महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उन्होंने कौरवोंको गदायुद्ध, खड्ग चलाने तथा तोमर, प्रास और शक्तियोंके प्रयोगकी कला एवं एक ही साथ अनेक शस्त्रोंके प्रयोग अथवा अकेले ही अनेक शत्रुओंसे युद्ध करनेकी शिक्षा दी ॥ २९ ॥
तस्य तत् कौशलं श्रुत्वा धनुर्वेदजिघृक्षवः ।
राजानो राजपुत्राश्च समाजग्मुः सहस्रशः ॥ ३० ॥
द्रोणाचार्यका वह अस्त्रकौशल सुनकर सहस्रों राजा और राजकुमार धनुर्वेदकी शिक्षा लेनेके लिये वहाँ एकत्रित हो गये ॥ ३० ॥
ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः ।
एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह ॥ ३१ ॥
महाराज! तदनन्तर निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र एकलव्य द्रोणके पास आया ॥ ३१ ॥
न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन् ।
शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया ॥ ३२ ॥
परंतु उसे निषादपुत्र समझकर धर्मज्ञ आचार्यने धनुर्विद्याविषयक शिष्य नहीं बनाया। कौरवोंकी ओर दृष्टि रखकर ही उन्होंने ऐसा किया ॥ ३२ ॥
स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परंतपः ।
अरण्यमनुसम्प्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम् ॥ ३३ ॥
तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा ।
इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः ॥ ३४ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले एकलव्यने द्रोणाचार्यके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और वनमें लौटकर उनकी मिट्टीकी मूर्ति बनायी तथा उसीमें आचार्यकी परमोच्च भावना रखकर उसने धनुर्विद्याका अभ्यास प्रारम्भ किया। वह बड़े नियमके साथ रहता था ॥ ३३-३४ ॥
परया श्रद्धयोपेतो योगेन परमेण च ।
विमोक्षादानसंधाने लघुत्वं परमाप सः ॥ ३५ ॥
आचार्यमें उत्तम श्रद्धा रखकर उत्तम और भारी अभ्यासके बलसे उसने बाणोंके छोड़ने, लौटाने और संधान करनेमें बड़ी अच्छी फुर्ती प्राप्त कर ली ॥ ३५ ॥
अथ द्रोणाभ्यनुज्ञाताः कदाचित् कुरुपाण्डवाः ।
रथैर्विनिर्ययुः सर्वे मृगयामरिर्मदन ॥ ३६ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! तदनन्तर एक दिन समस्त कौरव और पाण्डव आचार्य द्रोणकी अनुमतिसे रथोंपर बैठकर (हिंसक पशुओंका) शिकार खेलनेके लिये निकले ॥ ३६ ॥
तत्रोपकरणं गृह्य नरः कश्चिद् यदृच्छया ।
राजन्ननुजगामैकः श्वानमादाय पाण्डवान् ।। ३७ ।।
इस कार्यके लिये आवश्यक सामग्री लेकर कोई मनुष्य स्वेच्छानुसार अकेला ही उन पाण्डवोंके पीछे-पीछे चला। उसने साथमें एक कुत्ता भी ले रखा था ।। ३७ ।।
तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्मचिकीर्षया ।
श्वा चरन् स वने मूढो नैषादिं प्रति जग्मिवान् ।। ३८ ।।
वे सब अपना-अपना काम पूरा करनेकी इच्छासे वनमें इधर-उधर विचर रहे थे। उनका वह मूढ़ कुत्ता वनमें घूमता-घामता निषादपुत्र एकलव्यके पास जा पहुँचा ।। ३८ ।।
स कृष्णं मलदिग्धाङ्गं कृष्णाजिनजटाधरम् ।
नैषादिं श्वा समालक्ष्य भषंस्तस्थौ तदन्तिके ।। ३९ ।।
एकलव्यके शरीरका रंग काला था। उसके अंगोंमें मैल जम गया था और उसने काला मृगचर्म एवं जटा धारण कर रखी थी। निषादपुत्रको इस रूपमें देखकर वह कुत्ता भौं-भौं करके भूँकता हुआ उसके पास खड़ा हो गया ।। ३९ ।।
तदा तस्याथ भषतः शुनः सप्त शरान् मुखे ।
लाघवं दर्शयन्नस्त्रे मुमोच युगपद् यथा ।। ४० ।।
यह देख भीलने अपने अस्त्रलाघवका परिचय देते हुए उस भूँकनेवाले कुत्तेके मुखमें मानो एक ही साथ सात बाण मारे ।। ४० ।।
स तु श्वा शरपूर्णास्यः पाण्डवानाजगाम ह ।
तं दृष्ट्वा पाण्डवा वीराः परं विस्मयमागताः ।। ४१ ।।
उसका मुँह बाणोंसे भर गया और वह उसी अवस्थामें पाण्डवोंके पास आया। उसे देखकर पाण्डव वीर बड़े विस्मयमें पड़े ।। ४१ ।।
लाघवं शब्दवेधित्वं दृष्ट्वा तत् परमं तदा । प्रेक्ष्य तं व्रीडिताश्चासन् प्रशशंसुश्च सर्वशः ॥ ४२ ॥ वह हाथकी फुर्ती और शब्दके अनुसार लक्ष्य बेधनेकी उत्तम शक्ति देखकर उस समय सब राजकुमार उस कुत्तेकी ओर दृष्टि डालकर लज्जित हो गये और सब प्रकारसे बाण मारनेवालेकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४२ ॥ तं ततोऽन्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम् । ददृशुः पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान् ॥ ४३ ॥ राजन्! तत्पश्चात् पाण्डवोंने उस वनवासी वीरकी वनमें खोज करते हुए उसे निरन्तर बाण चलाते हुए देखा ॥ ४३ ॥ न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम् । अथैनं परिपप्रच्छुः को भवान् कस्य वेत्युत ॥ ४४ ॥ उस समय उसका रूप बदल गया था। पाण्डव उसे पहचान न सके; अतः पूछने लगे—‘तुम कौन हो, किसके पुत्र हो?’ ॥ ४४ ॥
