महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
‘जिस महाबाहु वीरके पास पहले सुन्दरी स्त्रियाँ बैठा करती थीं, वही आज युद्धभूमिमें पड़ा होगा और उसके आस-पास सियारिनें बैठी होंगी; यह सब कैसे सम्भव हुआ?’ ।। ७ ।।
योऽस्तूयत पुरा हृष्टैः सूतमागधवन्दिभिः ।
सोऽद्य क्रव्याद्गणैर्घोरैर्विनदद्भिरुपास्यते ।। ८ ।।
‘पहले हर्षमें भरे हुए सूत, मागध और वन्दीजन जिसकी स्तुति किया करते थे, उसीकी आज विकट गर्जना करते हुए भयंकर मांसभक्षी जन्तुओंके समुदाय उपासना करते होंगे ।। ८ ।।
पाण्डवेषु च नाथेषु वृष्णिवीरेषु वा विभो ।
पञ्चालेषु च वीरेषु हतः केनास्यनाथवत् ।। ९ ।।
‘शक्तिशाली पुत्र! तुम्हारे रक्षक पाण्डवों, वृष्णिवीरों तथा पांचालवीरोंके होते हुए भी तुम्हें अनाथकी भाँति किसने मारा? ।। ९ ।।
अतृप्तदर्शना पुत्र दर्शनस्य तवानघ ।
मन्दभाग्या गमिष्यामि व्यक्तमद्य यमक्षयम् ।। १० ।।
‘बेटा! तुम्हें देखनेके लिये मेरी आँखें तरस रही हैं, इनकी प्यास नहीं बुझी। अनघ! कितनी मन्दभागिनी हूँ। निश्चय ही आज मैं यमलोकको चली जाऊँगी ।। १० ।।
विशालाक्षं सुकेशान्तं चारुवाक्यं सुगन्धि च ।
तव पुत्र कदा भूयो मुखं द्रक्ष्यामि निर्व्रणम् ।। ११ ।।
‘वत्स! बड़े-बड़े नेत्र, सुन्दर केशप्रान्त, मनोहर वाक्य और उत्तम सुगंधसे युक्त तुम्हारा घावरहित सुन्दर मुख मैं फिर कब देख पाऊँगी? ।। ११ ।।
धिक् बलं भीमसेनस्य धिक् पार्थस्य धनुष्मताम् ।
धिक् वीर्यं वृष्णिवीराणां पञ्चालानां च धिग् बलम् ।। १२ ।।
‘भीमसेनके बलको धिक्कार है, अर्जुनके धनुष-धारणको धिक्कार है, वृष्णिवंशी वीरोंके पराक्रमको धिक्कार है तथा पांचालोंके बलको भी धिक्कार है! ।।
धिक्केकयांस्तथा चेदीन् मत्स्यांश्चैवाथ सृञ्जयान् ।
ये त्वां रणगतं वीरं न शेकुरभिरक्षितुम् ।। १३ ।।
‘केकय, चेदि तथा मत्स्यदेशके वीरों और सृंजयवंशी क्षत्रियोंको भी धिक्कार है, जो युद्धमें गये हुए तुम-जैसे वीरकी रक्षा न कर सके ।। १३ ।।
अद्य पश्यामि पृथिवीं शून्यामिव हतत्विषम् ।
अभिमन्युमपश्यन्ती शोकव्याकुललोचना ।। १४ ।।
‘अभिमन्युको न देखनेके कारण मेरे नेत्र शोकसे व्याकुल हो रहे हैं। आज मुझे सारी पृथ्वी सूनी एवं कान्तिहीन-सी दिखायी देती है ।। १४ ।।
स्वस्त्रीयं वासुदेवस्य पुत्रं गाण्डीवधन्वनः ।
कथं त्वातिरथं वीरं द्रक्ष्याम्यद्य निपातितम् ॥ १५ ॥ 'वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके भानजे और गाण्डीवधारी अर्जुनके अतिरथी वीर पुत्र अभिमन्युको आज मैं धरतीपर पड़ा हुआ कैसे देख सकूँगी? ॥ १५ ॥
एह्येहि तृषितो वत्स स्तनौ पूर्णौ पिबाशु मे। अङ्कमारुह्य मन्दाया ह्यतृप्तायाश्च दर्शने ॥ १६ ॥ 'बेटा! आओ, आओ। तुम्हें प्यास लगी होगी। तुम्हें देखनेके लिये प्यासी हुई मुझ अभागिनी माताकी गोदमें बैठकर मेरे दूधसे भरे हुए इन स्तनोंको शीघ्र पी लो ॥ १६ ॥
हा वीर दृष्टो नष्टश्च धनं स्वप्न इवासि मे। अहो ह्यनित्यं मानुष्यं जलबुद्बुदचञ्चलम् ॥ १७ ॥ 'हा वीर! तुम सपनेमें मिले हुए धनकी भाँति मुझे दिखायी दिये और नष्ट हो गये। अहो! यह मनुष्यजीवन पानीके बुलबुलेके समान चंचल एवं अनित्य है ॥ १७ ॥
इमां ते तरुणीं भार्यां तवाधिभिरभिप्लुताम्। कथं संधारयिष्यामि विवत्सामिव धेनुकाम् ॥ १८ ॥ 'बेटा! तुम्हारी यह तरुणी पत्नी तुम्हारे विरहशोकमें डूबी हुई है। जिसका बछड़ा खो गया हो, उस गायकी भाँति व्याकुल है। मैं इसे कैसे धीरज बँधाऊँगी? ॥ १८ ॥
(उत्तरामुत्तमां जात्या सुशीलां प्रियभाषिणीम्। शनकैः परिरभ्यैनां स्नुषां मम यशस्विनीम् ॥ सुकुमारीं विशालाक्षीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम्। बालपल्लवतन्वङ्गीं मत्तमातङ्गगामिनीम् ॥ बिम्बाधरोष्ठीमबलामभिमन्यो प्रहर्षय।) 'यह उत्तरा जातिसे उत्तम, सुशीला, प्रियभाषिणी, यशस्विनी तथा मेरी प्यारी बहू है। यह सुकुमारी है। इसके नेत्र बड़े-बड़े और मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति परम मनोहर है। इसके अंग नूतन पल्लवोंके समान कृश हैं। यह मतवाले हाथीके समान मन्दगतिसे चलनेवाली है। इसके ओठ बिम्बफलके समान लाल हैं। बेटा अभिमन्यु! तुम मेरी इस बहूको धीरे-धीरे हृदयसे लगाकर आनन्दित करो।
अहो ह्यकाले प्रस्थानं कृतवानसि पुत्रक। विहाय फलकाले मां सुगृद्धां तव दर्शने ॥ १९ ॥ 'अहो वत्स! जब पुत्रके होनेका फल मिलनेका समय आया है, तब तुम मुझे अपने दर्शनोंके लिये भी तरसती हुई छोड़कर असमयमें ही चल बसे ॥ १९ ॥
नूनं गतिः कृतान्तस्य प्राज्ञैरपि सुदुर्विदा। यत्र त्वं केशवे नाथे संग्रामेऽनाथवद्धतः ॥ २० ॥ 'निश्चय ही कालकी गति बड़े-बड़े विद्वानोंके लिये भी अत्यन्त दुर्बोध है, जिसके अधीन होकर तुम श्रीकृष्ण-जैसे संरक्षकके रहते हुए संग्रामभूमिमें अनाथकी भाँति मारे
