भारतकोश
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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

(स्वयंवरपर्व)

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(स्वयंवरपर्व)

त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंकी पंचालयात्रा और मार्गमें ब्राह्मणोंसे बातचीत

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते नरशार्दूला भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ।
प्रययुर्द्रौपदीं द्रष्टुं तं च देशं महोत्सवम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब वे नरश्रेष्ठ पाँचों भाई पाण्डव राजकुमारी द्रौपदी, उसके पंचालदेश और वहाँके महान् उत्सवको देखनेके लिये वहाँसे चल दिये ॥ १ ॥

ते प्रयाता नरव्याघ्राः सह मात्रा परंतपाः ।
ब्राह्मणान् ददृशुर्मार्गे गच्छतः संगतान् बहून् ॥ २ ॥
मनुष्योंमें सिंहके समान वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ यात्रा कर रहे थे। उन्होंने मार्गमें देखा, बहुत-से ब्राह्मण एक साथ जा रहे हैं ॥ २ ॥

त ऊचुर्ब्राह्मणा राजन् पाण्डवान् ब्रह्मचारिणः ।
क्व भवन्तो गमिष्यन्ति कुतो वाभ्यागता इह ॥ ३ ॥
राजन्! उन ब्रह्मचारी ब्राह्मणोंने पाण्डवोंसे पूछा—'आपलोग कहाँ जायँगे और कहाँसे आ रहे हैं?' ॥ ३ ॥

युधिष्ठिर उवाच

आगतानेकचक्रायाः सोदर्यानेकचारिणः ।
भवन्तो वै विजानन्तु सह मात्रा द्विजर्षभाः ॥ ४ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**विप्रवरो! आपलोगोंको मालूम हो कि हमलोग एक साथ विचरनेवाले सहोदर भाई हैं और अपनी माताके साथ एकचक्रा नगरीसे आ रहे हैं ॥ ४ ॥

ब्राह्मणा ऊचुः

गच्छताद्यैव पञ्चालान् द्रुपदस्य निवेशने ।
स्वयंवरो महांस्तत्र भविता सुमहाधनः ॥ ५ ॥
**ब्राह्मणोंने कहा—**आज ही पंचालदेशको चलिये। वहाँ राजा द्रुपदके दरबारमें महान् धन-धान्यसे सम्पन्न स्वयंवरका बहुत बड़ा उत्सव होनेवाला है ॥ ५ ॥

एकसार्थं प्रयाताः स्म वयं तत्रैव गामिनः । तत्र ह्यद्भुतसंकाशो भविता सुमहोत्सवः ॥ ६ ॥ हम सबलोग एक साथ चले हैं और वहीं जा रहे हैं। वहाँ अत्यन्त अद्भुत और बहुत बड़ा उत्सव होनेवाला है ॥ ६ ॥

यज्ञसेनस्य दुहिता द्रुपदस्य महात्मनः । वेदीमध्यात् समुत्पन्ना पद्मपत्रनिभेक्षणा ॥ ७ ॥ यज्ञसेन नामवाले महाराज द्रुपदके एक पुत्री है, जो यज्ञकी वेदीसे प्रकट हुई है। उसके नेत्र विकसित कमलदलके समान सुन्दर हैं ॥ ७ ॥

दर्शनीयानवद्याङ्गी सुकुमारी मनस्विनी । धृष्टद्युम्नस्य भगिनी द्रोणशत्रोः प्रतापिनः ॥ ८ ॥ उसका एक-एक अंग निर्दोष है। वह मनस्विनी सुकुमारी द्रुपदकन्या देखने ही योग्य है। द्रोणाचार्यके शत्रु प्रतापी धृष्टद्युम्नकी वह बहिन है ॥ ८ ॥

यो जातः कवची खड्गी सशरः सशरासनः । सुसमिद्धे महाबाहुः पावके पावकोपमः ॥ ९ ॥ धृष्टद्युम्न वे ही हैं, जो कवच, खड्ग, धनुष और बाणके साथ उत्पन्न हुए हैं। महाबाहु धृष्टद्युम्न प्रज्वलित अग्निसे प्रकट होनेके कारण अग्निके समान ही तेजस्वी हैं ॥ ९ ॥

स्वसा तस्यानवद्याङ्गी द्रौपदी तनुमध्यमा । नीलोत्पलसमो गन्धो यस्याः क्रोशात् प्रवाति वै ॥ १० ॥ द्रौपदी निर्दोष अंगों तथा पतली कमरवाली है और उसके शरीरसे नीलकमलके समान सुगन्ध निकलकर एक कोसतक फैलती रहती है। वह उन्हीं धृष्टद्युम्नकी बहिन है ॥ १० ॥

यज्ञसेनस्य च सुतां स्वयंवरकृतक्षणाम् । गच्छामो वै वयं द्रष्टुं तं च दिव्यं महोत्सवम् ॥ ११ ॥ यज्ञसेनकी पुत्री द्रौपदीका स्वयंवर नियत हुआ है। अतः हमलोग उस राजकुमारीको तथा उस स्वयंवरके दिव्य महोत्सवको देखनेके लिये वहाँ जा रहे हैं ॥ ११ ॥

राजानो राजपुत्राश्च यज्वानो भूरिदक्षिणाः । स्वाध्यायवन्तः शुचयो महात्मानो यतव्रताः ॥ १२ ॥ तरुणा दर्शनीयाश्च नानादेशसमागताः । महारथाः कृतास्त्राश्च समुपैष्यन्ति भूमिपाः ॥ १३ ॥ (वहाँ) कितने ही प्रचुर दक्षिणा देनेवाले, यज्ञ करनेवाले, स्वाध्यायशील, पवित्र, नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, महात्मा एवं तरुण अवस्थावाले दर्शनीय राजा और राजकुमार अनेक देशोंसे पधारेंगे। अस्त्रविद्यामें निपुण महारथी भूमिपाल भी वहाँ आयेंगे ॥ १२-१३ ॥

ते तत्र विविधान् दायान् विजयार्थं नरेश्वराः ।

प्रदास्यन्ति धनं गाश्च भक्ष्यं भोज्यं च सर्वशः ॥ १४ ॥ वे नरपतिगण अपनी-अपनी विजयके उद्देश्यसे वहाँ नाना प्रकारके उपहार, धन, गौएँ, भक्ष्य और भोज्य आदि सब प्रकारकी वस्तुएँ दान करेंगे ॥ १४ ॥

