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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पूरुवंशवर्णनविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥


* ऋचेयु, अन्वग्भानु और अनाधृष्टि एक ही व्यक्तिके नाम हैं।

दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन

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पञ्चनवतितमोऽध्यायः

दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन

जनमेजय उवाच

श्रुतस्त्वत्तो मया ब्रह्मन् पूर्वेषां सम्भवो महान् ।
उदाराश्चापि वंशेऽस्मिन् राजानो मे परिश्रुताः ॥ १ ॥
जनमेजय बोले— ब्रह्मन्! मैंने आपके मुखसे पूर्ववर्ती राजाओंकी उत्पत्तिका महान् वृत्तान्त सुना। इस पूरुवंशमें उत्पन्न हुए उदार राजाओंके नाम भी मैंने भलीभाँति सुन लिये ॥ १ ॥

किंतु लघ्वर्थसंयुक्तं प्रियाख्यानं न मामति ।
प्रीणात्यतो भवान् भूयो विस्तरेण ब्रवीतु मे ॥ २ ॥
एतामेव कथां दिव्यामाप्रजापतितो मनोः ।
तेषामाजननं पुण्यं कस्य न प्रीतिमावहेत् ॥ ३ ॥
परंतु संक्षेपसे कहा हुआ यह प्रिय आख्यान सुनकर मुझे पूर्णतः तृप्ति नहीं हो रही है। अतः आप पुनः विस्तारपूर्वक मुझसे इसी दिव्य कथाका वर्णन कीजिये। दक्ष प्रजापति और मनुसे लेकर उन सब राजाओंका पवित्र जन्म-प्रसंग किसको प्रसन्न नहीं करेगा? ॥ २-३ ॥

सद्धर्मगुणमाहात्म्यैरभिवर्धितमुत्तमम् ।
विष्टभ्य लोकांस्त्रीनेषां यशः स्फीतमवस्थितम् ॥ ४ ॥
उत्तम धर्म और गुणोंके माहात्म्यसे अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त हुआ इन राजाओंका श्रेष्ठ और उज्ज्वल यश तीनों लोकोंमें व्याप्त हो रहा है ॥ ४ ॥

गुणप्रभाववीर्यौजःसत्त्वोत्साहवतामहम् ।
न तृप्यामि कथां शृण्वन्नमृतास्वादसम्मिताम् ॥ ५ ॥
ये सभी नरेश उत्तम गुण, प्रभाव, बल-पराक्रम, ओज, सत्त्व (धैर्य) और उत्साहसे सम्पन्न थे। इनकी कथा अमृतके समान मधुर है, उसे सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

शृणु राजन् पुरा सम्यङ्मया द्वैपायनाच्छ्रुतम् ।
प्रोच्यमानमिदं कृत्स्नं स्ववंशजननं शुभम् ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! पूर्वकालमें मैंने महर्षि कृष्णद्वैपायनके मुखसे जिसका भलीभाँति श्रवण किया था, वह सम्पूर्ण प्रसंग तुम्हें सुनाता हूँ। अपने वंशकी

उत्पत्तिका वह शुभ वृत्तान्त सुनो ।। ६ ।।
दक्षाददितिरदितेर्विवस्वान् विवस्वतो मनुर्मनो-रिला इलायाः पुरूरवाः पुरूरवस आयुरायुषो नहुषो नहुषाद् ययातिः; ययातेर्द्वे भार्ये बभूवतुः ।। ७ ।।
उशनसो दुहिता देवयानी; वृषपर्वणश्च दुहिता शर्मिष्ठा नाम ।। ८ ।।
दक्षसे अदिति, अदितिसे विवस्वान् (सूर्य), विवस्वान्‌से मनु, मनुसे इला, इलासे पुरूरवा, पुरूरवासे आयु, आयुसे नहुष और नहुषसे ययातिका जन्म हुआ। ययातिकी दो पत्नियाँ थीं पहली शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा दूसरी वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा ।। ८ ।।
अत्रानुवंशश्लोको भवति—
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।
द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ।। ९ ।।
यहाँ उनके वंशका परिचय देनेवाला यह श्लोक कहा जाता है—
देवयानीने यदु और तुर्वसु नामवाले दो पुत्रोंको जन्म दिया और वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु तथा पूरु—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये ।। ९ ।।
तत्र यदोर्यादवाः; पूरोः पौरवाः ।। १० ।।
इनमें यदुसे यादव और पूरुसे पौरव हुए ।। १० ।।
पूरोस्तु भार्या कौसल्या नाम । तस्यामस्य जज्ञे जनमेजयो नाम; यस्त्रीनश्वमेधानाजहार, विश्वजिता चेष्ट्वा वनं विवेश ।। ११ ।।
पूरुकी पत्नीका नाम कौसल्या था (उसीको पौष्टी भी कहते हैं)। उसके गर्भसे पूरुके जनमेजय नामक पुत्र हुआ (इसीका दूसरा नाम प्रवीर है); जिसने तीन अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था और विश्वजित् यज्ञ करके वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया था ।। ११ ।।
जनमेजयः खल्वनन्तां नामोपयेमे माधवीम् । तस्यामस्य जज्ञे प्राचिन्वान्; यः प्राचीं दिशं जिगाय यावत् सूर्योदयात्, ततस्तस्य प्राचिन्वत्त्वम् ।। १२ ।।
जनमेजयने मधुवंशकी कन्या अनन्ताके साथ विवाह किया था। उसके गर्भसे उनके प्राचिन्वान् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने उदयाचलसे लेकर सारी प्राची दिशाको एक ही दिनमें जीत लिया था; इसीलिये उसका नाम प्राचिन्वान् हुआ ।। १२ ।।
प्राचिन्वान् खल्वश्मकीमुपयेमे यादवीम् । तस्यामस्य जज्ञे संयातिः ।। १३ ।।
प्राचिन्वान्‌ने यदुकुलकी कन्या अश्मकीको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे उन्हें संयाति नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। १३ ।।
संयातिः खलु दृषद्वतो दुहितरं वराङ्गीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे अहंयातिः ।। १४ ।।
संयातिने दृषद्वान्‌की पुत्री वरांगीसे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें अहंयाति नामक पुत्र हुआ ।। १४ ।।

