्यापो महोदधौ ॥ २२ ॥

वसिष्ठजी कहते हैं— पराशर! तब और्वने (अपनी) उस क्रोधाग्निको समुद्रमें डाल दिया। आज भी वह बहुत बड़ी घोड़ीके मुखकी-सी आकृति धारण करके महासागरके जलका पान करती रहती है। वेदज्ञ पुरुष उससे (भली-भाँति) परिचित हैं। वह बड़वा अपने मुखसे वही आग उगलती हुई महासागरका जल पीती रहती है ॥ २१-२२ ॥

तस्मात् त्वमपि भद्रं ते न लोकान् हन्तुमर्हसि ।
पराशर पराँल्लोकान् जानञ्ज्ञानवतां वर ॥ २३ ॥

ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पराशर! तुम्हारा कल्याण हो, तुम परलोकको भलीभाँति जानते हो; अतः तुम्हें भी समस्त लोकोंका विनाश नहीं करना चाहिये ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्वोपाख्याने
एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें और्वोपाख्यानविषयक एक सौ उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७९ ॥

१८०-

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अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

पुलस्त्य आदि महर्षियोंके समझानेसे पराशरजीके द्वारा राक्षससत्रकी समाप्ति

गन्धर्व उवाच

एवमुक्तः स विप्रर्षिर्वसिष्ठेन महात्मना ।
न्ययच्छदात्मनः क्रोधं सर्वलोकपराभवात् ॥ १ ॥
**गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! महात्मा वसिष्ठके यों कहनेपर उन ब्रह्मर्षि पराशरने अपने क्रोधको समस्त लोकोंके पराभवसे रोक लिया ॥ १ ॥

ईजे च स महातेजाः सर्ववेदविदां वरः ।
ऋषी राक्षससत्रेण शाक्तेयोऽथ पराशरः ॥ २ ॥
तब सम्पूर्ण वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी शक्ति-नन्दन पराशरने राक्षससत्रका अनुष्ठान किया ॥ २ ॥

ततो वृद्धांश्च बालांश्च राक्षसान् स महामुनिः ।
ददाह वितते यज्ञे शक्तेर्वधमनुस्मरन् ॥ ३ ॥
उस विस्तृत यज्ञमें अपने पिता शक्तिके वधका बार-बार चिन्तन करते हुए महामुनि पराशरने राक्षसजातिके बूढ़ों तथा बालकोंको भी जलाना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

न हि तं वारयामास वसिष्ठो रक्षसां वधात् ।
द्वितीयामस्य मा भाङ्क्षं प्रतिज्ञामिति निश्चयात् ॥ ४ ॥
उस समय महर्षि वसिष्ठने यह सोचकर कि इसकी दूसरी प्रतिज्ञाको न तोडूँ, उन्हें राक्षसोंके वधसे नहीं रोका ॥ ४ ॥

त्रयाणां पावकानां च सत्रे तस्मिन् महामुनिः ।
आसीत् पुरस्ताद् दीप्तानां चतुर्थ इव पावकः ॥ ५ ॥
उस सत्रमें तीन प्रज्वलित अग्नियोंके समक्ष महामुनि पराशर चौथे अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ५ ॥

तेन यज्ञेन शुभ्रेण हूयमानेन शक्तिजः ।
तद्विदीपितमाकाशं सूर्येणेव घनात्यये ॥ ६ ॥
(पापी राक्षसोंका संहार करनेके कारण) वह यज्ञ अत्यन्त निर्मल एवं शुद्ध समझा जाता था। शक्तिनन्दन पराशरद्वारा उसमें यज्ञसामग्रीका हवन आरम्भ होते ही (वह इतना प्रज्वलित हो उठा कि) उसके तेजसे सम्पूर्ण आकाश ठीक उसी तरह उद्भासित होने लगा, जैसे वर्षा बीतनेपर सूर्यकी प्रभासे उद्दीप्त हो उठता है ॥ ६ ॥

तं वसिष्ठादयः सर्वे मुनयस्तत्र मेनिरे । तेजसा दीप्यमानं वै द्वितीयमिव भास्करम् ॥ ७ ॥ उस समय वसिष्ठ आदि सभी मुनियोंको वहाँ तेजसे प्रकाशमान महर्षि पराशर दूसरे सूर्यके समान जान पड़ते थे ॥ ७ ॥

ततः परमदुष्प्रापमन्यैर्ऋषिभिरुदारधीः । समापिपयिषुः सत्रं तमत्रिः समुपागमत् ॥ ८ ॥ तदनन्तर दूसरोंके लिये उस यज्ञको बंद करना अत्यन्त कठिन जानकर उदारबुद्धि महर्षि अत्रि स्वयं उस यज्ञको समाप्त करानेकी इच्छासे पराशरके पास आये ॥ ८ ॥