प्रतिगृह्य च तत् सर्वं दृष्ट्वा चैव स्वयंवरम् । अनुभूयोत्सवं चैव गमिष्यामो यथेप्सितम् ॥ १५ ॥ उनका वह सब दान ग्रहण कर, स्वयंवरको देखकर और उत्सवका आनन्द लेकर फिर हमलोग अपने-अपने अभीष्ट स्थानको चले जायँगे ॥ १५ ॥

नटा वैतालिकास्तत्र नर्तकाः सूतमागधाः । नियोधकाश्च देशेभ्यः समेष्यन्ति महाबलाः ॥ १६ ॥ वहाँ अनेक देशोंके नट, वैतालिक, नर्तक, सूत, मागध तथा अत्यन्त बलवान् मल्ल आयेंगे ॥ १६ ॥

एवं कौतूहलं कृत्वा दृष्ट्वा च प्रतिगृह्य च । सहास्माभिर्महात्मानः पुनः प्रतिनिवर्त्स्यथ ॥ १७ ॥ महात्माओ! इस प्रकार हमारे साथ खेल करके, तमाशा देखकर और नाना प्रकारके दान ग्रहण करके फिर आपलोग भी लौट आइयेगा ॥ १७ ॥

दर्शनीयांश्च वः सर्वान् देवरूपानवस्थितान् । समीक्ष्य कृष्णा वरयेत् संगत्यैकतमं वरम् ॥ १८ ॥ आप सब लोगोंका रूप तो देवताओंके समान है, आप सभी दर्शनीय हैं, आपलोगोंको (वहाँ उपस्थित) देखकर द्रौपदी दैवयोगसे आपमेंसे ही किसी एकको अपना वर चुन सकती है ॥ १८ ॥

अयं भ्राता तव श्रीमान् दर्शनीयो महाभुजः । नियुज्यमानो विजये संगत्या द्रविणं बहु । आहरिष्यन्नयं नूनं प्रीतिं वो वर्धयिष्यति ॥ १९ ॥ आपलोगोंके ये भाई अर्जुन तो बड़े सुन्दर और दर्शनीय हैं। इनकी भुजाएँ बहुत बड़ी हैं। इन्हें यदि विजयके कार्यमें नियुक्त कर दिया जाय, तो ये दैवात् बहुत बड़ी धनराशि जीत लाकर निश्चय ही आपलोगोंकी प्रसन्नता बढ़ायेंगे ॥ १९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

परमं भो गमिष्यामो द्रष्टुं चैव महोत्सवम् । भवद्भिः सहिताः सर्वे कन्यायास्तं स्वयंवरम् ॥ २० ॥ **युधिष्ठिर बोले—**ब्राह्मणो! हम भी द्रुपदकन्याके उस श्रेष्ठ स्वयंवर-महोत्सवको देखनेके लिये आपलोगोंके साथ चलेंगे ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि पाण्डवागमने त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें पाण्डवागमनविषयक एक सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८३ ॥

पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा

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चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंका द्रुपदकी राजधानीमें जाकर कुम्हारके यहाँ रहना, स्वयंवरसभाका वर्णन तथा धृष्टद्युम्नकी घोषणा

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ताः प्रयातास्ते पाण्डवा जनमेजय ।
राज्ञा दक्षिणपञ्चालान् द्रुपदेनाभिरक्षितान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उन ब्राह्मणोंके यों कहनेपर पाण्डवलोग (उन्हींके साथ) राजा द्रुपदके द्वारा पालित दक्षिणपांचाल देशकी ओर चले ।। १ ।।

ततस्ते सुमहात्मानं शुद्धात्मानमकल्मषम् ।
ददृशुः पाण्डवा वीरा मुनिं द्वैपायनं तदा ॥ २ ॥
तदनन्तर उन पाण्डववीरोंको मार्गमें पापरहित, शुद्ध-चित्त एवं श्रेष्ठ महात्मा द्वैपायन मुनिका दर्शन हुआ ।। २ ।।

तस्मै यथावत् सत्कारं कृत्वा तेन च सत्कृताः ।
कथान्ते चाभ्यनुज्ञाताः प्रययुर्द्रुपदक्षयम् ॥ ३ ॥
पाण्डवोंने उनका यथावत् सत्कार किया और उन्होंने पाण्डवोंका। फिर उनमें आवश्यक बातचीत हुई। वार्तालाप समाप्त होनेपर व्यासजीकी आज्ञा ले पाण्डव पुनः द्रुपदकी राजधानीकी ओर चल दिये ।। ३ ।।

पश्यन्तो रमणीयानि वनानि च सरांसि च । तत्र तत्र वसन्तश्च शनैर्जग्मुर्महारथाः ॥ ४ ॥ महारथी पाण्डव मार्गमें अनेकानेक रमणीय वन और सरोवर देखते तथा उन-उन स्थानोंमें डेरा डालते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते गये ॥ ४ ॥

स्वाध्यायवन्तः शुचयो मधुराः प्रियवादिनः । आनुपूर्व्येण सम्प्राप्ताः पञ्चालान् पाण्डुनन्दनाः ॥ ५ ॥ (प्रतिदिन) स्वाध्यायमें तत्पर रहनेवाले, पवित्र, मधुर प्रकृतिवाले तथा प्रियवादी पाण्डुकुमार इस तरह चलकर क्रमशः पांचालदेशमें जा पहुँचे ॥ ५ ॥

ते तु दृष्ट्वा पुरं तच्च स्कन्धावारं च पाण्डवाः । कुम्भकारस्य शालायां निवासं चक्रिरे तदा ॥ ६ ॥ द्रुपदके नगर और उसकी चहारदीवारीको देखकर पाण्डवोंने उस समय एक कुम्हारके घरमें अपने रहनेकी व्यवस्था की ॥ ६ ॥

तत्र भैक्षं समाजह्रुर्ब्राह्मणीं वृत्तिमाश्रिताः । तान् सम्प्राप्तांस्तथा वीराञ्जज्ञिरे न नराः क्वचित् ॥ ७ ॥ वहाँ ब्राह्मणवृत्तिका आश्रय ले वे भिक्षा माँगकर लाते (और उसीसे निर्वाह करते) थे। इस प्रकार वहाँ पहुँचे हुए पाण्डववीरोंको कहीं कोई भी मनुष्य पहचान न सके ॥ ७ ॥

