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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

ततः स राक्षसः क्रुद्धो भीमस्य वचनात् तदा ।
आजगाम सुसंक्रुद्धो यत्र भीमो व्यवस्थितः ॥ ६ ॥
भीमके इस प्रकार पुकारनेसे वह राक्षस कुपित हो उठा और अत्यन्त क्रोधमें भरकर जहाँ भीमसेन बैठकर भोजन कर रहे थे, वहाँ आया ॥ ६ ॥

महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम् ।
लोहिताक्षः करालश्च लोहितश्मश्रुमूर्धजः ॥ ७ ॥
उसका शरीर बहुत बड़ा था। वह इतने महान् वेगसे चलता था, मानो पृथ्वीको विदीर्ण कर देगा। उसकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं। आकृति बड़ी विकराल जान पड़ती थी। उसके दाढ़ी, मूँछ और सिरके बाल लाल रंगके थे ॥ ७ ॥

आकर्णाद् भिन्नवक्त्रश्च शङ्कुकर्णो बिभीषणः ।
त्रिशिखां भुकुटिं कृत्वा संदश्य दशनच्छदम् ॥ ८ ॥
मूँहका फैलाव कानोंके समीपतक था, कान भी शंकुके समान लंबे और नुकीले थे। बड़ा भयानक था वह राक्षस। उसने भौंहें ऐसी टेढ़ी कर रखी थीं कि वहाँ तीन रेखाएँ उभड़ आयी थीं और वह दाँतोंसे ओठ चबा रहा था ॥ ८ ॥

भुञ्जानमन्नं तं दृष्ट्वा भीमसेनं स राक्षसः ।
विवृत्य नयने क्रुद्ध इदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
भीमसेनको वह अन्न खाते देख राक्षसका क्रोध बहुत बढ़ गया और उसने आँखें तरेरकर कहा— ॥ ९ ॥

कोऽयमन्नमिदं भुङ्क्ते मदर्थमुपकल्पितम् ।
पश्यतो मम दुर्बुद्धिर्यासुर्यमसादनम् ॥ १० ॥
'यमलोकमें जानेकी इच्छा रखनेवाला यह कौन दुर्बुद्धि मनुष्य है, जो मेरी आँखोंके सामने मेरे ही लिये तैयार करके लाये हुए इस अन्नको स्वयं खा रहा है?' ॥ १० ॥

भीमसेनस्ततः श्रुत्वा प्रहसन्निव भारत ।
राक्षसं तमनादृत्य भुङ्क्त एव पराङ्मुखः ॥ ११ ॥
भारत! उसकी बात सुनकर भीमसेन मानो जोर-जोरसे हँसने लगे और उस राक्षसकी अवहेलना करते हुए मुँह फेरकर खाते ही रह गये ॥ ११ ॥

रवं स भैरवं कृत्वा समुद्यम्य करावुभौ ।
अभ्यद्रवद् भीमसेनं जिघांसुः पुरुषादकः ॥ १२ ॥
अब तो वह नरभक्षी राक्षस भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे भयंकर गर्जना करता हुआ दोनों हाथ ऊपर उठाकर उनकी ओर दौड़ा ॥ १२ ॥

तथापि परिभूयैनं प्रेक्षमाणो वृकोदरः ।
राक्षसं भुङ्क्त एवान्नं पाण्डवः परवीरहा ॥ १३ ॥
अमर्षेण तु सम्पूर्णः कुन्तीपुत्रं वृकोदरम् ।

जघान पृष्ठे पाणिभ्यामुभाभ्यां पृष्ठतः स्थितः ॥ १४ ॥ तो भी शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेन उस राक्षसकी ओर देखते हुए उसका तिरस्कार करके उस अन्नको खाते ही रहे। तब उसने अत्यन्त अमर्षमें भरकर कुन्तीनन्दन भीमसेनके पीछे खड़े हो अपने दोनों हाथोंसे उनकी पीठपर प्रहार किया ॥ १३-१४ ॥

तथा बलवता भीमः पाणिभ्यां भृशमाहतः । नैवावलोकयामास राक्षसं भुङ्क्त एव सः ॥ १५ ॥ इस प्रकार बलवान् राक्षसके दोनों हाथोंसे भयानक चोट खाकर भी भीमसेनने उसकी ओर देखा तक नहीं, वे भोजन करनेमें ही संलग्न रहे ॥ १५ ॥

ततः स भूयः संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षसः । ताडयिष्यंस्तदा भीमं पुनरभ्यद्रवद् बली ॥ १६ ॥ तब उस बलवान् राक्षसने पुनः अत्यन्त कुपित हो एक वृक्ष उखाड़कर भीमसेनको मारनेके लिये फिर उनपर धावा किया ॥ १६ ॥

ततो भीमः शनैर्भुक्त्वा तदन्नं पुरुषर्षभः । वार्युपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थौ युधि महाबलः ॥ १७ ॥ तदनन्तर नरश्रेष्ठ महाबली भीमसेनने धीरे-धीरे वह सब अन्न खाकर, आचमन करके मुँह-हाथ धो लिये, फिर वे अत्यन्त प्रसन्न हो युद्धके लिये डट गये ॥ १७ ॥

क्षिप्तं क्रुद्धेन तं वृक्षं प्रतिजग्राह वीर्यवान् । सव्येन पाणिना भीमः प्रहसन्निव भारत ॥ १८ ॥ जनमेजय! कुपित राक्षसके द्वारा चलाये हुए उस वृक्षको पराक्रमी भीमसेनने बायें हाथसे हँसते हुए-से पकड़ लिया ॥ १८ ॥

ततः स पुनरुद्यम्य वृक्षान् बहुविधान् बली । प्राहिणोद् भीमसेनाय तस्मै भीमश्च पाण्डवः ॥ १९ ॥ तब उस बलवान् निशाचरने पुनः बहुत-से वृक्षोंको उखाड़ा और भीमसेनपर चला दिया। पाण्डुनन्दन भीमने भी उसपर अनेक वृक्षोंद्वारा प्रहार किया ॥ १९ ॥

तद् वृक्षयुद्धमभवन्महीरुहविनाशनम् । घोररूपं महाराज नरराक्षसराजयोः ॥ २० ॥ महाराज! नरराज तथा राक्षसराजका वह भयंकर वृक्षयुद्ध उस वनके समस्त वृक्षोंके विनाशका कारण बन गया ॥ २० ॥

नाम विश्राव्य तु बकः समभिद्रुत्य पाण्डवम् । भुजाभ्यां परिजग्राह भीमसेनं महाबलम् ॥ २१ ॥ तदनन्तर बकासुरने अपना नाम सुनाकर महाबली पाण्डुनन्दन भीमसेनकी ओर दौड़कर दोनों बाँहोंसे उन्हें पकड़ लिया ॥ २१ ॥

