महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उन्होंने संसारमें वह कार्य किया जिसे दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा। यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुएँ और प्रचुर धन पाकर सदाके लिये तृप्त हो गये।
व्यासं धौम्यं च प्रयतो नारदं च महामतिम् ।।
सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च ।
याज्ञवल्क्यं कठं चैव कलापं च महौजसम् ।
सर्वांश्च विप्रप्रवरान् पूजयामास सत्कृतान् ।।
फिर राजा युधिष्ठिरने व्यास, धौम्य, महामति नारद, सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, याज्ञवल्क्य, कठ तथा महातेजस्वी कलाप—इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूर्ण मनोयोगके साथ सत्कार एवं पूजन किया।
युधिष्ठिर उवाच
युष्मत्प्रभावात् प्राप्तोऽयं राजसूयो महाक्रतुः ।
जनार्दनप्रभावाच्च सम्पूर्णो मे मनोरथः ।।
युधिष्ठिर उनसे बोले— महर्षियो! आपलोगोंके प्रभावसे यह राजसूय महायज्ञ सांगोपांग सम्पन्न हुआ। भगवान् श्रीकृष्णके प्रतापसे मेरा सारा मनोरथ पूर्ण हो गया।
वैशम्पायन उवाच
अथ यज्ञं समाप्यान्ते पूजयामास माधवम् ।
बलदेवं च देवेशं भीष्माद्यांश्च कुरुत्तमान् ।।)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार यज्ञसमाप्तिके समय राजा युधिष्ठिरने अन्तमें लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण, देवेश्वर बलदेव तथा कुरुश्रेष्ठ भीष्म आदिका पूजन किया।
समापयामास च तं राजसूयं महाक्रतुम् ।
तं तु यज्ञं महाबाहुरासमाप्तेर्जनार्दनः ।
ररक्ष भगवाञ्छौरिः शार्ङ्गचक्रगदाधरः ।। ३९ ।।
तदनन्तर उस राजसूय महायज्ञको विधिपूर्वक समाप्त किया। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने आरम्भसे लेकर अन्ततक उस यज्ञकी रक्षा की ।। ३९ ।।
ततस्त्ववभृथस्नातं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
समस्तं पार्थिवं क्षत्रमुपगम्येदमब्रवीत् ।। ४० ।।
तदनन्तर धर्मात्मा युधिष्ठिर जब अवभृथस्नान कर चुके, उस समय समस्त क्षत्रियराजाओंका समुदाय उनके पास जाकर बोला— ।। ४० ।।
दिष्ट्या वर्धसि धर्मज्ञ साम्राज्यं प्राप्तवानसि ।
आजमीढाजमीढानां यशः संवर्धितं त्वया ॥ ४१ ॥ कर्मणैतेन राजेन्द्र धर्मश्च सुमहान् कृतः । आपृच्छामो नरव्याघ्र सर्वकामैः सुपूजिताः ॥ ४२ ॥ ‘धर्मज्ञ! आपका अभ्युदय हो रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने सम्राटका पद प्राप्त कर लिया। अजमीढकुलनन्दन राजाधिराज! आपने इस कर्मद्वारा अजमीढवंशी क्षत्रियोंके यशका विस्तार तो किया ही है, महान् धर्मका भी सम्पादन किया है। नरव्याघ्र! आपने हमारे लिये सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थ सुलभ करके हमारा बड़ा सम्मान किया है। अब हम आपसे जानेकी अनुमति लेना चाहते हैं ॥ ४१-४२ ॥ स्वराष्ट्राणि गमिष्यामस्तदनुज्ञातुमर्हसि । श्रुत्वा तु वचनं राज्ञां धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४३ ॥ यथार्हं पूज्य नृपतीन् भ्रातॄन् सर्वानुवाच ह । राजानः सर्व एवैते प्रीत्यास्मान् समुपागताः ॥ ४४ ॥ प्रस्थिताः स्वानि राष्ट्राणि मामापृच्छ्य परंतपाः । अनुव्रजत भद्रं वो विषयान्तं नृपोत्तमान् ॥ ४५ ॥ ‘हम अपने-अपने राष्ट्रको जायँगे, आप हमें आज्ञा दें।' राजाओंका यह वचन सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पूजनीय नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके सब भाइयोंसे कहा—‘ये सभी राजा प्रेमसे ही हमारे यहाँ पधारे थे। ये परंतप भूपाल अब मुझसे पूछकर अपने राष्ट्रको जानेके लिये उद्यत हैं। तुमलोगोंका भला हो। तुमलोग अपने राज्यकी सीमातक आदरपूर्वक इन श्रेष्ठ नरपतियोंको पहुँचा आओ' ॥ ४३—४५ ॥ भ्रातुर्वचनमाज्ञाय पाण्डवा धर्मचारिणः । यथार्हं नृपतीन् सर्वानैकैकं समनुव्रजन् ॥ ४६ ॥ भाईकी बात मानकर वे धर्मात्मा पाण्डव एक-एक करके यथायोग्य सभी राजाओंके साथ गये ॥ ४६ ॥ विराटमन्वयात् तूर्णं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् । धनंजयो यज्ञसेनं महात्मानं महारथम् ॥ ४७ ॥ प्रतापी धृष्टद्युम्न तुरंत ही राजा विराटके साथ गया। धनंजयने महारथी महात्मा द्रुपदका अनुसरण किया ॥ ४७ ॥ भीष्मं च धृतराष्ट्रं च भीमसेनो महाबलः । द्रोणं च ससुतं वीरं सहदेवो युधाम्पतिः ॥ ४८ ॥ महाबली भीमसेन भीष्म और धृतराष्ट्रके साथ गये। योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेवने द्रोणाचार्य तथा उनके वीर पुत्र अश्वत्थामाको पहुँचाया ॥ ४८ ॥ नकुलः सुबलं राजन् सहपुत्रं समन्वयात् । द्रौपदेयाः ससौभद्राः पर्वतीयान् महारथान् ॥ ४९ ॥