तथा पुलस्त्यः पुलहः क्रतुश्चैव महाक्रतुः । तत्राजग्मुरमित्रघ्न रक्षसां जीवितेप्सया ॥ ९ ॥ शत्रुओंका नाश करनेवाले अर्जुन! उसी प्रकार पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और महाक्रतुने भी राक्षसोंके जीवनकी रक्षाके लिये वहाँ पदार्पण किया ॥ ९ ॥

पुलस्त्यस्तु वधात् तेषां रक्षसां भरतर्षभ । उवाचेदं वचः पार्थ पराशरमरिंदमम् ॥ १० ॥ भरतकुलभूषण कुन्तीकुमार! उन राक्षसोंका विनाश होता देख महर्षि पुलस्त्यने शत्रुसूदन पराशरसे यह बात कही— ॥ १० ॥

कच्चित् तातापविघ्नं ते कच्चिन्नन्दसि पुत्रक । अजानतामदोषाणां सर्वेषां रक्षसां वधात् ॥ ११ ॥ ‘तात! तुम्हारे इस यज्ञमें कोई विघ्न तो नहीं पड़ा? बेटा! तुम्हारे पिताकी हत्याके विषयमें कुछ भी न जाननेवाले इन सभी निर्दोष राक्षसोंका वध करके क्या तुम्हें प्रसन्नता होती है? ॥ ११ ॥

प्रजोच्छेदमिमं मह्यं न हि कर्तुं त्वमर्हसि । नैष तात द्विजातीनां धर्मो दृष्टस्तपस्विनाम् ॥ १२ ॥ ‘वत्स! मेरी संततिका तुम्हें इस प्रकार उच्छेद नहीं करना चाहिये। तात! यह हिंसा तपस्वी ब्राह्मणोंका धर्म कभी नहीं मानी गयी ॥ १२ ॥

शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर । अधर्मिष्ठं वरिष्ठः सन् कुरुषे त्वं पराशर ॥ १३ ॥ ‘पराशर! शान्त रहना ही (ब्राह्मणोंका) श्रेष्ठ धर्म है, अतः उसीका आचरण करो। तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह पापकर्म करते हो? ॥ १३ ॥

शक्तिं चापि हि धर्मज्ञं नातिक्रान्तुमिहार्हसि । प्रजायाश्च ममोच्छेदं न चैवं कर्तुमर्हसि ॥ १४ ॥ ‘तुम्हारे पिता शक्ति धर्मके ज्ञाता थे, तुम्हें (इस अधर्मकृत्यद्वारा) उनकी मर्यादाका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। फिर मेरी संतानोंका विनाश करना तुम्हारे लिये कदापि उचित

नहीं है ॥ १४ ॥ शापाद्धि शक्तेर्वासिष्ठ तदा तदुपपादितम् । आत्मजेन स दोषेण शक्तिर्नींत इतो दिवम् ॥ १५ ॥ वसिष्ठकुलभूषण! शक्तिके शापसे ही उस समय वैसी दुर्घटना हो गयी थी। वे अपने ही अपराधसे इस लोकको छोड़कर स्वर्गवासी हुए हैं (इसमें राक्षसोंका कोई दोष नहीं है) ॥ १५ ॥ न हि तं राक्षसः कश्चिच्छक्तो भक्षयितुं मुने । आत्मनैवात्मनस्तेन दृष्टो मृत्युस्तदाभवत् ॥ १६ ॥ ‘मुने! कोई भी राक्षस उन्हें खा नहीं सकता था। अपने ही शापसे (राजाको नरभक्षी राक्षस बना देनेके कारण) उन्हें उस समय अपनी मृत्यु देखनी पड़ी ॥ १६ ॥ निमित्तभूतस्तत्रासीद् विश्वामित्रः पराशर । राजा कल्माषपादश्च दिवमारुह्य मोदते ॥ १७ ॥ ‘पराशर! विश्वामित्र तथा राजा कल्माषपाद भी इसमें निमित्तमात्र ही थे (तुम्हारे पूर्वजोंकी मृत्युमें तो प्रारब्ध ही प्रधान है)। इस समय तुम्हारे पिता शक्ति स्वर्गमें जाकर आनन्द भोगते हैं ॥ १७ ॥ ये च शक्त्यवराः पुत्रा वसिष्ठस्य महामुने । ते च सर्वे मुदा युक्ता मोदन्ते सहिताः सुरैः ॥ १८ ॥ ‘महामुने! वसिष्ठजीके शक्तिसे छोटे जो पुत्र थे, वे सभी देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक सुख भोग रहे हैं ॥ १८ ॥ सर्वमेतद् वसिष्ठस्य विदितं वै महामुने । रक्षसां च समुच्छेद एष तात तपस्विनाम् ॥ १९ ॥ निमित्तभूतस्त्वं चात्र क्रतौ वासिष्ठनन्दन । तत् सत्रं मुञ्च भद्रं ते समाप्तमिदमस्तु ते ॥ २० ॥ ‘महर्षे! तुम्हारे पितामह वसिष्ठजीको ये सब बातें विदित हैं। तात शक्तिनन्दन! तेजस्वी राक्षसोंके विनाशके लिये आयोजित इस यज्ञमें तुम भी निमित्तमात्र ही बने हो (वास्तवमें यह सब उन्हींके पूर्वकर्मोंका फल है)। अतः अब इस यज्ञको छोड़ दो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हारे इस सत्रकी समाप्ति हो जानी चाहिये' ॥ १९-२० ॥

