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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

य इन्द्रियाणां प्रीतिरसानुगामी ॥ ४ ॥

हमलोग वही सुख चाहते हैं, जो धर्मकी प्राप्ति करानेवाला हो। जो इन्द्रियोंको प्रिय लगनेवाले विषय-रसका अनुगामी होता है, वह सुखको पाने और दुःखको नष्ट करनेकी इच्छासे कर्म करता है; परंतु वास्तवमें उसका सारा कर्म दुःखरूप ही है; क्योंकि वह कष्टदायक उपायोंसे ही साध्य है ॥ ४ ॥

कामाभिध्या स्वशरीरं दुनोति
यया प्रमुक्तो न करोति दुःखम् ।
यथेध्यमानस्य समृद्धतेजसो
भूयो बलं वर्धते पावकस्य ॥ ५ ॥
कामार्थलाभेन तथैव भूयो
न तृप्यते सर्पिषेवाग्निरिद्धः ।

विषयोंका चिन्तन अपने शरीरको पीड़ा देता है। जो विषय-चिन्तनसे सर्वथा मुक्त है, वह कभी दुःखका अनुभव नहीं करता। जैसे प्रज्वलित अग्निमें ईंधन डालनेसे उसका बल बहुत अधिक बढ़ जाता है, उसी प्रकार विषयभोग और धनका लाभ होनेसे मनुष्यकी तृष्णा और अधिक बढ़ जाती है। घीसे शान्त न होनेवाली प्रज्वलित अग्निकी भाँति मानव कभी विषयभोग और धनसे तृप्त नहीं होता है ॥ ५ १/२ ॥

सम्पश्येमं भोगचयं महान्तं
सहास्माभिर्धृतराष्ट्रस्य राज्ञः ॥ ६ ॥

हमलोगोंसहित राजा धृतराष्ट्रके पास यह भोगोंकी विशाल राशि संचित हो गयी है। परंतु देखो (इतनेपर भी उनकी तृप्ति नहीं होती) ॥ ६ ॥

नाश्रेयानीश्वरो विग्रहाणां
नाश्रेयान् वै गीतशब्दं शृणोति ।
नाश्रेयान् वै सेवते माल्यगन्धान्
न चाप्यश्रेयाननुलेपनानि ॥ ७ ॥
नाश्रेयान् वै प्रावारान् संविवस्ते
कथं त्वस्मान् सम्प्रणुदेत् कुरुभ्यः ।
अत्रैव स्यादबुधस्यैव कामः
प्रायः शरीरे हृदयं दुनोति ॥ ८ ॥

जो पुण्यात्मा नहीं है, वह संग्रामोंमें विजयी नहीं होता। जो पुण्यात्मा नहीं है, वह अपना यशोगान नहीं सुनता। जिसने पुण्य नहीं किया है, वह मालाएँ और गन्ध नहीं धारण कर सकता। जो पुण्यात्मा नहीं है, वह चन्दन आदि अवलेपनका भी उपयोग नहीं कर सकता। जिसने पुण्य नहीं किया है, वह अच्छे कपड़े नहीं धारण करता। यदि राजा धृतराष्ट्र पुण्यवान् न होते, तो हमलोगोंको कुरुदेशसे दूर कैसे कर देते? तथापि यह भोगतृष्णा

अज्ञानी दुर्योधन आदिके ही योग्य है, जो प्रायः (सभीके) शरीरोंके भीतर अन्तःकरणको पीड़ा देती रहती है ।। ७-८ ।।
स्वयं राजा विषमस्थः परेषु
सामस्थ्यमन्विच्छति तन्न साधु ।
यथाऽऽत्मनः पश्यति वृत्तमेव
तथा परेषामपि सोऽभ्युपैतु ॥ ९ ॥
राजा धृतराष्ट्र स्वयं तो विषम-बर्तावमें लगे हुए हैं; परंतु दूसरोंमें समतापूर्ण बर्ताव देखना चाहते हैं, यह अच्छी बात नहीं है। वे जैसा अपना बर्ताव देखते हैं, वैसा ही दूसरोंका भी देखें ।। ९ ।।
आसन्नमग्निं तु निदाघकाले
गम्भीरकक्षे गहने विसृज्य ।
यथा विवृद्धं वायुवशेन शोचेत्
क्षेमं मुमुक्षुः शिशिरव्यपाये ॥ १० ॥
प्राप्तैश्वर्यो धृतराष्ट्रोऽद्य राजा
लालप्यते संजय कस्य हेतोः ।
प्रगृह्य दुर्बुद्धिमनार्जवे रतं
पुत्रं मन्दं मूढममन्त्रिणं तु ॥ ११ ॥
संजय! जैसे कोई मनुष्य शिशिर-ऋतु बीतनेपर ग्रीष्म-ऋतुकी दुपहरीमें बहुत घास-फूससे भरे हुए गहन वनमें आग लगा दे और जब हवा चलनेसे वह आग सब ओर फैलकर अपने निकट आ जाय, तब उसकी ज्वालासे अपने-आपको बचानेके लिये वह कुशल-क्षेमकी इच्छा रखकर बार-बार शोक करने लगे, उसी प्रकार आज राजा धृतराष्ट्र सारा ऐश्वर्य अपने अधिकारमें करके खोटी बुद्धिवाले, उद्दण्ड, भाग्यहीन, मूर्ख और किसी अच्छे मन्त्रीकी सलाहके अनुसार न चलनेवाले अपने पुत्र दुर्योधनका पक्ष लेकर अब किसलिये (दीनकी भाँति) विलाप करते हैं? ।। १०-११ ।।
अनाप्तवच्चाप्ततमस्य वाचः
सुयोधनो विदुरस्यावमत्य ।
सुतस्य राजा धृतराष्ट्रः प्रियैषी
सम्बुध्यमानो विशतेऽधर्ममेव ॥ १२ ॥
अपने पुत्र दुर्योधनका प्रिय चाहनेवाले राजा धृतराष्ट्र अपने सबसे अधिक विश्वासपात्र विदुरजीके वचनोंको अविश्वसनीय-से समझकर उनकी अवहेलना करके जान-बूझकर अधर्मके ही पथका आश्रय ले रहे हैं ।। १२ ।।
मेधाविनं ह्यर्थकामं कुरूणां
बहुश्रुतं वाग्मिनं शीलवन्तम् ।