भीमसेनोऽपि तद् रक्षः परिरभ्य महाभुजः । विस्फुरन्तं महाबाहुं विचकर्ष बलाद् बली ॥ २२ ॥ महाबाहु बलवान् भीमसेनने भी उस विशाल भुजाओंवाले राक्षसको दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया और बलपूर्वक उसे इधर-उधर खींचने लगे। उस समय बकासुर उनके बाहुपाशसे छूटनेके लिये छटपटा रहा था ॥ २२ ॥

स कृष्यमाणो भीमेन कर्षमाणश्च पाण्डवम् । समयुज्यत तीव्रेण क्लमेन पुरुषादकः ॥ २३ ॥ भीमसेन उस राक्षसको खींचते थे तथा राक्षस भीमसेनको खींच रहा था। इस खींचा-खींचीमें वह नरभक्षी राक्षस बहुत थक गया ॥ २३ ॥

तयोर्वेगेन महता पृथिवी समकम्पत । पादपांश्च महाकायांश्चूर्णयामासतुस्तदा ॥ २४ ॥ उन दोनोंके महान् वेगसे धरती जोरसे काँपने लगी। उन दोनोंने उस समय बड़े-बड़े वृक्षोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ २४ ॥

हीयमानं तु तद् रक्षः समीक्ष्य पुरुषादकम् । निष्पिष्य भूमौ जानुभ्यां समाजघ्ने वृकोदरः ॥ २५ ॥ उस नरभक्षी राक्षसको कमजोर पड़ते देख भीमसेन उसे पृथ्वीपर पटककर रगड़ने और दोनों घुटनोंसे मारने लगे ॥ २५ ॥

ततोऽस्य जानुना पृष्ठमवपीड्य बलादिव । बाहुना परिजग्राह दक्षिणेन शिरोधराम् ॥ २६ ॥ सव्येन च कटीदेशे गृह्य वाससि पाण्डवः । तद् रक्षो द्विगुणं चक्रे रुवन्तं भैरवं रवम् ॥ २७ ॥ तदनन्तर उन्होंने अपने एक घुटनेसे बल-पूर्वक राक्षसकी पीठ दबाकर दाहिने हाथसे उसकी गर्दन पकड़ ली और बायें हाथसे कमरका लँगोट पकड़कर उस राक्षसको दोहरा मोड़ दिया। उस समय वह बड़ी भयानक आवाजमें चीत्कार कर रहा था ॥ २६-२७ ॥

ततोऽस्य रुधिरं वक्त्रात् प्रादुरासीद् विशाम्पते । भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षसः ॥ २८ ॥ राजन्! भीमसेनके द्वारा उस घोर राक्षसकी जब कमर तोड़ी जा रही थी, उस समय उसके मुखसे (बहुत-सा) खून गिरा ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकभीमसेनयुद्धे द्विषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें बकासुर और भीमसेनका युद्धविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २९ श्लोक हैं)

१६३-

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त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

बकासुरके वधसे राक्षसोंका भयभीत होकर पलायन और नगरनिवासियोंकी प्रसन्नता

वैशम्पायन उवाच

ततः स भग्नपार्श्वाङ्गो नदित्वा भैरवं रवम् ।
शैलराजप्रतीकाशो गतासुरभवद् बकः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! पसलीकी हड्डियोंके टूट जानेपर पर्वतके समान विशालकाय बकासुर भयंकर चीत्कार करके प्राणरहित हो गया ॥ १ ॥

तेन शब्देन वित्रस्तो जनस्तस्याथ रक्षसः ।
निष्पपात गृहाद् राजन् सहैव परिचारिभिः ॥ २ ॥
तान् भीतान् विगतज्ञानान् भीमः प्रहरतां वरः ।
सान्त्वयामास बलवान् समये च न्यवेशयत् ॥ ३ ॥
न हिंस्या मानुषा भूयो युष्माभिरिति कर्हिचित् ।
हिंसतां हि वधः शीघ्रमेवमेव भवेदिति ॥ ४ ॥
जनमेजय! उस चीत्कारसे भयभीत हो उस राक्षसके परिवारके लोग अपने सेवकोंके साथ घरसे बाहर निकल आये। योद्धाओंमें श्रेष्ठ बलवान् भीमसेनने उन्हें भयसे अचेत देखकर ढाढ़स बँधाया और उनसे यह शर्त करा ली कि 'अबसे कभी तुमलोग मनुष्योंकी हिंसा न करना। जो हिंसा करेंगे, उनका शीघ्र ही इसी प्रकार वध कर दिया जायगा' ॥ २—४ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा तानि रक्षांसि भारत ।
एवमस्त्विति तं प्राहुर्जगृहुः समयं च तम् ॥ ५ ॥
भारत! भीमकी यह बात सुनकर उन राक्षसोंने 'एवमस्तु' कहकर वह शर्त स्वीकार कर ली ॥ ५ ॥

ततः प्रभृति रक्षांसि तत्र सौम्यानि भारत ।
नगरे प्रत्यदृश्यन्त नरैर्नगरवासिभिः ॥ ६ ॥
भारत! तबसे नगरनिवासी मनुष्योंने अपने नगरमें राक्षसोंको बड़े सौम्य स्वभावका देखा ॥ ६ ॥