राजन्! सुबल और उनके पुत्रके साथ नकुल गये। द्रौपदीके पाँच पुत्रों तथा अभिमन्युने पर्वतीय महारथियोंको अपने राज्यकी सीमातक पहुँचाया ।। ४९ ।। अन्वगच्छंस्तथैवान्यान् क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभाः । एवं सुपूजिताः सर्वे जग्मुर्विप्राः सहस्रशः ।। ५० ।। गतेषु पार्थिवेन्द्रेषु सर्वेषु ब्राह्मणेषु च । युधिष्ठिरमुवाचेदं वासुदेवः प्रतापवान् ।। ५१ ।। इसी प्रकार अन्य क्षत्रियशिरोमणियोंने दूसरे-दूसरे क्षत्रिय राजाओंका अनुगमन किया। इसी तरह सभी ब्राह्मण भी अत्यन्त पूजित हो सहस्रोंकी संख्यामें वहाँसे विदा हुए। राजाओं तथा ब्राह्मणोंके चले जानेपर प्रतापी भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिरसे कहा— ।। ५०-५१ ।। आपृच्छे त्वां गमिष्यामि द्वारकां कुरुनन्दन । राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं दिष्ट्या त्वं प्राप्तवानसि ।। ५२ ।। ‘कुरुनन्दन! मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ, अब मैं द्वारकापुरीको जाऊँगा। सौभाग्यसे आपने सब यज्ञोंमें उत्तम राजसूयका सम्पादन कर लिया’ ।। ५२ ।। तमुवाचैवमुक्तस्तु धर्मराजो जनार्दनम् । तव प्रसादाद् गोविन्द प्राप्तः क्रतुवरो मया ।। ५३ ।। उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिर जनार्दनसे बोले—‘गोविन्द! आपकी ही कृपासे मैंने यह श्रेष्ठ यज्ञ सम्पन्न किया है ।। ५३ ।। क्षत्रं समग्रमपि च त्वत्प्रसादाद् वशे स्थितम् । उपादाय बलिं मुख्यं मामेव समुपस्थितम् ।। ५४ ।। ‘तथा सारा क्षत्रियमण्डल भी आपके ही प्रसादसे मेरे अधीन हुआ और उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट ले मेरे पास आया ।। ५४ ।। कथं त्वद्गमनार्थं मे वाणी वितरतेऽनघ । न ह्यहं त्वामृते वीर रतिं प्राप्नोमि कर्हिचित् ।। ५५ ।। ‘अनघ! आपको जानेके लिये मेरी वाणी कैसे कह सकती है? वीर! मैं आपके बिना कभी प्रसन्न नहीं रह सकूँगा ।। ५५ ।। अवश्यं चैव गन्तव्या भवता द्वारकापुरी । एवमुक्तः स धर्मात्मा युधिष्ठिरसहायवान् ।। ५६ ।। अभिगम्याब्रवीत् प्रीतः पृथां पृथुयशा हरिः । साम्राज्यं समनुप्राप्ताः पुत्रास्तेऽद्य पितृष्वसः ।। ५७ ।। सिद्धार्था वसुमन्तश्च सा त्वं प्रीतिमवाप्नुहि । अनुज्ञातस्त्वया चाहं द्वारकां गन्तुमुत्सहे ।। ५८ ।। ‘परंतु आपका द्वारकापुरी जाना भी आवश्यक ही है।' उनके ऐसा कहनेपर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीहरि युधिष्ठिरको साथ ले बुआ कुन्तीके पास गये और प्रसन्नतापूर्वक
बोले—'बुआजी! तुम्हारे पुत्रोंने अब साम्राज्य प्राप्त कर लिया, उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। वे सब-के-सब धन तथा रत्नोंसे सम्पन्न हैं। अब तुम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहो। यदि तुम्हारी आज्ञा हो तो मैं द्वारका जाना चाहता हूँ'॥ ५६—५८ ॥
सुभद्रां द्रौपदीं चैव सभाजयत केशवः ।
निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्माद् युधिष्ठिरसहायवान् ॥ ५९ ॥
कुन्तीकी आज्ञा ले श्रीकृष्ण सुभद्रा और द्रौपदीसे भी मिले और मीठे वचनोंसे उन दोनोंको प्रसन्न किया। तत्पश्चात् वे युधिष्ठिरके साथ अन्तःपुरसे बाहर निकले ॥ ५९ ॥
स्नातश्च कृतजप्यश्च ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ।
ततो मेघवपुः प्रख्यं स्यन्दनं च सुकल्पितम् ।
योजयित्वा महाबाहुर्दारुकः समुपस्थितः ॥ ६० ॥
उपस्थितं रथं दृष्ट्वा तार्क्ष्यप्रवरकेतनम् ।
प्रदक्षिणमुपावृत्य समारुह्य महामनाः ॥ ६१ ॥
प्रययौ पुण्डरीकाक्षस्ततो द्वारवतीं पुरीम् ॥ ६२ ॥
फिर स्नान और जप करके उन्होंने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया। इसके बाद महाबाहु दारुक मेघके समान नीले रंगका सुन्दर रथ जोतकर उनकी सेवामें उपस्थित हुआ। गरुडध्वजसे सुशोभित उस सुन्दर रथको उपस्थित देख महामना कमलनयन श्रीकृष्णने उसकी दक्षिणावर्त प्रदक्षिणा की और उसपर आरूढ़ हो वे द्वारकापुरीकी ओर चल पड़े ॥ ६०—६२ ॥
(सात्यकिः कृतवर्मा च रथमारुह्य सत्वरौ ।
वीजयामासतुस्तत्र चामराभ्यां हरिं तथा ॥
बलदेवश्च देवेशो यादवाश्च सहस्रशः ।
प्रययू राजवत् सर्वे धर्मपुत्रेण पूजिताः ।
ततः स सम्मतं राजा हित्वा सौवर्णमासनम् ॥)
तं पद्भ्यामनुवव्राज धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भ्रातृभिः सहितः श्रीमान् वासुदेवं महाबलम् ॥ ६३ ॥
सात्यकि और कृतवर्मा शीघ्रतापूर्वक उस रथपर आरूढ़ हो श्रीहरिकी सेवाके लिये चँवर डुलाने लगे। देवेश्वर बलदेवजी तथा सहस्रों यदुवंशी धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे पूजित हो राजाकी भाँति वहाँसे विदा हुए। तदनन्तर सोनेके श्रेष्ठ सिंहासनको छोड़कर भाइयोंसहित श्रीमान् धर्मराज युधिष्ठिर पैदल ही महाबली भगवान् वासुदेवके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ ६३ ॥