स तं राजा धृतराष्ट्रः कुरुभ्यो

न सस्मार विदुरं पुत्रकाम्यात् ॥ १३ ॥

बुद्धिमान्, कौरवोंके अभीष्टकी सिद्धि चाहनेवाले, बहुश्रुत विद्वान्, उत्तम वक्ता तथा

शीलवान् विदुरजीका भी राजा धृतराष्ट्रने कौरवोंके हितके लिये पुत्रस्नेहकी लालसासे आदर

नहीं किया ॥ १३ ॥

मानघ्नस्यासौ मानकामस्य चेर्षोः

    संरम्भिणश्चार्थधर्मातिगस्य ।

दुर्भाषिणो मन्युवशानुगस्य

    कामात्मनो दौर्हृदैर्भावितस्य ॥ १४ ॥

अनेयस्याश्रेयसो दीर्घमन्यो-

    र्मित्रद्रुहः संजय पापबुद्धेः ।

सुतस्य राजा धृतराष्ट्रः प्रियैषी

    प्रपश्यमानः प्राजहाद् धर्मकामौ ॥ १५ ॥

संजय! दूसरोंका मान मिटाकर अपना मान चाहनेवाले, ईर्ष्यालु, क्रोधी, अर्थ और

धर्मका उल्लंघन करनेवाले, कटुवचन बोलनेवाले, क्रोध और दीनताके वशवर्ती, कामात्मा

(भोगासक्त), पापियोंसे प्रशंसित, शिक्षा देनेके अयोग्य, भाग्यहीन, अधिक क्रोधी, मित्रद्रोही

तथा पापबुद्धि पुत्र दुर्योधनका प्रिय चाहनेवाले राजा धृतराष्ट्रने समझते हुए भी धर्म और

कामका परित्याग किया है ॥ १४-१५ ॥

तदैव मे संजय दीव्यतोऽभू-

    न्मतिः कुरूणामागतः स्यादभावः ।

काव्यां वाचं विदुरो भाषमाणो

    न विन्दते यद् धार्तराष्ट्रात् प्रशंसाम् ॥ १६ ॥

संजय! जिस समय मैं जूआ खेल रहा था, उसी समयकी बात है, विदुरजी शुक्रनीतिके

अनुसार युक्ति-युक्त वचन कह रहे थे, तो भी दुर्योधनकी ओरसे उन्हें प्रशंसा नहीं प्राप्त हुई।

तभी मेरे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ था कि सम्भवतः कौरवोंका विनाशकाल समीप आ

गया है ॥ १६ ॥

क्षत्तुर्यदा नान्ववर्तन्त बुद्धिं

    कृच्छ्रं कुरून् सूत तदाभ्याजगाम ।

यावत् प्रज्ञामन्ववर्तन्त तस्य

    तावत् तेषां राष्ट्रवृद्धिर्बभूव ॥ १७ ॥

सूत! जबतक कौरव विदुरजीकी बुद्धिके अनुसार बर्ताव करते और चलते थे, तबतक

सदा उनके राष्ट्रकी वृद्धि ही होती रही। जबसे उन्होंने विदुरजीसे सलाह लेना छोड़ दिया,

तभीसे उनपर विपत्ति आ पड़ी है ॥ १७ ॥

तदर्थलुब्धस्य निबोध मेऽद्य ये मन्त्रिणो धार्तराष्ट्रस्य सूत । दुःशासनः शकुनिः सूतपुत्रो गावलगणे पश्य सम्मोहमस्य ॥ १८ ॥ गवल्गणपुत्र संजय! धनके लोभी दुर्योधनके जो-जो मन्त्री हैं, उनके नाम आज तुम मुझसे सुन लो। दुःशासन, शकुनि तथा सूतपुत्र कर्ण—ये ही उसके मन्त्री हैं। उसका मोह तो देखो ॥ १८ ॥

सोऽतं न पश्यामि परीक्षमाणः कथं स्वस्ति स्यात् कुरुसृंजयानाम् । आत्तैश्वर्यो धृतराष्ट्रः परेभ्यः प्रव्राजिते विदुरे दीर्घदृष्टौ ॥ १९ ॥ आशंसते वै धृतराष्ट्रः सपुत्रो महाराज्यमसपत्नं पृथिव्याम् । तस्मिञ्छमः केवलं नोपलभ्यः सर्वं स्वकं मद्गते मन्यतेऽर्थम् ॥ २० ॥ मैं बहुत सोचने-विचारनेपर भी कोई ऐसा उपाय नहीं देखता, जिससे कुरु तथा सृंजयवंश दोनोंका कल्याण हो। धृतराष्ट्र हम शत्रुओंसे ऐश्वर्य छीनकर दूरदर्शी विदुरको देशसे निर्वासित करके अपने पुत्रोंसहित भूमण्डलका निष्कण्टक साम्राज्य प्राप्त करनेकी आशा लगाये बैठे हैं। ऐसे लोभी नरेशके साथ केवल संधि ही बनी रहेगी, (युद्ध आदिका अवसर नहीं आयेगा) यह सम्भव नहीं जान पड़ता; क्योंकि हमलोगोंके वन चले जानेपर वे हमारे सारे धनको अपना ही मानने लगे हैं ॥ १९-२० ॥

यत् तत् कर्णो मन्यते पारणीयं युद्धे गृहीतायुधमर्जुनं वै । आसंश्च युद्धानि पुरा महान्ति कथं कर्णो नाभवद् द्वीप एषाम् ॥ २१ ॥ कर्ण जो ऐसा समझता है कि युद्धमें धनुष उठाये हुए अर्जुनको जीत लेना सहज है, वह उसकी भूल है। पहले भी तो बड़े-बड़े युद्ध हो चुके हैं। उनमें कर्ण इन कौरवोंका आश्रयदाता क्यों न हो सका? ॥ २१ ॥

कर्णश्च जानाति सुयोधनश्च द्रोणश्च जानाति पितामहश्च । अन्ये च ये कुरवस्तत्र सन्ति यथार्जुनान्नास्त्यपरो धनुर्धरः ॥ २२ ॥

