महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दुहितुः स्नेहसंयोगमनुध्याय वराङ्गना । मनसाचिन्तयद् देवी एतत् पुत्रशतं मम ॥ ९ ॥ भविष्यति न संदेहो न ब्रवीत्यन्यथा मुनिः । ममेयं परमा तुष्टिर्दुहिता मे भवेद् यदि ॥ १० ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**पाण्डवनन्दन! तुमने यह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें इसका उत्तर देता हूँ। महातपस्वी भगवान् व्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डको शीतल जलसे सींचकर उसके सौ भाग किये। राजन्! उस समय जो भाग जैसा बना, उसे धायद्वारा वे एक-एक करके घीसे भरे हुए कुण्डोंमें डलवाते गये। इसी बीचमें पूर्ण दृढ़तासे सतीव्रतका पालन करनेवाली साध्वी एवं सुन्दरी गान्धारी कन्याके स्नेह-सम्बन्धका विचार करके मन-ही-मन सोचने लगी—इसमें संदेह नहीं कि इस मांसपिण्डसे मेरे सौ पुत्र उत्पन्न होंगे; क्योंकि व्यासमुनि कभी झूठ नहीं बोलते; परंतु मुझे अधिक संतोष तो तब होता, यदि एक पुत्री भी हो जाती ॥ ६—१० ॥
एका शताधिका बाला भविष्यति कनीयसी । ततो दौहित्रजाल्लोकादबाह्योऽसौ पतिर्मम ॥ ११ ॥
यदि सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक छोटी कन्या हो जायगी तो मेरे ये पति दौहित्रके पुण्यसे प्राप्त होनेवाले उत्तम लोकोंसे भी वंचित नहीं रहेंगे ॥ ११ ॥
अधिका किल नारीणां प्रीतिर्जामातृजा भवेत् । यदि नाम ममापि स्याद् दुहितैका शताधिका ॥ १२ ॥ कृतकृत्या भवेयं वै पुत्रदौहित्रसंवृता । यदि सत्यं तपस्तप्तं दत्तं वाप्यथवा हुतम् ॥ १३ ॥ गुरवस्तोषिता वापि तथास्तु दुहिता मम । एतस्मिन्नेव काले तु कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ॥ १४ ॥ व्यभजत् स तदा पेशीं भगवानृषिसत्तमः । गणयित्वा शतं पूर्णमंशानामाह सौबलीम् ॥ १५ ॥
कहते हैं, स्त्रियोंका दामादमें पुत्रसे भी अधिक स्नेह होता है। यदि मुझे भी सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक पुत्री प्राप्त हो जाय तो मैं पुत्र और दौहित्र दोनोंसे घिरी रहकर कृतकृत्य हो जाऊँ। यदि मैंने सचमुच तप, दान अथवा होम किया हो तथा गुरुजनोंको सेवाद्वारा प्रसन्न कर लिया हो, तो मुझे पुत्री अवश्य प्राप्त हो। इसी बीचमें मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डके विभाग कर दिये और पूरे सौ अंशोंकी गणना करके गान्धारीसे कहा ॥ १२—१५ ॥
व्यास उवाच
पूर्णं पुत्रशतं त्वेतन्न मिथ्या वागुदाहृता ।
दौहित्रयोगाय भाग एकः शिष्टः शतात् परः ।
एषा ते सुभगा कन्या भविष्यति यथेप्सिता ॥ १६ ॥
व्यासजी बोले— गान्धारी! मैंने झूठी बात नहीं कही थी; ये पूरे सौ पुत्र हैं। सौके अतिरिक्त एक भाग और बचा है, जिससे दौहित्रका योग होगा। इस अंशसे तुम्हें अपने मनके अनुरूप एक सौभाग्यशालिनी कन्या प्राप्त होगी ॥ १६ ॥
ततोऽन्यं घृतकुम्भं च समानाय्य महातपाः ।
तं चापि प्राक्षिपत् तत्र कन्याभागं तपोधनः ॥ १७ ॥
एतत् ते कथितं राजन् दुःशलाजन्म भारत ।
ब्रूहि राजेन्द्र किं भूयो वर्तयिष्यामि तेऽनघ ॥ १८ ॥
यों कहकर महातपस्वी व्यासजीने घीसे भरा हुआ एक और घड़ा मँगाया और उन तपोधन मुनिने उस कन्याभागको उसीमें डाल दिया। भरतवंशी नरेश! इस प्रकार मैंने तुम्हें दुःशलाके जन्मका प्रसंग सुना दिया। अनघ! बोलो, अब पुनः और क्या कहूँ ॥ १७-१८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि दुःशलोत्पत्तौ
पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें दुःशलाकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥
११६-
षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंकी नामावली
जनमेजय उवाच
ज्येष्ठानुज्येष्ठतां तेषां नामानि च पृथक् पृथक् ।
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्यात् प्रकीर्तय ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें सबसे ज्येष्ठ कौन था? फिर उससे छोटा और उससे भी छोटा कौन था? उन सबके अलग-अलग नाम क्या थे? इन सब बातोंका क्रमशः वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन् दुःशासनस्तथा ।
दुःसहो दुःशलश्चैव जलसंधः समः सहः ॥ २ ॥
विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः ।
दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च ॥ ३ ॥
विविंशतिर्विकर्णश्च शलः सत्त्वः सुलोचनः ।
चित्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुचित्रशरासनः ॥ ४ ॥
दुर्मदो दुर्विगाहश्च विवित्सुर्विकटाननः ।
ऊर्णनाभः सुनाभश्च तथा नन्दोपनन्दकौ ॥ ५ ॥
चित्रबाणश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः ।
अयोबाहुर्महाबाहुश्चित्राङ्गश्चित्रकुण्डलः ॥
भीमवेगो भीमबलो बलाकी बलवर्धनः ।
उग्रायुधः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौ ॥ ७ ॥