ततो मुहूर्तं संगृह्य स्यन्दनप्रवरं हरिः ।
अब्रवीत् पुण्डरीकाक्षः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ६४ ॥
तब कमललोचन भगवान् श्रीहरिने दो घड़ीतक अपने श्रेष्ठ रथको रोककर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ६४ ॥
अप्रमत्तः स्थितो नित्यं प्रजाः पाहि विशाम्पते ।
पर्जन्यमिव भूतानि महाद्रुममिव द्विजाः ॥ ६५ ॥
बान्धवास्त्वोपजीवन्तु सहस्राक्षमिवामराः ।
कृत्वा परस्परेणैवं संविदं कृष्णपाण्डवौ ॥ ६६ ॥
अन्योन्यं समनुज्ञाप्य जग्मतुः स्वगृहान् प्रति ।
‘राजन्! आप सदा सावधान रहकर प्रजाजनोंके पालनमें लगे रहें। जैसे सब प्राणी मेघको, पक्षी महान् वृक्षको और सम्पूर्ण देवता इन्द्रको अपने जीवनका आधार मानकर उनका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार सभी बन्धु-बान्धव जीवन-निर्वाहके लिये आपका आश्रय लें।' श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर आपसमें इस प्रकार बातें करके एक दूसरेकी आज्ञा ले अपने-अपने स्थानको चल दिये ॥ ६५-६६ १/२ ॥
गते द्वारवतीं कृष्णे सात्वतप्रवरे नृप ॥ ६७ ॥
एको दुर्योधनो राजा शकुनिश्चापि सौबलः ।
तस्यां सभायां दिव्यायामूषतुस्तौ नरर्षभौ ॥ ६८ ॥
राजन्! यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर भी राजा दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि—ये दोनों नरश्रेष्ठ उस दिव्य सभाभवनमें ही रहे ॥ ६७-६८ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवधे
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें शिशुपालवधविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४२ श्लोक मिलाकर कुल ११० श्लोक हैं)
(द्यूतपर्व)
(द्यूतपर्व)
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
व्यासजीकी भविष्यवाणीसे युधिष्ठिरकी चिन्ता और समत्वपूर्ण बर्ताव करनेकी प्रतिज्ञा
वैशम्पायन उवाच
समाप्ते राजसूये तु क्रतुश्रेष्ठे सुदुर्लभे ।
शिष्यैः परिवृतो व्यासः पुरस्तात् समपद्यत ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यज्ञोंमें श्रेष्ठ परम दुर्लभ राजसूययज्ञके समाप्त हो जानेपर शिष्योंसे घिरे हुए भगवान् व्यास राजा युधिष्ठिरके पास आये ॥ १ ॥
सोऽभ्ययादासनात् तूर्णं भ्रातृभिः परिवारितः ।
पाद्येनासनदानेन पितामहमपूजयत् ॥ २ ॥
उन्हें देखकर भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर तुरंत आसनसे उठकर खड़े हो गये और आसन एवं पाद्य आदि समर्पण करके उन्होंने पितामह व्यासजीका यथावत् पूजन किया ॥ २ ॥
अथोपविश्य भगवान् काञ्चने परमासने । आस्यतामिति चोवाच धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ ३ ॥ तत्पश्चात् सुवर्णमय उत्तम आसनपर बैठकर भगवान् व्यासने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—‘बैठ जाओ’ ॥ ३ ॥ अथोपविष्टं राजानं भ्रातृभिः परिवारितम् । उवाच भगवान् व्यासस्तत्तद्वाक्यविशारदः ॥ ४ ॥ भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरके बैठ जानेपर बातचीतमें कुशल भगवान् व्यासने उनसे कहा— ॥ ४ ॥ दिष्ट्या वर्धसि कौन्तेय साम्राज्यं प्राप्य दुर्लभम् । वर्धिताः कुरवः सर्वे त्वया कुरुकुलोद्वह ॥ ५ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! बड़े आनन्दकी बात है कि तुम परम दुर्लभ सम्राटका पद पाकर सदा उन्नतिशील हो रहे हो। कुरुकुलका भार वहन करनेवाले नरेश! तुमने समस्त कुरुवंशियोंको समृद्धिशाली बना दिया ॥ ५ ॥ आपृच्छे त्वां गमिष्यामि पूजितोऽस्मि विशाम्पते । एवमुक्तः स कृष्णेन धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥ अभिवाद्योपसंगृह्य पितामहमथाब्रवीत् ।
‘राजन्! अब मैं जाऊँगा। इसके लिये तुम्हारी अनुमति चाहता हूँ। तुमने मेरा अच्छी तरह सम्मान किया है।’ महात्मा कृष्णद्वैपायन व्यासके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने उन पितामहके दोनों चरणोंको पकड़कर प्रणाम किया और कहा ।। ६ १/३ ।।
युधिष्ठिर उवाच
संशयो द्विपदां श्रेष्ठ ममोत्पन्नः सुदुर्लभः ।। ७ ।।
तस्य नान्योऽस्ति वक्ता वै त्वामृते द्विजपुङ्गव ।
**युधिष्ठिर बोले—**नरश्रेष्ठ! मेरे मनमें एक भारी संशय उत्पन्न हो गया है। विप्रवर! आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उसका समाधान कर सके ।। ७ १/३ ।।
उत्पातांस्त्रिविधान् प्राह नारदो भगवानृषिः ।। ८ ।।
दिव्यांश्चैवान्तरिक्षांश्च पार्थिवांश्च पितामह ।
अपि चैद्यस्य पतनाच्छन्नमौत्पातिकं महत् ।। ९ ।।