यज्ञसेनस्य कामस्तु पाण्डवाय किरीटिने । कृष्णां दद्यामिति सदा न चैतद् विवृणोति सः ॥ ८ ॥

राजा द्रुपदके मनमें सदा यही इच्छा रहती थी कि मैं पाण्डुनन्दन अर्जुनके साथ द्रौपदीका ब्याह करूँ। परंतु वे अपने इस मनोभावको किसीपर प्रकट नहीं करते थे ॥ ८ ॥
सोऽन्वेषमाणः कौन्तेयं पाञ्चाल्यो जनमेजय।
दृढं धनुरनानम्यं कारयामास भारत ॥ ९ ॥
भरतवंशी जनमेजय! पांचालनरेशने कुन्तीकुमार अर्जुनको खोज निकालनेकी इच्छासे एक ऐसा दृढ़ धनुष बनवाया, जिसे दूसरा कोई झुका भी न सके ॥ ९ ॥
यन्त्रं वैहायसं चापि कारयामास कृत्रिमम्।
तेन यन्त्रेण समितं राजा लक्ष्यं चकार सः ॥ १० ॥
राजाने एक कृत्रिम आकाश-यन्त्र भी बनवाया (जो तीव्रवेगसे आकाशमें घूमता रहता था)। उस यन्त्रके छिद्रके ऊपर उन्होंने उसीके बराबरका लक्ष्य तैयार कराकर रखवा दिया। (इसके बाद उन्होंने यह घोषणा करा दी) ॥ १० ॥

द्रुपद उवाच

इदं सज्यं धनुः कृत्वा सज्जैरेभिश्च सायकैः।
अतीत्य लक्ष्यं यो वेद्धा स लब्धा मत्सुतामिति ॥ ११ ॥
द्रुपदने घोषणा की— जो वीर इस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर इन प्रस्तुत बाणोंद्वारा ही यन्त्रके छेदके भीतरसे इसे लाँघकर लक्ष्यवेध करेगा, वही मेरी पुत्रीको प्राप्त कर सकेगा ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

इति स द्रुपदो राजा स्वयंवरमघोषयत्।
तच्छ्रुत्वा पार्थिवाः सर्वे समीयुस्तत्र भारत ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार राजा द्रुपदने जब स्वयंवरकी घोषणा करा दी, तब उसे सुनकर सब राजा वहाँ उनकी राजधानीमें एकत्र होने लगे ॥ १२ ॥
ऋषयश्च महात्मानः स्वयंवरदिदृक्षवः।
दुर्योधनपुरोगाश्च सकर्णाः कुरवो नृप ॥ १३ ॥
बहुत-से महात्मा ऋषि-मुनि भी स्वयंवर देखनेके लिये आये। राजन्! दुर्योधन आदि कुरुवंशी भी कर्णके साथ वहाँ आये थे ॥ १३ ॥
ब्राह्मणाश्च महाभागा देशेभ्यः समुपागमन्।
ततोऽर्चिता राजगणा द्रुपदेन महात्मना ॥ १४ ॥
उपोपविष्टा मञ्चेषु द्रष्टुकामाः स्वयंवरम्।
ततः पौरजनाः सर्वे सागरोद्धूतनिःस्वनाः ॥ १५ ॥
भिन्न-भिन्न देशोंसे कितने ही महाभाग ब्राह्मणोंने भी पदार्पण किया था। महामना राजा द्रुपदने (वहाँ पधारे हुए) नरपतियोंका भलीभाँति स्वागत-सत्कार एवं सेवा-पूजा की।

तत्पश्चात् वे सभी नरेश स्वयंवर देखनेकी इच्छासे वहाँ रखे हुए मंचोंपर बैठे। उस नगरके समस्त निवासी भी यथास्थान आकर बैठ गये। उन सबका कोलाहल क्षुब्ध हुए समुद्रके भयंकर गर्जनके समान सुनायी पड़ता था ॥ १४-१५ ॥

शिशुमारशिरः प्राप्य न्यविशंस्ते स्म पार्थिवाः ।
प्रागुत्तरेण नगराद् भूमिभागे समे शुभे ॥
समाजवाटः शुशुभे भवनैः सर्वतो वृतः ॥ १६ ॥
वहाँकी बैठक शिशुमारकी आकृतिमें सजायी गयी थी। शिशुमारके शिरोभागमें सब राजा अपने-अपने मंचोंपर बैठे थे। नगरसे ईशानकोणमें सुन्दर एवं समतल भूमिपर स्वयंवरसभाका रंगमण्डप सजाया गया था, जो सब ओरसे सुन्दर भवनोंद्वारा घिरा होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहा था ॥ १६ ॥

प्राकारपरिखोपेतो द्वारतोरणमण्डितः ।
वितानेन विचित्रेण सर्वतः समलंकृतः ॥ १७ ॥
उसके सब ओर चहारदीवारी और खाई बनी थीं। अनेक फाटक और दरवाजे उस मण्डपकी शोभा बढ़ा रहे थे। विचित्र चंदोवेसे उस सभाभवनको सब ओरसे सजाया गया था ॥ १७ ॥

तूर्यौघशतसंकीर्णः पराग्र्यागुरुधूपितः ।
चन्दनोदकसिक्तश्च माल्यदामोपशोभितः ॥ १८ ॥
वहाँ सैकड़ों प्रकारके बाजे बज रहे थे। बहुमूल्य अगुरुधूपकी सुगन्ध चारों ओर फैल रही थी। फर्शपर चन्दनके जलका छिड़काव किया गया था। सब ओर फूलोंकी मालाएँ और हार टँगे थे, जिससे वहाँकी शोभा बहुत बढ़ गयी थी ॥ १८ ॥

कैलासशिखरप्रख्यैर्नभस्तलविलेखिभिः ।
सर्वतः संवृतः शुभ्रैः प्रासादैः सुकृतोच्छ्रयैः ॥ १९ ॥
उस रंगमण्डपके चारों ओर कैलासशिखरके समान ऊँचे और श्वेत रंगके गगनचुम्बी महल बने हुए थे ॥ १९ ॥

सुवर्णजालसंवीतैर्मणिकुट्टिमभूषणैः ।
सुखारोहणसोपानैर्महासनपरिच्छदैः ॥ २० ॥
उन्हें भीतरसे सोनेके जालीदार पर्दों और झालरोंसे सजाया गया था। फर्श और दीवारोंमें मणि एवं रत्न जड़े गये थे। उत्तम सुखपूर्वक चढ़नेयोग्य सीढ़ियाँ बनी थीं। बड़े-बड़े आसन और बिछावन आदि बिछाये गये थे ॥ २० ॥