ततो भीमस्तमादाय गतासुं पुरुषादकम् ।
द्वारदेशे विनिक्षिप्य जगामानुपलक्षितः ॥ ७ ॥

तदनन्तर भीमसेनने उस राक्षसकी लाश उठाकर नगरके दरवाजेपर गिरा दी और स्वयं दूसरोंकी दृष्टिसे अपनेको बचाते हुए चले गये ॥ ७ ॥ दृष्ट्वा भीमबलोद्धूतं बकं विनिहतं तदा । ज्ञातयोऽस्य भयोद्विग्नाः प्रतिजग्मुस्ततस्ततः ॥ ८ ॥ भीमसेनके बलसे बकासुरको पछाड़ा एवं मारा गया देख उस राक्षसके कुटुम्बीजन भयसे व्याकुल हो इधर-उधर भाग गये ॥ ८ ॥ ततः स भीमस्तं हत्वा गत्वा ब्राह्मणवेश्म तत् । आचचक्षे यथावृत्तं राज्ञः सर्वमशेषतः ॥ ९ ॥ उस राक्षसको मारनेके पश्चात् भीमसेन ब्राह्मणके उसी घरमें गये तथा वहाँ उन्होंने राजा युधिष्ठिरसे सारा वृत्तान्त ठीक-ठीक कह सुनाया ॥ ९ ॥ ततो नरा विनिष्क्रान्ता नगरात् कल्पमेव तु । ददृशुर्निहतं भूमौ राक्षसं रुधिरोक्षितम् ॥ १० ॥ तत्पश्चात् जब सबेरा हुआ और लोग नगरसे बाहर निकले, तब उन्होंने देखा बकासुर खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर मरा पड़ा है ॥ १० ॥ तमद्रिकूटसदृशं विनिकीर्णं भयानकम् । दृष्ट्वा संहृष्टरोमाणो बभूवुस्तत्र नागराः ॥ ११ ॥ पर्वतशिखरके समान भयानक उस राक्षसको नगरके दरवाजेपर फेंका हुआ देखकर नगरनिवासी मनुष्योंके शरीरमें रोमांच हो आया ॥ ११ ॥ एकचक्रां ततो गत्वा प्रवृत्तिं प्रददुः पुरे । ततः सहस्रशो राजन् नरा नगरवासिनः ॥ १२ ॥ तत्राजग्मुर्बकं द्रष्टुं सस्त्रीवृद्धकुमारकाः । ततस्ते विस्मिताः सर्वे कर्म दृष्ट्वातिमानुषम् । दैवतान्यर्चयांचक्रुः सर्व एव विशाम्पते ॥ १३ ॥ राजन्! उन्होंने एकचक्रा नगरीमें जाकर नगरभरमें यह समाचार फैला दिया; फिर तो हजारों नगरनिवासी मनुष्य स्त्री, बच्चों और बूढ़ोंके साथ बकासुरको देखनेके लिये वहाँ आये। उस समय वह अमानुषिक कर्म देखकर सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। जनमेजय! उन सभी लोगोंने देवताओंकी पूजा की ॥ १२-१३ ॥ ततः प्रगणयामासुः कस्य वारोऽद्य भोजने । ज्ञात्वा चागम्य तं विप्रं पप्रच्छुः सर्व एव ते ॥ १४ ॥ इसके बाद उन्होंने यह जाननेके लिये कि आज भोजन पहुँचानेकी किसकी बारी थी, दिन आदिकी गणना की। फिर उस ब्राह्मणकी बारीका पता लगनेपर सब लोग उसके पास आकर पूछने लगे ॥ १४ ॥ एवं पृष्टः स बहुशो रक्षमाणश्च पाण्डवान् ।

उवाच नगरान् सर्वानिदं विप्रर्षभस्तदा ॥ १५ ॥
इस प्रकार उनके बार-बार पूछनेपर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने पाण्डवोंको गुप्त रखते हुए समस्त नागरिकोंसे इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥
आज्ञापितं मामशने रुदन्तं सह बन्धुभिः ।
ददर्श ब्राह्मणः कश्चिन्मन्त्रसिद्धो महामनाः ॥ १६ ॥
‘कल जब मुझे भोजन पहुँचानेकी आज्ञा मिली, उस समय मैं अपने बन्धुजनोंके साथ रो रहा था। इस दशामें मुझे एक विशाल हृदयवाले मन्त्रसिद्ध ब्राह्मणने देखा ॥ १६ ॥
परिपृच्छ्य स मां पूर्वं परिक्लेशं पुरस्य च ।
अब्रवीद् ब्राह्मणश्रेष्ठो विश्वास्य प्रहसन्निव ॥ १७ ॥
‘देखकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणदेवताने पहले मुझसे सम्पूर्ण नगरके कष्टका कारण पूछा। इसके बाद अपनी अलौकिक शक्तिका विश्वास दिलाकर हँसते हुए-से कहा— ॥ १७ ॥
प्रापयिष्याम्यहं तस्मा अन्नमेतद् दुरात्मने ।
मन्निमित्तं भयं चापि न कार्यमिति चाब्रवीत् ॥ १८ ॥
‘ब्रह्मन्! आज मैं स्वयं ही उस दुरात्मा राक्षसके लिये भोजन ले जाऊँगा।’ उन्होंने यह भी बताया कि ‘आपको मेरे लिये भय नहीं करना चाहिये’ ॥ १८ ॥
स तदन्नमुपादाय गतो बकवनं प्रति ।
तेन नूनं भवेदेतत् कर्म लोकहितं कृतम् ॥ १९ ॥
‘वे वह भोजन-सामग्री लेकर बकासुरके वनकी ओर गये। अवश्य उन्होंने ही यह लोक-हितकारी कर्म किया होगा’ ॥ १९ ॥
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च सुविस्मिताः ।
वैश्याः शूद्राश्च मुदिताश्चक्रुर्ब्रह्ममहं तदा ॥ २० ॥
तब तो वे सब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आश्चर्यचकित हो आनन्दमें निमग्न हो गये। उस समय उन्होंने ब्राह्मणोंके उपलक्ष्यमें महान् उत्सव मनाया ॥ २० ॥
ततो जानपदाः सर्वे आजग्मुर्नगरं प्रति ।
तदद्भुततमं द्रष्टुं पार्थास्तत्रैव चावसन् ॥ २१ ॥
इसके बाद उस अद्भुत घटनाको देखनेके लिये जनपदमें रहनेवाले सब लोग नगरमें आये और पाण्डवलोग भी (पूर्ववत्) वहीं निवास करने लगे ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकवधे त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें बकासुरवधविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६३ ॥

(चैत्ररथपर्व)

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(चैत्ररथपर्व)

चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंका एक ब्राह्मणसे विचित्र कथाएँ सुनना

जनमेजय उवाच

ते तथा पुरुषव्याघ्रा निहत्य बकराक्षसम् ।
अत ऊर्ध्वं ततो ब्रह्मन् किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! पुरुषसिंह पाण्डवोंने उस प्रकार बकासुरका वध करनेके पश्चात् कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

तत्रैव न्यवसन् राजन् निहत्य बकराक्षसम् ।
अधीयानाः परं ब्रह्म ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! बकासुरका वध करनेके पश्चात् पाण्डवलोग ब्रह्मतत्त्वका प्रतिपादन करनेवाले उपनिषदोंका स्वाध्याय करते हुए वहीं ब्राह्मणके घरमें रहने लगे ॥ २ ॥

ततः कतिपयाहस्य ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
प्रतिश्रयार्थी तद् वेश्म ब्राह्मणस्य जगाम ह ॥ ३ ॥
तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद एक कठोर नियमोंका पालन करनेवाला ब्राह्मण ठहरनेके लिये उन ब्राह्मणदेवताके घरपर आया ॥ ३ ॥

स सम्यक् पूजयित्वा तं विप्रं विप्रर्षभस्तदा ।
ददौ प्रतिश्रयं तस्मै सदा सर्वातिथिव्रतः ॥ ४ ॥
उन विप्रवरका सदा घरपर आये हुए सभी अतिथियोंकी सेवा करनेका व्रत था। उन्होंने आगन्तुक ब्राह्मणकी भलीभाँति पूजा करके उसे ठहरनेके लिये स्थान दिया ॥ ४ ॥

