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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

यमेते संश्रिता वस्तुं कामयन्ते च भूमिपम् । सोऽल्पवीर्यबलो राजा द्रुपदो वै मतो मम ॥ ये पाण्डव जिस राजाके आश्रयमें रहनेकी इच्छा रखते हैं, उस द्रुपदका बल और पराक्रम मेरी रायमें बहुत थोड़ा है।

यावदेतान् न जानन्ति जीवतो वृष्णिपुङ्गवाः । चैद्यश्च पुरुषव्याघ्रः शिशुपालः प्रतापवान् ॥ जबतक वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर यह नहीं जानते कि पाण्डव जीवित हैं, पुरुषसिंह चेदिराज प्रतापी शिशुपाल भी जबतक इस बातसे अनभिज्ञ है, तभीतक पाण्डवोंको मार डालना चाहिये।

एकीभावं गता राज्ञा द्रुपदेन महात्मना । दुराधर्षतरा राजन् भविष्यन्ति न संशयः ॥ राजन्! जब ये महात्मा राजा द्रुपदके साथ मिलकर एक हो जायँगे, तब इन्हें परास्त करना अत्यन्त कठिन हो जायगा, इसमें संशय नहीं है।

यावदत्वरतां सर्वे प्राप्नुवन्ति नराधिपाः । तावदेव व्यवस्यामः पाण्डवानां वधं प्रति ॥ जबतक सब राजा ढीले पड़े हैं, तभीतक हमें पाण्डवोंके वधके लिये पूरा प्रयत्न कर लेना चाहिये।

मुक्ता जतुगृहाद् भीमाद् आशीविषमुखादिव । पुनर्यदीह मुच्यन्ते महन्नो भयमाविशेत् ॥ विषधर सर्पके मुख-सदृश भयंकर लाक्षागृहसे तो वे बच ही गये हैं। यदि फिर यहाँ हमारे हाथसे छूट जाते हैं तो उनसे हमलोगोंको महान् भय प्राप्त हो सकता है।

तेषामिहोपयातानामेषां च पुरवासिनाम् । अन्तरे दुष्करं स्थातुं मेषयोर्महतोरिव ॥ यदि वे वृष्णिवंशी और चेदिवंशी वीर यहाँ आ जायँ और यहाँके नागरिक भी अस्त्र-शस्त्र लेकर खड़े हो जायँ तो इनके बीचमें खड़ा होना उतना ही कठिन होगा, जितना आपसमें लड़ते हुए दो विशाल मेढ़ोंके बीचमें ठहरना।

हलधृक्प्रगृहीतानि बलानि बलिनां स्वयं । यावन्न कुरुसेनायां पतन्ति पतगा इव ॥ तावत् सर्वाभिसारेण पुरमेतद् विनाशयताम् । एतदत्र परं मन्ये प्राप्तकालं नरर्षभाः ॥ जबतक हल धारण करनेवाले बलरामजीके द्वारा संचालित बलवान् योद्धाओंकी सेनाएँ स्वयं ही आकर कौरवसेनारूपी खेतीपर टिड्डियोंकी भाँति न टूट पड़ें, तबतक हम सब लोग

एक साथ आक्रमण करके इस नगरको नष्ट कर दें। नरश्रेष्ठ वीरो! मैं इस अवसरपर यही सर्वोत्तम कर्तव्य मानता हूँ!

वैशम्पायन उवाच

शकुनेर्वचनं श्रुत्वा भाषमाणस्य दुर्मतेः ।
सौमदत्तिरिदं वाक्यं जगाद परमं ततः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— दुर्बुद्धि शकुनिका यह प्रस्ताव सुनकर सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाने यह उत्तम बात कही।

सौमदत्तिरुवाच

प्रकृतीः सप्त वै ज्ञात्वा आत्मनश्च परस्य च ।
तथा देशं च कालं च षड्विधांश्च नयेद् गुणान् ॥
भूरिश्रवा बोले— अपने पक्षकी और शत्रुपक्षकी भी सातों³ प्रकृतियोंको ठीक-ठीक जानकर ही देश और कालका ज्ञान रखते हुए छः³ प्रकारके गुणोंका यथावसर प्रयोग करना चाहिये।

स्थानं वृद्धिं क्षयं चैव भूमिं मित्राणि विक्रमम् ।
समीक्ष्याथाभियुञ्जीत परं व्यसनपीडितम् ॥
स्थान, वृद्धि, क्षय, भूमि, मित्र तथा पराक्रम—इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए यदि शत्रु संकटसे पीड़ित हो तभी उसपर आक्रमण करना चाहिये।

ततोऽहं पाण्डवान् मन्ये मित्रकोशसमन्वितान् ।
बलस्थान् विक्रमस्थांश्च स्वकृतैः प्रकृतिप्रियान् ॥
इस दृष्टिसे देखनेपर मैं पाण्डवोंको मित्र और खजाना दोनोंसे सम्पन्न समझता हूँ। वे बलवान् तो हैं ही, पराक्रमी भी हैं और अपने सत्कर्मोंद्वारा समस्त प्रजाके प्रिय हो रहे हैं।

वपुषा हि तु भूतानां नेत्राणि हृदयानि च ।
श्रोत्रं मधुरया वाचा रमयत्यर्जुनो नृणाम् ॥
अर्जुन अपने शरीरकी गठनसे (सभी) मनुष्योंके नेत्रों तथा हृदयको आनन्द प्रदान करते हैं और मीठी-मीठी वाणीद्वारा सबके कानोंको सुख पहुँचाते हैं।

न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन भेजिरे ।
यद् बभूव मनःकान्तं कर्मणा च चकार तत् ॥
केवल प्रारब्धसे ही प्रजा उनकी सेवा नहीं करती। प्रजाके मनको जो प्रिय लगता है, उसकी पूर्ति अर्जुन अपने प्रयत्नोंद्वारा करते रहते हैं।

न ह्ययुक्तं न चासक्तं नानृतं न च विप्रियम् ।
भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य भारती ॥

मनोहर वचन बोलनेवाले अर्जुनकी वाणी कभी ऐसा वचन नहीं बोलती, जो अयुक्त, आसक्तिपूर्ण, मिथ्या तथा अप्रिय हो।

तानेवंगुणसम्पन्नान् सम्पन्नान् राजलक्षणैः ।
न तान् पश्यामि ये शक्ताः समुच्छेत्तुं यथा बलात् ॥
समस्त पाण्डव राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न तथा उपर्युक्त गुणोंसे विभूषित हैं। मैं ऐसे किन्हीं वीरोंको नहीं देखता, जो अपने बलसे पाण्डवोंका वास्तवमें उच्छेद कर सकें।

प्रभावशक्तिर्विपुला मन्त्रशक्तिश्च पुष्कला ।
तथैवोत्साहशक्तिश्च पार्थेष्वभ्यधिका सदा ॥
उनकी प्रभावशक्ति विपुल है, मन्त्रशक्ति भी प्रचुर है तथा उत्साहशक्ति भी पाण्डवोंमें सबसे अधिक है।