अर्जुनसे बढ़कर दूसरा कोई धनुर्धर नहीं है—इस बातको कर्ण जानता है, दुर्योधन जानता है, आचार्य द्रोण और पितामह भीष्म जानते हैं तथा अन्य जो-जो कौरव वहाँ रहते हैं, वे सब भी जानते हैं ॥ २२ ॥ जानन्त्येतत् कुरवः सर्व एव ये चाप्यन्ये भूमिपालाः समेताः । दुर्योधने राज्यमिहाभवद् यथा अरिंदमे फाल्गुने विद्यमाने ॥ २३ ॥ समस्त कौरव तथा वहाँ एकत्र हुए अन्य भूपाल भी इस बातको जानते हैं कि शत्रुदमन अर्जुनके उपस्थित रहते हुए दुर्योधनने किस उपायसे पाण्डवोंका राज्य प्राप्त किया (अर्थात् उन्होंने अपनी वीरतासे नहीं, अपितु छलपूर्वक जूएके द्वारा ही हमारा राज्य लिया) ॥ २३ ॥ तेनानुबन्धं मन्यते धार्तराष्ट्रः शक्यं हर्तुं पाण्डवानां ममत्वम् । किरीटिना तालमात्रायुधेन तद्वेदिना संयुगं तत्र गत्वा ॥ २४ ॥ राज्य आदिपर जो पाण्डवोंका ममत्व है, उसे हर लेना क्या दुर्योधन सरल समझता है? इसके लिये उसे उन किरीटधारी अर्जुनके साथ युद्धभूमिमें उतरना पड़ेगा, जो चार हाथ लंबा धनुष धारण करते हैं और धनुर्वेदके प्रकाण्ड विद्वान् हैं ॥ २४ ॥ गाण्डीवविस्फारितशब्दमाजा- वशृणवाना धार्तराष्ट्रा ध्रियन्ते । क्रुद्धं न चेदीक्षते भीमसेनं सुयोधनो मन्यते सिद्धमर्थम् ॥ २५ ॥ धृतराष्ट्रके पुत्र तभीतक जीवित हैं, जबतक कि वे युद्धमें गाण्डीव धनुषका टंकारघोष नहीं सुन रहे हैं। दुर्योधन जबतक क्रोधमें भरे हुए भीमसेनको नहीं देख रहा है, तभीतक अपने राज्यप्राप्तिसम्बन्धी मनोरथको सिद्ध हुआ समझे ॥ २५ ॥ इन्द्रोऽप्येतन्नोत्सहेत् तात हर्तु- मैश्वर्यं नो जीवति भीमसेने । धनंजये नकुले चैव सूत तथा वीरे सहदेवे सहिष्णौ ॥ २६ ॥ तात संजय! जबतक भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहनशील वीर सहदेव जीवित हैं, तबतक इन्द्र भी हमारे ऐश्वर्यका अपहरण नहीं कर सकता ॥ २६ ॥ स चेदेतां प्रतिपद्येत बुद्धिं वृद्धो राजा सह पुत्रेण सूत ।

एवं रणे पाण्डवकोपद्ग्धा न नश्येयुः संजय धार्तराष्ट्राः ॥ २७ ॥ सूत! यदि राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रोंके साथ यह अच्छी तरह समझ लेंगे कि पाण्डवोंको राज्य न देनेमें कुशल नहीं है तो धृतराष्ट्रके सभी पुत्र समरांगणमें पाण्डवोंकी क्रोधाग्निसे दग्ध होकर नष्ट होनेसे बच जायेंगे ॥ २७ ॥

जानासि त्वं क्लेशमस्मासु वृत्तं त्वां पूजयन् संजयाहं क्षमेयम् । यच्चास्माकं कौरवैर्भूतपूर्वं या नो वृत्तिर्धार्तराष्ट्रे तदाऽऽसीत् ॥ २८ ॥ संजय! हमलोगोंको कौरवोंके कारण पहले कितना क्लेश उठाना पड़ा है, यह तुम भलीभाँति जानते हो तथापि मैं तुम्हारा आदर करते हुए उनके सब अपराधोंको क्षमा कर सकता हूँ। दुर्योधन आदि कौरवोंने पहले हमारे साथ कैसा बर्ताव किया है और उस समय हमलोगोंका उनके साथ कैसा बर्ताव रहा है, यह भी तुमसे छिपा नहीं है ॥ २८ ॥

अद्यापि तत् तत्र तथैव वर्त्ततां शान्तिं गमिष्यामि यथा त्वमात्थ । इन्द्रप्रस्थे भवतु ममैव राज्यं सुयोधनो यच्छतु भारताग्र्यः ॥ २९ ॥ अब भी वह सब कुछ पहलेके ही समान हो सकता है। जैसा तुम कह रहे हो, उसके अनुसार मैं शान्ति धारण कर लूँगा। परंतु इन्द्रप्रस्थमें पूर्ववत् मेरा ही राज्य रहे और भरतवंशशिरोमणि सुयोधन मेरा वह राज्य मुझे लौटा दे ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तविंशोऽध्यायः

संजयका युधिष्ठिरको युद्धमें दोषकी सम्भावना बतलाकर उन्हें युद्धसे उपरत करनेका प्रयत्न करना

संजय उवाच

धर्मनित्या पाण्डव ते विचेष्टा
लोके श्रुता दृश्यते चापि पार्थ।
महाश्रावं जीवितं चाप्यनित्यं
सम्पश्य त्वं पाण्डव मा व्यनीनशः॥ १॥

**संजय बोला—**पाण्डुनन्दन! आपकी प्रत्येक चेष्टा सदा धर्मके अनुसार ही होती है। कुन्तीकुमार! आपकी वह धर्मयुक्त चेष्टा लोकमें तो विख्यात है ही, देखनेमें भी आ रही है। यद्यपि यह जीवन अनित्य है तथापि इससे महान् सुयशकी प्राप्ति हो सकती है। पाण्डव! आप जीवनकी उस अनित्यतापर दृष्टिपात करें और अपनी कीर्तिको नष्ट न होने दें॥ १॥

न चेद् भागं कुरवोऽन्यत्र युद्धात्
प्रयच्छेरंस्तुभ्यमजातशत्रो।
भैक्ष्यचर्यामन्धकवृष्णिराज्ये
श्रेयो मन्ये न तु युद्धेन राज्यम्॥ २॥

अजातशत्रो! यदि कौरव युद्ध किये बिना आपको राज्यका भाग न दें, तो भी अन्धक और वृष्णिवंशी क्षत्रियोंके राज्यमें भीख माँगकर जीवन-निर्वाह कर लेना मैं आपके लिये श्रेष्ठ समझता हूँ; परंतु युद्ध करके राज्य लेना अच्छा नहीं समझता॥ २॥

अल्पकालं जीवितं यन्मनुष्ये
महास्त्रावं नित्यदुःखं चलं च।
भूयश्च तद् यशसो नानुरूपं
तस्मात् पापं पाण्डव मा कृथास्त्वम्॥ ३॥