अहंयातिः खलु कृतवीर्यदुहितरमुपयेमे भानुमतीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे सार्वभौमः ॥ १५ ॥
अहंयातिने कृतवीर्यकुमारी भानुमतीको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे अहंयातिके सार्वभौम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १५ ॥
सार्वभौमः खलु जित्वा जहार कैकेयीं सुनन्दां नाम । तामुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे जयत्सेनो नाम ॥ १६ ॥
सार्वभौमने युद्धमें जीतकर केकयकुमारी सुनन्दाका अपहरण किया और उसीको अपनी पत्नी बनाया। उससे उनको जयत्सेन नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ १६ ॥
जयत्सेनो खलु वैदर्भीमुपयेमे सुश्रवां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अवाचीनः ॥ १७ ॥
जयत्सेनने विदर्भराजकुमारी सुश्रवासे विवाह किया। उसके गर्भसे उनके अवाचीन नामक पुत्र हुआ ॥ १७ ॥
अवाचीनोऽपि वैदर्भीमपरामेवोपयेमे मर्यादां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अरिहः ॥ १८ ॥
अवाचीनने भी विदर्भराजकुमारी मर्यादाके साथ विवाह किया, जो आगे बतायी जानेवाली देवातिथिकी पत्नीसे भिन्न थी। उसके गर्भसे उन्हें 'अरिह' नामक पुत्र हुआ ॥ १८ ॥
अरिहः खल्वाङ्गीमुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे महाभौमः ॥ १९ ॥
अरिहने अंगदेशकी राजकुमारीसे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हें महाभौम नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ १९ ॥
महाभौमः खलु प्रासेनजितीमुपयेमे सुयज्ञा नाम । तस्यामस्य जज्ञे अयुतनायी; यः पुरुषमेधानामयुतमानयत्, तेनास्यायुतनायित्वम् ॥ २० ॥
महाभौमने प्रसेनजित्की पुत्री सुयज्ञासे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें अयुतनायी नामक पुत्र प्राप्त हुआ; जिसने दस हजार पुरुषमेध 'यज्ञ' किये। अयुत यज्ञोंका आनयन (अनुष्ठान) करनेके कारण ही उनका नाम अयुतनायी हुआ ॥ २० ॥
अयुतनायी खलु पृथुश्रवसो दुहितरमुपयेमे कामां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अक्रोधनः ॥ २१ ॥
अयुतनायीने पृथुश्रवाकी पुत्री कामासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अक्रोधनका जन्म हुआ ॥ २१ ॥
स खलु कालिङ्गीं करम्भां नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे देवातिथिः ॥ २२ ॥
अक्रोधनने कलिंगदेशकी राजकुमारी करम्भासे विवाह किया। जिसके गर्भसे उनके देवातिथि नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ २२ ॥
देवातिथिः खलु वैदेहीमुपयेमे मर्यादां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अरिहो नाम ॥ २३ ॥

देवातिथिने विदेहराजकुमारी मर्यादासे विवाह किया, जिसके गर्भसे अरिह नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ २३ ॥

अरिहः खल्वाङ्गेयीमुपयेमे सुदेवां नाम । तस्यां पुत्रमजीजनदृक्षम् ॥ २४ ॥ अरिहने अंगराजकुमारी सुदेवाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ २४ ॥

ऋक्षः खलु तक्षकदुहितरमुपयेमे ज्वालां नाम । तस्यां पुत्रं मतिनारं नामोत्पादयामास ॥ २५ ॥ ऋक्षने तक्षककी पुत्री ज्वालाके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे मतिनार नामक पुत्रको उत्पन्न किया ॥ २५ ॥

मतिनारः खलु सरस्वत्यां गुणसमन्वितं द्वादशवार्षिकं सत्रमाहरत् । समाप्ते च सत्रे सरस्वत्य-भिगम्य तं भर्तारं वरयामास । तस्यां पुत्रमजीजनत् तंसुं नाम ॥ २६ ॥ मतिनारने सरस्वतीके तटपर उत्तम गुणोंसे युक्त द्वादशवार्षिक यज्ञका अनुष्ठान किया। उसके समाप्त होनेपर सरस्वतीने उनके पास आकर उन्हें पतिरूपमें वरण किया। मतिनारने उसके गर्भसे तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया ॥ २६ ॥

अत्रानुवंशश्लोको भवति— तंसुं सरस्वती पुत्रं मतिनारादजीजनत् । ईलिनं जनयामास कालिंग्यां तंसुरात्मजम् ॥ २७ ॥ यहाँ वंशपरम्पराका सूचक श्लोक इस प्रकार है— सरस्वतीने मतिनारसे तंसु नामक पुत्र उत्पन्न किया और तंसुने कलिंगराजकुमारीके गर्भसे ईलिन नामक पुत्रको जन्म दिया ॥ २७ ॥

ईलिनस्तु रथन्तर्यां दुष्यन्ताद्यान् पञ्च पुत्रानजीजनत् ॥ २८ ॥ ईलिनने रथन्तरीके गर्भसे दुष्यन्त आदि पाँच पुत्र उत्पन्न किये ॥ २८ ॥

दुष्यन्तः खलु विश्वामित्रदुहितरं शकुन्तलां नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे भरतः ॥ २९ ॥ दुष्यन्तने विश्वामित्रकी पुत्री शकुन्तलाके साथ विवाह किया; जिसके गर्भसे उनके पुत्र भरतका जन्म हुआ ॥ २९ ॥

अत्रानुवंशश्लोकौ भवतः— भस्त्रा माता पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः । भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ॥ ३० ॥ यहाँ वंशपरम्पराके सूचक दो श्लोक हैं— ‘माता तो भाथी (धौंकनी)-के समान है। वास्तवमें पुत्र पिताका ही होता है; जिससे उसका जन्म होता है, वही उस बालकके रूपमें प्रकट होता है। दुष्यन्त! तुम अपने पुत्रका भरण-पोषण करो; शकुन्तलाका अपमान न करो ॥ ३० ॥

रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात् । त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ ३१ ॥ ‘गर्भाधान करनेवाला पिता ही पुत्ररूपमें उत्पन्न होता है। नरदेव! पुत्र यमलोकसे पिताका उद्धार कर देता है। तुम्हीं इस गर्भके आधान करनेवाले हो। शकुन्तलाका कथन सत्य है' ॥ ३१ ॥

ततोऽस्य भरतत्वम् । भरतः खलु काशेयीमुपयेमे सार्वसेनीं सुनन्दां नाम । तस्यामस्य जज्ञे भुमन्युः ॥ ३२ ॥ आकाशवाणीने भरण-पोषणके लिये कहा था, इसलिये उस बालकका नाम भरत हुआ। भरतने राजा सर्वसेनकी पुत्री सुनन्दासे विवाह किया। वह काशीकी राजकुमारी थी। उसके गर्भसे भरतके भुमन्यु नामक पुत्र हुआ ॥ ३२ ॥

भुमन्युः खलु दाशार्हीमुपयेमे विजयां नाम । तस्यामस्य जज्ञे सुहोत्रः ॥ ३३ ॥ भुमन्युने दशार्हकन्या विजयासे विवाह किया; जिसके गर्भसे सुहोत्रका जन्म हुआ ॥ ३३ ॥

सुहोत्रः खल्विक्ष्वाकुकन्यामुपयेमे सुवर्णां नाम । तस्यामस्य जज्ञे हस्ती; य इदं हास्तिनपुरं स्थापयामास । एतदस्य हास्तिनपुरत्वम् ॥ ३४ ॥ सुहोत्रने इक्ष्वाकुकुलकी कन्या सुवर्णासे विवाह किया। उसके गर्भसे उन्हें हस्ती नामक पुत्र हुआ; जिसने यह हस्तिनापुर नामक नगर बसाया था। हस्तीके बसानेसे ही यह नगर ‘हास्तिनपुर’ कहलाया ॥ ३४ ॥

हस्ती खलु त्रैगर्तीमुपयेमे यशोधरां नाम । तस्यामस्य जज्ञे विकुण्ठनो नाम ॥ ३५ ॥ हस्तीने त्रिगर्तराजकी पुत्री यशोधराके साथ विवाह किया और उसके गर्भसे विकुण्ठन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ३५ ॥