ततस्ते पाण्डवाः सर्वे सह कुन्त्या नरर्षभाः ।
उपासांचक्रिरे विप्रं कथयन्तं कथाः शुभाः ॥ ५ ॥
वह ब्राह्मण बड़ी सुन्दर एवं कल्याणमयी कथाएँ कह रहा था, (अतः उन्हें सुननेके लिये) सभी नरश्रेष्ठ पाण्डव माता कुन्तीके साथ उसके निकट जा बैठे ॥ ५ ॥

कथयामास देशांश्च तीर्थानि सरितस्तथा ।

राज्ञश्च विविधांश्चर्यान् देशांश्चैव पुराणि च ॥ ६ ॥
उसने अनेक देशों, तीर्थों, नदियों, राजाओं, नाना प्रकारके आश्चर्यजनक स्थानों तथा नगरोंका वर्णन किया ॥ ६ ॥

स तत्राकथयद् विप्रः कथान्ते जनमेजय ।
पञ्चालेष्वद्भुताकारं याज्ञसेन्याः स्वयंवरम् ॥ ७ ॥
जनमेजय! बातचीतके अन्तमें उस ब्राह्मणने वहाँ यह भी बताया कि पंचालदेशमें यज्ञसेनकुमारी द्रौपदीका अद्भुत स्वयंवर होने जा रहा है ॥ ७ ॥

धृष्टद्युम्नस्य चोत्पत्तिमुत्पत्तिं च शिखण्डिनः ।
अयोनिजत्वं कृष्णाया द्रुपदस्य महामखे ॥ ८ ॥
धृष्टद्युम्न और शिखण्डीकी उत्पत्ति तथा द्रुपदके महायज्ञमें कृष्णा (द्रौपदी)-का बिना माताके गर्भके ही (यज्ञकी वेदीसे) जन्म होना आदि बातें भी उसने कहीं ॥ ८ ॥

तदद्भुततमं श्रुत्वा लोके तस्य महात्मनः ।
विस्तरेणैव पप्रच्छुः कथान्ते पुरुषर्षभाः ॥ ९ ॥
उस महात्मा ब्राह्मणका इस लोकमें अत्यन्त अद्भुत प्रतीत होनेवाला यह वचन सुनकर कथाके अन्तमें पुरुषशिरोमणि पाण्डवोंने विस्तारपूर्वक जाननेके लिये पूछा ॥ ९ ॥

पाण्डवा ऊचुः

कथं द्रुपदपुत्रस्य धृष्टद्युम्नस्य पावकात् ।
वेदीमध्याच्च कृष्णायाः सम्भवः कथमद्भुतः ॥ १० ॥
पाण्डव बोले— द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नका यज्ञाग्निसे और कृष्णाका यज्ञवेदीके मध्यभागसे अद्भुत जन्म किस प्रकार हुआ? ॥ १० ॥

कथं द्रोणान्महेष्वासात् सर्वाण्यस्त्राण्यशिक्षत ।
कथं विप्र सखायौ तौ भिन्नौ कस्य कृतेन वा ॥ ११ ॥
धृष्टद्युम्नने महाधनुर्धर द्रोणसे सब अस्त्रोंकी शिक्षा किस प्रकार प्राप्त की? ब्रह्मन्! द्रुपद और द्रोणमें किस प्रकार मैत्री हुई? और किस कारणसे उनमें वैर पड़ गया? ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं तैश्चोदितो राजन् स विप्रः पुरुषर्षभैः ।
कथयामास तत् सर्वं द्रौपदीसम्भवं तदा ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! पुरुषशिरोमणि पाण्डवोंके इस प्रकार पूछनेपर आगन्तुक ब्राह्मणने उस समय द्रौपदीकी उत्पत्तिका सारा वृत्तान्त सुनाना आरम्भ किया ॥ १२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसम्भवे चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें ब्राह्मणकथाविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥

१६५-

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पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

द्रोणके द्वारा द्रुपदके अपमानित होनेका वृत्तान्त

ब्राह्मण उवाच

गङ्गाद्वारं प्रति महान् बभूवर्षिर्महातपाः ।
भरद्वाजो महाप्राज्ञः सततं संशितव्रतः ॥ १ ॥
आगन्तुक ब्राह्मणने कहा—गंगाद्वारमें एक महाबुद्धिमान् और परम तपस्वी भरद्वाज नामक महर्षि रहते थे, जो सदा कठोर व्रतका पालन करते थे ॥ १ ॥

सोऽभिषेक्तुं गतो गङ्गां पूर्वमेवागतां सतीम् ।
ददर्शाप्सरसं तत्र घृताचीमाप्लुतामृषिः ॥ २ ॥
एक दिन वे गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये। वहाँ पहलेसे ही आकर सुन्दरी अप्सरा घृताची नामवाली गंगाजीमें गोते लगा रही थी। महर्षिने उसे देखा ॥ २ ॥

तस्या वायुर्नदीतीरे वसनं व्यहरत् तदा ।
अपकृष्टाम्बरां दृष्ट्वा तामृषिश्चकमे तदा ॥ ३ ॥
जब नदीके तटपर खड़ी हो वह वस्त्र बदलने लगी, उस समय वायुने उसकी साड़ी उड़ा दी। वस्त्र हट जानेसे उसे नग्नावस्थामें देखकर महर्षिने उसे प्राप्त करनेकी इच्छा की ॥ ३ ॥

तस्यां संसक्तमनसः कौमारब्रह्मचारिणः ।
चिरस्य रेतश्चस्कन्द तदृषिर्द्रोण आदधे ॥ ४ ॥
मुनिवर भरद्वाजने कुमारावस्थासे ही दीर्घकाल-तक ब्रह्मचर्यका पालन किया था। घृताचीमें चित्त आसक्त हो जानेके कारण उनका वीर्य स्खलित हो गया। महर्षिने उस वीर्यको द्रोण (यज्ञकलश)-में रख दिया ॥ ४ ॥

ततः समभवद् द्रोणः कुमारस्तस्य धीमतः ।
अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ॥ ५ ॥
उसीसे बुद्धिमान् भरद्वाजजीके द्रोण नामक पुत्र हुआ। उसने सम्पूर्ण वेदों और वेदांगोंका भी अध्ययन कर लिया ॥ ५ ॥

भरद्वाजस्य तु सखा पृषतो नाम पार्थिवः ।
तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत् सुतः ॥ ६ ॥
पृषत नामके एक राजा भरद्वाज मुनिके मित्र थे। उन्हीं दिनों राजा पृषतके भी द्रुपद नामक पुत्र हुआ ॥ ६ ॥

स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्षतः ।
चिक्रीडाध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्षभः ॥ ७ ॥