गये ।। २० ।। यज्वनां दानशीलानां ब्राह्मणानां कृतात्मनाम् । चरितब्रह्मचर्याणां पुण्यतीर्थावगाहिनाम् ।। २१ ।। कृतज्ञानां वदान्यानां गुरुशुश्रूषिणामपि । सहस्रदक्षिणानां च या गतिस्तामवाप्नुहि ।। २२ ।। 'वत्स! यज्ञकर्ता, दानी, जितेन्द्रिय, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण, ब्रह्मचारी, पुण्यतीर्थोंमें नहानेवाले, कृतज्ञ, उदार, गुरुसेवा-परायण और सहस्रोंकी संख्यामें दक्षिणा देनेवाले धर्मात्मा पुरुषोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। या गतिर्युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । हत्वारीन् निहतानां च संग्रामे तां गतिं व्रज ।। २३ ।। 'संग्राममें युद्धतत्पर हो कभी पीछे पैर न हटानेवाले और शत्रुओंको मारकर मरनेवाले शूरवीरोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। २३ ।। गोसहस्रप्रदातॄणां क्रतुदानां च या गतिः । नैवेशिकं चाभिमतं ददतां या गतिः शुभा ।। २४ ।। 'सहस्र गोदान करनेवाले, यज्ञके लिये दान देनेवाले तथा मनके अनुरूप सब सामग्रियोंसहित निवासस्थान प्रदान करनेवाले पुरुषोंको जो शुभ गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। २४ ।। ब्राह्मणेभ्यः शरण्येभ्यो निधिं निदधतां च या । या चापि न्यस्तदण्डानां तां गतिं व्रज पुत्रक ।। २५ ।। 'जो शरणागतवत्सल ब्राह्मणोंके लिये निधि स्थापित करते हैं तथा किसी भी प्राणीको दण्ड नहीं देते, उन्हें जिस गतिकी प्राप्ति होती है, बेटा! वही गति तुम्हें भी प्राप्त हो ।। २५ ।। ब्रह्मचर्येण यां यान्ति मुनयः संशितव्रताः । एकपत्न्यश्च यां यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ।। २६ ।। 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनि ब्रह्मचर्यके द्वारा जिस गतिको पाते हैं और पतिव्रता स्त्रियोंको जिस गतिकी प्राप्ति होती है, बेटा! वही गति तुम्हें भी सुलभ हो ।। २६ ।। राज्ञां सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती । चतुराश्रमिणां पुण्यैः पावितानां सुरक्षितैः ।। २७ ।। दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् । पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ।। २८ ।। 'पुत्र! सदाचारके पालनसे राजाओंको तथा सुरक्षित पुण्यके प्रभावसे पवित्र हुए चारों आश्रमोंके लोगोंको जो सनातन गति प्राप्त होती है; दीनोंपर दया करनेवाले, उत्तम
वस्तुओंको घरमें बाँटकर उपयोगमें लेनेवाले तथा चुगलीसे दूर रहनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति तुम्हें भी मिले ।। २७-२८ ।। व्रतिनां धर्मशीलानां गुरुशुश्रूषिणामपि । अमोघातिथीनां या च तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ २९ ॥ 'वत्स! व्रतपरायण, धर्मशील, गुरुसेवक एवं अतिथिको निराश न लौटानेवाले लोगोंको जिस गतिकी प्राप्ति होती है, वह तुम्हें भी प्राप्त हो ।। २९ ।। कृच्छ्रेषु या धारयतामात्मानं व्यसनेषु च । गतिः शोकाग्निदग्धानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३० ॥ 'बेटा! जो लोग भारी-से-भारी कठिनाइयोंमें और संकटोंमें पड़नेपर तथा शोकाग्निसे दग्ध होनेपर भी धैर्य धारण करके अपने-आपको स्थिर रखते हैं, उन्हें मिलनेवाली गतिको तुम भी प्राप्त करो ।। ३० ।। मातापित्रोश्च शुश्रूषां कल्पयन्तीह ये सदा । स्वदारनिरतानां च या गतिस्तामवाप्नुहि ॥ ३१ ॥ 'जो सदा इस जगत्में माता-पिताकी सेवा करते हैं और अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखते हैं, उनकी जैसी गति होती है, वही तुम्हें भी प्राप्त हो ।। ३१ ।। ऋतुकाले स्वकां भार्यां गच्छतां या मनीषिणाम् । परस्त्रीभ्यो निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३२ ॥ 'पुत्र! ऋतुकालमें अपनी स्त्रीसे सहवास करते हुए परायी स्त्रियोंसे सदा दूर रहनेवाले मनीषी पुरुषोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। ३२ ।। साम्ना ये सर्वभूतानि पश्यन्ति गतमत्सराः । नारुंतुदानां क्षमिणां या गतिस्तामवाप्नुहि ॥ ३३ ॥ 'जो ईर्ष्या-द्वेषसे दूर रहकर समस्त प्राणियोंको समभावसे देखते हैं तथा जो किसीके मर्मस्थानको वाणीद्वारा चोट नहीं पहुँचाते एवं सबके प्रति क्षमाभाव रखते हैं, उनकी जो गति होती है, उसीको तुम भी प्राप्त करो ।। ३३ ।। मधुमांसनिवृत्तानां मदाद् दम्भात् तथानृतात् । परोपतापत्यक्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३४ ॥ 'पुत्र! जो मद्य और मांसका सेवन नहीं करते, मद, दम्भ और असत्यसे अलग रहते और दूसरोंको संताप नहीं देते हैं, उन्हें मिलनेवाली सद्गति तुम्हें भी प्राप्त हो ।। ३४ ।। ह्रीमन्तः सर्वशास्त्रज्ञा ज्ञानतृप्ता जितेन्द्रियाः । यां गतिं साधवो यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ॥ ३५ ॥ 'बेटा! सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता, लज्जाशील, ज्ञानसे परितृप्त, जितेन्द्रिय श्रेष्ठपुरुष जिस गतिको पाते हैं, उसीको तुम भी प्राप्त करो' ।। ३५ ।। एवं विलपतीं दीनां सुभद्रां शोककर्शिताम् ।