विकुण्ठनः खलु दाशार्हीमुपयेमे सुदेवां नाम । तस्यामस्य जज्ञे अजमीढो नाम ॥ ३६ ॥ विकुण्ठनने दशार्हकुलकी कन्या सुदेवासे विवाह किया और उसके गर्भसे उन्हें अजमीढ नामक पुत्र प्राप्त हुआ ॥ ३६ ॥

अजमीढस्य चतुर्विंशं पुत्रशतं बभूव कैकेय्यां गान्धार्यां विशालायामृक्षायां चेति । पृथक् पृथग् वंशधरा नृपतयः । तत्र वंशकरः संवरणः ॥ ३७ ॥ अजमीढके कैकेयी, गान्धारी, विशाला तथा ऋक्षासे एक सौ चौबीस पुत्र हुए। वे सब पृथक्-पृथक् वंशप्रवर्तक राजा हुए। इनमें राजा संवरण कुरुवंशके प्रवर्तक हुए ॥ ३७ ॥

संवरणः खलु वैवस्वतीं तपतीं नामोपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे कुरुः ॥ ३८ ॥ संवरणने सूर्यकन्या तपतीसे विवाह किया; जिसके गर्भसे कुरुका जन्म हुआ ॥ ३८ ॥

कुरुः खलु दाशार्हीमुपयेमे शुभाङ्गीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे विदूरः ॥ ३९ ॥

कुरुने दशार्हकुलकी कन्या शुभांगीसे विवाह किया। उसके गर्भसे विदूर नामक पुत्र हुआ ।। ३९ ।।

विदूरस्तु माधवीमुपयेमे सम्प्रियां नाम । तस्या-मस्य जज्ञे अनश्वा नाम ।। ४० ।।
विदूरने मधुवंशकी कन्या सम्प्रियासे विवाह किया; जिसके गर्भसे अनश्वा नामक पुत्र प्राप्त हुआ ।। ४० ।।

अनश्वा खलु मागधीमुपयेमे अमृतां नाम । तस्यामस्य जज्ञे परिक्षित् ।। ४१ ।।
अनश्वाने मगधराजकुमारी अमृताको अपनी पत्नी बनाया। उसके गर्भसे परिक्षित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ।। ४१ ।।

परिक्षित् खलु बाहुदामुपयेमे सुयशां नाम । तस्यामस्य जज्ञे भीमसेनः ।। ४२ ।।
परिक्षित्ने बाहुदराजकी पुत्री सुयशाके साथ विवाह किया; जिसके गर्भसे भीमसेन नामक पुत्र हुआ ।। ४२ ।।

भीमसेनः खलु कैकेयीमुपयेमे कुमारीं नाम । तस्यामस्य जज्ञे प्रतिश्रवा नाम ।। ४३ ।।
भीमसेनने केकयदेशकी राजकुमारी कुमारीको अपनी पत्नी बनाया; जिसके गर्भसे प्रतिश्रवाका जन्म हुआ ।। ४३ ।।

प्रतिश्रवसः प्रतीपः खलु । शैब्यामुपयेमे सुनन्दां नाम । तस्यां पुत्रानुत्पादयामास देवापिं शान्तनुं बाह्लीकं चेति ।। ४४ ।।
प्रतिश्रवासे प्रतीप उत्पन्न हुआ। उसने शिबि-देशकी राजकन्या सुनन्दासे विवाह किया और उसके गर्भसे देवापि, शान्तनु तथा बाह्लीक—इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया ।। ४४ ।।

देवापिः खलु बाल एवारण्यं विवेश । शान्तनुस्तु महीपालो बभूव ।। ४५ ।।
देवापि बाल्यावस्थामें ही वनको चले गये, अतः शान्तनु राजा हुए ।। ४५ ।।

अत्रानुवंशश्लोको भवति—
यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं स सुखमश्नुते । पुनर्युवा च भवति तस्मात् तं शान्तनुं विदुः ।। इति तदस्य शान्तनुत्वम् ।। ४६ ।।
शान्तनुके विषयमें यह अनुवंशश्लोक उपलब्ध होता है—
वे जिस-जिस बूढ़ेको अपने दोनों हाथोंसे छू देते थे, वह बड़े सुख और शान्तिका अनुभव करता था तथा पुनः नौजवान हो जाता था। इसीलिये लोग उन्हें शान्तनुके रूपमें जानने लगे। यही उनके शान्तनु नाम पड़नेका कारण हुआ ।। ४६ ।।

शान्तनुः खलु गङ्गां भागीरथीमुपयेमे । तस्यामस्य जज्ञे देवव्रतो नामः यमाहुर्भीष्ममिति ।। ४७ ।।
शान्तनुने भागीरथी गंगाको अपनी पत्नी बनाया; जिसके गर्भसे उन्हें देवव्रत नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसे लोग ‘भीष्म’ कहते हैं ।। ४७ ।।

भीष्मः खलु पितुः प्रियचिकीर्षया सत्यवतीं मातरमुदवाहयत्; यामाहुर्गन्धकालीति ॥ ४८ ॥ भीष्मने अपने पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे उनके साथ माता सत्यवतीका विवाह कराया; जिसे गन्धकाली भी कहते हैं ॥ ४८ ॥

तस्यां पूर्वं कानीनो गर्भः पराशराद् द्वैपायनोऽभवत् । तस्यामेव शान्तनोरन्यौ द्वौ पुत्रौ बभूवतुः ॥ ४९ ॥ सत्यवतीके गर्भसे पहले कन्यावस्थामें महर्षि पराशरसे द्वैपायन व्यास उत्पन्न हुए थे। फिर उसी सत्यवतीके राजा शान्तनुद्वारा दो पुत्र और हुए ॥ ४९ ॥

विचित्रवीर्यश्चित्राङ्गदश्च । तयोरप्राप्तयौवन एव चित्राङ्गदो गन्धर्वेण हतः; विचित्रवीर्यस्तु राजाऽऽसीत् ॥ ५० ॥ जिनका नाम था, विचित्रवीर्य और चित्रांगद। उनमेंसे चित्रांगद युवावस्थामें पदार्पण करनेसे पहले ही एक गन्धर्वके द्वारा मारे गये; परंतु विचित्रवीर्य राजा हुए ॥ ५० ॥

विचित्रवीर्यः खलु कौसल्यात्मजे अम्बिकाम्बालिके काशिराजदुहितरावुपयेमे ॥ ५१ ॥ विचित्रवीर्यने अम्बिका और अम्बालिकासे विवाह किया। वे दोनों काशिराजकी पुत्रियाँ थीं और उनकी माताका नाम कौसल्या था ॥ ५१ ॥

विचित्रवीर्यस्त्वनपत्य एव विदेहत्वं प्राप्तः । ततः सत्यवत्यचिन्तयन्मा दौष्यन्तो वंश उच्छेदं व्रजेदिति ॥ ५२ ॥ विचित्रवीर्यके अभी कोई संतान नहीं हुई थी, तभी उनका देहावसान हो गया। तब सत्यवतीको यह चिन्ता हुई कि 'राजा दुष्यन्तका यह वंश नष्ट न हो जाय' ॥ ५२ ॥