पितामह! देवर्षि भगवान् नारदने स्वर्ग, अन्तरिक्ष और पृथिवीविषयक तीन प्रकारके उत्पात बताये हैं। क्या शिशुपालके मारे जानेसे वे महान् उत्पात शान्त हो गये? ।।
वैशम्पायन उवाच
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा पराशरसुतः प्रभुः ।
कृष्णद्वैपायनो व्यास इदं वचनमब्रवीत् ।। १० ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा युधिष्ठिरका यह प्रश्न सुनकर पराशरनन्दन कृष्णद्वैपायन भगवान् व्यासने इस प्रकार कहा— ।। १० ।।
त्रयोदश समा राजन्नुत्पातानां फलं महत् ।
सर्वक्षत्रविनाशाय भविष्यति विशाम्पते ।। ११ ।।
‘राजन्! उत्पातोंका महान् फल तेरह वर्षोंतक हुआ करता है। इस समय जो उत्पात प्रकट हुआ था, वह समस्त क्षत्रियोंका विनाश करनेवाला होगा ।। ११ ।।
त्वामेकं कारणं कृत्वा कालेन भरतर्षभ ।
समेतं पार्थिवं क्षत्रं क्षयं यास्यति भारत ।
दुर्योधनापराधेन भीमार्जुनबलेन च ।। १२ ।।
‘भरतकुलतिलक! एकमात्र तुम्हींको निमित्त बनाकर यथासमय समस्त भूमिपालोंका समुदाय आपसमें लड़कर नष्ट हो जायगा। भारत! क्षत्रियोंका यह विनाश दुर्योधनके अपराधसे तथा भीमसेन और अर्जुनके पराक्रमद्वारा सम्पन्न होगा ।। १२ ।।
स्वप्ने द्रक्ष्यसि राजेन्द्र क्षपान्ते त्वं वृषध्वजम् ।
नीलकण्ठं भवं स्थाणुं कपालिं त्रिपुरान्तकम् ।। १३ ।।
उग्रं रुद्रं पशुपतिं महादेवमुमापतिम् ।
हरं शर्वं वृषं शूलं पिनाकिं कृत्तिवाससम् ।। १४ ।।
'राजेन्द्र! तुम रातके अन्तमें स्वप्नमें उन वृषभध्वज भगवान् शंकरका दर्शन करोगे, जो नीलकण्ठ, भव, स्थाणु, कपाली, त्रिपुरान्तक, उग्र, रुद्र, पशुपति, महादेव, उमापति, हर, शर्व, वृष, शूली, पिनाकी तथा कृत्तिवासा कहलाते हैं।। १३-१४ ।।
कैलासकूटप्रतिमं वृषभेऽवस्थितं शिवम् ।
निरीक्षमाणं सततं पितृराजाश्रितां दिशम् ।। १५ ।।
'उन भगवान् शिवकी कान्ति कैलासशिखरके समान उज्ज्वल होगी। वे वृषभपर आरूढ़ हुए सदा दक्षिण दिशाकी ओर देख रहे होंगे ।। १५ ।।
एवमीदृशकं स्वप्नं द्रक्ष्यसि त्वं विशाम्पते ।
मा तत्कृते ह्यनुध्याहि कालो हि दुरतिक्रमः ।। १६ ।।
'राजन्! तुम्हें इस प्रकार ऐसा स्वप्न दिखायी देगा, किंतु उसके लिये तुम्हें चिन्ता नहीं करनी चाहिये; क्योंकि काल सबके लिये दुर्लङ्घ्य है ।। १६ ।।
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि कैलासं पर्वतं प्रति ।
अप्रमत्तः स्थितो दान्तः पृथिवीं परिपालय ।। १७ ।।
'तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं कैलासपर्वतपर जाऊँगा। तुम सावधान एवं जितेन्द्रिय होकर पृथ्वीका पालन करो' ।। १७ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स भगवान् कैलासं पर्वतं ययौ ।
कृष्णद्वैपायनो व्यासः सह शिष्यैः श्रुतानुगैः ।। १८ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर भगवान् कृष्ण द्वैपायन व्यास वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले अपने शिष्योंके साथ कैलासपर्वतपर चले गये ।। १८ ।।
गते पितामहे राजा चिन्ताशोकसमन्वितः ।
निःश्वसन्नुष्णमसकृत् तमेवार्थं विचिन्तयन् ।। १९ ।।
कथं नु दैवं शक्येत पौरुषेण प्रबाधितुम् ।
अवश्यमेव भविता यदुक्तं परमर्षिणा ।। २० ।।
अपने पितामह व्यासजीके चले जानेपर चिन्ता और शोकसे युक्त राजा युधिष्ठिर बारंबार गरम साँसें लेते हुए उसी बातका चिन्तन करते रहे। अहो! दैवका विधान पुरुषार्थसे किस प्रकार टाला जा सकता है? महर्षिने जो कुछ कहा है, वह निश्चय ही होगा ।। १९-२० ।।
ततोऽब्रवीन्महातेजाः सर्वान् भ्रातॄन् युधिष्ठिरः ।
श्रुतं वै पुरुषव्याघ्रा यन्मां द्वैपायनोऽब्रवीत् ।। २१ ।।
तदा तद्वचनं श्रुत्वा मरणे निश्चिता मतिः ।
सर्वक्षत्रस्य निधने यद्यहं हेतुरीप्सितः ।। २२ ।।
कालेन निर्मितस्तात को ममार्थोऽस्ति जीवतः ।
एवं ब्रुवन्तं राजानं फाल्गुनः प्रत्यभाषत ॥ २३ ॥
यही सोचते-सोचते महातेजस्वी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे कहा—'पुरुषसिंहो! महर्षि व्यासने मुझसे जो कहा है, उसे तुमलोगोंने सुना है न? उनकी वह बात सुनकर मैंने मरनेका निश्चय कर लिया है। तात! यदि समस्त क्षत्रियोंके विनाशमें विधाताने मुझे ही निमित्त बनानेकी इच्छा की है, कालने मुझे ही इस अनर्थका कारण बनाया है तो मेरे जीवनका क्या प्रयोजन है?' राजाकी ऐसी बातें सुनकर अर्जुनने उत्तर दिया— ॥ २१—२३ ॥
मा राजन् कश्मलं घोरं प्रविशो बुद्धिनाशनम् ।
सम्प्रधार्य महाराज यत् क्षेमं तत् समाचर ॥ २४ ॥
'राजन्! इस भयंकर मोहमें न पड़िये, यह बुद्धिको नष्ट करनेवाला है। महाराज! अच्छी तरह सोच-विचारकर आपको जो कल्याणप्रद जान पड़े, वह कीजिये' ॥ २४ ॥
ततोऽब्रवीत् सत्यधृतिर्भ्रातॄन् सर्वान् युधिष्ठिरः ।
द्वैपायनस्य वचनं ह्येवं समनुचिन्तयन् ॥ २५ ॥