क्षत्रियशिरोमणि पृषतकुमार द्रुपद प्रतिदिन भरद्वाज मुनिके आश्रमपर जाकर द्रोणके साथ खेलते और अध्ययन करते थे ॥ ७ ॥ ततस्तु पृषतेऽतीते स राजा द्रुपदोऽभवत् । द्रोणोऽपि रामं शुश्राव दित्सन्तं वसु सर्वशः ॥ ८ ॥ वनं तु प्रस्थितं रामं भरद्वाजसुतोऽब्रवीत् । आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजोत्तम ॥ ९ ॥ पृषतकी मृत्युके पश्चात् द्रुपद राजा हुए। इधर द्रोणने भी यह सुना कि परशुरामजी अपना सारा धन दान कर देना चाहते हैं और वनमें जानेके लिये उद्यत हैं। तब वे भरद्वाजनन्दन द्रोण परशुरामजीके पास जाकर बोले—‘द्विजश्रेष्ठ! मुझे द्रोण जानिये। मैं धनकी कामनासे यहाँ आया हूँ’ ॥ ८-९ ॥

राम उवाच शरीरमात्रमेवाद्य मया समवशेषितम् । अस्त्राणि वा शरीरं वा ब्रह्मन्नेकतमं वृणु ॥ १० ॥ परशुरामजीने कहा— ब्रह्मन्! अब तो केवल मैंने अपने शरीरको ही बचा रखा है (शरीरके सिवा सब कुछ दान कर दिया)। अतः अब तुम मेरे अस्त्रों अथवा यह शरीर—दोनोंमेंसे किसी एकको माँग लो ॥ १० ॥

द्रोण उवाच अस्त्राणि चैव सर्वाणि तेषां संहारमेव च । प्रयोगं चैव सर्वेषां दातुमर्हसि मे भवान् ॥ ११ ॥ द्रोण बोले— भगवन्! आप मुझे सम्पूर्ण अस्त्र तथा उन सबके प्रयोग और उपसंहारकी विधि भी प्रदान करें ॥ ११ ॥

ब्राह्मण उवाच तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रददौ भृगुनन्दनः । प्रतिगृह्य तदा द्रोणः कृतकृत्योऽभवत् तदा ॥ १२ ॥ आगन्तुक ब्राह्मणने कहा— तब भृगुनन्दन परशुरामजीने ‘तथास्तु’ कहकर अपने सब अस्त्र द्रोणको दे दिये। उन सबको ग्रहण करके द्रोण उस समय कृतार्थ हो गये ॥ १२ ॥ सम्पृहृष्टमना द्रोणो रामात् परमसंमतम् । ब्रह्मास्त्रं समनुप्राप्य नरेष्वभ्यधिकोऽभवत् ॥ १३ ॥ उन्होंने परशुरामजीसे प्रसन्नचित्त होकर परम सम्मानित ब्रह्मास्त्रका ज्ञान प्राप्त किया और मनुष्योंमें सबसे बढ़-चढ़कर हो गये ॥ १३ ॥

ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान् । अब्रवीत् पुरुषव्याघ्रः सखायं विद्धि मामिति ॥ १४ ॥ तब पुरुषसिंह प्रतापी द्रोणने राजा द्रुपदके पास जाकर कहा—'राजन्! मैं तुम्हारा सखा हूँ, मुझे पहचानो' ॥ १४ ॥

द्रुपद उवाच

नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नार्थी रथिनः सखा । नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते ॥ १५ ॥ द्रुपदने कहा—जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथी वीरका और इसी प्रकार जो राजा नहीं है, वह किसी राजाका मित्र होनेयोग्य नहीं है; फिर तुम पहलेकी मित्रताकी अभिलाषा क्यों करते हो? ॥ १५ ॥

ब्राह्मण उवाच

स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चाल्यं प्रति बुद्धिमान् । जगाम कुरुमुख्यानां नगरं नागसाह्वयम् ॥ १६ ॥ आगन्तुक ब्राह्मणने कहा—बुद्धिमान् द्रोणने पांचालराज द्रुपदसे बदला लेनेका मन-ही-मन निश्चय किया। फिर वे कुरुवंशी राजाओंकी राजधानी हस्तिनापुरमें गये ॥ १६ ॥ तस्मै पौत्रान् समादाय वसूनि विविधानि च । प्राप्ताय प्रददौ भीष्मः शिष्यान् द्रोणाय धीमते ॥ १७ ॥ वहाँ जानेपर बुद्धिमान् द्रोणको नाना प्रकारके धन लेकर भीष्मजीने अपने सभी पौत्रोंको उन्हें शिष्यरूपमें सौंप दिया ॥ १७ ॥ द्रोणः शिष्यांस्ततः पार्थानिदं वचनमब्रवीत् । समानीय तु ताञ्शिष्यान् द्रुपदस्यासुखाय वै ॥ १८ ॥ तब द्रोणने सब शिष्योंको एकत्र करके, जिनमें कुन्तीके पुत्र तथा अन्य लोग भी थे, द्रुपदको कष्ट देनेके उद्देश्यसे इस प्रकार कहा— ॥ १८ ॥ आचार्यवेतनं किंचिद् हृदि यद् वर्तते मम । कृतास्त्रैस्तत् प्रदेयं स्यात् तद्द्रुतं वदतानघाः । सोऽर्जुनप्रमुखैरुक्तस्तथास्त्विति गुरुस्तदा ॥ १९ ॥ 'निष्पाप शिष्यगण! मेरे मनमें तुमलोगोंसे कुछ गुरुदक्षिणा लेनेकी इच्छा है। अस्त्रविद्यामें पारंगत होनेपर तुम्हें वह दक्षिणा देनी होगी। इसके लिये सच्ची प्रतिज्ञा करो।' तब अर्जुन आदि शिष्योंने अपने गुरुसे कहा—'तथास्तु (ऐसा ही होगा)' ॥ १९ ॥ यदा च पाण्डवाः सर्वे कृतास्त्राः कृतनिश्चयाः । ततो द्रोणोऽब्रवीद् भूयो वेतनार्थमिदं वचः ॥ २० ॥

जब समस्त पाण्डव अस्त्रविद्यामें पारंगत हो गये और प्रतिज्ञापालनके निश्चयपर दृढ़तापूर्वक डटे रहे, तब द्रोणाचार्यने गुरुदक्षिणा लेनेके लिये पुनः यह बात कही— ॥ २० ॥

पार्षतो द्रुपदो नामच्छत्रवत्यां नरेश्वरः ।
तस्मादाकृष्य तद् राज्यं मम शीघ्रं प्रदीयताम् ॥ २१ ॥

‘अहिच्छत्रा नगरीमें पृषतके पुत्र राजा द्रुपद रहते हैं। उनसे उनका राज्य छीनकर शीघ्र मुझे अर्पित कर दो’ ॥ २१ ॥