स्रग्दामसमवच्छन्नैरगुरूत्तमवासितैः ।
हंसांशुवर्णैर्बहुभिरायोजनसुगन्धिभिः ॥ २१ ॥
अनेक प्रकारकी मालाएँ और हार उन भवनोंकी शोभा बढ़ा रहे थे। अगुरुकी सुगन्ध छा रही थी। वे हंस और चन्द्रमाकी किरणोंके समान श्वेत दिखायी देते थे। उनके भीतरसे

निकली हुई धूपकी सुगन्ध चारों ओर एक योजनतक फैल रही थी ॥ २१ ॥

असम्बाधशतद्वारैः शयनासनशोभितैः ।

बहुधा तु पिनद्धाङ्गैर्हिमवच्छिखरैरिव ॥ २२ ॥

उन महलोंमें सैकड़ों दरवाजे थे। उनके भीतर आने-जानेके लिये बिलकुल रोक-टोक

नहीं थी और वे भाँति-भाँतिकी शय्याओं तथा आसनोंसे सुशोभित थे। उनकी दीवारोंको

अनेक प्रकारकी धातुओंके रंगोंसे रँगा गया था। अतः वे राजमहल हिमालयके बहुरंगे

शिखरोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ २२ ॥

तत्र नानाप्रकारेषु विमानेषु स्वलंकृताः ।

स्पर्धमानास्तदान्योन्यं निषेदुः सर्वपार्थिवाः ॥ २३ ॥

उन्हीं सतमहले मकानों या विमानोंमें, जो अनेक प्रकारके बने हुए थे, सब राजालोग

परस्पर एक-दूसरेसे होड़ रखते हुए सुन्दर-से-सुन्दर शृंगार धारण करके बैठे ॥ २३ ॥

तत्रोपविष्टान् ददृशुर्महासत्त्वपराक्रमान् ।

राजसिंहान् महाभागान् कृष्णागुरुविभूषितान् ॥ २४ ॥

महाप्रसादान् ब्रह्मण्यन् स्वराष्ट्रपरिरक्षिणः ।

प्रियान् सर्वस्य लोकस्य सुकृतैः कर्मभिः शुभैः ॥ २५ ॥

मञ्चेषु च पराग्र्येषु पौरजानपदा जनाः ।

कृष्णादर्शनसिद्धयर्थं सर्वतः समुपाविशन् ॥ २६ ॥

नगर और जनपदके लोगोंने जब देखा कि उक्त विमानोंमें बहुमूल्य मंचोंके ऊपर महान्

बल और पराक्रमसे सम्पन्न परम सौभाग्यशाली, कालागुरुसे विभूषित, महान् कृपाप्रसादसे

युक्त, ब्राह्मणभक्त, अपने-अपने राष्ट्रके रक्षक और शुभ पुण्यकर्मोंके प्रभावसे सम्पूर्ण

जगत्के प्रिय श्रेष्ठ नरपतिगण आकर बैठ गये हैं, तब राजकुमारी द्रौपदीके दर्शनका लाभ

लेनेके लिये वे भी सब ओर सुखपूर्वक जा बैठे ॥ २४—२६ ॥

ब्राह्मणैस्ते च सहिताः पाण्डवाः समुपाविशन् ।

ऋद्धिं पाञ्चालराजस्य पश्यन्तस्तामनुत्तमाम् ॥ २७ ॥

वे पाण्डव भी पांचालनरेशकी उस सर्वोत्तम समृद्धिका अवलोकन करते हुए ब्राह्मणोंके

साथ उन्हींकी पंक्तिमें बैठे थे ॥ २७ ॥

ततः समाजो ववृधे स राजन् दिवसान् बहून् ।

रत्नप्रदानबहुलः शोभितो नटनर्तकैः ॥ २८ ॥

राजन्! नगरमें बहुत दिनोंसे लोगोंकी भीड़ बढ़ रही थी। राजसमाजके द्वारा प्रचुर धन-

रत्नोंका दान किया जा रहा था। बहुतेरे नट और नर्तक अपनी कला दिखाकर उस

समाजकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ २८ ॥

वर्तमाने समाजे तु रमणीयेऽह्नि षोडशे ।

आप्लुताङ्गी सुवसना सर्वाभरणभूषिता ॥ २९ ॥

मालां च समुपादाय काञ्चनीं समलंकृताम् । अवतीर्णा ततो रङ्गं द्रौपदी भरतर्षभ ।। ३० ।। सोलहवें दिन अत्यन्त मनोहर समाज जुटा। भरतश्रेष्ठ! उसी दिन स्नान करके सुन्दर वस्त्र और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो हाथोंमें सोनेकी बनी हुई कामदार जयमाला लिये द्रुपदराजकुमारी उस रंग-भूमिमें उतरी ।। २९-३० ।। पुरोहितः सोमकानां मन्त्रविद् ब्राह्मणः शुचिः । परिस्तीर्य जुहावाग्निमाज्येन विधिवत् तदा ।। ३१ ।। तब सोमवंशी क्षत्रियोंके पवित्र एवं मन्त्रज्ञ ब्राह्मण पुरोहितने अग्निवेदीके चारों ओर कुशा बिछाकर वेदोक्त विधिके अनुसार प्रज्वलित अग्निमें घीकी आहुति डाली ।। ३१ ।। संतर्पयित्वा ज्वलनं ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च । वारयामास सर्वाणि वादित्राणि समन्ततः ।। ३२ ।। इस प्रकार अग्निदेवको तृप्त करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर चारों ओर बजनेवाले सब प्रकारके बाजे बंद करा दिये गये ।। ३२ ।। निःशब्दे तु कृते तस्मिन् धृष्टद्युम्नो विशाम्पते । कृष्णामादाय विधिवन्मेघदुन्दुभिनिःस्वनः ।। ३३ ।। रङ्गमध्ये गतस्तत्र मेघगम्भीरया गिरा । वाक्यमुच्चैर्जगादेदं श्लक्ष्णमर्थवदुत्तमम् ।। ३४ ।। महाराज! बाजोंकी आवाज बंद हो जानेपर जब स्वयंवरसभामें सन्नाटा छा गया, तब विधिके अनुसार धृष्टद्युम्न द्रौपदीको (साथ) लेकर रंगमण्डपके बीचमें खड़ा हो मेघ और दुन्दुभिके समान स्वर तथा मेघ-गर्जनकी-सी गम्भीर वाणीमें यह अर्थयुक्त उत्तम एवं मधुर वचन बोला— ।। ३३-३४ ।।