एकलव्य उवाच
निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुषः सुतम् ।
द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम् ॥ ४५ ॥
एकलव्यने कहा— वीरो! आपलोग मुझे निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र तथा द्रोणाचार्यका शिष्य जानें। मैंने धनुर्वेदमें विशेष परिश्रम किया है ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
ते तमाज्ञाय तत्त्वेन पुनरागम्य पाण्डवाः ।
यथावृत्तं वने सर्वं द्रोणायाचख्युरद्भुतम् ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! वे पाण्डवलोग उस निषादका यथार्थ परिचय पाकर लौट आये और वनमें जो अद्भुत घटना घटी थी, वह सब उन्होंने द्रोणाचार्यसे कह सुनायी ॥ ४६ ॥
कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन् ।
रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
जनमेजय! कुन्तीनन्दन अर्जुन बार-बार एकलव्यका स्मरण करते हुए एकान्तमें द्रोणसे मिलकर प्रेमपूर्वक यों बोले ॥ ४७ ॥
अर्जुन उवाच
तदाहं परिरभ्यैकः प्रीतिपूर्वमिदं वचः ।
भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्विशिष्टो भविष्यति ॥ ४८ ॥
अर्जुनने कहा— आचार्य! उस दिन तो आपने मुझ अकेलेको हृदयसे लगाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ यह बात कही थी कि मेरा कोई भी शिष्य तुमसे बढ़कर नहीं होगा ॥ ४८ ॥
अथ कस्मान्मद्विशिष्टो लोकादपि च वीर्यवान् ।
अन्योऽस्ति भवतः शिष्यो निषादाधिपतेः सुतः ॥ ४९ ॥
फिर आपका यह अन्य शिष्य निषादराजका पुत्र अस्त्र-विद्यामें मुझसे बढ़कर कुशल और सम्पूर्ण लोकसे भी अधिक पराक्रमी कैसे हुआ? ॥ ४९ ॥
वैशम्पायन उवाच
मुहूर्तमिव तं द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्चयम् ।
सव्यसाचिनमादाय नैषादिं प्रति जग्मिवान् ॥ ५० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! आचार्य द्रोण उस निषादपुत्रके विषयमें दो घड़ीतक मानो कुछ सोचते-विचारते रहे; फिर कुछ निश्चय करके वे सव्यसाची अर्जुनको साथ ले उसके पास गये ॥ ५० ॥
ददर्श मलदिग्धाङ्गं जटिलं चीरवाससम् ।
एकलव्यं धनुष्पाणिमस्यन्तमनिशं शरान् ॥ ५१ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने एकलव्यको देखा, जो हाथमें धनुष ले निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहा था। उसके शरीरपर मैल जम गया था। उसने सिरपर जटा धारण कर रखी थी और वस्त्रके स्थानपर चिथड़े लपेट रखे थे ।। ५१ ।।
एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमायान्तमन्तिकात् ।
अभिगम्योपसंगृह्य जगाम शिरसा महीम् ॥ ५२ ॥
इधर एकलव्यने आचार्य द्रोणको समीप आते देख आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और उनके दोनों चरण पकड़कर पृथ्वीपर माथा टेक दिया ।। ५२ ।।
पूजयित्वा ततो द्रोणं विधिवत् स निषादजः ।
निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिग्रतः ॥ ५३ ॥
फिर उस निषादकुमारने अपनेको शिष्यरूपसे उनके चरणोंमें समर्पित करके गुरु द्रोणकी विधिपूर्वक पूजा की और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया ।। ५३ ।।
ततो द्रोणोऽब्रवीद् राजन्नेकलव्यमिदं वचः ।
यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम ॥ ५४ ॥
एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीयमाणोऽब्रवीदिदम् ।
राजन्! तब द्रोणाचार्यने एकलव्यसे यह बात कही—‘वीर! यदि तुम मेरे शिष्य हो तो मुझे गुरुदक्षिणा दो’।
यह सुनकर एकलव्य बहुत प्रसन्न हुआ और इस प्रकार बोला ।। ५४ १/२ ।।
एकलव्य उवाच
किं प्रयच्छामि भगवन्नाज्ञापयतु मां गुरुः ॥ ५५ ॥
न हि किंचिददेयं मे गुरवे ब्रह्मवित्तम ।
एकलव्यने कहा— भगवन्! मैं आपको क्या दूँ? स्वयं गुरुदेव ही मुझे इसके लिये आज्ञा दें। ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य! मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो गुरुके लिये अदेय हो ।। ५५ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
तमब्रवीत् त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति ॥ ५६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब द्रोणाचार्यने उससे कहा—‘तुम मुझे दाहिने हाथका अँगूठा दे दो’ ।। ५६ ।।
एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम् ।
प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन् सत्ये च नियतः सदा ॥ ५७ ॥
तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः ।
छित्त्वाविचार्य तं प्रादाद् द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः ॥ ५८ ॥
द्रोणाचार्यका यह दारुण वचन सुनकर सदा सत्यपर अटल रहनेवाले एकलव्यने अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए पहलेकी ही भाँति प्रसन्नमुख और उदारचित्त रहकर बिना कुछ सोच-विचार किये अपना दाहिना अँगूठा काटकर द्रोणाचार्यको दे दिया ।। ५७-५८ ।।
(स सत्यसंधं नैषादिं दृष्ट्वा प्रीतोऽब्रवीदिदम् । एवं कर्तव्यमिति वा एकलव्यमभाषत ।।) ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत । न तथा च स शीघ्रोऽभूद् यथा पूर्वं नराधिप ।। ५९ ।। द्रोणाचार्य निषादनन्दन एकलव्यको सत्यप्रतिज्ञ देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने संकेतसे उसे यह बता दिया कि तर्जनी और मध्यमाके संयोगसे बाण पकड़कर किस प्रकार धनुषकी डोरी खींचनी चाहिये। तबसे वह निषादकुमार अपनी अँगुलीयोंद्वारा ही बाणोंका संधान करने लगा। राजन्! उस अवस्थामें वह उतनी शीघ्रतासे बाण नहीं चला पाता था, जैसे पहले चलाया करता था ।। ५९ ।। ततोऽर्जुनः प्रीतमना बभूव विगतज्वरः । द्रोणश्च सत्यवागासीन्नान्योऽभिभवितार्जुनम् ।। ६० ।।
इस घटनासे अर्जुनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उनकी भारी चिन्ता दूर हो गयी। द्रोणाचार्यका भी वह कथन सत्य हो गया कि अर्जुनको दूसरा कोई पराजित नहीं कर सकता ॥ ६० ॥
द्रोणस्य तु तदा शिष्यौ गदायोग्यौ बभूवतुः ।
दुर्योधनश्च भीमश्च सदा संरब्धमानसौ ॥ ६१ ॥
उस समय द्रोणके दो शिष्य गदायुद्धमें सुयोग्य निकले—दुर्योधन और भीमसेन। ये दोनों सदा एक-दूसरेके प्रति मनमें क्रोध (स्पर्द्धा)-से भरे रहते थे ॥ ६१ ॥
अश्वत्थामा रहस्येषु सर्वेष्वभ्यधिकोऽभवत् ।
तथाति पुरुषानन्यान् त्सारुकौ यमजावुभौ ॥ ६२ ॥
अश्वत्थामा धनुर्वेदके रहस्योंकी जानकारीमें सबसे बढ़-चढ़कर हुआ। नकुल और सहदेव दोनों भाई तलवारकी मूठ पकड़कर युद्ध करनेमें अत्यन्त कुशल हुए। वे इस कलामें अन्य सब पुरुषोंसे बढ़-चढ़कर थे ॥ ६२ ॥
युधिष्ठिरो रथश्रेष्ठः सर्वत्र तु धनंजयः ।
प्रथितः सागरान्तायां रथयूथपयूथपः ॥ ६३ ॥
युधिष्ठिर रथपर बैठकर युद्ध करनेमें श्रेष्ठ थे। परंतु अर्जुन सब प्रकारकी युद्ध-कलाओंमें सबसे बढ़कर थे। वे समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीमें रथयूथपतियोंके भी यूथपतिके रूपमें प्रसिद्ध थे ॥ ६३ ॥
बुद्धियोगबलोत्साहैः सर्वास्त्रेषु च निष्ठितः ।
अस्त्रे गुर्वनुरागे च विशिष्टोऽभवदर्जुनः ॥ ६४ ॥
बुद्धि, मनकी एकाग्रता, बल और उत्साहके कारण वे सम्पूर्ण अस्त्र-विद्याओंमें प्रवीण हुए। अस्त्रोंके अभ्यास तथा गुरुके प्रति अनुरागमें भी अर्जुनका स्थान सबसे ऊँचा था ॥ ६४ ॥
तुल्येष्वस्त्रोपदेशेषु सौष्ठवेन च वीर्यवान् ।
एकः सर्वकुमाराणां बभूवातिरथोऽर्जुनः ॥ ६५ ॥
यद्यपि सबको समानरूपसे अस्त्र-विद्याका उपदेश प्राप्त होता था तो भी पराक्रमी अर्जुन अपनी विशिष्ट प्रतिभाके कारण अकेले ही समस्त कुमारोंमें अतिरथी हुए ॥ ६५ ॥
प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनंजयम् ।
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानो नामृष्यन्त परस्परम् ॥ ६६ ॥
धृतराष्ट्रके पुत्र बड़े दुरात्मा थे। वे भीमसेनको बलमें अधिक और अर्जुनको अस्त्रविद्यामें प्रवीण देखकर परस्पर सहन नहीं कर पाते थे ॥ ६६ ॥
तांस्तु सर्वान् समानीय सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान् ।
द्रोणः प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुषर्षभः ॥ ६७ ॥
जब सम्पूर्ण धनुर्विद्या तथा अस्त्र-संचालनकी कलामें वे सभी कुमार सुशिक्षित हो गये, तब नरश्रेष्ठ द्रोणने उन सबको एकत्र करके उनके अस्त्रज्ञानकी परीक्षा लेनेका विचार किया ॥ ६७ ॥
कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभिः कृतम् ।
अविज्ञातं कुमाराणां लक्ष्यभूतमुपादिशत् ॥ ६८ ॥
उन्होंने कारीगरोंसे एक नकली गीध बनवाकर वृक्षके अग्रभागपर रखवा दिया। राजकुमारोंको इसका पता नहीं था। आचार्यने उसी गीधको बींधनेयोग्य लक्ष्य बताया ॥ ६८ ॥
द्रोण उवाच
शीघ्रं भवन्तः सर्वेऽपि धनूंष्यादाय सर्वशः ।
भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठध्वं संहितेषवः ॥ ६९ ॥
द्रोण बोले— तुम सब लोग इस गीधको बींधनेके लिये शीघ्र ही धनुष लेकर उसपर बाण चढ़ाकर खड़े हो जाओ ॥ ६९ ॥
मद्वाक्यसमकालं तु शिरोऽस्य विनिपात्यताम् ।
एकैकशो नियोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रकाः ॥ ७० ॥