मनुष्यका जो यह जीवन है, वह बहुत थोड़े समयतक रहनेवाला है। इसको क्षीण करनेवाले महान् दोष इसे प्राप्त होते रहते हैं। यह सदा दुःखमय और चंचल है। अतः पाण्डुनन्दन! आप युद्धरूपी पाप न कीजिये। वह आपके सुयशके अनुरूप नहीं है॥ ३॥

कामा मनुष्यं प्रसजन्ति एते
धर्मस्य ये विघ्नमूलं नरेन्द्र।
पूर्वं नरस्तान् मतिमान् प्रणिघ्न-
ल्लोँके प्रशंसां लभतेऽनवद्याम्॥ ४॥

नरेन्द्र! जो धर्माचरणमें विघ्न डालनेकी मूल कारण हैं, वे कामनाएँ प्रत्येक मनुष्यको अपनी ओर खींचती हैं। अतः बुद्धिमान् मनुष्य पहले उन कामनाओंको नष्ट करता है, तदनन्तर जगत्में निर्मल प्रशंसाका भागी होता है ॥ ४ ॥

निबन्धनी ह्यर्थतृष्णोह पार्थ
तामिच्छतां बाध्यते धर्म एव ।
धर्मं तु यः प्रवृणीते स बुद्धः
कामे गृध्नो हीयतेऽर्थानुरोधात् ॥ ५ ॥

कुन्तीनन्दन! इस संसारमें धनकी तृष्णा ही बन्धनमें डालनेवाली है। जो धनकी तृष्णामें फँसता है, उसका धर्म भी नष्ट हो जाता है। जो धर्मका वरण करता है, वही ज्ञानी है। भोगोंकी इच्छा करनेवाला मनुष्य तो धनमें आसक्त होनेके कारण धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ ५ ॥

धर्मं कृत्वा कर्मणां तात मुख्यं
महाप्रतापः सवितेव भाति ।
हीनो हि धर्मेण महीमपीमां
लब्ध्वा नरः सीदति पापबुद्धिः ॥ ६ ॥

तात! धर्म, अर्थ और काम तीनोंमें धर्मको प्रधान मानकर तदनुसार चलनेवाला पुरुष महाप्रतापी होकर सूर्यकी भाँति चमक उठता है; परंतु जो धर्मसे हीन है और जिसकी बुद्धि पापमें ही लगी हुई है, वह मनुष्य इस सारी पृथ्वीको पाकर भी कष्ट ही भोगता रहता है ॥ ६ ॥

वेदोऽधीतश्चरितं ब्रह्मचर्यं
यज्ञैरिष्टं ब्राह्मणेभ्यश्च दत्तम् ।
परं स्थानं मन्यमानेन भूय
आत्मा दत्तो वर्षपूगं सुखेभ्यः ॥ ७ ॥

आपने परलोकपर विश्वास करके वेदोंका अध्ययन, ब्रह्मचर्यका पालन एवं यज्ञोंका अनुष्ठान किया है तथा ब्राह्मणोंको दान दिया है और अनन्त वर्षोंतक वहाँके सुख भोगनेके लिये अपने-आपको भी समर्पित कर दिया है ॥ ७ ॥

सुखप्रिये सेवमानोऽतिवेलं
योगाभ्यासे यो न करोति कर्म ।
वित्तक्षये हीनसुखोऽतिवेलं
दुःखं शेते कामवेगप्रणुन्नः ॥ ८ ॥

जो मनुष्य भोग तथा प्रिय (पुत्रादि)-का निरन्तर सेवन करते हुए योगाभ्यासोपयोगी कर्मका सेवन नहीं करता, वह धनका क्षय हो जानेपर सुखसे वंचित हो कामवेगसे अत्यन्त विक्षुब्ध होकर सदा दुःखशय्यापर शयन करता रहता है ॥ ८ ॥

एवं पुनर्ब्रह्मचर्याप्रसक्तो हित्वा धर्मं यः प्रकरोत्यधर्मम् । अश्रद्दधत् परलोकाय मूढो हित्वा देहं तप्यते प्रेत्य मन्दः ॥ ९ ॥ जो ब्रह्मचर्यपालनमें प्रवृत्त न हो धर्मका त्याग करके अधर्मका आचरण करता है तथा जो मूढ़ परलोकपर विश्वास नहीं रखता है, वह मन्दभाग्य मानव शरीर त्यागनेके पश्चात् परलोकमें बड़ा कष्ट पाता है ॥ ९ ॥

न कर्मणां विप्रणाशोऽस्त्यमुत्र पुण्यानां वाप्यथवा पापकानाम् । पूर्वं कर्तुर्गच्छति पुण्यपापं पश्चात् त्वेनमनुयात्येव कर्ता ॥ १० ॥ पुण्य अथवा पाप किन्हीं भी कर्मोंका परलोकमें नाश नहीं होता है। पहले कर्ताके पुण्य और पाप परलोकमें जाते हैं, फिर उन्हींके पीछे-पीछे कर्ता जाता है ॥ १० ॥

न्यायोपेतं ब्राह्मणेभ्योऽथ दत्तं श्रद्धापूतं गन्धरसोपपन्नम् । अन्वाहार्येषूत्तमदक्षिणेषु तथारूपं कर्म विख्यायते ते ॥ ११ ॥ लोकमें आपके कर्म इस रूपमें विख्यात हैं कि आपने उत्तम दक्षिणायुक्त वृद्धिश्राद्ध आदिके अवसरोंपर ब्राह्मणोंको न्यायोपार्जित प्रचुर धन एवं श्रद्धासहित उत्तम गन्धयुक्त, सुस्वादु एवं पवित्र अन्नका दान किया है ॥ ११ ॥

इह क्षेत्रे क्रियते पार्थ कार्यं न वै किञ्चित् क्रियते प्रेत्य कार्यम् । कृतं त्वया पारलौक्यं च कर्म पुण्यं महत् सद्‌भिरतिप्रशस्तम् ॥ १२ ॥ कुन्तीनन्दन! इस शरीरके रहते हुए ही कोई भी सत्कर्म किया जा सकता है। मरनेके बाद कोई कार्य नहीं किया जा सकता। आपने तो परलोकमें सुख देनेवाला महान् पुण्यकर्म किया है, जिसकी साधु पुरुषोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की है ॥ १२ ॥

