महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
राजन्! जहाँ एक ओर इस प्रकार भयानक तथा अत्यन्त दारुण युद्ध चल रहा था, वहीं दूसरी ओर द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नमें भयंकर मुठभेड़ हो रही थी ।। ७२ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मार्जुनयुद्धे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्म और अर्जुनका युद्धविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५२ ।।
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७२ १/३ श्लोक हैं।]
अध्याय (पृष्ठ 1781)
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
धृष्टद्युम्न तथा द्रोणाचार्यका युद्ध
धृतराष्ट्र उवाच
कथं द्रोणो महेष्वासः पाञ्चाल्यश्चापि पार्षतः ।
उभौ समीयुतुर्यत्तौ तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! महाधनुर्धर द्रोणाचार्य तथा द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न—ये दोनों वीर किस प्रकार प्रयत्नपूर्वक आपसमें युद्ध कर रहे थे, वह सब वृत्तान्त मुझसे कहो ॥ १ ॥
दिष्टमेव परं मन्ये पौरुषादिति मे मतिः ।
यत्र शान्तनवो भीष्मो नातरद् युधि पाण्डवम् ॥ २ ॥
मैं तो पुरुषार्थसे अधिक प्रबल भाग्यको ही मानता हूँ और इसीपर विश्वास करता हूँ, जिसके अनुसार शान्तनुनन्दन भीष्म युद्धमें पाण्डुपुत्र अर्जुनसे पार न पा सके ॥ २ ॥
भीष्मो हि समरे क्रुद्धो हन्याल्लोकांश्चराचरान् ।
स कथं पाण्डवं युद्धे नातरत् संजयौजसा ॥ ३ ॥
संजय! भीष्म रणक्षेत्रमें कुपित हो जायँ तो वे चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण लोकोंको मार सकते हैं। फिर वे अपने पराक्रमद्वारा युद्धमें पाण्डुकुमार अर्जुनसे क्यों न पार पा सके? ॥ ३ ॥
संजय उवाच
शृणु राजन् स्थिरो भूत्वा युद्धमेतत् सुदारुणम् ।
न शक्याः पाण्डवा जेतुं देवैरपि सवासवैः ॥ ४ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! पाण्डवोंको तो इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी नहीं जीत सकते। अब आप इस अत्यन्त भयंकर युद्धका वृत्तान्त स्थिर होकर सुनिये ॥ ४ ॥
द्रोणस्तु निशितैर्बाणैर्धृष्टद्युम्नमविध्यत ।
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् ॥ ५ ॥
द्रोणाचार्यने अपने तीखे बाणोंसे धृष्टद्युम्नको घायल कर दिया और उनके सारथिको भल्लके द्वारा मारकर रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ॥ ५ ॥
तथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिः सायकोत्तमैः ।
पीडयामास संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नस्य मारिष ॥ ६ ॥
आर्य! क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्यने चार उत्तम सायकोंसे धृष्टद्युम्नके चारों घोड़ोंको भी बहुत पीड़ा दी ॥ ६ ॥
धृष्टद्युम्नस्ततो द्रोणं नवत्या निशितैः शरैः ।
विव्याध प्रहसन् वीरस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ७ ॥
तब धृष्टद्युम्नने हँसकर नब्बे पैने बाणोंसे द्रोणाचार्यको घायल कर दिया और कहा —'खड़े रहो, खड़े रहो' ॥ ७ ॥
ततः पुनरमेयात्मा भारद्वाजः प्रतापवान् ।
शरैः प्रच्छादयामास धृष्टद्युम्नममर्षणम् ॥ ८ ॥
तदनन्तर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न प्रतापी द्रोणाचार्यने पुनः अमर्षशील धृष्टद्युम्नको अपने बाणोंसे ढक दिया ॥ ८ ॥
आददे च शरं घोरं पार्षतान्तचिकीर्षया ।
शक्राशनिसमस्पर्शं कालदण्डमिवापरम् ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् धृष्टद्युम्नका अन्त कर डालनेकी इच्छासे द्वितीय कालदण्डके समान एक भयंकर बाण हाथमें लिया, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान कठोर था ॥ ९ ॥
हाहाकारो महानासीत् सर्वसैन्येषु भारत ।
तमिषुं संधितं दृष्ट्वा भारद्वाजेन संयुगे ॥ १० ॥
भरतनन्दन! युद्धमें द्रोणाचार्यके द्वारा उस बाणका संधान होता देख सम्पूर्ण पाण्डव-सेनामें महान् हाहाकार मच गया ॥ १० ॥
तत्राद्भुतमपश्याम धृष्टद्युम्नस्य पौरुषम् ।
यदेकः समरे वीरस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ ११ ॥
उस समय मैंने वहाँ धृष्टद्युम्नका अद्भुत पराक्रम देखा। वह वीर समरांगणमें अकेला ही पर्वतके समान अविचल भावसे खड़ा रहा ॥ ११ ॥
तं च दीप्तं शरं घोरमायान्तं मृत्युमात्मनः ।
चिच्छेद शरवृष्टिं च भारद्वाजे मुमोच ह ॥ १२ ॥
अपने लिये मृत्यु बनकर आते हुए उस भयंकर तेजस्वी बाणको देखकर धृष्टद्युम्नने तत्काल ही उसे काट गिराया और द्रोणाचार्यपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १२ ॥
तत उच्चुक्रुशुः सर्वे पञ्चालाः पाण्डवैः सह ।
धृष्टद्युम्नेन तत् कर्म कृतं दृष्ट्वा सुदुष्करम् ॥ १३ ॥
धृष्टद्युम्नके द्वारा किये हुए उस अत्यन्त दुष्कर कर्मको देखकर पाण्डवसहित समस्त पांचाल वीर हर्षसे कोलाहल कर उठे ॥ १३ ॥
ततः शक्तिं महावेगां स्वर्णवैदूर्यभूषिताम् ।
द्रोणस्य निधनाकाङ्क्षी चिक्षेप स पराक्रमी ॥ १४ ॥