फिर मेरी आज्ञा मिलनेके साथ ही इसका सिर काट गिराओ। पुत्रो! मैं एक-एकको बारी-बारीसे इस कार्यमें नियुक्त करूँगा; तुमलोग मेरे बताये अनुसार कार्य करो ॥ ७० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरं पूर्वमुवाचाङ्गिरसां वरः ।
संधत्स्व बाणं दुर्धर्ष मद्वाक्यान्ते विमुञ्च तम् ॥ ७१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर अंगिरागोत्रवाले ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ आचार्य द्रोणने सबसे पहले युधिष्ठिरसे कहा—'दुर्धर्ष वीर! तुम धनुषपर बाण चढ़ाओ और मेरी आज्ञा मिलते ही उसे छोड़ दो' ॥ ७१ ॥
ततो युधिष्ठिरः पूर्वं धनुर्गृह्य परंतपः ।
तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ॥ ७२ ॥
तब शत्रुओंको संताप देनेवाले युधिष्ठिर गुरुकी आज्ञासे प्रेरित हो सबसे पहले धनुष लेकर गीधको बींधनेके लिये लक्ष्य बनाकर खड़े हो गये ॥ ७२ ॥
ततो विततधन्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम् ।
स मुहूर्तादुवाचेदं वचनं भरतर्षभ ॥ ७३ ॥
भरतश्रेष्ठ! तब धनुष तानकर खड़े हुए कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे दो घड़ी बाद आचार्य द्रोणने इस प्रकार कहा— ॥ ७३ ॥
पश्यैनं तं द्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज ।
पश्यामीत्येवमाचार्य प्रत्युवाच युधिष्ठिरः ॥ ७४ ॥
'राजकुमार! वृक्षकी शिखापर बैठे हुए इस गीधको देखो।' तब युधिष्ठिरने आचार्यको उत्तर दिया—'भगवन्! मैं देख रहा हूँ' ॥ ७४ ॥
स मुहूर्तादिव पुनर्द्रोणस्तं प्रत्यभाषत ।
मानो दो घड़ी और बिताकर द्रोणाचार्य फिर उनसे बोले ॥ ७४ १/२ ॥
द्रोण उवाच
अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातॄन् वापि प्रपश्यसि ॥ ७५ ॥
द्रोणने कहा—क्या तुम इस वृक्षको, मुझको अथवा अपने भाइयोंको भी देखते हो? ॥ ७५ ॥
तमुवाच स कौन्तेयः पश्याम्येनं वनस्पतिम् ।
भवन्तं च तथा भ्रातॄन् भासं चेति पुनः पुनः ॥ ७६ ॥
यह सुनकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर उनसे इस प्रकार बोले—'हाँ, मैं इस वृक्षको, आपको, अपने भाइयोंको तथा गीधको भी बारंबार देख रहा हूँ' ॥ ७६ ॥
तमुवाचापसर्पेति द्रोणोऽप्रीतमना इव ।
नैतच्छक्यं त्वया वेद्धुं लक्ष्यमित्येव कुत्सयन् ॥ ७७ ॥
उनका उत्तर सुनकर द्रोणाचार्य मन-ही-मन अप्रसन्न-से हो गये और उन्हें झिड़कते हुए बोले, 'हट जाओ यहाँसे, तुम इस लक्ष्यको नहीं बींध सकते' ॥ ७७ ॥
ततो दुर्योधनादींस्तान् धार्तराष्ट्रान् महायशाः ।
तेनैव क्रमयोगेन जिज्ञासुः पर्यपृच्छत ॥ ७८ ॥
तदनन्तर महायशस्वी आचार्यने उसी क्रमसे दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंको भी उनकी परीक्षा लेनेके लिये बुलाया और उन सबसे उपर्युक्त बातें पूछीं ॥ ७८ ॥
अन्यांश्च शिष्यान् भीमादीन् राज्ञश्चैवान्यदेशजान् ।
तथा च सर्वे तत् सर्वं पश्याम इति कुत्सिताः ॥ ७९ ॥
उन्होंने भीम आदि अन्य शिष्यों तथा दूसरे देशके राजाओंसे भी, जो वहाँ शिक्षा पा रहे थे, वैसा ही प्रश्न किया। प्रश्नके उत्तरमें सभीने (युधिष्ठिरकी भाँति ही) कहा—'हम सब कुछ देख रहे हैं।' यह सुनकर आचार्यने उन सबको झिड़ककर हटा दिया ॥ ७९ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि
द्रोणशिष्यपरीक्षायामेकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें आचार्य द्रोणके द्वारा शिष्योंकी परीक्षासे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ८० श्लोक हैं।)
१३२-
द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोणका ग्राहसे छुटकारा और अर्जुनको ब्रह्मशिर नामक अस्त्रकी प्राप्ति
वैशम्पायन उवाच
ततो धनंजयं द्रोणः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
त्वयेदानीं प्रहर्तव्यमेतल्लक्ष्यं विलोक्यताम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर द्रोणाचार्यने अर्जुनसे मुसकराते हुए कहा—'अब तुम्हें इस लक्ष्यका वेध करना है। इसे अच्छी तरह देख लो' ।। १ ।।
मद्वाक्यसमकालं ते मोक्तव्योऽत्र भवेच्छरः ।
वितत्य कार्मुकं पुत्र तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ।। २ ।।
‘मेरी आज्ञा मिलनेके साथ ही तुम्हें इसपर बाण छोड़ना होगा। बेटा! धनुष तानकर खड़े हो जाओ और दो घड़ी मेरे आदेशकी प्रतीक्षा करो' ।। २ ।।
एवमुक्तः सव्यसाची मण्डलीकृतकार्मुकः ।
तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ।। ३ ।।
उनके ऐसा कहनेपर अर्जुनने धनुषको इस प्रकार खींचा कि वह मण्डलाकार (गोल) प्रतीत होने लगा। फिर वे गुरुकी आज्ञासे प्रेरित हो गीधकी ओर लक्ष्य करके खड़े हो गये ।। ३ ।।
मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत ।
पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि चार्जुन ॥ ४ ॥
मानो दो घड़ी बाद द्रोणाचार्यने उनसे भी उसी प्रकार प्रश्न किया—'अर्जुन! क्या तुम उस वृक्षपर बैठे हुए गीधको, वृक्षको और मुझे भी देखते हो?' ॥ ४ ॥
पश्याम्येकं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत ।
न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत ॥ ५ ॥
जनमेजय! यह प्रश्न सुनकर अर्जुनने द्रोणाचार्यसे कहा—'मैं केवल गीधको देखता हूँ। वृक्षको अथवा आपको नहीं देखता' ॥ ५ ॥
ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः ।
प्रत्यभाषत दुर्धर्षः पाण्डवानां महारथम् ॥ ६ ॥
इस उत्तरसे द्रोणका मन प्रसन्न हो गया। मानो दो घड़ी बाद दुर्धर्ष द्रोणाचार्यने पाण्डव-महारथी अर्जुनसे फिर पूछा— ॥ ६ ॥
भासं पश्यसि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः ।
शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥
'वत्स! यदि तुम इस गीधको देखते हो तो फिर बताओ, उसके अंग कैसे हैं?' अर्जुन बोले—'मैं गीधका मस्तकभर देख रहा हूँ, उसके सम्पूर्ण शरीरको नहीं' ॥ ७ ॥
अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः । मुञ्चस्वेत्यब्रवीत् पार्थं स मुमोचाविचारयन् ॥ ८ ॥ अर्जुनके यों कहनेपर द्रोणाचार्यके शरीरमें (हर्षातिरेकसे) रोमांच हो आया और वे अर्जुनसे बोले, 'चलाओ बाण'! अर्जुनने बिना सोचे-विचारे बाण छोड़ दिया ॥ ८ ॥
ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन च । शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः ॥ ९ ॥ फिर तो पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने चलाये हुए तीखे क्षुर नामक बाणसे वृक्षपर बैठे हुए उस गीधका मस्तक वेगपूर्वक काट गिराया ॥ ९ ॥
तस्मिन् कर्मणि संसिद्धे पर्यष्वजत पाण्डवम् । मेने च द्रुपदं संख्ये सानुबन्धं पराजितम् ॥ १० ॥ इस कार्यमें सफलता प्राप्त होनेपर आचार्यने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उन्हें यह विश्वास हो गया कि राजा द्रुपद युद्धमें अर्जुनद्वारा अपने भाई-बन्धुओंसहित अवश्य पराजित हो जायँगे ॥ १० ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः । जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर किसी समय आंगिरसवंशियोंमें उत्तम आचार्य द्रोण अपने शिष्योंके साथ गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये ॥ ११ ॥
अवगाढमथो द्रोणं सलिले सलिलेचरः । ग्राहो जग्राह बलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः ॥ १२ ॥ वहाँ जलमें गोता लगाते समय कालसे प्रेरित हो एक बलवान् जलजन्तु ग्राहने द्रोणाचार्यकी पिंडली पकड़ ली ॥ १२ ॥
स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान् सर्वानचोदयत् । ग्राहं हत्वा मोक्षयध्वं मामिति त्वरयन्निव ॥ १३ ॥ वे अपनेको छुड़ानेमें समर्थ होते हुए भी मानो हड़बड़ाये हुए अपने सभी शिष्योंसे बोले—'इस ग्राहको मारकर मुझे बचाओ' ॥ १३ ॥
तद्वाक्यसमकालं तु बीभत्सुर्निशितैः शरैः । अवार्यैः पञ्चभिर्ग्राहं मग्नमम्भस्यताडयत् ॥ १४ ॥ उनके इस आदेशके साथ ही बीभत्सु (अर्जुन)-ने पाँच अमोघ एवं तीखे बाणोंद्वारा पानीमें डूबे हुए उस ग्राहपर प्रहार किया ॥ १४ ॥
इतरे त्वथ सम्मूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे । तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् ॥ १५ ॥ विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत् तदा । स पार्थबाणैर्बहुधा खण्डशः परिकल्पितः ॥ १६ ॥
ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः ।
अथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् ।। १७ ।।
परंतु दूसरे राजकुमार हक्के-बक्के-से होकर अपने-अपने स्थानपर ही खड़े रह गये। अर्जुनको तत्काल कार्यमें तत्पर देख द्रोणाचार्यने उन्हें अपने सब शिष्योंसे बढ़कर माना और उस समय वे उनपर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुनके बाणोंसे ग्राहके टुकड़े-टुकड़े हो गये और वह महात्मा द्रोणकी पिंडली छोड़कर मर गया। तब द्रोणाचार्यने महारथी महात्मा अर्जुनसे कहा— ।। १५—१७ ।।
गृहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम् ।। १८ ।।
‘महाबाहो! यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र मैं तुम्हें प्रयोग और उपसंहारके साथ बता रहा हूँ। यह सब अस्त्रोंसे बढ़कर है तथा इसे धारण करना भी अत्यन्त कठिन है। तुम इसे ग्रहण करो’ ।। १८ ।।
