भारतकोश
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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

रक्ष्यतां सौहृदं तस्मादन्योन्यप्रीतिभावकम् ।
यथा वो नात्र भेदः स्यात् तत् कुरुष्व युधिष्ठिर ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर! इसलिये आपसकी प्रीतिका बढ़ानेवाले सौहार्दकी रक्षा करो और ऐसा कोई नियम बनाओ, जिससे यहाँ तुमलोगोंमें वैर-विरोध न हो ॥ २१ ॥

युधिष्ठिर उवाच

सुन्दोपसुन्दावसुरौ कस्य पुत्रौ महामुने ।
उत्पन्नश्च कथं भेदः कथं चान्योन्यमघ्नताम् ॥ २२ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**महामुने! सुन्द और उपसुन्द नामक असुर किसके पुत्र थे? उनमें कैसे विरोध उत्पन्न हुआ और किस प्रकार उन्होंने एक-दूसरेको मार डाला? ॥ २२ ॥

अप्सरा देवकन्या वा कस्य चैषा तिलोत्तमा ।
यस्याः कामेन सम्मत्तौ जघ्नतुस्तौ परस्परम् ॥ २३ ॥
यह तिलोत्तमा अप्सरा थी? किसी देवताकी कन्या थी? तथा वह किसके अधिकारमें थी, जिसकी कामनासे उन्मत्त होकर उन्होंने एक-दूसरेको मार डाला ॥ २३ ॥

एतत् सर्वं यथावृत्तं विस्तरेण तपोधन ।
श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन् परं कौतूहलं हि नः ॥ २४ ॥
तपोधन! यह सब वृत्तान्त जिस प्रकार घटित हुआ था, वह सब हम विस्तारपूर्वक सुनना चाहते हैं। ब्रह्मन्! उसे सुननेके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि युधिष्ठिरनारदसंवादे सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें युधिष्ठिर-नारद- संवादविषयक दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४९ १/३ श्लोक हैं)


* कण्ठ, तालू, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ—इन पाँच स्थानों अथवा पाँच आभ्यन्तर प्रयत्नोंके भेदसे पाँच प्रकारके अक्षरसमूह कहे गये हैं। अ इ उ ऋ ऌ ये पाँच ही मूल स्वर हैं, अन्य स्वर इन्हींके दीर्घ आदि भेद अथवा संधिज हैं।

२०८-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः

सुन्द-उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव

नारद उवाच

शृणु मे विस्तरेणेममितिहासं पुरातनम् ।
भ्रातृभिः सहितः पार्थ यथावृत्तं युधिष्ठिर ॥ १ ॥
**नारदजीने कहा—**कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! यह वृत्तान्त जिस प्रकार संघटित हुआ था, वह प्राचीन इतिहास तुम मुझसे भाइयोंसहित विस्तारपूर्वक सुनो ॥ १ ॥

महासुरस्यान्ववाये हिरण्यकशिपोः पुरा ।
निकुम्भो नाम दैत्येन्द्रस्तेजस्वी बलवानभूत् ॥ २ ॥
प्राचीनकालमें महान् दैत्य हिरण्यकशिपुके कुलमें निकुम्भ नामसे प्रसिद्ध एक दैत्यराज हो गया है, जो अत्यन्त तेजस्वी और बलवान् था ॥ २ ॥

तस्य पुत्रौ महावीर्यौ जातौ भीमपराक्रमौ ।
सुन्दोपसुन्दौ दैत्येन्द्रौ दारुणौ क्रूरमानसौ ॥ ३ ॥
उसके महाबली और भयानक पराक्रमी दो पुत्र हुए, जिनका नाम था सुन्द और उपसुन्द। वे दोनों दैत्यराज बड़े भयंकर और क्रूर हृदयके थे ॥ ३ ॥

तावेकनिश्चयो दैत्यावेककार्यार्थसम्मतौ ।
निरन्तरमवर्तेतां समदुःखसुखावुभौ ॥ ४ ॥
उनका एक ही निश्चय होता था और एक ही कार्यके लिये वे सदा सहमत रहते थे। उनके सुख और दुःख भी एक ही प्रकारके थे। वे दोनों सदा साथ रहते थे ॥ ४ ॥

विनान्योन्यं न भुञ्जाते विनान्योन्यं न जल्पतः ।
अन्योन्यस्य प्रियकरावन्योन्यस्य प्रियंवदौ ॥ ५ ॥
उनमेंसे एकके बिना दूसरा न तो खाता-पीता और न किसीसे कुछ बात-चीत ही करता था। वे दोनों एक-दूसरेका प्रिय करते और परस्पर मीठे वचन बोलते थे ॥ ५ ॥

एकशीलसमाचारौ द्विधैवैकोऽभवत् कृतः ।
तौ विवृद्धौ महावीर्यौ कार्येष्वप्येकनिश्चयौ ॥ ६ ॥
उनके शील और आचरण एक-से थे, मानो एक ही जीवात्मा दो शरीरोंमें विभक्त कर दिया गया हो। वे महापराक्रमी दैत्य साथ-साथ बढ़ने लगे। वे प्रत्येक कार्यमें एक ही निश्चयपर पहुँचते थे ॥ ६ ॥

