महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
राजेन्द्र! स्वामी कार्तिकेय भी वहाँ उपस्थित होकर सदा ब्रह्माजीकी सेवा करते हैं। भगवान् नारायण, देवर्षिगण, बालखिल्य ऋषि तथा दूसरे योनिज और अयोनिज ऋषि उस सभामें ब्रह्माजीकी आराधना करते हैं ।। ५२ १/२ ।।
यच्च किंचित् त्रिलोकेऽस्मिन् दृश्यते स्थाणु जङ्गमम् ।
सर्वं तस्यां मया दृष्टमिति विद्धि नराधिप ।। ५३ ।।
नरेश्वर! संक्षेपमें यह समझ लो कि तीनों लोकोंमें स्थावर-जंगम भूतोंके रूपमें जो कुछ भी दिखायी देता है, वह सब मैंने उस सभामें देखा था ।। ५३ ।।
अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।
प्रजावतां च पञ्चाशदृषीणामपि पाण्डव ।। ५४ ।।
पाण्डुनन्दन! अठासी हजार ऊर्ध्वरेता ऋषि और पचास संतानवान् महर्षि उस सभामें उपस्थित होते हैं ।। ५४ ।।
ते स्म तत्र यथाकामं दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः ।
प्रणम्य शिरसा तस्मै सर्वे यान्ति यथाऽऽगतम् ।। ५५ ।।
वे सब महर्षि तथा सम्पूर्ण देवता वहाँ इच्छानुसार ब्रह्माजीका दर्शन करके उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करते और आज्ञा लेकर जैसे आये होते हैं, वैसे ही चले जाते हैं ।। ५५ ।।
अतिथीनागतान् देवान् दैत्यान् नागांस्तथा द्विजान् ।
यक्षान् सुपर्णान् कालेयान् गन्धर्वाप्सरसस्तथा ।। ५६ ।।
महाभागानमितधीर्ब्रह्मा लोकपितामहः ।
दयावान् सर्वभूतेषु यथार्हं प्रतिपद्यते ।। ५७ ।।
अगाध बुद्धिवाले दयालु लोकपितामह ब्रह्माजी अपने यहाँ आये हुए सभी महाभाग अतिथियों—देवता, दैत्य, नाग, पक्षी, यक्ष, सुपर्ण, कालेय, गन्धर्व तथा अप्सराओं एवं सम्पूर्ण भूतोंसे यथायोग्य मिलते हैं और उन्हें अनुगृहीत करते हैं ।। ५६-५७ ।।
प्रतिगृह्य तु विश्वात्मा स्वयम्भूरमितद्युतिः ।
सान्त्वमानार्थसम्भोगैर्युनक्ति मनुजाधिप ।। ५८ ।।
मनुजेश्वर! अमित तेजस्वी विश्वात्मा स्वयम्भू उन सब अतिथियोंको अपनाकर उन्हें सान्त्वना देते, उनका सम्मान करते, उनके प्रयोजनकी पूर्ति करके उन सबको आवश्यकता तथा रुचिके अनुसार भोगसामग्री प्रदान करते हैं ।। ५८ ।।
तथा तैरुपयातैश्च प्रतियद्भिश्च भारत ।
आकुला सा सभा तात भवति स्म सुखप्रदा ।। ५९ ।।
तात भारत! इस प्रकार वहाँ आने-जानेवाले लोगोंसे भरी हुई वह सभा बड़ी सुखदायिनी जान पड़ती है ।। ५९ ।।
सर्वतेजोमयी दिव्या ब्रह्मर्षिगणसेविता ।
ब्राह्म्या श्रिया दीप्यमाना शुशुभे विगतक्लमा ।। ६० ।।
सा सभा तादृशी दृष्टा मया लोकेषु दुर्लभा ।
सभेयं राजशार्दूल मनुष्येषु यथा तव ॥ ६१ ॥
नृपश्रेष्ठ! वह सभा सम्पूर्ण तेजसे सम्पन्न, दिव्य तथा ब्रह्मर्षियोंके समुदायसे सेवित और पापरहित एवं ब्राह्मी श्रीसे उद्भासित और सुशोभित होती रहती है। वैसी उस सभाका मैंने दर्शन किया है। जैसे मनुष्यलोकमें तुम्हारी यह सभा दुर्लभ है, वैसे ही सम्पूर्ण लोकोंमें ब्रह्माजीकी सभा परम दुर्लभ है ॥ ६०-६१ ॥
एता मया दृष्टपूर्वाः सभा देवेषु भारत ।
सभेयं मानुषे लोके सर्वश्रेष्ठतमा तव ॥ ६२ ॥
भारत! ये सभी सभाएँ मैंने पूर्वकालसे देव-लोकमें देखी हैं। मनुष्यलोकमें तो तुम्हारी यह सभा ही सर्वश्रेष्ठ है ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि ब्रह्मसभावर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें ब्रह्मसभा-वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
* ‘एतत् सत्यं ब्रह्मपुरम्’ इस श्रुतिसे भी उसकी नित्यता ही सूचित होती है।
१. आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र—ये चार उपवेद माने गये हैं।
२. अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रा, नाद, बिन्दु और शक्ति—ये प्रणवके सात प्रकार हैं अथवा संस्कृत, प्राकृत, पैशाची, अपभ्रंश, ललित, मागध और गद्य—ये वाणीके सात प्रकार जानने चाहिये।
राजा हरिश्चन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश
द्वादशोऽध्यायः
राजा हरिश्चन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश
युधिष्ठिर उवाच
प्रायशो राजलोकस्ते कथितो वदतां वर ।
वैवस्वतसभायां तु यथा वदसि मे प्रभो ॥ १ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! जैसा आपने मुझसे वर्णन किया है, उसके अनुसार सूर्यपुत्र यमकी सभामें ही अधिकांश राजालोगोंकी स्थिति बतायी गयी है ॥ १ ॥
वरुणस्य सभायां तु नागास्ते कथिता विभो ।
दैत्येन्द्राश्चापि भूयिष्ठाः सरितः सागरास्तथा ॥ २ ॥
प्रभो! वरुणकी सभामें तो अधिकांश नाग, दैत्येन्द्र, सरिताएँ और समुद्र ही बताये गये हैं ॥ २ ॥
तथा धनपतेर्यक्षा गुह्यका राक्षसास्तथा ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव भगवांश्च वृषध्वजः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार धनाध्यक्ष कुबेरकी सभामें यक्ष, गुह्यक, राक्षस, गन्धर्व, अप्सरा तथा भगवान् शंकरकी उपस्थितिका वर्णन हुआ है ॥ ३ ॥