सा द्वैपायनमृषिं मनसा चिन्तयामास । स तस्याः पुरतः स्थितः, किं करवाणीति ॥ ५३ ॥ उसने मन-ही-मन द्वैपायन महर्षि व्यासका चिन्तन किया। फिर तो व्यासजी उसके आगे प्रकट हो गये और बोले—'क्या आज्ञा है?' ॥ ५३ ॥

सा तमुवाच—भ्राता तवानपत्य एव स्वर्ग्यतो विचित्रवीर्यः । साध्वपत्यं तस्योत्पादयेति ॥ ५४ ॥ सत्यवतीने उनसे कहा—'बेटा! तुम्हारे भाई विचित्रवीर्य संतानहीन अवस्थामें ही स्वर्गवासी हो गये। अतः उनके वंशकी रक्षाके लिये उत्तम संतान उत्पन्न करो' ॥ ५४ ॥

स तथेत्युक्त्वा त्रीन् पुत्रानुत्पादयामास; धृतराष्ट्रं पाण्डुं विदुरं चेति ॥ ५५ ॥ उन्होंने 'तथास्तु' कहकर धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर—इन तीन पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ ५५ ॥

तत्र धृतराष्ट्रस्य राज्ञः पुत्रशतं बभूव गान्धार्यां वरदानाद् द्वैपायनस्य ॥ ५६ ॥

उनमेंसे राजा धृतराष्ट्रके गान्धारीके गर्भसे व्यासजीके दिये हुए वरदानके प्रभावसे सौ पुत्र हुए॥ ५६॥

तेषां धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां चत्वारः प्रधाना बभूवुः, दुर्योधनो दुःशासनो विकर्णश्चित्रसेनश्चेति ॥ ५७॥

धृतराष्ट्रके उन सौ पुत्रोंमें चार प्रधान थे—दुर्योधन, दुःशासन, विकर्ण और चित्रसेन ॥ ५७॥

पाण्डोस्तु द्वे भार्ये बभूवतुः कुन्ती पृथा नाम माद्री च इत्युभे स्त्रीरत्ने ॥ ५८॥

पाण्डुकी दो पत्नियाँ थीं; कुन्तिभोजकी कन्या पृथा और माद्री। ये दोनों ही स्त्रियोंमें रत्नस्वरूपा थीं ॥ ५८॥

अथ पाण्डुर्मृगयां चरन् मैथुनगतमृषिमपश्यन्मृग्यां वर्तमानम् । तथैवाद्भुतमनासादितकामरसतृप्तं च बाणेनाजघान ॥ ५९ ॥

एक दिन राजा पाण्डुने शिकार खेलते समय एक मृगरूपधारी ऋषिको मृगीरूपधारिणी अपनी पत्नीके साथ मैथुन करते देखा। वह अद्भुत मृग अभी काम-रसका आस्वादन नहीं कर सका था। उसे अतृप्त अवस्थामें ही राजाने बाणसे मार दिया॥ ५९॥

स बाणविद्ध उवाच पाण्डुम्—चरता धर्ममिमं येन त्वयाभिज्ञेन कामरसस्याहमनवाप्तकामरसो निहतस्तस्मात् त्वमप्येतामवस्थामासाद्यानवाप्तकामरसः पञ्चत्वमाप्स्यसि क्षिप्रमेवेति । स विवर्णरूपस्तथा पाण्डुः शापं परिहरमाणो नोपासर्पत भार्ये । वाक्यं चोवाच — ॥ ६० ॥

बाणसे घायल होकर उस मुनिने पाण्डुसे कहा—'राजन्! तुम भी इस मैथुन धर्मका आचरण करनेवाले तथा काम-रसके ज्ञाता हो, तो भी तुमने मुझे उस दशामें मारा है, जब कि मैं काम-रससे तृप्त नहीं हुआ था। इस कारण इसी अवस्थामें पहुँचकर काम-रसका आस्वादन करनेसे पहले ही शीघ्र मृत्युको प्राप्त हो जाओगे।' यह सुनकर राजा पाण्डु उदास हो गये और शापका परिहार करते हुए पत्नियोंके सहवाससे दूर रहने लगे। उन्होंने कहा— ॥ ६० ॥

स्वचापल्यादिदं प्राप्तवानहं शृणोमि च नानपत्यस्य लोकाः सन्तीति । सा त्वं मदर्थे पुत्रानुत्पादयेति कुन्तीमुवाच । सा तथोक्ता पुत्रानुत्पादयामास । धर्माद् युधिष्ठिरं मारुताद् भीमसेनं शक्रादर्जुनमिति ॥ ६१ ॥

'देवियो! अपनी चपलताके कारण मुझे यह शाप मिला है। सुनता हूँ, संतानहीनको पुण्यलोक नहीं प्राप्त होते हैं। अतः तुम मेरे लिये पुत्र उत्पन्न करो।' यह बात उन्होंने कुन्तीसे कही। उनके ऐसा कहनेपर कुन्तीने तीन पुत्र उत्पन्न किये—धर्मराजसे युधिष्ठिरको, वायुदेवसे भीमसेनको और इन्द्रसे अर्जुनको जन्म दिया ॥ ६१ ॥

तां संहृष्टः पाण्डुरुवाच—

इयं ते सपत्न्यनपत्या; साध्वस्या अपत्यमुत्पाद्यतामिति । एवमस्त्विति कुन्ती तां विद्यां माद्र्याः प्रायच्छत् ॥ ६२ ॥ इससे पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने कुन्तीसे कहा—‘यह तुम्हारी सौत माद्री तो संतानहीन ही रह गयी, इसके गर्भसे भी सुन्दर संतान उत्पन्न होनेकी व्यवस्था करो।’ ‘ऐसा ही हो’ कहकर कुन्तीने अपनी वह विद्या (जिससे देवता आकृष्ट होकर चले आते थे) माद्रीको भी दे दी ॥ ६२ ॥

माद्रयामश्विभ्यां नकुलसहदेवावुत्पादितौ ॥ ६३ ॥ माद्रीके गर्भसे अश्विनीकुमारोंने नकुल और सहदेवको उत्पन्न किया ॥ ६३ ॥

माद्रीं खल्वलंकृतां दृष्ट्वा पाण्डुर्भावं चक्रे च तां स्पृष्ट्वैव विदेहत्वं प्राप्तः ॥ ६४ ॥

तत्रैनं चिताग्निस्थं माद्री समन्वारुरोह उवाच कुन्तीम्; यमयोरप्रमत्तया त्वया भवितव्यमिति ॥ ६५ ॥ एक दिन माद्रीको शृंगार किये देख पाण्डु उसके प्रति आसक्त हो गये और उसका स्पर्श होते ही उनका शरीर छूट गया। तदनन्तर वहाँ चिताकी आगमें स्थित पतिके शवके साथ माद्री चितापर आरूढ़ हो गयी और कुन्तीसे बोली—‘बहिन! मेरे जुड़वें बच्चोंके भी लालन-पालनमें तुम सदा सावधान रहना’ ॥ ६४-६५ ॥

ततस्ते पाण्डवाः कुन्त्या सहिता हास्तिनपुर-मानीय तापसैर्भीष्मस्य च विदुरस्य च निवेदिताः । सर्ववर्णानां च निवेद्यान्तर्हितास्तापसा बभूवुः प्रेक्ष्य-माणानां तेषाम् ॥ ६६ ॥ इसके बाद तपस्वी मुनियोंने कुन्तीसहित पाण्डवोंको वनसे हस्तिनापुरमें लाकर भीष्म तथा विदुरजीको सौंप दिया। साथ ही समस्त प्रजावर्गके लोगोंको भी सारे समाचार बताकर वे तपस्वी उन सबके देखते-देखते वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ६६ ॥