तब सत्यवादी युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंसे व्यासजीकी बातोंपर विचार करते हुए कहा— ॥ २५ ॥
अद्यप्रभृति भद्रं वः प्रतिज्ञां मे निबोधत ।
त्रयोदश समास्तात को ममार्थोऽस्ति जीवतः ॥ २६ ॥
'तात! तुमलोगोंका कल्याण हो, भाइयोंके विनाशका कारण बननेके लिये मुझे तेरह वर्षोंतक जीवित रहनेसे क्या लाभ? यदि जीना ही है तो आजसे मेरी यह प्रतिज्ञा सुन लो— ॥ २६ ॥
न प्रवक्ष्यामि परुषं भ्रातॄन्यांश्च पार्थिवान् ।
स्थितो निदेशे ज्ञातीनां योक्ष्ये तत् समुदाहरन् ॥ २७ ॥
'मैं अपने भाइयों तथा दूसरे राजाओंसे कभी कड़वी बात नहीं बोलूँगा। बन्धु-बान्धवोंकी आज्ञामें रहकर प्रसन्नतापूर्वक उनकी मुँहमाँगी वस्तुएँ लानेमें संलग्न रहूँगा' ॥ २७ ॥
एवं मे वर्तमानस्य स्वसुतेष्वितरेषु च ।
भेदो न भविता लोके भेदमूलो हि विग्रहः ॥ २८ ॥
'इस प्रकार समतापूर्ण बर्ताव करते हुए मेरा अपने पुत्रों तथा दूसरोंके प्रति भेदभाव न होगा; क्योंकि जगत्में लड़ाई-झगड़ेका मूल कारण भेदभाव ही है ॥ २८ ॥
विग्रहं दूरतो रक्षन् प्रियाण्येव समाचरन् ।
वाच्यतां न गमिष्यामि लोकेषु मनुजर्षभाः ॥ २९ ॥
‘नररत्न! विग्रह या वैर-विरोधको अपनेसे दूर ही रखकर सबका प्रिय करते हुए मैं संसारमें निन्दाका पात्र नहीं हो सकूँगा’ ॥ २९ ॥ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य वचनं पाण्डवाः संनिशम्य तत् । तमेव समवर्तन्त धर्मराजहिते रताः ॥ ३० ॥ अपने बड़े भाईकी वह बात सुनकर सब पाण्डव उन्हींके हितमें तत्पर हो सदा उनका ही अनुसरण करने लगे ॥ ३० ॥ संसत्सु समयं कृत्वा धर्मराड् भ्रातृभिः सह । पितॄंस्तर्प्य यथान्यायं देवतांश्च विशाम्पते ॥ ३१ ॥ राजन्! धर्मराजने अपने भाइयोंके साथ भरी सभामें यह प्रतिज्ञा करके देवताओं तथा पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण किया ॥ ३१ ॥ कृतमङ्गलकल्याणो भ्रातृभिः परिवारितः । गतेषु क्षत्रियेन्द्रेषु सर्वेषु भरतर्षभ ॥ ३२ ॥ युधिष्ठिरः सहामात्यः प्रविवेश पुरोत्तमम् । दुर्योधनो महाराज शकुनिश्चापि सौबलः । सभायां रमणीयायां तत्रैवास्ते नराधिप ॥ ३३ ॥ भरतश्रेष्ठ जनमेजय! समस्त क्षत्रियोंके चले जानेपर कल्याणमय मांगलिक कृत्य पूर्ण करके भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने मन्त्रियोंके साथ अपने उत्तम नगरमें प्रवेश किया। महाराज! दुर्योधन तथा सुबलपुत्र शकुनि ये दोनों उस रमणीय सभामें ही रह गये ॥ ३२-३३ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरसमये षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिर-प्रतिज्ञाविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2027)
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
दुर्योधनका मयनिर्मित सभाभवनको देखना और पग-पगपर भ्रमके कारण उपहासका पात्र बनना तथा युधिष्ठिरके वैभवको देखकर उसका चिन्तित होना
वैशम्पायन उवाच
वसन् दुर्योधनस्तस्यां सभायां पुरुषर्षभ ।
शनैर्ददर्श तां सर्वां सभां शकुनिना सह ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा दुर्योधनने उस सभाभवनमें निवास करते समय शकुनिके साथ धीरे-धीरे उस सारी सभाका निरीक्षण किया ॥ १ ॥
तस्यां दिव्यान्भिप्रायन् ददर्श कुरुनन्दनः ।
न दृष्टपूर्वा ये तेन नगरे नागसाह्वये ॥ २ ॥
कुरुनन्दन दुर्योधन उस सभामें उन दिव्य अभिप्रायों (दृश्यों)-को देखने लगा, जिन्हें उसने हस्तिनापुरमें पहले कभी नहीं देखा था ॥ २ ॥
स कदाचित् सभामध्ये धार्तराष्ट्रो महीपतिः ।
स्फाटिकं स्थलमासाद्य जलमित्यभिशङ्कया ॥ ३ ॥
स्ववस्त्रोत्कर्षणं राजा कृतवान् बुद्धिमोहितः ।
दुर्मना विमुखश्चैव परिचक्राम तां सभाम् ॥ ४ ॥
एक दिनकी बात है, राजा दुर्योधन उस सभाभवनमें घूमता हुआ स्फटिक-मणिमय स्थलपर जा पहुँचा और वहाँ जलकी आशंकासे उसने अपना वस्त्र ऊपर उठा लिया। इस प्रकार बुद्धि-मोह हो जानेसे उसका मन उदास हो गया और वह उस स्थानसे लौटकर सभामें दूसरी ओर चक्कर लगाने लगा ॥ ३-४ ॥
ततः स्थले निपतितो दुर्मना व्रीडितो नृपः ।
निःश्वसन् विमुखश्चापि परिचक्राम तां सभाम् ॥ ५ ॥
तदनन्तर वह स्थलमें ही गिर पड़ा, इससे वह मन-ही-मन दुःखी और लज्जित हो गया तथा वहाँसे हटकर लम्बी साँसें लेता हुआ सभाभवनमें घूमने लगा ॥ ५ ॥
ततः स्फाटिकतोयां वै स्फाटिकाम्बुजशोभिताम् ।
वापीं मत्वा स्थलमिव सवासाः प्रापतज्जले ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् स्फटिकमणिके समान स्वच्छ जलसे भरी और स्फटिकमणिमय कमलोंसे सुशोभित बावलीको स्थल मानकर वह वस्त्रसहित जलमें गिर पड़ा ॥ ६ ॥
जले निपतितं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः ।