तदनन्तर द्रोणाचार्यकी मृत्यु चाहनेवाले पराक्रमी वीर धृष्टद्युम्नने उनके ऊपर सुवर्ण और वैदूर्यमणिसे भूषित अत्यन्त वेगशालिनी शक्ति चलायी ॥ १४ ॥
तामापतन्तीं सहसा शक्तिं कनकभूषिताम् ।
त्रिधा चिच्छेद समरे भारद्वाजो हसन्निव ॥ १५ ॥
उस सुवर्णभूषित शक्तिको सहसा आती देख द्रोणाचार्यने समरभूमिमें हँसते-हँसते उसके तीन टुकड़े कर दिये ॥ १५ ॥
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ।
ववर्ष शरवर्षाणि द्रोणं प्रति जनेश्वर ॥ १६ ॥
जनेश्वर! अपनी शक्तिको नष्ट हुई देख प्रतापी धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यपर पुनः बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १६ ॥
शरवर्षं ततस्तत् तु संनिवार्य महायशाः ।
द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य मध्ये चिच्छेद कार्मुकम् ॥ १७ ॥
तब महायशस्वी द्रोणने उस बाण-वर्षाका निवारण करके द्रुपदपुत्रके धनुषको बीचसे ही काट डाला ॥ १७ ॥
सच्छिन्नधन्वा समरे गदां गुर्वीं महायशाः ।
द्रोणाय प्रेषयामास गिरिसारमयीं बली ॥ १८ ॥
धनुष कट जानेपर महायशस्वी बलवान् वीर धृष्टद्युम्नने समरभूमिमें द्रोणाचार्यपर लोहेकी बनी हुई एक भारी गदा चलायी ॥ १८ ॥
सा गदा वेगवन्मुक्ता प्रायाद् द्रोणजिघांसया ।
तत्राद्भुतमपश्याम भारद्वाजस्य विक्रमम् ॥ १९ ॥
द्रोणाचार्यके वधकी इच्छासे वेगपूर्वक छोड़ी हुई वह गदा बड़े जोरसे चली; परंतु वहाँ हमलोगोंने उस समय द्रोणाचार्यका अद्भुत पराक्रम देखा ॥ १९ ॥
लाघवाद् व्यंसयामास गदां हेमविभूषिताम् ।
व्यंसयित्वा गदां तां च प्रेषयामास पार्षतम् ॥ २० ॥
भल्लान् सुनिशितान् पीतान् रुक्मपुंखान् सुदारुणान् ।
ते तस्य कवचं भित्त्वा पपुः शोणितमाहवे ॥ २१ ॥
उन्होंने बड़ी फुर्तीसे उस स्वर्णभूषित गदाको व्यर्थ कर दिया। इस प्रकार उस गदाको निष्फल करके द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नपर सुवर्णमय पंखोंसे युक्त अत्यन्त तीक्ष्ण पानीदार और भयंकर ‘भल्ल’ नामक बाण चलाये। वे बाण धृष्टद्युम्नका कवच छेदकर रणक्षेत्रमें उनका रक्त पीने लगे ॥ २०-२१ ॥
अथान्यद् धनुरदाय धृष्टद्युम्नो महारथः ।
द्रोणं युधि पराक्रम्य शरैर्विव्याध पञ्चभिः ॥ २२ ॥
तब महारथी धृष्टद्युम्नने दूसरा धनुष लेकर युद्धमें पराक्रमपूर्वक पाँच बाण मारकर द्रोणाचार्यको क्षत-विक्षत कर दिया ॥ २२ ॥
रुधिराक्तौ ततस्तौ तु शुशुभाते नरर्षभौ ।
वसन्तसमये राजन् पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ २३ ॥
राजन्! उस समय वे दोनों नरश्रेष्ठ लहूलुहान होकर वसंत-ऋतुमें खिले हुए दो पलाश वृक्षोंकी भाँति अत्यन्त शोभा पाने लगे ॥ २३ ॥
अमर्षितस्ततो राजन् पराक्रम्य चमूमुखे । द्रोणो द्रुपदपुत्रस्य पुनश्चिच्छेद कार्मुकम् ॥ २४ ॥
राजन्! तब उस सेनाके अग्रभागमें खड़े हो अमर्षमें भरे हुए द्रोणाचार्यने पराक्रम प्रकट करते हुए पुनः धृष्टद्युम्नका धनुष काट दिया ॥ २४ ॥
अथैनं छिन्नधन्वानं शरैः संनतपर्वभिः । अभ्यवर्षदमेयात्मा वृष्ट्या मेघ इवाचलम् ॥ २५ ॥
तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न द्रोणाचार्यने जिसका धनुष कट गया था, उन धृष्टद्युम्नपर झुकी हुई गाँठवाले बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो मेघ किसी पर्वतपर जलकी बूँदें बरसा रहा हो ॥ २५ ॥
सारथिं चास्य भल्लेन रथनीडादपातयत् । अथास्य चतुरो वाहांश्चतुर्भिर्निशितैः शरैः ॥ २६ ॥ पातयामास समरे सिंहनादं ननाद च । ततोऽपरेण भल्लेन हस्ताच्चापमथाच्छिनत् ॥ २७ ॥
साथ ही उन्होंने भल्ल मारकर धृष्टद्युम्नके सारथिको रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया और चार तीखे बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको भी मार गिराया। फिर वे समरांगणमें जोर- जोरसे सिंहनाद करने लगे। इतना ही नहीं, उन्होंने दूसरा बाण मारकर उनके हाथमें स्थित दूसरे धनुषको भी काट डाला ॥ २६-२७ ॥
सच्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः । गदापाणिरवारोहत् ख्यापयन् पौरुषं महत् ॥ २८ ॥ तामस्य विशिखैस्तूर्णं पातयामास भारत । रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २९ ॥
इस प्रकार धनुष कट जाने और घोड़े तथा सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए धृष्टद्युम्न हाथमें गदा लेकर उतरने लगे। भारत! इतनेहीमें अपने महान् पौरुषका परिचय देते हुए द्रोणाचार्यने तुरंत ही बाण मारकर रथसे उतरते-उतरते ही उनकी गदाको भी गिरा दिया। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई ॥ २८-२९ ॥
ततः स विपुलं चर्म शतचन्द्रं च भानुमत् । खड्गं च विपुलं दिव्यं प्रगृह्य सुभुजो बली ॥ ३० ॥ अभिदुद्राव वेगेन द्रोणस्य वधकाङ्क्षया । आमिषार्थी यथा सिंहो वने मत्तमिव द्विपम् ॥ ३१ ॥
तब सुन्दर बाँहोंवाले बलवान् वीर धृष्टद्युम्नने चन्द्राकार सौ फुल्लियोंसे सुशोभित तेजस्वी और विस्तृत ढाल तथा दिव्य एवं विशाल खड्ग हाथमें लेकर द्रोणका वध करनेकी