तच्च वाक्यमुपश्रुत्य भगवतामन्तरिक्षात् पुष्पवृष्टिः पपात; देवदुन्दुभयश्च प्रणेदुः ॥ ६७ ॥ उन ऐश्वर्यशाली मुनियोंकी बात सुनकर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं ॥ ६७ ॥

प्रतिगृहीताश्च पाण्डवाः पितुर्निधनमावेदयन् तस्यौर्ध्वदेहिकं न्यायतश्च कृतवन्तः । तांस्तत्र निवसतः पाण्डवान् बाल्यात् प्रभृति दुर्योधनो नामर्षयत् ॥ ६८ ॥ भीष्म और धृतराष्ट्रके द्वारा अपना लिये जानेपर पाण्डवोंने उनसे अपने पिताकी मृत्युका समाचार बताया, तत्पश्चात् पिताकी और्ध्वदैहिक क्रियाको विधिपूर्वक सम्पन्न करके पाण्डव वहीं रहने लगे। दुर्योधनको बाल्यावस्थासे ही पाण्डवोंका साथ रहना सहन नहीं हुआ ॥ ६८ ॥

पापाचारो राक्षसीं बुद्धिमाश्रितोऽनेकरूपायैरुद्धर्तुं च व्यवसितः;
भावित्वाच्चार्थस्य न शकितास्ते समुद्धर्तुम् ॥ ६९ ॥
पापाचारी दुर्योधन राक्षसी बुद्धिका आश्रय ले अनेक उपायोंसे पाण्डवोंकी जड़ उखाड़नेका प्रयत्न करता रहता था। परंतु जो होनेवाली बात है, वह होकर ही रहती है; इसलिये दुर्योधन आदि पाण्डवोंको नष्ट करनेमें सफल न हो सके ॥ ६९ ॥

ततश्च धृतराष्ट्रेण व्याजेन वारणावतमनुप्रेषिता गमनमरोचयन् ॥ ७० ॥
इसके बाद धृतराष्ट्रने किसी बहानेसे पाण्डवोंको जब वारणावत नगरमें जानेके लिये प्रेरित किया, तब उन्होंने वहाँसे जाना स्वीकार कर लिया ॥ ७० ॥

तत्रापि जतुगृहे दग्धुं समारब्धा न शकिता विदुरमन्त्रितेनेति ॥ ७१ ॥
वहाँ भी उन्हें लाक्षागृहमें जला डालनेका प्रयत्न किया गया; किंतु पाण्डवोंके विदुरजीकी सलाहके अनुसार काम करनेके कारण विरोधीलोग उनको दग्ध करनेमें समर्थ न हो सके ॥ ७१ ॥

तस्माच्च हिडिम्बमन्तरा हत्वा एकचक्रां गताः ॥ ७२ ॥
पाण्डव वारणावतसे अपनेको छिपाते हुए चल पड़े और मार्गमें हिडिम्ब राक्षसका वध करके वे एकचक्रा नगरीमें जा पहुँचे ॥ ७२ ॥

तस्यामप्येकचक्रायां बकं नाम राक्षसं हत्वा पाञ्चालनगरमधिगताः ॥ ७३ ॥
एकचक्रामें भी बक नामवाले राक्षसका संहार करके वे पांचाल नगरमें चले गये ॥ ७३ ॥

तत्र द्रौपदीं भार्यामविन्दन्, स्वविषयं चाभिजग्मुः ॥ ७४ ॥
वहाँ पाण्डवोंने द्रौपदीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और फिर अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें लौट आये ॥ ७४ ॥

कुशलिनः पुत्रांश्चोत्पादयामासुः । प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरः, सुतसोमं वृकोदरः, श्रुतकीर्तिमर्जुनः, शतानीकं नकुलः, श्रुतकर्माणं सहदेव इति ॥ ७५ ॥
वहाँ कुशलपूर्वक रहते हुए उन्होंने द्रौपदीसे पाँच पुत्र उत्पन्न किये। युधिष्ठिरने प्रतिविन्ध्यको, भीमसेनने सुतसोमको, अर्जुनने श्रुतकीर्तिको, नकुलने शतानीकको और सहदेवने श्रुतकर्माको जन्म दिया ॥ ७५ ॥

युधिष्ठिरस्तु गोवासनस्य शैब्यस्य देविकां नाम कन्यां स्वयंवरे लेभे । तस्यां पुत्रं जनयामास यौधेयं नाम ॥ ७६ ॥

भीमसेनोऽपि काश्यां बलन्धरां नामोपयेमे वीर्य-शुल्काम् । तस्यां पुत्रं सर्वगं नामोत्पादयामास ॥ ७७ ॥
युधिष्ठिरने शिबिदेशके राजा गोवासनकी पुत्री देविकाको स्वयंवरमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे एक पुत्रको जन्म दिया; जिसका नाम यौधेय था। भीमसेनने भी काशिराजकी कन्या बलन्धराके साथ विवाह किया; उसे प्राप्त करनेके लिये बल एवं पराक्रमका शुल्क

रखा गया था अर्थात् यह शर्त थी कि जो अधिक बलवान् हो, वही उसके साथ विवाह कर सकता है। भीमसेनने उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम सर्वग था॥ ७६-७७॥

अर्जुनः खलु द्वारवतीं गत्वा भगिनीं वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीं भार्यामुदावहत् । स्वविषयं चाभ्याजगाम कुशली । तस्यां पुत्रमभिमन्युमतीव गुणसम्पन्नं दयितं वासुदेवस्याजनयत् ॥ ७८ ॥

अर्जुनने द्वारकामें जाकर मङ्गलमय वचन बोलनेवाली वासुदेवकी बहिन सुभद्राको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसे लेकर कुशलपूर्वक अपनी राजधानीमें चले आये वहाँ उसके गर्भसे अत्यन्त गुणसम्पन्न अभिमन्यु नामक पुत्रको उत्पन्न किया; जो वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको बहुत प्रिय था॥ ७८॥

नकुलस्तु चैद्यां करेणुमतीं नाम भार्यामुदावहत् । तस्यां पुत्रं निरमित्रं नामाजनयत् ॥ ७९ ॥

नकुलने चेदिनरेशकी पुत्री करेणुमतीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे निरमित्र नामक पुत्रको जन्म दिया॥ ७९॥

सहदेवोऽपि माद्रीमेव स्वयंवरे विजयां नामोपयेमे मद्रराजस्य द्युतिमतो दुहितरम् । तस्यां पुत्रमजनयत् सुहोत्रं नाम ॥ ८० ॥

सहदेवने भी मद्रदेशकी राजकुमारी विजयाको स्वयंवरमें प्राप्त किया। वह मद्रराज द्युतिमान्‌की पुत्री थी। उसके गर्भसे उन्होंने सुहोत्र नामक पुत्रको जन्म दिया॥ ८०॥