त्रैलोक्यविजयार्थाय समाधायैकनिश्चयम् ।

दीक्षां कृत्वा गतौ विन्ध्यं तावुग्रं तेपतुस्तपः ॥ ७ ॥ किसी समय वे तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छासे एकमत होकर गुरुसे दीक्षा ले विन्ध्य पर्वतपर आये और वहाँ कठोर तपस्या करने लगे ॥ ७ ॥ तौ तु दीर्घेण कालेन तपोयुक्तौ बभूवतुः । क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ जटावल्कलधारिणौ ॥ ८ ॥ भूख और प्यासका कष्ट सहते हुए सिरपर जटा तथा शरीरपर वल्कल धारण किये वे दोनों भाई दीर्घकालतक भारी तपस्यामें लगे रहे ॥ ८ ॥ मलोपचितसर्वाङ्गौ वायुभक्षौ बभूवतुः । आत्ममांसानि जुह्वन्तौ पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितौ । ऊर्ध्वबाहू चानिमिषौ दीर्घकालं धृतव्रतौ ॥ ९ ॥ उनके सम्पूर्ण अंगोंमें मैल जम गयी थी, वे हवा पीकर रहते थे और अपने ही शरीरके मांसखण्ड काट-काटकर अग्निमें आहुति देते थे। तदनन्तर बहुत समयतक पैरोंके अंगूठोंके अग्रभागके बलपर खड़े हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये एकटक दृष्टिसे देखते हुए वे दोनों व्रत धारण करके तपस्यामें संलग्न रहे ॥ ९ ॥ तयोस्तपःप्रभावेण दीर्घकालं प्रतापितः । धूमं प्रमुमुचे विन्ध्यस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १० ॥ उन दैत्योंकी तपस्याके प्रभावसे दीर्घकालतक संतप्त होनेके कारण विन्ध्य पर्वत धुआँ छोड़ने लगा, यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ १० ॥ ततो देवा भयं जग्मुरुग्रं दृष्ट्वा तयोस्तपः । तपोविघातार्थमथो देवा विघ्नानि चक्रिरे ॥ ११ ॥ उनकी उग्र तपस्या देखकर देवताओंको बड़ा भय हुआ। वे देवतागण उनके तपको भंग करनेके लिये अनेक प्रकारके विघ्न डालने लगे ॥ ११ ॥ रत्नैः प्रलोभयामासुः स्त्रीभिश्चोभौ पुनः पुनः । न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥ १२ ॥ उन्होंने बार-बार रत्नोंके ढेर तथा सुन्दरी स्त्रियोंको भेज-भेजकर उन दोनोंको प्रलोभनमें डालनेकी चेष्टा की; किंतु उन महान् व्रतधारी दैत्योंने अपने तपको भंग नहीं किया ॥ १२ ॥ अथ मायां पुनर्देवास्तयोश्चक्रुर्महात्मनोः । भगिन्यो मातरो भार्यास्तयोश्चात्मजनस्तथा ॥ १३ ॥ प्रपात्यमाना विस्रस्ताः शूलहस्तेन रक्षसा । भ्रष्टाभरणकेशान्ता भ्रष्टाभरणवाससः ॥ १४ ॥ अभिभाष्य ततः सर्वास्तौ त्राहीति विचुक्रुशुः । न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥ १५ ॥

तत्पश्चात् देवताओंने महान् आत्मबलसे सम्पन्न उन दोनों दैत्योंके सामने पुनः मायाका प्रयोग किया। उनकी मायानिर्मित बहनें, माताएँ, पत्नियाँ तथा अन्य आत्मीयजन वहाँ भागते हुए आते और उन्हें कोई शूलधारी राक्षस बार-बार खदेड़ता तथा पृथ्वीपर पटक देता था। उनके आभूषण गिर जाते, वस्त्र खिसक जाते और बालोंकी लटें खुल जाती थीं। वे सभी आत्मीयजन सुन्द-उपसुन्दको पुकारकर चीखते हुए कहते—'बेटा! मुझे बचाओ, भैया! मेरी रक्षा करो।' यह सब सुनकर भी वे दोनों महान् व्रतधारी तपस्वी अपनी तपस्यासे नहीं डिगे; अपने व्रतको नहीं तोड़ सके ॥ १३—१५॥

यदा क्षोभं नोपयाति नार्तिमन्यतरस्तयोः । ततः स्त्रियस्ता भूतं च सर्वमन्तरधीयत ॥ १६ ॥

जब उन दोनोंमेंसे एक भी न तो इन घटनाओंसे क्षुब्ध हुआ और न किसीके मनमें कष्टका ही अनुभव हुआ, तब वे मायामयी स्त्रियाँ और वह राक्षस सब-के-सब अदृश्य हो गये ॥ १६ ॥

ततः पितामहः साक्षादभिगम्य महासुरौ । वरेणच्छन्दयामास सर्वलोकहितः प्रभुः ॥ १७ ॥

तब सम्पूर्ण लोकोंके हितैषी पितामह साक्षात् भगवान् ब्रह्माने उन दोनों महादैत्योंके निकट आकर उन्हें इच्छानुसार वर माँगनेको कहा ॥ १७ ॥

ततः सुन्दोपसुन्दौ तौ भ्रातरौ दृढविक्रमौ । दृष्ट्वा पितामहं देवं तस्थतुः प्राञ्जली तदा ॥ १८ ॥ ऊचतुश्च प्रभुं देवं ततस्तौ सहितौ तदा । आवयोस्तपसानेन यदि प्रीतः पितामहः ॥ १९ ॥ मायाविदावस्त्रविदौ बलिनौ कामरूपिणौ । उभावप्यमरौ स्यावः प्रसन्नो यदि नौ प्रभुः ॥ २० ॥

तदनन्तर सुदृढ़ पराक्रमी दोनों भाई सुन्द और उपसुन्द भगवान् ब्रह्माको उपस्थित देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये और एक साथ भगवान् ब्रह्मासे बोले—'भगवन्! यदि आप हमारी तपस्यासे प्रसन्न हैं तो हम दोनों सम्पूर्ण मायाओंके ज्ञाता, अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान्, बलवान्, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और अमर हो जायें' ॥ १८—२० ॥

ब्रह्मोवाच

ऋतेऽमरत्वं युवयोः सर्वमुक्तं भविष्यति । अन्यद् वृणीतं मृत्योश्च विधानममरैः समम् ॥ २१ ॥

**ब्रह्माजीने कहा—**अमरत्वके सिवा तुम्हारी माँगी हुई सब वस्तुएँ तुम्हें प्राप्त होंगी। तुम मृत्युका कोई दूसरा ऐसा विधान माँग लो, जो तुम्हें देवताओंके समान बनाये रख सके ॥ २१ ॥

प्रभविष्याव इति यन्महदभ्युद्यतं तपः। युवयोर्हेतुनानेन नामरत्वं विधीयते॥ २२॥ हम तीनों लोकोंके ईश्वर होंगे, ऐसा संकल्प करके जो तुमलोगोंने यह बड़ी भारी तपस्या प्रारम्भ की थी, इसीलिये तुमलोगोंको अमर नहीं बनाया जाता; क्योंकि अमरत्व तुम्हारी तपस्याका उद्देश्य नहीं था॥ २२॥ त्रैलोक्यविजयार्थाय भवद्भ्यामास्थितं तपः। हेतुनानेन दैत्येन्द्रौ न वा कामं करोम्यहम्॥ २३॥ दैत्यपतियो! तुम दोनोंने त्रिलोकीपर विजय पानेके लिये ही इस तपस्याका आश्रय लिया था, इसीलिये तुम्हारी अमरत्वविषयक कामनाकी पूर्ति मैं नहीं कर रहा हूँ॥ २३॥