इच्छासे उनके ऊपर वेगपूर्वक आक्रमण किया। ठीक उसी तरह, जैसे मांस चाहनेवाला सिंह वनमें किसी मतवाले हाथीपर धावा करता है ॥ ३०-३१ ॥ तत्राद्भुतमपश्याम भारद्वाजस्य पौरुषम् । लाघवं चास्त्रयोगं च बलं बाह्वोश्च भारत ॥ ३२ ॥ भारत! उस समय हमने वहाँ द्रोणाचार्यका अद्भुत हस्तलाघव, अस्त्र-प्रयोग, बाहुबल तथा पुरुषार्थ देखा ॥ ३२ ॥ यदेनं शरवर्षेण वारयामास पार्षतम् । न शशाक ततो गन्तुं बलवानपि संयुगे ॥ ३३ ॥ उन्होंने अपने बाणोंकी वर्षासे द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नको सहसा आगे बढ़नेसे रोक दिया। अतः वे बलवान् होनेपर भी युद्धमें द्रोणाचार्यके पासतक न पहुँच सके ॥ ३३ ॥ निवारितस्तु द्रोणेन धृष्टद्युम्नो महारथः । न्यवारयच्छरौघांस्तांश्चर्मणा कृतहस्तवत् ॥ ३४ ॥ द्रोणाचार्यसे रोके गये महारथी धृष्टद्युम्न सिद्धहस्त वीर पुरुषकी भाँति अपनी ढालसे ही उनके बाण-समूहोंका निवारण करने लगे ॥ ३४ ॥ ततो भीमो महाबाहुः सहसाभ्यपतद् बली । साहाय्यकारी समरे पार्षतस्य महात्मनः ॥ ३५ ॥ तब बलवान् वीर महाबाहु भीम सहसा समरमें महामना धृष्टद्युम्नकी सहायता करनेके लिये आ पहुँचे ॥ ३५ ॥ स द्रोणं निशितैर्बाणै राजन् विव्याध सप्तभिः । पार्षतं च रथं तूर्णं स्वकमारोहयत् तदा ॥ ३६ ॥ राजन्! उन्होंने सात पैने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको घायल कर दिया और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नको तुरंत ही अपने रथपर चढ़ा लिया ॥ ३६ ॥ ततो दुर्योधनो राजन् भानुमन्तमचोदयत् । सैन्येन महता युक्तं भारद्वाजस्य रक्षणे ॥ ३७ ॥ महाराज! तब दुर्योधनने विशाल सेनासे युक्त भानुमान्को द्रोणाचार्यकी रक्षाके कार्यमें नियुक्त किया ॥ ३७ ॥ ततः सा महती सेना कलिङ्गानां जनेश्वर । भीममभ्युद्ययौ तूर्णं तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ३८ ॥ जनेश्वर! उस समय आपके पुत्रकी आज्ञासे कलिंगदेशीय वीरोंकी वह विशाल सेना तुरंत ही भीमसेनके सम्मुख आ पहुँची ॥ ३८ ॥ पाञ्चाल्यमथ संत्यज्य द्रोणोऽपि रथिनां वरः । विराटद्रुपदौ वृद्धौ वारयामास संयुगे ॥ ३९ ॥
तब रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य भी धृष्टद्युम्नको छोड़कर युद्धस्थलमें विराट और द्रुपद इन दोनों वृद्ध नरेशोंको आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ ३९ ॥
धृष्टद्युम्नोऽपि समरे धर्मराजानमभ्ययात् । ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ ४० ॥ कलिङ्गानां च समरे भीमस्य च महात्मनः । जगतः प्रक्षयकरं घोररूपं भयावहम् ॥ ४१ ॥
इधर धृष्टद्युम्न भी उस समरांगणमें धर्मराज युधिष्ठिरके पास चले गये। तत्पश्चात् समरभूमिमें कलिंगदेशीय योद्धाओं और महामनस्वी भीमसेनका अत्यन्त भयंकर तथा रोमांचकारी युद्ध होने लगा। जो सम्पूर्ण जगत्का विनाश करनेवाला घोरस्वरूप एवं महान् भयदायक था ॥ ४०-४१ ॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि धृष्टद्युम्नद्रोणयुद्धे त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें धृष्टद्युम्न और द्रोणका युद्धविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1787)
चतुष्पञ्चशत्तमोऽध्यायः
भीमसेनका कलिंगों और निषादोंसे युद्ध, भीमसेनके द्वारा शक्रदेव, भानुमान् और केतुमान्का वध तथा उनके बहुत-से सैनिकोंका संहार
धृतराष्ट्र उवाच
तथा प्रतिसमादिष्टः कालिङ्गो वाहिनीपतिः ।
कथमद्भुतकर्मार्णं भीमसेनं महाबलम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! दुर्योधनकी वैसी आज्ञा पाकर सेनापति कलिंगराजने अद्भुत पराक्रमी महाबली भीमसेनके साथ किस प्रकार युद्ध किया? ॥ १ ॥
चरन्तं गदया वीरं दण्डहस्तमिवान्तकम् ।
योधयामास समरे कालिङ्गः सह सेनया ॥ २ ॥
वीरवर भीमसेन जब गदा हाथमें लेकर विचरते हैं, तब दण्डधारी यमराजके समान जान पड़ते हैं। उनके साथ समरांगणमें सेनासहित कलिंगराजने किस प्रकार युद्ध किया? ॥ २ ॥
संजय उवाच
पुत्रेण तव राजेन्द्र स तथोक्तो महाबलः ।
महत्या सेनया गुप्तः प्रायाद् भीमरथं प्रति ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**राजेन्द्र! आपके पुत्रका उपर्युक्त आदेश पाकर अपनी विशाल सेनासे सुरक्षित हो महाबली कलिंगराज भीमसेनके रथके पास गया ॥ ३ ॥
तामापतन्तीं महतीं कलिङ्गानां महाचमूम् ।
रथाश्वनागकलिलां प्रगृहीतमहायुधाम् ॥ ४ ॥
भीमसेनः कलिङ्गानामाच्छर्द भारत वाहिनीम् ।
केतुमन्तं च नैषादिमायान्तं सह चेदिभिः ॥ ५ ॥
भारत! रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंसे भरी हुई कलिंगोंकी उस विशाल वाहिनीको हाथोंमें बड़े-बड़े आयुध लिये आती देख चेदिदेशीय सैनिकोंके साथ भीमसेनने उसे बाणोंद्वारा पीड़ित करना आरम्भ किया। साथ ही युद्धके लिये आते हुए निषादराजपुत्र केतुमान्को भी चोट पहुँचायी ॥
ततः श्रुतायुः संक्रुद्धो राज्ञा केतुमता सह ।
आससाद रणे भीमं व्यूढानीकेषु चेदिषु ॥ ६ ॥
तब राजा केतुमान्के साथ क्रोधमें भरा हुआ श्रुतायु भी रणक्षेत्रमें भीमसेनके सामने आया। उस समय चेदि-देशीय सैनिकोंकी सेनाएँ व्यूहबद्ध होकर खड़ी थीं ॥ ६ ॥