चित्रायुधो निषङ्गी च पाशी वृन्दारकस्तथा ।
दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः ॥
दृढसन्धो जरासन्धः सत्यसन्धः सदःसुवाक् ।
उग्रश्रवा उग्रसेनः सेनानीर्दुष्पराजयः ॥
अपराजितः पण्डितको विशालाक्षो दुराधरः ।
दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ ॥ १० ॥
आदित्यकेतुर्बह्वाशी नागदत्तोऽग्रयाय्यपि ।
कवची क्रथनः दण्डी दण्डधारो धनुर्ग्रहः ॥ ११ ॥
उग्रभीमरथौ वीरौ वीरबाहुरलोलुपः ।
अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथाश्रयः ॥ १२ ॥ अनाधृष्यः कुण्डभेदी विरावी चित्रकुण्डलः । प्रमथश्च प्रमाथी च दीर्घरोमश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥ दीर्घबाहुर्महाबाहुर्व्यूढोरुः कनकध्वजः । कुण्डाशी विरजाश्चैव दुःशला च शताधिका ॥ १४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—(जनमेजय! धृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमशः ये हैं—) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, ११. दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन (चित्र-चाप), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २९. विवित्सु, ३०. विकटानन (विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ (पद्मनाभ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण (चित्रबाहु), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्वरोचन, ३९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद), ४१. चित्रकुण्डल (सुकुण्डल), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन (विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४९. महोदर, ५०. चित्रायुध (दृढायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढवर्मा, ५५. दृढक्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढसन्ध, ५९. जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सदःसुवाक् (सहस्रवाक्), ६२. उग्रश्रवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी (सेनापति), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६९. दुराधर (दुराधन), ७०. दृढहस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्वाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी (अनुयायी), ७८. कवची, ७९. क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुर्ग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७. अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८९. दृढरथाश्रय (दृढरथ), ९०. अनाधृष्य, ९१. कुण्डभेदी, ९२. विरावी, ९३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९५. वीर्यवान् दीर्घरोमा (दीर्घलोचन), ९६. दीर्घबाहु, ९७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज (कनकांगद), ९९. कुण्डाशी (कुण्डज) तथा १००. विरजा—धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे। इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी*॥ २—१४॥
इति पुत्रशतं राजन् कन्या चैव शताधिका । नामधेयानुपूर्व्येण विद्धि जन्मक्रमं नृप ॥ १५ ॥
राजन्! इस प्रकार धृतराष्ट्रके सौ पुत्र और उन सौके अतिरिक्त एक कन्या बतायी गयी। राजन्! जिस क्रमसे इनके नाम लिये गये हैं, उसी क्रमसे इनका जन्म हुआ समझो॥ १५॥
सर्वे त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः । सर्वे वेदविदश्चैव सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः ॥ १६ ॥
ये सभी अतिरथी शूरवीर थे। सबने युद्धविद्यामें निपुणता प्राप्त कर ली थी। सब-के-सब वेदोंके विद्वान् तथा सम्पूर्ण अस्त्रविद्याके मर्मज्ञ थे ॥ १६ ॥
सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते ।
धृतराष्ट्रेण समये परीक्ष्य विधिवन्नृप ॥ १७ ॥
दुःशलां चापि समये धृतराष्ट्रो नराधिपः ।
जयद्रथाय प्रददौ विधिना भरतर्षभ ॥ १८ ॥
जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रने समयपर भलीभाँति जाँच-पड़ताल करके अपने सभी पुत्रोंका उनके योग्य स्त्रियोंके साथ विवाह कर दिया। भरतश्रेष्ठ! महाराज धृतराष्ट्रने विवाहके योग्य समय आनेपर अपनी पुत्री दुःशलाका राजा जयद्रथके साथ विधिपूर्वक विवाह किया ॥ १७-१८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रपुत्रनामकथने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें धृतराष्ट्रपुत्रनामवर्णनविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥
* आदिपर्वके सरसठवें अध्यायमें भी धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंके नाम आये हैं। वहाँ जो नाम दिये गये हैं, उनमेंसे अधिकांश नाम इस अध्यायमें भी ज्यों-के-त्यों हैं। कुछ नामोंमें साधारण अन्तर है, जिन्हें यहाँ कोष्ठकमें दे दिया गया है। इस प्रकार यहाँ और वहाँके नामोंकी एकता की गयी है। थोड़े-से नाम ऐसे भी हैं, जिनका मेल नहीं मिलता। नामोंके क्रममें भी दोनों स्थलोंमें अन्तर है। सम्भव है, उनके दो-दो नाम रहे हों और दोनों स्थलोंमें भिन्न-भिन्न नामोंका उल्लेख हो।
११७-
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति
जनमेजय उवाच
कथितो धार्तराष्ट्राणामार्षः सम्भव उत्तमः ।
अमनुष्यो मनुष्याणां भवता ब्रह्मवादिना ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— भगवन्! आपने धृतराष्ट्रके पुत्रोंके जन्मका उत्तम प्रसंग सुनाया है, जो महर्षि व्यासकी कृपासे सम्भव हुआ था। आप ब्रह्मवादी हैं। आपने यद्यपि यह मनुष्योंके जन्मका वृत्तान्त बताया है, तथापि यह दूसरे मनुष्योंमें कभी नहीं देखा गया ॥ १ ॥
नामधेयानि चाप्येषां कथ्यमानानि भागशः ।
त्वत्तः श्रुतानि मे ब्रह्मन् पाण्डवानां च कीर्तय ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! इन धृतराष्ट्रपुत्रोंके पृथक्-पृथक् नाम भी जो आपने कहे हैं, वे मैंने अच्छी तरह सुन लिये। अब पाण्डवोंके जन्मका वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
ते हि सर्वे महात्मानो देवराजपराक्रमाः ।
त्वयैवांशावतरणे देवभागाः प्रकीर्तिताः ॥ ३ ॥
वे सब महात्मा पाण्डव देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। आपने ही अंशावतरणके प्रसंगमें उन्हें देवताओंका अंश बताया था ॥ ३ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुमतिमानुषकर्मणाम् ।
तेषामाजननं सर्वं वैशम्पायन कीर्तय ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजी! वे ऐसे पराक्रम कर दिखाते थे, जो मनुष्योंकी शक्तिके परे हैं; अतः मैं उनके जन्म-सम्बन्धी वृत्तान्तको सम्पूर्णतासे सुनना चाहता हूँ; कृपा करके कहिये ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
राजा पाण्डुर्महारण्ये मृगव्यालनिषेविते ।
चरन् मैथुनधर्मस्थं ददर्श मृगयूथपम् ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी बोले— जनमेजय! एक समय राजा पाण्डु मृगों और सर्पोंसे सेवित विशाल वनमें विचर रहे थे। उन्होंने मृगोंके एक यूथपतिको देखा, जो मृगीके साथ मैथुन कर रहा था ॥ ५ ॥
ततस्तां च मृगीं तं च रुक्मपुङ्खैः सुपत्रिभिः ।
निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः पाण्डुः पञ्चभिराशुगैः ॥ ६ ॥
उसे देखते ही राजा पाण्डुने पाँच सुन्दर एवं सुनहरे पंखोंसे युक्त तीखे तथा शीघ्रगामी बाणोंद्वारा, उस मृगी और मृगको भी बींध डाला ।। ६ ।।
स च राजन् महातेजा ऋषिपुत्रस्तपोधनः । भार्यया सह तेजस्वी मृगरूपेण संगतः ।। ७ ।।
राजन्! उस मृगके रूपमें एक महातेजस्वी तपोधन ऋषिपुत्र थे, जो अपनी मृगीरूपधारिणी पत्नीके साथ तेजस्वी मृग बनकर समागम कर रहे थे ।। ७ ।।
संसक्तश्च तया मृग्या मानुषीमीरयन् गिरम् । क्षणेन पतितो भूमौ विललापाकुलेन्द्रियः ।। ८ ।।
वे उस मृगीसे सटे हुए ही मनुष्योंकी-सी बोली बोलते हुए क्षणभरमें पृथ्वीपर गिर पड़े। उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं और वे विलाप करने लगे ।। ८ ।।
मृग उवाच
काममन्युपरीता हि बुद्ध्या विरहिता अपि । वर्जयन्ति नृशंसानि पापेष्वपि रता नराः ।। ९ ।। न विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः । विधिपर्यागतानर्थान् प्राज्ञो न प्रतिपद्यते ।। १० ।।
**मृगने कहा—**राजन्! जो मनुष्य काम और क्रोधसे घिरे हुए, बुद्धिशून्य तथा पापोंमें संलग्न रहनेवाले हैं, वे भी ऐसे क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग देते हैं। बुद्धि प्रारब्धको नहीं ग्रसती (नहीं लाँघ सकती) प्रारब्ध ही बुद्धिको अपना ग्रास बना लेता है (भ्रष्ट कर देता है)। प्रारब्धसे प्राप्त होनेवाले पदार्थोंको बुद्धिमान् पुरुष भी नहीं जान पाता ।। ९-१० ।।
शश्वद्धर्मात्मनां मुख्ये कुले जातस्य भारत ।
कामलोभाभिभूतस्य कथं ते चलिता मतिः ॥ ११ ॥
भारत! सदा धर्ममें मन लगानेवाले क्षत्रियोंके प्रधान कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ है, तो भी काम और लोभके वशीभूत होकर तुम्हारी बुद्धि धर्मसे कैसे विचलित हुई? ।। ११ ।।
पाण्डुरुवाच
शत्रूणां या वधे वृत्तिः सा मृगाणां वधे स्मृता ।
राज्ञां मृग न मां मोहात् त्वं गर्हयितुमर्हसि ॥ १२ ॥
**पाण्डु बोले—**शत्रुओंके वधमें राजाओंकी जैसी वृत्ति बतायी गयी है, वैसी ही मृगोंके वधमें भी मानी गयी है; अतः मृग! तुम्हें मोहवश मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये ।। १२ ।।
अच्छद्मना मायया च मृगाणां वध इष्यते ।
स एव धर्मो राज्ञां तु तद्वि त्वं किं नु गर्हसे ॥ १३ ॥
प्रकट या अप्रकट रूपसे मृगोंका वध हमारे लिये अभीष्ट है। वह राजाओंके लिये धर्म है, फिर तुम उसकी निन्दा कैसे करते हो? ।। १३ ।।