सुन्दोपसुन्दावूचतुः त्रिषु लोकेषु यद् भूतं किंचित् स्थावरजङ्गमम्। सर्वस्मान्नो भयं न स्यादृतेऽन्योन्यं पितामह॥ २४॥ सुन्द और उपसुन्द बोले—पितामह! तब यह वर दीजिये कि हम दोनोंमेंसे एक-दूसरेको छोड़कर तीनों लोकोंमें जो कोई भी चर या अचर भूत हैं, उनसे हमें मृत्युका भय न हो॥ २४॥ पितामह उवाच यत् प्रार्थितं यथोक्तं च काममेतद् ददानि वाम्।

मृत्योर्विधानमेतच्च यथावद् वा भविष्यति ॥ २५ ॥ ब्रह्माजीने कहा— तुमने जैसी प्रार्थना की है, तुम्हारी वह मुँहमाँगी वस्तु तुम्हें अवश्य दूँगा। तुम्हारी मृत्युका विधान ठीक इसी प्रकार होगा ॥ २५ ॥

नारद उवाच

ततः पितामहो दत्त्वा वरमेतत् तदा तयोः । निवर्त्य तपसस्तौ च ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ २६ ॥ नारदजी कहते हैं— युधिष्ठिर! उस समय उन दोनों दैत्योंको यह वरदान देकर और उन्हें तपस्यासे निवृत्त करके ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २६ ॥

लब्ध्वा वराणि दैत्येन्द्रावथ तौ भ्रातरावुभौ । अवध्यौ सर्वलोकस्य स्वमेव भवनं गतौ ॥ २७ ॥ फिर वे दोनों भाई दैत्यराज सुन्द और उपसुन्द यह अभीष्ट वर पाकर सम्पूर्ण लोकोंके लिये अवध्य हो पुनः अपने घरको ही लौट गये ॥ २७ ॥

तौ तु लब्धवरौ दृष्ट्वा कृतकामौ मनस्विनौ । सर्वः सुहृज्जनस्ताभ्यां प्रहर्षमुपजग्मिवान् ॥ २८ ॥ वरदान पाकर पूर्णकाम होकर लौटे हुए उनदोनों मनस्वी वीरोंको देखकर उनके सभी सगे-सम्बन्धी बड़े प्रसन्न हुए ॥ २८ ॥

ततस्तौ तु जटा भित्त्वा मौलिनौ सम्बभूवतुः । महार्हाभरणोपेतौ विरजोऽम्बरधारिणौ ॥ २९ ॥ अकालकौमुदीं चैव चक्रतुः सार्वकालिकीम् । नित्यप्रमुदितः सर्वस्तयोश्चैव सुहृज्जनः ॥ ३० ॥ तदनन्तर उन्होंने जटाएँ कटाकर मस्तकपर मुकुट धारण कर लिये और बहुमूल्य आभूषण तथा निर्मल वस्त्र धारण करके ऐसा प्रकाश फैलाया, मानो असमयमें ही चाँदनी छिटक गयी हो और सर्वदा दिन-रात एकरस रहने लगी हो। उनके सभी सगे-सम्बन्धी सदा आमोद-प्रमोदमें डूबे रहते थे ॥ २९-३० ॥

भक्ष्यतां भुज्यतां नित्यं दीयतां रम्यतामिति । गीयतां पीयतां चेति शब्दश्चासीद् गृहे गृहे ॥ ३१ ॥ प्रत्येक घरमें सर्वदा 'खाओ, भोग करो, लुटाओ, मौज करो, गाओ और पीओ' का शब्द गूँजता रहता था ॥ ३१ ॥

तत्र तत्र महानादैरूत्कृष्टतलनादितैः । हृष्टं प्रमुदितं सर्वं दैत्यानामभवत् पुरम् ॥ ३२ ॥ जहाँ-तहाँ जोर-जोरसे तालियाँ पीटनेकी ऊँची आवाजसे दैत्योंका वह सारा नगर हर्ष और आनन्दमें मग्न जान पड़ता था ॥ ३२ ॥

तैस्तैर्विहारैर्बहुभिर्दैत्यानां कामरूपिणाम् ।
समाः संक्रीडतां तेषामहरेकमिवाभवत् ॥ ३३ ॥
इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वे दैत्य वर्षोंतक भाँति-भाँतिके खेल-कूद और आमोद-प्रमोद करनेमें लगे रहे; किंतु वह सारा समय उन्हें एक दिनके समान लगा ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्यानेऽष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें सुन्दोपसुन्दोपाख्यानविषयक दो सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥

२०९-

⬅ विषय-सूची (TOC)

नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः

सुन्द और उपसुन्दद्वारा क्रूरतापूर्ण कर्मोंसे त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करना

नारद उवाच

उत्सवे वृत्तमात्रे तु त्रैलोक्याकाङ्क्षिणावुभौ ।
मन्त्रयित्वा ततः सेनां तावाज्ञापयतां तदा ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं— युधिष्ठिर! उत्सव समाप्त हो जानेपर तीनों लोकोंको अपने अधिकारमें करनेकी इच्छासे आपसमें सलाह करके उन दोनों दैत्योंने सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दी ॥ १ ॥

सुहृद्भिरप्यनुज्ञातौ दैत्यैर्वृद्धैश्च मन्त्रिभिः ।
कृत्वा प्रास्थानिकं रात्रौ मघासु ययतुस्तदा ॥ २ ॥
सुहृदों तथा दैत्यजातीय बूढ़े मन्त्रियोंकी अनुमति लेकर उन्होंने रातके समय मघा नक्षत्रमें प्रस्थान करके यात्रा प्रारम्भ की ॥ २ ॥