अन्वपद्यत पाञ्चाली वैराटीसहितां तदा ॥ ३६ ॥
इस प्रकार उत्तरासहित विलाप करती हुई दीन-दुःखी एवं शोकसे दुर्बल सुभद्राके पास उस समय द्रौपदी भी आ पहुँची ॥ ३६ ॥
ताः प्रकामं रुदित्वा च विलप्य च सुदुःखिताः ।
उन्मत्तवत् तदा राजन् विसंज्ञान्यपतन् क्षितौ ॥ ३७ ॥
राजन्! वे सब-की-सब अत्यन्त दुःखी हो इच्छानुसार रोती और विलाप करती हुई पगली-सी हो गयीं और मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ ३७ ॥
सोपचारस्तु कृष्णश्च दुःखितां भृशदुःखितः ।
सिक्त्वाम्भसा समाश्वास्य तत्तदुक्त्वा हितं वचः ॥ ३८ ॥
विसंज्ञकल्पां रुदतीं मर्मविद्धां प्रवेपतीम् ।
भगिनीं पुण्डरीकाक्ष इदं वचनमब्रवीत् ॥ ३९ ॥
तब कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त दुःखी हो उन सबको होशमें लानेके लिये उपचार करने लगे। उन्होंने अपनी दुःखिनी बहिन सुभद्रापर जल छिड़ककर नाना प्रकारके हितकर वचन कहते हुए उसे आश्वासन दिया। पुत्र-शोकसे मर्माहत हो वह रोती हुई काँप रही थी और अचेत-सी हो गयी थी। उस अवस्थामें भगवान्ने उससे कहा— ॥ ३८-३९ ॥
सुभद्रे मा शुचः पुत्रं पाञ्चाल्याश्वासयोत्तराम् ।
गतोऽभिमन्युः प्रथितां गतिं क्षत्रियपुङ्गवः ॥ ४० ॥
'सुभद्रे! तुम पुत्रके लिये शोक न करो। द्रुपदकुमारी! तुम उत्तराको धीरज बँधाओ। वह क्षत्रियशिरोमणि सर्वश्रेष्ठ गतिको प्राप्त हुआ है ॥ ४० ॥
ये चान्येऽपि कुले सन्ति पुरुषा नो वरानने ।
सर्वे ते तां गतिं यान्तु ह्यभिमन्योर्यशस्विनः ॥ ४१ ॥
'सुमुखि! हमारी इच्छा तो यह है कि हमारे कुलमें और भी जितने पुरुष हैं, वे सब यशस्वी अभिमन्युकी ही गति प्राप्त करें' ॥ ४१ ॥
कुर्याम तद् वयं कर्म क्रियासु सुहृदश्च नः ।
कृतवान् यादृगद्यैकस्तव पुत्रो महारथः ॥ ४२ ॥
'तुम्हारे महारथी पुत्रने अकेले ही आज जैसा पराक्रम किया है, उसे हम और हमारे सुहृद् भी कार्यरूपमें परिणत करें' ॥ ४२ ॥
एवमाश्वास्य भगिनीं द्रौपदीमपि चोत्तराम् ।
पार्थस्यैव महाबाहुः पार्श्वमागादरिंदमः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार अपनी बहिन सुभद्रा, उत्तरा तथा द्रौपदीको आश्वासन देकर शत्रुदमन महाबाहु श्रीकृष्ण पुनः अर्जुनके ही पास चले आये ॥ ४३ ॥
ततोऽभ्यनुज्ञाय नृपान् कृष्णो बन्धूंस्तथार्जुनम् ।
विवेशान्तःपुरे राजंस्ते च जग्मुर्यथालयम् ॥ ४४ ॥
राजन्! तदनन्तर श्रीकृष्ण राजाओं, बन्धुजनों तथा अर्जुनसे अनुमति ले अन्तःपुरमें गये और वे राजालोग भी अपने-अपने शिविरमें चले गये ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि सुभद्राप्रविलापे अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें सुभद्रा-विलापविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४६ १/३ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 518)
एकोनाशीतितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका अर्जुनकी विजयके लिये रात्रिमें भगवान् शिवका पूजन करवाना, जागते हुए पाण्डव-सैनिकोंकी अर्जुनके लिये शुभाशंसा तथा अर्जुनकी सफलताके लिये श्रीकृष्णके दारुकके प्रति उत्साहभरे वचन
संजय उवाच
ततोऽर्जुनस्य भवनं प्रविश्याप्रतिमं विभुः ।
स्पृष्ट्वाम्भः पुण्डरीकाक्षः स्थण्डिले शुभलक्षणे ॥ १ ॥
संतस्तार शुभां शय्यां दर्भैर्वैदूर्यसंनिभैः ।
ततो माल्येन विधिवल्लाजैर्गन्धैः सुमङ्गलैः ॥ २ ॥
अलंचकार तां शय्यां परिवार्यायधोत्तमैः ।
ततः स्पृष्टोदके पार्थे विनीताः परिचारकाः ॥ ३ ॥
दर्शयन्तोऽन्तिके चक्रुर्नैशं त्र्यम्बकं बलिम् ।
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके अनुपम भवनमें प्रवेश करके जलका स्पर्श किया और शुभ लक्षणोंसे युक्त वेदीपर वैदूर्यमणिके सदृश कुशोंकी सुन्दर शय्या बिछायी। तत्पश्चात् विधिपूर्वक परम मंगलकारी अक्षत, गन्ध एवं पुष्पमाला आदिसे उस शय्याको सजाया। उसके चारों ओर उत्तम आयुध रख दिये। इसके बाद जब अर्जुन आचमन कर चुके, तब विनीत (सुशिक्षित) परिचारकोंने उन्हें दिखाते हुए उनके निकट ही भगवान् शंकरका निशीथ-पूजन किया ॥ १—३ ½ ॥
ततः प्रीतमनाः पार्थो गन्धमाल्यैश्च माधवम् ॥ ४ ॥
अलंकृत्योपहारं तं नैशं तस्मै न्यवेदयत् ।
स्मयमानस्तु गोविन्दः फाल्गुनं प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने प्रसन्नचित्त होकर श्रीकृष्णको गन्ध और मालाओंसे अलंकृत करके रात्रिका वह सारा उपहार उन्हींको समर्पित किया। तब मुसकराते हुए भगवान् गोविन्द अर्जुनसे बोले— ॥ ४-५ ॥
सुप्यतां पार्थ भद्रं ते कल्याणाय व्रजाम्यहम् ।
स्थापयित्वा ततो द्वाःस्थान् गोप्तूंश्चात्तायुधान् नरान् ॥ ६ ॥