जहास जहसुश्चैव किंकराश्च सुयोधनम् ॥ ७ ॥ वासांसि च शुभान्यस्मै प्रददू राजशासनात् । तथागतं तु तं दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः ॥ ८ ॥ अर्जुनश्च यमौ चोभौ सर्वे ते प्राहसंस्तदा । नामर्षयत् ततस्तेषामवहासममर्षणः ॥ ९ ॥ उसे जलमें गिरा देख महाबली भीमसेन हँसने लगे। उनके सेवकोंने भी दुर्योधनकी हँसी उड़ायी तथा राजाज्ञासे उन्होंने दुर्योधनको सुन्दर वस्त्र दिये। दुर्योधनकी यह दुरवस्था देख महाबली भीमसेन, अर्जुन और नकुल-सहदेव सभी उस समय जोर-जोरसे हँसने लगे। दुर्योधन स्वभावसे ही अमर्षशील था; अतः वह उनका उपहास न सह सका ॥
आकारं रक्षमाणस्तु न स तान् समुदैक्षत । पुनर्वसनमुत्क्षिप्य प्रतरिष्यन्निव स्थलम् ॥ १० ॥ वह अपने चेहरेके भावको छिपाये रखनेके लिये उनकी ओर दृष्टि नहीं डालता था। फिर स्थलमें ही जलका भ्रम हो जानेसे वह कपड़े उठाकर इस प्रकार चलने लगा; मानो तैरनेकी तैयारी कर रहा हो ॥ १० ॥
आरुरोह ततः सर्वे जहसुश्च पुनर्जनाः । द्वारं तु पिहिताकारं स्फाटिकं प्रेक्ष्य भूमिपः । प्रविशन्नाहतो मूर्ध्नि व्याघूर्णित इव स्थितः ॥ ११ ॥ इस प्रकार जब वह ऊपर चढ़ा, तब सब लोग उसकी भ्रान्तिपर हँसने लगे। उसके बाद राजा दुर्योधनने एक स्फटिकमणिका बना हुआ दरवाजा देखा, जो वास्तवमें बंद था, तो भी खुला दीखता था। उसमें प्रवेश करते ही उसका सिर टकरा गया और उसे चक्कर-सा आ गया ॥
तादृशं च परं द्वारं स्फाटिकोरुकपाटकम् । विघट्टयन् कराभ्यां तु निष्क्रम्याग्रे पपात ह ॥ १२ ॥ ठीक उसी तरहका एक दूसरा दरवाजा मिला, जिसमें स्फटिकमणिके बड़े-बड़े किंवाड़ लगे थे। यद्यपि वह खुला था, तो भी दुर्योधनने उसे बंद समझकर उसपर दोनों हाथोंसे धक्का देना चाहा। किंतु धक्केसे वह स्वयं द्वारके बाहर निकलकर गिर पड़ा ॥ १२ ॥
द्वारं तु वितताकारं समापेदे पुनश्च सः । तद्वृत्तं चेति मन्वानो द्वारस्थानादुपारमत् ॥ १३ ॥ आगे जानेपर उसे एक बहुत बड़ा फाटक और मिला; परंतु कहीं पिछले दरवाजोंकी भाँति यहाँ भी कोई अप्रिय घटना न घटित हो इस भयसे वह उस दरवाजेके इधरसे ही लौट आया ॥ १३ ॥
एवं प्रलम्भान् विविधान् प्राप्य तत्र विशाम्पते । पाण्डवेयाभ्यनुज्ञातस्ततो दुर्योधनो नृपः ॥ १४ ॥
अप्रहृष्टेन मनसा राजसूये महाक्रतौ । प्रेक्ष्य तामद्भुतामृद्धिं जगाम गजसाह्वयम् ॥ १५ ॥ राजन्! इस प्रकार बार-बार धोखा खाकर राजा दुर्योधन राजसूय महायज्ञमें पाण्डवोंके पास आयी हुई अद्भुत समृद्धिपर दृष्टि डालकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर-की आज्ञा ले अप्रसन्न मनसे हस्तिनापुरको चला गया ॥ १४-१५ ॥ पाण्डवश्रीप्रतप्तस्य ध्यायमानस्य गच्छतः । दुर्योधनस्य नृपतेः पापा मतिरजायत ॥ १६ ॥ पाण्डवोंकी राजलक्ष्मीसे संतप्त हो उसीका चिन्तन करते हुए जानेवाले राजा दुर्योधनके मनमें पापपूर्ण विचारका उदय हुआ ॥ १६ ॥ पार्थान् सुमनसो दृष्ट्वा पार्थिवांश्च वशानुगान् । कृत्स्नं चापि हितं लोकमाकुमारं कुरुद्वह ॥ १७ ॥ महिमानं परं चापि पाण्डवानां महात्मनाम् । दुर्योधनो धार्तराष्ट्रो विवर्णः समपद्यत ॥ १८ ॥ कुरुश्रेष्ठ! यह देखकर कि कुन्तीके पुत्रोंका मन प्रसन्न है, भूमण्डलके सब नरेश उनके वशमें हैं तथा बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक सारा जगत् उनका हितैषी है, इस प्रकार महात्मा पाण्डवोंकी महिमा अत्यन्त बढ़ी हुई देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनका रंग फीका पड़ गया ॥ १७-१८ ॥ स तु गच्छन्ननेकाग्रः सभामेकोऽन्वचिन्तयत् । श्रियं च तामनुपमां धर्मराजस्य धीमतः ॥ १९ ॥ रास्तेमें जाते समय वह नाना प्रकारके विचारोंसे चिन्तातुर था। वह अकेला ही परम बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरकी अलौकिक सभा तथा अनुपम लक्ष्मीके विषयमें सोच रहा था ॥ १९ ॥ प्रमत्तो धृतराष्ट्रस्य पुत्रो दुर्योधनस्तदा । नाभ्यभाषत् सुबलजं भाषमाणं पुनः पुनः ॥ २० ॥ इस समय धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन उन्मत्त-सा हो रहा था। वह शकुनिके बार-बार पूछनेपर भी उसे कोई उत्तर नहीं दे रहा था ॥ २० ॥ अनेकाग्रं तु तं दृष्ट्वा शकुनिः प्रत्यभाषत । दुर्योधन कुतोमूलं निःश्वसन्निव गच्छसि ॥ २१ ॥ उसे नाना प्रकारकी चिन्ताओंसे युक्त देख शकुनि-ने पूछा—‘दुर्योधन! तुम्हें कहाँसे यह दुःखका कारण प्राप्त हो गया, जिससे तुम लंबी साँसें खींचते चल रहे हो’ ॥ २१ ॥
दुर्योधन उवाच
