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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

उन ऋषियोंकी यह बात सुनकर, भीमसेनके कथनपर विचार कर और रणभूमिमें धृष्टद्युम्नको सामने देखकर आचार्य द्रोणका मन उदास हो गया ॥ ४१ ॥

संदिह्यमानो व्यथितः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
अहतं वा हतं वेति पप्रच्छ सुतमात्मनः ॥ ४२ ॥
वे संदेहमें पड़े हुए थे, अतः उन्होंने व्यथित होकर अपने पुत्रके मारे जाने या नहीं मारे जानेका समाचार कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे पूछा ॥ ४२ ॥

स्थिरा बुद्धिर्हि द्रोणस्य न पार्थो वक्ष्यतेऽनृतम् ।
त्रयाणामपि लोकानामैश्वर्यार्थे कथञ्चन ॥ ४३ ॥
द्रोणाचार्यके मनमें यह दृढ़ विश्वास था कि कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर तीनों लोकोंके राज्यके लिये भी किसी प्रकार झूठ नहीं बोलेंगे ॥ ४३ ॥

तस्मात् तं परिपप्रच्छ नान्यं कञ्चिद् द्विजर्षभः ।
तस्मिंस्तस्य हि सत्याशा बाल्यात् प्रभृति पाण्डवे ॥ ४४ ॥
अतः उन द्विजश्रेष्ठने उन्हींसे वह बात पूछी, दूसरे किसीसे नहीं, क्योंकि बचपनसे ही पाण्डुपुत्रकी सच्चाईमें आचार्यका विश्वास था ॥ ४४ ॥

ततो निष्पाण्डवामुर्वी करिष्यन्तं युधां प्रतिम् ।
द्रोणं ज्ञात्वा धर्मराजं गोविन्दो व्यथितोऽब्रवीत् ॥ ४५ ॥
उस समय योद्धाओंमें श्रेष्ठ द्रोण इस पृथ्वीको पाण्डवरहित कर डालनेके लिये उद्यत थे। उनका यह विचार जानकर भगवान् श्रीकृष्णने व्यथित हो धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—॥ ४५ ॥

यद्यर्धदिवसं द्रोणो युध्यते मन्युमास्थितः ।
सत्यं ब्रवीमि ते सेना विनाशं समुपैष्यति ॥ ४६ ॥
‘राजन्! यदि क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्य आधे दिन भी युद्ध करते रहें तो मैं सच कहता हूँ, तुम्हारी सेनाका सर्वनाश हो जायगा ॥ ४६ ॥

स भवांस्त्रातु नो द्रोणात् सत्याज्ज्यायोऽनृतं वचः ।
अनृतं जीवितस्यार्थे वदन्न स्पृश्यतेऽनृतैः ॥ ४७ ॥
‘अतः तुम द्रोणसे हमलोगोंको बचाओ; इस अवसरपर असत्यभाषणका महत्त्व सत्यसे भी बढ़कर है। किसीकी प्राणरक्षाके लिये यदि कदाचित् असत्य बोलना पड़े तो उस बोलनेवालेको झूठका पाप नहीं लगता’ ॥ ४७ ॥

तयोः संवदतोरेवं भीमसेनोऽब्रवीदिदम् ॥ ४८ ॥
श्रुत्वैवं तु महाराज वधोपायं महात्मनः ।
गाहमानस्य ते सेनां मालवस्येन्द्रवर्मणः ॥ ४९ ॥
अश्वत्थामेति विख्यातो गजः शक्रगजोपमः ।
निहतो युधि विक्रम्य ततोऽहं द्रोणमब्रुवम् ॥ ५० ॥

अश्वत्थामा हतो ब्रह्मन्निवर्तस्वाहवादिति ।
नूनं नाश्रद्दधद् वाक्यमेष मे पुरुषर्षभः ॥ ५१ ॥
वे दोनों इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि भीमसेन बोल उठे—'महाराज! महामना द्रोणके वधका ऐसा उपाय सुनकर मैंने आपकी सेनामें विचरनेवाले मालवनरेश इन्द्रवर्माके अश्वत्थामानामसे विख्यात गजराजको, जो ऐरावतके समान शक्तिशाली था, युद्धमें पराक्रम करके मार डाला। फिर द्रोणाचार्यके पास जाकर कहा—'ब्रह्मन्! अश्वत्थामा मारा गया, अब युद्धसे निवृत्त हो जाइये।' परंतु इन पुरुषप्रवर द्रोणने निश्चय ही मेरी बातपर विश्वास नहीं किया है ॥ ४८—५१ ॥

स त्वं गोविन्दवाक्यानि मानयस्व जयैषिणः ।
द्रोणाय निहतं शंस राजन् शारद्वतीसुतम् ॥ ५२ ॥
'नरेश्वर! अतः आप विजय चाहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी बात मान लीजिये और द्रोणाचार्यसे कह दीजिये कि 'अश्वत्थामा मारा गया' ॥ ५२ ॥

त्वयोक्तो नैव युध्येत जातु राजन् द्विजर्षभः ।
सत्यवान् हि त्रिलोकेऽस्मिन् भवान् ख्यातो जनाधिप ॥ ५३ ॥
'राजन्! जनेश्वर! आपके कह देनेपर द्विजश्रेष्ठ द्रोण कदापि युद्ध नहीं करेंगे; क्योंकि आप तीनों लोकोंमें सत्यवादीके रूपमें विख्यात हैं' ॥ ५३ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृष्णवाक्यप्रचोदितः ।
भावित्वाच्च महाराज वक्तुं समुपचक्रमे ॥ ५४ ॥
'महाराज! भीमकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णके आदेशसे प्रेरित हो भावीवश राजा युधिष्ठिर वह झूठी बात कहनेको तैयार हो गये ॥ ५४ ॥

तमतथ्यभये मग्नो जये सक्तो युधिष्ठिरः ।
(अश्वत्थामा हत इति शब्दमुच्चैश्चचार ह ।)
अव्यक्तमब्रवीद् राजन् हतः कुञ्जर इत्युत ॥ ५५ ॥
एक ओर तो वे असत्यके भयमें डूबे हुए थे और दूसरी ओर विजयकी प्राप्तिके लिये भी आसक्तिपूर्वक प्रयत्नशील थे; अतः राजन्! उन्होंने 'अश्वत्थामा मारा गया' यह बात तो उच्च स्वरसे कही, परंतु 'हाथीका वध हुआ है,' यह बात धीरेसे कही ॥ ५५ ॥

तस्य पूर्वं रथः पृथ्व्याश्चतुरङ्गुलमुच्छ्रितः ।
बभूवैवं च तेनोक्ते तस्य वाहाः स्पृशन्महीम् ॥ ५६ ॥
इसके पहले युधिष्ठिरका रथ पृथ्वीसे चार अंगुल ऊँचे रहा करता था, किंतु उस दिन उनके इस प्रकार असत्य बोलते ही उनके रथके घोड़े धरतीका स्पर्श करके चलने लगे ॥ ५६ ॥