दारुकानुगतः श्रीमान् विवेश शिबिरं स्वकम् ।
‘कुन्तीकुमार! तुम्हारा कल्याण हो। अब शयन करो। मैं तुम्हारे कल्याण-साधनके लिये ही जा रहा हूँ’ ऐसा कहकर वहाँ अस्त्र-शस्त्र लिये हुए मनुष्योंको द्वारपाल एवं रक्षक नियुक्त करके भगवान् श्रीकृष्ण दारुकके साथ अपने शिविरमें चले गये॥ ६१/२॥
शिश्ये च शयने शुभ्रे बहुकृत्यं विचिन्तयन् ॥ ७ ॥
पार्थाय सर्वं भगवान् शोकदुःखपहं विधिम् ।
व्यदधात् पुण्डरीकाक्षस्तेजोद्युतिविवर्धनम् ॥ ८ ॥
योगमास्थाय युक्तात्मा सर्वेषामीश्वरेश्वरः ।
श्रेयस्कामः पृथुयशा विष्णुर्जिष्णुप्रियंकरः ॥ ९ ॥
वहाँ बहुत-से कार्योंका चिन्तन करते हुए उन्होंने शुभ्र शय्यापर शयन किया। कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण सबके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं। उनका यश महान् है। वे विष्णुरूप गोविन्द अर्जुनका प्रिय करनेवाले हैं और सदा उनके कल्याणकी कामना रखते हैं। उन युक्तात्मा श्रीहरिने उत्तम योगका आश्रय ले अर्जुनके लिये वह सारा विधि-विधान सम्पन्न किया, जो उनके शोक और दुःखको दूर करनेवाला तथा तेज और कान्तिको बढ़ानेवाला था॥ ७—९॥
न पाण्डवानां शिबिरे कश्चित् सुष्वाप तां निशाम् ।
प्रजागरः सर्वजनं ह्याविवेश विशाम्पते ॥ १० ॥
राजन्! उस रातमें पाण्डवोंके शिविरमें कोई नहीं सोया। सब लोगोंमें जागरणका आवेश हो गया था॥ १०॥
पुत्रशोकाभितप्तेन प्रतिज्ञातो महात्मना ।
सहसा सिन्धुराजस्य वधो गाण्डीवधन्वना ॥ ११ ॥
तत् कथं नु महाबाहुर्वासविः परवीरहा ।
प्रतिज्ञां सफलां कुर्यादिति ते समचिन्तयन् ॥ १२ ॥
सब लोग इसी चिन्तामें पड़े थे कि पुत्रशोकसे संतप्त हुए गाण्डीवधारी महामना अर्जुनने सहसा सिंधुराज जयद्रथके वधकी प्रतिज्ञा कर ली है। शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वे महाबाहु इन्द्रकुमार अपनी उस प्रतिज्ञाको कैसे सफल करेंगे? ॥ ११-१२॥
कष्टं हीदं व्यवसितं पाण्डवेन महात्मना ।
पुत्रशोकाभितप्तेन प्रतिज्ञा महती कृता ॥ १३ ॥
स च राजा महावीर्यः पारयत्वर्जुनः स ताम् ।
भ्रातरश्चापि विक्रान्ता बहुलानि बलानि च ॥ १४ ॥
महामना पाण्डवने यह बड़ा कष्टप्रद निश्चय किया है। उन्होंने पुत्रशोकसे संतप्त होकर बड़ी भारी प्रतिज्ञा कर ली है। उधर राजा जयद्रथका पराक्रम भी महान् है। तथापि अर्जुन अपनी उस प्रतिज्ञाको पूरी कर लेंगे; क्योंकि उनके भाई भी बड़े पराक्रमी हैं और उनके पास सेनाएँ भी बहुत हैं॥ १३-१४॥
धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण सर्वं तस्मै निवेदितम् । स हत्वा सैन्धवं संख्ये पुनरेतु धनंजयः ॥ १५ ॥ धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने जयद्रथको सब बातें बता दी होंगी। अर्जुन युद्धमें सिंधुराज जयद्रथको मारकर पुनः सकुशल लौट आवें (यही हमारी शुभ कामना है) ॥ १५ ॥
जित्वा रिपुगणांश्चैव पारयत्वर्जुनो व्रतम् । श्वोऽहत्वा सिन्धुराजं वै धूमकेतुं प्रवेक्ष्यति ॥ १६ ॥ न ह्यसावनृतं कर्तुमलं पार्थो धनंजयः । धर्मपुत्रः कथं राजा भविष्यति मृतेऽर्जुने ॥ १७ ॥ अर्जुन शत्रुओंको जीतकर अपना व्रत पूरा करें। यदि वे कल सिंधुराजको न मार सके तो अग्निमें प्रवेश कर जायेंगे। कुन्तीकुमार धनंजय अपनी बात झूठी नहीं कर सकते। यदि अर्जुन मर गये तो धर्मपुत्र युधिष्ठिर कैसे राजा होंगे? ॥ १६-१७ ॥
तस्मिन् हि विजयः कृत्स्नः पाण्डवेन समाहितः । यदि नोऽस्ति कृतं किञ्चिद् यदि दत्तं हुतं यदि ॥ १८ ॥ फलेन तस्य सर्वस्य सव्यसाची जयत्वरीन् । पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने अर्जुनपर ही सारा विजयका भार रख दिया। यदि हमलोगोंका किया हुआ कुछ भी सत्कर्म शेष हो, यदि हमने दान और होम किये हों तो हमारे उन सभी शुभकर्मोंके फलसे सव्यसाची अर्जुन अपने शत्रुओंपर विजय प्राप्त करें ॥ १८ १/२ ॥
एवं कथयतां तेषां जयमाशंसतां प्रभो ॥ १९ ॥ कृच्छ्रेण महता राजन् रजनी व्यत्यवर्तत । राजन्! प्रभो! इस प्रकार बातें करते और अर्जुनकी विजय चाहते हुए उन सभी सैनिकोंकी वह रात्रि महान् कष्टसे बीती थी ॥ १९ १/२ ॥
तस्यां रजन्यां मध्ये तु प्रतिबुद्धो जनार्दनः ॥ २० ॥ स्मृत्वा प्रतिज्ञां पार्थस्य दारुकं प्रत्यभाषत । भगवान् श्रीकृष्ण उस रात्रिके मध्यकालमें जाग उठे और अर्जुनकी प्रतिज्ञाको स्मरण करके दारुकसे बोले— ॥ २० १/२ ॥
अर्जुनेन प्रतिज्ञातमार्तेन हतबन्धुना ॥ २१ ॥ जयद्रथं वधिष्यामि श्वोभूत इति दारुक । ‘दारुक! अपने पुत्र अभिमन्युके मारे जानेसे शोकार्त होकर अर्जुनने यह प्रतिज्ञा कर ली है कि मैं कल जयद्रथका वध कर डालूँगा' ॥ २१ १/२ ॥
तत्तु दुर्योधनः श्रुत्वा मन्त्रिभिर्मन्त्रयिष्यति ॥ २२ ॥ यथा जयद्रथं पार्थो न हन्यादिति संयुगे ।