दृष्ट्वेमां पृथिवीं कृत्स्नां युधिष्ठिरवशानुगाम् । जितामस्त्रप्रतापेन श्वेताश्वस्य महात्मनः ॥ २२ ॥ तं च यज्ञं तथाभूतं दृष्ट्वा पार्थस्य मातुल । यथा शक्रस्य देवेषु तथाभूतं महाद्युतेः ॥ २३ ॥ अमर्षेण तु सम्पूर्णो दह्यमानो दिवानिशम् । शुचिशुक्रागमे काले शुष्येत् तोयमिवाल्पकम् ॥ २४ ॥ दुर्योधनने कहा—मामाजी! मैंने देखा है, श्वेतवाहन महात्मा अर्जुनके अस्त्रोंके प्रतापसे जीती हुई यह सारी पृथ्वी युधिष्ठिरके वशमें हो गयी है। महातेजस्वी युधिष्ठिरका वह राजसूययज्ञ उसी प्रकार सम्पन्न हुआ है, जैसे देवताओंमें देवराज इन्द्रका यज्ञ पूर्ण हुआ था। यह सब देखकर मैं दिन-रात ईर्ष्यासे भरा ठीक उसी प्रकार जलता रहता हूँ, जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें थोड़ा-सा जल जल्दी सूख जाता है ॥ २२—२४ ॥ पश्य सात्वतमुख्येन शिशुपालो निपातितः । न च तत्र पुमानासीत् कश्चित् तस्य पदानुगः ॥ २५ ॥ और भी देखिये, यदुवंशशिरोमणि श्रीकृष्णने शिशुपालको मार गिराया, परंतु वहाँ कोई भी वीर पुरुष उसका बदला लेनेको तैयार नहीं हुआ ॥ २५ ॥ दह्यमाना हि राजानः पाण्डवोत्थेन वह्निना । क्षान्तवन्तोऽपराधं ते को हि तत् क्षन्तुमर्हति ॥ २६ ॥
पाण्डवजनित आगसे दग्ध होनेवाले राजाओंने वह अपराध क्षमा कर दिया। अन्यथा इतने बड़े अन्यायको कौन सह सकता है? ॥ २६॥ वासुदेवेन तत् कर्म यथायुक्तं महत् कृतम् । सिद्धं च पाण्डुपुत्राणां प्रतापेन महात्मनाम् ॥ २७॥ वासुदेव श्रीकृष्णने जैसा महान् अनुचित कर्म किया था, वह महामना पाण्डवोंके प्रतापसे सफल हो गया ॥ २७॥ तथा हि रत्नान्यादाय विविधानि नृपा नृपम् । उपातिष्ठन्त कौन्तेयं वैश्या इव करप्रदाः ॥ २८॥ जैसे कर देनेवाले व्यापारी वैश्य नाना प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर राजाकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार सब राजा अनेक प्रकारके उत्तम रत्न लेकर राजा युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित हुए थे ॥ २८॥ श्रियं तथाऽऽगतां दृष्ट्वा ज्वलन्तीमिव पाण्डवे । अमर्षवशमापन्नो दह्यामि न तथोचितः ॥ २९॥ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके समीप प्राप्त हुई उस प्रकाश-मयी लक्ष्मीको देखकर मैं ईर्ष्यावश जल रहा हूँ। यद्यपि मेरी यह दुरवस्था उचित नहीं है ॥ २९॥ एवं स निश्चयं कृत्वा ततो वचनमब्रवीत् । पुनर्गान्धारनृपतिं दह्यमान इवाग्निना ॥ ३०॥ ऐसा निश्चय करके दुर्योधन चिन्ताकी आगसे दग्ध-सा होता हुआ पुनः गान्धारराज शकुनिसे बोला ॥ ३०॥ वह्निमेव प्रवेक्ष्यामि भक्षयिष्यामि वा विषम् । अपो वापि प्रवेक्ष्यामि न हि शक्ष्यामि जीवितुम् ॥ ३१॥ मैं आगमें प्रवेश कर जाऊँगा, विष खा लूँगा अथवा जलमें डूब मरूँगा, अब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ ३१॥ को हि नाम पुमाँल्लोके मर्षयिष्यति सत्त्ववान् । सपत्नान्मृद्ध्यतो दृष्ट्वा हीनमात्मानमेव च ॥ ३२॥ संसारमें कौन ऐसा शक्तिशाली पुरुष होगा, जो शत्रुओंकी वृद्धि और अपनी हीन दशा होती देखकर भी चुपचाप सहन कर लेगा ॥ ३२॥ सोऽहं न स्त्री न चाप्यस्त्री न पुमान्नापुमानपि । योऽहं तां मर्षयाम्यद्य तादृशीं श्रियमागताम् ॥ ३३॥ मैं इस समय न तो स्त्री हूँ, न अस्त्रबलसे सम्पन्न हूँ, न पुरुष हूँ और न नपुंसक ही हूँ, तो भी अपने शत्रुओंके पास आयी हुई वैसी उत्कृष्ट सम्पत्तिको देखकर भी चुपचाप सहन कर रहा हूँ? ॥ ३३॥ ईश्वरत्वं पृथिव्याश्च वसुमत्तां च तादृशीम् ।
यज्ञं च तादृशं दृष्ट्वा मादृशः को न संज्वरेत् ॥ ३४ ॥
शत्रुओंके पास समस्त भूमण्डलका वह साम्राज्य, वैसी धन-रतनोंसे भरी सम्पदा और उनका वैसा उत्कृष्ट राजसूययज्ञ देखकर मेरे-जैसा कौन पुरुष चिन्तित न होगा? ॥ ३४ ॥
अशक्तश्चैक एवाहं तामाहर्तुं नृपश्रियम् ।
सहायांश्च न पश्यामि तेन मृत्युं विचिन्तये ॥ ३५ ॥
मैं अकेला उस राजलक्ष्मीको हड़प लेनेमें असमर्थ हूँ और अपने पास योग्य सहायक नहीं देखता हूँ, इसीलिये मृत्युका चिन्तन करता हूँ ॥ ३५ ॥
दैवमेव परं मन्ये पौरुषं च निरर्थकम् ।
दृष्ट्वा कुन्तीसुते शुद्धां श्रियं तामहतां तथा ॥ ३६ ॥
कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके पास उस अक्षय विशुद्ध लक्ष्मीका संचय देख मैं दैवको ही प्रबल मानता हूँ, पुरुषार्थ तो निरर्थक जान पड़ता है ॥ ३६ ॥
कृतो यत्नो मया पूर्वं विनाशे तस्य सौबल ।
तच्च सर्वमतिक्रम्य संवृद्धोऽप्स्विव पङ्कजम् ॥ ३७ ॥
सुबलपुत्र! मैंने पहले धर्मराज युधिष्ठिरको नष्ट कर देनेका प्रयत्न किया था, किंतु उन सारे संकटोंको लाँघ करके वे जलमें कमलकी भाँति उत्तरोत्तर बढ़ते गये ॥ ३७ ॥
तेन दैवं परं मन्ये पौरुषं च निरर्थकम् ।
धार्तराष्ट्राश्च हीयन्ते पार्था वर्धन्ति नित्यशः ॥ ३८ ॥
इसीसे मैं दैवको उत्तम मानता हूँ और पुरुषार्थको निरर्थक; क्योंकि हम धृतराष्ट्रपुत्र हानि उठा रहे हैं और ये कुन्तीके पुत्र प्रतिदिन उन्नति करते जा रहे हैं ॥ ३८ ॥
सोऽहं श्रियं च तां दृष्ट्वा सभां तां च तथाविधाम् ।
रक्षिभिश्चावहासं तं परितप्ये यथाग्निना ॥ ३९ ॥