पितामहसभायां तु कथितास्ते महर्षयः ।
सर्वे देवनिकायाश्च सर्वशास्त्राणि चैव ह ॥ ४ ॥
ब्रह्माजीकी सभामें आपने महर्षियों, सम्पूर्ण देवगणों तथा समस्त शास्त्रोंकी स्थिति बतायी है ॥ ४ ॥
शक्रस्य तु सभायां तु देवाः संकीर्तिता मुने ।
उद्देशतश्च गन्धर्वा विविधाश्च महर्षयः ॥ ५ ॥
परंतु मुने! इन्द्रकी सभामें आपने अधिकांश देवताओंकी ही उपस्थितिका वर्णन किया है और थोड़े-से विभिन्न गंधर्वों एवं महर्षियोंकी भी स्थिति बतायी है ॥ ५ ॥
एक एव तु राजर्षिर्हरिश्चन्द्रो महामुने ।
कथितस्ते सभायां वै देवेन्द्रस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
महामुने! महात्मा देवराज इन्द्रकी सभामें आपने राजर्षियोंमेंसे एकमात्र हरिश्चन्द्रका ही नाम लिया है ॥ ६ ॥
किं कर्म तेनाचरितं तपो वा नियतव्रत ।
येनासौ सह शक्रेण स्पर्द्धते सुमहायशाः ॥ ७ ॥
नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! उन्होंने कौन-सा कर्म अथवा कौन-सी तपस्या की है, जिससे वे महान् यशस्वी होकर देवराज इन्द्रसे स्पर्धा कर रहे हैं ॥ ७ ॥
पितृलोकगतश्चैव त्वया विप्र पिता मम ।
दृष्टः पाण्डुर्महाभागः कथं वापि समागतः ॥ ८ ॥
किमुक्तवांश्च भगवंस्तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ।
त्वत्तः श्रोतुं सर्वमिदं परं कौतूहलं हि मे ॥ ९ ॥
विप्रवर! आपने पितृलोकमें जाकर मेरे पिता महाभाग पाण्डुको भी देखा था, किस प्रकार वे आपसे मिले थे? भगवन्! उन्होंने आपसे क्या कहा? यह मुझे बताइये। सुव्रत! आपसे यह सब कुछ सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ८-९ ॥
नारद उवाच
यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र हरिश्चन्द्रं प्रति प्रभो ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥ १० ॥
नारदजीने कहा— शक्तिशाली राजेन्द्र! तुमने जो राजर्षि हरिश्चन्द्रके विषयमें मुझसे पूछा है, उसके उत्तरमें मैं उन बुद्धिमान् नरेशका माहात्म्य बता रहा हूँ, सुनो ॥ १० ॥
(इक्ष्वाकूणां कुले जातस्त्रिशङ्कुर्नाम पार्थिवः ।
अयोध्याधिपतिर्वीरो विश्वामित्रेण संस्थितः ॥
तस्य सत्यवती नाम पत्नी केकयवंशजा ।
तस्यां गर्भः समभवद् धर्मेण कुरुनन्दन ॥
सा च काले महाभागा जन्ममासं प्रविश्य वै ।
कुमारं जनयामास हरिश्चन्द्रमकल्मषम् ॥
स वै राजा हरिश्चन्द्रस्त्रैशङ्कव इति स्मृतः ।)
इक्ष्वाकुकुलमें त्रिशंकु नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वीर त्रिशंकु अयोध्याके स्वामी थे और वहाँ विश्वामित्र मुनिके साथ रहा करते थे। उनकी पत्नीका नाम सत्यवती था, वह केकय-कुलमें उत्पन्न हुई थी। कुरुनन्दन! रानी सत्यवतीके धर्मानुकूल गर्भ रहा। फिर समयानुसार जन्ममास प्राप्त होनेपर महाभागा रानीने एक निष्पाप पुत्रको जन्म दिया, उसका नाम हुआ हरिश्चन्द्र। वे त्रिशंकुकुमार ही लोकविख्यात राजा हरिश्चन्द्र कहे गये हैं।
स राजा बलवानासीत् सम्राट् सर्वमहीक्षिताम् ।
तस्य सर्वे महीपालाः शासनावनताः स्थिताः ॥ ११ ॥
राजा हरिश्चन्द्र बड़े बलवान् और समस्त भूपालोंके सम्राट् थे। भूमण्डलके सभी नरेश उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सिर झुकाये खड़े रहते थे ॥ ११ ॥
तेनैकं रथमास्थाय जैत्रं हेमविभूषितम् ।
शस्त्रप्रतापेन जिता द्वीपाः सप्त जनेश्वर ॥ १२ ॥
जनेश्वर! उन्होंने एकमात्र स्वर्णविभूषित जैत्र नामक रथपर चढ़कर अपने शस्त्रोंके प्रतापसे सातों द्वीपोंपर विजय प्राप्त कर ली थी ।। १२ ।।
स निर्जित्य महीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम् ।
आजहार महाराज राजसूयं महाक्रतुम् ।। १३ ।।
महाराज! पर्वतों और वनोंसहित इस सारी पृथ्वीको जीतकर राजा हरिश्चन्द्रने राजसूय नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान किया ।। १३ ।।
तस्य सर्वे महीपाला धनान्याजहुराज्ञया ।
द्विजानां परिवेष्टारस्तस्मिन् यज्ञे च तेऽभवन् ।। १४ ।।
राजाकी आज्ञासे समस्त भूपालोंने धन लाकर भेंट किये और उस यज्ञमें ब्राह्मणोंको भोजन परोसनेका कार्य किया ।। १४ ।।
प्रादाच्च द्रविणं प्रीत्या याचकानां नरेश्वरः ।
यथोक्तवन्तस्ते तस्मिंस्ततः पञ्चगुणाधिकम् ।। १५ ।।
महाराज हरिश्चन्द्रने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस यज्ञमें याचकोंको, जितना उन्होंने माँगा, उससे पाँचगुना अधिक धन दान किया ।। १५ ।।
अतर्पयच्च विविधैर्वसुभिर्ब्राह्मणांस्तदा ।
प्रसर्पकाले सम्प्राप्ते नानादिग्भ्यः समागतान् ।। १६ ।।
जब अग्निदेवके विसर्जनका अवसर आया, उस समय उन्होंने विभिन्न दिशाओंसे आये हुए ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके धन एवं रत्न देकर तृप्त किया ।। १६ ।।
भक्ष्यभोज्यैश्च विविधैर्यथाकामपुरस्कृतैः ।
रत्नौघतर्पितैस्तुष्टैर्द्विजैश्च समुदाहृतम् ।
तेजस्वी च यशस्वी च नृपेभ्योऽभ्यधिकोऽभवत् ।। १७ ।।
नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, मनोवांछित वस्तुओंका पुरस्कार तथा रत्नराशिका दान देकर तृप्त एवं संतुष्ट किये हुए ब्राह्मणोंने राजा हरिश्चन्द्रको आशीर्वाद दिये। इसीलिये वे अन्य राजाओंकी अपेक्षा अधिक तेजस्वी और यशस्वी हुए हैं ।। १७ ।।
एतस्मात् कारणाद् राजन् हरिश्चन्द्रो विराजते ।
तेभ्यो राजसहस्रेभ्यस्तद् विद्धि भरतर्षभ ।। १८ ।।
राजन्! भरतश्रेष्ठ! यही कारण है कि उन सहस्रों राजाओंकी अपेक्षा महाराज हरिश्चन्द्र अधिक सम्मानपूर्वक इन्द्रसभामें विराजमान होते हैं—इस बातको तुम अच्छी तरह जान लो ।। १८ ।।
समाप्य च हरिश्चन्द्रो महायज्ञं प्रतापवान् ।
अभिषिक्तश्च शुशुभे साम्राज्येन नराधिप ।। १९ ।।
नरेश्वर! प्रतापी हरिश्चन्द्र उस महायज्ञको समाप्त करके जब सम्राट्के पदपर अभिषिक्त हुए, उस समय उनकी बड़ी शोभा हुई ।। १९ ।।
ये चान्ये च महीपाला राजसूयं महाक्रतुम् । यजन्ते ते सहेन्द्रेण मोदन्ते भरतर्षभ ॥ २० ॥ भरतकुलभूषण! दूसरे भी जो भूपाल राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करते हैं, वे देवराज इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं ॥ २० ॥
ये चापि निधनं प्राप्ताः संग्रामेष्वपलायिनः । ते तत् सदनमासाद्य मोदन्ते भरतर्षभ ॥ २१ ॥ भरतर्षभ! जो लोग संग्राममें पीठ न दिखाकर वहीं मृत्युका वरण कर लेते हैं, वे भी देवराज इन्द्रकी उस सभामें जाकर वहाँ आनन्दका उपभोग करते हैं ॥ २१ ॥
तपसा ये च तीव्रेण त्यजन्तीह कलेवरम् । ते तत् स्थानं समासाद्य श्रीमन्तो भान्ति नित्यशः ॥ २२ ॥ तथा जो लोग कठोर तपस्याके द्वारा यहाँ अपने शरीरका त्याग करते हैं, वे भी उस इन्द्रसभामें जाकर तेजस्वीरूप धारण करके सदा प्रकाशित होते रहते हैं ॥ २२ ॥
पिता च त्वाऽऽह कौन्तेय पाण्डुः कौरवनन्दन । हरिश्चन्द्रे श्रियं दृष्ट्वा नृपतौ जातविस्मयः ॥ २३ ॥ कौरवनन्दन कुन्तीकुमार! तुम्हारे पिता पाण्डुने राजा हरिश्चन्द्रकी सम्पत्ति देखकर अत्यन्त चकित हो तुमसे कहनेके लिये संदेश दिया है ॥ २३ ॥
विज्ञाय मानुषं लोकमायान्तं मां नराधिप । प्रोवाच प्रणतो भूत्वा वदेथास्त्वं युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥ नरेश्वर! मुझे मनुष्यलोकमें आता जान उन्होंने प्रणाम करके मुझसे कहा—'देवर्षे! आप युधिष्ठिरसे यह कहियेगा— ॥ २४ ॥
समर्थोऽसि महीं जेतुं भ्रातरस्ते स्थिता वशे । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहरस्वेति भारत ॥ २५ ॥ 'भारत! तुम्हारे भाई तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं, तुम सारी पृथ्वीको जीतनेमें समर्थ हो; अतः राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान करो ॥ २५ ॥
त्वयीष्टवति पुत्रेऽहं हरिश्चन्द्रवदाशु वै । मोदिष्ये बहुलाः शश्वत् समाः शक्रस्य संसदि ॥ २६ ॥ 'तुम-जैसे पुत्रके द्वारा वह यज्ञ सम्पन्न होनेपर मैं भी शीघ्र ही राजा हरिश्चन्द्रकी भाँति बहुत वर्षोंतक इन्द्रभवनमें आनन्द भोगूँगा' ॥ २६ ॥
एवं भवतु वक्ष्येऽहं तव पुत्रं नराधिपम् । भूलोकं यदि गच्छेयमिति पाण्डुमथाब्रुवम् ॥ २७ ॥ तब मैंने पाण्डुसे कहा—'एवमस्तु, यदि मैं भूलोकमें जाऊँगा तो आपके पुत्र राजा युधिष्ठिरसे कह दूँगा' ॥ २७ ॥
तस्य त्वं पुरुषव्याघ्र संकल्पं कुरु पाण्डव ।
गन्तासि त्वं महेन्द्रस्य पूर्वैः सह सलोकताम् ॥ २८ ॥
पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन! तुम अपने पिताके संकल्पको पूरा करो। ऐसा करनेपर तुम पूर्वजोंके साथ देवराज इन्द्रके लोकमें जाओगे ॥ २८ ॥
बहुविघ्नश्च नृपते क्रतुरेष स्मृतो महान् ।
छिद्राण्यस्य तु वाञ्छन्ति यज्ञघ्ना ब्रह्मराक्षसाः ॥ २९ ॥
राजन्! इस महान् यज्ञमें बहुत-से विघ्न आनेकी सम्भावना रहती है; क्योंकि यज्ञनाशक ब्रह्मराक्षस इसका छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं ॥ २९ ॥
युद्धं च क्षत्रशमनं पृथिवीक्षयकारणम् ।
किंचिदेव निमित्तं च भवत्यत्र क्षयावहम् ॥ ३० ॥
तथा इसका अनुष्ठान होनेपर कोई एक ऐसा निमित्त भी बन जाता है, जिससे पृथ्वीपर विनाशकारी युद्ध उपस्थित हो जाता है, जो क्षत्रियोंके संहार और भूमण्डलके विनाशका कारण होता है ॥ ३० ॥
एतत् संचिन्त्य राजेन्द्र यत् क्षेमं तत् समाचर ।
अप्रमत्तोत्थितो नित्यं चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे ॥ ३१ ॥
राजेन्द्र! यह सब सोच-विचारकर तुम्हें जो हितकर जान पड़े, वह करो। चारों वर्णोंकी रक्षाके लिये सदा सावधान और उद्यत रहो ॥ ३१ ॥
भव एधस्व मोदस्व धनैस्तर्पय च द्विजान् ।
एतत् ते विस्तरेणोक्तं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि दाशार्हनगरीं प्रति ॥ ३२ ॥
संसारमें तुम्हारा अभ्युदय हो, तुम आनन्दित रहो और धनसे ब्राह्मणोंको तृप्त करो। तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने विस्तारपूर्वक बता दिया। अब मैं यहाँसे द्वारका जाऊँगा, इसके लिये तुमसे अनुमति चाहता हूँ ॥ ३२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमाख्याय पार्थेभ्यो नारदो जनमेजय ।