मौलमित्रबलानां च कालज्ञो वै युधिष्ठिरः ।
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनेति युधिष्ठिरः ॥
अमित्रं यतते जेतुं न रोषेणेति मे मतिः ॥
युधिष्ठिर इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि कब स्वाभाविक बलका प्रयोग करना चाहिये तथा कब मित्र और सैन्यबलका। राजा युधिष्ठिर साम, दान, भेद और दण्डनीतिके द्वारा ही यथासमय शत्रुको जीतनेका प्रयत्न करते हैं, क्रोधके द्वारा नहीं—ऐसा मेरा विश्वास है।

परिक्रीय धनैः शत्रून् मित्राणि च बलानि च ।
मूलं च सुदृढं कृत्वा हन्त्यरीन् पाण्डवस्तदा ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर प्रचुर धन देकर शत्रुओंको, मित्रोंको तथा सेनाओंको भी खरीद लेते हैं और अपनी नींवको सुदृढ़ करके शत्रुओंका नाश करते हैं।

अशक्यान् पाण्डवान् मन्ये देवैरपि सवासवैः ।
येषामर्थे सदा युक्तौ कृष्णसंकर्षणावुभौ ॥
मैं ऐसा मानता हूँ कि इन्द्र आदि देवता भी उन पाण्डवोंका कुछ नहीं बिगाड़ सकते, जिनकी सहायताके लिये कृष्ण और बलराम दोनों सदा कमर कसे रहते हैं।

श्रेयश्च यदि मन्यध्वं मन्मतं यदि वो मतम् ।
संविदं पाण्डवैः सार्धं कृत्वा याम यथागतम् ॥
यदि आपलोग मेरी बातको हितकर मानते हों, यदि मेरे मतके अनुकूल ही आपलोगोंका मत हो, तो हमलोग पाण्डवोंसे मेल करके जैसे आये हैं, वैसे ही लौट चलें।

गोपुराट्टालकैरूच्चैरुपतल्पशतैरपि ।
गुप्तं पुरवरश्रेष्ठमेतद्विद्भिश्च संवृतम् ॥
तृणधान्येन्धनरसैस्तथा यन्त्रायुधौषधैः ।
युक्तं बहुकपाटैश्च द्रव्यागारतुषादिकैः ॥

यह श्रेष्ठ नगर गोपुरों, ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं तथा सैकड़ों उपतल्पोंसे सुरक्षित है। इसके चारों ओर जलसे भरी खाई है। घास-चारा, अनाज, ईंधन, रस, यन्त्र, आयुध तथा औषध आदिकी यहाँ बहुतायत है। बहुत-से कपाट, द्रव्यागार और भूसा आदिसे भी यह नगर भरपूर है। भीमोच्छ्रितमहाचक्रं बृहदट्टालसंवृतम् । दृढप्राकारनिर्यूहं शतघ्नीजालसंवृतम् ॥ यहाँ बड़े भयंकर और ऊँचे विशाल चक्र हैं। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंकी पंक्ति इस नगरको घेरे हुए है। इसकी चहारदीवारी और छज्जे सुदृढ़ हैं। शतघ्नी (तोप) नामक अस्त्रोंके समुदायसे यह नगरी घिरी हुई है। ऐष्टको दारवो वप्रो मानुषश्चेति यः स्मृतः । प्राकारकर्तृभिर्वीरैर्नृगर्भस्तत्र पूजितः ॥ इसकी रक्षाके लिये तीन प्रकारका घेरा बना है—एक तो ईंटोंका, दूसरा काठका और तीसरा मानव-सैनिकोंका। चहारदीवारी बनानेवाले वीरोंने यहाँ नगरगर्भकी पूजा की है। तदेतन्नरगर्भेण पाण्डरेण विराजते । सालेनानेकतालेन सर्वतः संवृतं पुरम् ॥ अनुरक्ताः प्रकृतयो द्रुपदस्य महात्मनः । दानमानार्चिताः सर्वे बाह्याश्चाभ्यन्तराश्च ये ॥ इस प्रकार यह नगर श्वेत नगरगर्भसे शोभित है। अनेक ताड़के बराबर ऊँचे शालवृक्षोंकी पंक्तियोंद्वारा यह श्रेष्ठ नगरी सब ओरसे घिरी हुई है। महामना राजा द्रुपदकी सभी प्रजा और प्रकृतियाँ (मन्त्री आदि) उनमें अनुराग रखती हैं। बाहर और भीतरके सभी कर्मचारियोंका दान और मानद्वारा सत्कार किया जाता है। प्रतिरुद्धांनिमाञ्ज्ञात्वा राजभिर्भीमविक्रमैः । उपयास्यन्ति दाशार्हाः समुदग्रोच्छ्रितायुधाः ॥ भयानक पराक्रमी राजाओंद्वारा पाण्डवोंको सब ओरसे घिरा हुआ जानकर समस्त यदुवंशी वीर प्रचण्ड अस्त्र-शस्त्र लिये यहाँ उपस्थित हो जायँगे। तस्मात् संधिं वयं कृत्वा धार्तराष्ट्रस्य पापडवैः । स्वराष्ट्रमेव गच्छामो यद्याप्तवचनं मम ॥ एतन्मम मतं सर्वैः क्रियतां यदि रोचते । एतद्धि सुकृतं मन्ये क्षेमं चापि महीक्षिताम् ॥ अतः हम धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधनकी पाण्डवोंके साथ संधि कराकर अपने राज्यमें ही लौट चलें। यदि आपलोगोंको मेरी बातपर विश्वास हो और मेरा यह मत सबको ठीक जँचता हो तो आप सब लोग इसे काममें लायें। हमारा यही सर्वोत्तम कर्तव्य है और मैं इसीको राजाओंके लिये कल्याणकारी मानता हूँ।