गन्धर्व उवाच

एवमुक्तः पुलस्त्येन वसिष्ठेन च धीमता । तदा समापयामास सत्रं शाक्तो महामुनिः ॥ २१ ॥ **गन्धर्व कहता है—**अर्जुन! पुलस्त्यजी तथा परम बुद्धिमान् वसिष्ठजीके यों कहनेपर महामुनि शक्तिपुत्र पराशरने उसी समय यज्ञको समाप्त कर दिया ॥ २१ ॥

सर्वराक्षससत्राय सम्भृतं पावकं तदा ।
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे उत्ससर्ज महावने ॥ २२ ॥
सम्पूर्ण राक्षसोंके विनाशके उद्देश्यसे किये जाने-वाले उस सत्रके लिये जो अग्नि संचित की गयी थी, उसे उन्होंने उत्तरदिशामें हिमालयके आस-पासके विशाल वनमें छोड़ दिया ॥ २२ ॥

स तत्राद्यापि रक्षांसि वृक्षानश्मन एव च ।
भक्षयन् दृश्यते वह्निः सदा पर्वणि पर्वणि ॥ २३ ॥
वह अग्नि आज भी वहाँ सदा प्रत्येक पर्वके अवसरपर राक्षसों, वृक्षों और पत्थरोंको जलाती हुई देखी जाती है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वण्यौर्वोपाख्याने
अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें और्वोपाख्यानविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८० ॥

१८१-

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एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

राजा कल्माषपादको ब्राह्मणी आंगिरसीका शाप

अर्जुन उवाच

राज्ञा कल्माषपादेन गुरौ ब्रह्मविदां वरे ।
कारणं किं पुरस्कृत्य भार्या वै संनियोजिता ॥ १ ॥
**अर्जुनने पूछा—**गन्धर्वराज! किस कारणको सामने रखकर राजा कल्माषपादने ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरु वसिष्ठजीके साथ अपनी पत्नीका नियोग कराया था? ॥ १ ॥

जानता वै परं धर्मं वसिष्ठेन महात्मना ।
अगम्यागमनं कस्मात् कृतं तेन महर्षिणा ॥ २ ॥
तथा उत्तम धर्मके ज्ञाता महात्मा महर्षि वसिष्ठने यह परस्त्रीगमनका पाप कैसे किया? ॥ २ ॥

अधर्मिष्ठं वसिष्ठेन कृतं चापि पुरा सखे ।
एतन्मे संशयं सर्वं छेत्तुमर्हसि पृच्छतः ॥ ३ ॥
सखे! पूर्वकालमें महर्षि वसिष्ठने जो यह अधर्म-कार्य किया, उसका क्या कारण है? यह मेरा संशय है, जिसे मैं पूछता हूँ। आप मेरे इन सारे संशयोंका निवारण कीजिये ॥ ३ ॥

गन्धर्व उवाच

धनंजय निबोधेदं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
वसिष्ठं प्रति दुर्धर्ष तथा मित्रसहं नृपम् ॥ ४ ॥
**गन्धर्वने कहा—**दुर्धर्ष वीर धनंजय! आप महर्षि वसिष्ठ तथा राजा मित्रसहके विषयमें जो कुछ मुझसे पूछ रहे हैं, उसका समाधान सुनिये ॥ ४ ॥

कथितं ते मया सर्वं यथा शप्तः स पार्थिवः ।
शक्तिना भरतश्रेष्ठ वासिष्ठेन महात्मना ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! वसिष्ठपुत्र महात्मा शक्तिसे राजा कल्माषपादको जिस प्रकार शाप प्राप्त हुआ, वह सब प्रसंग मैं आपसे कह चुका हूँ ॥ ५ ॥

स तु शापवशं प्राप्तः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ।
निर्जगाम पुराद् राजा सहदारः परंतपः ॥ ६ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा कल्माषपाद शापके परवश हो अपनी पत्नीके साथ नगरसे बाहर निकल गये। उस समय उनकी आँखें क्रोधसे व्याप्त हो रही थीं ॥ ६ ॥