जगाम तैर्वृतो राजन्नृषिभिर्यैः समागतः ॥ ३३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुन्तीकुमारोंसे ऐसा कहकर नारदजी जिन ऋषियोंके साथ आये थे, उन्हींसे घिरे हुए पुनः चले गये ॥ ३३ ॥
गते तु नारदे पार्थो भ्रातृभिः सह कौरवः ।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं चिन्तयामास पार्थिवः ॥ ३४ ॥
नारदजीके चले जानेपर कुरुश्रेष्ठ कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञके विषयमें विचार करने लगे ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यान पर्वणि पाण्डुसंदेशकथने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें पाण्डु-संदेश-कथनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३७ १/३ श्लोक हैं)
(राजसूयारम्भपर्व)
(राजसूयारम्भपर्व)
त्रयोदशोऽध्यायः
युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना
वैशम्पायन उवाच
ऋषेस्तद् वचनं श्रुत्वा निशश्वास युधिष्ठिरः ।
चिन्तयन् राजसूयेष्टिं न लेभे शर्म भारत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवर्षि नारदका वह वचन सुनकर युधिष्ठिरने लंबी साँस खींची। राजसूययज्ञके सम्बन्धमें चिन्तन करते हुए उन्हें शान्ति नहीं मिली ॥ १ ॥
राजर्षीणां च तं श्रुत्वा महिमानं महात्मनाम् ।
यज्वनां कर्मभिः पुण्यैर्लोकप्राप्तिं समीक्ष्य च ॥ २ ॥
हरिश्चन्द्रं च राजर्षिं रोचमानं विशेषतः ।
यज्वानं यज्ञमाहर्तुं राजसूयमिषेष सः ॥ ३ ॥
राजसूययज्ञ करनेवाले महात्मा राजर्षियोंकी वैसी महिमा सुनकर तथा पुण्यकर्मोंद्वारा उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती देखकर एवं यज्ञ करनेवाले राजर्षि हरिश्चन्द्रका महान् तेज (तथा विशेष वैभव एवं आदर-सत्कार) सुनकर उनके मनमें राजसूययज्ञ करनेकी इच्छा हुई ॥ २-३ ॥
युधिष्ठिरस्ततः सर्वानर्चयित्वा सभासदः ।
प्रत्यर्चितश्च तैः सर्वैर्यज्ञायैव मनो दधे ॥ ४ ॥
तदनन्तर युधिष्ठिरने अपने समस्त सभासदोंका सत्कार किया और उन सब सदस्योंने भी उनका बड़ा सम्मान किया। अन्तमें (सबकी सम्मतिसे) उनका मन यज्ञ करनेके ही संकल्पपर दृढ़ हो गया ॥ ४ ॥
स राजसूयं राजेन्द्र कुरूणामृषभस्तदा ।
आहर्तुं प्रवणं चक्रे मनः संचिन्त्य चासकृत् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उस समय बार-बार विचार करके राजसूययज्ञके अनुष्ठानमें ही मन लगाया ॥ ५ ॥
भूयश्चाद्भुतवीर्यौजा धर्ममेवानुचिन्तयन् ।
किं हितं सर्वलोकानां भवेदिति मनो दधे ॥ ६ ॥ अद्भुत बल और पराक्रमवाले धर्मराजने पुनः अपने धर्मका ही चिन्तन किया और सम्पूर्ण लोकोंका हित कैसे हो, इसी ओर वे ध्यान देने लगे ॥ ६ ॥
अनुगृह्णन् प्रजाः सर्वाः सर्वधर्मभृतां वरः । अविशेषेण सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ॥ ७ ॥ युधिष्ठिर समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे। वे सारी प्रजापर अनुग्रह करके सबका समानरूपसे हितसाधन करने लगे ॥ ७ ॥
सर्वेषां दीयतां देयं मुञ्चन् कोपमदावुभौ । साधु धर्मेति धर्मेति नान्यच्छ्रूयेत भाषितम् ॥ ८ ॥ क्रोध और अभिमानसे रहित होकर राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंसे कह दिया कि 'देनेयोग्य वस्तुएँ सबको दी जायँ अथवा सारी जनताका पावना (ऋण) चुका दिया जाय।' उनके राज्यमें 'धर्मराज! आप धन्य हैं। धर्मस्वरूप युधिष्ठिर आपको साधुवाद!' इसके सिवा और कोई बात नहीं सुनी जाती थी ॥ ८ ॥
एवंगते ततस्तस्मिन् पितरीवाश्वसज्जनाः । न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता ॥ ९ ॥ उनका ऐसा व्यवहार देख सारी प्रजा उनके ऊपर पिताके समान भरोसा रखने लगी। उनके प्रति द्वेष रखनेवाला कोई नहीं रहा। इसीलिये वे 'अजातशत्रु' नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ९ ॥
परिग्रहान्नरेन्द्रस्य भीमस्य परिपालनात् । शत्रूणां क्षपणाच्चैव बीभत्सोः सव्यसाचिनः ॥ १० ॥ धीमतः सहदेवस्य धर्माणामनुशासनात् । वैनत्यात् सर्वतश्चैव नकुलस्य स्वभावतः । अविग्रहा वीतभयाः स्वधर्मनिरताः सदा ॥ ११ ॥ निकामवर्षाः स्फीताश्च आसञ्जनपदास्तथा । महाराज युधिष्ठिर सबको आत्मीयजनोंकी भाँति अपनाते, भीमसेन सबकी रक्षा करते, सव्यसाची अर्जुन शत्रुओंके संहारमें लगे रहते, बुद्धिमान् सहदेव सबको धर्मका उपदेश दिया करते और नकुल स्वभावसे ही सबके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करते थे। इससे उनके राज्यके सभी जनपद कलहशून्य, निर्भय, स्वधर्मपरायण तथा उन्नतिशील थे। वहाँ उनकी इच्छाके अनुसार समयपर वर्षा होती थी ॥ १०-११ ½ ॥
वार्धुषी यज्ञसत्त्वानि गोरक्षं कर्षणं वणिक् ॥ १२ ॥ विशेषात् सर्वमेवैतत् संजज्ञे राजकर्मणा । अनुकर्षं च निष्कर्षं व्याधिपावकमूर्च्छनम् ॥ १३ ॥ सर्वमेव न तत्रासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ।