वृत्ते स्वयंवरे चैव राजानः सर्व एव ते । यथागतं विप्रजग्मुर्विदित्वा पाण्डवान् वृतान् ॥ ८ ॥ स्वयंवर समाप्त हो जानेपर जब यह ज्ञात हो गया कि द्रौपदीने पाण्डवोंका वरण किया है, तब वे सभी राजा जैसे आये थे, वैसे ही (अपने-अपने) देशको लौट गये ॥ ८ ॥ अथ दुर्योधनो राजा विमना भ्रातृभिः सह । अश्वत्थाम्ना मातुलेन कर्णेन च कृपेण च ॥ ९ ॥ विनिवृत्तो वृतं दृष्ट्वा द्रौपद्या श्वेतवाहनम् । तं तु दुःशासनो व्रीडन् मन्दं मन्दमिवाब्रवीत् ॥ १० ॥ द्रुपदकुमारी कृष्णाने श्वेतवाहन अर्जुनको (जयमाला पहनाकर उनका) वरण किया है, यह अपनी आँखों देखकर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। वह अश्वत्थामा, मामा शकुनि, कर्ण, कृपाचार्य तथा अपने भाइयोंके साथ (द्रुपदकी राजधानीसे) हस्तिनापुरके लिये लौट पड़ा। मार्गमें दुःशासनने लज्जित होकर दुर्योधनसे धीरे-धीरे (इस प्रकार) कहा— ॥ ९-१० ॥ यद्यसौ ब्राह्मणो न स्याद् विन्देत द्रौपदीं न सः । न हि तं तत्त्वतो राजन् वेद कश्चिद् धनंजयम् ॥ ११ ॥ ‘भाईजी! यदि अर्जुन ब्राह्मणके वेशमें न होता तो वह कदापि द्रौपदीको न पा सकता था। राजन्! वास्तवमें किसीको यह पता ही नहीं चला कि वह अर्जुन है ॥ ११ ॥ दैवं च परमं मन्ये पौरुषं चाप्यनर्थकम् । धिगस्तु पौरुषं तात ध्रियन्ते यत्र पाण्डवाः ॥ १२ ॥ ‘मैं तो भाग्यको ही प्रबल मानता हूँ, पुरुषका प्रयत्न निरर्थक है। तात! हमारे पुरुषार्थको धिक्कार है, जब कि पाण्डव अभीतक जी रहे हैं’ ॥ १२ ॥ एवं सम्भाषमाणास्ते निन्दन्तश्च पुरोचनम् । विविशुर्हास्तिनपुरं दीना विगतचेतसः ॥ १३ ॥ इस प्रकार परस्पर बातें करते और पुरोचनको कोसते हुए वे सब कौरव दुःखी होकर हस्तिनापुरमें पहुँचे। (पाण्डवोंकी) सफलता देखकर, उनका चित्त ठिकाने न रहा ॥ १३ ॥ त्रस्ता विगतसंकल्पा दृष्ट्वा पार्थान् महौजसः । मुक्तान् हव्यभुजश्चैव संयुक्तान् द्रुपदेन च ॥ १४ ॥ धृष्टद्युम्नं तु संचिन्त्य तथैव च शिखण्डिनम् । द्रुपदस्यात्मजांश्चान्यान् सर्वयुद्धविशारदान् ॥ १५ ॥ महातेजस्वी कुन्तीकुमार लाक्षागृहकी आगसे जीवित बचकर राजा द्रुपदके सम्बन्धी हो गये, यह अपनी आँखों देखकर और धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा द्रुपदके अन्य पुत्र युद्धकी सम्पूर्ण कलाओंमें दक्ष हैं, इस बातका विचार करके कौरव बहुत डर गये। उनकी आशा निराशामें परिणत हो गयी ॥ १४-१५ ॥

विदुरस्त्वथ तां श्रुत्वा द्रौपदीं पाण्डवैर्वृताम् । व्रीडितान् धार्तराष्ट्रांश्च भग्नदर्पानुपागतान् ॥ १६ ॥ ततः प्रीतमनाः क्षत्ता धृतराष्ट्रं विशाम्पते । उवाच दिष्ट्या कुरवो वर्धन्त इति विस्मितः ॥ १७ ॥ विदुरजीने जब यह सुना कि पाण्डवोंने द्रौपदीको प्राप्त किया है और धृतराष्ट्रके पुत्र अपना अभिमान चूर्ण हो जानेसे लज्जित होकर लौट आये हैं, तब वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। राजन्! तब वे धृतराष्ट्रके पास जाकर विस्मयसूचक वाणीमें बोले—'महाराज! हमारा अहोभाग्य है, जो कौरववंशकी वृद्धि हो रही है ॥ १६-१७ ॥

वैचित्रवीर्यस्तु वचो निशम्य विदुरस्य तत् । अब्रवीत् परमप्रीतो दिष्ट्या दिष्ट्येति भारत ॥ १८ ॥ भारत! विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्र विदुरकी यह बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो सहसा बोल उठे—'अहोभाग्य, अहोभाग्य' ॥ १८ ॥ मन्यते स वृतं पुत्रं ज्येष्ठं द्रुपदकन्यया । दुर्योधनमविज्ञानात् प्रज्ञाचक्षुरनेश्वरः ॥ १९ ॥ उस अंधे नरेशने अज्ञानवश यह समझ लिया कि 'द्रुपदकन्याने मेरे ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधनका वरण किया है' ॥ १९ ॥ अथ त्वाज्ञापयामास द्रौपद्या भूषणं बहु । आनीयतां वै कृष्णेति पुत्रं दुर्योधनं तदा ॥ २० ॥

इसलिये उन्होंने आज्ञा दी—'द्रौपदीके लिये बहुत-से आभूषण मँगाओ और मेरे पुत्र दुर्योधन तथा द्रौपदीको बड़ी धूमधामसे नगरमें ले आओ'॥ २०॥
अथास्य पश्चाद् विदुर आचख्यौ पाण्डवान् वृतान्।
सर्वान् कुशलिनो वीरान् पूजितान् द्रुपदेन ह ॥ २१ ॥
तब पीछेसे विदुरने उन्हें बताया कि—'द्रौपदीने पाण्डवोंका वरण किया है। वे सभी वीर राजा द्रुपदके द्वारा पूजित होकर वहाँ कुशलपूर्वक रह रहे हैं॥ २१॥
तेषां सम्बन्धिनश्चान्यान् बहून् बलसमन्वितान् ।
समागतान् पाण्डवेयैस्तस्मिन्नेव स्वयंवरे ॥ २२ ॥
उसी स्वयंवरमें उनके बहुत-से अन्य सम्बन्धी भी, जो भारी सैनिकशक्तिसे सम्पन्न हैं, पाण्डवोंसे प्रेमपूर्वक मिले हैं॥ २२॥
(एतच्छ्रुत्वा तु वचनं विदुरस्य नराधिपः।
आकारच्छादनार्थं तु दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रवीत् ॥
विदुरका यह कथन सुनकर राजा धृतराष्ट्रने अपनी बदली हुई आकृतिको छिपानेके लिये कहा—'अहोभाग्य! अहोभाग्य!'

धृतराष्ट्र उवाच

एवं विदुर भद्रं ते यदि जीवन्ति पाण्डवाः।
साध्वाचारा तथा कुन्ती सम्बन्धो द्रुपदेन च ॥
अन्ववाये वसोजातः प्रकृष्टे मान्यके कुले।
व्रतविद्यातपोवृद्धः पार्थिवानां धुरन्धरः ॥
पुत्राश्चास्य तथा पौत्राः सर्वे सुचरितव्रताः ।
तेषां सम्बन्धिनश्चान्ये बहवः सुमहाबलाः ॥)
धृतराष्ट्र (फिर) बोले—विदुर! यदि ऐसी बात है, यदि (वास्तवमें) पाण्डव जीवित हैं, तो बड़े आनन्दकी बात है, तुम्हारा कल्याण हो। अवश्य ही कुन्ती बड़ी साध्वी हैं। द्रुपदके साथ जो सम्बन्ध हुआ है, वह हमारे लिये अत्यन्त स्पृहणीय है। विदुर! राजा द्रुपद वसुके श्रेष्ठ और सम्माननीय कुलमें उत्पन्न हुए हैं। व्रत, विद्या और तप—तीनोंमें वे बढ़े-चढ़े हैं। राजाओंमें तो वे अग्रगण्य हैं ही। उनके सभी पुत्र और पौत्र भी उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं। द्रुपदके अन्य बहुत-से सम्बन्धी भी अत्यन्त बलवान् हैं।
यथैव पाण्डोः पुत्रास्तु तथैवाभ्यधिका मम ।
यथा चाभ्यधिका बुद्धिर्मम तान् प्रति तच्छृणु ॥ २३ ॥
विदुर! युधिष्ठिर आदि जैसे पाण्डुके पुत्र हैं, वैसे ही या उससे भी अधिक मेरे हैं। उनके प्रति मेरे मनमें अधिक अपनापनका भाव क्यों है?, यह बताता हूँ; सुनो॥ २३॥
यत् ते कुशलिनो वीरा मित्रवन्तश्च पाण्डवाः ।