गदापट्टिशधारिण्या शूलमुद्गरहस्तया ।
प्रस्थितौ सह वर्मिण्या महत्या दैत्यसेनया ॥ ३ ॥
मङ्गलैः स्तुतिभिश्चापि विजयप्रतिसंहितैः ।
चारणैः स्तूयमानौ तौ जग्मतुः परया मुदा ॥ ४ ॥
उनके साथ गदा, पट्टिश, शूल, मुद्गर और कवचसे सुसज्जित दैत्योंकी विशाल सेना जा रही थी। वे दोनों सेनाके साथ प्रस्थान कर रहे थे। चारणलोग विजयसूचक मंगल और स्तुतिपाठ करते हुए उन दोनोंके गुण गाते जाते थे। इस प्रकार उन दोनों दैत्योंने बड़े आनन्दसे यात्रा की ॥ ३-४ ॥

तावन्तरिक्षमुत्प्लुत्य दैत्यौ कामगमावुभौ ।
देवानामवे भवनं जग्मतुर्युद्धदुर्मदौ ॥ ५ ॥
युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले वे दोनों दैत्य इच्छानुसार सर्वत्र जानेकी शक्ति रखते थे; अतः आकाशमें उछलकर पहले देवताओंके ही घरोंपर जा चढ़े ॥ ५ ॥

तयोरागमनं ज्ञात्वा वरदानं च तत् प्रभोः ।
हित्वा त्रिविष्टपं जग्मुर्ब्रह्मलोकं ततः सुराः ॥ ६ ॥
उनका आगमन सुनकर और ब्रह्माजीसे मिले हुए उनके वरदानका विचार करके देवतालोग स्वर्ग छोड़कर ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ ६ ॥

ताविन्द्रलोकं निर्जित्य यक्षरक्षोगणांस्तदा ।

खेचराण्यपि भूतानि जघ्नतुस्तीव्रविक्रमौ ॥ ७ ॥ इस प्रकार इन्द्रलोकपर विजय पाकर वे तीव्रपराक्रमी दैत्य यक्षों, राक्षसों तथा अन्यान्य आकाशचारी भूतोंको मारने और पीड़ा देने लगे ॥ ७ ॥

अन्तर्भूमिगतान् नागाञ्जित्वा तौ च महारथौ । समुद्रवासिनीः सर्वा म्लेच्छजातीर्विजिग्यतुः ॥ ८ ॥ उन दोनों महारथियोंने भूमिके अंदर पातालमें रहनेवाले नागोंको जीतकर समुद्रके तटपर निवास करनेवाली सम्पूर्ण म्लेच्छ जातियोंको परास्त किया ॥ ८ ॥

ततः सर्वां महीं जेतुमारब्धावुग्रशासनौ । सैनिकांश्च समाहूय सुतीक्ष्णं वाक्यमूचतुः ॥ ९ ॥ तदनन्तर भयंकर शासन करनेवाले वे दोनों दैत्य सारी पृथ्वीको जीतनेके लिये उद्यत हो गये और अपने सैनिकोंको बुलाकर अत्यन्त तीखे वचन बोले— ॥ ९ ॥

राजर्षयो महायज्ञैर्हव्यकव्यैर्द्विजातयः । तेजो बलं च देवानां वर्धयन्ति श्रियं तथा ॥ १० ॥ ‘इस पृथ्वीपर बहुतसे राजर्षि और ब्राह्मण रहते हैं, जो बड़े-बड़े यज्ञ करके हव्य-कव्योंद्वारा देवताओंके तेज, बल और लक्ष्मीकी वृद्धि किया करते हैं’ ॥ १० ॥

तेषामेवंप्रवृत्तानां सर्वेषामसुरद्विषाम् । सम्भूय सर्वैरस्माभिः कार्यः सर्वात्मना वधः ॥ ११ ॥ ‘इस प्रकार यज्ञादि कर्मोंमें लगे हुए वे सभी लोग असुरोंके द्रोही हैं। इसलिये हम सबको संगठित होकर उन सबका सब प्रकारसे वध कर डालना चाहिये’ ॥ ११ ॥

एवं सर्वान् समादिश्य पूर्वतीरे महोदधेः । क्रूरां मतिं समास्थाय जग्मतुः सर्वतोमुखौ ॥ १२ ॥ समुद्रके पूर्वतटपर अपने समस्त सैनिकोंको ऐसा आदेश देकर मनमें क्रूर संकल्प लिये वे दोनों भाई सब ओर आक्रमण करने लगे ॥ १२ ॥

यज्ञैर्यजन्ति ये केचिद् याजयन्ति च ये द्विजाः । तान् सर्वान् प्रसभं हत्वा बलिनौ जग्मतुस्ततः ॥ १३ ॥ जो लोग यज्ञ करते तथा जो ब्राह्मण आचार्य बनकर यज्ञ कराते थे, उन सबका बलपूर्वक वध करके वे महाबली दैत्य आगे बढ़ जाते थे ॥ १३ ॥

आश्रमेष्वग्निहोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम् । गृहीत्वा प्रक्षिपन्त्यप्सु विश्रब्धं सैनिकास्तयोः ॥ १४ ॥ उनके सैनिक शुद्धात्मा मुनियोंके आश्रमोंपर जाकर उनके अग्निहोत्रकी सामग्री उठाकर बिना किसी डर-भयके पानीमें फेंक देते थे ॥ १४ ॥

तपोधनैश्च ये क्रुद्धैः शापा उक्ता महात्मभिः । नाक्रामन्त तयोस्तेऽपि वरदाननिराकृताः ॥ १५ ॥