उन दिनों राजाके सुप्रबन्धसे ब्याजकी आजीविका, यज्ञकी सामग्री, गोरक्षा, खेती और व्यापार—इन सबकी विशेष उन्नति होने लगी। निर्धन प्रजाजनोंसे पिछले वर्षका बाकी कर नहीं लिया जाता था तथा चालू वर्षका कर वसूल करनेके लिये किसीको पीड़ा नहीं दी जाती थी। सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले युधिष्ठिरके शासनकालमें रोग तथा अग्निका प्रकोप आदि कोई भी उपद्रव नहीं था ।। १२-१३ ½ ।।
दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यश्च राज्ञः प्रति परस्परम् ।। १४ ।। राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयत मृषा कृतम् ।
लुटेरोंसे, ठगोंसे, राजासे तथा राजाके प्रिय व्यक्तियोंसे प्रजाके प्रति अत्याचार या मिथ्या व्यवहार कभी नहीं सुना जाता था और आपसमें भी सारी प्रजा एक-दूसरेसे मिथ्या व्यवहार नहीं करती थी ।। १४ ½ ।।
प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वकर्मजम् ।। १५ ।। अभिहर्तुं नृपाः षट्सु पृथग् जात्यैश्च नैगमैः । ववृधे विषयस्तत्र धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ।। १६ ।। कामतोऽप्युपयुञ्जानै राजसैर्लोभजैर्जनैः ।
दूसरे राजालोग विभिन्न देशके कुलीन वैश्योंके साथ धर्मराज युधिष्ठिरका प्रिय करने, उन्हें कर देने, अपने उपार्जित धन-रत्न आदिकी भेंट देने तथा संधि-विग्रहादि छः कार्योंमें राजाको सहयोग देनेके लिये उनके पास आते थे। सदा धर्ममें ही लगे रहनेवाले राजा युधिष्ठिरके शासनकालमें राजस स्वभाववाले तथा लोभी मनुष्योंद्वारा इच्छानुसार धन आदिका उपभोग किये जानेपर भी उनका देश दिनोदिन उन्नति करने लगा ।। १५-१६ ½ ।।
सर्वव्यापी सर्वगुणी सर्वसाहः स सर्वराट् ।। १७ ।।
राजा युधिष्ठिरकी ख्याति सर्वत्र फैल रही थी। सभी सद्गुण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। वे शीत एवं उष्ण आदि सभी द्वन्द्वोंको सहनेमें समर्थ तथा अपने राजोचित गुणोंसे सर्वत्र सुशोभित होते थे ।। १७ ।।
यस्मिन्नधिकृतः सम्राड् भ्राजमानो महायशाः । यत्र राजन् दश दिशः पितृतो मातृतस्तथा । अनुरक्ताः प्रजा आसन्नागोपाला द्विजातयः ।। १८ ।।
राजन्! दसों दिशाओंमें प्रकाशित होनेवाले वे महायशस्वी सम्राट् जिस देशपर अधिकार जमाते, वहाँ ग्वालोंसे लेकर ब्राह्मणोंतक सारी प्रजा उनके प्रति पिता-माताके समान भाव रखकर प्रेम करने लगती थी ।। १८ ।।
वैशम्पायन उवाच
स मन्त्रिणः समानाय्य भ्रातॄंश्च वदतां वरः । राजसूयं प्रति तदा पुनः पुनरपृच्छत ।। १९ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उस समय अपने मन्त्रियों और भाइयोंको बुलाकर उनसे बार-बार पूछा—‘राजसूययज्ञके सम्बन्धमें आपलोगोंकी क्या सम्मति है?’॥ १९॥
ते पृच्छमानाः सहिता वचोऽर्थ्यं मन्त्रिणस्तदा।
युधिष्ठिरं महाप्राज्ञं यियक्षुमिदमब्रुवन्॥ २०॥
इस प्रकार पूछे जानेपर उन सब मन्त्रियोंने एक साथ यज्ञकी इच्छावाले परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरसे उस समय यह अर्थयुक्त बात कही—॥ २०॥
येनाभिषिक्तो नृपतिर्वारुणं गुणमृच्छति।
तेन राजापि तं कृत्स्नं सम्राड्गुणमभीप्सति॥ २१॥
‘महाराज! राजसूययज्ञके द्वारा अभिषिक्त होनेपर राजा वरुणके गुणोंको प्राप्त कर लेता है; इसलिये प्रत्येक नरेश उस यज्ञके द्वारा सम्राट्के समस्त गुणोंको पानेकी अभिलाषा रखता है॥ २१॥
तस्य सम्राड्गुणार्हस्य भवतः कुरुनन्दन।
राजसूयस्य समयं मन्यन्ते सुहृदस्तव॥ २२॥
‘कुरुनन्दन! आप तो सम्राट्के गुणोंको पानेके सर्वथा योग्य हैं; अतः आपके हितैषी सुहृद् आपके द्वारा राजसूययज्ञके अनुष्ठानका यह उचित अवसर प्राप्त हुआ मानते हैं॥ २२॥
तस्य यज्ञस्य समयः स्वाधीनः क्षत्रसम्पदा।
साम्ना षडग्नयो यस्मिंछ्रीयन्ते शंसितव्रतैः॥ २३॥
‘उस यज्ञका समय क्षत्रसम्पत्ति यानी सेना आदिके अधीन है। उसमें उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले ब्राह्मण सामवेदके मन्त्रोंद्वारा अग्निकी स्थापनाके लिये छः अग्निवेदियोंका निर्माण करते हैं॥ २३॥
दर्वीहोमानुपादाय सर्वान् यः प्राप्नुते क्रतून्।
अभिषेकं च यस्यान्ते सर्वजित् तेन चोच्यते॥ २४॥
‘जो उस यज्ञका अनुष्ठान करता है, वह ‘दर्वीहोम’ (अग्निहोत्र आदि)-से लेकर समस्त यज्ञोंके फलको प्राप्त कर लेता है एवं यज्ञके अन्तमें जो अभिषेक होता है, उससे वह यज्ञकर्ता नरेश ‘सर्वजित् सम्राट्’ कहलाने लगता है॥ २४॥
समर्थोऽसि महाबाहो सर्वे ते वशगा वयम्।
अचिरात् त्वं महाराज राजसूयमवाप्स्यसि॥ २५॥
‘महाबाहो! आप उस यज्ञके सम्पादनमें समर्थ हैं। हम सब लोग आपकी आज्ञाके अधीन हैं। महाराज! आप शीघ्र ही राजसूययज्ञ पूर्ण कर सकेंगे॥ २५॥
अविचार्य महाराज राजसूये मनः कुरु।
इत्येवं सुहृदः सर्वे पृथक् च सह चाब्रुवन्॥ २६॥
‘अतः किसी प्रकारका सोच-विचार न करके आप राजसूयके अनुष्ठानमें मन लगाइये।’ इस प्रकार उनके सभी सुहृदोंने अलग-अलग और सम्मिलित होकर अपनी यही सम्मति प्रकट की॥ २६॥