न च ते मानुषेष्वेतत् प्रयोक्तव्यं कथंचन ।
जगद् विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ।। १९ ।।
‘मनुष्योंपर तुम्हें इस अस्त्रका प्रयोग किसी भी दशामें नहीं करना चाहिये। यदि किसी अल्प तेजवाले पुरुषपर इसे चलाया गया तो यह उसके साथ ही समस्त संसारको भस्म कर सकता है ।। १९ ।।
असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते ।
तद् धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम ।। २० ।।
‘तात! यह अस्त्र तीनों लोकोंमें असाधारण बताया गया है। तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर इस अस्त्रको धारण करो और मेरी यह बात सुनो ।। २० ।।
बाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन ।
तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे ।। २१ ।।
‘वीर! यदि कोई अमानव शत्रु तुम्हें युद्धमें पीड़ा देने लगे तो तुम उसका वध करनेके लिये इस अस्त्रका प्रयोग कर सकते हो’ ।। २१ ।।
तथेति सम्प्रतिश्रुत्य बीभत्सुः स कृताञ्जलिः ।
जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः ।
भविता त्वत्समो नान्यः पुमाँल्लोके धनुर्धरः ।। २२ ।।
तब अर्जुनने ‘तथास्तु’ कहकर वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्रको ग्रहण किया। उस समय गुरु द्रोणने अर्जुनसे पुनः यह बात कही—‘संसारमें दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान धनुर्धर न होगा’ ।। २२ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणग्राहमोक्षणे द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणाचार्यका ग्राहसे छुटकारा नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥
१३३-
त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
राजकुमारोंका रंगभूमिमें अस्त्र-कौशल दिखाना
वैशम्पायन उवाच
कृतास्त्रान् धार्तराष्ट्रांश्च पाण्डुपुत्रांश्च भारत ।
दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद् राजन् धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ १ ॥
कृपस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः ।
गाङ्गेयस्य च सांनिध्ये व्यासस्य विदुरस्य च ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! जब द्रोणने देखा कि धृतराष्ट्रके पुत्र तथा पाण्डव अस्त्र-विद्याकी शिक्षा समाप्त कर चुके, तब उन्होंने कृपाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान् बाह्लीक, गंगानन्दन भीष्म, महर्षि व्यास तथा विदुरजीके निकट राजा धृतराष्ट्रसे कहा— ॥ १-२ ॥
राजन् सम्प्राप्तविद्यास्ते कुमाराः कुरुसत्तम ।
ते दर्शयेयुः स्वां शिक्षां राजन्ननुमते तव ॥ ३ ॥
ततोऽब्रवीन्महाराजः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
‘राजन्! आपके कुमार अस्त्र-विद्याकी शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं। कुरुश्रेष्ठ! यदि आपकी अनुमति हो तो वे अपनी सीखी हुई अस्त्र-संचालनकी कलाका प्रदर्शन करें’।
यह सुनकर महाराज धृतराष्ट्र अत्यन्त प्रसन्नचित्तसे बोले ॥ ३ १/२ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
भारद्वाज महत् कर्म कृतं ते द्विजसत्तम ॥ ४ ॥
**धृतराष्ट्रने कहा—**द्विजश्रेष्ठ भरद्वाजनन्दन! आपने (राजकुमारोंको अस्त्रकी शिक्षा देकर) बहुत बड़ा कार्य किया है ॥ ४ ॥
यदानुमन्यसे कालं यस्मिन् देशे यथा यथा ।
तथा तथा विधानाय स्वयमाज्ञापयस्व माम् ॥ ५ ॥
आप कुमारोंकी अस्त्र-शिक्षाके प्रदर्शनके लिये जब जो समय ठीक समझें, जिस स्थानपर जिस-जिस प्रकारका प्रबन्ध आवश्यक मानें, उस-उस तरहकी तैयारी करनेके लिये स्वयं ही मुझे आज्ञा दें ॥ ५ ॥
स्पृहयाम्यद्य निर्वेदात् पुरुषाणां सचक्षुषाम् ।
अस्त्रहेतोः पराक्रान्तान् ये मे द्रक्ष्यन्ति पुत्रकान् ॥ ६ ॥
आज मैं नेत्रहीन होनेके कारण दुःखी होकर, जिनके पास आँखें हैं, उन मनुष्योंके सुख और सौभाग्यको पानेके लिये तरस रहा हूँ; क्योंकि वे अस्त्र-कौशलका प्रदर्शन करनेके लिये भाँति-भाँतिके पराक्रम करनेवाले मेरे पुत्रोंको देखेंगे ॥ ६ ॥
क्षत्तर्यद् गुरुराचार्यो ब्रवीति कुरु तत् तथा । न हीदृशं प्रियं मन्ये भविता धर्मवत्सल ॥ ७ ॥ (आचार्यसे इतना कहकर राजा धृतराष्ट्र विदुरसे बोले—) ‘धर्मवत्सल! विदुर! गुरु द्रोणाचार्य जो काम जैसे कहते हैं, उसी प्रकार उसे करो। मेरी रायमें इसके समान प्रिय कार्य दूसरा नहीं होगा' ॥ ७ ॥