अरण्यं निर्जनं गत्वा सदारः परिचक्रमे ।
नानामृगगणाकीर्णं नानासत्त्वसमाकुलम् ॥ ७ ॥

अपनी स्त्रीके साथ निर्जन वनमें जाकर वे चारों ओर चक्कर लगाने लगे। वह महान् वन भाँति-भाँतिके मृगोंसे भरा हुआ था। उसमें नाना प्रकारके जीव-जन्तु निवास करते थे॥ ७॥

नानागुल्मलताच्छन्नं नानाद्रुमसमावृतम् । अरण्यं घोरसंनादं शापग्रस्तः परिभ्रमन् ॥ ८ ॥ अनेक प्रकारकी लताओं तथा गुल्मोंसे आच्छादित और विविध प्रकारके वृक्षोंसे आवृत वह (गहन) वन भयंकर शब्दोंसे गूँजता रहता था। शापग्रस्त राजा कल्माषपाद उसीमें भ्रमण करने लगे ॥ ८ ॥

स कदाचित् क्षुधाविष्टो मृगयन् भक्ष्यमात्मनः । ददर्श सुपरिक्लिष्टः कस्मिंश्चिन्निर्जने वने ॥ ९ ॥ ब्राह्मणं ब्राह्मणीं चैव मिथुनायोपसंगतौ । तौ तं वीक्ष्य सुवित्रस्तावकृतार्थौ प्रधावितौ ॥ १० ॥ एक दिन भूखसे व्याकुल हो वे अपने लिये भोजनकी तलाश करने लगे। बहुत क्लेश उठानेके बाद उन्होंने देखा कि उस वनके किसी निर्जन प्रदेशमें एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी मैथुनके लिये एकत्र हुए हैं। वे दोनों अभी अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर पाये थे, इतनेहीमें उन राक्षसाविष्ट कल्माषपादको देखकर अत्यन्त भयभीत हो (वहाँसे) भाग चले ॥ ९-१० ॥

तयोः प्रद्रवतोर्विप्रं जग्राह नृपतिर्बलात् । दृष्ट्वा गृहीतं भर्तारमथ ब्राह्मण्यभाषत ॥ ११ ॥ उन भागते हुए दम्पतिमेंसे ब्राह्मणको राजाने बलपूर्वक पकड़ लिया। पतिको राक्षसके हाथमें पड़ा देख ब्राह्मणी बोली— ॥ ११ ॥

शृणु राजन् मम वचो यत् त्वां वक्ष्यामि सुव्रत । आदित्यवंशप्रभवस्त्वं हि लोके परिश्रुतः ॥ १२ ॥ ‘राजन्! मैं आपसे जो बात कहती हूँ, उसे सुनिये। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले नरेश! आपका जन्म सूर्यवंशमें हुआ है। आप सम्पूर्ण जगत्में विख्यात हैं ॥ १२ ॥

अप्रमत्तः स्थितो धर्मे गुरुशुश्रूषणे रतः । शापोपहत दुर्धर्ष न पापं कर्तुमर्हसि ॥ १३ ॥ ‘आप सदा प्रमादशून्य होकर धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं। गुरुजनोंकी सेवामें सदा संलग्न रहते हैं। दुर्धर्ष वीर! यद्यपि आप इस समय शापसे ग्रस्त हैं, तो भी आपको पापकर्म नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥

ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते भर्तृव्यसनकर्शिता । अकृतार्था ह्यहं भर्त्रा प्रसवार्थं समागता ॥ १४ ॥ प्रसीद नृपतिश्रेष्ठ भर्तायं मे विसृज्यताम् ।

‘मेरा ऋतुकाल प्राप्त है, मैं पतिके कष्टसे दुःख पा रही हूँ। मैं संतानकी इच्छासे पतिके समीप आयी थी और उनसे मिलकर अभी अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर पायी हूँ। नृपश्रेष्ठ! ऐसी दशामें आप मुझपर प्रसन्न होइये और मेरे इन पतिदेवताको छोड़ दीजिये’ ॥ १४ १/२ ॥
एवं विक्रोशमानायास्तस्यास्तु स नृशंसवत् ॥ १५ ॥
भर्तारं भक्षयामास व्याघ्रो मृगमिवेप्सितम् ।
तस्याः क्रोधाभिभूताया यान्यश्रूण्यपतन् भुवि ॥ १६ ॥
सोऽग्निः समभवद् दीप्तस्तं च देशं व्यदीपयत् ।
ततः सा शोकसंतप्ता भर्तृव्यसनकर्शिता ॥ १७ ॥
कल्माषपादं राजर्षिमशपद् ब्राह्मणी रुषा ।
यस्मान्ममाकृतार्थायास्त्वया क्षुद्र नृशंसवत् ॥ १८ ॥
प्रेक्षन्त्या भक्षितो मेऽद्य प्रियो भर्ता महायशाः ।
तस्मात् त्वमपि दुर्बुद्धे मच्छापपरिविक्षतः ॥ १९ ॥
पत्नीमृतावनुप्राप्य सद्यस्त्यक्ष्यसि जीवितम् ।
यस्य चर्षेर्वसिष्ठस्य त्वया पुत्रा विनाशिताः ॥ २० ॥
तेन संगम्य ते भार्या तनयं जनयिष्यति ।
स ते वंशकरः पुत्रो भविष्यति नृपाधम ॥ २१ ॥