स धर्म्यं पाण्डवस्तेषां वचः श्रुत्वा विशाम्पते।
धृष्टमिष्टं वरिष्ठं च जग्राह मनसारिहा॥ २७॥
प्रजानाथ! शत्रुसूदन पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने उनका यह साहसपूर्ण, प्रिय एवं श्रेष्ठ वचन सुनकर उसे मन-ही-मन ग्रहण किया॥ २७॥
श्रुत्वा सुहृद्वचस्तच्च जानंश्चाप्यात्मनः क्षमम्।
पुनः पुनर्मनो दध्रे राजसूयाय भारत॥ २८॥
भारत! उन्होंने सुहृदोंका वह सम्मतिसूचक वचन सुनकर तथा यह भी जानते हुए कि राजसूययज्ञ अपने लिये साध्य है, उसके विषयमें बारम्बार मन-ही-मन विचार किया॥ २८॥
स भ्रातृभिः पुनर्धीमानृत्विग्भिश्च महात्मभिः।
मन्त्रिभिश्चापि सहितो धर्मराजो युधिष्ठिरः।
धौम्यद्वैपायनाद्यैश्च मन्त्रयामास मन्त्रवित्॥ २९॥
फिर मन्त्रणाका महत्त्व जाननेवाले बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों, महात्मा ऋत्विजों, मन्त्रियों तथा धौम्य एवं व्यास आदि महर्षियोंके साथ इस विषयपर पुनः विचार करने लगे॥ २९॥
युधिष्ठिर उवाच
इयं या राजसूयस्य सम्राडर्हस्य सुक्रतोः।
श्रद्दधानस्य वदतः स्पृहा मे सा कथं भवेत्॥ ३०॥
**युधिष्ठिरने कहा—**महात्माओ! राजसूय नामक उत्तम यज्ञ किसी सम्राट्के ही योग्य है, तो भी मैं उसके प्रति श्रद्धा रखने लगा हूँ; अतः आपलोग बताइये, मेरे मनमें जो यह राजसूययज्ञ करनेकी अभिलाषा हुई है, कैसी है?॥ ३०॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तास्तु ते तेन राज्ञा राजीवलोचन।
इदमूचुर्वचः काले धर्मराजं युधिष्ठिरम्॥ ३१॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कमलनयन जनमेजय! राजाके इस प्रकार पूछनेपर वे सब लोग उस समय धर्मराज युधिष्ठिरसे यों बोले—॥ ३१॥
अर्हस्त्वमसि धर्मज्ञ राजसूयं महाक्रतुम्।
अथैवमुक्ते नृपतावृत्विग्भिर्ऋषिभिस्तथा॥ ३२॥
मन्त्रिणो भ्रातरश्चान्ये तद्वचः प्रत्यपूजयन्।
‘धर्मज्ञ! आप राजसूय महायज्ञ करनेके सर्वथा योग्य हैं।’ ऋत्विजों तथा महर्षियोंने जब राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा, तब उनके मन्त्रियों और भाइयोंने उन महात्माओंके वचनका बड़ा आदर किया ।। ३२१/२ ।।
स तु राजा महाप्राज्ञः पुनरेवात्मनाऽऽत्मवान् ।। ३३ ।। भूयो विममृशे पार्थो लोकानां हितकाम्यया । सामर्थ्ययोगं सम्प्रेक्ष्य देशकालौ व्ययागमौ ।। ३४ ।। विमृश्य सम्यक् च धिया कुर्वन् प्राज्ञो न सीदति । न हि यज्ञसमारम्भः केवल आत्मविनिश्चयात् ।। ३५ ।। भवतीति समाज्ञाय यत्नतः कार्यमुद्वहन् । स निश्चयार्थं कार्यस्य कृष्णमेव जनार्दनम् ।। ३६ ।। सर्वलोकात् परं मत्वा जगाम मनसा हरिम् । अप्रमेयं महाबाहुं कामाज्जातमजं नृषु ।। ३७ ।।
तदनन्तर मनको वशमें रखनेवाले महाबुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे पुनः इस विषयपर मन-ही-मन विचार किया—‘जो बुद्धिमान् अपनी शक्ति और साधनोंको देखकर तथा देश, काल, आय और व्ययको बुद्धिके द्वारा भलीभाँति समझ करके कार्य आरम्भ करता है, वह कष्टमें नहीं पड़ता। केवल अपने ही निश्चयसे यज्ञका आरम्भ नहीं किया जाता।’ ऐसा समझकर यत्नपूर्वक कार्यभार वहन करनेवाले युधिष्ठिरने उस कार्यके विषयमें पूर्ण निश्चय करनेके लिये जनार्दन भगवान् श्रीकृष्णको ही सब लोगोंसे उत्तम माना और वे मन-ही-मन उन अप्रमेय महाबाहु श्रीहरिकी शरणमें गये, जो अजन्मा होते हुए भी धर्म एवं साधु पुरुषोंकी रक्षा आदिकी इच्छासे मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे ।। ३३-३७ ।।
पाण्डवस्तर्कयामास कर्मभिर्देवसम्मतैः । नास्य किंचिदविज्ञातं नास्य किंचिदकर्मजम् ।। ३८ ।।
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने श्रीकृष्णके देवपूजित अलौकिक कर्मोंद्वारा यह अनुमान किया कि श्रीकृष्णके लिये कुछ भी अज्ञात नहीं है तथा कोई भी ऐसा कार्य नहीं है, जिसे वे कर न सकें ।। ३८ ।।
न स किंचिन्न विषहेदिति कृष्णममन्यत । स तु तां नैष्ठिकीं बुद्धिं कृत्वा पार्थो युधिष्ठिरः ।। ३९ ।। गुरुवद् भूतगुरवे प्राहिणोद् दूतमञ्जसा । शीघ्रगेन रथेनाशु स दूतः प्राप्य यादवान् ।। ४० ।। द्वारकावासिनं कृष्णं द्वारवत्यां समासदत् ।
उनके लिये कुछ भी असह्य नहीं है। इस तरह उन्होंने उन्हें सर्वशक्तिमान् एवं सर्वज्ञ माना। ऐसी निश्चयात्मक बुद्धि करके कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने गुरुजनोंके प्रति निवेदन करनेकी भाँति समस्त प्राणियोंके गुरु श्रीकृष्णके पास शीघ्र ही एक दूत भेजा। वह दूत शीघ्रगामी रथके द्वारा तुरंत यादवोंके यहाँ पहुँचकर द्वारकावासी श्रीकृष्णसे द्वारकामें ही मिला ।। ३९-४० १/३ ।।
(स प्रह्वः प्राञ्जलिर्भूत्वा व्यज्ञापयत माधवम् ।।
उसने विनयपूर्वक हाथ जोड़ भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार निवेदन किया।
दूत उवाच
धर्मराजो हृषीकेश धौम्यव्यासादिभिः सह ।
पाञ्चालमात्स्यसहितैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वशः ।।