(धार्तराष्ट्रैश्च सहिताः पञ्चालान् पाण्डवा ययुः ॥
यज्ञसेनेन संगम्य कर्णदुर्योधनादयः ।
निर्जिताः संन्यवर्तन्त तथान्ये क्षत्रियर्षभाः ॥)
ततः पाण्डुसुताः पञ्च निर्जित्य द्रुपदं युधि ।
द्रोणाय दर्शयामासुर्बद्ध्वा ससचिवं तदा ॥ २२ ॥

(गुरुकी आज्ञा पाकर) धृतराष्ट्रपुत्रोंसहित पाण्डव पंचाल देशमें गये। वहाँ राजा द्रुपदके साथ युद्ध होनेपर कर्ण, दुर्योधन आदि कौरव तथा दूसरे-दूसरे प्रमुख क्षत्रिय वीर परास्त होकर रणभूमिसे भाग गये। तब पाँचों पाण्डवोंने द्रुपदको युद्धमें परास्त कर दिया और मन्त्रियों-सहित उन्हें कैद करके द्रोणके सम्मुख ला दिया ॥ २२ ॥

(महेन्द्र इव दुर्धर्षो महेन्द्र इव दानवम् ।
महेन्द्रपुत्रः पाञ्चालं जितवानर्जुनस्तदा ॥
तद् दृष्ट्वा तु महावीर्यं फाल्गुनस्यामितौजसः ।
व्यस्मयन्त जनाः सर्वे यज्ञसेनस्य बान्धवाः ॥
नास्त्यर्जुनसमो वीर्ये राजपुत्र इति ब्रुवन् ॥)

महेन्द्रपुत्र अर्जुन महेन्द्र पर्वतके समान दुर्धर्ष थे। जैसे महेन्द्रने दानवराजको परास्त किया था, उसी प्रकार उन्होंने पांचालराजपर विजय पायी। अमिततेजस्वी अर्जुनका वह महान् पराक्रम देख राजा द्रुपदके समस्त बान्धवजन बड़े विस्मित हुए और मन-ही-मन कहने लगे—‘अर्जुनके समान शक्तिशाली दूसरा कोई राजकुमार नहीं है’।

द्रोण उवाच

प्रार्थयामि त्वया सख्यं पुनरेव नराधिप ।
अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हति ॥ २३ ॥
अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन त्वया सह ।
राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे ॥ २४ ॥

**द्रोणाचार्य बोले—**राजन्! मैं फिर भी तुमसे मित्रताके लिये प्रार्थना करता हूँ। यज्ञसेन! तुमने कहा था, जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता; अतः मैंने राज्यप्राप्तिके

लिये तुम्हारे साथ युद्धका प्रयास किया है। तुम गंगाके दक्षिणतटके राजा रहो और मैं उत्तरतटका ।। २३-२४ ।।

ब्राह्मण उवाच

एवमुक्तो हि पाञ्चाल्यो भारद्वाजेन धीमता । उवाचास्त्रविदां श्रेष्ठो द्रोणं ब्राह्मणसत्तमम् ॥ २५ ॥ आगन्तुक ब्राह्मण कहता है—बुद्धिमान् भरद्वाज-नन्दन द्रोणके यों कहनेपर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पंचाल-नरेश द्रुपदने विप्रवर द्रोणसे इस प्रकार कहा— ॥ २५ ॥

एवं भवतु भद्रं ते भारद्वाज महामते । सख्यं तदेव भवतु शश्वद् यदभिमन्यसे ॥ २६ ॥ ‘महामते द्रोण! एवमस्तु, आपका कल्याण हो। आपकी जैसी राय है, उसके अनुसार हम दोनोंकी वही पुरानी मैत्री सदा बनी रहे’ ॥ २६ ॥

एवमन्योन्यमुक्त्वा तौ कृत्वा सख्यमनुत्तमम् । जग्मतुर्द्रोणपाञ्चाल्यौ यथागतमरिंदमौ ॥ २७ ॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणाचार्य और द्रुपद एक दूसरेसे उपर्युक्त बातें कहकर परम उत्तम मैत्रीभाव स्थापित करके इच्छानुसार अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २७ ॥

असत्कारः स तु महान् मुहूर्तमपि तस्य तु । नापैति हृदयाद् राज्ञो दुर्मनाः स कृशोऽभवत् ॥ २८ ॥ उस समय उनका जो महान् अपमान हुआ, वह दो घड़ीके लिये भी राजा द्रुपदके हृदयसे निकल नहीं पाया। वे मन-ही-मन बहुत दुःखी थे और उनका शरीर भी बहुत दुर्बल हो गया ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसम्भवे पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें द्रौपदीजन्मविषयक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६५ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं)

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षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

द्रुपदके यज्ञसे धृष्टद्युम्न और द्रौपदीकी उत्पत्ति

ब्राह्मण उवाच

अमर्षी द्रुपदो राजा कर्मसिद्धान् द्विजर्षभान् ।
अन्विच्छन् परिचक्राम ब्राह्मणावसथान् बहून् ॥ १ ॥
आगन्तुक ब्राह्मण कहता है— राजा द्रुपद अमर्षमें भर गये थे, अतः उन्होंने कर्मसिद्ध श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको ढूंढनेके लिये बहुत-से ब्रह्मर्षियोंके आश्रमोंमें भ्रमण किया ॥ १ ॥

पुत्रजन्म परीप्सन् वै शोकोपहतचेतनः ।
नास्ति श्रेष्ठमपत्यं मे इति नित्यमचिन्तयत् ॥ २ ॥
वे अपने लिये एक श्रेष्ठ पुत्र चाहते थे। उनका चित्त शोकसे व्याकुल रहता था। वे रात-दिन इसी चिन्तामें पड़े रहते थे कि मेरे कोई श्रेष्ठ संतान नहीं है ॥ २ ॥

जातान् पुत्रान् स निर्वेदाद् धिग् बन्धूनिति चाब्रवीत् ।
निःश्वासपरमश्चासीद् द्रोणं प्रतिचिकीर्षया ॥ ३ ॥
जो पुत्र या भाई-बन्धु उत्पन्न हो चुके थे, उन्हें वे खेदवश धिक्कारते रहते थे। द्रोणसे बदला लेनेकी इच्छा रखकर राजा द्रुपद सदा लंबी साँसें खींचा करते थे ॥ ३ ॥