जहाति मृत्युं च जरां भयं च न क्षुत्पिपासे मनसोऽप्रियाणि । न कर्तव्यं विद्यते तत्र किञ्चि- दन्यत्र वै चेन्द्रियप्रीणनाद्धि ॥ १३ ॥ (पुण्यात्मा) मनुष्य (स्वर्गलोकमें जाकर) मृत्यु, बुढ़ापा तथा भय त्याग देता है। वहाँ उसे मनके प्रतिकूल भूख-प्यासका कष्ट भी नहीं सहन करना पड़ता है। परलोकमें

इन्द्रियोंको सुख पहुँचानेके सिवा दूसरा कोई कर्तव्य नहीं रह जाता है* ॥ १३ ॥ एवंरूपं कर्मफलं नरेन्द्र मात्रावहं हृदयस्य प्रियेण । स क्रोधजं पाण्डव हर्षजं च लोकावुभौ मा प्रहासीश्चिराय ॥ १४ ॥ नरेन्द्र! इस प्रकार हृदयको प्रिय लगनेवाले विषयसे कर्मफलकी प्रार्थना नहीं करनी चाहिये। पाण्डुनन्दन! आप क्रोधजनित नरक और हर्षजनित स्वर्ग—इन दोनों लोकोंमें कभी न जायँ; (अपितु सनातन मोक्ष-सुखके लिये निष्काम कर्म अथवा ज्ञानयोगका ही साधन करें) ॥ १४ ॥ अन्तं गत्वा कर्मणां मा प्रजह्याः सत्यं दमं चार्जवमानृशंस्यम् । अश्वमेधं राजसूयं तथेज्याः पापस्यान्तं कर्मणो मा पुनर्गाः ॥ १५ ॥ इस तरह (ज्ञानाग्निके द्वारा) कर्मोंको दग्ध करके सत्य, दम, आर्जव (सरलता) तथा अनृशंसता (दया) इन सद्गुणोंका कभी त्याग न करें। अश्वमेध, राजसूय और अन्य यज्ञोंको भी न छोड़ें, परंतु युद्ध-जैसे पापकर्मके निकट फिर कभी न जायँ ॥ १५ ॥ तच्चेदेवं द्वेषरूपेण पार्थाः करिष्यध्वं कर्म पापं चिराय । निवसध्वं वर्षपूगान् वनेषु दुःखं वासं पाण्डवा धर्म एव ॥ १६ ॥ कुन्तीकुमारो! यदि आपलोगोंको राज्यके लिये चिरस्थायी विद्वेषके रूपमें युद्धरूप पापकर्म ही करना है, तब तो मैं यही कहूँगा कि आप बहुत वर्षोंतक दुःखमय वनवासका ही कष्ट भोगते रहें। पाण्डवो! वह वनवास ही आपके लिये धर्मरूप होगा ॥ १६ ॥ अप्रव्रज्येमा स्म हित्वाऽऽपुरस्ता- दात्माधीनं यद् बलं ह्येतदासीत् । नित्यं च वश्याः सचिवास्तवेमे जनार्दनो युयुधानश्च वीरः ॥ १७ ॥ पहले (द्यूतक्रीड़ाके समय ही) हमलोग बलपूर्वक इन्हें अपने वशमें रखकर वनमें गये बिना ही यहाँ रह सकते थे; क्योंकि आज जो सेना एकत्र हुई है, यह पहले भी अपने ही लोगोंके अधीन थी और ये भगवान् श्रीकृष्ण तथा वीरवर सात्यकि सदासे ही आपलोगोंके (प्रेमके कारण) वशीभूत एवं आपके सहायक रहे हैं ॥ मत्स्यो राजा रुक्मरथः सपुत्रः प्रहारिभिः सह वीरैर्विराटः ।

राजानश्च ये विजिताः पुरस्तात् त्वामेव ते संश्रयेयुः समस्ताः ॥ १८ ॥ प्रहार करनेमें कुशल वीर सैनिकों तथा पुत्रोंके साथ सुवर्णमय रथसे सुशोभित मत्स्यदेशके राजा विराट तथा दूसरे भी बहुत-से नरेश, जिन्हें पहले आपलोगोंने युद्धमें जीता था, वे सब-के-सब संग्राममें आपका ही पक्ष लेते ॥ १८ ॥

महासहायः प्रतपन् बलस्थः पुरस्कृतो वासुदेवार्जुनाभ्याम् । वरान् हनिष्यन् द्विषतो रङ्गमध्ये व्यनेष्यथा धार्तराष्ट्रस्य दर्पम् ॥ १९ ॥ उस समय आप महान् सहायकोंसे सम्पन्न और बलशाली थे, आप श्रीकृष्ण तथा अर्जुनके आगे-आगे चलकर शत्रुओंपर आक्रमण कर सकते थे। समरांगणमें अपने महान् शत्रुओंका संहार करते हुए आप दुर्योधनके घमंडको चूर-चूर कर सकते थे ॥ १९ ॥

बलं कस्माद् वर्धयित्वा परस्य निजान् कस्मात् कर्शयित्वा सहायान् । निरुष्य कस्माद् वर्षपूगान् वनेषु युयुत्ससे पाण्डव हीनकालम् ॥ २० ॥ पाण्डुनन्दन! फिर क्या कारण है कि आपने शत्रु की शक्तिको बढ़नेका अवसर दिया? किसलिये अपने सहायकोंको दुर्बल बनाया और क्यों बारह वर्षोंतक वनमें निवास किया? फिर आज जब वह अनुकूल अवसर बीत चुका है, आपको युद्ध करनेकी इच्छा क्यों हुई है? ॥ २० ॥

अप्राज्ञो वा पाण्डव युध्यमानो- ऽधर्मज्ञो वा भूतिमथोऽभ्युपैति । प्रज्ञावान् वा बुध्यमानोऽपि धर्मं संस्तम्भाद् वा सोऽपि भूतेरपैति ॥ २१ ॥ पाण्डुकुमार! अज्ञानी अथवा पापी मनुष्य भी युद्ध करके सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है और बुद्धिमान् अथवा धर्मज्ञ पुरुष भी दैवी बाधाके कारण पराजित होकर ऐश्वर्यसे हाथ धो बैठता है ॥ २१ ॥

नाधर्मे ते धीयते पार्थ बुद्धि- र्न संरम्भात् कर्म चकर्थ पापम् । आत्थ किं तत् कारणं यस्य हेतोः प्रज्ञाविरुद्धं कर्म चिकीर्षसीदम् ॥ २२ ॥ कुन्तीनन्दन! आपकी बुद्धि कभी अधर्ममें नहीं लगती तथा आपने क्रोधमें आकर भी कभी पापकर्म नहीं किया है, तो बताइये, कौन-सा ऐसा (प्रबल) कारण है, जिसके लिये