कुछ तपस्याके धनी महात्माओंने क्रोधमें भरकर उन्हें जो शाप दिये, उनके शाप भी उन दैत्योंके मिले हुए वरदानसे प्रतिहत होकर उनका कुछ बिगाड़ नहीं सके ॥ १५ ॥ नाक्रामन्त यदा शापा बाणा मुक्ताः शिलास्विव ।
नियमान् सम्परित्यज्य व्यद्रवन्त द्विजातयः ॥ १६ ॥
पत्थरपर चलाये हुए बाणोंकी भाँति जब शाप उन्हें पीड़ित न कर सके, तब ब्राह्मणलोग अपने सारे नियम छोड़कर वहाँसे भाग चले ॥ १६ ॥
पृथिव्यां ये तपःसिद्धा दान्ताः शमपरायणाः ।
तयोर्भयाद् दुद्रुवुस्ते वैनतेयादिवोरगाः ॥ १७ ॥
जैसे साँप गरुड़के डरसे भाग जाते हैं, उसी प्रकार भूमण्डलके जितेन्द्रिय, शान्तिपरायण एवं तपःसिद्ध महात्मा भी उन दोनों दैत्योंके भयसे भाग जाते थे ॥ १७ ॥
मथितैराश्रमैर्भग्नैर्विकीर्णकलशस्रुवैः ।
शून्यमासीज्जगत् सर्वं कालेनेव हतं तदा ॥ १८ ॥
सारे आश्रम मथकर उजाड़ डाले गये। कलश और स्रुव तोड़-फोड़कर फेंक दिये गये। उस समय सारा जगत् कालके द्वारा विनष्ट हुएकी भाँति सूना हो गया ॥ १८ ॥
ततो राजन्नदृश्यद्भिर्ऋषिभिश्च महासुरौ ।
उभौ विनिश्चयं कृत्वा विकुर्वाते वधैषिणौ ॥ १९ ॥
राजन्! तदनन्तर जब गुफाओंमें छिपे हुए ऋषि दिखायी न दिये, तब उन दोनोंने एक राय करके उनके वधकी इच्छासे अपने स्वरूपको अनेक जीव-जन्तुओंके रूपमें बदल लिया ॥ १९ ॥
प्रभिन्नकरटौ मत्तौ भूत्वा कुञ्जररूपिणौ ।
संलीनमपि दुर्गेशु निन्यतुर्यमसादनम् ॥ २० ॥
कठिन-से-कठिन स्थानमें छिपे हुए मुनिको भी वे मद बहानेवाले मतवाले हाथीका रूप धारण करके यमलोक पहुँचा देते थे ॥ २० ॥
सिंहौ भूत्वा पुनर्व्याघ्रौ पुनश्चान्तर्हितावभौ ।
तैस्तैरुपायैस्तौ क्रूरावृषीन् दृष्ट्वा निजघ्नतुः ॥ २१ ॥
निवृत्तयज्ञस्वाध्याया प्रणष्टनृपतिद्विजा ।
उत्सन्नोत्सवयज्ञा च बभूव वसुधा तदा ॥ २२ ॥
वे कभी सिंह होते, कभी बाघ बन जाते और कभी अदृश्य हो जाते थे। इस प्रकार वे क्रूर दैत्य विभिन्न उपायोंद्वारा ऋषियोंको ढूँढ़-ढूँढ़कर मारने लगे। उस समय पृथ्वीपर यज्ञ और स्वाध्याय बंद हो गये। राजर्षि और ब्राह्मण नष्ट हो गये और यात्रा, विवाह आदि उत्सवों तथा यज्ञोंकी सर्वथा समाप्ति हो गयी ॥ २१-२२ ॥
हाहाभूता भयार्ता च निवृत्तविपणापणा ।
निवृत्तदेवकार्या च पुण्योद्वाहविवर्जिता ॥ २३ ॥

सर्वत्र हाहाकार छा रहा था, भयका आर्तनाद सुनायी पड़ता था। बाजारोंमें खरीद-बिक्रीका नाम नहीं था। देवकार्य बंद हो गये। पुण्य और विवाहादि कर्म छूट गये थे॥ २३ ॥

निवृत्तकृषिगोरक्षा विध्वस्तनगराश्रमा । अस्थिकङ्कालसंकीर्णा भूर्बभूवोग्रदर्शना ॥ २४ ॥ कृषि और गोरक्षाका नाम नहीं था, नगर और आश्रम उजड़कर खण्डहर हो गये थे। चारों ओर हड्डियाँ और कंकाल भरे पड़े थे। इस प्रकार पृथ्वीकी ओर देखना भी भयानक प्रतीत होता था ॥ २४ ॥

निवृत्तपितृकार्यं च निर्वषट्कारमङ्गलम् । जगत् प्रतिभयाकारं दुष्प्रेक्ष्यमभवत् तदा ॥ २५ ॥ श्राद्धकर्म लुप्त हो गया। वषट्कार और मंगलका कहीं नाम नहीं रह गया। सारा जगत् भयानक प्रतीत होता था। इसकी ओर देखनातक कठिन हो गया था ॥ २५ ॥

चन्द्रादित्यौ ग्रहास्तारा नक्षत्राणि दिवौकसः । जग्मुर्विषादं तत् कर्म दृष्ट्वा सुन्दोपसुन्दयोः ॥ २६ ॥ सुन्द और उपसुन्दका वह भयानक कर्म देखकर चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, तारे, नक्षत्र और देवता सभी अत्यन्त खिन्न हो उठे ॥ २६ ॥

एवं सर्वा दिशो दैत्यौ जित्वा क्रूरेण कर्मणा । निःसपत्नौ कुरुक्षेत्रे निवेशमभिचक्रतुः ॥ २७ ॥ इस प्रकार वे दोनों दैत्य अपने क्रूर कर्मद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको जीतकर शत्रुओंसे रहित हो कुरुक्षेत्रमें निवास करने लगे ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्याने नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें सुन्दोपसुन्दोपाख्यानविषयक दो सौ नौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०९ ॥

२१०-

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दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

तिलोत्तमाकी उत्पत्ति, उसके रूपका आकर्षण तथा सुन्दोप-सुन्दको मोहित करनेके लिये उसका प्रस्थान

नारद उवाच

ततो देवर्षयः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ।
जग्मुस्तदा परामार्तिं दृष्ट्वा तत् कदनं महत् ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर सम्पूर्ण देवर्षि और सिद्ध-महर्षि वह महान् हत्याकाण्ड देखकर बहुत दुःखी हुए ॥ १ ॥

तेऽभिजग्मुर्जितक्रोधा जितात्मानो जितेन्द्रियाः ।
पितामहस्य भवनं जगतः कृपया तदा ॥ २ ॥
उन्होंने अपने मन, इन्द्रियसमुदाय तथा क्रोधको जीत लिया था। फिर भी सम्पूर्ण जगत्‌पर दया करके वे ब्रह्माजीके धाममें गये ॥ २ ॥