इदं धनुर्लक्ष्यमिमे च बाणाः शृण्वन्तु मे भूपतयः समेताः । छिद्रेण यन्त्रस्य समर्पयध्वं शरैः शितैर्व्योमचरैर्दशार्धैः ॥ ३५ ॥

'यहाँ आये हुए भूपालगण! आपलोग (ध्यान देकर) मेरी बात सुनें। यह धनुष है, ये बाण हैं और यह निशाना है। आपलोग आकाशमें छोड़े हुए पाँच पैने बाणोंद्वारा उस यन्त्रके छेदके भीतरसे लक्ष्यको बेधकर गिरा दें ॥ ३५ ॥

एतन्महत् कर्म करोति यो वै कुलेन रूपेण बलेन युक्तः । तस्याद्य भार्या भगिनी ममेयं कृष्णा भवित्री न मृषा ब्रवीमि ॥ ३६ ॥

'मैं सच कहता हूँ, झूठ नहीं बोलता—जो उत्तम कुल, सुन्दर रूप और श्रेष्ठ बलसे सम्पन्न वीर यह महान् कर्म कर दिखायेगा, आज यह मेरी बहिन कृष्णा उसीकी धर्मपत्नी होगी' ॥ ३६ ॥

तानेवमुक्त्वा द्रुपदस्य पुत्रः पश्चादिदं तां भगिनीमुवाच । नाम्ना च गोत्रेण च कर्मणा च संकीर्तयन् भूमिपतीन् समेतान् ॥ ३७ ॥

यों कहकर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने वहाँ आये हुए राजाओंके नाम, गोत्र और पराक्रमका वर्णन करते हुए अपनी बहिन द्रौपदीसे इस प्रकार कहा ।। ३७ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि धृष्टद्युम्नवाक्ये चतुरशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १८४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें धृष्टद्युम्नवाक्यविषयक एक सौ चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १८४ ।।

१८५-

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पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

धृष्टद्युम्नका द्रौपदीको स्वयंवरमें आये हुए राजाओंका परिचय देना

धृष्टद्युम्न उवाच

दुर्योधनो दुर्विषहो दुर्मुखो दुष्प्रधर्षणः ।
विविंशतिर्विकर्णश्च सहो दुःशासनस्तथा ॥ १ ॥
युयुत्सुर्वायुवेगश्च भीमवेगरवस्तथा ।
उग्रायुधो बलाकी च करकायुर्विरोचनः ॥ २ ॥
कुण्डकश्चित्रसेनश्च सुवर्चाः कनकध्वजः ।
नन्दको बाहुशाली च तुहुण्डो विकटस्तथा ॥ ३ ॥
एते चान्ये च बहवो धार्तराष्ट्रा महाबलाः ।
कर्णेन सहिता वीरास्त्वदर्थं समुपागताः ॥ ४ ॥

**धृष्टद्युम्नने कहा—**बहिन! यह देखो—दुर्योधन, दुर्विषह, दुर्मुख, दुष्प्रधर्षण, विविंशति, विकर्ण, सह, दुःशासन, युयुत्सु, वायुवेग, भीमवेगरव, उग्रायुध, बलाकी, करकायु, विरोचन, कुण्डक, चित्रसेन, सुवर्चा, कनकध्वज, नन्दक, बाहुशाली, तुहुण्ड तथा विकट—ये और दूसरे भी बहुत-से महाबली धृतराष्ट्रपुत्र जो सब-के-सब वीर हैं, तुम्हें प्राप्त करनेके लिये कर्णके साथ यहाँ पधारे हैं ॥ १—४ ॥

असंख्याता महात्मानः पार्थिवाः क्षत्रियर्षभाः ।
शकुनिः सौबलश्चैव वृषकोऽथ बृहद्वलः ॥ ५ ॥
एते गान्धारराजस्य सुताः सर्वे समागताः ।
अश्वत्थामा च भोजश्च सर्वशस्त्रभृतां वरौ ॥ ६ ॥
समवेतौ महात्मानौ त्वदर्थे समलंकृतौ ।
बृहन्तो मणिमांश्चैव दण्डधारश्च पार्थिवः ॥ ७ ॥
सहदेवजयत्सेनौ मेघसंधिश्च पार्थिवः ।
विराटः सह पुत्राभ्यां शङ्खेनैवोत्तरेण च ॥ ८ ॥
वार्द्धक्षेमिः सुशर्मा च सेनाबिन्दुश्च पार्थिवः ।
सुकेतुः सह पुत्रेण सुनाम्ना च सुवर्चसा ॥ ९ ॥
सुचित्रः सुकुमारश्च वृकः सत्यधृतिस्तथा ।
सूर्यध्वजो रोचमानो नीलश्चित्रायुधस्तथा ॥ १० ॥
अंशुमांश्चेकितानश्च श्रेणिमांश्च महाबलः ।