इस प्रकार ब्राह्मणी करुण विलाप करती हुई याचना कर रही थी, तो भी जैसे व्याघ्र मनचाहे मृगको मारकर खा जाता है, उसी प्रकार राजाने अत्यन्त निर्दयीकी भाँति ब्राह्मणीके पतिको खा लिया। उस समय क्रोधसे पीड़ित हुई ब्राह्मणीके नेत्रोंसे धरतीपर आँसुओंकी जो बूँदें गिरीं, वे सब प्रज्वलित अग्नि बन गयीं। उस अग्निने उस स्थानको जलाकर भस्म कर दिया। तदनन्तर पतिके वियोगसे व्यथित एवं शोकसंतप्त ब्राह्मणीने रोषमें भरकर राजर्षि कल्माषपादको शाप दिया—‘ओ नीच! मेरी पतिविषयक कामना अभी पूर्ण नहीं हो पायी थी, तभी तूने अत्यन्त क्रूरकी भाँति मेरे देखते-देखते आज मेरे महायशस्वी प्रियतम पतिको अपना ग्रास बना लिया है; अतः दुर्बुद्धे! तू भी मेरे शापसे पीड़ित हुआ ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम करते ही तत्काल प्राण त्याग देगा। जिन महर्षि वसिष्ठके पुत्रोंका तुमने संहार किया है, उन्हींसे समागम करके तेरी पत्नी पुत्र पैदा करेगी। नृपाधम! वही पुत्र तेरा वंश चलानेवाला होगा’ ॥ १५—२१ ॥

एवं शप्त्वा तु राजानं सा तमाङ्गिरसी शुभा ।
तस्यैव संनिधौ दीप्तं प्रविवेश हुताशनम् ॥ २२ ॥

इस प्रकार राजाको शाप देकर वह सती साध्वी आंगिरसी राजा कल्माषपादके समीप ही प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश कर गयी ॥ २२ ॥

वसिष्ठश्च महाभागः सर्वमेतदवैक्षत ।
ज्ञानयोगेन महता तपसा च परंतप ॥ २३ ॥

शत्रुसूदन अर्जुन! महाभाग वसिष्ठजी अपनी बड़ी भारी तपस्या तथा ज्ञानयोगके प्रभावसे ये सब बातें जानते थे ।। २३ ।।

मुक्तशापश्च राजर्षिः कालेन महता ततः । ऋतुकालेऽभिपतितो मदयन्त्या निवारितः ।। २४ ।। दीर्घकालके पश्चात् वे राजर्षि जब शापसे मुक्त हुए, तब ऋतुकालमें अपनी पत्नीके पास गये। परंतु उनकी रानी मदयन्तीने उन्हें (उक्त शापकी याद दिलाकर) रोक दिया ।। २४ ।।

न हि सस्मार स नृपस्तं शापं काममोहितः । देव्याः सोऽथ वचः श्रुत्वा सम्भ्रान्तो नृपसत्तमः ।। २५ ।। राजा कल्माषपाद कामसे मोहित हो रहे थे। इसलिये उन्हें शापका स्मरण नहीं रहा। महारानी मदयन्तीकी बात सुनकर वे नृपश्रेष्ठ बड़े सम्भ्रम (घबराहट)-में पड़ गये ।। २५ ।।

तं शापमनुसंस्मृत्य पर्यतप्यद् भृशं तदा । एतस्मात् कारणाद् राजा वसिष्ठं संनयोजयत् । स्वदारेषु नरश्रेष्ठ शापदोषसमन्वितः ।। २६ ।। उस शापको बार-बार याद करके उन्हें बड़ा संताप हुआ। नृपश्रेष्ठ! इसी कारण शापदोषसे युक्त राजा कल्माषपादने महर्षि वसिष्ठका अपनी पत्नीके साथ नियोग कराया ।। २६ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि वसिष्ठोपाख्याने एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें वसिष्ठोपाख्यानविषयक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८१ ।।

१८२-

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द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंका धौम्यको अपना पुरोहित बनाना

अर्जुन उवाच

अस्माकमनुरूपो वै यः स्याद् गन्धर्व वेदवित् ।
पुरोहितस्तमाचक्ष्व सर्वं हि विदितं तव ॥ १ ॥
**अर्जुनने कहा—**गन्धर्वराज! हमारे अनुरूप जो कोई वेदवेत्ता पुरोहित हों, उनका नाम बताओ; क्योंकि तुम्हें सब कुछ ज्ञात है ॥ १ ॥