युधिष्ठिरात् तु तद् वाक्यं श्रुत्वा द्रोणो महारथः ।
पुत्रव्यसनसंतप्तो निराशो जीवितेऽभवत् ॥ ५७ ॥

युधिष्ठिरके मुँहसे यह वचन सुनकर महारथी द्रोणाचार्य पुत्रशोकसे संतप्त हो अपने जीवनसे निराश हो गये ।। ५७ ।। आगस्कृतमिवात्मानं पाण्डवानां महात्मनाम् । ऋषिवाक्येन मन्वानः श्रुत्वा च निहतं सुतम् ।। ५८ ।। अपने पुत्रके मारे जानेकी बात सुनकर महर्षियोंके कथनानुसार वे अपने आपको महात्मा पाण्डवोंका अपराधी-सा मानने लगे ।। ५८ ।।

विचेताः परमोद्विग्नो धृष्टद्युम्नमवेक्ष्य च । योद्धुं नाश्क्नुवद् राजन् यथापूर्वमरिंदमः ।। ५९ ।। उनकी चेतनाशक्ति लुप्त होने लगी। वे अत्यन्त उद्विग्न हो उठे। राजन्! उस समय धृष्टद्युम्नको सामने देखकर भी शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणाचार्य पूर्ववत् युद्ध न कर सके ।। ५९ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि युधिष्ठिरासत्यकथने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें युधिष्ठिरका असत्यभाषणविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९० ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५९ १/३ श्लोक हैं।)

१९१-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिकी शूरवीरता और प्रशंसा

संजय उवाच

तं दृष्ट्वा परमोद्विग्नं शोकोपहतचेतसम् ।
पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नः समाद्रवत् ॥ १ ॥
य इष्ट्वा मनुजेन्द्रेण द्रुपदेन महामखे ।
लब्धो द्रोणविनाशाय समिद्धाद्धव्यवाहनात् ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! राजा द्रुपदने एक महान् यज्ञमें देवाराधन करके द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये प्रज्वलित अग्निसे जिस पुत्रको प्राप्त किया था, उस पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने जब देखा कि आचार्य द्रोण बड़े उद्विग्न हैं और उनका चित्त शोकसे व्याकुल है, तब उन्होंने उनपर धावा कर दिया ॥
स धनुर्जैत्रमादाय घोरं जलदनिःस्वनम् ।
दृढज्यमजरं दिव्यं शरं चाशीविषोपमम् ॥ ३ ॥
संदधे कार्मुके तस्मिंस्ततस्तमनलोपमम् ।
द्रोणं जिघांसुः पाञ्चाल्यो महाज्वालमिवानलम् ॥ ४ ॥
उन पांचालपुत्रने द्रोणाचार्यके वधकी इच्छा रखकर सुदृढ़ प्रत्यंचासे युक्त, मेघगर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले, कभी जीर्ण न होनेवाले, भयंकर तथा विजयशील दिव्य धनुष हाथमें लेकर उसके ऊपर विषधर सर्पके समान भयदायक और प्रचण्ड लपटोंवाले अग्निके तुल्य तेजस्वी एक बाण रखा ॥ ३-४ ॥
तस्य रूपं शरस्यासीद् धनुर्ज्यामण्डलान्तरे ।
द्योततो भास्करस्येव घनान्ते परिवेषिणः ॥ ५ ॥
धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेसे जो मण्डलाकार घेरा बन गया था, उसके भीतर उस तेजस्वी बाणका रूप शरत्कालमें परिधिके भीतर प्रकाशित होनेवाले सूर्यके समान जान पड़ता था ॥ ५ ॥
पार्षतेन परामृष्टं ज्वलन्तमिव तद् धनुः ।
अन्तकालमनुप्राप्तं मेनिरे वीक्ष्य सैनिकाः ॥ ६ ॥
धृष्टद्युम्नके हाथमें आये हुए उस प्रज्वलित अग्निके सदृश तेजस्वी धनुषको देखकर सब सैनिक यह समझने लगे कि 'मेरा अन्तकाल आ पहुँचा है' ॥ ६ ॥
तमिषुं संहतं तेन भारद्वाजः प्रतापवान् ।

दृष्ट्वामन्यत देहस्य कालपर्यायमागतम् ॥ ७ ॥ द्रुपदपुत्रके द्वारा उस बाणको धनुषपर रखा गया देख प्रतापी द्रोणने भी यह मान लिया कि 'अब इस शरीरका काल आ गया' ॥ ७ ॥ ततः प्रयत्नमातिष्ठदाचार्यस्तस्य वारणे । न चास्यास्त्राणि राजेन्द्र प्रादुरासन्महात्मनः ॥ ८ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर आचार्यने उस अस्त्रको रोकनेका प्रयत्न किया, परंतु उन महात्माके अन्तःकरणमें वे दिव्यास्त्र पूर्ववत् प्रकट न हो सके ॥ ८ ॥ तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता । तस्य चाह्नस्त्रिभागेन क्षयं जग्मुः पतत्त्रिणः ॥ ९ ॥ उनके निरन्तर बाण चलाते चार दिन और एक रातका समय बीत चुका था। उस दिनके पंद्रह भागोंमेंसे तीन ही भागमें उनके सारे बाण समाप्त हो गये ॥ ९ ॥ स शरक्षयमासाद्य पुत्रशोकेन चार्दितः । विविधानां च दिव्यानामस्त्राणामप्रसादतः ॥ १० ॥ उत्स्रष्टुकामः शस्त्राणि ऋषिवाक्यप्रचोदितः । तेजसा पूर्यमाणश्च युयुधे न यथा पुरा ॥ ११ ॥ बाणोंके समाप्त हो जानेसे पुत्रशोकसे पीड़ित हुए द्रोणाचार्य नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंके प्रकट न होनेसे महर्षियोंकी आज्ञा मानकर अब हथियार डाल देनेको उद्यत हो गये; इसीलिये तेजसे परिपूर्ण होनेपर भी वे पूर्ववत् युद्ध नहीं करते थे ॥ १०-११ ॥ भूयश्चान्यत् समादाय दिव्यमाङ्गिरसं धनुः । शरांश्च ब्रह्मदण्डाभान् धृष्टद्युम्नमयोधयत् ॥ १२ ॥ इसके बाद द्रोणाचार्यने पुनः आंगिरस नामक दिव्य धनुष तथा ब्रह्मदण्डके समान बाण हाथमें लेकर धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ १२ ॥ ततस्तं शरवर्षेण महता समवाकिरत् । व्यशातयच्च संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नममर्षणम् ॥ १३ ॥ उन्होंने अत्यन्त कुपित होकर अमर्षमें भरे हुए धृष्टद्युम्नको अपनी भारी बाणवर्षासे ढक दिया और उन्हें क्षत-विक्षत कर दिया ॥ १३ ॥ शरांश्च शतधा तस्य द्रोणश्चिच्छेद सायकैः । ध्वजं धनुश्च निशितैः सारथिं चाप्यपातयत् ॥ १४ ॥ इतना ही नहीं, द्रोणाचार्यने अपने तीखे बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्नके बाण, ध्वज और धनुषके सैकड़ों टुकड़े कर डाले और सारथिको भी मार गिराया ॥ १४ ॥ धृष्टद्युम्नः प्रहस्यान्यत् पुनरादाय कार्मुकम् । शितेन चैनं बाणेन प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ १५ ॥