तेषां सम्बन्धिनश्चान्ये बहवश्च महाबलाः ॥ २४ ॥ वे वीर पाण्डव कुशलपूर्वक जीवित बच गये हैं और उन्हें मित्रोंका सहयोग भी प्राप्त हो गया है। इतना ही नहीं और भी बहुत-से महाबली नरेश उनके सम्बन्धी होते जा रहे हैं ॥ २४ ॥

को हि द्रुपदमासाद्य मित्रं क्षत्तः सबान्धवम् । न बुभूषेद् भवेनार्थी गतश्रीरपि पार्थिवः ॥ २५ ॥ विदुर! कौन ऐसा राजा है, जिसकी सम्पत्ति नष्ट हो जानेपर भी बन्धु-बान्धवोंसहित द्रुपदको मित्रके रूपमें पाकर जीना नहीं चाहेगा ॥ २५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तं तथा भाषमाणं तु विदुरः प्रत्यभाषत । नित्यं भवतु ते बुद्धिरेषा राजञ्छतं समाः । इत्युक्त्वा प्रययौ राजन् विदुरः स्वं निवेशनम् ॥ २६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसी बातें कहनेवाले राजा धृतराष्ट्रसे विदुर (इस प्रकार) बोले—'महाराज! सौ वर्षोंतक आपकी बुद्धि ऐसी ही बनी रहे।' राजन्! इतना कहकर विदुरजी अपने घर चले गये ॥ २६ ॥

ततो दुर्योधनश्चापि राधेयश्च विशाम्पते । धृतराष्ट्रमुपागम्य वचोऽब्रूतामिदं तदा ॥ २७ ॥ जनमेजय! तदनन्तर दुर्योधन और कर्णने धृतराष्ट्रके पास आकर यह बात कही— ॥ २७ ॥

संनिधौ विदुरस्य त्वां दोषं वक्तुं न शक्नुवः । विविक्तमिति वक्ष्यावः किं तवेदं चिकीर्षितम् ॥ २८ ॥ सपत्नवृद्धिं यत् तात मन्यसे वृद्धिमात्मनः । अभिष्टौषि च यत् क्षत्तुः समीपे द्विषतां वर ॥ २९ ॥ 'महाराज! विदुरके समीप हम आपसे आपका कोई दोष नहीं बता सकते। इस समय एकान्त है, इसलिये कहते हैं। आप यह क्या करना चाहते हैं? पूज्य पिताजी! आप तो शत्रुओंकी उन्नतिको ही अपनी उन्नति मानने लगे हैं और विदुरजीके निकट हमारे वैरियोंकी ही भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं ॥ २८-२९ ॥

अन्यस्मिन् नृप कर्तव्ये त्वमन्यत् कुरुषेऽनघ । तेषां बलविघातो हि कर्तव्यस्तात नित्यशः ॥ ३० ॥ निष्पाप नरेश! हमें करना तो कुछ और चाहिये, किंतु आप करते कुछ और (ही) हैं। तात! हमारे लिये तो यही उचित है कि हम सदा पाण्डवोंकी शक्तिका विनाश करते रहें ॥ ३० ॥

ते वयं प्राप्तकालस्य चिकीर्षां मन्त्रयामहे । यथा नो न ग्रसेयुस्ते सपुत्रबलबान्धवान् ॥ ३१ ॥ ‘इस समय जैसा अवसर उपस्थित है, इसमें हमें क्या करना चाहिये—यही सोच-विचारकर निश्चय करना है, जिससे वे पाण्डव पुत्र, बान्धव तथा सेनासहित हमारा सर्वनाश न कर बैठें’ ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि दुर्योधनवाक्ये नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें दुर्योधनवचनविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३९ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७० १/३ श्लोक हैं)


१. राज्यके स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना—इन सात अंगोंको सात प्रकृतियाँ कहते हैं। २. संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय—ये छः गुण हैं। इनमें शत्रुसे मेल रखना संधि, उससे लड़ाई छेड़ना विग्रह, आक्रमण करना यान, अवसरकी प्रतीक्षामें बैठे रहना आसन, दुरंगी नीति बर्तना द्वैधीभाव और अपनेसे बलवान् राजाकी शरण लेना समाश्रय कहलाता।

२००-

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विशततमोऽध्यायः

धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, शत्रुओंको वशमें करनेके उपाय

धृतराष्ट्र उवाच

अहमप्येवमेवैतच्चिकीर्षामि यथा युवाम् ।
विवक्तुं नाहमिच्छामि त्वाकारं विदुरं प्रति ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— बेटा! मैं भी तो वही करना चाहता हूँ, जैसा तुम दोनों चाहते हो; परंतु मैं अपनी आकृतिसे भी विदुरपर अपने मनका भाव प्रकट होने देना नहीं चाहता ॥ १ ॥
ततस्तेषां गुणानेव कीर्तयामि विशेषतः ।
नावबुध्येत विदुरो ममाभिप्रायमिङ्गितैः ॥ २ ॥
इसीलिये विदुरके सामने विशेषतः पाण्डवोंके गुणोंका ही बखान करता हूँ, जिससे वह इशारेसे भी मेरे मनोभावको न ताड़ सके ॥ २ ॥
यच्च त्वं मन्यसे प्राप्तं तद् ब्रवीहि सुयोधन ।
राधेय मन्यसे यच्च प्राप्तकालं वदाशु मे ॥ ३ ॥
सुयोधन और कर्ण! तुम दोनों समयके अनुसार जो कार्य करना आवश्यक समझते हो वह शीघ्र मुझे बताओ ॥ ३ ॥

दुर्योधन उवाच

अद्य तान् कुशलैर्विप्रैः सुगुप्तैराप्तकारिभिः ।
कुन्तीपुत्रान् भेदयामो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ४ ॥
दुर्योधन बोला— पिताजी! आज अत्यन्त गुप्तरूपसे कुछ ऐसे चतुर ब्राह्मणोंको नियुक्त करना चाहिये, जिनके कार्योंपर हमारा पूर्ण विश्वास हो। हमें उनके द्वारा पाण्डवोंमेंसे कुन्ती और माद्रीके पुत्रोंमें फूट डालनेकी चेष्टा करनी चाहिये ॥ ४ ॥
अथवा द्रुपदो राजा महद्भिर्वित्तसंचयैः ।
पुत्राश्चास्य प्रलोभ्यन्ताममात्याश्चैव सर्वशः ॥ ५ ॥
परित्यजेद् यथा राजा कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
अथ तत्रैव वा तेषां निवासं रोचयन्तु ते ॥ ६ ॥
अथवा धनकी बहुत बड़ी राशि देकर राजा द्रुपद, उनके पुत्र तथा मन्त्रियोंको सर्वथा प्रलोभनमें डालना चाहिये, जिससे पांचालनरेश कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको त्याग दें—उन्हें