अब आप अपनी बुद्धिके विरुद्ध यह युद्ध-जैसा पापकर्म करना चाहते हैं? ।। २२ ।।

अव्याधिजं कटुकं शीर्षरोगि

यशोमुषं पापफलोदयं वा ।

सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो

मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य ।। २३ ।।

महाराज! जो बिना व्याधिके ही उत्पन्न होता है, स्वादमें कड़ुआ है, जिसके कारण

सिरमें दर्द होने लगता है, जो यशका नाशक और पापरूप फलको प्रकट करनेवाला है, जो

सज्जन पुरुषोंके ही पीने योग्य है, जिसे असाधु पुरुष नहीं पीते हैं, उस क्रोधको आप पी

लीजिये और शान्त हो जाइये ।। २३ ।।

पापानुबन्धं को नु तं कामयेत

क्षमैव ते ज्यायसी नोत भोगाः ।

यत्र भीष्मः शान्तनवो हतः स्याद्

यत्र द्रोणः सहपुत्रो हतः स्यात् ।। २४ ।।

जो पापकी जड़ है, उस क्रोधकी इच्छा कौन करेगा? आपकी दृष्टिमें तो क्षमा ही सबसे

श्रेष्ठ वस्तु है, वे भोग नहीं, जिनके लिये शान्तनुनन्दन भीष्म तथा पुत्रसहित आचार्य द्रोणकी

हत्या की जाय ।। २४ ।।

कृपः शल्यः सौमदत्तिर्विकर्णो

विविंशतिः कर्णदुर्योधनौ च ।

एतान् हत्वा कीदृशं तत् सुखं स्याद्

यद् विन्देथास्तदनु ब्रूहि पार्थ ।। २५ ।।

कुन्तीनन्दन! ऐसा कौन-सा सुख हो सकता है, जिसे आप कृपाचार्य, शल्य, भूरिश्रवा,

विकर्ण, विविंशति, कर्ण तथा दुर्योधन—इन सबका वध करके पाना चाहते हैं, कृपया

बताइये ।। २५ ।।

लब्ध्वापीमां पृथिवीं सागरान्तां

जरामृत्यू नैव हि त्वं प्रजह्याः ।

प्रियाप्रिये सुखदुःखे च राज-

न्नेवं विद्वान् नैव युद्धं कुरु त्वम् ।। २६ ।।

राजन्! समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथिवीको पाकर भी आप जरा-मृत्यु, प्रिय-अप्रिय तथा

सुख-दुःखसे पिण्ड नहीं छुड़ा सकते। आप इन सब बातोंको अच्छी तरह जानते हैं; अतः

मेरी प्रार्थना है कि आप युद्ध न करें ।। २६ ।।

अमात्यानां यदि कामस्य हेतो-

रेवं युक्तं कर्म चिकीर्षसि त्वम् ।

अपक्रामैः स्वं प्रदायैव तेषां

मा गास्त्वं वै देवयानात् पथोऽद्य ॥ २७ ॥

यदि आप अपने मन्त्रियोंकी इच्छासे ही ऐसा पापमय युद्ध करना चाहते हैं तो अपना सर्वस्व उन मन्त्रियोंको ही देकर वानप्रस्थ ग्रहण कर लीजिये; परंतु अपने कुटुम्बका वध करके देवयानमार्गसे भ्रष्ट न होइये ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि संजयवाक्ये सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें संजयवाक्यविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥


* देवयोनि भोगयोनि है, कर्मयोनि नहीं। उसमें नवीन कर्म करनेके लिये देवता बाध्य नहीं हैं।

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अष्टाविंशोऽध्यायः

संजयको युधिष्ठिरका उत्तर

युधिष्ठिर उवाच

असंशयं संजय सत्यमेतद् धर्मो वरः कर्मणां यत् त्वमात्थ । ज्ञात्वा तु मां संजय गर्हयेस्त्वं यदि धर्मं यद्यधर्मं चरेयम् ॥ १ ॥

युधिष्ठिर बोले— संजय! सब प्रकारके कर्मोंमें धर्म ही श्रेष्ठ है। यह जो तुमने कहा है, वह बिलकुल ठीक है। इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं है; परंतु मैं धर्म कर रहा हूँ या अधर्म, इस बातको पहले अच्छी तरह जान लो; फिर मेरी निन्दा करना ॥ १ ॥

यत्राधर्मो धर्मरूपाणि धत्ते धर्मः कृत्स्नो दृश्यतेऽधर्मरूपः । बिभ्रद् धर्मो धर्मरूपं तथा च विद्वांसस्तं सम्प्रपश्यन्ति बुद्धया ॥ २ ॥

कहीं तो अधर्म ही धर्मका रूप धारण कर लेता है, कहीं पूर्णतया धर्म ही अधर्म दिखायी देता है तथा कहीं धर्म अपने वास्तविक स्वरूपको ही धारण किये रहता है। विद्वान् पुरुष अपनी बुद्धिसे विचार करके उसके असली रूपको देख और समझ लेते हैं ॥ २ ॥

एवं तथैवापदि लिङ्गमेतद् धर्माधर्मौ नित्यवृत्ती भजेताम् । आद्यं लिङ्गं यस्य तस्य प्रमाण- मापद्धर्मं संजय तं निबोध ॥ ३ ॥

इस प्रकार जो यह विभिन्न वर्णोंका अपना-अपना लक्षण (लिंग) (जैसे ब्राह्मणके लिये अध्ययनाध्यापन आदि, क्षत्रियके लिये शौर्य आदि तथा वैश्यके लिये कृषि आदि) है, वह ठीक उसी प्रकार उस-उस वर्णके लिये धर्मरूप है और वही दूसरे वर्णके लिये अधर्मरूप है। इस प्रकार यद्यपि धर्म और अधर्म सदा सुनिश्चितरूपसे रहते हैं तथापि आपत्तिकालमें वे दूसरे वर्णके लक्षणको भी अपना लेते हैं। प्रथम वर्ण ब्राह्मणका जो विशेष लक्षण (याजन और अध्यापन आदि) है, वह उसीके लिये प्रमाणभूत है (क्षत्रिय आदिको आपत्तिकालमें भी याजन और अध्यापन आदिका आश्रय नहीं लेना चाहिये)। संजय! आपद्धर्मका क्या स्वरूप है, उसे तुम (शास्त्रके वचनोंद्वारा) जानो ॥ ३ ॥