भीमसेनस्तु पूर्वमेव हिडिम्बायां राक्षसं घटोत्कचं पुत्रमुत्पादयामास ॥ ८१ ॥

भीमसेनने पहले ही हिडिम्बाके गर्भसे घटोत्कच नामक राक्षसजातीय पुत्रको उत्पन्न किया॥ ८१॥

इत्येत एकादश पाण्डवानां पुत्राः । तेषां वंशकरोऽभिमन्युः ॥ ८२ ॥

इस प्रकार ये पाण्डवोंके ग्यारह पुत्र हुए। इनमेंसे अभिमन्युका ही वंश चला॥ ८२॥

स विराटस्य दुहितरमुपयेमे उत्तरां नाम । तस्यामस्य परासुर्गर्भोऽभवत् । तमुत्सङ्गेन प्रतिजग्राह पृथा नियोगात् पुरुषोत्तमस्य वासुदेवस्य, षाण्मासिकं गर्भमहमेनं जीवयिष्यामीति ॥ ८३ ॥

अभिमन्युने विराटकी पुत्री उत्तराके साथ विवाह किया था। उसके गर्भसे अभिमन्युके एक पुत्र हुआ; जो मरा हुआ था। पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके आदेशसे कुन्तीने उसे अपनी गोदमें ले लिया। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि छः महीनेके इस मरे हुए बालकको मैं जीवित कर दूँगा॥ ८३॥

स भगवता वासुदेवेनासञ्जातबलवीर्य-पराक्रमोऽकालजातोऽस्त्राग्निना दग्धस्तेजसा स्वेन संजीवितः । जीवयित्वा चैनमुवाच—परिक्षीणे कुले जातो भवत्वयं परिक्षिन्नामेति ॥ ८४ ॥

परिक्षित् खलु माद्रवतीं नामोपयेमे तन्मातरम्। तस्यां भवान् जनमेजयः।। ८५ ।।

अश्वत्थामाके अस्त्रकी अग्निसे झुलसकर वह असमयमें (समयसे पहले) ही पैदा हो गया था। उसमें बल, वीर्य और पराक्रम नहीं था। परंतु भगवान् श्रीकृष्णने उसे अपने तेजसे जीवित कर दिया। इसको जीवित करके वे इस प्रकार बोले—‘इस कुलके परिक्षीण (नष्ट) होनेपर इसका जन्म हुआ है; अतः यह बालक परिक्षित् नामसे विख्यात हो’। परिक्षित्ने तुम्हारी माता माद्रवतीके साथ विवाह किया, जिसके गर्भसे तुम जनमेजय नामक पुत्र उत्पन्न हुए।। ८४-८५।।

भवतो वपुष्टमायां द्वौ पुत्रौ जज्ञाते; शतानीकः शङ्कुकर्णश्च। शतानीकस्य वैदेह्यां पुत्र उत्पन्नोऽश्व-मेधदत्त इति।। ८६।।

तुम्हारी पत्नी वपुष्टमाके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए हैं—शतानीक और शंकुकर्ण। शतानीककी पत्नी विदेहराजकुमारीके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्रका नाम है अश्वमेधदत्त।। ८६।।

एष पूरोर्वंशः पाण्डवानां च कीर्तितः; धन्यः पुण्यः परमपवित्रः सततं श्रोतव्यो ब्राह्मणैर्नियम-वद्भिरनन्तरं क्षत्रियैः स्वधर्मनिरतैः प्रजापालन-तत्परैर्वैश्यैरपि च श्रोतव्योऽधिगम्यश्च तथा शूद्रैरपि त्रिवर्णशुश्रूषुभिः श्रद्दधानैरिति।। ८७।।

यह पूरु तथा पाण्डवोंके वंशका वर्णन किया गया; जो धन और पुण्यकी प्राप्ति करानेवाला एवं परम पवित्र है, नियमपरायण ब्राह्मणों, अपने धर्ममें स्थित प्रजापालक क्षत्रियों, वैश्यों तथा तीनों वर्णोंकी सेवा करनेवाले श्रद्धालु शूद्रोंको भी सदा इसका श्रवण एवं स्वाध्याय करना चाहिये।। ८७।।

इतिहासमिमं पुण्यमशेषतः श्रावयिष्यन्ति ये नराः श्रोष्यन्ति वा नियतात्मानो विमत्सरा मैत्रा वेद-परास्तेऽपि स्वर्गजितः पुण्यलोका भवन्ति सततं देवब्राह्मणमनुष्याणां मान्याः सम्पूज्याश्च।। ८८।।

जो पुण्यात्मा मनुष्य मनको वशमें करके ईर्ष्या छोड़कर सबके प्रति मैत्रीभावको रखते हुए वेदपरायण हो इस सम्पूर्ण पुण्यमय इतिहासको सुनावेंगे अथवा सुनेंगे वे स्वर्गलोकके अधिकारी होंगे और देवता, ब्राह्मण तथा मनुष्योंके लिये सदैव आदरणीय तथा पूजनीय होंगे।। ८८।।

परं हीदं भारतं भगवता व्यासेन प्रोक्तं पावनं ये ब्राह्मणादयो वर्णाः श्रद्दधाना अमत्सरा मैत्रा वेदसम्पन्नाः श्रोष्यन्ति, तेऽपि स्वर्गजितः सुकृतिनोऽशोच्याः कृताकृते भवन्ति।। ८९।।

जो ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोग मात्सर्यरहित, मैत्रीभावसे संयुक्त और वेदाध्ययनसे सम्पन्न हो श्रद्धापूर्वक भगवान् व्यासके द्वारा कहे हुए इस परम पावन महाभारत ग्रन्थको

सुनेंगे, वे भी स्वर्गके अधिकारी और पुण्यात्मा होंगे तथा उनके लिये इस बातका शोक नहीं रह जायगा कि उन्होंने अमुक कर्म क्यों किया और अमुक कर्म क्यों नहीं किया ।। ८९ ।।
भवति चात्र श्लोकः—
इदं हि वेदैः संमितं पवित्रमपि चोत्तमम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं श्रोतव्यं नियतात्मभिः ।। ९० ।।
इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है—
‘यह महाभारत वेदोंके समान पवित्र, उत्तम तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है। मनको वशमें रखनेवाले साधु पुरुषोंको सदैव इसका श्रवण करना चाहिये’ ।। ९० ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने
पञ्चनवतितमोऽध्यायः ।। ९५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पूरुवंशानुवर्णनविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९५ ।।

अध्याय (पृष्ठ 714)

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षण्णवतितमोऽध्यायः

महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसुओंके साथ गंगाकी बातचीत

वैशम्पायन उवाच

इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजाऽऽसीत् पृथिवीपतिः ।
महाभिष इति ख्यातः सत्यवाक् सत्यविक्रमः ॥ १ ॥
सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च ।
तोषयामास देवेशं स्वर्गं लेभे ततः प्रभुः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इक्ष्वाकु-वंशमें उत्पन्न महाभिष नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो सत्यवादी होनेके साथ ही सत्यपराक्रमी भी थे। उन्होंने एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञोंद्वारा देवेश्वर इन्द्रको संतुष्ट किया और उन यज्ञोंके पुण्यसे उन शक्तिशाली नरेशने स्वर्गलोग प्राप्त कर लिया ॥ १-२ ॥