अपने घर और नगरसे निकाल दें, अथवा वे ब्राह्मणलोग पाण्डवोंके मनमें वहीं रहनेकी रुचि उत्पन्न करें॥ ५-६॥
इहैषां दोषवद्वासं वर्णयन्तु पृथक् पृथक्।
ते भिद्यमानास्तत्रैव मनः कुर्वन्तु पाण्डवाः॥ ७॥
वे अलग-अलग इन सभी पाण्डवोंसे कहें कि हस्तिनापुरका निवास आपलोगोंके लिये अत्यन्त हानिकारक होगा। इस प्रकार ब्राह्मणोंद्वारा बुद्धिभेद उत्पन्न कर देनेपर सम्भव है, पाण्डवलोग अपने मनमें वहीं (पांचालदेशमें ही) रहनेका निश्चय कर लें॥ ७॥
अथवा कुशलाः केचिदुपायनिपुणा नराः।
इतरेतरतः पार्थान् भेदयन्त्वनुरागतः॥ ८॥
अथवा कुछ ऐसे मनुष्य भेजे जायें, जो उपाय ढूँढ़ निकालनेमें चतुर तथा कार्यकुशल हों और प्रेमपूर्वक बातें करके कुन्तीपुत्रोंमें परस्पर फूट डाल दें॥ ८॥
व्युत्थापयन्तु वा कृष्णां बहुत्वात् सुकरं हि तत्।
अथवा पाण्डवांस्तस्यां भेदयन्तु ततश्च ताम्॥ ९॥
अथवा कृष्णाको ही इस प्रकार बहका दें कि वह अपने पतियोंका परित्याग कर दे। अनेक पति होनेके कारण (उसका किसीमें भी सुदृढ़ अनुराग नहीं हो सकता; अतः) उनका परित्याग कराना सरल है। अथवा वे लोग पाण्डवोंको ही द्रौपदीकी ओरसे विलग कर दें और ऐसा होनेपर द्रौपदीको उनकी ओरसे विरक्त बना दें॥ ९॥
भीमसेनस्य वा राजन्नुपायकुशलैर्नरैः।
मृत्युर्विधीयतां छन्नैः स हि तेषां बलाधिकः॥ १०॥
अथवा राजन्! उपायकुशल मनुष्य छिपे रहकर भीमसेनका ही वध कर डालें; क्योंकि वही पाण्डवोंमें सबसे अधिक बलवान् है॥ १०॥
तमाश्रित्य हि कौन्तेयः पुरा चास्मान् न मन्यते।
स हि तीक्ष्णश्च शूरश्च तेषां चैव परायणम्॥ ११॥
उसीका आश्रय लेकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर पहलेसे ही हमें कुछ नहीं समझते। वह बड़े तीखे स्वभावका और शूरवीर है। वही पाण्डवोंका सबसे बड़ा सहारा है॥ ११॥
तस्मिंस्त्वभिहते राजन् हतोत्साहा हतौजसः।
यतिष्यन्ते न राज्याय स हि तेषां व्यपाश्रयः॥ १२॥
राजन्! उसके मारे जानेपर पाण्डवोंका बल और उत्साह नष्ट हो जायगा। फिर वे राज्य लेनेका प्रयत्न नहीं करेंगे। भीमसेन ही उनका सबसे बड़ा आश्रय है॥ १२॥
अजेयो ह्यर्जुनः संख्ये पृष्ठगोपे वृकोदरे।
तमृते फाल्गुनो युद्धे राधेयस्य न पादभाक्॥ १३॥
भीमसेनको पृष्ठरक्षक पाकर ही अर्जुन युद्धमें अजेय बने हुए हैं। यदि भीम न हों तो वे रणभूमिमें कर्णकी एक चौथाईके बराबर भी नहीं हो सकेंगे॥ १३॥

ते जानानास्तु दौर्बल्यं भीमसेनमृते महत् । अस्मान् बलवतो ज्ञात्वा न यतिष्यन्ति दुर्बलाः ॥ १४ ॥ भीमसेनके बिना अपनी बहुत बड़ी दुर्बलताका अनुभव करके वे दुर्बल पाण्डव हमें अपनेसे बलवान् जानकर राज्य लेनेका प्रयत्न नहीं करेंगे ॥ १४ ॥

इहागतेषु वा तेषु निदेशवशवर्तिषु । प्रवर्तिष्यामहे राजन् यथाशास्त्रं निबर्हणम् ॥ १५ ॥ राजन्! अथवा यदि वे यहाँ आकर हमारी आज्ञाके अधीन होकर रहेंगे, तब हम नीतिशास्त्रके अनुसार उनके विनाशके कार्यमें लग जायँगे ॥ १५ ॥

अथवा दर्शनीयाभिः प्रमदाभिर्विलोभ्यताम् । एकैकस्तत्र कौन्तेयस्ततः कृष्णा विरज्यताम् ॥ १६ ॥ अथवा देखनेमें सुन्दर युवती स्त्रियोंद्वारा एक-एक पाण्डवको लुभाया जाय और इस प्रकार कृष्णाका मन उनकी ओरसे फेर दिया जाय ॥ १६ ॥

प्रेष्यतां चैव राधेयस्तेषामागमनाय वै । तैस्तैः प्रकारैः संनीय पात्यन्तामाप्तकारिभिः ॥ १७ ॥ अथवा पाण्डवोंको यहाँ बुला लानेके लिये राधानन्दन कर्णको भेजा जाय और यहाँ लाकर विश्वसनीय कार्यकर्ताओंद्वारा विभिन्न उपायोंसे उन सबको मार गिराया जाय ॥ १७ ॥

एतेषामप्युपायानां यस्ते निर्दोषवान् मतः । तस्य प्रयोगमातिष्ठ पुरा कालोऽतिवर्तते ॥ १८ ॥ यावद्ध्यकृतविश्वासा द्रुपदे पार्थिवर्षभे । तावदेव हि ते शक्या न शक्यास्तु ततः परम् ॥ १९ ॥ पिताजी! इन उपायोंमेंसे जो भी आपको निर्दोष जान पड़े, उसीसे पहले काम लीजिये; क्योंकि समय बीता जा रहा है। जबतक वे राजाओंमें श्रेष्ठ द्रुपदपर उनका पूरा विश्वास नहीं जम जाता, तभीतक उन्हें मारा जा सकता है। पूरा विश्वास जम जानेपर तो उन्हें मारना असम्भव हो जायगा ॥ १८-१९ ॥