लुप्तायां तु प्रकृतौ येन कर्म निष्पादयेत् तत् परीप्सेद् विहीनः ।

प्रकृतिस्थश्चापदि वर्तमान उभौ गर्ह्यौ भवतः संजयैतौ ॥ ४ ॥ प्रकृति (जीविकाके साधन)-का सर्वथा लोप हो जानेपर जिस वृत्तिका आश्रय लेनेसे (जीवनकी रक्षा एवं) सत्कर्मोंका अनुष्ठान हो सके, जीविकाहीन पुरुष उसे अवश्य अपनानेकी इच्छा करे। संजय! जो प्रकृतिस्थ (स्वाभाविक स्थितिमें स्थित) होकर भी आपद्धर्मका आश्रय लेता है, वह (अपनी लोभवृत्तिके कारण) निन्दनीय होता है तथा जो आपत्तिग्रस्त होनेपर भी (उस समयके अनुरूप शास्त्रोक्त साधनको अपनाकर) जीविका नहीं चलाता है, वह (जीवन और कुटुम्बकी रक्षा न करनेके कारण) गर्हणीय होता है। इस प्रकार ये दोनों तरहके लोग निन्दाके पात्र होते हैं ॥ ४ ॥

अविनाशमिच्छतां ब्राह्मणानां प्रायश्चित्तं विहितं यद् विधात्रा। सम्पश्येथाः कर्मसु वर्तमानान् विकर्मस्थान् संजय गर्हयेस्त्वम् ॥ ५ ॥ सूत! (जीविकाका मुख्य साधन न होनेपर) ब्राह्मणोंका नाश न हो जाय, ऐसी इच्छा रखनेवाले विधाताने जो (उनके लिये अन्य वर्णोंकी वृत्तिसे जीविका चलाकर अन्तमें) प्रायश्चित्त करनेका विधान किया है, उसपर दृष्टिपात करो। फिर यदि हम आपत्तिकालमें भी (स्वाभाविक) कर्मोंमें ही लगे हों और आपत्तिकाल न होनेपर भी अपने वर्णके विपरीत कर्मोंमें स्थित हो रहे हों तो उस दशामें हमें देखकर तुम (अवश्य) हमारी निन्दा करो ॥ ५ ॥

मनीषिणां सत्त्वविच्छेदनाय विधीयते सत्सु वृत्तिः सदैव । अब्राह्मणाः सन्ति तु ये न वैद्याः सर्वोत्सङ्गं साधु मन्येत तेभ्यः ॥ ६ ॥ मनीषी पुरुषोंको सत्त्व आदिके बन्धनसे मुक्त होनेके लिये सदा ही सत्पुरुषोंका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करना चाहिये, यह उनके लिये शास्त्रीय विधान है। परंतु जो ब्राह्मण नहीं हैं तथा जिनकी ब्रह्मविद्यामें निष्ठा नहीं है, उन सबके लिये सबके समीप अपने धर्मके अनुसार ही जीविका चलानी चाहिये ॥ ६ ॥

तदध्वानः पितरो ये च पूर्वे पितामहा ये च तेभ्यः परेऽन्ये । यज्ञैषिणो ये च हि कर्म कुर्यु- र्नान्यं ततो नास्तिकोऽस्मीति मन्ये ॥ ७ ॥ यज्ञकी इच्छा रखनेवाले मेरे पूर्व पिता-पितामह आदि तथा उनके भी पूर्वज उसी मार्गपर चलते रहे (जिसकी मैंने ऊपर चर्चा की है) तथा जो कर्म करते हैं, वे भी उसी मार्गसे

चलते आये हैं। मैं भी नास्तिक नहीं हूँ, इसलिये उसी मार्गपर चलता हूँ; उसके सिवा दूसरे मार्गपर विश्वास नहीं रखता हूँ ॥ ७ ॥ यत् किंचनेदं वित्तमस्यां पृथिव्यां यद् देवानां त्रिदशानां परं यत् । प्राजापत्यं त्रिदिवं ब्रह्मलोकं नाधर्मतः संजय कामयेयम् ॥ ८ ॥ संजय! इस धरातलपर जो कुछ भी धन-वैभव विद्यमान है, नित्य यौवनसे युक्त रहनेवाले देवताओंके यहाँ जो धनराशि है, उससे भी उत्कृष्ट जो प्रजापतिका धन है तथा जो स्वर्गलोक एवं ब्रह्मलोकका सम्पूर्ण वैभव है, वह सब मिल रहा हो, तो भी मैं उसे अधर्मसे लेना नहीं चाहूँगा ॥ ८ ॥ धर्मेश्वरः कुशलो नीतिमांश्च- प्युपासिता ब्राह्मणानां मनीषी । नानाविधांश्चैव महाबलांश्च राजन्यभोजनानुशास्ति कृष्णः ॥ ९ ॥ यदि ह्यहं विसृजन् साम गर्ह्यो नियुध्यमानो यदि जह्यां स्वधर्मम् । महायशाः केशवस्तद् ब्रवीतु वासुदेवस्तूभयोरर्थकामः ॥ १० ॥ यहाँ धर्मके स्वामी, कुशल नीतिज्ञ, ब्राह्मणभक्त और मनीषी भगवान् श्रीकृष्ण बैठे हैं, जो नाना प्रकारके महान् बलशाली क्षत्रियों तथा भोजवंशियोंका शासन करते हैं। यदि मैं सामनीति अथवा संधिका परित्याग करके निन्दाका पात्र होता होऊँ या युद्धके लिये उद्यत होकर अपने धर्मका उल्लंघन करता होऊँ तो ये महायशस्वी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण अपने विचार प्रकट करें; क्योंकि ये दोनों पक्षोंका हित चाहनेवाले हैं ॥ शैनेयोऽयं चेदयश्चान्धकाश्च वार्ष्णेयभोजाः कुकुराः सृंजयाश्च । उपासीना वासुदेवस्य बुद्धिं निगृह्य शत्रून् सुहृदो नन्दयन्ति ॥ ११ ॥ ये सात्यकि, ये चेदिदेशके लोग, ये अन्धक, वृष्णि, भोज, कुकुर तथा सृंजयवंशके क्षत्रिय इन्हीं भगवान् वासुदेवकी सलाहसे चलकर अपने शत्रुओंको बंदी बनाते और सुहृदोंको आनन्दित करते हैं ॥ ११ ॥ वृष्ण्यन्धका ह्युग्रसेनादयो वै कृष्णप्रणीताः सर्व एवेन्द्रकल्पाः । मनस्विनः सत्यपरायणाश्च