अगस्त्यः सत्रमासीनश्चकार मृगयामृषिः ।
आरण्यान् सर्वदेवेभ्यो मृगान् प्रेषन् महावने ॥ १४ ॥
प्रमाणदृष्टधर्मेण कथमस्मान् विगर्हसे ।
अगस्त्यस्याभिचारेण युष्माकं विहितो वधः ॥ १५ ॥
महर्षि अगस्त्य एक सत्रमें दीक्षित थे, तब उन्होंने भी मृगया की थी। सभी देवताओंके हितके लिये उन्होंने सत्रमें विघ्न करनेवाले पशुओंको महान् वनमें खदेड़ दिया था। अगस्त्य ऋषिके उक्त हिंसककर्मके अनुसार (मुझ क्षत्रियके लिये तो) तुम्हारा वध करना ही उचित है। मैं प्रमाणसिद्ध धर्मके अनुकूल बर्ताव करता हूँ, तो भी तुम क्यों मेरी निन्दा करते हो? ।। १४-१५ ।।
मृग उवाच
न रिपून् वै समुद्दिश्य विमुञ्चन्ति नराः शरान् ।
रन्ध्र एषां विशेषेण वधः काले प्रशस्यते ॥ १६ ॥
**मृगने कहा—**मनुष्य अपने शत्रुओंपर भी, विशेषतः जब वे संकटकालमें हों, बाण नहीं छोड़ते। उपयुक्त अवसर (संग्राम आदि)-में ही शत्रुओंके वधकी प्रशंसा की जाती है ।। १६ ।।
पाण्डुरुवाच
प्रमत्तमप्रमत्तं वा विवृतं घ्नन्ति चौजसा ।
उपायैर्विविधैस्तीक्ष्णैः कस्मान्मृग विगर्हसे ॥ १७ ॥
**पाण्डु बोले—**मृग! राजालोग नाना प्रकारके तीक्ष्ण उपायोंद्वारा बलपूर्वक खुले-आम मृगका वध करते हैं; चाहे वह सावधान हो या असावधान। फिर तुम मेरी निन्दा क्यों करते हो? ॥ १७ ॥
मृग उवाच
नाहं घ्नन्तं मृगान् राजन् विगर्हे चात्मकारणात् ।
मैथुनं तु प्रतीक्ष्यं मे त्वयेहाद्यानृशंस्यतः ॥ १८ ॥
**मृगने कहा—**राजन्! मैं अपने मारे जानेके कारण इस बातके लिये तुम्हारी निन्दा नहीं करता कि तुम मृगोंको मारते हो। मुझे तो इतना ही कहना है कि तुम्हें दयाभावका आश्रय लेकर मेरे मैथुनकर्मसे निवृत्त होनेतक प्रतीक्षा करनी चाहिये थी ॥ १८ ॥
सर्वभूतहिते काले सर्वभूतेप्सिते तथा ।
को हि विद्वान् मृगं हन्याच्चरन्तं मैथुनं वने ॥ १९ ॥
जो सम्पूर्ण भूतोंके लिये हितकर और अभीष्ट है, उस समयमें वनके भीतर मैथुन करनेवाले किसी मृगको कौन विवेकशील पुरुष मार सकता है? ॥ १९ ॥
अस्यां मृग्यां च राजेन्द्र हर्षाण्मैथुनमाचरम् ।
पुरुषार्थफलं कर्तुं तत् त्वया विफलीकृतम् ॥ २० ॥
राजेन्द्र! मैं बड़े हर्ष और उल्लासके साथ अपने कामरूपी पुरुषार्थको सफल करनेके लिये इस मृगीके साथ मैथुन कर रहा था; किंतु तुमने उसे निष्फल कर दिया ॥ २० ॥
पौरवाणां महाराज तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।
वंशे जातस्य कौरव्य नानुरूपमिदं तव ॥ २१ ॥
महाराज! क्लेशरहित कर्म करनेवाले कुरुवंशियोंके कुलमें जन्म लेकर तुमने जो यह कार्य किया है, यह तुम्हारे अनुरूप नहीं है ॥ २१ ॥
नृशंसं कर्म सुमहत् सर्वलोकविगर्हितम् ।
अस्वर्ग्यमयशस्यं चाप्यधर्मिष्ठं च भारत ॥ २२ ॥
भारत! अत्यन्त कठोरतापूर्ण कर्म सम्पूर्ण लोकोंमें निन्दित है। वह स्वर्ग और यशको हानि पहुँचानेवाला है। इसके सिवा वह महान् पापकृत्य है ॥ २२ ॥
स्त्रीभोगानां विशेषज्ञः शास्त्रधर्मार्थतत्त्ववित् ।
नार्हस्त्वं सुरसंकाश कर्तुमस्वर्ग्यमीदृशम् ॥ २३ ॥
देवतुुल्य महाराज! तुम स्त्री-भोगोंके विशेषज्ञ तथा शास्त्रीय धर्म एवं अर्थके तत्त्वको जाननेवाले हो। तुम्हें ऐसा नरकप्रद पापकार्य नहीं करना चाहिये था ॥ २३ ॥
त्वया नृशंसकर्तारः पापाचाराश्च मानवाः । निग्राह्याः पार्थिवश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिवर्जिताः ॥ २४ ॥ नृपशिरोमणे! तुम्हारा कर्तव्य तो यह है कि धर्म, अर्थ और कामसे हीन जो पापाचारी मनुष्य कठोरतापूर्ण कर्म करनेवाले हों, उन्हें दण्ड दो ॥ २४ ॥ किं कृतं ते नरश्रेष्ठ मामिहानागसं घ्नता । मुनिं मूलफलाहारं मृगवेषधरं नृप ॥ २५ ॥ वसमानमरण्येषु नित्यं शमपरायणम् । त्वयाहं हिंसितो यस्मात् तस्मात् त्वामप्यहं शपे ॥ २६ ॥ नरश्रेष्ठ! मैं तो फल-मूलका आहार करनेवाला एक मुनि हूँ और मृगका रूप धारण करके शम-दमके पालनमें तत्पर हो सदा जंगलोंमें ही निवास करता हूँ। मुझ निरपराधको मारकर यहाँ तुमने क्या लाभ उठाया? तुमने मेरी हत्या की है, इसलिये बदलेमें मैं भी तुम्हें शाप देता हूँ ॥ २५-२६ ॥ द्वयोर्नृशंसकर्तारमवशं काममोहितम् । जीवितान्तकरो भाव एवमेवागमिष्यति ॥ २७ ॥ तुमने मैथुन-धर्ममें आसक्त दो स्त्री-पुरुषोंका निष्ठुरता-पूर्वक वध किया है। तुम अजितेन्द्रिय एवं कामसे मोहित हो; अतः इसी प्रकार मैथुनमें आसक्त होनेपर जीवनका अन्त करनेवाली मृत्यु निश्चय ही तुमपर आक्रमण करेगी ॥ २७ ॥ अहं हि किंदमो नाम तपसा भावितो मुनिः । व्यपत्रपन्मनुष्याणां मृग्यां मैथुनमाचरम् ॥ २८ ॥ मृगो भूत्वा मृगैः सार्धं चरामि गहने वने । न तु ते ब्रह्महत्येयं भविष्यत्यविजानतः ॥ २९ ॥ मेरा नाम किंदम है। मैं तपस्यामें संलग्न रहनेवाला मुनि हूँ, अतः मनुष्योंमें—मानव-शरीरसे यह काम करनेमें मुझे लज्जाका अनुभव हो रहा था। इसीलिये मृग बनकर अपनी मृगीके साथ मैथुन कर रहा था। मैं प्रायः इसी रूपमें मृगोंके साथ घने वनमें विचरता रहता हूँ। तुम्हें मुझे मारनेसे ब्रह्महत्या तो नहीं लगेगी; क्योंकि तुम यह बात नहीं जानते थे (कि यह मुनि है) ॥ २८-२९ ॥ मृगरूपधरं हत्वा मामेवं काममोहितम् । अस्य तु त्वं फलं मूढ प्राप्स्यसीदृशमेव हि ॥ ३० ॥ परंतु जब मैं मृगरूप धारण करके कामसे मोहित था, उस अवस्थामें तुमने अत्यन्त क्रूरताके साथ मुझे मारा है; अतः मूढ़! तुम्हें अपने इस कर्मका ऐसा ही फल अवश्य मिलेगा ॥ ३० ॥ प्रियया सह संवासं प्राप्य कामविमोहितः । त्वमप्यस्यामवस्थायां प्रेतलोकं गमिष्यसि ॥ ३१ ॥