रथैरनेकसाहस्रैः कलिङ्गानां नराधिप । अयुतेन गजानां च निषादैः सह केतुमान् ॥ ७ ॥ भीमसेनं रणे राजन् समन्तात् पर्यवारयत् । नरेश्वर! कलिंगोंके कई सहस्र रथ और दस हजार हाथियों एवं निषादोंके साथ केतुमान् उस रणस्थलमें भीमसेनको सब ओरसे रोकने लगा ॥ ७ १/२ ॥
चेदिमत्स्यकरूषाश्च भीमसेनपदानुगाः ॥ ८ ॥ अभ्यधावन्त समरे निषादान् सह राजभिः । ततः प्रवृत्ते युद्धं घोररूपं भयावहम् ॥ ९ ॥ तब भीमसेनके पदचिह्नोंपर चलनेवाले चेदि, मत्स्य तथा करूषदेशके क्षत्रियोंने समरभूमिमें निषादों एवं उनके राजाओंपर आक्रमण किया। फिर तो दोनों दलोंमें अत्यन्त घोर और भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ८-९ ॥
न प्राजानन्त योधाः स्वान् परस्परजिघांसया । घोरमासीत् ततो युद्धं भीमस्य सहसा परैः ॥ १० ॥ यथेन्द्रस्य महाराज महत्या दैत्यसेनया । महाराज! उस समय एक-दूसरोंको मार डालनेकी इच्छा रखकर सब योद्धा अपने और परायेकी पहचान नहीं कर पाते थे। शत्रुओंके साथ भीमसेनका वह युद्ध सहसा उसी प्रकार अत्यन्त भयंकर हो चला, जैसे विशाल दैत्य-सेनाके साथ देवराज इन्द्रका युद्ध हुआ करता है ॥ १० १/२ ॥
तस्य सैन्यस्य संग्रामे युध्यमानस्य भारत ॥ ११ ॥ बभूव सुमहान् शब्दः सागरस्येव गर्जतः । भरतनन्दन! संग्रामभूमिमें युद्ध करती हुई उस कलिंग-सेनाका महान् कोलाहल समुद्रकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ ११ १/२ ॥
अन्योन्यं स्म तदा योधा विकर्षन्तो विशाम्पते ॥ १२ ॥ महीं चक्रुश्चितां सर्वां शशलोहितसंनिभाम् । राजन्! उस समय सब योद्धाओंने छिन्न-भिन्न होकर परस्पर एक-दूसरेको खींचते हुए वहाँकी सारी भूमिको अपनी रक्तरंजित लाशोंसे पाट दिया। वह भूमि खरगोशके रक्तकी भाँति लाल दिखायी देने लगी ॥ १२ १/२ ॥
योधांश्च स्वान् परान् वापि नाभ्यजानञ्जिघांसया ॥ १३ ॥ स्वानप्याददते स्वांश्च शूराः परमदुर्जयाः ।
परम दुर्जय शूर सैनिक विपक्षीको मार डालनेकी अभिलाषा लेकर अपने और परायेको भी जान नहीं पाते थे। बहुधा अपने ही पक्षके सैनिक अपने ही योद्धाओंको मारनेके लिये पकड़ लेते थे ॥ १३ ½ ॥ विमर्दः सुमहानासीदल्पानां बहुभिः सह ॥ १४ ॥ कलिङ्गैः सह चेदीनां निषादैश्च विशाम्पते । राजन्! इस प्रकार वहाँ बहुसंख्यक कलिंगों और निषादोंके साथ अल्पसंख्यक चेदिदेशीय सैनिकोंका बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा ॥ १४ ½ ॥ कृत्वा पुरुषकारं तु यथाशक्ति महाबलाः ॥ १५ ॥ भीमसेनं परित्यज्य संन्यवर्तन्त चेदयः । महाबली चेदि सैनिक यथाशक्ति पुरुषार्थ प्रकट करके भीमसेनको छोड़कर भाग चले ॥ १५ ½ ॥ सर्वैः कलिङ्गैरासन्नः संनिवृत्तेषु चेदिषु ॥ १६ ॥ स्वबाहुबलमास्थाय न न्यवर्तत पाण्डवः । न चचाल रथोपस्थाद् भीमसेनो महाबलः ॥ १७ ॥ चेदिदेशीय सैनिकोंके पलायन कर जानेपर समस्त कलिंग भीमसेनके निकट जा पहुँचे; तो भी महाबली पाण्डुनन्दन भीमसेन अपने बाहुबलका भरोसा करके पीछे नहीं हटे और न रथकी बैठकसे तनिक भी विचलित हुए ॥ १६-१७ ॥ शितैर्वाकिरद् बाणैः कलिङ्गानां वरूथिनीम् । कालिङ्गस्तु महेष्वासः पुत्रश्चास्य महारथः ॥ १८ ॥ शक्रदेव इति ख्यातो जघ्नतुः पाण्डवं शरैः । वे कलिंगोंकी सेनापर अपने तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे। महाधनुर्धर कलिंगराज और उसका महारथी पुत्र शक्रदेव दोनों मिलकर पाण्डुनन्दन भीमसेनपर बाणोंका प्रहार करने लगे ॥ १८ ½ ॥ ततो भीमो महाबाहुर्विधुन्वन् रुचिरं धनुः ॥ १९ ॥ योधयामास कालिङ्गं स्वबाहुबलमाश्रितः । तब महाबाहु भीमने अपने बाहुबलका आश्रय लेकर सुन्दर धनुषकी टंकार फैलाते हुए कलिंगराजसे युद्ध आरम्भ किया ॥ १९ ½ ॥ शक्रदेवस्तु समरे विसृजन् सायकान् बहून् ॥ २० ॥ अश्वाञ्जघान समरे भीमसेनस्य सायकैः । शक्रदेवने समरभूमिमें बहुत-से सायकोंकी वर्षा करते हुए उन सायकोंद्वारा भीमसेनके घोड़ोंको मार डाला ॥ २० ½ ॥ तं दृष्ट्वा विरथं तत्र भीमसेनमरिंदमम् ॥ २१ ॥ शक्रदेवोऽभिदुद्राव शरैरवकिरन् शितैः ।
शत्रुदमन भीमसेनको वहाँ रथहीन हुआ देख शक्रदेव तीखे बाणोंकी वर्षा करता हुआ उनकी ओर दौड़ा ॥ २१ १/२ ॥ भीमस्योपरि राजेन्द्र शक्रदेवो महाबलः ॥ २२ ॥ ववर्ष शरवर्षाणि तपान्ते जलदो यथा । राजेन्द्र! जैसे गर्मीके अन्तमें बादल पानीकी बूँदें बरसाता है, उसी प्रकार महाबली शक्रदेव भीमसेनके ऊपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा ॥ २२ १/२ ॥ हताश्वे तु रथे तिष्ठन् भीमसेनो महाबलः ॥ २३ ॥ शक्रदेवाय चिक्षेप सर्वशैक्यायसीं गदाम् । जिसके घोड़े मारे गये थे, उसी रथपर खड़े हुए महाबली भीमसेनने शक्रदेवको लक्ष्य करके सम्पूर्णतः लोहेके सारतत्त्वकी बनी हुई अपनी गदा चलायी ॥ २३ १/२ ॥ स तया निहतो राजन् कालिङ्गतनयो रथात् ॥ २४ ॥ सध्वजः सह सूतेन जगाम धरणीतलम् । राजन्! उस गदाकी चोट खाकर कलिंगराजकुमार प्राणशून्य हो अपने सारथि और ध्वजके साथ ही रथसे नीचे पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २४ १/२ ॥ हतमात्मसुतं दृष्ट्वा कलिङ्गानां जनाधिपः ॥ २५ ॥ रथैरनेकसाहस्रैर्भीमस्यावारयद् दिशः । अपने पुत्रको मारा गया देख कलिंगराजने कई हजार रथोंके द्वारा भीमसेनकी सम्पूर्ण दिशाओंको रोक लिया ॥ २५ १/२ ॥ ततो भीमो महावेगां त्यक्त्वा गुर्वीं महागदाम् ॥ २६ ॥ निस्त्रिंशमाददे घोरं चिकीर्षुः कर्म दारुणम् । चर्म चाप्रतिमं राजन्नार्षभं पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥ नक्षत्रैरर्धचन्द्रैश्च शातकुम्भमयैश्चितम् । नरश्रेष्ठ! तब भीमसेनने अत्यन्त वेगशालिनी एवं भारी और विशाल गदाको वहीं छोड़कर अत्यन्त भयंकर कर्म करनेकी इच्छासे तलवार खींच ली तथा ऋषभके चमड़ेकी बनी हुई अनुपम ढाल हाथमें ले ली। राजन्! उस ढालमें सुवर्णमय नक्षत्र और अर्धचन्द्रके आकारकी फूलियाँ जड़ी हुई थीं ॥ २६-२७ १/२ ॥ कालिङ्गस्तु ततः क्रुद्धो धनुर्ज्यामवमृज्य च ॥ २८ ॥ प्रगृह्य च शरं घोरमेकं सर्पविषोपमम् । प्राहिणोद् भीमसेनाय वधाकाङ्क्षी जनेश्वरः ॥ २९ ॥ इधर क्रोधमें भरे हुए कलिंगराजने धनुषकी प्रत्यंचाको रगड़कर सर्पके समान विषैला एक भयंकर बाण हाथमें लिया और भीमसेनके वधकी इच्छासे उनपर चलाया ॥ २८-२९ ॥ तमापतन्तं वेगेन प्रेरितं निशितं शरम् ।
भीमसेनो द्विधा राजंश्छिच्छेद विपुलासिना ।। ३० ।।
उदक्रोशच्च संहृष्टस्त्रासयानो वरूथिनीम् ।
राजन्! भीमसेनने अपने विशाल खड्गसे उसके वेगपूर्वक चलाये हुए तीखे बाणके दो टुकड़े कर दिये और कलिंगोंकी सेनाको भयभीत करते हुए हर्षमें भरकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया ।। ३० १/२ ।।
कालिङ्गोऽथ ततः क्रुद्धो भीमसेनाय संयुगे ।। ३१ ।।
तोमरान् प्राहिणोच्छीघ्रं चतुर्दश शिलाशितान् ।
तब कलिंगराजने रणक्षेत्रमें अत्यन्त कुपित हो भीमसेनपर तुरंत ही चौदह तोमरोंका प्रहार किया, जिन्हें सानपर चढ़ाकर तेज किया गया था ।। ३१ १/२ ।।
तानप्राप्तान् महाबाहुः खगतानेव पाण्डवः ।। ३२ ।।
चिच्छेद सहसा राजन्नसम्भ्रान्तो वरासिना ।
राजन्! वे तोमर अभी भीमसेनतक पहुँच ही नहीं पाये थे कि उन महाबाहु पाण्डुकुमारने बिना किसी घबराहटके अपनी अच्छी तलवारसे सहसा उन्हें आकाशमें ही काट डाला ।। ३२ १/२ ।।
निकृत्य तु रणे भीमस्तोमरान् वै चतुर्दश ।। ३३ ।।
भानुमन्तं ततो भीमः प्राद्रवत् पुरुषर्षभः ।
इस प्रकार पुरुषश्रेष्ठ भीमसेनने रणक्षेत्रमें उन चौदह तोमरोंको काटकर भानुमान्पर धावा किया ।। ३३ १/२ ।।
भानुमांस्तु ततो भीमं शरवर्षेण छादयन् ।। ३४ ।।
ननाद बलवन्नादं नादयानो नभस्तलम् ।
यह देख भानुमान्ने अपने बाणोंकी वर्षासे भीमसेनको आच्छादित करके आकाशको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ।। ३४ १/२ ।।
न च तं ममृषे भीमः सिंहनादं महाहवे ।। ३५ ।।
ततः शब्देन महता विननाद महास्वनः ।
तेन नादेन वित्रस्ता कलिङ्गानां वरूथिनी ।। ३६ ।।
भीमसेन उस महासमरमें भानुमान्की वह गर्जना न सह सके। उन्होंने और भी अधिक जोरसे सिंहके समान दहाड़ना आरम्भ किया। उनकी उस गर्जनासे कलिंगोंकी वह विशाल वाहिनी संत्रस्त हो उठी ।। ३५-३६ ।।
न भीमं समरे मेने मानुषं भरतर्षभ ।
ततो भीमो महाबाहुर्नर्दित्वा विपुलं स्वनम् ।। ३७ ।।
सासिवेगवदाप्लुत्य दन्ताभ्यां वारणोत्तमम् ।
आरुरोह ततो मध्यं नागराजस्य मारिष ।। ३८ ।।
भरतश्रेष्ठ! उस सेनाके सैनिकोंने भीनसेनको युद्धमें मनुष्य नहीं, कोई देवता समझा। आर्य! तदनन्तर महाबाहु भीमसेन जोर-जोरसे गर्जना करके हाथमें तलवार लिये वेगपूर्वक उछलकर गजराजके दाँतोंके सहारे उसके मस्तकपर चढ़ गये ॥ ३७-३८ ॥
ततो मुमोच कालिङ्गः शक्तिं तामकरोद् द्विधा ।
खड्गेन पृथुना मध्ये भानुमन्तमथाच्छिनत् ॥ ३९ ॥
इतनेहीमें कलिंगराजकुमारने उनके ऊपर शक्ति चलायी; किंतु भीमसेनने उसके दो टुकड़े कर दिये और अपने विशाल खड्गसे भानुमान्के शरीरको बीचसे काट डाला ॥ ३९ ॥
सोऽन्तर्रायुधिनं हत्वा राजपुत्रमरिंदमः ।
गुरुं भारसहं स्कन्धे नागस्यासिमपातयत् ॥ ४० ॥
इस प्रकार गजारूढ़ होकर युद्ध करनेवाले कलिंगराजकुमारको मारकर शत्रुदमन भीमसेनने भार सहनेमें समर्थ अपनी भारी तलवारको उस हाथीके कंधेपर भी दे मारा ॥ ४० ॥
छिन्नस्कन्धः स विनदन् पपात गजयूथपः ।
आरुग्णः सिन्धुवेगेन सानुमानिव पर्वतः ॥ ४१ ॥
कंधा कट जानेसे वह गजयूथपति चिग्घाड़ता हुआ समुद्रके वेगसे भग्न होकर गिरनेवाले शिखरयुक्त पर्वतके समान धराशायी हो गया ॥ ४१ ॥
ततस्तस्मादवप्लुत्य गजाद् भारत भारतः ।
खड्गपाणिरदीनात्मा तस्थौ भूमौ सुदंशितः ॥ ४२ ॥
भारत! फिर कवचधारी, खड्गपाणि, उदारचित्त, भरतवंशी भीमसेन उस हाथीसे सहसा कूदकर धरतीपर खड़े हो गये ॥ ४२ ॥
स चचार बहून् मार्गानभितः पातयन् गजान् । अग्निचक्रमिवाविद्धं सर्वतः प्रत्यदृश्यत ॥ ४३ ॥ फिर दोनों ओर घूम-घूमकर हाथियोंको गिराते हुए वे अनेक मार्गोंसे विचरण करने लगे। उस समय घूमते हुए अलातचक्रकी भाँति वे सब ओर दिखायी देते थे ॥ ४३ ॥
अश्ववृन्देषु नागेषु रथानीकेषु चाभिभूः । पदातीनां च संघेषु विनिघ्नन् शोणितोक्षितः ॥ ४४ ॥ शक्तिशाली भीमसेन घोड़ों, हाथियों, रथों और पैदलोंके समूहोंमें घुसकर सबका संहार करते हुए रक्तसे भीग गये ॥ ४४ ॥
श्येनवद् व्यचरद् भीमो रणेऽरिषु बलोत्कटः । छिन्दंस्तेषां शरीराणि शिरांसि च महाबलः ॥ ४५ ॥ प्रचण्डबलवाले महान् शक्तिशाली भीमसेन शत्रुओंके समूहमें घुसकर उनके शरीर और मस्तक काटते हुए बाज पक्षीकी तरह रणभूमिमें विचरने लगे ॥ ४५ ॥