महाबला यादवा भोगवन्तः ॥ १२ ॥
श्रीकृष्णकी बतायी हुई नीतिके अनुसार बर्ताव करनेसे वृष्णि और अन्धकवंशके सभी उग्रसेन आदि क्षत्रिय इन्द्रके समान शक्तिशाली हो गये हैं तथा सभी यादव मनस्वी, सत्यपरायण, महान् बलशाली और भोगसामग्रीसे सम्पन्न हुए हैं ॥ १२ ॥
काश्यो बभ्रुः श्रियमुत्तमां गतो
लब्ध्वा कृष्णं भ्रातरमीशितारम् ।
यस्मै कामान् वर्षति वासुदेवो
ग्रीष्मात्यये मेघ इव प्रजाभ्यः ॥ १३ ॥
(पौण्ड्रक वासुदेवके छोटे भाई) काशीनरेश बभ्रु श्रीकृष्णको ही शासक बन्धुके रूपमें पाकर उत्तम राज्यलक्ष्मीके अधिकारी हुए हैं। भगवान् श्रीकृष्ण बभ्रुके लिये समस्त मनोवांछित भोगोंकी वर्षा उसी प्रकार करते हैं, जैसे वर्षाकालमें मेघ प्रजाओंके लिये जलकी वृष्टि करता है ॥ १३ ॥
ईदृशोऽयं केशवस्तात विद्वान्
विद्धि ह्येनं कर्मणां निश्चयज्ञम् ।
प्रियश्च नः साधुतमश्च कृष्णो
नातिक्रामे वचनं केशवस्य ॥ १४ ॥
तात संजय! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि भगवान् श्रीकृष्ण ऐसे प्रभावशाली और विद्वान् हैं। ये प्रत्येक कर्मका अन्तिम परिणाम जानते हैं। ये हमारे सबसे बढ़कर प्रिय तथा श्रेष्ठतम पुरुष हैं। मैं इनकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार महाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरवचनसम्बन्धी अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥

अध्याय (पृष्ठ 198)

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः

संजयकी बातोंका प्रत्युत्तर देते हुए श्रीकृष्णका उसे धृतराष्ट्रके लिये चेतावनी देना

वासुदेव उवाच

अविनाशं संजय पाण्डवाना-
मिच्छाम्यहं भूतिमेषां प्रियं च ।
तथा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य सूत
समाशंसे बहुपुत्रस्य वृद्धिम् ॥ १ ॥

**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**सूत संजय! मैं जिस प्रकार पाण्डवोंको विनाशसे बचाना, उनको ऐश्वर्य दिलाना तथा उनका प्रिय करना चाहता हूँ, उसी प्रकार अनेक पुत्रोंसे युक्त राजा धृतराष्ट्रका भी अभ्युदय चाहता हूँ ॥ १ ॥

कामो हि मे संजय नित्यमेव
नान्यद् ब्रूयां तान् प्रति शाम्यतेति ।
राज्ञश्च हि प्रियमेतच्छृणोमि
मन्ये चैतत् पाण्डवानां समक्षम् ॥ २ ॥

सूत! मेरी भी सदा यही अभिलाषा है कि दोनों पक्षोंमें शान्ति बनी रहे। ‘कुन्तीकुमारो! कौरवोंसे संधि करो, उनके प्रति शान्त बने रहो,’ इसके सिवा दूसरी कोई बात मैं पाण्डवोंके सामने नहीं कहता हूँ। राजा युधिष्ठिरके मुँहसे भी ऐसा ही प्रिय वचन सुनता हूँ और स्वयं भी इसीको ठीक मानता हूँ॥ २ ॥ सुदुष्करस्तत्र शमो हि नूनं प्रदर्शितः संजय पाण्डवेन । यस्मिन् गृद्धो धृतराष्ट्रः सपुत्रः कस्मादेषां कलहो नावमूर्च्छेत् ॥ ३ ॥ संजय! जैसा कि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने प्रकट किया है, राज्यके प्रश्नोंको लेकर दोनों पक्षोंमें शान्ति बनी रहे, यह अत्यन्त दुष्कर जान पड़ता है। पुत्रों-सहित धृतराष्ट्र (इनके स्वत्वरूप) जिस राज्यमें आसक्त होकर उसे लेनेकी इच्छा करते हैं, उसके लिये इन कौरव-पाण्डवोंमें कलह कैसे नहीं बढ़ेगा? ॥ ३ ॥ न त्वं धर्मं विचारं संजयेह मत्तश्च जानासि युधिष्ठिराच्च । अथो कस्मात् संजय पाण्डवस्य उत्साहिनः पूरयतः स्वकर्म ॥ ४ ॥ यथाऽऽख्यातमावसतः कुटुम्बे पुरा कस्मात् साधुविलोपमात्थ । अस्मिन् विधौ वर्तमाने यथाव- दुच्चावचा मतयो ब्राह्मणानाम् ॥ ५ ॥ संजय! तुम यह अच्छी तरह जानते हो कि मुझसे और युधिष्ठिरसे धर्मका लोप नहीं हो सकता, तो भी जो उत्साहपूर्वक स्वधर्मका पालन करते हैं तथा शास्त्रोंमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार ही कुटुम्ब (गृहस्थाश्रम)-में रहते हैं, उन्हीं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके धर्मलोपकी चर्चा या आशंका तुमने पहले किस आधारपर की है? गृहस्थ आश्रममें रहनेकी जो शास्त्रोक्त विधि है, उसके होते हुए भी इसके ग्रहण अथवा त्यागके विषयमें वेदज्ञ ब्राह्मणोंके भिन्न-भिन्न विचार हैं ॥ ४-५ ॥ कर्मणाऽऽहुः सिद्धिमेके परत्र हित्वा कर्म विद्यया सिद्धिमेके । नाभुञ्जानो भक्ष्यभोज्यस्य तृप्येद् विद्वानपीह विहितं ब्राह्मणानाम् ॥ ६ ॥ कोई तो (गृहस्थाश्रममें रहकर) कर्मयोगके द्वारा ही परलोकमें सिद्धि-लाभ होनेकी बात बताते हैं,* दूसरे लोग कर्मको त्यागकर ज्ञानके द्वारा ही सिद्धि (मोक्ष)-का प्रतिपादन करते हैं।

अध्याय (पृष्ठ 200)

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आकाशचारी भगवान् सूर्यदेव