ततः कदाचिद् ब्रह्माणमुपासांचक्रिरे सुराः ।
तत्र राजर्षयो ह्यासन् स च राजा महाभिषः ॥ ३ ॥
तदनन्तर एक समय सब देवता ब्रह्माजीकी सेवामें उनके समीप बैठे हुए थे। वहाँ बहुत-से राजर्षि तथा पूर्वोक्त राजा महाभिष भी उपस्थित थे ॥ ३ ॥

अथ गङ्गा सरिच्छ्रेष्ठा समुपायात् पितामहम् ।
तस्या वासः समुद्धूतं मारुतेन शशिप्रभम् ॥ ४ ॥
इसी समय सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा ब्रह्माजीके समीप आयी। उस समय वायुके झोंकेसे उसके शरीरका चाँदनीके समान उज्ज्वल वस्त्र सहसा ऊपरकी ओर उठ गया ॥ ४ ॥

ततोऽभवन् सुरगणाः सहसावाङ्मुखास्तदा ।
महाभिषस्तु राजर्षिरशङ्को दृष्टवान् नदीम् ॥ ५ ॥
यह देख सब देवताओंने तुरंत अपना मुँह नीचेकी ओर कर लिया; किंतु राजर्षि महाभिष निःशंक होकर देवनदीकी ओर देखते ही रह गये ॥ ५ ॥

सोऽपध्यातो भगवता ब्रह्मणा तु महाभिषः ।
उक्तश्च जातो मर्त्येषु पुनर्लोकानवाप्स्यसि ॥ ६ ॥
ययाऽऽहृतमनाश्चासि गङ्गया त्वं हि दुर्मते ।
सा ते वै मानुषे लोके विप्रियाण्याचरिष्यति ॥ ७ ॥
तब भगवान् ब्रह्माने महाभिषको शाप देते हुए कहा—'दुर्मते! तुम मनुष्योंमें जन्म लेकर फिर पुण्यलोकोंमें आओगे। जिस गंगाने तुम्हारे चित्तको चुरा लिया है, वही

मनुष्यलोकमें तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करेगी ।। ६-७ ।। यदा ते भविता मन्युस्तदा शापाद् विमोक्ष्यसे । 'जब तुम्हें गंगापर क्रोध आ जायगा, तब तुम भी शापसे छूट जाओगे।'

वैशम्पायन उवाच

स चिन्तयित्वा नृपतिर्नृपानन्यांस्तपोधनान् ।। ८ ।। प्रतीपं रोचयामास पितरं भूरितेजसम् । महाभिषं तु तं दृष्ट्वा नदी धैर्याच्च्युतं नृपम् ।। ९ ।। तमेव मनसा ध्यायन्त्युपावर्तत् सरिद्वरा । सा तु विध्वस्तवपुषः कश्मलाभिहतान् नृप ।। १० ।। ददर्श पथि गच्छन्ती वसून् देवान् दिवौकसः । तथारूपांश्च तान् दृष्ट्वा पप्रच्छ सरितां वरा ।। ११ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब राजा महाभिषने अन्य बहुत-से तपस्वी राजाओंका चिन्तन करके महातेजस्वी राजा प्रतीपको ही अपना पिता बनानेके योग्य चुना—उन्हींको पसंद किया। महानदी गंगा राजा महाभिषको धैर्य खोते देख मन-ही-मन उन्हींका चिन्तन करती हुई लौटी। मार्गसे जाती हुई गंगाने वसुदेवताओंको देखा। उनका शरीर स्वर्गसे नीचे गिर रहा था। वे मोहाच्छन्न एवं मलिन दिखायी दे रहे थे। उन्हें इस रूपमें देखकर नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाने पूछा— ।। ८—११ ।।

किमिदं नष्टरूपाः स्थ कच्चित् क्षेमं दिवौकसाम् । तामूचुर्वसवो देवाः शप्ताः स्मो वै महानदि ।। १२ ।। अल्पेऽपराधे संरम्भाद् वसिष्ठेन महात्मना । विमूढा हि वयं सर्वे प्रच्छन्नमृषिसत्तमम् ।। १३ ।। संध्यां वसिष्ठमासीनं तमत्यभिस्रुताः पुरा । तेन कोपाद् वयं शप्ता योनौ सम्भवतेति ह ।। १४ ।।

तुमलोगोंका दिव्य रूप नष्ट कैसे हो गया? देवता सकुशल तो हैं न? तब वसुदेवताओंने गंगासे कहा—'महानदी! महात्मा वसिष्ठने थोड़े-से अपराधपर क्रोधमें आकर हमें शाप दे दिया है। पहलेकी बात है एक दिन जब वसिष्ठजी पेड़ोंकी आड़में संध्योपासना कर रहे थे, हम सब मोहवश उनका उल्लंघन करके चले गये (और उनकी धेनुका अपहरण कर लिया)। इससे कुपित होकर उन्होंने हमें शाप दिया कि 'तुमलोग मनुष्ययोनिमें जन्म लो' ।। १२—१४ ।।

न निवर्तयितुं शक्यं यदुक्तं ब्रह्मवादिना । त्वमस्मान् मानुषी भूत्वा सृज पुत्रान्-वसून् भुवि ।। १५ ।।

‘उन ब्रह्मवादी महर्षिने जो बात कह दी है, वह टाली नहीं जा सकती; अतः हमारी प्रार्थना है कि तुम पृथ्वीपर मानवपत्नी होकर हम वसुओंको अपने पुत्ररूपसे उत्पन्न करो ।। १५ ।।

न मानुषीणां जठरं प्रविशेम वयं शुभे ।
इत्युक्ता तैश्च वसुभिस्तथेत्युक्त्वाब्रवीदिदम् ।। १६ ।।
‘शुभे! हमें मानुषी स्त्रियोंके उदरमें प्रवेश न करना पड़े, इसीलिये हमने यह अनुरोध किया है।' वसुओंके ऐसा कहनेपर गंगाजी 'तथास्तु' कहकर यों बोलीं ।। १६ ।।

गङ्गोवाच
मर्त्येषु पुरुषश्रेष्ठः को वः कर्ता भविष्यति ।
**गंगाजीने कहा—**वसुओ! मर्त्यलोकमें ऐसे श्रेष्ठ पुरुष कौन हैं; जो तुमलोगोंके पिता होंगे।

वसव ऊचुः
प्रतीपस्य सुतो राजा शान्तनुर्लोकविश्रुतः ।
भविता मानुषे लोके स नः कर्ता भविष्यति ।। १७ ।।
**वसुगण बोले—**प्रतीपके पुत्र राजा शान्तनु लोकविख्यात साधु पुरुष होंगे। मनुष्यलोकमें वे ही मारे जनक होंगे ।। १७ ।।

गङ्गोवाच
ममाप्येवं मतं देवा यथा मां वदतानघाः ।
प्रियं तस्य करिष्यामि युष्माकं चैतदीप्सितम् ।। १८ ।।
**गंगाजीने कहा—**निष्पाप देवताओ! तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही मेरा भी विचार है। मैं राजा शान्तनुका प्रिय करूँगी और तुम्हारे इस अभीष्ट कार्यको भी सिद्ध करूँगी ।। १८ ।।