समुद्रसेनपुत्रश्च चन्द्रसेनः प्रतापवान् ॥ ११ ॥ जलसंधः पितापुत्रौ विदण्डो दण्ड एव च । पौण्ड्रको वासुदेवश्च भगदत्तश्च वीर्यवान् ॥ १२ ॥ कालिङ्गस्ताम्रलिप्तश्च पत्तनाधिपतिस्तथा । मद्रराजस्तथा शल्यः सहपुत्रो महारथः ॥ १३ ॥ रुक्माङ्गदेन वीरेण तथा रुक्मरथेन च । कौरव्यः सोमदत्तश्च पुत्राश्चास्य महारथाः ॥ १४ ॥ समवेतास्त्रयः शूरा भूरिभूरिश्रवाः शलः । सुदक्षिणश्च काम्बोजो दृढधन्वा च पौरवः ॥ १५ ॥ इनके सिवा और भी असंख्य महामना क्षत्रियशिरोमणि भूमिपाल यहाँ आये हैं। उधर देखो, गान्धारराज सुबलके पुत्र शकुनि, वृषक और बृहद्वल बैठे हैं। गान्धारराजके ये सभी पुत्र यहाँ पधारे हैं। अश्वत्थामा और भोज—ये दोनों महान् तेजस्वी और सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं और तुम्हारे लिये गहने-कपड़ोंसे सज-धजकर यहाँ आये हैं। राजा बृहन्त, मणिमान्, दण्डधार, सहदेव, जयत्सेन, राजा मेघसंधि, अपने दोनों पुत्रों शंख और उत्तरके साथ राजा विराट, वृद्धक्षेमके पुत्र सुशर्मा, राजा सेनाबिन्दु, सुकेतु और उनके पुत्र सुवर्चा, सुचित्र, सुकुमार, वृक, सत्यधृति, सूर्यध्वज, रोचमान, नील, चित्रायुध, अंशुमान्, चेकितान, महाबली श्रेणिमान्, समुद्रसेनके प्रतापी पुत्र चन्द्रसेन, जलसंध, विदण्ड और उनके पुत्र दण्ड, पौण्ड्रक वासुदेव, पराक्रमी भगदत्त, कलिंगनरेश ताम्रलिप्तनरेश, पाटनके राजा, अपने दो पुत्रों वीर रुक्मांगद तथा रुक्मरथके साथ महारथी मद्रराज शल्य, कुरुवंशी सोमदत्त तथा उनके तीन महारथी शूरवीर पुत्र भूरि, भूरिश्रवा और शल, काम्बोजदेशीय सुदक्षिण, पूरुवंशी दृढधन्वा ॥ ५—१५ ॥ बृहद्वलः सुषेणश्च शिबिरौशीनरस्तथा । पटच्चरनिहन्ता च कारूषाधिपतिस्तथा ॥ १६ ॥ संकर्षणो वासुदेवो रौक्मिणेयश्च वीर्यवान् । साम्बश्च चारुदेष्णश्च प्रद्युम्निः सगदस्तथा ॥ १७ ॥ अक्रूरः सात्यकिश्चैव उद्धवश्च महामतिः । कृतकर्मा च हार्दिक्यः पृथुर्विपृथुरेव च ॥ १८ ॥ विदूरथश्च कङ्कश्च शङ्कुश्च सगवेषणः । आशावहोऽनिरुद्धश्च शमीकः सारिमेजयः ॥ १९ ॥ वीरो वातपतिश्चैव झिल्लीपिण्डारकस्तथा । उशीनरश्च विक्रान्तो वृष्णयस्ते प्रकीर्तिताः ॥ २० ॥ महाबली सुषेण, उशीनरदेशीय शिबि तथा चोर-डाकुओंको मार डालनेवाले कारूषाधिपति भी यहाँ आये हैं। इधर संकर्षण, वासुदेव, (भगवान् श्रीकृष्ण)

रुक्मिणीनन्दन पराक्रमी प्रद्युम्न, साम्ब, चारुदेष्ण, प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्ध, श्रीकृष्णके बड़े भाई गद, अक्रूर, सात्यकि, परम बुद्धिमान् उद्धव, हृदिकपुत्र कृतकर्मा, पृथु, विपृथु, विदूरथ, कंक, शंकु, गवेषण, आशावह, अनिरुद्ध, शमीक, सारिमेजय, वीर, वातपति, झिल्लीपिण्डारक तथा पराक्रमी उशीनर—ये सब वृष्णिवंशी कहे गये हैं ॥ १६—२० ॥

भागीरथो बृहत्क्षत्रः सैन्धवश्च जयद्रथः ।
बृहद्रथो बाह्लिकश्च श्रुतायुश्च महारथः ॥ २१ ॥
उलूकः कैतवो राजा चित्राङ्गदशुभाङ्गदौ ।
वत्सराजश्च मतिमान् कोसलाधिपतिस्तथा ॥ २२ ॥
शिशुपालश्च विक्रान्तो जरासंधस्तथैव च ।
एते चान्ये च बहवो नानाजनपदेश्वराः ॥ २३ ॥
त्वदर्थमागता भद्रे क्षत्रियाः प्रथिता भुवि ।
एते भेत्स्यन्ति विक्रान्तास्त्वदर्थे लक्ष्यमुत्तमम् ।
विध्येत य इदं लक्ष्यं वरयेथाः शुभेऽद्य तम् ॥ २४ ॥

भगीरथवंशी बृहत्क्षत्र, सिन्धुराज जयद्रथ, बृहद्रथ, बाह्लीक, महारथी श्रुतायु, उलूक, राजा कैतव, चित्रांगद, शुभांगद, बुद्धिमान् वत्सराज, कोसलनरेश, पराक्रमी शिशुपाल तथा जरासंध—ये तथा और भी अनेक जनपदोंके शासक भूमण्डलमें विख्यात बहुत-से क्षत्रिय वीर तुम्हारे लिये यहाँ पधारे हैं। भद्रे! ये पराक्रमी नरेश तुम्हें पानेके उद्देश्यसे इस उत्तम लक्ष्यका भेदन करेंगे। शुभे! जो इस निशानेको वेध डाले, उसीका आज तुम वरण करना ॥ २१—२४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि राजनामकीर्तने
पञ्चाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत, आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें राजाओंके नामका परिचयविषयक एक सौ पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८५ ॥

१८६-

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षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

राजाओंका लक्ष्यवेधके लिये उद्योग और असफल होना

वैशम्पायन उवाच

तेऽलंकृताः कुण्डलिनो युवानः
परस्परं स्पर्धमाना नरेन्द्राः ।
अस्त्रं बलं चात्मनि मन्यमानाः
सर्वे समुत्पेतुरुदायुधास्ते ॥ १ ॥
रूपेण वीर्येण कुलेन चैव
शीलेन वित्तेन च यौवनेन ।
समिद्धदर्पा मदवेगभिन्ना
मत्ता यथा हैमवता गजेन्द्राः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वे सब नवयुवक राजा अनेक आभूषणोंसे विभूषित हो कानोंमें कुण्डल पहने और परस्पर लाग-डाँट रखते हुए हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये अपने-अपने आसनोंसे उठने लगे। उन्हें अपनेमें ही सबसे अधिक अस्त्रविद्या और बलके होनेका अभिमान था; सभीको अपने रूप, पराक्रम, कुल, शील, धन और जवानीका बड़ा घमंड था। वे सभी मस्तकसे वेगपूर्वक मदकी धारा बहानेवाले हिमाचल-प्रदेशके गजराजोंकी भाँति उन्मत्त हो रहे थे ॥ १-२ ॥