ततो ददृशुरासीनं सह देवैः पितामहम् ।
सिद्धैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव समन्तात् परिवारितम् ॥ ३ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने ब्रह्माजीको देवताओं, सिद्धों और महर्षियोंसे सब ओर घिरे हुए बैठे देखा ॥ ३ ॥

तत्र देवो महादेवस्तत्राग्निर्वायुना सह ।
चन्द्रादित्यौ च शक्रश्च पारमेष्ठ्यास्तथर्षयः ॥ ४ ॥

वैखानसा बालखिल्या वानप्रस्था मरीचिपाः ।
अजाश्चैवाविमूढाश्च तेजोगर्भास्तपस्विनः ॥ ५ ॥

ऋषयः सर्व एवैते पितामहमुपागमन् ।
ततोऽभिगम्य ते दीनाः सर्व एव महर्षयः ॥ ६ ॥

सुन्दोपसुन्दयो कर्म सर्वमेव शशंसिरे ।
यथा हृतं यथा चैव कृतं येन क्रमेण च ॥ ७ ॥

न्यवेदयंस्ततः सर्वमखिलेन पितामहे ।
ततो देवगणाः सर्वे ते चैव परमर्षयः ॥ ८ ॥

तमेवार्थं पुरस्कृत्य पितामहमचोदयन् ।
ततः पितामहः श्रुत्वा सर्वेषां तद् वचस्तदा ॥ ९ ॥

मुहूर्तमिव संचिन्त्य कर्तव्यस्य च निश्चयम् ।
तयोर्वधं समुद्दिश्य विश्वकर्माणमाह्वयत् ॥ १० ॥

वहाँ भगवान् महादेव, वायुसहित अग्निदेव, चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, ब्रह्मपुत्र महर्षि, वैखानस (वनवासी), बालखिल्य, वानप्रस्थ, मरीचिप, अजन्मा, अविमूढ़ तथा तेजोगर्भ आदि नाना प्रकारके तपस्वी मुनि ब्रह्माजीके पास आये थे। उन सभी महर्षियोंने निकट जाकर दीनभावसे ब्रह्माजीसे सुन्द-उपसुन्दके सारे क्रूर कर्मोंका वृत्तान्त कह सुनाया। दैत्योंने जिस प्रकार लूट-पाट की, जैसे-जैसे और जिस क्रमसे लोगोंकी हत्याएँ कीं, वह सब समाचार पूर्णरूपसे ब्रह्माजीको बताया। तब सम्पूर्ण देवताओं और महर्षियोंने भी इस बातको लेकर ब्रह्माजीको प्रेरणा की। ब्रह्माजीने उन सबकी बातें सुनकर दो घड़ीतक कुछ विचार किया। फिर उन दोनोंके वधके लिये कर्तव्यका निश्चय करके विश्वकर्माको बुलाया ॥ ४—१० ॥

दृष्ट्वा च विश्वकर्माणं व्यादिदेश पितामहः ।
सृज्यतां प्रार्थनीयैका प्रमदेति महातपाः ॥ ११ ॥
उनको आया देखकर महातपस्वी ब्रह्माजीने यह आज्ञा दी कि तुम एक तरुणी स्त्रीके शरीरकी रचना करो, जो सबका मन लुभा लेनेवाली हो ॥ ११ ॥

पितामहं नमस्कृत्य तद्वाक्यमभिनन्द्य च ।
निर्ममे योषितं दिव्यां चिन्तयित्वा पुनः पुनः ॥ १२ ॥
ब्रह्माजीकी आज्ञाको शिरोधार्य करके विश्वकर्माने उन्हें प्रणाम किया और खूब सोच-विचारकर एक दिव्य युवतीका निर्माण किया ॥ १२ ॥

त्रिषु लोकेषु यत् किंचिद् भूतं स्थावरजङ्गमम् ।
समानयद् दर्शनीयं तत् तदत्र स विश्ववित् ॥ १३ ॥
तीनों लोकोंमें जो कुछ भी चर और अचर दर्शनीय पदार्थ था, सर्वज्ञ विश्वकर्माने उन सबके सारांशका उस सुन्दरीके शरीरमें संग्रह किया ॥ १३ ॥

कोटिशश्चैव रत्नानि तस्या गात्रे न्यवेशयत् ।
तां रत्नसंघातमयीमसृजद् देवरूपिणीम् ॥ १४ ॥
उन्होंने उस युवतीके अंगोंमें करोड़ों रत्नोंका समावेश किया और इस प्रकार रत्नराशिमयी उस देवरूपिणी रमणीका निर्माण किया ॥ १४ ॥

सा प्रयत्नेन महता निर्मिता विश्वकर्मणा ।
त्रिषु लोकेषु नारीणां रूपेणाप्रतिमाभवत् ॥ १५ ॥
विश्वकर्माद्वारा बड़े प्रयत्नसे बनायी हुई वह दिव्य युवती अपने रूप-सौन्दर्यके कारण तीनों लोकोंकी स्त्रियोंमें अनुपम थी ॥ १५ ॥

न तस्याः सूक्ष्ममप्यस्ति यद् गात्रे रूपसम्पदा ।
नियुक्ता यत्र वा दृष्टिर्न सज्जति निरीक्षताम् ॥ १६ ॥
उसके शरीरमें कहीं तिलभर भी ऐसी जगह नहीं थी, जहाँकी रूपसम्पत्तिको देखनेके लिये लगी हुई दर्शकोंकी दृष्टि जम न जाती हो ॥ १६ ॥

सा विग्रहवतीव श्रीः कामरूपा वपुष्मती ।
जहार सर्वभूतानां चक्षूंषि च मनांसि च ॥ १७ ॥
वह मूर्तिमती कामरूपिणी लक्ष्मीकी भाँति समस्त प्राणियोंके नेत्रों और मनको हर लेती थी ॥ १७ ॥
तिलं तिलं समानीय रत्नानां यद् विनिर्मिता ।
तिलोत्तमेति तत् तस्या नाम चक्रे पितामहः ॥ १८ ॥
उत्तम रत्नोंका तिल-तिलभर अंश लेकर उसके अंगोंका निर्माण हुआ था, इसलिये ब्रह्माजीने उसका नाम 'तिलोत्तमा' रख दिया ॥ १८ ॥
ब्रह्माणं सा नमस्कृत्य प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।
किं कार्यं मयि भूतेश येनास्म्यद्येह निर्मिता ॥ १९ ॥
तदनन्तर तिलोत्तमा ब्रह्माजीको नमस्कार करके हाथ जोड़कर बोली—'प्रजापते! मुझपर किस कार्यका भार रखा गया है? जिसके लिये आज मेरे शरीरका निर्माण किया गया है' ॥ १९ ॥