एषा मम मतिस्तात निग्रहाय प्रवर्तते । साध्वी वा यदि वासाध्वी किं वा राधेय मन्यसे ॥ २० ॥ पिताजी! शत्रुओंको वशमें करनेके लिये ये ही उपाय मेरी बुद्धिमें आते हैं; मेरा यह विचार भला है या बुरा, यह आप जानें। अथवा कर्ण! तुम्हारी क्या राय है? ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि दुर्योधनवाक्ये द्विशततमोऽध्यायः ॥ २०० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें दुर्योधनवाक्यविषयक दो सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०० ॥

२०१-

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एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंको पराक्रमसे दबानेके लिये कर्णकी सम्मति

कर्ण उवाच

दुर्योधन तव प्रज्ञा न सम्यगिति मे मतिः ।
न ह्युपायेन ते शक्याः पाण्डवाः कुरुवर्धन ॥ १ ॥
**कर्णने कहा—**दुर्योधन! मेरे विचारसे तुम्हारी यह सलाह ठीक नहीं है। कुरुवर्धन! ऐसे किसी भी उपायसे पाण्डवोंको वशमें नहीं किया जा सकता ॥ १ ॥

पूर्वमेव हि ते सूक्ष्मैरुपायैर्यतितास्त्वया ।
निग्रहीतुं तदा वीर न चैव शकितास्त्वया ॥ २ ॥
इहैव वर्तमानास्ते समीपे तव पार्थिव ।
अजातपक्षाः शिशवः शकिता नैव बाधितुम् ॥ ३ ॥
वीर! पहले भी तुमने अनेक गुप्त उपायोंद्वारा पाण्डवोंको दबानेकी चेष्टा की है, परंतु उनपर तुम्हारा वश नहीं चल सका। भूपाल! वे जब बच्चे थे और यहीं तुम्हारे पास रहते थे, उस समय उनके पक्षमें कोई नहीं था, तब भी तुम उन्हें बाधा पहुँचानेमें सफल न हो सके ॥ २-३ ॥

जातपक्षा विदेशस्था विवृद्धाः सर्वशोऽद्य ते ।
नोपायसाध्याः कौन्तेया ममैषा मतिरच्युत ॥ ४ ॥
अब तो वे विदेशमें हैं, उनके पक्षमें बहुत-से लोग हो गये हैं और सब प्रकारसे उनकी बढ़ती हो गयी है। अतः अब वे कुन्तीकुमार तुम्हारे बताये हुए उपायोंद्वारा वशमें आनेवाले नहीं हैं। पुरुषार्थसे कभी च्युत न होनेवाले वीर! मेरा तो यही विचार है ॥ ४ ॥

न च ते व्यसनैर्योक्तुं शक्या दिष्टकृतेन च ।
शकिताश्चेप्सवश्चैव पितृपैतामहं पदम् ॥ ५ ॥
अब वे संकटमें नहीं डाले जा सकते। भाग्यने उन्हें शक्तिशाली बना दिया है और उनमें अपने बाप-दादोंके राज्यको प्राप्त करनेकी अभिलाषा जाग उठी है ॥ ५ ॥

परस्परेण भेदश्च नाधातुं तेषु शक्यते ।
एकस्यां ये रताः पत्न्यां न भिद्यन्ते परस्परम् ॥ ६ ॥
उनमें आपसमें भी फूट डालना सम्भव नहीं है। जो (एकराय होकर) एक ही पत्नीमें अनुरक्त हैं, उनमें परस्पर विरोध नहीं हो सकता ॥ ६ ॥

न चापि कृष्णा शक्येत तेभ्यो भेदयितुं परः ।
परिद्यूनान् वृतवती किमुताद्य मृजावतः ॥ ७ ॥

कृष्णाको भी उनकी ओरसे फूट डालकर विलग करना असम्भव है; क्योंकि जब पाण्डवलोग भिक्षाभोजी होनेके कारण दीन-हीन थे, उस अवस्थामें कृष्णाने उनका वरण किया है; अब तो वे सम्पत्तिशाली होकर स्वच्छ एवं सुन्दर वेषमें रहते हैं, अब वह क्यों उनकी ओरसे विरक्त होगी? ॥ ७ ॥

ईप्सितश्च गुणः स्त्रीणामेकस्या बहुभर्तृता । तं च प्राप्तवती कृष्णा न सा भेदयितुं क्षमा ॥ ८ ॥ प्रायः स्त्रियोंका यह अभीष्ट गुण है कि एक स्त्रीमें अनेक पुरुषोंसे सम्बन्ध स्थापित करनेकी रुचि हो। पाण्डवोंके साथ रहनेमें कृष्णाको यह लाभ स्वतः प्राप्त है; अतः उसके मनमें भेद नहीं उत्पन्न किया जा सकता ॥ ८ ॥

आर्यव्रतश्च पाञ्चाल्यो न स राजा धनप्रियः । न संत्यक्ष्यति कौन्तेयान् राज्यदानैरपि ध्रुवम् ॥ ९ ॥ पांचालराज द्रुपद श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले हैं। वे धनके लोभी नहीं हैं। अतः तुम अपना सारा राज्य दे दो, तो भी यह निश्चय है कि वे कुन्ती-पुत्रोंका परित्याग नहीं करेंगे ॥ ९ ॥

यथास्य पुत्रो गुणवाननुरक्तश्च पाण्डवान् । तस्मान्नोपायसाध्यांस्तानहं मन्ये कथंचन ॥ १० ॥ इसी प्रकार उनका पुत्र धृष्टद्युम्न भी गुणवान् तथा पाण्डवोंका प्रेमी है। अतः मैं उन्हें पूर्वोक्त उपायोंसे वशमें करनेयोग्य कदापि नहीं मान सकता ॥ १० ॥

इदं त्वद्य क्षमं कर्तुमस्माकं पुरुषर्षभ । यावन्न कृतमूलास्ते पाण्डवेया विशाम्पते ॥ ११ ॥ तावत् प्रहरणीयास्ते तत् तुभ्यं तात रोचताम् । अस्मत्पक्षो महान् यावद् यावत् पाञ्चालको लघुः । तावत् प्रहरणं तेषां क्रियतां मा विचारय ॥ १२ ॥ 'राजन्! इस समय हमारे लिये एक ही उपाय काममें लानेयोग्य है; वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव जबतक अपनी जड़ नहीं जमा लेते, तभीतक उनपर प्रहार करना चाहिये। इसीसे वे काबूमें आ सकते हैं।' तात! मैं समझता हूँ, तुम्हें भी यह राय पसंद होगी। जबतक हमारा पक्ष बढ़ा-चढ़ा है और जबतक पांचालराजका बल हमसे कम है, तभीतक उनपर आक्रमण कर दिया जाय। इसमें दूसरा कुछ विचार न करो ॥ ११-१२ ॥

वाहनानि प्रभूतानि मित्राणि च कुलानि च । यावन्न तेषां गान्धारे तावद् विक्रम पार्थिव ॥ १३ ॥ राजन्! गान्धारीनन्दन! जबतक पाण्डवोंके पास बहुत-से वाहन, मित्र और कुटुम्बी नहीं हो जाते, तभीतक तुम उनके ऊपर पराक्रम कर लो ॥ १३ ॥