परस्परं स्पर्धया प्रेक्षमाणाः
संकल्पजेनाभिपरिप्लुताङ्गाः ।
कृष्णा ममैवेत्यभिभाषमाणा
नृपासनेभ्यः सहसोदतिष्ठन् ॥ ३ ॥

वे एक-दूसरेको बड़ी स्पर्धासे देख रहे थे। उनके सभी अंगोंमें कामोन्माद व्याप्त हो रहा था। 'कृष्णा तो मेरी ही होनेवाली है' यह कहते हुए वे अपने राजोचित आसनोंसे सहसा उठकर खड़े हो गये ॥ ३ ॥

ते क्षत्रिया रङ्गगताः समेता
जिगीषमाणा द्रुपदात्मजां ताम् ।
चकाशिरे पर्वतराजकन्या-
मुमां यथा देवगणाः समेताः ॥ ४ ॥

द्रुपदकुमारीको पानेकी इच्छासे रंगमण्डपमें एकत्र हुए वे क्षत्रियनरेश गिरिराजनन्दिनी उमाके विवाहमें इकट्ठे हुए देवताओंकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ ४ ॥

कन्दर्पबाणाभिनिपीडिताङ्गाः

कृष्णागतैस्ते हृदयैनरिन्द्राः । रङ्गावतीर्णा द्रुपदात्मजार्थं द्वेषं प्रचक्रुः सुहृदोऽपि तत्र ॥ ५ ॥ कामदेवके बाणोंकी चोटसे उनके सभी अंगोंमें निरन्तर पीड़ा हो रही थी। उनका मन द्रौपदीमें ही लगा हुआ था। द्रुपदकुमारीको पानेके लिये रंगभूमिमें उतरे हुए वे सभी नरेश वहाँ अपने सुहृद् राजाओंसे भी ईर्ष्या करने लगे ॥ ५ ॥

अथायुर्देवगणा विमानै रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च । साध्याश्च सर्वे मरुतस्तथैव यमं पुरस्कृत्य धनेश्वरं च ॥ ६ ॥ इसी समय रुद्र, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, समस्त साध्यगण तथा मरुद्गण यमराज और कुबेरको आगे करके अपने-अपने विमानोंपर बैठकर वहाँ आये ॥ ६ ॥

दैत्याः सुपर्णाश्च महोरगाश्च देवर्षयो गुह्यकाश्चारणाश्च । विश्वावसुर्नारदपर्वतौ च गन्धर्वमुख्याः सहसाप्सरोभिः ॥ ७ ॥ दैत्य, सुपर्ण, नाग, देवर्षि, गुह्यक, चारण तथा विश्वावसु, नारद और पर्वत आदि प्रधान-प्रधान गन्धर्व भी अप्सराओंको साथ लिये सहसा आकाशमें उपस्थित हो गये ॥ ७ ॥

हलायुधस्तत्र जनार्दनश्च वृष्ण्यन्धकाश्चैव यथाप्रधानम् । प्रेक्षां स्म चक्रुर्यदुपुङ्गवास्ते स्थिताश्च कृष्णस्य मते महान्तः ॥ ८ ॥ (अन्य राजालोग द्रौपदीकी प्राप्तिके लिये लक्ष्य बेधनेके विचारमें पड़े थे, किंतु) भगवान् श्रीकृष्णकी सम्मतिके अनुसार चलनेवाले महान् यदुश्रेष्ठ, जिनमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि वृष्णि और अन्धक वंशके प्रमुख व्यक्ति वहाँ उपस्थित थे, चुपचाप अपनी जगहपर बैठे-बैठे देख रहे थे ॥ ८ ॥

दृष्ट्वा तु तान् मत्तगजेन्द्ररूपान् पञ्चाभिपद्मानिव वारेणेन्द्रान् । भस्मावृताङ्गानिव हव्यवाहान् कृष्णः प्रदध्यौ यदुवीरमुख्यः ॥ ९ ॥ यदुवंशी वीरोंके प्रधान नेता श्रीकृष्णने लक्ष्मीके सम्मुख विराजमान गजराजों तथा राखमें छिपी हुई आगके समान मतवाले हाथीकी-सी आकृतिवाले पाण्डवोंको, जो अपने सब अंगोंमें भस्म लपेटे हुए थे, देखकर (तुरंत) पहचान लिया ॥ ९ ॥

शशंस रामाय युधिष्ठिरं स भीमं सजिष्णुं च यमौ च वीरौ । शनैः शनैस्तान् प्रसमीक्ष्य रामो जनार्दनं प्रीतमना ददर्श ह ॥ १० ॥ और बलरामजीसे धीरे-धीरे कहा—‘भैया! वह देखिये, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और दोनों जुड़वे वीर नकुल-सहदेव उधर बैठे हैं।' बलरामजीने उन्हें देखकर अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो भगवान् श्रीकृष्णकी ओर दृष्टिपात किया ॥ १० ॥

अन्ये तु वीरा नृपपुत्रपौत्राः कृष्णागतैर्नेत्रमनःस्वभावैः । व्यायच्छमाना ददृशुर्न तान् वै संदष्टदन्तच्छदताम्रनेत्राः ॥ ११ ॥ दूसरे-दूसरे वीर राजा, राजकुमार एवं राजाओंके पौत्र अपने नेत्रों, मन और स्वभावको द्रौपदीकी ओर लगाकर उसीको देख रहे थे, अतः पाण्डवोंकी ओर उनकी दृष्टि नहीं गयी। वे जोशमें आकर दाँतोंसे ओठ चबा रहे थे और रोषसे उनकी आँखें लाल हो रही थीं ॥ ११ ॥

तथैव पार्थाः पृथुबाहवस्ते वीरौ यमौ चैव महानुभावौ । तां द्रौपदीं प्रेक्ष्य तदा स्म सर्वे कन्दर्पबाणाभिहता बभूवुः ॥ १२ ॥ इसी प्रकार वे महाबाहु कुन्तीपुत्र तथा दोनों महानुभाव वीर नकुल-सहदेव सब-के-सब द्रौपदीको देखकर तुरंत कामदेवके बाणोंसे घायल हो गये ॥ १२ ॥

देवर्षिगन्धर्वसमाकुलं तत् सुपर्णनागासुरसिद्धजुष्टम् । दिव्येन गन्धेन समाकुलं च दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणम् ॥ १३ ॥ राजन्! उस समय वहाँका आकाश देवर्षियों तथा गन्धर्वोंसे खचाखच भरा था। सुपर्ण, नाग, असुर और सिद्धोंका समुदाय वहाँ जुट गया था। सब ओर दिव्य सुगन्ध व्याप्त हो रही थी और दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की जा रही थी ॥ १३ ॥