पितामह उवाच
गच्छ सुन्दोपसुन्दाभ्यामसुराभ्यां तिलोत्तमे ।
प्रार्थनीयेन रूपेण कुरु भद्रे प्रलोभनम् ॥ २० ॥
ब्रह्माजीने कहा— भद्रे तिलोत्तमे! तू सुन्द और उपसुन्द नामक असुरोंके पास जा और अपने अत्यन्त कमनीय रूपके द्वारा उनको लुभा ॥ २० ॥
त्वत्कृते दर्शनादेव रूपसम्पत्कृतेन वै ।
विरोधः स्याद् यथा ताभ्यामन्योन्येन तथा कुरु ॥ २१ ॥
तुझे देखते ही तेरे लिये—तेरी रूपसम्पत्तिके लिये उन दोनों दैत्योंमें परस्पर विरोध हो जाय, ऐसा प्रयत्न कर ॥ २१ ॥

नारद उवाच
सा तथेति प्रतिज्ञाय नमस्कृत्य पितामहम् ।
चकार मण्डलं तत्र विबुधानां प्रदक्षिणम् ॥ २२ ॥
नारदजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब तिलोत्तमाने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा करके ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वह देवमण्डलीकी परिक्रमा करने लगी ॥ २२ ॥
प्राङ्मुखो भगवानास्ते दक्षिणेन महेश्वरः ।
देवाश्चैवोत्तरेणासन् सर्वतस्त्वृषयोऽभवन् ॥ २३ ॥
ब्रह्माजीके दक्षिणभागमें भगवान् महेश्वर पूर्वाभिमुख होकर बैठे थे, उत्तरभागमें देवतालोग थे तथा ऋषि-मुनि ब्रह्माजीके चारों ओर बैठे थे ॥ २३ ॥
कुर्वत्या तु तदा तत्र मण्डलं तत् प्रदक्षिणम् ।

इन्द्रः स्थाणुश्च भगवान् धैर्येण प्रत्यवस्थितौ ॥ २४ ॥ वहाँ तिलोत्तमाने जब देवमण्डलीकी प्रदक्षिणा आरम्भ की, तब इन्द्र और भगवान् शंकर दोनों धैर्यपूर्वक अपने स्थानपर ही बैठे रहे ॥ २४ ॥

द्रष्टुकामस्य चात्यर्थं गतया पार्श्वतस्तया । अन्यदञ्चितपद्माक्षं दक्षिणं निःसृतं मुखम् ॥ २५ ॥ जब वह दक्षिण पार्श्वकी ओर गयी, तब उसे देखनेकी इच्छासे भगवान् शंकरके दक्षिणभागमें एक और मुख प्रकट हो गया, जो कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित था ॥ २५ ॥

पृष्ठतः परिवर्तन्त्या पश्चिमं निःसृतं मुखम् । गतया चोत्तरं पार्श्वमुत्तरं निःसृतं मुखम् ॥ २६ ॥ जब वह पीछेकी ओर गयी, तब उनका पश्चिम मुख प्रकट हुआ और उत्तर पार्श्वकी ओर उसके जानेपर भगवान् शिवके उत्तरवर्ती मुखका प्राकट्य हुआ ॥ २६ ॥

महेन्द्रस्यापि नेत्राणां पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः । रक्तान्तानां विशालानां सहस्रं सर्वतोऽभवत् ॥ २७ ॥ इसी प्रकार इन्द्रके भी आगे, पीछे और पार्श्व-भागमें सब ओर लाल कोनेवाले सहस्रों विशाल नेत्र प्रकट हो गये ॥ २७ ॥

एवं चतुर्मुखः स्थाणुर्महादेवोऽभवत् पुरा । तथा सहस्रनेत्रश्च बभूव बलसूदनः ॥ २८ ॥ इस प्रकार पूर्वकालमें अविनाशी भगवान् महादेवजीके चार मुख प्रकट हुए और बलहन्ता इन्द्रके हजार नेत्र हुए ॥ २८ ॥

तथा देवनिकायानां महर्षीणां च सर्वशः । मुखानि चाभ्यवर्तन्त येन याति तिलोत्तमा ॥ २९ ॥ दूसरे-दूसरे देवताओं और महर्षियोंके मुख भी जिस ओर तिलोत्तमा जाती थी, उसी ओर घूम जाते थे ॥ २९ ॥

तस्या गात्रे निपतिता दृष्टिस्तेषां महात्मनाम् । सर्वेषामेव भूयिष्ठमृते देवं पितामहम् ॥ ३० ॥ उस समय देवाधिदेव ब्रह्माजीको छोड़कर शेष सभी महानुभावोंकी दृष्टि तिलोत्तमाके शरीरपर बार-बार पड़ने लगी ॥ ३० ॥

गच्छन्त्या तु तया सर्वे देवाश्च परमर्षयः । कृतमित्येव तत् कार्यं मेनिरे रूपसम्पदा ॥ ३१ ॥ जब वह जाने लगी, तब सभी देवताओं और महर्षियोंको उसकी रूपसम्पत्ति देखकर यह विश्वास हो गया कि अब वह सारा कार्य सिद्ध ही है ॥ ३१ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1467)

सुन्द और उपसुन्दका अत्याचार


तिलोत्तमाके लिये सुन्द और उपसुन्दका युद्ध

तिलोत्तमायां तस्यां तु गतायां लोकभावनः ।
सर्वान् विसर्जयामास देवानृषिगणांश्च तान् ॥ ३२ ॥
तिलोत्तमाके चले जानेपर लोकस्रष्टा ब्रह्माजीने उन सम्पूर्ण देवताओं और महर्षियोंको विदा किया ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्याने
तिलोत्तमाप्रस्थापने दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें
सुन्दोपसुन्दोपाख्यानके प्रसंगमें तिलोत्तमाप्रस्थापनविषयक दो सौ दसवाँ अध्याय पूरा
हुआ ॥ २१० ॥