ततो राजानमामन्त्र्य निर्गतो विदुरो बहिः । भारद्वाजो महाप्राज्ञो मापयामास मेदिनीम् ॥ ८ ॥ तदनन्तर राजाकी आज्ञा लेकर विदुरजी (आचार्य द्रोणके साथ) बाहर निकले। महाबुद्धिमान् भरद्वाजनन्दन द्रोणने रंगमण्डपके लिये एक भूमि पसंद की और उसका माप करवाया ॥ ८ ॥
समामवृक्षां निर्गुल्मामुदक्प्रस्रवणान्विताम् । तस्यां भूमौ बलिं चक्रे तिथौ नक्षत्रपूजिते ॥ ९ ॥ अवघुष्टे समाजे च तदर्थं वदतां वरः । रङ्गभूमौ सुविपुलं शास्त्रदृष्टं यथाविधि ॥ १० ॥ प्रेक्षागारं सुविहितं चक्रुस्ते तस्य शिल्पिनः । राज्ञः सर्वायुधोपेतं स्त्रीणां चैव नरर्षभ ॥ ११ ॥ मञ्चांश्च कारयामासुस्तत्र जानपदा जनाः । विपुलामुच्छ्रयोपेतान् शिबिकाश्च महाधनाः ॥ १२ ॥ वह भूमि समतल थी। उसमें वृक्ष या झाड़-झंखाड़ नहीं थे। वह उत्तरदिशाकी ओर नीची थी। वक्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणने वास्तुपूजन देखनेके लिये डिण्डिम-घोष कराके वीरसमुदायको आमन्त्रित किया और उत्तम नक्षत्रसे युक्त तिथिमें उस भूमिपर वास्तुपूजन किया। तत्पश्चात् उनके शिल्पियोंने उस रंगभूमिमें वास्तु-शास्त्रके अनुसार विधिपूर्वक एक अति विशाल प्रेक्षागृहकी* नींव डाली तथा राजा और राजघरानेकी स्त्रियोंके बैठनेके लिये वहाँ सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न बहुत सुन्दर भवन बनाया। जनपदके लोगोंने अपने बैठनेके लिये वहाँ ऊँचे और विशाल मंच बनवाये तथा (स्त्रियोंको लानेके लिये) बहुमूल्य शिबिकाएँ तैयार करायीं ॥ ९—१२ ॥
तस्मिंस्ततोऽहनि प्राप्ते राजा ससचिवस्तदा । भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा कृपं चाचार्यसत्तमम् ॥ १३ ॥ (बाह्लीकं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च । कुरूनन्यांश्च सचिवानादाय नगराद् बहिः ॥) मुक्ताजालपरिक्षिप्तं वैदूर्यमणिशोभितम् । शातकुम्भमयं दिव्यं प्रेक्षागारमुपागमत् ॥ १४ ॥
तत्पश्चात् जब निश्चित दिन आया, तब मन्त्रियोंसहित राजा धृतराष्ट्र भीष्मजी तथा आचार्यप्रवर कृपको आगे करके बाह्लीक, सोमदत्त, भूरिश्रवा तथा अन्यान्य कौरवों और मन्त्रियोंको साथ ले नगरसे बाहर उस दिव्य प्रेक्षागृहमें आये। उसमें मोतियोंकी झालरें लगी थीं, वैदूर्यमणियोंसे उस भवनको सजाया गया था तथा उसकी दीवारोंमें स्वर्णखण्ड मढ़े गये थे ।। १३-१४ ।।
गान्धारी च महाभागा कुन्ती च जयतां वर । स्त्रियश्च राज्ञः सर्वास्ताः सप्रेष्याः सपरिच्छदाः ।। १५ ।। हर्षादारुरुहुर्मञ्चान् मेरुं देवस्त्रियो यथा । ब्राह्मणक्षत्रियाद्यं च चातुर्वर्ण्यं पुराद् द्रुतम् ।। १६ ।। दर्शनेप्सु समभ्यागात् कुमाराणां कृतास्त्रताम् । क्षणेनैकस्थतां तत्र दर्शनेप्सु जगाम ह ।। १७ ।।
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! परम सौभाग्यशालिनी गान्धारी, कुन्ती तथा राजभवनकी सभी स्त्रियाँ वस्त्राभूषणोंसे सज-धजकर दास-दासियों और आवश्यक सामग्रियोंके साथ उस भवनमें आयीं तथा जैसे देवांगनाएँ मेरुपर्वतपर चढ़ती हैं, उसी प्रकार वे हर्षपूर्वक मंचोंपर चढ़ गयीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि चारों वर्णोंके लोग कुमारोंका अस्त्र-कौशल देखनेकी इच्छासे तुरंत नगरसे निकलकर आ गये। क्षणभरमें वहाँ विशाल जनसमुदाय एकत्र हो गया ।। १५-१७ ।।
प्रवादितैश्च वादित्रैर्जनकौतूहलेन च । महार्णव इव क्षुब्धः समाजः सोऽभवत् तदा ।। १८ ।।
अनेक प्रकारके बाजोंके बजनेसे तथा मनुष्योंके बढ़ते हुए कौतूहलसे वह जनसमूह उस समय क्षुब्ध महासागरके समान जान पड़ता था ।। १८ ।।
ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लयज्ञोपवीतवान् । शुक्लकेशः सितश्मश्रुः शुक्लमाल्यानुलेपनः ।। १९ ।। रंगमध्यं तदाऽऽचार्यः सपुत्रः प्रविवेश ह । नभो जलधरैर्हीनं साङ्गारक इवांशुमान् ।। २० ।।
तदनन्तर श्वेत वस्त्र और श्वेत यज्ञोपवीत धारण किये आचार्य द्रोणने अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ रंगभूमिमें प्रवेश किया; मानो मेघरहित आकाशमें चन्द्रमाने मंगलके साथ पदार्पण किया हो। आचार्यके सिर और दाढ़ी-मूँछके बाल सफेद हो गये थे। वे श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत चन्दनसे सुशोभित हो रहे थे ।। १९-२० ।।
स यथासमयं चक्रे बलिं बलवतां वरः । ब्राह्मणांस्तु सुमन्त्रज्ञान् कारयामास मङ्गलम् ।। २१ ।।
बलवानोंमें श्रेष्ठ द्रोणने यथासमय देवपूजा की और श्रेष्ठ मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंसे मंगलपाठ करवाया ।। २१ ।।