'यह सब सुनकर दुर्योधन अपने मन्त्रियोंके साथ ऐसी मन्त्रणा करेगा' जिससे अर्जुन समरभूमिमें जयद्रथको मार न सकें ।। २२ १/२ ।। अक्षौहिण्यो हि ताः सर्वा रक्षिष्यन्ति जयद्रथम् ।। २३ ।। द्रोणश्च सह पुत्रेण सर्वास्त्रविधिपारगः । 'वे सारी अक्षौहिणी सेनाएँ जयद्रथकी रक्षा करेंगी तथा सम्पूर्ण अस्त्र-विधिके पारंगत विद्वान् द्रोणाचार्य भी अपने पुत्र अश्वत्थामाके साथ उसकी रक्षामें रहेंगे ।। २३ १/२ ।। एको वीरः सहस्राक्षो दैत्यदानवदर्पहा ।। २४ ।। सोऽपि तं नोत्सहेताजौ हन्तुं द्रोणेन रक्षितम् । 'त्रिलोकीके एकमात्र वीर हैं सहस्रनेत्रधारी इन्द्र, जो दैत्यों और दानवोंके भी दर्पका दलन करनेवाले हैं; परंतु वे भी द्रोणाचार्यसे सुरक्षित जयद्रथको युद्धमें मार नहीं सकते ।। २४ १/२ ।। सोऽहं श्वस्तत् करिष्यामि यथा कुन्तीसुतोऽर्जुनः ।। २५ ।। अप्राप्तेऽस्तं दिनकरे हनिष्यति जयद्रथम् । 'अतः मैं कल वह उद्योग करूँगा, जिससे कुन्तीपुत्र अर्जुन सूर्यदेवके अस्त होनेसे पहले जयद्रथको मार डालेंगे ।। २५ १/२ ।। न हि दारा न मित्राणि ज्ञातयो न च बान्धवाः ।। २६ ।। कश्चिदन्यः प्रियतरः कुन्तीपुत्रान्ममार्जुनत् । 'मुझे स्त्री, मित्र, कुटुम्बीजन, भाई-बन्धु तथा दूसरा कोई भी कुन्तीपुत्र अर्जुनसे अधिक प्रिय नहीं है ।। २६ १/२ ।। अनर्जुनमिमं लोकं मुहूर्तमाप दारुक ।। २७ ।। उदीक्षितुं न शक्तोऽहं भविता न च तत् तथा । 'दारुक! मैं अर्जुनसे रहित इस संसारको दो घड़ी भी नहीं देख सकता। ऐसा हो ही नहीं सकता (कि मेरे रहते अर्जुनका कोई अनिष्ट हो) ।। २७ १/२ ।। अहं विजित्य तान् सर्वान् सहसा सहयद्विपान् ।। २८ ।। अर्जुनार्थे हनिष्यामि सकर्णान् ससुयोधनान् । 'मैं अर्जुनके लिये हाथी, घोड़े, कर्ण और दुर्योधनसहित उन समस्त शत्रुओंको जीतकर सहसा उनका संहार कर डालूँगा ।। २८ १/२ ।। श्वो निरीक्षन्तु मे वीर्यं त्रयो लोका महाहवे ।। २९ ।। धनंजयार्थे समरे पराक्रान्तस्य दारुक । 'दारुक! कलके महासमरमें तीनों लोक धनंजयके लिये युद्धमें पराक्रम प्रकट करते हुए मेरे बल और प्रभावको देखें ।। २९ १/२ ।। श्वो नरेन्द्रसहस्राणि राजपुत्रशतानि च ।। ३० ।।
साश्वद्विपरथान्याजौ विद्रविष्यमि दारुक।
‘दारुक! कल युद्धमें मैं सहस्रों राजाओं तथा सैकड़ों राजकुमारोंको उनके घोड़े, हाथी एवं रथोंसहित मार भगाऊँगा।। ३० १/२ ।।
श्वस्तां चक्रप्रमथितां द्रक्ष्यसे नृपवाहिनीम्।। ३१।।
मया क्रुद्धेन समरे पाण्डवार्थे निपातिताम्।
‘तुम कल देखोगे कि मैंने समरांगणमें कुपित होकर पाण्डुपुत्र अर्जुनके लिये सारी राजसेनाको चक्रसे चूर-चूर करके धरतीपर मार गिराया है।। ३१ १/२ ।।
श्वः सदेवाः सगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः।। ३२।।
ज्ञास्यन्ति लोकाः सर्वे मां सुहृदं सव्यसाचिनः।
‘कल देवता, गन्धर्व, पिशाच, नाग तथा राक्षस आदि समस्त लोक यह अच्छी तरह जान लेंगे कि मैं सव्यसाची अर्जुनका हितैषी मित्र हूँ।। ३२ १/२ ।।
यस्तं द्वेष्टि स मां द्वेष्टि यस्तं चानु स मामनु।। ३३।।
इति संकल्प्यतां बुद्ध्या शरीरार्द्धं ममार्जुन्ः।
‘जो अर्जुनसे द्वेष करता है, वह मुझसे द्वेष करता है और जो अर्जुनका अनुगामी है, वह मेरा अनुगामी है, तुम अपनी बुद्धिसे यह निश्चय कर लो कि अर्जुन मेरा आधा शरीर है।। ३३ १/२ ।।
यथा त्वं मे प्रभातायामस्यां निशि रथोत्तमम्।। ३४।।
कल्पयित्वा यथाशास्त्रमादाय व्रज संयतः।
‘कल प्रातःकाल तुम शास्त्रविधिके अनुसार मेरे उत्तम रथको सुसज्जित करके सावधानीके साथ लेकर युद्धस्थलमें चलना।। ३४ १/२ ।।
गदां कौमोदकीं दिव्यां शक्तिं चक्रं धनुः शरान्।। ३५।।
आरोप्य वै रथे सूत सर्वोपकरणानि च।
स्थानं च कल्पयित्वाथ रथोपस्थे ध्वजस्य मे।। ३६।।
वैनतेयस्य वीरस्य समरे रथशोभिनः।
‘सूत! कौमोदकी गदा, दिव्य शक्ति, चक्र, धनुष, बाण तथा अन्य सब आवश्यक सामग्रियोंको रथपर रखकर उसके पिछले भागमें समरांगणमें रथपर शोभा पानेवाले वीर विनतानन्दन गरुड़के चिह्नवाले ध्वजके लिये भी स्थान बना लेना।। ३५-३६ १/२ ।।
छत्रं जाम्बूनदैर्जालैरर्कज्वलनसप्रभैः।। ३७।।
विश्वकर्मकृतैर्दिव्यैरश्वानपि विभूषितान्।
बलाहकं मेघपुष्पं शैब्यं सुग्रीवमेव च।। ३८।।
युक्तान् वाजिवरान् यत्तः कवची तिष्ठ दारुक।
‘दारुक! साथ ही उसमें छत्र लगाकर अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले तथा विश्वकर्माके बनाये हुए दिव्य सुवर्णमय जालोंसे विभूषित मेरे चारों श्रेष्ठ घोड़ों—बलाहक, मेघपुष्प, शैब्य तथा सुग्रीवको जोत लेना और स्वयं भी कवच धारण करके तैयार रहना ।। ३७-३८ १/२ ।।
पाञ्चजन्यस्य निर्घोषमार्षभेणैव पूरितम् ।। ३९ ।। श्रुत्वा च भैरवं नादमुपेयास्त्वं जवेन माम् ।
‘पाञ्चजन्य शंखका ऋषभ स्वरसे बजाया हुआ शब्द और भयंकर कोलाहल सुनते ही तुम बड़े वेगसे मेरे पास पहुँच जाना ।। ३९ १/२ ।।
एकाह्नाहममर्षं च सर्वदुःखानि चैव ह ।। ४० ।। भ्रातुः पैतृष्वसेयस्य व्यपनेष्यामि दारुक ।