खड्गेन शितधारेण संयुगे गजयोधिनाम् । पदातिरेकः संक्रुद्धः शत्रूणां भयवर्धनः ॥ ४६ ॥ सम्मोहयामास स तान् कालान्तकयमोपमः । उस रण-क्षेत्रमें गजारूढ़ होकर युद्ध करनेवाले योद्धाओंके मस्तकोंको अपनी तीखी धारवाली तलवारसे काटते हुए वे अकेले ही क्रोधमें भरकर पैदल विचरते और शत्रुओंके भयको बढ़ाते थे। उन्होंने प्रलयकालीन यमराजके समान भयंकर रूप धारण करके उन सबको भयसे मोहित कर दिया था ॥ ४६ १/२ ॥
मूढाश्च ते तमेवाजौ विनदन्तः समाद्रवन् ॥ ४७ ॥ सासिमुत्तमवेगेन विचरन्तं महारणे । वे मूढ़ सैनिक गर्जना करते हुए उन्हींके पास दौड़े चले आते (और मारे जाते) थे। भीमसेन हाथमें तलवार लिये उस महान् संग्राममें बड़े वेगसे विचरण करते थे ॥ ४७ १/२ ॥
निकृत्य रथिनां चाजौ रथेषांश्च युगानि च ॥ ४८ ॥ जघान रथिनश्चापि बलवान् रिपुमर्दनः । शत्रुओंका मर्दन करनेवाले बलवान् भीम युद्धमें रसारोहियोंके रथोंके ईषादण्ड और जूए काटकर उन रथियोंका भी संहार कर डालते थे ॥ ४८ १/२ ॥
भीमसेनश्चरन् मार्गान् सुबहून् प्रत्यदृश्यत ॥ ४९ ॥ भ्रान्तमाविद्धमुद्भ्रान्तमाप्लुतं प्रसृतं प्लुतम् । सम्पातं समुदीर्णं च दर्शयामास पाण्डवः ॥ ५० ॥ उस समय पाण्डुनन्दन भीमसेन अनेक मागोंपर विचरते हुए दिखायी देते थे। उन्होंने खड्गयुद्धके भ्रान्त, आविद्ध, उद्भ्रान्त, आप्लुत, प्रसृत, प्लुत, सम्पात तथा समुदीर्ण आदि
बहुत-से पैंतरे दिखाये*॥ ४९-५० ॥
केचिदग्रासिना छिन्नाः पाण्डवेन महात्मना ।
विनेदुर्भिन्नमर्माणो निपेतुश्च गतासवः ॥ ५१ ॥
पाण्डुनन्दन महामना भीमसेनके श्रेष्ठ खड्गकी चोटसे कितने ही हाथियोंके अंग छिन्न-भिन्न हो उनके मर्मस्थल विदीर्ण हो गये और वे चिग्घाड़ते हुए प्राणशून्य होकर धरतीपर गिर पड़े॥ ५१ ॥
छिन्नदन्ताग्रहस्ताश्च भिन्नकुम्भास्तथा परे ।
वियोधाः स्वान्यनीकानि जघ्नुर्भारत वारणाः ॥ ५२ ॥
निपेतुरुर्व्यां च तथा विनदन्तो महारवान् ।
भरतनन्दन! कुछ गजराजोंके दाँत और सूँड़के अग्रभाग कट गये, कुम्भस्थल फट गये और सवार मारे गये। उस अवस्थामें उन्होंने इधर-उधर भागकर अपनी ही सेनाओंको कुचल डाला और अन्तमें जोर-जोरसे चिग्घाड़ते हुए वे पृथ्वीपर गिरे और मर गये ॥ ५२ १/२ ॥
छिन्नांश्च तोमरान् राजन् महामात्रशिरांसि च ॥ ५३ ॥
परिस्तोमान् विचित्रांश्च कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः ।
ग्रैवेयाण्यथ शक्तीश्च पताकाः कणपांस्तथा ॥ ५४ ॥
तूणीरानथ यन्त्राणि विचित्राणि धनूंषि च ।
भिन्दिपालानि शुभ्राणि तोत्राणि चाङ्कुशैः सह ॥ ५५ ॥
घण्टाश्च विविधा राजन् हेमगर्भान् त्सरूनपि ।
पततः पातितांश्चैव पश्यामः सह सादिभिः ॥ ५६ ॥
राजन्! हमलोगोंने वहाँ देखा, बहुत-से तोमर और महावतोंके मस्तक कटकर गिरे हैं, हाथियोंकी पीठोंपर बिछी हुई विचित्र-विचित्र झूलें पड़ी हुई हैं। हाथियोंको कसनेके उपयोगमें आनेवाली स्वर्णभूषित चमकीली रस्सियाँ गिरी हुई हैं, हाथी और घोड़ोंके गलेके आभूषण, शक्ति, पताका, कणप (अस्त्रविशेष), तरकस, विचित्र यन्त्र, धनुष, चमकीले भिन्दिपाल, तोत्र, अंकुश, भाँति-भाँतिके घंटे तथा स्वर्णजटित खड्गमुष्टि—ये सब वस्तुएँ हाथीसवारों-सहित गिरी हुई हैं और गिरती जा रही हैं॥
छिन्नगात्रावरकरैर्निहतैश्चापि वारणैः ।
आसीद् भूमिः समास्तीर्णा पतितैर्भूधरैरिव ॥ ५७ ॥
कहीं कटे हुए हाथियोंके शरीरके ऊर्ध्वभाग पड़े थे, कहीं अधोभाग पड़े थे। कहीं कटी हुई सूँडें पड़ी थीं और कहीं मारे गये हाथियोंकी लोथें पड़ी थीं। उनसे आच्छादित हुई वह समरभूमि ढहे हुए पर्वतोंसे ढकी-सी जान पड़ती थी॥ ५७॥
विमृद्यैवं महानागान् ममर्दान्यान् महाबलः ।
अश्वारोहवरांश्चैव पातयामास संयुगे ॥ ५८ ॥
तद् घोरमभवद् युद्धं तस्य तेषां च भारत ।
भारत! इस प्रकार महाबली भीमसेनने कितने ही बड़े-बड़े गजराजोंको नष्ट करके दूसरे प्राणियोंका भी विनाश आरम्भ किया। उन्होंने युद्धस्थलमें बहुत-से प्रमुख अश्वारोहियोंको मार गिराया। इस प्रकार भीमसेन और कलिंग सैनिकोंका वह युद्ध अत्यन्त घोर रूप धारण करता गया ॥ ५८ १/२ ॥
खलीनान्यथ योक्त्राणि कक्ष्याश्च कनकोज्ज्वलाः ॥ ५९ ॥ परिस्तोमांश्च प्रासांश्च ऋष्ट्यश्च महाधनाः । कवचान्यथ चर्माणि चित्राण्यास्तरणानि च ॥ ६० ॥ तत्र तत्रापविद्धानि व्यदृश्यन्त महाहवे । उस महासमरमें घोड़ोंकी लगाम, जोत, सुवर्णमण्डित चमकीली रस्सियाँ, पीठपर कसी जानेवाली गद्दियाँ (जीन), प्रास, बहुमूल्य ऋष्टियाँ, कवच, ढाल तथा भाँति-भाँतिके विचित्र आस्तरण इधर-उधर बिखरे दिखायी देने लगे ॥ ५९-६० १/२ ॥
प्रासैैर्यन्त्रैर्विचित्रैश्च शस्त्रैश्च विमलैस्तथा ॥ ६१ ॥ स चक्रे वसुधां कीर्णां शबलैः कुसुमैरिव । भीमसेनने बहुत-से प्रासों, विचित्र यन्त्रों और चमकीले शस्त्रोंसे वहाँकी भूमिको पाट दिया, जिससे वह चितकबरे पुष्पोंसे आच्छादित-सी प्रतीत होने लगी ॥ ६१ १/२ ॥
आप्लुत्य रथिनः कांश्चित् परामृश्य महाबलः ॥ ६२ ॥ पातयामास खड्गेन सध्वजानपि पाण्डवः । महाबली पाण्डुनन्दन भीम उछलकर कितने ही रथियोंके पास पहुँच जाते और उन्हें पकड़कर ध्वजोंसहित तलवारसे काट गिराते थे ॥ ६२ १/२ ॥