महास्वनैर्दुन्दुभिनादितैश्च बभूव तत् संकुलमन्तरिक्षम् । विमानसम्बाधमभूत् समन्तात् सवेणुवीणापणवानुनादम् ॥ १४ ॥ बृहत् शब्द करनेवाली दुन्दुभियोंके नादसे सारा अन्तरिक्ष गूँज उठा था। चारों ओरका आकाश विमानोंसे ठसाठस भरा था और वहाँ बाँसुरी, वीणा तथा ढोलकी मधुर ध्वनि हो

रही थी ॥ १४ ॥ ततस्तु ते राजगणाः क्रमेण कृष्णानिमित्तं कृतविक्रमाश्च । सकर्णदुर्योधनशाल्वशल्य- द्रौणायनिक्राथसुनीथवक्राः ॥ १५ ॥ कलिङ्गवङ्गाधिपपाण्ड्यपौण्ड्रा विदेहराजो यवनाधिपश्च । अन्ये च नानान्नृपपुत्रपौत्रा राष्ट्राधिपाः पङ्कजपत्रनेत्राः ॥ १६ ॥ किरीटहाराङ्गदचक्रवालै- र्विभूषिताङ्गाः पृथुबाहवस्ते । अनुक्रमं विक्रमसत्त्वयुक्ता बलेन वीर्येण च नर्दमानाः ॥ १७ ॥ तदनन्तर वे नृपतिगण द्रौपदीके लिये क्रमशः अपना पराक्रम प्रकट करने लगे। कर्ण, दुर्योधन, शाल्व, शल्य, अश्वत्थामा, क्राथ, सुनीथ, वक्र, कलिंगराज, वंगनरेश, पाण्ड्यनरेश, पौण्ड्र देशके अधिपति, विदेहके राजा, यवनदेशके अधिपति तथा अन्यान्य अनेक राष्ट्रोंके स्वामी, बहुतेरे राजा, राजपुत्र तथा राजपौत्र, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलपत्रके समान शोभा पा रहे थे, जिनके विभिन्न अंगोंमें किरीट, हार, अंगद (बाजूबंद) तथा कड़े आदि आभूषण शोभा दे रहे थे तथा जिनकी भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं, वे सब-के-सब पराक्रमी और धैर्यसे युक्त हो अपने बल और शक्तिपर गर्जते हुए क्रमशः उस धनुषपर अपना बल दिखाने लगे ॥ १५—१७ ॥

तत् कार्मुकं संहननोपपन्नं सज्यं न शेकुर्मनसापि कर्तुम् । ते विक्रमन्तः स्फुरता दृढेन विक्षिप्यमाणा धनुषा नरेन्द्राः ॥ १८ ॥ विचेष्टमाना धरणीतलस्था यथाबलं शैक्ष्यगुणक्रमाश्च । गतौजसः स्रस्तकिरीटहारा विनिःश्वसन्तः शमयाम्बभूवुः ॥ १९ ॥ परंतु वे उस सुदृढ़ धनुषपर हाथसे कौन कहे, मनसे भी प्रत्यंचा न चढ़ा सके। अपने बल, शिक्षा और गुणके अनुसार उसपर जोर लगाते समय वे सभी नरेन्द्र उस सुदृढ़ एवं चमचमाते हुए धनुषके झटकेसे दूर फेंक दिये जाते और लड़खड़ाकर धरतीपर जा गिरते

थे। फिर तो उनका उत्साह समाप्त हो जाता, किरीट और हार खिसककर गिर जाते और वे लंबी साँसें खींचते हुए शान्त होकर बैठ जाते थे॥ १८-१९॥
हाहाकृतं तद् धनुषा दृढेन
विस्रस्तहाराङ्गदचक्रवालम् ।
कृष्णानिमित्तं विनिवृत्तकामं
राज्ञां तदा मण्डलमार्तमासीत् ॥ २० ॥
उस सुदृढ़ धनुषके झटकेसे जिनके हार, बाजूबंद और कड़े आदि आभूषण दूर जा गिरे थे, वे नरेश उस समय द्रौपदीको पानेकी आशा छोड़कर अत्यन्त व्यथित हो हाहाकार कर उठे॥ २०॥
सर्वान् नृपांस्तान् प्रसमीक्ष्य कर्णो
धनुर्धराणां प्रवरो जगाम ।
उद्धृत्य तूर्णं धनुरुद्यतं तत्
सज्यं चकाराशु युयोज बाणान् ॥ २१ ॥
उन सब राजाओंकी यह अवस्था देख धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण उस धनुषके पास गया और तुरंत ही उसे उठाकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी तथा शीघ्र ही उस धनुषपर वे पाँचों बाण जोड़ दिये*॥ २१॥
दृष्ट्वा सूतं मेनिरे पाण्डुपुत्रा
भित्त्वा नीतं लक्ष्यवरं धरायाम् ।
धनुर्धरा रागकृतप्रतिज्ञ-
मत्यग्निसोमार्कमथार्कपुत्रम् ॥ २२ ॥
अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यसे भी अधिक तेजस्वी सूर्यपुत्र कर्ण द्रौपदीके प्रति आसक्त होनेके कारण जब लक्ष्य भेदनेकी प्रतिज्ञा करके उठा, तब उसे देखकर महाधनुर्धर पाण्डवोंने यह विश्वास कर लिया कि अब यह इस उत्तम लक्ष्यको भेदकर पृथ्वीपर गिरा देगा॥ २२॥
दृष्ट्वा तु तं द्रौपदी वाक्यमुच्चै-
र्जगाद नाहं वरयामि सूतम् ।
सामर्षहासं प्रसमीक्ष्य सूर्यं
तत्याज कर्णः स्फुरितं धनुस्तत् ॥ २३ ॥
कर्णको देखकर द्रौपदीने उच्च स्वरसे यह बात कही—'मैं सूत जातिके पुरुषका वरण नहीं करूँगी।' यह सुनकर कर्णने अमर्षयुक्त हँसीके साथ भगवान् सूर्यकी ओर देखा और उस प्रकाशमान धनुषको डाल दिया॥ २३॥
एवं तेषु निवृत्तेषु क्षत्रियेषु समन्ततः ।
चेदीनामधिपो वीरो बलवानन्तकोपमः ॥ २४ ॥