तब धृष्टद्युम्नने हँसकर फिर दूसरा धनुष उठाया और तीखे बाणद्वारा आचार्यकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ १५ ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासोऽसम्भ्रान्त इव संयुगे ।
भल्लेन शितधारेण चिच्छेदास्य पुनर्धनुः ॥ १६ ॥
युद्धस्थलमें अत्यन्त घायल होकर भी महाधनुर्धर द्रोणने बिना किसी घबराहटके तीखी धारवाले भल्लसे पुनः उनका धनुष काट दिया ॥ १६ ॥
यच्चास्य बाणविकृतं धनूंषि च विशाम्पते ।
सर्वं चिच्छेद दुर्धर्षो गदां खड्गं च वर्जयन् ॥ १७ ॥
प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नके जो-जो बाण, तरकस और धनुष आदि थे, उनमेंसे गदा और खड्गको छोड़कर शेष सारी वस्तुओंको दुर्धर्ष द्रोणाचार्यने काट डाला ॥
धृष्टद्युम्नं च विव्याध नवभिर्निशितैः शरैः ।
जीवितान्तकरैः क्रुद्धः क्रुद्धरूपं परंतपः ॥ १८ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणने कुपित होकर क्रोधमें भरे हुए धृष्टद्युम्नको नौ प्राणान्तकारी तीक्ष्ण बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ १८ ॥
धृष्टद्युम्नोऽथ तस्याश्वान् स्वरथाश्वैर्महारथः ।
व्यामिश्रयदमेयात्मा ब्राह्ममस्त्रमुदीरयन् ॥ १९ ॥
तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न महारथी धृष्टद्युम्नने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करनेके लिये अपने रथके घोड़ोंको आचार्यके घोड़ोंसे मिला दिया ॥ १९ ॥
ते मिश्रा बह्वशोभन्त जवना वातरंहसः ।
पारावतसवर्णाश्च शोणाश्च भरतर्षभ ॥ २० ॥
भरतश्रेष्ठ! वे वायुके समान वेगशाली, कबूतरके समान रंगवाले और लाल घोड़े परस्पर मिलकर बड़ी शोभा पाने लगे ॥ २० ॥
यथा सविद्युतो मेघा नदन्तो जलदागमे ।
तथा रेजुर्महाराज मिश्रिता रणमूर्धनि ॥ २१ ॥
महाराज! जैसे वर्षाकालमें गर्जते हुए विद्युत्सहित मेघ सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार युद्धके मुहानेपर परस्पर मिले हुए वे घोड़े शोभा पाते थे ॥ २१ ॥
ईषाबन्धं चक्रबन्धं रथबन्धं तथैव च ।
प्रणाशयदमेयात्मा धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः ॥ २२ ॥
उस समय अमेय बलसम्पन्न विप्रवर द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नके रथके ईषाबन्ध, चक्रबन्ध तथा रथबन्धको नष्ट कर दिया ॥ २२ ॥
स च्छिन्नधन्वा पाञ्चाल्यो निकृत्तध्वजसारथिः ।
उत्तमामापदं प्राप्य गदां वीरः परामृशत् ॥ २३ ॥

धनुष, ध्वज और सारथिके नष्ट हो जानेपर भारी विपत्तिमें पड़कर पांचालराजकुमार वीर धृष्टद्युम्नने गदा उठायी ॥ २३ ॥

तामस्य विशिखैस्तीक्ष्णैः क्षिप्यमाणां महारथः ।
निजघान शरैर्द्रोणः क्रुद्धः सत्यपराक्रमः ॥ २४ ॥
उसके द्वारा चलायी जानेवाली उस गदाको सत्यपराक्रमी महारथी द्रोणने कुपित हो बाणोंद्वारा नष्ट कर दिया ॥ २४ ॥

तां तु दृष्ट्वा नरव्याघ्रो द्रोणेन निहतां शरैः ।
विमलं खड्गमादत्त शतचन्द्रं च भानुमत् ॥ २५ ॥
उस गदाको द्रोणाचार्यके बाणोंसे नष्ट हुई देख पुरुषसिंह धृष्टद्युम्नने सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त चमकीली ढाल और चमचमाती हुई तलवार हाथमें ले ली ॥ २५ ॥

असंशयं तथाभूतः पाञ्चाल्यः साध्वमन्यत ।
वधमाचार्यमुख्यस्य प्राप्तकालं महात्मनः ॥ २६ ॥
उस अवस्थामें पांचालराजकुमारने यह निःसंदेह ठीक मान लिया कि अब आचार्यप्रवर महात्मा द्रोणके वधका समय आ पहुँचा है ॥ २६ ॥

ततः स रथनीडस्थं स्वरथस्य रथेषया ।
अगच्छदसिमुद्यम्य शतचन्द्रं च भानुमत् ॥ २७ ॥
उस समय उन्होंने तलवार और सौ चन्द्रचिह्नोंवाली ढाल लेकर अपने रथकी ईषाके मार्गसे रथकी बैठकमें बैठे हुए द्रोणपर आक्रमण किया ॥ २७ ॥

चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म धृष्टद्युम्नो महारथः ।
इयेष वक्षो भेत्तुं स भारद्वाजस्य संयुगे ॥ २८ ॥
तत्पश्चात् महारथी धृष्टद्युम्नने दुष्कर कर्म करनेकी इच्छासे उस रणभूमिमें आचार्य द्रोणकी छातीमें तलवार भोंक देनेका विचार किया ॥ २८ ॥

सोऽतिष्ठद् युगमध्ये वै युगसन्नहनेषु च ।
जघनार्धेषु चाश्वानां तत् सैन्याः समपूजयन् ॥ २९ ॥
वे रथके जूएके ठीक बीचमें, जूएके बन्धनोंपर और द्रोणाचार्यके घोड़ोंके पिछले भागोंपर पैर जमाकर खड़े हो गये। उनके इस कार्यकी सभी सैनिकोंने भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २९ ॥