‘दारुक! मैं अपनी बुआजीके पुत्र भाई अर्जुनके सारे दुःख और अमर्षको एक ही दिनमें दूर कर दूँगा ।। ४० १/२ ।।
सर्वोपायैर्यतिष्यामि यथा बीभत्सुराहवे ।। ४१ ।। पश्यतां धार्तराष्ट्राणां हनिष्यति जयद्रथम् ।
‘सभी उपायोंसे ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे अर्जुन युद्धमें धृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते-देखते जयद्रथको मार डालें’ ।।
यस्य यस्य च बीभत्सुर्वधे यत्नं करिष्यति । आशंसे सारथे तत्र भवितास्य ध्रुवो जयः ।। ४२ ।।
‘सारथे! कल अर्जुन जिस-जिस वीरके वधका प्रयत्न करेंगे, मैं आशा करता हूँ, वहाँ-वहाँ उनकी निश्चय ही विजय होगी’ ।। ४२ ।।
दारुक उवाच
जय एव ध्रुवस्तस्य कुत एव पराजयः । यस्य त्वं पुरुषव्याघ्र सारथ्यमुपजग्मिवान् ।। ४३ ।।
दारुक बोला— पुरुषसिंह! आप जिनके सारथि बने हुए हैं, उनकी विजय तो निश्चित है ही। उनकी पराजय कैसे हो सकती है? ।। ४३ ।।
एवं चैतत् करिष्यामि यथा मामनुशाससि । सुप्रभातामिमां रात्रिं जयाय विजयस्य हि ।। ४४ ।।
अर्जुनकी विजयके लिये कल सबेरे जो कुछ करनेकी आप मुझे आज्ञा देते हैं, उसे उसी रूपमें मैं अवश्य पूर्ण करूँगा ।। ४४ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि प्रतिज्ञापर्वणि कृष्णदारुकसम्भाषणे एकोनाशीतितमोऽध्यायः ।। ७९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत प्रतिज्ञापर्वमें श्रीकृष्ण और दारुककी बातचीतविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७९ ।।
अध्याय (पृष्ठ 525)
अशीतितमोऽध्यायः
अर्जुनका स्वप्नमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ शिवजीके समीप जाना और उनकी स्तुति करना
संजय उवाच
कुन्तीपुत्रस्तु तं मन्त्रं स्मरन्नेव धनंजयः ।
प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन् मुमोहाचिन्त्यविक्रमः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! इधर अचिन्त्य पराक्रमशाली कुन्तीपुत्र अर्जुन अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये (वनवासकालमें व्यासजीके बताये हुए शिवसम्बन्धी) मन्त्रका चिन्तन करते-करते नींदसे मोहित हो गये ॥ १ ॥
तं तु शोकेन संतप्तं स्वप्ने कपिवरध्वजम् ।
आससाद महातेजा ध्यायन्तं गरुडध्वजः ॥ २ ॥
उस समय स्वप्नमें महातेजस्वी गरुड़ध्वज भगवान् श्रीकृष्ण शोकसंतप्त हो चिन्तामें पड़े हुए कपिध्वज अर्जुनके पास आये ॥ २ ॥
प्रत्युत्थानं च कृष्णस्य सर्वावस्थो धनंजयः ।
न लोपयति धर्मात्मा भक्त्या प्रेम्णा च सर्वदा ॥ ३ ॥
धर्मात्मा धनंजय किसी भी अवस्थामें क्यों न हों, सदा प्रेम और भक्तिके साथ खड़े होकर श्रीकृष्णका स्वागत करते थे। अपने इस नियमका वे कभी लोप नहीं होने देते थे ॥ ३ ॥
प्रत्युत्थाय च गोविन्दं स तस्मा आसनं ददौ ।
न चासने स्वयं बुद्धिं बीभत्सुर्व्यदधात् तदा ॥ ४ ॥
अर्जुनने खड़े होकर गोविन्दको बैठनेके लिये आसन दिया और स्वयं उस समय किसी आसनपर बैठनेका विचार उन्होंने नहीं किया ॥ ४ ॥
ततः कृष्णो महातेजा जानन् पार्थस्य निश्चयम् ।
कुन्तीपुत्रमिदं वाक्यमासीनः स्थितमब्रवीत् ॥ ५ ॥
तब महातेजस्वी श्रीकृष्ण पार्थके इस निश्चयको जानकर अकेले ही आसनपर बैठ गये और खड़े हुए कुन्तीकुमारसे इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
मा विषादे मनः पार्थ कृथाः कालो हि दुर्जयः ।
कालः सर्वाणि भूतानि नियच्छति परे विधौ ॥ ६ ॥
'कुन्तीनन्दन! तुम अपने मनको विषादमें न डालो; क्योंकि कालपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है। काल ही समस्त प्राणियोंको विधाताके अवश्यम्भावी विधानमें प्रवृत्त कर
देता है ।। ६ ।। किमर्थं च विषादस्ते तद् ब्रूहि द्विपदां वर । न शोच्यं विदुषां श्रेष्ठ शोकः कार्यविनाशनः ।। ७ ।। ‘मनुष्योंमें श्रेष्ठ अर्जुन! बताओ तो सही, तुम्हें किसलिये विषाद हो रहा है? विद्वद्वर! तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये; क्योंकि शोक समस्त कर्मोंका विनाश करनेवाला है ।। ७ ।। यत् तु कार्यं भवेत् कार्यं कर्मणा तत् समाचर । हीनचेष्टस्य यः शोकः स हि शत्रुर्धनंजय ।। ८ ।। ‘जो कार्य करना हो, उसे प्रयत्नपूर्वक करो। धनंजय! उद्योगहीन मनुष्यका जो शोक है, वह उसके लिये शत्रुके समान है ।। ८ ।। शोचन् नन्दयते शत्रून् कर्शयत्यपि बान्धवान् । क्षीयते च नरस्तस्मान्न त्वं शोचितुमर्हसि ।। ९ ।। ‘शोक करनेवाला पुरुष अपने शत्रुओंको आनन्दित करता और बन्धु-बान्धवोंको दुःखसे दुर्बल बनाता है। इसके सिवा वह स्वयं भी शोकके कारण क्षीण होता जाता है। अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये’ ।। ९ ।। इत्युक्तो वासुदेवेन बीभत्सुरपराजितः । आबभाषे तदा विद्वानिदं वचनमर्थवत् ।। १० ।। वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर किसीसे पराजित न होनेवाले विद्वान् अर्जुनने यह अर्थयुक्त वचन उस समय कहा— ।। १० ।। मया प्रतिज्ञा महती जयद्रथवधे कृता । श्वोऽस्मि हन्ता दुरात्मानं पुत्रघ्नमिति केशव ।। ११ ।। ‘केशव! मैंने जयद्रथ-वधके लिये यह भारी प्रतिज्ञा कर ली है कि कल मैं अपने पुत्रके घातक दुरात्मा सिंधुराजको अवश्य मार डालूँगा ।। ११ ।। मत्प्रतिज्ञाविघातार्थं धार्तराष्ट्रैः किलाच्युत । पृष्ठतः सैन्धवः कार्यः सर्वैर्गुप्तो महारथैः ।। १२ ।। ‘परंतु अच्युत! धृतराष्ट्र-पक्षके सभी महारथी मेरी प्रतिज्ञा भंग करनेके लिये सिंधुराजको निश्चय ही सबसे पीछे खड़े करेंगे और वह उन सबके द्वारा सुरक्षित होगा ।। दश चैका च ताः कृष्ण अक्षौहिण्यः सुदुर्जयाः । हतावशेषास्तत्रेमा हन्त माधव संख्यया ।। १३ ।। ताभिः परिवृतः संख्ये सर्वैश्चैव महारथैः । कथं शक्येत संद्रष्टुं दुरात्मा कृष्ण सैन्धवः ।। १४ ।। ‘माधव! श्रीकृष्ण! कौरवोंकी वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ, जो अत्यन्त दुर्जय हैं और उनमें मरनेसे बचे हुए जितने सैनिक विद्यमान हैं, उनसे तथा पूर्वोक्त सभी महारथियोंसे युद्धस्थलमें घिरे होनेपर दुरात्मा सिंधुराजको कैसे देखा जा सकता है? ।। १३-१४ ।।
प्रतिज्ञापारं चापि न भविष्यति केशव । प्रतिज्ञायां च हीनायां कथं जीवेत् मद्विधः ॥ १५ ॥ ‘केशव! ऐसी अवस्थामें प्रतिज्ञाकी पूर्ति नहीं हो सकेगी और प्रतिज्ञा भंग होनेपर मेरे-जैसा पुरुष कैसे जीवन धारण कर सकता है? ॥ १५ ॥
दुःखोपायस्य मे वीर विकाङ्क्षा परिवर्तते । द्रुतं च याति सविता तत एतद् ब्रवीम्यहम् ॥ १६ ॥ ‘वीर! अब इस कष्टसाध्य (जयद्रथवधरूपी कार्य)-की ओरसे मेरी अभिलाषा परिवर्तित हो रही है। इसके सिवा इन दिनों सूर्य जल्दी अस्त हो जाते हैं; इसलिये मैं ऐसा कह रहा हूँ' ॥ १६ ॥
शोकस्थानं तु तच्छ्रुत्वा पार्थस्य द्विजकेतनः । संस्पृश्याम्भस्ततः कृष्णः प्राङ्मुखः समवस्थितः ॥ १७ ॥ इदं वाक्यं महातेजा बभाषे पुष्करेक्षणः । हितार्थं पाण्डुपुत्रस्य सैन्धवस्य वधे कृती ॥ १८ ॥ अर्जुनके शोकका आधार क्या है, यह सुनकर महातेजस्वी विद्वान् गरुड़ध्वज कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण आचमन करके पूर्वाभिमुख होकर बैठे और पाण्डुपुत्र अर्जुनके हित तथा सिंधुराज जयद्रथके वधके लिये इस प्रकार बोले— ॥ १७-१८ ॥
पार्थ पाशुपतं नाम परमास्त्रं सनातनम् । येन सर्वान् मृधे दैत्यान् जघ्ने देवो महेश्वरः ॥ १९ ॥ ‘पार्थ! पाशुपत नामक एक परम उत्तम सनातन अस्त्र है, जिससे युद्धमें भगवान् महेश्वरने समस्त दैत्योंका वध किया था ॥ १९ ॥
यदि तद् विदितं तेऽद्य श्वो हन्तासि जयद्रथम् । अथाज्ञातं प्रपद्यस्व मनसा वृषभध्वजम् ॥ २० ॥ तं देवं मनसा ध्यात्वा जोषमास्व धनंजय । ततस्तस्य प्रसादात् त्वं भक्तः प्राप्स्यसि तन्महत् ॥ २१ ॥ ‘यदि वह अस्त्र आज तुम्हें विदित हो तो तुम अवश्य कल जयद्रथको मार सकते हो और यदि तुम्हें उसका ज्ञान न हो तो मन-ही-मन भगवान् वृषभध्वज (शिव)-की शरण लो। धनंजय! तुम मनमें उन महादेवजीका ध्यान करते हुए चुपचाप बैठ जाओ। तब उनके दया-प्रसादसे तुम उनके भक्त होनेके कारण उस महान् अस्त्रको प्राप्त कर लोगे' ॥ २०-२१ ॥
ततः कृष्णवचः श्रुत्वा संस्पृश्याम्भो धनंजयः । भूमावासीन एकाग्रो जगाम मनसा भवम् ॥ २२ ॥ भगवान् श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर अर्जुन जलका आचमन करके धरतीपर एकाग्र होकर बैठ गये और मनसे महादेवजीका चिन्तन करने लगे ॥ २२ ॥
ततः प्रणिहितो ब्राह्मे मुहूर्ते शुभलक्षणे ।
आत्मानमर्जुनोऽपश्यद् गगने सहकेशवम् ॥ २३ ॥
तब शुभ लक्षणोंसे युक्त ब्राह्म मुहूर्तमें ध्यानस्थ होनेपर अर्जुनने अपने-आपको भगवान् श्रीकृष्णके साथ आकाशमें जाते देखा ॥ २३ ॥
पुण्यं हिमवतः पादं मणिमन्तं च पर्वतम् ।
ज्योतिर्भिंश्च समाकीर्णं सिद्धचारणसेवितम् ॥ २४ ॥
पवित्र हिमालयके शिखर तथा तेजःपुंजसे व्याप्त एवं सिद्धों और चारणोंसे सेवित मणिमान् पर्वतको भी देखा ॥ २४ ॥
वायुवेगगतिः पार्थः खं भेजे सहकेशवः ।
केशवेन गृहीतः स दक्षिणे विभुना भुजे ॥ २५ ॥
उस समय अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णके साथ वायुवेगके समान तीव्रगतिसे आकाशमें बहुत ऊँचे उठ गये। भगवान् केशवने उनकी दाहिनी बाँह पकड़ रखी थी ॥ २५ ॥
प्रेक्षमाणो बहून् भावान् जगामाद्भुतदर्शनान् ।
उदीच्यां दिशि धर्मात्मा सोऽपश्यच्छ्वेतपर्वतम् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् धर्मात्मा अर्जुनने अद्भुत दिखायी देनेवाले बहुत-से पदार्थोंको देखते हुए क्रमशः उत्तर-दिशामें जाकर श्वेत पर्वतका दर्शन किया ॥ २६ ॥
कुबेरस्य विहारे च नलिनीं पद्मभूषिताम् ।
सरिच्छ्रेष्ठां च तां गङ्गां वीक्षमाणो बहुदकाम् ॥ २७ ॥