तुम भी जब कामसे सर्वथा मोहित होकर अपनी प्यारी पत्नीके साथ समागम करने लगोगे, तब इस—मेरी अवस्थामें ही यमलोक सिधारोगे ॥ ३१ ॥
अन्तकाले हि संवासं यया गन्तासि कान्तया ।
प्रेतराजपुरं प्राप्तं सर्वभूतदुरत्ययम् ।
भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ सैव त्वानुगमिष्यति ॥ ३२ ॥
बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज! अन्तकाल आनेपर तुम जिस प्यारी पत्नीके साथ समागम करोगे, वही समस्त प्राणियोंके लिये दुर्गम यमलोकमें जानेपर भक्तिभावसे तुम्हारा अनुसरण करेगी ॥ ३२ ॥
वर्तमानः सुखे दुःखं यथाहं प्रापितस्त्वया ।
तथा त्वां च सुखं प्राप्तं दुःखमभ्यागमिष्यति ॥ ३३ ॥
मैं सुखमें मग्न था, तथापि तुमने जिस प्रकार मुझे दुःखमें डाल दिया, उसी प्रकार तुम भी जब प्रेयसी पत्नीके संयोग-सुखका अनुभव करोगे, उसी समय तुम्हारे ऊपर दुःख टूट पड़ेगा ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो जीवितात् स व्यमुच्यत ।
मृगः पाण्डुश्च दुःखार्तः क्षणेन समपद्यत ॥ ३४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—यों कहकर वे मृगरूप-धारी मुनि अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो गये और उनका देहान्त हो गया तथा राजा पाण्डु भी क्षणभरमें दुःखसे आतुर हो उठे ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुमृगशापे
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुको मृगका शाप नामक
एक सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११७ ॥
११८-
अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डुका अनुताप, संन्यास लेनेका निश्चय तथा पत्नियोंके अनुरोधसे वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश
वैशम्पायन उवाच
तं व्यतीतमतिक्रम्य राजा स्वमिव बान्धवम् ।
सभार्यः शोकदुःखार्तः पर्यदेवयदातुरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उन मृगरूपधारी मुनिको मरा हुआ छोड़कर राजा पाण्डु जब आगे बढ़े, तब पत्नीसहित शोक और दुःखसे आतुर हो अपने सगे भाई-बन्धुकी भाँति उनके लिये विलाप करने लगे तथा अपनी भूलपर पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे ॥ १ ॥
पाण्डुरुवाच
सतामपि कुले जाताः कर्मणा बत दुर्गतिम् ।
प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः ॥ २ ॥
**पाण्डु बोले—**खेदकी बात है कि श्रेष्ठ पुरुषोंके उत्तम कुलमें उत्पन्न मनुष्य भी अपने अन्तःकरणपर वश न होनेके कारण कामके फंदेमें फँसकर विवेक खो बैठते हैं और अनुचित कर्म करके उसके द्वारा भारी दुर्गतिमें पड़ जाते हैं ॥ २ ॥
शश्वद्धर्मात्मना जातो बाल एव पिता मम ।
जीवितान्तमनुप्राप्तः कामात्मैवेति नः श्रुतम् ॥ ३ ॥
हमने सुना है, सदा धर्ममें मन लगाये रहनेवाले महाराज शन्तनुसे जिनका जन्म हुआ था, वे मेरे पिता विचित्रवीर्य भी कामभोगमें आसक्तचित्त होनेके कारण ही छोटी अवस्थामें ही मृत्युको प्राप्त हुए थे ॥ ३ ॥
तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संयतवागृषिः ।
कृष्णद्वैपायनः साक्षाद् भगवान् मामजीजनत् ॥ ४ ॥
उन्हीं कामासक्त नरेशकी पत्नीसे वाणीपर संयम रखनेवाले ऋषिप्रवर साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायनने मुझे उत्पन्न किया ॥ ४ ॥
तस्याद्य व्यसने बुद्धिः संजातेयं ममाधमा ।
त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावतः ॥ ५ ॥
मैं शिकारके पीछे दौड़ता रहता हूँ; मेरी इसी अनीतिके कारण जान पड़ता है देवताओंने मुझे त्याग दिया है। इसीलिये तो ऐसे विशुद्ध वंशमें उत्पन्न होनेपर भी आज व्यसनमें फँसकर मेरी यह बुद्धि इतनी नीच हो गयी ॥ ५ ॥
मोक्षमेव व्यवस्यामि बन्धो हि व्यसनं महत् ।
सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ॥ ६ ॥
अतः अब मैं इस निश्चयपर पहुँच रहा हूँ कि मोक्षके मार्गपर चलनेसे ही अपना कल्याण है। स्त्री-पुत्र आदिका बन्धन ही सबसे महान् दुःख है। आजसे मैं अपने पिता वेदव्यासजीकी उस उत्तम वृत्तिका आश्रय लूँगा, जिससे पुण्यका कभी नाश नहीं होता ॥ ६ ॥
अतीव तपसाऽऽत्मानं योजयिष्याम्यसंशयम् ।