मुहुरुत्पततो दिक्षु धावतश्च यशस्विनः ॥ ६३ ॥ मार्गांश्च चरतश्चित्रं व्यस्मयन्त रणे जनाः । वे बार-बार उछलते, सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ते और युद्धके विचित्र पैंतरे दिखाते हुए रणभूमिमें विचरते थे। यशस्वी भीमसेनका यह पराक्रम देखकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य होता था ॥ ६३ १/२ ॥
स जघान पदा कांश्चिद् व्याक्षिप्यान्यानपोथयत् ॥ ६४ ॥ खड्गेनान्यांश्च चिच्छेद नादेनान्यांश्च भीषयन् । ऊरुवेगेन चाप्यन्यान् पातयामास भूतले ॥ ६५ ॥ उन्होंने कितने ही योद्धाओंको पैरोंसे कुचलकर मार डाला, कितनोंको ऊपर उछालकर पटक दिया, कितनोंको तलवारसे काट दिया, दूसरे कितने ही योद्धाओंको अपनी भीषण गर्जनासे डरा दिया और कितनों-को अपने महान् वेगसे पृथ्वीपर दे मारा ॥ ६४-६५ ॥
अपरे चैनमालोक्य भयात् पञ्चत्वमागताः । एवं सा बहुला सेना कलिङ्गानां तरस्विनाम् ॥ ६६ ॥ परिवार्य रणे भीष्मं भीमसेनमुपादद्रवत् ।
दूसरे बहुत-से योद्धा इन्हें देखते ही भयके मारे निष्प्राण हो गये। इस प्रकार मारी जानेपर भी वेगशाली कलिंग वीरोंकी उस विशाल वाहिनीने रणक्षेत्रमें भीष्मकी रक्षाके लिये उन्हें चारों ओरसे घेरकर पुनः भीमसेनपर धावा किया ।। ६६ १/२ ।। ततः कालिङ्गसैन्यानां प्रमुखे भरतर्षभ ।। ६७ ।। श्रुतायुषमभिप्रेक्ष्य भीमसेनः समभ्ययात् । भरतश्रेष्ठ! कलिंगसेनाके अग्रभागमें राजा श्रुतायुको देखकर भीमसेन उसका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ।। ६७ १/२ ।। तमायान्तमभिप्रेक्ष्य कालिङ्गो नवभिः शरैः ।। ६८ ।। भीमसेनममेयात्मा प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे । उन्हें आते देख अमेय आत्मबलसे सम्पन्न कलिंग-राज श्रुतायुने भीमसेनकी छातीमें नौ बाण मारे ।। ६८ १/२ ।। कालिङ्गबाणाभिहतस्तोत्रार्दित इव द्विपः ।। ६९ ।। भीमसेनः प्रजज्वाल क्रोधेनाग्निरिवैधितः । कलिंगराजके बाणोंसे आहत हो भीमसेन अंकुशकी मार खाये हुए हाथीके समान क्रोधसे जल उठे, मानो घीकी आहुति पाकर आग प्रज्वलित हो उठी हो ।। ६९ १/२ ।। अथाशोकः समादाय रथं हेमपरिष्कृतम् ।। ७० ।। भीमं सम्पादयामास रथेन रथसारथिः । इसी समय भीमसेनके सारथि अशोकने एक सुवर्णभूषित रथ लेकर उसे भीमके पास पहुँचाकर उन्हें भी रथसे सम्पन्न कर दिया ।। ७० १/२ ।। तमारुह्य रथं तूर्णं कौन्तेयः शत्रुसूदनः ।। ७१ ।। कालिङ्गमभिदुद्राव तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । शत्रुसूदन कुन्तीकुमार भीम तुरंत ही उस रथपर आरूढ़ हो कलिंगराजकी ओर दौड़े और बोले—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ७१ १/२ ।। ततः श्रुतायुर्बलवान् भीमाय निशितान् शरान् ।। ७२ ।। प्रेषयामास संक्रुद्धो दर्शयन् पाणिलाघवम् । तब बलवान् श्रुतायुने कुपित हो अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए बहुत-से पैने बाण भीमसेनपर चलाये ।। ७२ १/२ ।। स कार्मुकवरोत्सृष्टैर्नवभिर्निशितैः शरैः ।। ७३ ।। समाहतो महाराज कालिङ्गेन महात्मना । संचुक्रुशे भृशं भीमो दण्डाहत इवोरगः ।। ७४ ।। महाराज! महामना कलिंगराजके द्वारा श्रेष्ठ धनुषसे छोड़े हुए नौ तीखे बाणोंसे घायल हो भीमसेन डंडेकी चोट खाये हुए सर्पकी भाँति अत्यन्त कुपित हो उठे ।। ७३-७४ ।। क्रुद्धश्च चापमायम्य बलवद् बलिनां वरः ।
कालिङ्गमवधीत् पार्थो भीमः सप्तभिरायसैः ॥ ७५ ॥
बलवानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीपुत्र भीमने क्रुद्ध हो अपने सुदृढ़ धनुषको बलपूर्वक खींचकर लोहेके सात बाणोंद्वारा कलिंगराज श्रुतायुको घायल कर दिया ॥ ७५ ॥
क्षुराभ्यां चक्ररक्षौ च कालिङ्गस्य महाबलौ ।
सत्यदेवं च सत्यं च प्राहिणोद् यमसादनम् ॥ ७६ ॥
तत्पश्चात् दो क्षुर नामक बाणोंसे कलिंगराजके चक्ररक्षक महाबली सत्यदेव तथा सत्यको यमलोक पहुँचा दिया ॥ ७६ ॥
ततः पुनरमेयात्मा नाराचैर्निशितैस्त्रिभिः ।
केतुमन्तं रणे भीमोऽगमयद् यमसादनम् ॥ ७७ ॥
इसके बाद अमेय आत्मबलसे सम्पन्न भीमने तीन तीखे नाराचोंद्वारा रणक्षेत्रमें केतुमान्को मारकर उसे यमलोक भेज दिया ॥ ७७ ॥
ततः कलिङ्गाः संनद्धा भीमसेनममर्षणम् ।
अनीकैर्बहुसाहस्रैः क्षत्रियाः समवारयन् ॥ ७८ ॥
तब कलिंगदेशीय समस्त क्षत्रियोंने कई हजार सैनिकोंके साथ आकर युद्धके लिये उद्यत हो अमर्षशील भीमसेनको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ७८ ॥
ततः शक्तिगदाखड्गतोमरर्ष्टिपरश्वधैः ।
कलिङ्गाश्च ततो राजन् भीमसेनमवाकिरन् ॥ ७९ ॥
राजन्! उस समय कलिंग-योद्धा भीमसेनपर शक्ति, गदा, खड्ग, तोमर, ऋष्टि तथा फरसोंकी वर्षा करने लगे ॥ ७९ ॥
संनिवार्य स तां घोरां शरवृष्टिं समुत्थिताम् ।
गदामादाय तरसा संनिपत्य महाबलः ॥ ८० ॥
भीमः सप्त शतान् वीराननयद् यमसादनम् ।
पुनश्चैव द्विसाहस्रान् कलिङ्गानरिमर्दनः ॥ ८१ ॥
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय तदद्भुतमिवाभवत् ।