तिष्ठतो युगपालीषु शोणानप्यधितिष्ठतः ।
नापश्यदन्तरं द्रोणस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ३० ॥
वे जूएके मध्यभागमें और द्रोणाचार्यके लाल घोड़ोंकी पीठपर पैर रखकर खड़े थे। उस अवस्थामें द्रोणाचार्यको उनके ऊपर प्रहार करनेका कोई अवसर ही नहीं दिखायी देता था, यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥

क्षिप्रं श्येनस्य चरतो यथैवामिषगृद्धिनः ।

तद्वदासीदभीसारो द्रोणपार्षतयो रणे ।। ३१ ।। जैसे मांसके टुकड़ेके लोभसे विचरते हुए बाजका बड़े वेगसे आक्रमण होता है, उसी प्रकार रणभूमिमें द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नके परस्पर वेगपूर्वक आक्रमण होते थे ।। ३१ ।।

तस्य पारावतानश्वान् रथशक्त्या पराभिनत् । सर्वानैकैकशो द्रोणो रक्तानश्वान् विवर्जयन् ।। ३२ ।। द्रोणाचार्यने लाल घोड़ोंको बचाते हुए रथशक्तिका प्रहार करके बारी-बारीसे कबूतरके समान रंगवाले सभी घोड़ोंको मार डाला ।। ३२ ।।

ते हता न्यपतन् भूमौ धृष्टद्युम्नस्य वाजिनः । शोणास्तु पर्यमुच्यन्त रथबन्धाद् विशाम्पते ।। ३३ ।। प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नके वे घोड़े मारे जाकर पृथ्वीपर गिर पड़े और लाल रंगवाले घोड़े रथके बन्धनसे मुक्त हो गये ।। ३३ ।।

तान् हयान् निहतान् दृष्ट्वा द्विजाग्र्येण स पार्षतः । नामृष्यत युधां श्रेष्ठो याज्ञसेनिर्महारथः ।। ३४ ।। विप्रवर द्रोणके द्वारा अपने घोड़ोंको मारा गया देख योद्धाओंमें श्रेष्ठ पार्षतवंशी महारथी द्रुपदकुमार सहन न कर सके ।। ३४ ।।

विरथः स गृहीत्वा तु खड्गं खड्गभृतां वर । द्रोणमभ्यपतद् राजन् वैनतेय इवोरगम् ।। ३५ ।। राजन्! रथहीन हो जानेपर खड्गधारियोंमें श्रेष्ठ धृष्टद्युम्न खड्ग हाथमें लेकर द्रोणाचार्यपर उसी प्रकार टूट पड़े, जैसे गरुड़ किसी सर्पपर झपटते हैं ।। ३५ ।।

तस्य रूपं बभौ राजन् भारद्वाजं जिघांसतः । यथा रूपं पुरा विष्णोर्हिरण्यकशिपोर्वधे ।। ३६ ।। नरेश्वर! द्रोणके वधकी इच्छा रखनेवाले धृष्टद्युम्नका रूप पूर्वकालमें हिरण्यकशिपुके वधके लिये उद्यत हुए नृसिंहरूपधारी भगवान् विष्णुके समान प्रतीत होता था ।।

स तदा विविधान् मार्गान् प्रवरांश्चैकविंशतिम् । दर्शयामास कौरव्य पार्षतो विचरन् रणे ॥ ३७ ॥ कुरुनन्दन! रणमें विचरते हुए धृष्टद्युम्नने उस समय तलवारके इक्कीस प्रकारके विविध उत्तम हाथ दिखाये ॥ ३७ ॥ भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं प्रसृतं सृतम् । परिवृत्तं निवृत्तं च खड्गं चर्म च धारयन् ॥ ३८ ॥ सम्पातं समुदीर्णं च दर्शयामास पार्षतः। भारतं कौशिकं चैव सात्वतं चैव शिक्षया ॥ ३९ ॥ उन्होंने ढाल-तलवार लेकर भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, प्रसृत, सृत, परिवृत्त, निवृत्त, सम्पात, समुदीर्ण, भारत, कौशिक तथा सात्वत आदि मार्गोंको* अपनी शिक्षाके अनुसार दिखलाया ॥ ३८-३९ ॥ दर्शयन् व्यचरद् युद्धे द्रोणस्यान्तचिकीर्षया । चरतस्तस्य तान् मार्गान् विचित्रान् खड्गचर्मिणः ॥ ४० ॥ व्यस्मयन्त रणे योधा देवताश्च समागताः।

वे द्रोणाचार्यका अन्त करनेकी इच्छासे युद्धमें तलवारके उपर्युक्त हाथ दिखाते हुए विचर रहे थे। ढाल-तलवार लेकर विचरते हुए धृष्टद्युम्नके उन विचित्र पैंतरोंको देखकर रणभूमिमें आये हुए योद्धा और देवता आश्चर्यचकित हो उठे थे ।। ४० १/२ ।।

ततः शरसहस्रेण शतचन्द्रमपातयत् ।। ४१ ।। चर्म खड्गं च सम्बाधे धृष्टद्युम्नस्य स द्विजः । ये तु वैतस्तिका नाम शरा आसन्नयोधिनः ।। ४२ ।। निकृष्टयुद्धे द्रोणस्य नान्येषां सन्ति ते शराः । तदनन्तर, उस युद्ध-संकटके समय विप्रवर द्रोणाचार्यने एक हजार बाणोंसे धृष्टद्युम्नकी सौ चाँदवाली ढाल और तलवार काट गिरायी। निकटसे युद्ध करते समय उपयोगमें आनेवाले जो एक बित्तेके बराबर वैतस्तिक नामक बाण होते हैं, वे समीपसे भी युद्ध करनेमें कुशल द्रोणाचार्यके ही पास थे, दूसरोंके नहीं ।। ४१-४२ १/२ ।।

ऋते शारद्वतात् पार्थाद् द्रौणेर्वैकर्तनात् तथा ।। ४३ ।। प्रद्युम्नयुयुधानाभ्यामभिमन्योश्च भारत । भारत! कृपाचार्य, अर्जुन, अश्वत्थामा, वैकर्तन, कर्ण, प्रद्युम्न, सात्यकि और अभिमन्युको छोड़कर और किसीके पास वैसे बाण नहीं थे ।। ४३ १/२ ।।

अथास्येषुं समाधत्त दृढं परमसम्मतम् ।। ४४ ।। अन्तेवासिनमाचार्यो जिघांसुः पुत्रसम्मितम् । तत्पश्चात् पुत्रतुल्य शिष्यको मार डालनेकी इच्छासे आचार्यने धनुषपर परम उत्तम सुदृढ़ बाण रखा ।। ४४ १/२ ।।