गन्धर्व उवाच

यवीयान् देवलस्यैष वने भ्राता तपस्यति ।
धौम्य उत्कोचके तीर्थे तं वृणुध्वं यदीच्छथ ॥ २ ॥
**गन्धर्व बोला—**कुन्तीनन्दन! इसी वनके उत्कोचक तीर्थमें महर्षि देवलके छोटे भाई धौम्य मुनि तपस्या करते हैं। यदि आपलोग चाहें तो उन्हींका पुरोहितके पदपर वरण करें ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततोऽर्जुनोऽस्त्रमाग्नेयं प्रददौ तद् यथाविधि ।
गन्धर्वाय तदा प्रीतो वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तब अर्जुनने (बहुत) प्रसन्न होकर गन्धर्वको विधिपूर्वक आग्नेयास्त्र प्रदान किया और यह बात कही— ॥ ३ ॥

त्वय्येव तावत् तिष्ठन्तु हया गन्धर्वसत्तम ।
कार्यकाले ग्रहीष्यामः स्वस्ति तेऽस्त्विति चाब्रवीत् ॥ ४ ॥
तेऽन्योन्यमभिसम्पूज्य गन्धर्वः पाण्डवाश्च ह ।
रम्याद् भागीरथीतीराद् यथाकामं प्रतस्थिरे ॥ ५ ॥
‘गन्धर्वप्रवर! तुमने जो घोड़े दिये हैं, वे अभी तुम्हारे ही पास रहें। आवश्यकताके समय हम तुमसे ले लेंगे, तुम्हारा कल्याण हो।' अर्जुनकी यह बात पूरी होनेपर गन्धर्वराज और पाण्डवोंने एक-दूसरेका बड़ा सत्कार किया। फिर पाण्डवगण गंगाके रमणीय तटसे अपनी इच्छाके अनुसार चल दिये ॥ ४-५ ॥

तत उत्कोचकं तीर्थं गत्वा धौम्याश्रमं तु ते ।
तं वव्रुः पाण्डवा धौम्यं पौरोहित्याय भारत ॥ ६ ॥
जनमेजय! तदनन्तर उत्कोचक तीर्थमें धौम्यके आश्रमपर जाकर पाण्डवोंने धौम्यका पौरोहित्य-कर्मके लिये वरण किया ॥ ६ ॥

तान् धौम्यः प्रतिजग्राह सर्ववेदविदां वरः । वन्येन फलमूलेन पौरोहित्येन चैव ह ॥ ७ ॥ सम्पूर्ण वेदोंके विद्वानोंमें श्रेष्ठ धौम्यने जंगली फल-मूल अर्पण करके तथा पुरोहितीके लिये स्वीकृति देकर उन सबका सत्कार किया ॥ ७ ॥ ते समाशंसिरे लब्धां श्रियं राज्यं च पाण्डवाः । ब्राह्मणं तै पुरस्कृत्य पाञ्चालीं च स्वयंवरे ॥ ८ ॥ पाण्डवोंने उन ब्राह्मणदेवताको पुरोहित बनाकर यह भलीभाँति विश्वास कर लिया कि 'हमें अपना राज्य और धन अब मिले हुएके ही समान है।' साथ ही उन्हें यह भी भरोसा हो गया कि 'स्वयंवरमें द्रौपदी हमें मिल जायगी' ॥ ८ ॥ पुरोहितेन तेनाथ गुरुणा संगतास्तदा । नाथवन्तमिवात्मानं मेनिरे भरतर्षभाः ॥ ९ ॥ उन गुरु एवं पुरोहितके साथ हो जानेसे उस समय भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ पाण्डवोंने अपने-आपको सनाथ-सा समझा ॥ ९ ॥ स हि वेदार्थतत्त्वज्ञस्तेषां गुरुरुदारधीः । तेन धर्मविदा पार्था याज्या धर्मविदः कृताः ॥ १० ॥ उदारबुद्धि धौम्य वेदार्थके तत्त्वज्ञ थे, वे पाण्डवोंके गुरु हुए। उन धर्मज्ञ मुनिने धर्मज्ञ कुन्तीकुमारोंको अपना यजमान बना लिया ॥ १० ॥ वीरांस्तु सहितान् मेने प्राप्तराज्यान् स्वधर्मतः ।

बुद्धिवीर्यबलोत्साहैर्युक्तान् देवानिव द्विजः ।। ११ ।।
धौम्यको भी यह विश्वास हो गया कि ये बुद्धि, वीर्य, बल और उत्साहसे युक्त देवोपम वीर संगठित होकर स्वधर्मके अनुसार अपना राज्य अवश्य प्राप्त कर लेंगे ।। ११ ।।
कृतस्वस्त्ययनास्तेन ततस्ते मनुजाधिपाः ।
मेनिरे सहिता गन्तुं पाञ्चाल्यास्तं स्वयंवरम् ।। १२ ।।
धौम्यने पाण्डवोंके लिये स्वस्तिवाचन किया। तदनन्तर उन नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने एक साथ द्रौपदीके स्वयंवरमें जानेका निश्चय किया ।। १२ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि धौम्यपुरोहितकरणे
द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें धौम्यको पुरोहित बनानेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८२ ।।