तस्मादेकोऽहमेकाकी एकैकस्मिन् वनस्पतौ ॥ ७ ॥
चरन् भैक्ष्यं मुनिर्मुण्डश्चरिष्याम्याश्रमानिमान् ।
पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारकृतालयः ॥ ८ ॥
मैं अपने शरीर और मनको निःसंदेह अत्यन्त कठोर तपस्यामें लगाऊँगा। इसलिये अब अकेला (स्त्रीरहित) और एकाकी (सेवक आदिसे भी अलग) रहकर एक-एक वृक्षके नीचे फलकी भिक्षा माँगूँगा। सिर मुँड़ाकर मौनी संन्यासी हो इन वानप्रस्थियोंके आश्रमोंमें विचरूँगा। उस समय मेरा शरीर धूलसे भरा होगा और निर्जन एकान्त स्थानमें मेरा निवास होगा ॥ ७-८ ॥
वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः ।
न शोचन् न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ ९ ॥
अथवा वृक्षोंका तल ही मेरा निवासगृह होगा। मैं प्रिय एवं अप्रिय सब प्रकारकी वस्तुओंको त्याग दूँगा। न मुझे किसीके वियोगका शोक होगा और न किसीकी प्राप्ति या संयोगसे हर्ष ही होगा। निन्दा और स्तुति दोनों मेरे लिये समान होंगी ॥ ९ ॥
निराशीर्निर्नमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ।
न चाप्यवहसन् कच्चिन्न कुर्वन् भ्रुकुटीं क्वचित् ॥ १० ॥
न मुझे आशीर्वादकी इच्छा होगी न नमस्कारकी। मैं सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे रहित और संग्रह-परिग्रहसे दूर रहूँगा। न तो किसीकी हँसी उड़ाऊँगा और न क्रोधसे किसीपर भौंहें टेढ़ी करूँगा ॥ १० ॥
प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः ।
जङ्गमाजङ्गमं सर्वमविहिंसंश्चतुर्विधम् ॥ ११ ॥
मेरे मुखपर प्रसन्नता छायी रहेगी तथा सदा सब भूतोंके हितसाधनमें संलग्न रहूँगा। (स्वेदज, उद्भिज्ज, अण्डज, जरायुज—) चार प्रकारके जो चराचर प्राणी हैं, उनमेंसे किसीकी भी मैं हिंसा नहीं करूँगा ॥ ११ ॥
स्वासु प्रजास्विव सदा समः प्राणभृतां प्रति ।
एककालं चरन् भैक्ष्यं कुलानि दश पञ्च वा ॥ १२ ॥
जैसे पिता अपनी अनेक संतानोंमें सर्वदा समभाव रखता है, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंके प्रति मेरा सदा समानभाव होगा। (पहले कहे अनुसार) मैं केवल एक समय वृक्षोंसे भिक्षा माँगूँगा अथवा यह सम्भव न हुआ तो दस-पाँच घरोंमें घूमकर (थोड़ी-थोड़ी) भिक्षा ले लूँगा ।। १२ ।।
असम्भवे वा भैक्ष्यस्य चरन्नशनान्यपि । अल्पमल्पं च भुञ्जानः पूर्वालाभे न जातुचित् ।। १३ ।। अन्यान्यपि चरँल्लोभादलाभे सप्त पूरयन् । अलाभे यदि वा लाभे समदर्शी महातपाः ।। १४ ।।
अथवा यदि भिक्षा मिलनी असम्भव हो जाय, तो कई दिनतक उपवास ही करता चलूँगा। (भिक्षा मिल जानेपर भी) भोजन थोड़ा-थोड़ा ही करूँगा। ऊपर बताये हुए एक प्रकारसे भिक्षा न मिलनेपर ही दूसरे प्रकारका आश्रय लूँगा। ऐसा तो कभी न होगा कि लोभवश दूसरे-दूसरे बहुत-से घरोंमें जाकर भिक्षा लूँ। यदि कहीं कुछ न मिला तो भिक्षाकी पूर्तिके लिये सात घरोंपर फेरी लगा लूँगा। यदि मिला तो और न मिला तो, दोनों ही दशाओंमें समान दृष्टि रखते हुए भारी तपस्यामें लगा रहूँगा ।। १३-१४ ।।
वास्यैकं तक्षतो बाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः । नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः ।। १५ ।। न जिजीविषुवत् किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन् । जीवितं मरणं चैव नाभिनन्दन् न च द्विषन् ।। १६ ।।
एक आदमी बसूलेसे मेरी एक बाँह काटता हो और दूसरा मेरी दूसरी बाँहपर चन्दन छिड़कता हो तो उन दोनोंमेंसे एकके अकल्याणका और दूसरेके कल्याणका चिन्तन नहीं करूँगा। जीने अथवा मरनेकी इच्छावाले मनुष्य जैसी चेष्टाएँ करते हैं, वैसी कोई चेष्टा मैं नहीं करूँगा। न जीवनका अभिनन्दन करूँगा, न मृत्युसे द्वेष ।। १५-१६ ।।
याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः । ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थिताः ।। १७ ।। तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः । सम्परित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णीक्तात्मकल्मषः ।। १८ ।।
जीवित पुरुषोंद्वारा अपने अभ्युदयके लिये जो-जो कर्म किये जा सकते हैं, उन समस्त सकाम कर्मोंको मैं त्याग दूँगा; क्योंकि वे सब कालसे सीमित हैं। अनित्य फल देनेवाली क्रियाओंके लिये जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंद्वारा चेष्टा की जाती है, उस चेष्टाको भी मैं सर्वथा त्याग दूँगा; धर्मके फलको भी छोड़ दूँगा। अपने अन्तःकरणके मलको सर्वथा धोकर शुद्ध हो जाऊँगा ।। १७-१८ ।।
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः । न वशे कस्यचित् तिष्ठन् सधर्मा मातरिश्वनः ।। १९ ।।
मैं सब पापोंसे सर्वथा मुक्त हो अविद्याजनित समस्त बन्धनोंको लाँघ जाऊँगा। किसीके वशमें न रहकर वायुके समान सर्वत्र विचरूँगा॥ १९॥