तं शरैर्दशभिस्तीक्ष्णैश्छच्छेद शिनिपुङ्गवः ।। ४५ ।। पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च महात्मनः । ग्रस्तमाचार्यमुख्येन धृष्टद्युम्नममोचयत् ।। ४६ ।। परंतु उस बाणको शिनिप्रवर सात्यकिने महामना कर्ण और आपके पुत्रके देखते-देखते दस तीखे बाणोंसे काट डाला और आचार्यप्रवरके द्वारा प्राणसंकटमें पड़े हुए धृष्टद्युम्नको छुड़ा लिया ।। ४५-४६ ।।

चरन्तं रथमार्गेषु सात्यकिं सत्यविक्रमम् । द्रोणकर्णान्तरगतं कृपस्यापि च भारत ।। ४७ ।। अपश्येतां महात्मानौ विष्वक्सेनधनंजयौ । अपूजयतां वार्ष्णेयं ब्रुवाणौ साधु साध्विति ।। ४८ ।। दिव्यान्यस्त्राणि सर्वेषां युधि निघ्नन्तमच्युतम् ।

भारत! उस समय सत्यपराक्रमी सात्यकि द्रोण, कर्ण और कृपाचार्यके बीचमें होकर रथके मागोंपर विचर रहे थे। उन्हें उस अवस्थामें महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनने देखा और ‘साधु-साधु’ कहकर सात्यकिकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। वे युद्धमें अविचलभावसे डटे रहकर समस्त विरोधियोंके दिव्यास्त्रोंका निवारण कर रहे थे॥ ४७-४८ १/२॥

अभिपत्य ततः सेनां विष्वक्सेनधनंजयौ ॥ ४९ ॥
धनंजयस्ततः कृष्णमब्रवीत् पश्य केशव ।
आचार्यरथमुख्यानां मध्ये क्रीडन् मधूद्वहः ॥ ५० ॥
तदनन्तर श्रीकृष्ण और अर्जुन शत्रुसेनापर टूट पड़े। उस समय अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा—‘केशव! देखिये, यह मधुवंशशिरोमणि सात्यकि आचार्यकी रक्षा करनेवाले मुख्य महारथियोंके बीचमें खेल रहा है॥ ४९-५०॥

आनन्दयति मां भूयः सात्यकिः परवीरहा ।
माद्रीपुत्रौ च भीमं च राजानं च युधिष्ठिरम् ॥ ५१ ॥
शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला सात्यकि मुझे बारंबार आनन्द दे रहा है और नकुल, सहदेव, भीमसेन तथा राजा युधिष्ठिरको भी आनन्दित कर रहा है॥ ५१॥

यच्छिक्षयानुद्धतः सन् रणे चरति सात्यकिः ।
महारथानुपक्रीडन् वृष्णीनां कीर्तिवर्धनः ॥ ५२ ॥
तमेते प्रतिनन्दन्ति सिद्धाः सैन्याश्च विस्मिताः ।
अजय्यं समरे दृष्ट्वा साधु साध्विति सात्यकिम् ।
योधाश्चोभयतः सर्वे कर्मभिः समपूजयन् ॥ ५३ ॥
‘वृष्णिवंशका यश बढ़ानेवाला सात्यकि उत्तम शिक्षासे युक्त होनेपर भी अभिमानशून्य हो महारथियोंके साथ क्रीड़ा करता हुआ रणभूमिमें विचर रहा है। इसलिये ये सिद्धगण और सैनिक आश्चर्यचकित हो समरांगणमें परास्त न होनेवाले सात्यकिकी ओर देखकर ‘साधु-साधु’ कहते हुए इसका अभिनन्दन करते हैं और दोनों दलोंके समस्त योद्धाओंने इसके वीरोचित कर्मोंसे प्रभावित हो इसकी बड़ी प्रशंसा की है’॥ ५२-५३॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि संकुलयुद्धे
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९१॥


* तलवारको मण्डलाकार घुमाना ‘भ्रान्त’ कहलाता है। वही कार्य बाँह ऊपर उठाकर किया जाय तो उसे ‘उद्भ्रान्त’ कहा गया है। अपने चारों ओर तलवारको घुमाया जाय तो उसे ‘आविद्ध’ कहते हैं। ये तीन कार्य शत्रुके चलाये हुए शस्त्रका निवारण करनेके लिये किये जाते हैं, शत्रुपर आक्रमण करनेके लिये जाना ‘आप्लुत’ माना गया है। तलवारकी

नोकसे शत्रुके शरीरका स्पर्श करना ‘प्रसृत’ कहा गया है। चकमा देकर शत्रुपर शस्त्रका आघात करना ‘सृत’ बताया गया है। शत्रुके दायें-बायें तलवार चलाना ‘परिवृत्त’ कहा गया है। पीछे हटना ‘निवृत्त’ है। दोनों योद्धाओंका परस्पर आघात-प्रत्याघात ‘सम्पात’ कहलाता है। अपनी विशेषता स्थापित करना ‘समुदीर्ण’ है। अंग-प्रत्यंगमें तलवार भाँजना ‘भारत’ माना गया है। विचित्र रीतिसे तलवार चलानेकी कला दिखाना ‘कौशिक’ कहा गया है। अपनेको ढालकी आड़में छिपाकर तलवार चलानेका नाम ‘सात्वत’ है।

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द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

उभयपक्षके श्रेष्ठ महारथियोंका परस्पर युद्ध, धृष्टद्युम्नका आक्रमण, द्रोणाचार्यका अस्त्र त्यागकर योगधारणाके द्वारा ब्रह्मलोक-गमन और धृष्टद्युम्नद्वारा उनके मस्तकका उच्छेद

संजय उवाच

सात्वतस्य तु तत् कर्म दृष्ट्वा दुर्योधनादयः ।
शैनेयं सर्वतः क्रुद्धा वारयामासुरोजसा ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! सात्वतवंशी सात्यकिका वह कर्म देखकर दुर्योधन आदि कौरवयोद्धा कुपित हो उठे और उन्होंने अनायास ही शिनिपौत्रको सब ओरसे घेर लिया ॥ १ ॥

कृपकर्णौ च समरे पुत्राश्च तव मारिष ।
शैनेयं त्वरयाभ्येत्य विनिघ्नन् निशितैः शरैः ॥ २ ॥
मान्यवर! समरांगणमें कृपाचार्य, कर्ण और आपके पुत्र तुरंत ही सात्यकिके पास पहुँचकर उन्हें पैने बाणोंसे घायल करने लगे ॥ २ ॥

युधिष्ठिरस्ततो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ।
भीमसेनश्च बलवान् सात्यकिं पर्यवारयन् ॥ ३ ॥
तब राजा युधिष्ठिर, पाण्डुकुमार नकुल-सहदेव तथा बलवान् भीमसेनने सात्यकिकी रक्षाके लिये उन्हें अपने बीचमें कर लिया ॥ ३ ॥