वसव ऊचुः
जातान् कुमारान् स्वानप्सु प्रक्षेप्तुं वै त्वमर्हसि ।
यथा न चिरकालं नो निष्कृतिः स्यात् त्रिलोकगे ।। १९ ।।
**वसुगण बोले—**तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगे! हमलोग जब तुम्हारे गर्भसे जन्म लें, तब तुम पैदा होते ही हमें अपने जलमें फेंक देना; जिससे शीघ्र ही हमारा मर्त्यलोकसे छुटकारा हो जाय ।। १९ ।।

गङ्गोवाच
एवमेतत् करिष्यामि पुत्रस्तस्य विधीयताम् ।

नास्य मोघः संगमः स्यात् पुत्रहेतोर्मया सह ॥ २० ॥ **गंगाजीने कहा—**ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगी; परंतु उस राजाका मेरे साथ पुत्रके लिये किया हुआ सम्बन्ध व्यर्थ न हो जाय, इसलिये उनके लिये एक पुत्रकी भी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ २० ॥

वसव ऊचुः तुरीयार्धं प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम् । तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितः ॥ २१ ॥ **वसुगण बोले—**हम सब लोग अपने तेजका एक-एक अष्टमांश देंगे। उस तेजसे जो तुम्हारा एक पुत्र होगा, वह उस राजाकी इच्छाके अनुरूप होगा ॥ २१ ॥ न सम्पत्स्यति मर्त्येषु पुनस्तस्य तु संततिः । तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान् ॥ २२ ॥ किंतु मर्त्यलोकमें उसकी कोई संतान न होगी। अतः तुम्हारा वह पुत्र संतानहीन होनेके साथ ही अत्यन्त पराक्रमी होगा ॥ २२ ॥ एवं ते समयं कृत्वा गङ्गया वसवः सह । जग्मुः संहृष्टमनसो यथासंकल्पमञ्जसा ॥ २३ ॥ इस प्रकार गंगाजीके साथ शर्त करके वसुगण प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि महाभिषोपाख्याने षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें महाभिषोपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 718)

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सप्तनवतितमोऽध्यायः

राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रतीपो राजाऽऽसीत् सर्वभूतहितः सदा ।
निषसाद समा बह्वीर्गङ्गाद्वारगतो जपन् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— तदनन्तर इस पृथ्वीपर राजा प्रतीप राज्य करने लगे। वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते थे। एक समय महाराज प्रतीप गंगाद्वार (हरिद्वार)-में गये और बहुत वर्षोंतक जप करते हुए एक आसनपर बैठे रहे ॥ १ ॥

तस्य रूपगुणोपेता गङ्गा स्त्रीरूपधारिणी ।
उत्तीर्य सलिलात् तस्माल्लोभनीयतमाकृतिः ॥ २ ॥
अधीयानस्य राजर्षेर्दिव्यररूपा मनस्विनी ।
दक्षिणं शालसंकाशमूरूं भेजे शुभानना ॥ ३ ॥

उस समय मनस्विनी गंगा सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे युक्त युवती स्त्रीका रूप धारण करके जलसे निकलीं और स्वाध्यायमें लगे हुए राजर्षि प्रतीपके शाल-जैसे विशाल दाहिने ऊरु (जाँघ)-पर जा बैठीं। उस समय उनकी आकृति बड़ी लुभावनी थी; रूप देवांगनाओंके समान था और मुख अत्यन्त मनोहर था ॥ २-३ ॥

प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच यशस्विनीम् ।
करोमि किं ते कल्याणि प्रियं यत् तेऽभिकाङ्क्षितम् ॥ ४ ॥

अपनी जाँघपर बैठी हुई उस यशस्विनी नारीसे राजा प्रतीपने पूछा—‘कल्याणि! मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? तुम्हारी क्या इच्छा है?’ ॥ ४ ॥

रूयुवाच

त्वामहं कामये राजन् भजमानां भजस्व माम् ।
त्यागः कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्भिर्विगर्हितः ॥ ५ ॥

स्त्री बोली— राजन्! मैं आपको ही चाहती हूँ। आपके प्रति मेरा अनुराग है, अतः आप मुझे स्वीकार करें; क्योंकि कामके अधीन होकर अपने पास आयी हुई स्त्रियोंका परित्याग साधु पुरुषोंने निन्दित माना है ॥ ५ ॥

प्रतीप उवाच

नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनि ।
न चासवर्णों कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम् ॥ ६ ॥

**प्रतीपने कहा—**सुन्दरी! मैं कामवश परायी स्त्रीके साथ समागम नहीं कर सकता। जो अपने वर्णकी न हो, उससे भी मैं सम्बन्ध नहीं रख सकता। कल्याणि! यह मेरा धर्मानुकूल व्रत है ।। ६ ।।

स्त्र्युवाच

नाश्रेयस्यस्मि नागम्या न वक्तव्या च कर्हिचित् ।
भजन्तीं भज मां राजन् दिव्यां कन्यां वरस्त्रियम् ।। ७ ।।
**स्त्री बोली—**राजन्! मैं अशुभ या अमंगल करनेवाली नहीं हूँ, समागमके अयोग्य भी नहीं हूँ और ऐसी भी नहीं हूँ कि कभी कोई मुझपर कलंक लगावे। मैं आपके प्रति अनुरक्त होकर आयी हुई दिव्य कन्या एवं सुन्दरी स्त्री हूँ। अतः आप मुझे स्वीकार करें ।। ७ ।।

प्रतीप उवाच

त्वया निवृत्तमेतत् तु यन्मां चोदयसि प्रियम् ।
अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशयेद् धर्मविप्लवः ।। ८ ।।
**प्रतीपने कहा—**सुन्दरी! तुम जिस प्रिय मनोरथकी पूर्तिके लिये मुझे प्रेरित कर रही हो, उसका निराकरण भी तुम्हारे द्वारा ही हो गया। यदि मैं धर्मके विपरीत तुम्हारा यह प्रस्ताव स्वीकार कर लूँ तो धर्मका यह विनाश मेरा भी नाश कर डालेगा ।। ८ ।।
प्राप्य दक्षिणमूरूं मे त्वमाश्लिष्टा वराङ्गने ।
अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्ध्येतदासनम् ।। ९ ।।
वरांगने! तुम मेरी दाहिनी जाँघपर आकर बैठी हो। भीरु! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि यह पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधूका आसन है ।। ९ ।।
सव्योरुः कामिनीभोग्यस्त्वया स च विवर्जितः ।
तस्मादहं नाचरिष्ये त्वयि कामं वराङ्गने ।। १० ।।
पुरुषकी बायीं जाँघ ही कामिनीके उपभोगके योग्य है; किंतु तुमने उसका त्याग कर दिया है। अतः वरांगने! मैं तुम्हारे प्रति कामयुक्त आचरण नहीं करूँगा ।। १० ।।
स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थं त्वां वृणोम्यहम् ।
स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता ।। ११ ।।
सुश्रोणि! तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ। मैं अपने पुत्रके लिये तुम्हारा वरण करता हूँ; क्योंकि वामोरु! तुमने यहाँ आकर मेरी उसी जाँघका आश्रय लिया है, जो पुत्रवधूके पक्षकी है ।। ११ ।।

स्त्र्युवाच

एवमप्यस्तु धर्मज्ञ संयुज्येयं सुतेन ते ।
त्वद्भक्त्या तु भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम् ।। १२ ।।