यावच्च राजा पाञ्चाल्यो नोद्यमे कुरुते मनः ।

सह पुत्रैर्महावीर्यैस्तावद् विक्रम पार्थिव ॥ १४ ॥
पृथ्वीपते! जबतक पांचालनरेश अपने महा-पराक्रमी पुत्रोंके साथ हमारे ऊपर चढ़ाई करनेका विचार नहीं कर रहे हैं, तभीतक तुम अपना बल-विक्रम प्रकट कर लो ॥ १४ ॥
यावन्नायाति वार्ष्णेयः कर्षन् यादववाहिनीम् ।
राज्यार्थे पाण्डवेयानां पाञ्चाल्यसदनं प्रति ॥ १५ ॥
इसके लिये तुम्हें तभीतक अवसर है, जबतक कि वृष्णिकुलनन्दन श्रीकृष्ण यदुवंशियोंकी सेना साथ लिये पाण्डवोंको राज्य दिलानेके उद्देश्यसे पांचालराजके घरपर नहीं आ जाते ॥ १५ ॥
वसूनि विविधान् भोगान् राज्यमेव च केवलम् ।
नात्याज्यमस्ति कृष्णस्य पाण्डवार्थे कथंचन ॥ १६ ॥
पाण्डवोंके लिये श्रीकृष्णकी ओरसे धन-रत्न, भाँति-भाँतिके भोग तथा सारा राज्य—कुछ भी अदेय नहीं है ॥ १६ ॥
विक्रमेण मही प्राप्ता भरतेन महात्मना ।
विक्रमेण च लोकांस्त्रीञ्जितवान् पाकशासनः ॥ १७ ॥
महात्मा भरतने पराक्रमसे ही यह पृथ्वी प्राप्त की। इन्द्रने पराक्रमसे ही तीनों लोकोंपर विजय पायी ॥ १७ ॥
विक्रमं च प्रशंसन्ति क्षत्रियस्य विशाम्पते ।
स्वको हि धर्मः शूराणां विक्रमः पार्थिवर्षभ ॥ १८ ॥
राजन्! क्षत्रियके लिये पराक्रमकी ही प्रशंसा की जाती है। नृपश्रेष्ठ! पराक्रम करना ही शूरवीरोंका स्वधर्म है ॥ १८ ॥
ते बलेन वयं राजन् महता चतुरङ्गिणा ।
प्रमथ्य द्रुपदं शीघ्रमानयामहे पाण्डवान् ॥ १९ ॥
राजन्! हमलोग विशाल चतुरंगिणी सेनाके द्वारा राजा द्रुपदको कुचलकर शीघ्र ही यहाँ पाण्डवोंको कैद कर लायें ॥ १९ ॥
न हि साम्ना न दानेन न भेदेन च पाण्डवाः ।
शक्याः साधयितुं तस्माद् विक्रमेणैव ताञ्जहि ॥ २० ॥
न सामसे, न दानसे और न भेदकी नीतिसे पाण्डवोंको वशमें किया जा सकता है। अतः उन्हें पराक्रमसे ही नष्ट करो ॥ २० ॥
तान् विक्रमेण जित्वेमामखिलां भुङ्क्ष्व मेदिनीम् ।
अतो नान्यं प्रपश्यामि कार्योपायं जनाधिप ॥ २१ ॥
पराक्रमसे पाण्डवोंको जीतकर इस सारी पृथ्वीका राज्य भोगो। नरेश्वर! इसके सिवा दूसरा कोई कार्यसिद्धिका उपाय मैं नहीं देखता ॥ २१ ॥
वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा तु राधेयवचो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ।
अभिपूज्य ततः पश्चादिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कर्णकी बात सुनकर प्रतापी धृतराष्ट्रने उसकी बड़ी सराहना की और तदनन्तर इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
उपपन्नं महाप्राज्ञ कृतास्त्रे सूतनन्दने ।
त्वयि विक्रमसम्पन्नमिदं वचनमीदृशम् ॥ २३ ॥
‘कर्ण! तुम परम बुद्धिमान्, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता और सूतकुलको आनन्दित करनेवाले हो। ऐसा पराक्रमयुक्त वचन तुम्हारे ही योग्य है ॥ २३ ॥
भूय एव तु भीष्मश्च द्रोणो विदुर एव च ।
युवां च कुरुतं बुद्धिं भवेद् या नः सुखोदया ॥ २४ ॥
‘परंतु मेरा विचार है कि भीष्म, द्रोण, विदुर और तुम दोनों एक साथ बैठकर पुनः विचार कर लो तथा कोई ऐसी बात सोच निकालो, जो भविष्यमें भी हमें सुख देनेवाली हो’ ॥ २४ ॥
तत आनाय्य तान् सर्वान् मन्त्रिणः सुमहायशाः ।
धृतराष्ट्रो महाराज मन्त्रयामास वै तदा ॥ २५ ॥
महाराज! तदनन्तर महायशस्वी धृतराष्ट्रने भीष्म, द्रोण आदि सम्पूर्ण मन्त्रियोंको बुलवाकर उनके साथ उस समय विचार आरम्भ किया ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि धृतराष्ट्रमन्त्रणे
एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें
धृतराष्ट्रमन्त्रणासम्बन्धी दो सौ पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ २०१ ॥

२०२-

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द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

भीष्मकी दुर्योधनसे पाण्डवोंको आधा राज्य देनेकी सलाह

भीष्म उवाच

न रोचते विग्रहो मे पाण्डुपुत्रैः कथंचन । यथैव धृतराष्ट्रो मे तथा पाण्डुरसंशयम् ॥ १ ॥ भीष्मजी बोले—मुझे पाण्डवोंके साथ विरोध या युद्ध किसी प्रकार भी पसंद नहीं है। मेरे लिये जैसे धृतराष्ट्र हैं, वैसे ही पाण्डु—इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥

गान्धार्याश्च यथा पुत्रास्तथा कुन्तीसुता मम । यथा च मम ते रक्ष्या धृतराष्ट्र तथा तव ॥ २ ॥ धृतराष्ट्र! जैसे गान्धारीके पुत्र मेरे अपने हैं, उसी प्रकार कुन्तीके पुत्र भी हैं; इसीलिये जैसे मुझे पाण्डवोंकी रक्षा करनी चाहिये, वैसे तुम्हें भी ॥ २ ॥

यथा च मम राजंश्च तथा दुर्योधनस्य ते । तथा कुरूणां सर्वेषामन्येषामपि पार्थिव ॥ ३ ॥ भूपाल! मेरे और तुम्हारे लिये जैसे पाण्डवोंकी रक्षा आवश्यक है, वैसे ही दुर्योधन तथा अन्य समस्त कौरवोंको भी उनकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ३ ॥

एवं गते विग्रहं तैनं रोचे संधाय वीरैर्दीयतामर्धभूमिः । तेषामपीदं प्रपितामहानां राज्यं पितुश्चैव कुरूत्तमानाम् ॥ ४ ॥ ऐसी दशामें मैं पाण्डवोंके साथ लड़ाई-झगड़ा पसंद नहीं करता। उन वीरोंके साथ संधि करके उन्हें आधा राज्य दे दिया जाय। (दुर्योधनकी ही भाँति) उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंके भी बाप-दादोंका यह राज्य है ॥ ४ ॥