कर्णश्च शरवर्षेण गौतमश्च महारथः ।
दुर्योधनादयस्ते च शैनेयं पर्यवारयन् ॥ ४ ॥
कर्ण, महारथी कृपाचार्य और दुर्योधन आदिने बाणोंकी वर्षा करके चारों ओरसे सात्यकिको अवरुद्ध कर दिया ॥ ४ ॥

तां वृष्टिं सहसा राजन्नुत्थितां घोररूपिणीम् ।
वारयामास शैनेयो योधयंस्तान् महारथान् ॥ ५ ॥
राजन्! उन महारथियोंके साथ युद्ध करते हुए शिनिपौत्र सात्यकिने सहसा उठी हुई उस भयंकर बाण-वर्षाको अपने अस्त्रोंद्वारा रोक दिया ॥ ५ ॥

तेषामस्त्राणि दिव्यानि संहितानि महात्मनाम् ।
वारयामास विधिवद् दिव्यैरस्त्रैर्महामृधे ॥ ६ ॥
उन्होंने उस महासमरमें विधिपूर्वक दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करके उन महामनस्वी वीरोंके छोड़े हुए दिव्य अस्त्रोंका निवारण कर दिया ॥ ६ ॥

क्रूरमायोधनं जज्ञे तस्मिन् राजसमागमे । रुद्रस्येव हि क्रुद्धस्य निघ्नतस्तान् पशून् पुरा ॥ ७ ॥ राजाओंमें वह संघर्ष छिड़ जानेपर उस युद्ध-स्थलमें क्रूरताका ताण्डव होने लगा। जैसे पूर्व (प्रलय) कालमें क्रोधमें भरे हुए रुद्रदेवके द्वारा पशुओं (प्राणियों)-का संहार होते समय निर्दयताका दृश्य उपस्थित हुआ था ॥ ७ ॥ हस्तानामुत्तमाङ्गानां कार्मुकाणां च भारत । छत्राणां चापविद्धानां चामराणां च संचयैः ॥ ८ ॥ राशयः स्म व्यदृश्यन्त तत्र तत्र रणाजिरे । भारत! कटकर गिरे हुए हाथों, मस्तकों, धनुषों, छत्रों और चँवरोंके संग्रहोंसे उस समरांगणके विभिन्न प्रदेशोंमें उक्त वस्तुओंके ढेर-के-ढेर दिखायी दे रहे थे ॥ भग्नचक्रै रथैश्चापि पातितैश्च महाध्वजैः ॥ ९ ॥ सादिभिश्च हतैः शूरैः संकीर्णा वसुधाभवत् । टूटे पहियेवाले रथों, गिराये हुए विशाल ध्वजों और मारे गये शूरवीर घुड़सवारोंसे वहाँकी भूमि आच्छादित हो गयी थी ॥ ९ १/२ ॥ बाणपातनिकृत्तास्तु योधास्ते कुरुसत्तम ॥ १० ॥ चेष्टन्तो विविधाश्चेष्टा व्यदृश्यन्त महाहवे । कुरुश्रेष्ठ! बाणोंके आघातसे कटे हुए योद्धा उस महासमरमें अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करते और छटपटाते दिखायी देते थे ॥ १० १/२ ॥ वर्तमाने तथा युद्धे घोरे देवासुरोपमे ॥ ११ ॥ अब्रवीत् क्षत्रियांस्तत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः । अभिद्रवत संयत्ताः कुम्भयोनिं महारथाः ॥ १२ ॥ देवासुर-संग्रामके समान जब वह घोर युद्ध चल रहा था, उस समय धर्मराज युधिष्ठिरने अपने पक्षके क्षत्रिय योद्धाओंसे इस प्रकार कहा—'महारथियो! तुम सब लोग पूर्णतः सावधान होकर द्रोणाचार्यपर धावा करो ॥ एषो हि पार्षतो वीरो भारद्वाजेन संगतः । घटते च यथाशक्ति भारद्वाजस्य नाशने ॥ १३ ॥ 'ये वीर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न द्रोणाचार्यके साथ जूझ रहे हैं और उनके विनाशके लिये यथाशक्ति चेष्टा कर रहे हैं ॥ १३ ॥ यादृशानि हि रूपाणि दृश्यन्तेऽस्य महारणे । अद्य द्रोणं रणे क्रुद्धो घातयिष्यति पार्षतः ॥ १४ ॥ ते यूयं सहिता भूत्वा युध्यध्वं कुम्भसम्भवम् ।

'आज महासमरमें इनके जैसे रूप दिखायी देते हैं, उनसे यह ज्ञात होता है कि रणभूमिमें कुपित हुए धृष्टद्युम्न सब प्रकारसे द्रोणाचार्यका वध कर डालेंगे। इसलिये तुम सब लोग एक साथ होकर कुम्भजन्मना द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करो' ॥ १४ १/२ ॥
युधिष्ठिरसमाज्ञाप्ताः सृञ्जयानां महारथाः ॥ १५ ॥
अभ्यद्रवन्त संयत्ता भारद्वाजजिघांसवः ।
युधिष्ठिरकी यह आज्ञा पाकर सृंजय महारथी द्रोणाचार्यको मार डालनेकी अभिलाषासे पूर्ण सावधान हो उनपर टूट पड़े ॥ १५ १/२ ॥
तान् समापततः सर्वान् भारद्वाजो महारथः ॥ १६ ॥
अभ्यवर्तत वेगेन मर्तव्यमिति निश्चितः ।
महारथी द्रोणाचार्यने मरनेका निश्चय करके उन समस्त आक्रमणकारियोंका बड़े वेगसे सामना किया ॥
प्रयाते सत्यसंधे तु समकम्पत मेदिनी ॥ १७ ॥
ववुर्वाताः सनिर्घातास्त्रासयाना वरूथिनीम् ।
सत्यप्रतिज्ञ द्रोणाचार्यके आगे बढ़ते ही पृथ्वी काँपने लगी और वज्रपातकी आवाजके साथ ही प्रचण्ड आँधी चलने लगी, जो सारी सेनाको डरा रही थी ॥
पपात महती चोल्का आदित्यान्निश्चरन्त्युत ॥ १८ ॥
दीपयन्ती उभे सेने शंसन्तीव महत् भयम् ।
सूर्यमण्डलसे बड़ी भारी उल्का निकलकर दोनों सेनाओंको प्रकाशित करती और महान् भयकी सूचना-सी देती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १८ १/२ ॥
जज्वलुश्चैव शस्त्राणि भारद्वाजस्य मारिष ॥ १९ ॥
रथाः स्वनन्ति चात्यर्थं हयाश्चाश्रुण्यवासृजन् ।
माननीय नरेश! द्रोणाचार्यके शस्त्र जलने लगे, रथसे बड़े जोरकी आवाज उठने लगी और घोड़े आँसू बहाने लगे ॥ १९ १/२ ॥
हतौजा इव चाप्यासीद् भारद्वाजो महारथः ॥ २० ॥
प्रास्फुरन्नयनं चास्य वामं बाहुस्तथैव च ।
महारथी द्रोणाचार्य उस समय तेजोहिन-से हो रहे थे। उनकी बायीं आँख और बायीं भुजा फड़क रही थी ॥
विमनाश्चाभवद् युद्धे दृष्ट्वा पार्षतमग्रतः ॥ २१ ॥
ऋषीणां ब्रह्मवादानां स्वर्गस्य गमनं प्रति ।
सुयुद्धेन ततः प्राणानुत्स्रष्टुमुपचक्रमे ॥ २२ ॥
वे युद्धमें अपने सामने धृष्टद्युम्नको देखकर मन-ही-मन उदास हो गये। साथ ही ब्रह्मवादी महर्षियोंके ब्रह्मलोकमें चलनेके सम्बन्धमें कहे हुए वचनोंका स्मरण करके उन्होंने उत्तम युद्धके द्वारा अपने प्राणोंको त्याग देनेका विचार किया ॥ २१-२२ ॥