(सुवर्णमणिरत्नानि वस्त्राणि विविधानि च । प्रददौ दक्षिणां राजा द्रोणस्य च कृपस्य च ॥) सुखपुण्यार्हघोषस्य पुण्यस्य समनन्तरम् । विविशुर्विविधं गृह्य शस्त्रोपकरणं नराः ॥ २२ ॥ उस समय राजा धृतराष्ट्रने सुवर्ण, मणि, रत्न तथा नाना प्रकारके वस्त्र आचार्य द्रोण और कृपको दक्षिणारूपमें दिये। फिर सुखमय पुण्याहवाचन तथा दान-होम आदि पुण्यकर्मोंके अनन्तर नाना प्रकारकी शस्त्र-सामग्री लेकर बहुत-से मनुष्योंने उस रंगमण्डपमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥
ततो बद्धाङ्गुलित्राणा बद्धकक्षा महारथाः । बद्धतूणाः सधनुषो विविशुर्भरतर्षभाः ॥ २३ ॥ उसके बाद भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ वे वीर राजकुमार बड़े-बड़े रथोंके साथ दस्ताने पहने, कमर कसे, पीठपर तूणीर बाँधे और धनुष लिये हुए उस रंगमण्डपके भीतर आये ॥ २३ ॥
अनुज्येष्ठं तु ते तत्र युधिष्ठिरपुरोगमाः । (रणमध्ये स्थितं द्रोणमभिवाद्य नरर्षभाः । पूजां चक्रुर्यथान्यायं द्रोणस्य च कृपस्य च ॥ नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि उन राजकुमारोंने जेठे-छोटेके क्रमसे स्थित हो उस रंगभूमिके मध्यभागमें बैठे हुए आचार्य द्रोणको प्रणाम करके द्रोण और कृप दोनों आचार्योंकी यथोचित पूजा की।
आशीर्भिश्च प्रयुक्ताभिः सर्वे संहृष्टमानसाः । अभिवाद्य पुनः शस्त्रान् बलिपुष्पैः समन्वितान् ॥ रक्तचन्दनसम्मिश्रैः स्वयमर्चन्त कौरवाः । रक्तचन्दनदिग्धाश्च रक्तमाल्यानुधारिणः ॥ सर्वे रक्तपताकाश्च सर्वे रक्तान्तलोचनाः । द्रोणेन समनुज्ञाता गृह्य शस्त्रं परंतपाः ॥ धनूंषि पूर्वं संगृह्य तप्तकाञ्चनभूषिताः । सज्यानि विविधाकारैः शरैः संधाय कौरवाः ॥ ज्याघोषं तलघोषं च कृत्वा भूतान्यपूजयन् ।) चक्रुरस्त्रं महावीर्याः कुमाराः परमाद्भुतम् ॥ २४ ॥ फिर उनसे आशीर्वाद पाकर उन सबका मन प्रसन्न हो गया। तत्पश्चात् पूजाके पुष्पोंसे आच्छादित अस्त्र-शस्त्रोंको प्रणाम करके कौरवोंने रक्त चन्दन और फूलोंद्वारा पुनः स्वयं उनका पूजन किया। वे सब-के-सब लाल चन्दनसे चर्चित तथा लाल रंगकी मालाओंसे विभूषित थे। सबके रथोंपर लाल रंगकी पताकाएँ थीं। सभीके नेत्रोंके कोने लाल रंगके थे। तदनन्तर तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित एवं शत्रुओंको संताप देनेवाले कौरव
राजकुमारोंने आचार्य द्रोणकी आज्ञा पाकर पहले अपने अस्त्र एवं धनुष लेकर डोरी चढ़ायी और उसपर भाँति-भाँतिकी आकृतिके बाणोंका संधान करके प्रत्यंचाका टंकार करते और ताल ठोंकते हुए समस्त प्राणियोंका आदर किया। तत्पश्चात् वे महापराक्रमी राजकुमार वहाँ परम अद्भुत अस्त्र-कौशल प्रकट करने लगे ॥ २४ ॥
केचिच्छराक्षेपभयाच्छिरांस्यवननामिरे । मनुजा धृष्टमपरे वीक्षाञ्चक्रुः सुविस्मिताः ॥ २५ ॥ कितने ही मनुष्य बाण लग जानेके डरसे अपना मस्तक झुका देते थे। दूसरे लोग अत्यन्त विस्मित होकर बिना किसी भयके सब कुछ देखते थे ॥ २५ ॥
ते स्म लक्ष्याणि बिभिदुर्बाणैर्नामाङ्कशोभितैः । विविधैर्लाघवोत्सृष्टैरुह्यन्तो वाजिभिर्द्रुतम् ॥ २६ ॥ वे राजकुमार घोड़ोंपर सवार हो अपने नामके अक्षरोंसे सुशोभित और बड़ी फुर्तीके साथ छोड़े हुए नाना प्रकारके बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक लक्ष्यवेध करने लगे ॥ २६ ॥
तत् कुमारबलं तत्र गृहीतशरकार्मुकम् । गन्धर्वनगराकारं प्रेक्ष्य ते विस्मिताभवन् ॥ २७ ॥ धनुष-बाण लिये हुए राजकुमारोंके उस समुदायको गन्धर्वनगरके समान अद्भुत देख वहाँ समस्त दर्शक आश्चर्यचकित हो गये ॥ २७ ॥
सहसा चुक्रुशुश्चान्ये नराः शतसहस्रशः । विस्मयोत्फुल्लनयनाः साधु साध्विति भारत ॥ २८ ॥ जनमेजय! सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें एक-एक जगह बैठे हुए लोग आश्चर्यचकित नेत्रोंसे देखते हुए सहसा 'साधु-साधु (वाह-वाह)' कहकर कोलाहल मचा देते थे ॥ २८ ॥
कृत्वा धनुषि ते मार्गान् रथचर्यासु चासकृत् । गजपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च नियुद्धे च महाबलः ॥ २९ ॥ उन महाबली राजकुमारोंने पहले धनुष-बाणके पैंतरे दिखाये। तदनन्तर रथ-संचालनके विविध मार्गों (शीघ्र ले जाना, लौटा लाना, दायें, बायें और मण्डलाकार चलाना आदि)-का अवलोकन कराया। फिर कुश्ती लड़ने तथा हाथी और घोड़ेकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेकी चातुरीका परिचय दिया ॥ २९ ॥
गृहीतखड्गचर्माणस्ततो भूयः प्रहारिणः । त्सरुमार्गान् यथोद्दिष्टांश्चेरूः सर्वासु भूमिषु ॥ ३० ॥ इसके बाद वे ढाल और तलवार लेकर एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए खड्ग चलानेके शास्त्रोक्त मार्ग (ऊपर-नीचे और अगल-बगलमें घुमानेकी कला)-का प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने रथ, हाथी, घोड़े और भूमि—इन सभी भूमियोंपर यह युद्ध-कौशल दिखाया ॥ ३० ॥