एतया सततं धृत्या चरन्नेवंप्रकारया।
देहं संस्थापयिष्यामि निर्भयं मार्गमास्थितः॥ २०॥
सदा इस प्रकारकी धृति (धारणा)-द्वारा उक्त रूपसे व्यवहार करता हुआ भयरहित मोक्षमार्गमें स्थित होकर इस देहका विसर्जन करूँगा॥ २०॥
नाहं सुकृपणे मार्ग स्ववीर्यक्षयशोचिते।
स्वधर्मात् सततापेते चरेयं वीर्यवर्जितः॥ २१॥
मैं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो गया हूँ। मेरा गृहस्थाश्रम संतानोत्पादन आदि धर्मसे सर्वथा शून्य है और मेरे लिये अपने वीर्यक्षयके कारण सर्वथा शोचनीय हो रहा है; अतः इस अत्यन्त दीनतापूर्ण मार्गपर अब मैं नहीं चल सकता॥ २१॥
सत्कृतोऽसत्कृतो वापि योऽन्यं कृपणचक्षुषा।
उपैति वृत्तिं कामात्मा स शुनां वर्तते पथि॥ २२॥
जो सत्कार या तिरस्कार पाकर दीनतापूर्ण दृष्टिसे देखता हुआ किसी दूसरे पुरुषके पास जीविकाकी आशासे जाता है, वह कामात्मा मनुष्य तो कुत्तोंके मार्गपर चलता है॥ २२॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो निःश्वासपरमो नृपः।
अवेक्षमाणः कुन्तीं च माद्रीं च समभाषत॥ २३॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यों कहकर राजा पाण्डु अत्यन्त दुःखसे आतुर हो लंबी साँस खींचते और कुन्ती-माद्रीकी ओर देखते हुए उन दोनोंसे इस प्रकार बोले—॥ २३॥
कौसल्या विदुरः क्षत्ता राजा च सह बन्धुभिः।
आर्या सत्यवती भीष्मस्ते च राजपुरोहिताः॥ २४॥
ब्राह्मणाश्च महात्मानः सोमपाः संशितव्रताः।
पौरवृद्धाश्च ये तत्र निवसन्त्यस्मदाश्रयाः।
प्रसाद्य सर्वे वक्तव्याः पाण्डुः प्रव्रजितो वनम्॥ २५॥
‘(देवियो! तुम दोनों हस्तिनापुरको लौट जाओ और) माता अम्बिका, अम्बालिका, भाई विदुर, संजय, बन्धुओंसहित राजा धृतराष्ट्र, दादी सत्यवती, चाचा भीष्मजी, राजपुरोहितगण, कठोरव्रतका पालन तथा सोमपान करनेवाले महात्मा ब्राह्मण तथा वृद्ध पुरवासीजन आदि जो लोग वहाँ हमलोगोंके आश्रित होकर निवास करते हैं, उन सबको प्रसन्न करके कहना, ‘राजा पाण्डु संन्यासी होकर वनमें चले गये’॥ २४-२५॥
निशम्य वचनं भर्तुर्वानवासे धृतात्मनः । तत्समं वचनं कुन्ती माद्री च समभाषताम् ॥ २६ ॥ वनवासके लिये दृढ़ निश्चय करनेवाले पतिदेवका यह वचन सुनकर कुन्ती और माद्रीने उनके योग्य बात कही— ॥ २६ ॥
अन्येऽपि ह्याश्रमाः सन्ति ये शक्या भरतर्षभ । आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्तुं तपो महत् ॥ २७ ॥ ‘भरतश्रेष्ठ! संन्यासके सिवा और भी तो आश्रम हैं, जिनमें आप हम धर्मपत्नियोंके साथ रहकर भारी तपस्या कर सकते हैं ॥ २७ ॥ शरीरस्यापि मोक्षाय स्वर्ग्यं प्राप्य महाफलम् । त्वमेव भविता भर्ता स्वर्गस्यापि न संशयः ॥ २८ ॥ ‘आपकी वह तपस्या स्वर्गदायक महान् फलकी प्राप्ति कराकर इस शरीरसे भी मुक्ति दिलानेमें समर्थ हो सकती है। इसमें संदेह नहीं कि उस तपके प्रभावसे आप ही स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र भी हो सकते हैं ॥ २८ ॥ प्रणिधायेन्द्रियग्रामं भर्तृलोकपरायणे । त्यक्तकामसुखे ह्यावां तप्स्यावो विपुलं तपः ॥ २९ ॥
‘हम दोनों कामसुखका परित्याग करके पतिलोककी प्राप्तिका ही परम लक्ष्य लेकर अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई भारी तपस्या करेंगी ॥ २९ ॥ यदि चावां महाप्राज्ञ त्यक्ष्यसि त्वं विशाम्पते । अद्यैवावां प्रहास्यावो जीवितं नात्र संशयः ॥ ३० ॥ ‘महाप्राज्ञ नरेश्वर! यदि आप हम दोनोंको त्याग देंगे तो आज ही हम अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगी, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ३० ॥
पाण्डुरुवाच यदि व्यवसितं ह्येतद् युवयोर्धर्मसंहितम् । स्ववृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् ॥ ३१ ॥ **पाण्डुने कहा—**देवियो! यदि तुम दोनोंका यही धर्मयुक्त निश्चय है तो (ठीक है, मैं संन्यास न लेकर वानप्रस्थाश्रममें ही रहूँगा तथा) आजसे अपने पिता वेदव्यासजीकी अक्षय फलवाली जीवनचर्याका अनुसरण करूँगा ॥ ३१ ॥ त्यक्त्वा ग्राम्यसुखाहारं तप्यमानो महत् तपः । वल्कली फलमूलाशी चरिष्यामि महावने ॥ ३२ ॥ भोगियोंके सुख और आहारका परित्याग करके भारी तपस्यामें लग जाऊँगा। वल्कल पहनकर फल-मूलका भोजन करते हुए महान् वनमें विचरूँगा ॥ ३२ ॥ अग्नौ जुह्वन्नुभौ कालावभौ कालावुपस्पृशन् । कृशः परिमिताहारश्चीरचर्मजटाधरः ॥ ३३ ॥ दोनों समय स्नान-संध्या और अग्निहोत्र करूँगा। चिथड़े, मृगचर्म और जटा धारण करूँगा। बहुत थोड़ा आहार ग्रहण करके शरीरसे दुर्बल हो जाऊँगा ॥ ३३ ॥ शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासाानवेक्षकः । तपसा दुश्चरेणेदं शरीरमुपशोषयन् ॥ ३४ ॥ एकान्तशीली विमृशन् पक्वापक्वेन वर्तयन् । पितॄन् देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन् ॥ ३५ ॥ सर्दी, गरमी और आँधीका वेग सहूँगा। भूख-प्यासकी परवा नहीं करूँगा तथा दुष्कर तपस्या करके इस शरीरको सुखा डालूँगा। एकान्तमें रहकर आत्म-चिन्तन करूँगा। कच्चे (कन्द-मूल आदि) और पके (फल आदि)-से जीवन-निर्वाह करूँगा। देवताओं और पितरोंको जंगली फल-मूल, जल तथा मन्त्रपाठ-द्वारा तृप्त करूँगा ॥ ३४-३५ ॥