ततश्चतुर्दिशं सैन्यैर्द्रुपदस्याभिसंवृतः । निर्दहन् क्षत्रियव्रातान् द्रोणः पर्यचरद् रणे ॥ २३ ॥ तदनन्तर द्रुपदकी सेनाओंद्धारा चारों ओरसे घिरे हुए द्रोणाचार्य क्षत्रियसम्मूहोंको दग्ध करते हुए रणभूमिमें विचरने लगे ॥ २३ ॥ हत्वा विंशतिसाहस्रान् क्षत्रियानरिमर्दनः । दशायुतानि करिणामवधीद् विशिखैः शितैः ॥ २४ ॥ शत्रुमर्दन द्रोणने वहाँ बीस हजार क्षत्रियोंका संहार करके अपने तीखे बाणोंद्धारा एक लाख हाथियोंका वध कर डाला ॥ २४ ॥ सोऽतिष्ठदाहवे यत्तो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् । क्षत्रियाणामभावाय ब्राह्ममस्त्रं समास्थितः ॥ २५ ॥ फिर वे क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका सहारा ले बड़ी सावधानीके साथ युद्धभूमिमें खड़े हो गये और धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होने लगे ॥ २५ ॥ पाञ्चाल्यं विरथं भीमो हतसर्वायुधं बली । सुविषण्णं महात्मानं त्वरमाणः समभ्ययात् ॥ २६ ॥ ततः स्वरथमारोप्य पाञ्चाल्यमरिमर्दनः । अब्रवीदभिसम्प्रेक्ष्य द्रोणमस्यन्तमन्तिकात् ॥ २७ ॥ पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न रथहीन हो गये थे। उनके सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो चुके थे और वे भारी विषादमें डूब गये थे। उस अवस्थामें शत्रुमर्दन बलवान् भीमसेन उन महामनस्वी पांचालवीरके पास तुरंत आ पहुँचे और उन्हें अपने रथपर बिठाकर द्रोणाचार्यको निकटसे बाण चलाते देख इस प्रकार बोले— ॥ २६-२७ ॥ न त्वदन्य इहाचार्यं योद्धुमुत्सहते पुमान् । त्वरस्व प्राग् वधायैव त्वयि भारः समाहितः ॥ २८ ॥ 'धृष्टद्युम्न! यहाँ तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो आचार्यके साथ जूझनेका साहस कर सके। अतः तुम पहले उनके वधके लिये ही शीघ्रतापूर्वक प्रयत्न करो। तुमपर ही इसका सारा भार रखा गया है' ॥ स तथोक्तो महाबाहुः सर्वभारसहं धनुः । अभिपत्याददे क्षिप्रमायुधप्रवरं दृढम् ॥ २९ ॥ भीमसेनके ऐसा कहनेपर महाबाहु धृष्टद्युम्नने उछलकर शीघ्रतापूर्वक सारा भार सहन करनेमें समर्थ सुदृढ़ एवं श्रेष्ठ आयुध धनुषको उठा लिया ॥ २९ ॥ संरब्धश्च शरानस्यन् द्रोणं दुर्वारणं रणे । निवारयिषुराचार्यं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ३० ॥

फिर क्रोधमें भरकर बाण चलाते हुए उन्होंने रणभूमिमें कठिनतासे रोके जानेवाले द्रोणाचार्यको रोक देनेकी इच्छासे उन्हें बाणोंकी वर्षाद्वारा ढक दिया ॥ ३० ॥ तौ न्यवारयतां श्रेष्ठौ संरब्धौ रणशोभिनौ । उदीरयेतां ब्रह्माणि दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ॥ ३१ ॥ संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले वे दोनों श्रेष्ठ वीर कुपित हो नाना प्रकारके दिव्यास्त्र एवं ब्रह्मास्त्र प्रकट करते हुए एक-दूसरेको आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ ३१ ॥ स महास्त्रैर्महाराज द्रोणमाच्छादयद् रणे । निहत्य सर्वाण्यस्त्राणि भारद्वाजस्य पार्षतः ॥ ३२ ॥ महाराज! धृष्टद्युम्नने रणभूमिमें द्रोणाचार्यके सभी अस्त्रोंको नष्ट करके उन्हें अपने महान् अस्त्रोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ ३२ ॥ सवसातीञ्शिबींश्चैव बाह्लीकान् कौरवानपि । रक्षिष्यमाणान् संग्रामे द्रोणं व्यधमदच्युतः ॥ ३३ ॥ कभी विचलित न होनेवाले पांचालवीरने संग्राममें द्रोणाचार्यकी रक्षा करनेवाले बसाति, शिबि, बाह्लीक और कौरवयोध्दाओंका भी संहार कर डाला ॥ ३३ ॥ धृष्टद्युम्नस्तथा राजन् गभस्तिभिरिवांशुमान् । बभौ प्रच्छादयन्नाशाः शरजालैः समन्ततः ॥ ३४ ॥ राजन्! अपने बाणोंके समूहसे सम्पूर्ण दिशाओंको सब ओरसे आच्छादित करते हुए धृष्टद्युम्न किरणोंद्वारा अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३४ ॥ तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा विद्ध्वा चैनं शिलीमुखैः । मर्माण्यभ्यहनद् भूयः स व्यथां परमामगात् ॥ ३५ ॥ तदनन्तर द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नका धनुष काटकर उन्हें बाणोंद्वारा घायल कर दिया और पुनः उनके मर्मस्थानोंको गहरी चोट पहुँचायी; इससे उन्हें बड़ी व्यथा हुई ॥ ३५ ॥ ततो भीमो दृढक्रोधो द्रोणस्याश्लिष्य तं रथम् । शनकैरिव राजेन्द्र द्रोणं वचनमब्रवीत् ॥ ३६ ॥ राजेन्द्र! तब अपने क्रोधको दृढ़तापूर्वक बनाये रखनेवाले भीमसेन द्रोणाचार्यके उस रथसे सटकर उनसे धीरे-धीरे इस प्रकार बोले— ॥ ३६ ॥ यदि नाम न युध्येरन् शिक्षिता ब्रह्मबान्धवाः । स्वकर्मभिरसंतुष्टा न स्म क्षत्रं क्षयं व्रजेत् ॥ ३७ ॥ ‘यदि शिक्षित ब्राह्मण अपने कर्मोंसे असंतुष्ट हो परधर्मका आश्रय ले युद्ध न करते तो क्षत्रियोंका यह संहार न होता ॥ ३७ ॥ अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदुः । तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तमः ॥ ३८ ॥