त्वद्दर्शनं महाबाहो काङ्क्षते स युधिष्ठिरः ।
दूतने कहा—महाबाहु हृषीकेश! धर्मराज युधिष्ठिर धौम्य एवं व्यास आदि महर्षियों, द्रुपद और विराट आदि नरेशों तथा अपने समस्त भाइयोंके साथ आपका दर्शन करना चाहते हैं।
वैशम्पायन उवाच
इन्द्रसेनवचः श्रुत्वा यादवप्रवरो बली ।)
दर्शनाकाङ्क्षिणं पार्थं दर्शनाकाङ्क्षयाच्युतः ।। ४१ ।।
इन्द्रसेनेन सहित इन्द्रप्रस्थमगात् तदा ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—दूत इन्द्रसेनकी यह बात सुनकर यदुवंशशिरोमणि महाबली भगवान् श्रीकृष्ण दर्शनाभिलाषी युधिष्ठिरके पास स्वयं भी उनके दर्शनकी अभिलाषासे दूत इन्द्रसेनके साथ इन्द्रप्रस्थ नगरमें आये ।। ४१ १/३ ।।
व्यतीत्य विविधान् देशांस्त्वरावान् क्षिप्रवाहनः ।। ४२ ।।
मार्गमें अनेक देशोंको लाँघते हुए वे बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ रहे थे। उनके रथके घोड़े बहुत तेज चलनेवाले थे ।। ४२ ।।
इन्द्रप्रस्थगतं पार्थमभ्यगच्छज्जनार्दनः ।
स गृहे पितृवद् भ्रात्रा धर्मराजेन पूजितः ।
भीमेन च ततोऽपश्यत् स्वसारं प्रीतिमान् पितुः ।। ४३ ।।
भगवान् जनार्दन इन्द्रप्रस्थमें आकर राजा युधिष्ठिरसे मिले। फुफेरे भाई धर्मराज युधिष्ठिर तथा भीमसेनने अपने घरमें श्रीकृष्णका पिताकी भाँति पूजन किया। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण अपनी बुआ कुन्तीसे प्रसन्नतापूर्वक मिले ।। ४३ ।।
प्रीत: प्रीतेन सुहृदा रेमे स सहितस्तदा ।
अर्जुनेन यमाभ्यां च गुरुवत् पर्युपासितः ।। ४४ ।।
तदनन्तर प्रेमी सुहृद् अर्जुनसे मिलकर वे बहुत प्रसन्न हुए। फिर नकुल-सहदेवने गुरुकी भाँति उनकी सेवा-पूजा की॥ ४४॥ तं विश्रान्तं शुभे देशे क्षणिनं कल्पमच्युतम् । धर्मराजः समागम्याज्ञापयत् स्वप्रयोजनम् ॥ ४५ ॥ इसके बाद उन्होंने एक उत्तम भवनमें विश्राम किया। थोड़ी देर बाद जब वे मिलनेके योग्य हुए और इसके लिये उन्होंने अवसर निकाल लिया, तब धर्मराज युधिष्ठिरने आकर उनसे अपना सारा प्रयोजन बतलाया ॥ ४५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
प्रार्थितो राजसूयो मे न चासौ केवलिप्सया । प्राप्यते येन तत् ते हि विदितं कृष्ण सर्वशः ॥ ४६ ॥ युधिष्ठिर बोले—श्रीकृष्ण! मैं राजसूययज्ञ करना चाहता हूँ; परंतु वह केवल चाहनेभरसे ही पूरा नहीं हो सकता। जिस उपायसे उस यज्ञकी पूर्ति हो सकती है, वह सब आपको ही ज्ञात है॥ ४६॥ यस्मिन् सर्वं सम्भवति यश्च सर्वत्र पूज्यते । यश्च सर्वेश्वरो राजा राजसूयं स विन्दति ॥ ४७ ॥ जिसमें सब कुछ सम्भव है अर्थात् जो सब कुछ कर सकता है, जिसकी सर्वत्र पूजा होती है तथा जो सर्वेश्वर होता है, वही राजा राजसूययज्ञ सम्पन्न कर सकता है॥ ४७॥ तं राजसूयं सुहृदः कार्यमाहुः समेत्य मे । तत्र मे निश्चिततमं तव कृष्ण गिरा भवेत् ॥ ४८ ॥ मेरे सब सुहृद् एकत्र होकर मुझसे वही राजसूययज्ञ करनेके लिये कहते हैं; परंतु इसके विषयमें अन्तिम निश्चय तो आपके कहनेसे ही होगा ॥ ४८ ॥ केचिद्धि सौहृदादेव न दोषं परिचक्षते । स्वार्थहेतोस्तथैवान्ये प्रियमैव वदन्त्युत ॥ ४९ ॥ कुछ लोग प्रेम-सम्बन्धके नाते ही मेरे दोषों या त्रुटियोंको नहीं बताते हैं। दूसरे लोग स्वार्थवश वही बात कहते हैं, जो मुझे प्रिय लगे ॥ ४९ ॥ प्रियमेव परीप्सन्ते केचिदात्मनि यद्धितम् । एवंप्रायाश्च दृश्यन्ते जनवादाः प्रयोजने ॥ ५० ॥ कुछ लोग जो अपने लिये हितकर है, उसीको मेरे लिये भी प्रिय एवं हितकर समझ बैठते हैं। इस प्रकार अपने-अपने प्रयोजनको लेकर प्रायः लोगोंकी भिन्न-भिन्न बातें देखी जाती हैं॥ ५० ॥ त्वं तु हेतूनतीत्यैतान् कामक्रोधौ व्युदस्य च । परमं यत् क्षमं लोके यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ५१ ॥
परंतु आप उपर्युक्त सभी हेतुओंसे एवं काम-क्रोधसे रहित होकर (अपने स्वरूपमें स्थित हैं। अतः) इस लोकमें मेरे लिये जो उत्तम एवं करनेयोग्य हो, उसको ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें।। ५१ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि वासुदेवागमने त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें वासुदेवागमनविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५३ १/३ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1698)
चतुर्दशोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी राजसूययज्ञके लिये सम्मति
श्रीकृष्ण उवाच
सर्वैर्गुणैर्महाराज राजसूयं त्वमर्हसि ।
जानतस्त्वेव ते सर्वं किंचिद् वक्ष्यामि भारत ॥ १ ॥
**श्रीकृष्णने कहा—**महाराज! आपमें सभी सद्गुण विद्यमान हैं; अतः आप राजसूययज्ञ करनेके लिये योग्य हैं। भारत! आप सब कुछ जानते हैं, तो भी आपके पूछनेपर मैं इस विषयमें कुछ निवेदन करता हूँ ॥ १ ॥
जामदग्न्येन रामेण क्षत्रं यदवशेषितम् ।
तस्मादवरजं लोके यदिदं क्षत्रसंज्ञितम् ॥ २ ॥