वहाँ होती हुई उस भयंकर बाण-वर्षाको रोककर महाबली भीमसेन हाथमें गदा ले बड़े वेगसे कलिंग-सेनामें कूद पड़े। उस सेनामें घुसकर शत्रुमर्दन भीमने पहले सात सौ वीरोंको यमलोक पहुँचाया। फिर दो हजार कलिंगोंको मृत्युके लोकमें भेज दिया। यह अद्भुत-सी घटना हुई ॥ ८०-८१ १/२ ॥
एवं स तान्यनीकानि कलिङ्गानां पुनः पुनः ॥ ८२ ॥
बिभेद समरे तूर्णं प्रेक्ष्य भीष्मं महारथम् ।
इस प्रकार भीमसेनने महारथी भीष्मकी ओर देखते हुए कलिंगोंकी सेनाको बार-बार समरभूमिमें शीघ्रतापूर्वक विदीर्ण किया ॥ ८२ १/२ ॥
हतारोहाश्च मातङ्गाः पाण्डवेन कृता रणे ॥ ८३ ॥
विप्रजग्मुरनीकेषु मेघा वातहता इव ।
मृद्नन्तः स्वान्यनीकानि विनदन्तः शरातुराः ॥ ८४ ॥
उस रणभूमिमें पाण्डुनन्दन भीमके द्वारा सवारोंके मार दिये जानेपर बहुत-से मतवाले हाथी वायुके थपेड़े खाये हुए बादलोंके समान कौरव-सेनामें इधर-उधर भागने तथा अपने ही सैनिकोंको कुचलते हुए बाणोंकी व्यथासे व्याकुल हो चीत्कार करने लगे ॥ ८३-८४ ॥
ततो भीमो महाबाहुः खड्गहस्तो महाभुजः ।
सम्प्रहृष्टो महाघोषं शङ्खं प्राध्मापयद् बली ॥ ८५ ॥
तदनन्तर महाबली महाबाहु भीमसेनने खड्ग हाथमें लिये हुए अत्यन्त प्रसन्न हो बड़े जोरसे शंख बजाया ॥ ८५ ॥
सर्वकालिङ्गसैन्यानां मनांसि समकम्पयत् ।
मोहश्चापि कलिङ्गानामाविवेश परंतप ॥ ८६ ॥
परंतप! उस शंखनादके द्वारा उन्होंने सम्पूर्ण कलिंगोंके हृदयमें कम्प मचा दिया और उन सबपर बड़ा भारी मोह छा गया ॥ ८६ ॥
प्राकम्पन्त च सैन्यानि वाहनानि च सर्वशः ।
भीमेन समरे राजन् गजेन्द्रेणेव सर्वशः ॥ ८७ ॥
मार्गान् बहून् विचरता धावता च ततस्ततः ।
मुहुरुत्पतता चैव सम्मोहः समजायत ॥ ८८ ॥
राजन्! उस समरांगणमें गजराजके समान अनेक मार्गोंपर विचरते और इधर-उधर दौड़ते हुए भीमसेनके भयसे समस्त सैनिक और वाहन थर-थर काँपने लगे। उनके बार-बार उछलनेसे सबपर मोह छा गया ॥ ८७-८८ ॥
भीमसेनभयत्रस्तं सैन्यं च समकम्पत ।
क्षोभ्यमाणमसम्बाधं ग्राहेणेव महत् सरः ॥ ८९ ॥
जैसे महान् तालाब किसी ग्राहके द्वारा मथित होनेपर क्षुब्ध हो उठता है, उसी प्रकार वह सारी सेना भीमसेनके द्वारा बेरोक-टोक मथित होनेपर भयसे संत्रस्त हो काँपने लगी ॥ ८९ ॥
त्रासितेषु च सर्वेषु भीमेनाद्भुतकर्मणा ।
पुनरावर्तमानेषु विद्रवत्सु च सङ्घशः ॥ ९० ॥
सर्वकालिङ्गयोधेषु पाण्डूनां ध्वजिनीपतिः ।
अब्रवीत् स्वान्यनीकानि युध्यध्वमिति पार्षतः ॥ ९१ ॥
अद्भुतकर्मा भीमसेनके द्वारा भयभीत कर दिये जानेपर कलिंग देशके समस्त योद्धा जब दल बनाकर भागने और भाग-भागकर पुनः लौटने लगे, तब पाण्डव-सेनापति द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने अपने समस्त सैनिकोंसे कहा—'वीरो! (उत्साहके साथ) युद्ध करो' ॥ ९०-९१ ॥
सेनापतिवचः श्रुत्वा शिखण्डिप्रमुखा गणाः । भीममेवाभ्यवर्तन्त रथानीकैः प्रहारिभिः ॥ ९२ ॥ सेनापतिकी बात सुनकर शिखण्डी आदि महारथी प्रहारकुशल रथियोंकी सेनाओंके साथ भीमसेनका ही अनुसरण करने लगे ॥ ९२ ॥
धर्मराजश्च तान् सर्वानुपजग्राह पाण्डवः । महता मेघवर्णेन नागानीकेन पृष्ठतः ॥ ९३ ॥ तत्पश्चात् पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर मेघोंकी घटाके समान हाथियोंकी विशाल सेना साथ लिये पीछेसे आकर उन सबकी सहायता करने लगे ॥ ९३ ॥
एवं संनोद्य सर्वाणि स्वान्यनीकानि पार्षतः । भीमसेनस्य जग्राह पाष्णिं सत्पुरुषैर्वृतः ॥ ९४ ॥ इस प्रकार द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नने अपनी सारी सेनाओंको युद्धके लिये प्रेरित करके श्रेष्ठ पुरुषोंके साथ भीमसेनके पृष्ठभागकी रक्षाका कार्य हाथमें लिया ॥ ९४ ॥
न हि पञ्चालराजस्य लोके कश्चन विद्यते । भीमसात्यकयोरन्यः प्राणेभ्यः प्रियकृत्तमः ॥ ९५ ॥ जगत्में पांचालराज धृष्टद्युम्नके लिये भीम और सात्यकिको छोड़कर दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं था, जो प्राणोंसे भी बढ़कर हो ॥ ९५ ॥
सोऽपश्यच्च कलिङ्गेषु चरन्तमरिसूदनः । भीमसेनं महाबाहुं पार्षतः परवीरहा ॥ ९६ ॥ शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले वैरिविनाशक द्रुपद-कुमार धृष्टद्युम्नने महाबाहु भीमसेनको कलिंगोंकी सेनामें विचरते देखा ॥ ९६ ॥
ननर्द बहुधा राजन् हृष्टश्चासीत् परंतपः । शङ्खं दध्मौ च समरे सिंहनादं ननाद च ॥ ९७ ॥ राजन्! उन्हें देखते ही परंतप धृष्टद्युम्नके हृदयमें हर्षकी सीमा न रही। वे बारंबार गर्जना करने लगे। उन्होंने समरांगणमें शंख बजाया और सिंहनाद किया ॥ ९७ ॥
स च पारावताश्वस्य रथे हेमपरिष्कृते । कोविदारध्वजं दृष्ट्वा भीमसेनः समाश्वसत् ॥ ९८ ॥ कबूतरके समान रंगवाले घोड़े जिनके रथमें जोते जाते हैं, उन धृष्टद्युम्नके सुवर्णभूषित रथमें कचनार वृक्षके चिह्नसे युक्त ध्वजा फहराती देख भीमसेनको बड़ा आश्वासन मिला ॥ ९८ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु तं दृष्ट्वा कलिङ्गैः समभिद्रुतम् । भीमसेनममेयात्मा त्राणायाजौ समभ्ययात् ॥ ९९ ॥ कलिंगोंने भीमसेनपर धावा किया है, यह देखकर अनन्त आत्मबलसे सम्पन्न धृष्टद्युम्न भीमसेनकी रक्षाके लिये युद्धस्थलमें उनके पास जा पहुँचे ॥ ९९ ॥