(स्वयंवरपर्व)

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(स्वयंवरपर्व)

त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंकी पंचालयात्रा और मार्गमें ब्राह्मणोंसे बातचीत

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते नरशार्दूला भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ।
प्रययुर्द्रौपदीं द्रष्टुं तं च देशं महोत्सवम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब वे नरश्रेष्ठ पाँचों भाई पाण्डव राजकुमारी द्रौपदी, उसके पंचालदेश और वहाँके महान् उत्सवको देखनेके लिये वहाँसे चल दिये ॥ १ ॥

ते प्रयाता नरव्याघ्राः सह मात्रा परंतपाः ।
ब्राह्मणान् ददृशुर्मार्गे गच्छतः संगतान् बहून् ॥ २ ॥
मनुष्योंमें सिंहके समान वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ यात्रा कर रहे थे। उन्होंने मार्गमें देखा, बहुत-से ब्राह्मण एक साथ जा रहे हैं ॥ २ ॥

त ऊचुर्ब्राह्मणा राजन् पाण्डवान् ब्रह्मचारिणः ।
क्व भवन्तो गमिष्यन्ति कुतो वाभ्यागता इह ॥ ३ ॥
राजन्! उन ब्रह्मचारी ब्राह्मणोंने पाण्डवोंसे पूछा—'आपलोग कहाँ जायँगे और कहाँसे आ रहे हैं?' ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

आगतानेकचक्रायाः सोदर्यानेकचारिणः ।
भवन्तो वै विजानन्तु सह मात्रा द्विजर्षभाः ॥ ४ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**विप्रवरो! आपलोगोंको मालूम हो कि हमलोग एक साथ विचरनेवाले सहोदर भाई हैं और अपनी माताके साथ एकचक्रा नगरीसे आ रहे हैं ॥ ४ ॥

ब्राह्मणा ऊचुः

गच्छताद्यैव पञ्चालान् द्रुपदस्य निवेशने ।
स्वयंवरो महांस्तत्र भविता सुमहाधनः ॥ ५ ॥
**ब्राह्मणोंने कहा—**आज ही पंचालदेशको चलिये। वहाँ राजा द्रुपदके दरबारमें महान् धन-धान्यसे सम्पन्न स्वयंवरका बहुत बड़ा उत्सव होनेवाला है ॥ ५ ॥

एकसार्थं प्रयाताः स्म वयं तत्रैव गामिनः । तत्र ह्यद्भुतसंकाशो भविता सुमहोत्सवः ॥ ६ ॥ हम सबलोग एक साथ चले हैं और वहीं जा रहे हैं। वहाँ अत्यन्त अद्भुत और बहुत बड़ा उत्सव होनेवाला है ॥ ६ ॥

यज्ञसेनस्य दुहिता द्रुपदस्य महात्मनः । वेदीमध्यात् समुत्पन्ना पद्मपत्रनिभेक्षणा ॥ ७ ॥ यज्ञसेन नामवाले महाराज द्रुपदके एक पुत्री है, जो यज्ञकी वेदीसे प्रकट हुई है। उसके नेत्र विकसित कमलदलके समान सुन्दर हैं ॥ ७ ॥

दर्शनीयानवद्याङ्गी सुकुमारी मनस्विनी । धृष्टद्युम्नस्य भगिनी द्रोणशत्रोः प्रतापिनः ॥ ८ ॥ उसका एक-एक अंग निर्दोष है। वह मनस्विनी सुकुमारी द्रुपदकन्या देखने ही योग्य है। द्रोणाचार्यके शत्रु प्रतापी धृष्टद्युम्नकी वह बहिन है ॥ ८ ॥

यो जातः कवची खड्गी सशरः सशरासनः । सुसमिद्धे महाबाहुः पावके पावकोपमः ॥ ९ ॥ धृष्टद्युम्न वे ही हैं, जो कवच, खड्ग, धनुष और बाणके साथ उत्पन्न हुए हैं। महाबाहु धृष्टद्युम्न प्रज्वलित अग्निसे प्रकट होनेके कारण अग्निके समान ही तेजस्वी हैं ॥ ९ ॥

स्वसा तस्यानवद्याङ्गी द्रौपदी तनुमध्यमा । नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात् प्रवाति वै ॥ १० ॥ द्रौपदी निर्दोष अंगों तथा पतली कमरवाली है और उसके शरीरसे नीलकमलके समान सुगन्ध निकलकर एक कोसतक फैलती रहती है। वह उन्हीं धृष्टद्युम्नकी बहिन है ॥ १० ॥