जमदग्निनन्दन परशुरामने पूर्वकालमें जब क्षत्रियोंका संहार किया था, उस समय लुक-छिपकर जो क्षत्रिय शेष रह गये, वे पूर्ववर्ती क्षत्रियोंकी अपेक्षा निम्नकोटिके हैं। इस प्रकार इस समय संसारमें नाम-मात्रके क्षत्रिय रह गये हैं ॥ २ ॥
कृतोऽयं कुलसंकल्पः क्षत्रियैर्वसुधाधिप ।
निदेशवाग्भिस्तत् ते ह विदितं भरतर्षभ ॥ ३ ॥
पृथ्वीपते! इन क्षत्रियोंने पूर्वजोंके कथनानुसार सामूहिकरूपसे यह नियम बना लिया है कि हममेंसे जो समस्त क्षत्रियोंको जीत लेगा, वही सम्राट् होगा। भरतश्रेष्ठ! यह बात
आपको भी मालूम ही होगी ॥ ३ ॥
ऐलस्येक्ष्वाकुवंशस्य प्रकृतिं परिचक्षते ।
राजानः श्रेणिबद्धाश्च तथान्ये क्षत्रिया भुवि ॥ ४ ॥
इस समय श्रेणिबद्ध (सब-के-सब) राजा तथा भूमण्डलके दूसरे क्षत्रिय भी अपनेको सम्राट् पुरूरवा तथा इक्ष्वाकुकी संतान कहते हैं ॥ ४ ॥
ऐलवंशाश्च ये राजंस्तथैवेक्ष्वाकवो नृपाः ।
तानि चैकशतं विद्धि कुलानि भरतर्षभ ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ राजन्! पुरूरवा तथा इक्ष्वाकुके वंशमें जो नरेश आजकल हैं, उनके एक सौ कुल विद्यमान हैं; यह बात आप अच्छी तरह जान लें ॥ ५ ॥
ययातेस्त्वेव भोजानां विस्तरो गुणतो महान् ।
भजतेऽद्य महाराज विस्तरं स चतुर्दिशम् ॥ ६ ॥
तेषां तथैव तां लक्ष्मीं सर्वक्षत्रमुपासते ।
महाराज! आजकल राजा ययातिके कुलमें गुणकी दृष्टिसे भोजवंशियोंका ही अधिक विस्तार हुआ है। भोजवंशी बढ़कर चारों दिशाओंमें फैल गये हैं तथा आजके सभी क्षत्रिय उन्हींकी धन-सम्पत्तिका आश्रय ले रहे हैं ॥ ६ १/२ ॥
इदानीमेव वै राजन् जरासंधो महीपतिः ॥ ७ ॥
अभिभूय श्रियं तेषां कुलानामाभिषेचितः ।
स्थितो मूर्ध्नि नरेन्द्रणामोजसाऽऽक्रम्य सर्वशः ॥ ८ ॥
राजन्! अभी-अभी भूपाल जरासंध उन समस्त क्षत्रियकुलोंकी राजलक्ष्मीको लाँघकर राजाओंद्वारा सम्राट्के पदपर अभिषिक्त हुआ है और वह अपने बल-पराक्रमसे सबपर आक्रमण करके समस्त राजाओंका सिरमौर हो रहा है ॥ ७-८ ॥
सोऽवनिं मध्यमां भुक्त्वा मिथोभेदममन्यत ।
प्रभुर्यस्तु परो राजा यस्मिन्नेकवशे जगत् ॥ ९ ॥
जरासंध मध्यभूमिका उपभोग करते हुए समस्त राजाओंमें परस्पर फूट डालनेकी नीतिको पसंद करता है। इस समय वही सबसे प्रबल एवं उत्कृष्ट राजा है। यह सारा जगत् एकमात्र उसीके वशमें है ॥ ९ ॥
स साम्राज्यं महाराज प्राप्तो भवति योगतः ।
तं स राजा जरासंधं संश्रित्य किल सर्वशः ॥ १० ॥
राजन् सेनापतिर्जातः शिशुपालः प्रतापवान् ।
महाराज! वह अपनी राजनीतिक युक्तियोंसे इस समय सम्राट् बन बैठा है। राजन्! कहते हैं, प्रतापी राजा शिशुपाल सब प्रकारसे जरासंधका आश्रय लेकर ही उसका प्रधान सेनापति हो गया है ॥ १० १/२ ॥
तमेव च महाराज शिष्यवत् समुपस्थितः ॥ ११ ॥
वक्रः करूषाधिपतिर्मायायोधी महाबलः ।
युधिष्ठिर! मायायुद्ध करनेवाला महाबली करूषराज दन्तवक्र भी जरासंधके सामने शिष्यकी भाँति हाथ जोड़े खड़ा रहता है ।। ११ १/२ ।।
अपरौ च महावीर्यौ महात्मानौ समाश्रितौ ।। १२ ।।
जरासंधं महावीर्यं तौ हंसडिम्भकावुभौ ।
विशालकाय अन्य दो महापराक्रमी योद्धा सुप्रसिद्ध हंस और डिम्भक भी महाबली जरासंधकी शरण ले चुके थे ।। १२ १/२ ।।
दन्तवक्रः करूषश्च करभो मेघवाहनः ।
मूर्ध्ना दिव्यमणिं बिभ्रद् यमद्भुतमणिं विदुः ।। १३ ।।
करूषदेशका राजा दन्तवक्र, करभ और मेघवाहन—ये सभी सिरपर दिव्य मणिमय मुकुट धारण करते हुए भी जरासंधको अपने मस्तककी अद्भुत मणि मानते हैं (अर्थात् उसके चरणोंमें सिर झुकाते रहते हैं) ।। १३ ।।
मुरं च नरकं चैव शास्ति यो यवनाधिपः ।
अपर्यन्तबलो राजा प्रतीच्यां वरुणो यथा ।। १४ ।।
भगदत्तो महाराज वृद्धस्तव पितुः सखा ।
स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा च विशेषतः ।। १५ ।।
स्नेहबद्धश्च मनसा पितृवद् भक्तिमांस्त्वयि ।
महाराज! जो मुर और नरक नामक देशका शासन करते हैं, जिनकी सेना अनन्त है, जो वरुणके समान पश्चिम दिशाके अधिपति कहे जाते हैं, जिनकी वृद्धावस्था हो चली है तथा जो आपके पिताके मित्र रहे हैं, वे यवनाधिपति राजा भगदत्त भी वाणी तथा क्रियाद्वारा भी जरासंधके सामने विशेषरूपसे नतमस्तक रहते हैं; फिर वे मन-ही-मन तुम्हारे स्नेहपाशमें बँधे हैं और जैसे पिता अपने पुत्रपर प्रेम रखता है, वैसे ही उनका तुम्हारे ऊपर वात्सल्यभाव बना हुआ है ।। १४-१५ १/२ ।।
प्रतीच्यां दक्षिणं चान्तं पृथिव्याः प्रति यो नृपः ।। १६ ।।
मातुलो भवतः शूरः पुरुजित् कुन्तिवर्धनः ।
स ते सन्नतिमानेकः स्नेहतः शत्रुसूदनः ।। १७ ।।
जो भारतभूमिके पश्चिमसे लेकर दक्षिणतकके भागपर शासन करते हैं, आपके मामा वे शत्रुसंहारक शूरवीर कुन्तिभोजकुलवर्द्धक पुरुजित् अकेले ही स्नेहवश आपके प्रति प्रेम और आदरका भाव रखते हैं ।। १६-१७ ।।
जरासंधं गतस्त्वेव पुरा यो न मया हतः ।
पुरुषोत्तमविज्ञातो योऽसौ चेदिषु दुर्मतिः ।। १८ ।।
आत्मानं प्रतिजानाति लोकेऽस्मिन् पुरुषोत्तमम् ।
आदत्ते सततं मोहाद् यः स चिह्नं च मामकम् ।। १९ ।।