प्रभावं विनयं शिक्षां द्रोणस्य चरितानि च ।
क्षात्रेण च बलेनास्य चिन्तयन् नाध्यगच्छत ॥ ४ ॥
प्रतिकर्तुं नृपश्रेष्ठो यतमानोऽपि भारत ।
अभितः सोऽथ कल्माषीं गङ्गाकूले परिभ्रमन् ॥ ५ ॥
ब्राह्मणावसथं पुण्यमाससाद महीपतिः ।
तत्र नास्नातकः कश्चिन्न चासीदव्रती द्विजः ॥ ६ ॥
जनमेजय! नृपश्रेष्ठ द्रुपद द्रोणाचार्यसे बदला लेनेके लिये यत्न करनेपर भी उनके प्रभाव, विनय, शिक्षा एवं चरित्रका चिन्तन करके क्षात्रबलके द्वारा उन्हें परास्त करनेका कोई उपाय न जान सके। वे कृष्णवर्णा यमुना तथा गंगा दोनोंके तटोंपर घूमते हुए ब्राह्मणोंकी एक पवित्र बस्तीमें जा पहुँचे। वहाँ उन महाभाग नरेशने एक भी ऐसा ब्राह्मण नहीं देखा, जिसने विधिपूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करके वेद-वेदांगकी शिक्षा न प्राप्त की हो ॥ ४–६ ॥

तथैव च महाभागः सोऽपश्यत् संशितव्रतौ ।
याजोपयाजौ ब्रह्मर्षी शाम्यन्तौ परमेष्ठिनौ ॥ ७ ॥
इस प्रकार उन महाभागने वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले दो ब्रह्मर्षियोंको देखा, जिनके नाम थे याज और उपयाज। वे दोनों ही परम शान्त और परमेष्ठी ब्रह्माके तुल्य

प्रभावशाली थे ॥ ७ ॥
संहिताध्ययने युक्तौ गोत्रतश्चापि काश्यपौ ।
तारणेयौ युक्तरूपौ ब्राह्मणावृषिसत्तमौ ॥ ८ ॥
वे वैदिक संहिताके अध्ययनमें सदा संलग्न रहते थे। उनका गोत्र काश्यप था। वे दोनों ब्राह्मण सूर्यदेवके भक्त, बड़े ही योग्य तथा श्रेष्ठ ऋषि थे ॥ ८ ॥
स तावामन्त्रयामास सर्वकामैरतन्द्रितः ।
बुद्ध्वा बलं तयोस्तत्र कनीयांसमुपह्वरे ॥ ९ ॥
प्रपेदे छन्दयन् कामैरुपयाजं धृतव्रतम् ।
पादशुश्रूषणे युक्तः प्रियवाक् सर्वकामदः ॥ १० ॥
अर्चयित्वा यथान्यायमुपयाजमुवाच सः ।
येन मे कर्मणा ब्रह्मन् पुत्रः स्याद् द्रोणमृत्यवे ॥ ११ ॥
उपयाज कृते तस्मिन् गवां दातास्मि तेऽर्बुदम् ।
यद् वा तेऽन्यद् द्विजश्रेष्ठ मनसः सुप्रियं भवेत् ।
सर्वं तत् ते प्रदाताहं न हि मेऽत्रास्ति संशयः ॥ १२ ॥
उन दोनोंकी शक्तिको समझकर आलस्यरहित राजा द्रुपदने उन्हें सम्पूर्ण मनोवांछित भोग-पदार्थ अर्पण करनेका संकल्प लेकर निमन्त्रित किया। उन दोनोंमेंसे जो छोटे उपयाज थे, वे अत्यन्त उत्तम व्रतका पालन करनेवाले थे। द्रुपद एकान्तमें उनसे मिले और इच्छानुसार भोग्य वस्तुएँ अर्पण करके उन्हें अपने अनुकूल बनानेकी चेष्टा करने लगे। सम्पूर्ण मनोभिलषित पदार्थोंको देनेकी प्रतिज्ञा करके प्रिय वचन बोलते हुए द्रुपद मुनिके चरणोंकी सेवामें लग गये और यथायोग्य पूजन करके उपयाजसे बोले—'विप्रवर उपयाज! जिस कर्मसे मुझे ऐसा पुत्र प्राप्त हो, जो द्रोणाचार्यको मार सके। उस कर्मके पूरा होनेपर मैं आपको एक अर्बुद (दस करोड़) गायें दूँगा। द्विजश्रेष्ठ! इसके सिवा और भी जो आपके मनको अत्यन्त प्रिय लगनेवाली वस्तु होगी, वह सब आपको अर्पित करूँगा, इसमें कोई संशय नहीं है' ॥ ९—१२ ॥
इत्युक्तो नाहमित्येवं तमृषिः प्रत्यभाषत ।
आराधयिष्यन् द्रुपदः स तं पर्यचरत् पुनः ॥ १३ ॥
द्रुपदके यों कहनेपर ऋषि उपयाजने उन्हें जवाब दे दिया, 'मैं ऐसा कार्य नहीं करूँगा।' परंतु द्रुपद उन्हें प्रसन्न करनेका निश्चय करके पुनः उनकी सेवामें लगे रहे ॥ १३ ॥
ततः संवत्सरस्यान्ते द्रुपदं स द्विजोत्तमः ।
उपयाजोऽब्रवीत् काले राजन् मधुरया गिरा ॥ १४ ॥
ज्येष्ठो भ्राता ममागृह्णाद् विचरन् गहने वने ।
अपरिज्ञातशौचायां भूमौ निपतितं फलम् ॥ १५ ॥

तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर द्विजश्रेष्ठ उपयाजने उपयुक्त अवसरपर मधुर वाणीमें द्रुपदसे कहा—‘राजन्! मेरे बड़े भाई याज एक समय घने वनमें विचर रहे थे। उन्होंने एक ऐसी जमीनपर गिरे हुए फलको उठा लिया, जिसकी शुद्धिके सम्बन्धमें कुछ भी पता नहीं था ॥ १४-१५ ॥

तदपश्यमहं भ्रातुरसाम्प्रतमनुव्रजन् । विमर्शं संकरादाने नायं कुर्यात् कदाचन ॥ १६ ॥ ‘मैं भी भाईके पीछे-पीछे जा रहा था; अतः मैंने उनके इस अयोग्य कार्यको देख लिया और सोचा कि ये अपवित्र वस्तुको ग्रहण करनेमें भी कभी कोई विचार नहीं करते ॥ १६ ॥

दृष्ट्वा फलस्य नापश्यद् दोषान् पापानुबन्धकान् । विविनक्ति न शौचं यः सोऽन्यत्रापि कथं भवेत् ॥ १७ ॥ ‘जिन्होंने देखकर भी फलके पापजनक दोषोंकी ओर दृष्टिपात नहीं किया, जो किसी वस्तुको लेनेमें शुद्धि-अशुद्धिका विचार नहीं करते, वे दूसरे कार्योंमें भी कैसा बर्ताव करेंगे, कहा नहीं जा सकता ॥ १७ ॥