इसके बाद उन्होंने कुबेरके उद्यानमें कमलोंसे विभूषित सरोवर तथा अगाध जलराशिसे भरी हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाका अवलोकन किया ॥ २७ ॥
सदा पुष्पफलैर्वृक्षैरुपेतं स्फटिकोपलाम् ।
सिंहव्याघ्रसमाकीर्णां नानामृगसमाकुलाम् ॥ २८ ॥
गंगाके तटपर स्फटिकमणिमय पत्थर सुशोभित होते थे। सदा फूल और फलोंसे भरे हुए वृक्षसमूह वहाँकी शोभा बढ़ा रहे थे। गंगाके उस तटप्रान्तमें बहुत-से सिंह और व्याघ्र विचरण करते थे। नाना प्रकारके मृग वहाँ सब ओर भरे हुए थे ॥ २८ ॥
पुण्याश्रमवतीं रम्यां मनोज्ञाण्डजसेविताम् ।
मन्दरस्य प्रदेशांश्च किन्नरोद्गीतनादितान् ॥ २९ ॥
अनेक पवित्र आश्रमोंसे युक्त और मनोहर पक्षियोंसे सेवित रमणीय गंगानदीका दर्शन करते हुए आगे बढ़नेपर उन्हें मन्दराचलके प्रदेश दिखायी दिये, जो किन्नरोंके उच्चस्वरसे गाये हुए मधुर गीतोंसे मुखरित हो रहे थे ॥ २९ ॥
हेमरूप्यमयैः शृङ्गर्ना नौषधिविदीपितान् ।
तथा मन्दारवृक्षैश्च पुष्पितैरुपशोभितान् ॥ ३० ॥
सोने और चाँदीके शिखर तथा फूलोंसे भरे हुए पारिजातके वृक्ष उन पर्वतीय प्रान्तोंकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा भाँति-भाँतिकी तेजोमयी ओषधियाँ वहाँ अपना प्रकाश फैला रही
थीं ।। ३० ।। स्निग्धाञ्जनचयाकारं सम्प्राप्तः कालपर्वतम् । ब्रह्मतुङ्गं नदीश्चान्यास्तथा जनपदानपि ।। ३१ ।। वे क्रमशः आगे बढ़ते हुए स्निग्ध कज्जलराशिके समान आकारवाले काल पर्वतके समीप जा पहुँचे। फिर ब्रह्मतुंग पर्वत, अन्यान्य नदियों तथा बहुत-से जनपदोंको भी उन्होंने देखा ।। ३१ ।।
स तुङ्गं शतशृङ्गं च शर्यातिवनमेव च । पुण्यमश्वशिरःस्थानं स्थानमाथर्वणस्य च ।। ३२ ।। वृषदंशं च शैलेन्द्रं महामन्दरमेव च । अप्सरोभिः समाकीर्णं किन्नरैश्चोपशोभितम् ।। ३३ ।। तदनन्तर क्रमशः उच्चतम शतशृंग, शर्यातिवन, पवित्र अश्वशिरःस्थान, आथर्वण मुनिका स्थान और गिरिराज वृषदंशका अवलोकन करते हुए वे महा-मन्दराचलपर जा पहुँचे, जो अप्सराओंसे व्याप्त और किन्नरोंसे सुशोभित था ।। ३२-३३ ।।
तस्मिन् शैले व्रजन् पार्थः सकृष्णः समवैक्षत । शुभैः प्रस्रवणैर्जुष्टां हेमधातुविभूषिताम् ।। ३४ ।। चन्द्ररश्मिप्रकाशाङ्गीं पृथिवीं पुरमालिनीम् । उस पर्वतके ऊपरसे जाते हुए श्रीकृष्णसहित अर्जुनने नीचे देखा कि नगरों एवं गाँवोंके समुदायसे सुशोभित, सुवर्णमय धातुओंसे विभूषित तथा सुन्दर झरनोंसे युक्त पृथ्वीके सम्पूर्ण अंग चन्द्रमाकी किरणोंसे प्रकाशित हो रहे हैं ।। ३४ १/२ ।।
समुद्रांश्चाद्भुताकारानपश्यद् बहुलाकरान् ।। ३५ ।। वियद् द्यां पृथिवीं चैव तथा विष्णुपदं व्रजन् । विस्मितः सह कृष्णेन क्षिप्तो बाण इवाभ्यगात् ।। ३६ ।। बहुत-से रत्नोंकी खानोंसे युक्त समुद्र भी अद्भुत आकारमें दृष्टिगोचर हो रहे थे। इस प्रकार पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आकाशका एक साथ दर्शन करके आश्चर्यचकित हुए अर्जुन श्रीकृष्णके साथ विष्णुपद (उच्चतम आकाश)-में यात्रा करने लगे। वे धनुषसे चलाये हुए बाणके समान आगे बढ़ रहे थे ।। ३५-३६ ।।
ग्रहनक्षत्रसोमानां सूर्याग्न्योश्च समत्विषम् । अपश्यत तदा पार्थो ज्वलन्तमिव पर्वतम् ।। ३७ ।। तदनन्तर कुन्तीकुमार अर्जुनने एक पर्वतको देखा, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। ग्रह, नक्षत्र, चन्द्रमा, सूर्य और अग्निके समान उसकी प्रभा सब ओर फैल रही थी ।। ३७ ।।
समासाद्य तु तं शैलं शैलाग्रे समवस्थितम् । तपोनित्यं महात्मानमपश्यद् वृषभध्वजम् ।। ३८ ।।
उस पर्वतपर पहुँचकर अर्जुनने उसके एक शिखरपर खड़े हुए नित्य तपस्यापरायण परमात्मा भगवान् वृषभध्वजका दर्शन किया ॥ ३८ ॥
सहस्रमिव सूर्याणां दीप्यमानं स्वतेजसा । शूलिनं जटिलं गौरं वल्कलाजिनवाससम् ॥ ३९ ॥
वे अपने तेजसे सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रहे थे। उनके हाथमें त्रिशूल, मस्तकपर जटा और श्रीअंगोंपर वल्कल एवं मृगचर्मके वस्त्र शोभा पा रहे थे। उनकी कान्ति गौरवर्णकी थी ॥ ३९ ॥
नयनानां सहस्रश्च विचित्राङ्गं महौजसम् । पार्वत्या सहितं देवं भूतसंघैश्च भास्वरैः ॥ ४० ॥
सहस्रों नेत्रोंसे युक्त उनके श्रीविग्रहकी विचित्र शोभा हो रही थी। वे तेजस्वी महादेव अपनी धर्मपत्नी पार्वतीजीके साथ विराजमान थे और तेजोमय शरीरवाले भूतोंके समुदाय उनकी सेवामें उपस्थित थे ॥ ४० ॥
गीतवादित्रसंनादैर्हास्यलास्यसमन्वितम् । वल्गितास्फोटितोत्क्रुष्टैः पुण्यैर्गन्धैश्च सेवितम् ॥ ४१ ॥
उनके सम्मुख गीतों और वाद्योंकी मधुर ध्वनि हो रही थी। हास्य-लास्य (नृत्य)-का प्रदर्शन किया जा रहा था। प्रमथगण उछल-कूदकर बाहें फैलाकर और उच्चस्वरसे बोल-बोलकर अपनी कलाओंसे भगवान्का मनोरंजन करते थे। उनकी सेवामें पवित्र, सुगन्धित पदार्थ प्रस्तुत किये गये थे ॥ ४१ ॥
अध्याय (पृष्ठ 531)
अर्जुनका स्वप्नदर्शन