शतशृंग पर्वतपर पाण्डुका तप
B. K. Mitra
शतशृंग पर्वतपर पाण्डुका तप
वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनाम् । नाप्रियाण्याचरिष्यामि किं पुनर्ग्रामवासिनाम् ॥ ३६ ॥ मैं वानप्रस्थ आश्रममें रहनेवालोंका तथा कुटुम्बी-जनोंका भी दर्शन और अप्रिय नहीं करूँगा; फिर ग्रामवासियोंकी तो बात ही क्या है? ॥ ३६ ॥
एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम् । काङ्क्षमाणोऽहमास्थास्ये देहस्यास्य समापनात् ॥ ३७ ॥ इस प्रकार मैं वानप्रस्थ-आश्रमसम्बन्धी शास्त्रोंकी कठोर-से-कठोर विधियोंके पालनकी आकांक्षा करता हुआ तबतक वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित रहूँगा जबतक कि शरीरका अन्त न हो जाय ॥ ३७ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्येवमुक्त्वा भार्ये ते राजा कौरवनन्दनः । ततश्चूडामणिं निष्कमङ्गदे कुण्डलानि च ॥ ३८ ॥ वासांसि च महार्हाणि स्त्रीणामाभरणानि च । प्रदाय सर्वं विप्रेभ्यः पाण्डुः पुनरभाषत ॥ ३९ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले राजा पाण्डुने अपनी दोनों पत्नियोंसे यों कहकर अपने सिरपेंच, निष्क (वक्षःस्थलके आभूषण), बाजूबंद, कुण्डल और बहुमूल्य वस्त्र तथा माद्री और कुन्तीके भी शरीरके गहने उतारकर सब ब्राह्मणोंको दे दिये। फिर सेवकोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ३८-३९ ॥
गत्वा नागपुरं वाच्यं पाण्डुः प्रव्रजितो वनम् । अर्थं कामं सुखं चैव रतिं च परमात्मिकाम् ॥ ४० ॥ प्रतस्थे सर्वमुत्सृज्य सभार्यः कुरुनन्दनः । ‘तुमलोग हस्तिनापुरमें जाकर कह देना कि कुरुनन्दन राजा पाण्डु अर्थ, काम, विषयसुख और स्त्रीविषयक रति आदि सब कुछ छोड़कर अपनी पत्नियोंके साथ वानप्रस्थ हो गये हैं’ ॥ ४० १/२ ॥
ततस्तस्यानुयातारस्ते चैव परिचारकाः ॥ ४१ ॥ श्रुत्वा भरतसिंहस्य विविधाः करुणा गिरः । भीममार्तस्वरं कृत्वा हाहेति परिचुक्रुशुः ॥ ४२ ॥ भरतसिंह पाण्डुकी यह करुणायुक्त चित्र-विचित्र वाणी सुनकर उनके अनुचर और सेवक सभी हाय-हाय करके भयंकर आर्तनाद करने लगे ॥ ४१-४२ ॥
उष्णमश्रु विमुञ्चन्तस्तं विहाय महीपतिम् । ययुर्नागपुरं तूर्णं सर्वमादाय तद् धनम् ॥ ४३ ॥
उस समय नेत्रोंसे गरम-गरम आँसुओंकी धारा बहाते हुए वे सेवक राजा पाण्डुको छोड़कर और बचा हुआ सारा धन लेकर तुरंत हस्तिनापुरको चले गये ॥ ४३ ॥ ते गत्वा नगरं राज्ञो यथावृत्तं महात्मनः । कथयाञ्चक्रिरे राजंस्तद् धनं विविधं ददुः ॥ ४४ ॥ उन्होंने हस्तिनापुरमें जाकर महात्मा राजा पाण्डुका सारा समाचार राजा धृतराष्ट्रसे ज्यों-का-त्यों कह सुनाया और वह नाना प्रकारका धन धृतराष्ट्रको ही सौंप दिया ॥ ४४ ॥ श्रुत्वा तेभ्यस्ततः सर्वं यथावृत्तं महावने । धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठः पाण्डुमेवान्वशोचत ॥ ४५ ॥ फिर उन सेवकोंसे उस महान् वनमें पाण्डुके साथ घटित हुई सारी घटनाओंको यथावत् सुनकर नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र सदा पाण्डुकी ही चिन्तामें दुःखी रहने लगे ॥ ४५ ॥ न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् । भ्रातृशोकसमाविष्टस्तमेवार्थं विचिन्तयन् ॥ ४६ ॥ शय्या, आसन और नाना प्रकारके भोगोंमें कभी उनकी रुचि नहीं होती थी। वे भाईके शोकमें मग्न हो सदा उन्हींकी बात सोचते रहते थे ॥ ४६ ॥ राजपुत्रस्तु कौरव्य पाण्डुर्मूलफलाशनः । जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम् ॥ ४७ ॥ जनमेजय! राजकुमार पाण्डु फल-मूलका आहार करते हुए अपनी दोनों पत्नियोंके साथ वहाँसे नागशत नामक पर्वतपर चले गये ॥ ४७ ॥ स चैत्ररथमासाद्य कालकूटमतीत्य च । हिमवन्तमतिक्रम्य प्रययौ गन्धमादनम् ॥ ४८ ॥ तत्पश्चात् चैत्ररथ नामक वनमें जाकर कालकूट और हिमालय पर्वतको लाँघते हुए वे गन्धमादनपर चले गये ॥ ४८ ॥ रक्ष्यमाणो महाभूतैः सिद्धैश्च परमर्षिभिः । उवास स महाराज समेषु विषमेषु च ॥ ४९ ॥ इन्द्रद्युम्नसरः प्राप्य हंसकूटमतीत्य च । शतशृङ्गे महाराज तापसः समतप्यत ॥ ५० ॥ महाराज! उस समय महाभूत, सिद्ध और महर्षिगण उनकी रक्षा करते थे। वे ऊँची- नीची जमीनपर सो लेते थे। इन्द्रद्युम्न सरोवरपर पहुँचकर तथा उसके बाद हंसकूटको लाँघते हुए वे शतशृंग पर्वतपर जा पहुँचे। जनमेजय! वहाँ वे तपस्वी-जीवन बिताते हुए भारी तपस्यामें संलग्न हो गये ॥ ४९-५० ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुचरितेऽष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