संहिताध्ययनं कुर्वन् वसन् गुरुकुले च यः । भैक्ष्यमुत्सृष्टमन्येषां भुङ्क्ते स्म च यदा तदा ॥ १८ ॥ कीर्तयन् गुणमन्नानामघृणी च पुनः पुनः । तं वै फलार्थिनं मन्ये भ्रातरं तर्कचक्षुषा ॥ १९ ॥ ‘गुरुकुलमें रहकर संहिताभागका अध्ययन करते हुए भी जो दूसरोंकी त्यागी हुई भिक्षाको जब-तब खा लिया करते थे और घृणाशून्य होकर बार-बार उस अन्नके गुणोंका वर्णन करते रहते थे, उन अपने भाईको जब मैं तर्ककी दृष्टिसे देखता हूँ तो वे मुझे फलके लोभी जान पड़ते हैं ॥ १८-१९ ॥

तं वै गच्छस्व नृपते स त्वां संयाजयिष्यति । जुगुप्समानो नृपतिर्मनसेदं विचिन्तयन् ॥ २० ॥ उपयाजवचः श्रुत्वा याजस्याश्रममभ्यगात् । अभिसम्पूज्य पूजार्हमथ याजमुवाच ह ॥ २१ ॥ ‘राजन्! तुम उन्हींके पास जाओ। वे तुम्हारा यज्ञ करा देंगे।' राजा द्रुपद उपयाजकी बात सुनकर याजके इस चरित्रकी मन-ही-मन निन्दा करने लगे, तो भी अपने कार्यका विचार करके याजके आश्रमपर गये और पूजनीय याज मुनिका पूजन करके तब उनसे इस प्रकार बोले— ॥ २०-२१ ॥

अयुतानि ददान्यष्टौ गवां याजय मां विभो ।
द्रोणवैराभिसंतप्तं प्रह्लादयितुमर्हसि ॥ २२ ॥
'भगवन्! मैं आपको अस्सी हजार गौएँ भेंट करता हूँ। आप मेरा यज्ञ करा दीजिये। मैं द्रोणके वैरसे संतप्त हो रहा हूँ। आप मुझे प्रसन्नता प्रदान करें ।। २२ ।।
स हि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो ब्रह्मास्त्रे चाप्यनुत्तमः ।
तस्माद् द्रोणः पराजैष्ट मां वै स सखिविग्रहे ॥ २३ ॥
‘द्रोणाचार्य ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और ब्रह्मास्त्रके प्रयोगमें भी सर्वोत्तम हैं; इसलिये मित्र मानने-न-माननेके प्रश्नको लेकर होनेवाले झगड़ेमें उन्होंने मुझे पराजित कर दिया है ।। २३ ।।
क्षत्रियो नास्ति तस्यास्यां पृथिव्यां कश्चिदग्रणीः ।
कौरवाचार्यमुख्यस्य भारद्वाजस्य धीमतः ॥ २४ ॥
'परम बुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोण इन दिनों कुरुवंशी राजकुमारोंके प्रधान आचार्य हैं। इस पृथ्वीपर कोई भी ऐसा क्षत्रिय नहीं है, जो अस्त्र-विद्यामें उनसे आगे बढ़ा हो ।। २४ ।।
द्रोणस्य शरजालानि प्राणिदेहहराणि च ।
षडरत्नि धनुश्चास्य दृश्यते परमं महत् ॥ २५ ॥
स हि ब्राह्मणवेषेण क्षात्रं वेगमसंशयम् ।
प्रतिहन्ति महेष्वासो भारद्वाजो महामनाः ॥ २६ ॥

'द्रोणाचार्यके बाणसमूह प्राणियोंके शरीरका संहार करनेवाले हैं। उनका छः हाथका लंबा धनुष बहुत बड़ा दिखायी देता है। इसमें संदेह नहीं कि महान् धनुर्धर महामना द्रोण ब्राह्मण-वेशमें (अपने ब्राह्मतेजके द्वारा) क्षत्रिय-तेजको प्रतिहत कर देते हैं।। २५-२६ ।।

क्षत्रोच्छेदाय विहितो जामदग्न्य इवास्थितः ।
तस्य ह्यस्त्रबलं घोरमप्रधृष्यं नरैर्भुवि ।। २७ ।।
'मानो जमदग्निनन्दन परशुरामजीकी भाँति क्षत्रियोंका संहार करनेके लिये उनकी सृष्टि हुई है। उनका अस्त्रबल बड़ा भयंकर है। पृथ्वीके सब मनुष्य मिलकर भी उसे दबा नहीं सकते ।। २७ ।।

ब्राह्मं संधारयंस्तेजो हुताहुतिरिवानलः ।
समेत्य स दहत्याजौ क्षात्रधर्मपुरस्सरः ।। २८ ।।
'घीकी आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान वे प्रचण्ड ब्राह्मतेज धारण करते हैं और युद्धमें क्षात्रधर्मको आगे रखकर विपक्षियोंसे भिड़ंत होनेपर वे उन्हें भस्म कर डालते हैं।। २८ ।।

ब्रह्मक्षत्रे च विहिते ब्राह्मं तेजो विशिष्यते ।
सोऽहं क्षात्राद् बलाद्धीनो ब्राह्मं तेजः प्रपेदिवान् ।। २९ ।।
'यद्यपि द्रोणाचार्यमें ब्राह्मतेजके साथ-साथ क्षात्रतेज भी विद्यमान है, तथापि आपका ब्राह्मतेज उनसे बढ़कर है। मैं केवल क्षात्रबलके कारण द्रोणाचार्यसे हीन हूँ; अतः मैंने आपके ब्राह्मतेजकी शरण ली है ।। २९ ।।

द्रोणाद् विशिष्टमासाद्य भवन्तं ब्रह्मवित्तमम् ।
द्रोणान्तकमहं पुत्रं लभेयं युधि दुर्जयम् ।। ३० ।।
'आप वेदवेत्ताओंमें सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण द्रोणाचार्यसे बहुत बढ़े-चढ़े हैं। मैं आपकी शरण लेकर एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो युद्धमें दुर्जय और द्रोणाचार्यका विनाशक हो ।। ३० ।।

तत् कर्म कुरु मे याज वित्सम्यर्बुदं गवाम् ।
तथेत्युक्त्वा तु तं याजो याज्यार्थमुपकल्पयत् ।। ३१ ।।
'याजजी! मेरे इस मनोरथको पूर्ण करनेवाला यज्ञ कराइये। उसके लिये मैं आपको एक अर्बुद गौएँ दक्षिणामें दूँगा।'
तब याजने 'तथास्तु' कहकर यजमानकी अभीष्ट-सिद्धिके लिये आवश्यक यज्ञ और उसके साधनोंका स्मरण किया ।। ३१ ।।

गुर्वर्थ इति चाकाममुपयाजमचोदयत् ।
याजो द्रोणविनाशाय प्रतिजज्ञे तथा च सः ।। ३२ ।।
ततस्तस्य नरेन्द्रस्य उपयाजो महातपाः ।
आचख्यौ कर्म वैतानं तदा पुत्रफलाय वै ।। ३३ ।।