यज्ञसेनस्य च सुतां स्वयंवरकृतक्षणाम् । गच्छामो वै वयं द्रष्टुं तं च दिव्यं महोत्सवम् ॥ ११ ॥ यज्ञसेनकी पुत्री द्रौपदीका स्वयंवर नियत हुआ है। अतः हमलोग उस राजकुमारीको तथा उस स्वयंवरके दिव्य महोत्सवको देखनेके लिये वहाँ जा रहे हैं ॥ ११ ॥

राजानो राजपुत्राश्च यज्वानो भूरिदक्षिणाः । स्वाध्यायवन्तः शुचयो महात्मानो यतव्रताः ॥ १२ ॥ तरुणा दर्शनीयाश्च नानादेशसमागताः । महारथाः कृतास्त्राश्च समुपैष्यन्ति भूमिपाः ॥ १३ ॥ (वहाँ) कितने ही प्रचुर दक्षिणा देनेवाले, यज्ञ करनेवाले, स्वाध्यायशील, पवित्र, नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, महात्मा एवं तरुण अवस्थावाले दर्शनीय राजा और राजकुमार अनेक देशोंसे पधारेंगे। अस्त्रविद्यामें निपुण महारथी भूमिपाल भी वहाँ आयेंगे ॥ १२-१३ ॥

ते तत्र विविधान् दायान् विजयार्थं नरेश्वराः ।

प्रदास्यन्ति धनं गाश्च भक्ष्यं भोज्यं च सर्वशः ॥ १४ ॥ वे नरपतिगण अपनी-अपनी विजयके उद्देश्यसे वहाँ नाना प्रकारके उपहार, धन, गौएँ, भक्ष्य और भोज्य आदि सब प्रकारकी वस्तुएँ दान करेंगे ॥ १४ ॥

प्रतिगृह्य च तत् सर्वं दृष्ट्वा चैव स्वयंवरम् । अनुभूयोत्सवं चैव गमिष्यामो यथेप्सितम् ॥ १५ ॥ उनका वह सब दान ग्रहण कर, स्वयंवरको देखकर और उत्सवका आनन्द लेकर फिर हमलोग अपने-अपने अभीष्ट स्थानको चले जायँगे ॥ १५ ॥

नटा वैतालिकास्तत्र नर्तकाः सूतमागधाः । नियोधकाश्च देशेभ्यः समेष्यन्ति महाबलाः ॥ १६ ॥ वहाँ अनेक देशोंके नट, वैतालिक, नर्तक, सूत, मागध तथा अत्यन्त बलवान् मल्ल आयेंगे ॥ १६ ॥

एवं कौतूहलं कृत्वा दृष्ट्वा च प्रतिगृह्य च । सहास्माभिर्महात्मानः पुनः प्रतिनिवर्त्स्यथ ॥ १७ ॥ महात्माओ! इस प्रकार हमारे साथ खेल करके, तमाशा देखकर और नाना प्रकारके दान ग्रहण करके फिर आपलोग भी लौट आइयेगा ॥ १७ ॥

दर्शनीयांश्च वः सर्वान् देवरूपानवस्थितान् । समीक्ष्य कृष्णा वरयेत् संगत्यैकतमं वरम् ॥ १८ ॥ आप सब लोगोंका रूप तो देवताओंके समान है, आप सभी दर्शनीय हैं, आपलोगोंको (वहाँ उपस्थित) देखकर द्रौपदी दैवयोगसे आपमेंसे ही किसी एकको अपना वर चुन सकती है ॥ १८ ॥

अयं भ्राता तव श्रीमान् दर्शनीयो महाभुजः । नियुज्यमानो विजये संगत्या द्रविणं बहु । आहरिष्यन्नयं नूनं प्रीतिं वो वर्धयिष्यति ॥ १९ ॥ आपलोगोंके ये भाई अर्जुन तो बड़े सुन्दर और दर्शनीय हैं। इनकी भुजाएँ बहुत बड़ी हैं। इन्हें यदि विजयके कार्यमें नियुक्त कर दिया जाय, तो ये दैवात् बहुत बड़ी धनराशि जीत लाकर निश्चय ही आपलोगोंकी प्रसन्नता बढ़ायेंगे ॥ १९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

परमं भो गमिष्यामो द्रष्टुं चैव महोत्सवम् । भवद्भिः सहिताः सर्वे कन्यायास्तं स्वयंवरम् ॥ २० ॥ **युधिष्ठिर बोले—**ब्राह्मणो! हम भी द्रुपदकन्याके उस श्रेष्ठ स्वयंवर-महोत्सवको देखनेके लिये आपलोगोंके साथ चलेंगे ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि पाण्डवागमने त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें पाण्डवागमनविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८३ ॥