दुर्योधन यथा राज्यं त्वमिदं तात पश्यसि । मम पैतृकमित्येवं तेऽपि पश्यन्ति पाण्डवाः ॥ ५ ॥ तात दुर्योधन! जैसे तुम इस राज्यको अपनी पैतृक सम्पत्तिके रूपमें देखते हो, उसी प्रकार पाण्डव भी देखते हैं ॥ ५ ॥

यदि राज्यं न ते प्राप्ताः पाण्डवेया यशस्विनः । कुत एव तवापीदं भारतस्यापि कस्यचित् ॥ ६ ॥ यदि यशस्वी पाण्डव इस राज्यको नहीं पा सकते तो तुम्हें अथवा भरतवंशके किसी अन्य पुरुषको भी वह कैसे प्राप्त हो सकता है? ॥ ६ ॥

अधर्मेण च राज्यं त्वं प्राप्तवान् भरतर्षभ ।

तेऽपि राज्यमनुप्राप्ताः पूर्वमेवेति मे मतिः ॥ ७ ॥ भरतश्रेष्ठ! तुमने अधर्मपूर्वक इस राज्यको हथिया लिया है; परंतु मेरा विचार यह है कि तुमसे पहले ही वे भी इस राज्यको पा चुके थे ॥ ७ ॥

मधुरेणैव राज्यस्य तेषामर्धं प्रदीयताम् । एतद्धि पुरुषव्याघ्र हितं सर्वजनस्य च ॥ ८ ॥ पुरुषसिंह! प्रेमपूर्वक ही उन्हें आधा राज्य दे दो। इसीमें सब लोगोंका हित है ॥ ८ ॥

अतोऽन्यथा चेत् क्रियते न हितं नो भविष्यति । तवाप्यकीर्तिः सकला भविष्यति न संशयः ॥ ९ ॥ यदि इसके विपरीत कुछ किया जायगा तो हमारी भलाई नहीं हो सकती और तुम्हें भी पूरा-पूरा अपयश मिलेगा—इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

कीर्तिरक्षणमातिष्ठ कीर्तिर्हि परमं बलम् । नष्टकीर्तेर्मनुष्यस्य जीवितं ह्यफलं स्मृतम् ॥ १० ॥ अतः अपनी कीर्तिकी रक्षा करो, कीर्ति ही श्रेष्ठ बल है; जिसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है, उस मनुष्यका जीवन निष्फल माना गया है ॥ १० ॥

यावत्कीर्तिर्मनुष्यस्य न प्रणश्यति कौरव । तावज्जीवति गान्धारे नष्टकीर्तिस्तु नश्यति ॥ ११ ॥ गन्धारीनन्दन! कुरुश्रेष्ठ! मनुष्यकी कीर्ति जबतक नष्ट नहीं होती, तभीतक वह जीवित है; जिसकी कीर्ति नष्ट हो गयी, उसका तो जीवन ही नष्ट हो जाता है ॥ ११ ॥

तमिमं समुपातिष्ठ धर्मं कुरुकुलोचितम् । अनुरूपं महाबाहो पूर्वेषामात्मनः कुरु ॥ १२ ॥ महाबाहो! कुरुकुलके लिये उचित इस उत्तम धर्मका पालन करो। अपने पूर्वजोंके अनुरूप कार्य करते रहो ॥ १२ ॥

दिष्ट्या ध्रियन्ते पार्था हि दिष्ट्या जीवति सा पृथा । दिष्ट्या पुरोचनः पापो न सकामोऽत्ययं गतः ॥ १३ ॥ सौभाग्यकी बात है कि कुन्तीके पुत्र जीवित हैं; यह भी सौभाग्यकी ही बात है कि कुन्ती भी मरी नहीं है और सबसे बड़े सौभाग्यका विषय यह है कि पापी पुरोचन अपने (बुरे) इरादेमें सफल न होकर स्वयं नष्ट हो गया ॥ १३ ॥

यदा प्रभृति दग्धास्ते कुन्तिभोजसुतासुताः । तदा प्रभृति गान्धारे न शक्नोम्यभिवीक्षितुम् ॥ १४ ॥ लोके प्राणभृतां कंचिच्छ्रुत्वा कुन्तीं तथागताम् । न चापि दोषेण तथा लोको मन्येत् पुरोचनम् । यथा त्वां पुरुषव्याघ्र लोको दोषेण गच्छति ॥ १५ ॥

गान्धारीकुमार! जबसे मैंने सुना कि कुन्तीके पुत्र लाक्षागृहकी आगमें जल गये तथा कुन्ती भी उसी अवस्थाको प्राप्त हुई है, तभीसे मैं (लज्जाके मारे) जगत्‌के किसी भी प्राणीकी ओर आँख उठाकर देख नहीं सकता था। नरश्रेष्ठ! लोग इस कार्यके लिये पुरोचनको उतना दोषी नहीं मानते, जितना तुम्हें दोषी समझते हैं ।। १४-१५ ।। तदिदं जीवितं तेषां तव किल्बिषनाशनम् । सम्मन्तव्यं महाराज पाण्डवानां च दर्शनम् ॥ १६ ॥ अतः महाराज! पाण्डवोंका यह जीवित रहना और उनका दर्शन होना वास्तवमें तुम्हारे ऊपर लगे हुए कलंकका नाश करनेवाला है, ऐसा मानना चाहिये ।। १६ ।। न चापि तेषां वीराणां जीवतां कुरुनन्दन । पित्र्योंऽशः शक्य आदातुमपि वज्रभृता स्वयम् ॥ १७ ॥ कुरुनन्दन! पाण्डववीरोंके जीते-जी उनका पैतृक अंश साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी नहीं ले सकते ।। १७ ।। ते सर्वेऽवस्थिता धर्मे सर्वे चैवैकचेतसः । अधर्मेण निरस्ताश्च तुल्ये राज्ये विशेषतः ॥ १८ ॥ वे सब धर्ममें स्थित हैं; उन सबका एक चित्त—एक विचार है। इस राज्यपर तुम्हारा और उनका समान स्वत्व है, तो भी उनके साथ विशेष अधर्मपूर्ण बर्ताव करके उन्हें यहाँसे हटाया गया है ।। १८ ।। यदि धर्मस्त्वया कार्यो यदि कार्यं प्रियं च मे । क्षेमं च यदि कर्तव्यं तेषामर्धं प्रदीयताम् ॥ १९ ॥ यदि तुम्हें धर्मके अनुकूल चलना है, यदि मेरा प्रिय करना है और यदि (संसारमें) भलाई करनी है, तो उन्हें आधा राज्य दे दो ।। १९ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि भीष्मवाक्ये द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमन-राज्यलम्भपर्वमें भीष्मवाक्यविषयक दो सौ दूसरा अध्याय पूरा हुआ ।। २०२ ।।