'प्राणियोंकी हिंसा न करनेको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म माना गया है। उसकी जड़ है ब्राह्मण और आप तो उन ब्राह्मणोंमें भी सबसे उत्तम ब्रह्मवेत्ता हैं।। ३८ ।। श्वपाकवन्म्लेच्छगणान् हत्वा चान्यान् पृथग्विधान् । अज्ञानान्मूढवद् ब्रह्मन् पुत्रदारधनेप्सया ।। ३९ ।। 'ब्रह्मन्! ब्रह्मवेत्ता होकर भी आपने स्त्री, धन और पुत्रकी लिप्सासे मूर्ख चाण्डालोंके समान कितने ही म्लेच्छों तथा अन्य नाना प्रकारके क्षत्रियसम्मूहोंका संहार कर डाला है ।। ३९ ।। एकस्यार्थे बहून् हत्वा पुत्रस्याधर्मविद्यया । स्वकर्मस्थान् विकर्मस्थो न व्यपत्रपसे कथम् ।। ४० ।। 'आप अपने एक पुत्रकी जीविकाके लिये विपरीत कर्मका आश्रय ले इस पाप-विद्याके द्वारा स्वधर्मपरायण बहुसंख्यक क्षत्रियोंका वध करके लज्जित कैसे नहीं हो रहे हैं? ।। ४० ।। यस्यार्थे शस्त्रमादाय यमपेक्ष्य च जीवसि । स चाद्य पतितः शेते पृष्ठे नावेदितस्तव ।। ४१ ।। धर्मराजस्य तद् वाक्यं नाभिशङ्कितुमर्हसि । 'जिसके लिये आपने शस्त्र उठाया, जिसके जीवनकी अभिलाषा रखकर आप जी रहे हैं, वह तो आज पीछे समरभूमिमें गिरकर चिरनिद्रामें सो रहा है और आपको इसकी सूचनातक नहीं दी गयी। धर्मराज युधिष्ठिरके उस कथनपर तो आपको संदेह या अविश्वास नहीं करना चाहिये' ।। ४१ ½ ।। एवमुक्तस्ततो द्रोणो भीमेनोत्सृज्य तद् धनुः ।। ४२ ।। सर्वाण्यस्त्राणि धर्मात्मा हातुकामोऽभ्यभाषत । भीमसेनके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा द्रोणाचार्य वह धनुष फेंककर अन्य सब अस्त्र-शस्त्रोंको भी त्याग देनेकी इच्छासे इस प्रकार बोले— ।। ४२ ½ ।। कर्ण कर्ण महेष्वास कृप दुर्योधनेति च ।। ४३ ।। संग्रामे क्रियतां यत्नो ब्रवीम्येष पुनः पुनः । पाण्डवेभ्यः शिवं वोऽस्तु शस्त्रमभ्युत्सृजाम्यहम् ।। ४४ ।। 'कर्ण! कर्ण! महाधनुर्धर कृपाचार्य! और दुर्योधन! अब तुमलोग स्वयं ही युद्धमें विजय पानेके लिये प्रयत्न करो, यही मैं तुमसे बारंबार कहता हूँ। पाण्डवोंसे तुम-लोगोंका कल्याण हो। अब मैं अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग कर रहा हूँ' ।। ४३-४४ ।। इति तत्र महाराज प्राक्रोशद् द्रौणिमेव च । उत्सृज्य च रणे शस्त्रं रथोपस्थे निविश्य च ।। ४५ ।। अभयं सर्वभूतानां प्रददौ योगमीयिवान् ।

महाराज! यह कहकर उन्होंने वहाँ अश्वत्थामाका नाम ले-लेकर पुकारा। फिर सारे अस्त्र-शस्त्रोंको रणभूमिमें फेंककर वे रथके पिछले भागमें जा बैठे। फिर उन्होंने सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान दे दिया और समाधि लगा ली ॥ ४५½ ॥

तस्य तच्छिद्रमाज्ञाय धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ॥ ४६ ॥ सशरं तद् धनुर्घोरं संन्यस्याथ रथे ततः । खड्गी रथादवप्लुत्य सहसा द्रोणमभ्ययात् ॥ ४७ ॥ उनपर प्रहार करनेका वह अच्छा अवसर हाथ लगा जान प्रतापी धृष्टद्युम्न बाणसहित अपने भयंकर धनुषको रथपर ही रखकर तलवार हाथमें ले उस रथसे उछलकर सहसा द्रोणाचार्यके पास जा पहुँचा ॥ ४६-४७ ॥

हाहाकृतानि भूतानि मानुषाणीतराणि च । द्रोणं तथागतं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नवशं गतम् ॥ ४८ ॥ उस अवस्थामें द्रोणाचार्यको धृष्टद्युम्नके अधीन हुआ देख मनुष्य तथा अन्य प्राणी भी हाहाकार कर उठे ॥

हाहाकारं भृशं चक्रुरहो धिगिति चाब्रुवन् । द्रोणोऽपि शस्त्राण्युत्सृज्य परं सांख्यमास्थितः ॥ ४९ ॥ वहाँ सबने भारी हाहाकार मचाया और सभी कहने लगे, ‘अहो! धिक्कार है, धिक्कार है’। इधर आचार्य द्रोण भी शस्त्रोंका परित्याग करके परम ज्ञानस्वरूपमें स्थित हो गये ॥ ४९ ॥

तथोक्त्वा योगमास्थाय ज्योतिर्भूतो महातपाः । पुराणं पुरुषं विष्णुं जगाम मनसा परम् ॥ ५० ॥ वे महातपस्वी द्रोण पूर्वोक्त बात कहकर योगका आश्रय ले ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मसे अभिन्नताका अनुभव करते हुए मन-ही-मन सर्वोत्कृष्ट पुराणपुरुष भगवान् विष्णुका ध्यान करने लगे ॥ ५० ॥

मुखं किंचित् समुन्नाम्य विष्टभ्य उरमग्रतः । निमीलिताक्षः सत्त्वस्थो निक्षिप्य हृदि धारणाम् ॥ ५१ ॥