२११-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः

तिलोत्तमापर मोहित होकर सुन्द-उपसुन्दका आपसमें लड़ना और मारा जाना एवं तिलोत्तमाको ब्रह्माजीद्वारा वरप्राप्ति तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण

नारद उवाच

जित्वा तु पृथिवीं दैत्यौ निःसपत्नौ गतव्यथौ ।
कृत्वा त्रैलोक्यमव्यग्रं कृतकृत्यौ बभूवतुः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! वे दोनों दैत्य सुन्द और उपसुन्द सारी पृथ्वीको जीतकर शत्रुओंसे रहित एवं व्यथारहित हो तीनों लोकोंको पूर्णतः अपने वशमें करके कृतकृत्य हो गये ॥ १ ॥

देवगन्धर्वयक्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम् ।
आदाय सर्वरत्नानि परां तुष्टिमुपागतौ ॥ २ ॥
देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य तथा राक्षसोंके सभी रत्नोंको छीनकर उन दोनों दैत्योंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ ॥ २ ॥

यदा न प्रतिषेद्धारस्तयोः सन्तीह केचन ।
निरुद्योगौ तदा भूत्वा विजह्रातेऽमराविव ॥ ३ ॥
जब त्रिलोकीमें उनका सामना करनेवाले कोई नहीं रह गये, तब वे देवताओंके समान अकर्मण्य होकर भोग-विलासमें लग गये ॥ ३ ॥

स्त्रीभिर्माल्यैश्च गन्धैश्च भक्ष्यभोज्यैः सुपुष्कलैः ।
पानैश्च विविधैर्हृद्यैः परां प्रीतिमवापतुः ॥ ४ ॥
सुन्दरी स्त्रियों, मनोहर मालाओं, भाँति-भाँतिके सुगन्ध-द्रव्यों, पर्याप्त भोजन-सामग्रियों तथा मनको प्रिय लगनेवाले अनेक प्रकारके पेय रसोंका सेवन करके वे बड़े आनन्दसे दिन बिताने लगे ॥ ४ ॥

अन्तःपुरवनोद्याने पर्वतेषु वनेषु च ।
यथेप्सितेषु देशेषु विजह्रातेऽमराविव ॥ ५ ॥
अन्तःपुरके उपवन और उद्यानमें, पर्वतोंपर, वनोंमें तथा अन्य मनोवांछित प्रदेशोंमें भी वे देवताओंकी भाँति विहार करने लगे ॥ ५ ॥

ततः कदाचिद् विन्ध्यस्य प्रस्थे समशिलातले ।
पुष्पिताग्रेषु शालेषु विहारमभिजग्मतुः ॥ ६ ॥

तदनन्तर एक दिन विन्ध्यपर्वतके शिखरपर जहाँकी शिलामयी भूमि समतल थी और जहाँ ऊँचे शाल-वृक्षोंकी शाखाएँ फूलोंसे भरी हुई थीं, वहाँ वे दोनों दैत्य विहार करनेके लिये गये ।। ६ ।।

दिव्येषु सर्वकामेषु समानीतेषु तावुभौ ।
वरासनेषु संहृष्टौ सह स्त्रीभिर्निषीदतुः ।। ७ ।।
वहाँ उनके लिये सम्पूर्ण दिव्य भोग प्रस्तुत किये गये, तदनन्तर वे दोनों भाई श्रेष्ठ आसनोंपर सुन्दरी स्त्रियोंके साथ आनन्दमग्न होकर बैठे ।। ७ ।।

ततो वादित्रनृत्याभ्यामुपतिष्ठन्त तौ स्त्रियः ।
गीतैश्च स्तुतिसंयुक्तैः प्रीत्या समुपजग्मिरे ।। ८ ।।
तदनन्तर बहुत-सी स्त्रियाँ प्रेमपूर्वक उनके पास आयीं और वाद्य, नृत्य, गीत एवं स्तुति-प्रशंसा आदिके द्वारा उन दोनोंका मनोरंजन करने लगीं ।। ८ ।।

ततस्तिलोत्तमा तत्र वने पुष्पाणि चिन्वती ।
वेशं साऽऽक्षिप्तमाधाय रक्तेनैकेन वाससा ।। ९ ।।
इसी समय तिलोत्तमा वहाँ वनमें फूल चुनती हुई आयी। उसके शरीरपर एक ही लाल रंगकी महीन साड़ी थी। उसने ऐसा वेश धारण कर रखा था, जो किसी भी पुरुषको उन्मत्त बना सकता था ।। ९ ।।

नदीतीरेषु जातान् सा कर्णिकारान् प्रचिन्वती ।
शनैर्जगाम तं देशं यत्रास्तां तौ महासुरौ ।। १० ।।
नदीके किनारे उगे हुए कनेरके फूलोंका संग्रह करती हुई वह धीरे-धीरे उसी स्थानकी ओर गयी, जहाँ वे दोनों महादैत्य बैठे थे ।। १० ।।

तौ तु पीत्वा वरं पानं मदरक्तान्तलोचनौ ।
दृष्ट्वैव तां वरारोहां व्यथितौ सम्बभूवतुः ।। ११ ।।
उन दोनोंने बहुत अच्छा मादक रस पी लिया था, जिससे उनके नेत्र नशेके कारण कुछ लाल हो गये थे। उस सुन्दर अंगोंवाली तिलोत्तमाको देखते ही वे दोनों दैत्य कामवेदनासे व्यथित हो उठे ।। ११ ।।

तावुत्थायासनं हित्वा जग्मतुर्यत्र सा स्थिता ।
उभौ च कामसम्मत्तावुभौ प्रार्थयतश्च ताम् ।। १२ ।।
और अपना आसन छोड़कर खड़े हो उसी स्थानपर गये, जहाँ वह खड़ी थी। दोनों ही कामसे उन्मत्त हो रहे थे, इसलिये दोनों ही उसे अपनी स्त्री बनानेके लिये उससे प्रेमकी याचना करने लगे ।। १२ ।।

दक्षिणे तां करे सुभ्रूं सुन्दो जग्राह पाणिना ।
उपसुन्दोऽपि जग्राह वामे पाणौ तिलोत्तमाम् ।। १३ ।।