मैं उस राजलक्ष्मीको, उस दिव्य सभाको तथा रक्षकोंद्वारा किये गये अपने उपहासको देखकर निरन्तर संतप्त हो रहा हूँ, मानो आगमें जलता होऊँ ॥ ३९ ॥
स मामभ्यनुजानीहि मातुलाद्य सुदुःखितम् ।
अमर्षं च समाविष्टं धृतराष्ट्रे निवेदय ॥ ४० ॥
मामाजी! अब मुझे (मरनेके लिये) आज्ञा दीजिये, क्योंकि मैं बहुत दुःखी हूँ और ईर्ष्याकी आगमें जल रहा हूँ। महाराज धृतराष्ट्रको मेरी यह अवस्था सूचित कर दीजियेगा ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥
४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2034)
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेके लिये शकुनि और दुर्योधनकी बातचीत
शकुनिरुवाच
दुर्योधन न तेऽमर्षः कार्यः प्रति युधिष्ठिरम् ।
भागधेयानि हि स्वानि पाण्डवा भुञ्जते सदा ॥ १ ॥
विधानं विविधाकारं परं तेषां विधानतः ।
अनेकैर्भ्युपायैश्च त्वया न शकिताः पुरा ॥ २ ॥
शकुनि बोला—दुर्योधन! तुम्हें युधिष्ठिरके प्रति ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये; क्योंकि पाण्डव सदा अपने भाग्यका ही उपभोग करते आ रहे हैं। तुमने उन्हें वशमें लानेके लिये अनेक प्रकारके उपायोंका अवलम्बन किया, परंतु उनके द्वारा तुम उन्हें अपने अधीन न कर सके ॥
आरब्धाश्च महाराज पुनः पुनररिंदम ।
विमुक्ताश्च नरव्याघ्रा भागधेयपुरस्कृताः ॥ ३ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले महाराज! तुमने बार-बार पाण्डवोंपर कुचक्र चलाये, परंतु वे नरश्रेष्ठ अपने भाग्यसे उन सभी संकटोंसे छुटकारा पाते गये ॥ ३ ॥
तैर्लब्धा द्रौपदी भार्या द्रुपदश्च सुतैः सह ।
सहायः पृथिवीलाभे वासुदेवश्च वीर्यवान् ॥ ४ ॥
उन पाँचोंने पत्नीरूपमें द्रौपदीको तथा पुत्रों-सहित राजा द्रुपद एवं सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्राप्तिमें कारण महापराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको सहायकरूपमें प्राप्त किया है ॥ ४ ॥
(अजितः सोऽपि सर्वैर्हि सदेवासुरमानुषैः ।
तत्तेजसा प्रवृद्धोऽसौ तत्र का परिदेवना ॥)
श्रीकृष्णको सब देवता, असुर और मनुष्य मिलकर भी जीत नहीं सकते। उन्हींके तेजसे राजा युधिष्ठिरकी उन्नति हुई है; इसके लिये शोक करनेकी क्या बात है?
लब्धश्चानभिभूतार्थैः पित्र्योऽंशः पृथिवीपते ।
विवृद्धस्तेजसा तेषां तत्र का परिदेवना ॥ ५ ॥
पृथिवीपते! पाण्डवोंने अपने उद्देश्यसे विचलित न होकर निरन्तर प्रयत्न करके राज्यमें अपना पैतृक अंश प्राप्त किया है और वह पैतृक सम्पत्ति आज उन्हींके तेजसे बहुत बढ़ गयी है, अतः उसके लिये चिन्ता करनेकी क्या आवश्यकता है? ॥ ५ ॥
धनंजयेन गाण्डीवमक्षय्यौ च महेषुधी । लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तोषयित्वा हुताशनम् ॥ ६ ॥ तेन कार्मुकमुख्येन बाहुवीर्येण चात्मनः । कृता वशे महीपालास्तत्र का परिदेवना ॥ ७ ॥ अर्जुनने अग्निदेवको संतुष्ट करके गाण्डीव धनुष, अक्षय तरकस तथा कितने ही दिव्य अस्त्र प्राप्त किये हैं। उस श्रेष्ठ धनुषके द्वारा तथा अपनी भुजाओंके बलसे उन्होंने समस्त राजाओंको वशमें किया है, अतः इसके लिये शोककी क्या आवश्यकता है? ॥ ६-७ ॥ अग्निदाहान्मयं चापि मोक्षयित्वा स दानवम् । सभां तां कारयामास सव्यसाची परंतपः ॥ ८ ॥ सव्यसाची परंतप अर्जुनने मय दानवको आगमें जलनेसे बचाया और उसीके द्वारा उस दिव्य सभाका निर्माण कराया ॥ ८ ॥ तेन चैव मयेनोक्ताः किंकरा नाम राक्षसाः । वहन्ति तां सभां भीमास्तत्र का परिदेवना ॥ ९ ॥ यच्चासहायतां राजन्नुक्तवानसि भारत । तन्मिथ्या भ्रातरो हीमे तव सर्वे वशानुगाः ॥ १० ॥ उस मयके ही कहनेसे किंकरनामधारी भयंकर राक्षसगण उस सभाको एक स्थानसे दूसरे स्थानपर ले जाते हैं। अतः इसके लिये भी शोक-संताप क्यों किया जाय? भारत! तुमने जो अपनेको असहाय बताया है, वह मिथ्या है; क्योंकि तुम्हारे ये सब भाई तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं ॥ द्रोणस्तव महेष्वासः सह पुत्रेण वीर्यवान् । सूतपुत्रश्च राधेयो गौतमश्च महारथः ॥ ११ ॥ अहं च सह सोदर्यैः सौमदत्तिश्च पार्थिवः । एतैस्त्वं सहितः सर्वैर्जय कृत्स्नां वसुंधराम् ॥ १२ ॥ महान् धनुर्धर और पराक्रमी द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ तुम्हारी सहायताके लिये उद्यत हैं। राधानन्दन सूतपुत्र कर्ण, महारथी कृपाचार्य, भाइयोंसहित मैं तथा राजा भूरिश्रवा—इन सबके साथ तुम भी सारी पृथ्वीपर विजय प्राप्त करो ॥ ११-१२ ॥
दुर्योधन उवाच
त्वया च सहितो राजन्नेतैश्चान्यैर्महारथैः । एतानेव विजेष्यामि यदि त्वमनुमन्यसे ॥ १३ ॥ एतेषु विजितेष्वद्य भविष्यति मही मम । सर्वे च पृथिवीपालाः सभा सा च महाधना ॥ १४ ॥