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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पाण्डवेयाः समाहूता युद्धं चेदं प्रवर्तितम् ॥ ७ ॥
‘वीरो! आपलोगोंके बाहुबलका भरोसा करके मैंने युद्धके लिये पाण्डवोंको ललकारा है और यह युद्ध आरम्भ किया है ॥ ७ ॥
तदिदं निहते द्रोणे विषण्णमिव लक्ष्यते ।
युध्यमानाश्च समरे योधा वध्यन्ति सर्वशः ॥ ८ ॥
जयो वापि वधो वापि युध्यमानस्य संयुगे ।
भवेत् किमत्र चित्रं वै युध्यध्वं सर्वतोमुखाः ॥ ९ ॥
‘परंतु द्रोणाचार्यके मारे जानेपर यह सारी सेना विषादमें डूबी हुई-सी दिखायी देती है। समर-भूमिमें युद्ध करनेवाले प्रायः सभी योद्धा शत्रुओंके हाथसे मारे जाते हैं। रणभूमिमें जूझनेवाले वीरको कभी विजय भी प्राप्त होती है और कभी उसका वध भी हो जाता है। इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है? अतः आपलोग सब ओर मुँह करके उत्साहपूर्वक युद्ध करें ॥ ८-९ ॥
पश्यध्वं च महात्मानं कर्णं वैकर्तनं युधि ।
प्रचरन्तं महेष्वासं दिव्यैरस्त्रैर्महाबलम् ॥ १० ॥
‘देखिये, महामना, महाधनुर्धर और महाबली वैकर्तन कर्ण अपने दिव्यास्त्रोंके साथ किस प्रकार युद्धमें विचर रहा है? ॥ १० ॥
यस्य वै युधि संत्रासात् कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
निवर्तते सदा मन्दः सिंहात् क्षुद्रमृगो यथा ॥ ११ ॥
‘जिसके भयसे वह कुन्तीका मूर्ख पुत्र अर्जुन सदा उसी प्रकार मुँह मोड़ लेता है, जैसे सिंहके सामनेसे क्षुद्र मृग भाग जाता है ॥ ११ ॥
येन नागायुतप्राणो भीमसेनो महाबलः ।
मानुषेणैव युद्धेन तामवस्थां प्रवेशितः ॥ १२ ॥
‘जिसने दस हजार हाथियोंके समान बलवाले महाबली भीमसेनको मानव-युद्धके द्वारा ही वैसी दुरवस्थामें डाल दिया था ॥ १२ ॥
येन दिव्यास्त्रविच्छूरो मायावी स घटोत्कचः ।
अमोघया रणे शक्त्या निहतो भैरवं नदन् ॥ १३ ॥
‘जिसने रणभूमिमें भयंकर गर्जना करनेवाले दिव्यास्त्रवेत्ता, शूरवीर मायावी घटोत्कचको अपनी अमोघ शक्तिसे मार डाला था ॥ १३ ॥
तस्य दुर्वारवीर्यस्य सत्यसंधस्य धीमतः ।
बाह्वोर्द्रविणमक्षय्यमद्य द्रक्ष्यथ संयुगे ॥ १४ ॥
‘जिसके पराक्रमको रोकना अत्यन्त कठिन है, उस सत्यप्रतिज्ञ बुद्धिमान् कर्णके अक्षय बाहुबलको आज आपलोग समरांगणमें देखेंगे ॥ १४ ॥
द्रोणपुत्रस्य विक्रान्तं राधेयस्यैव चोभयोः ।

पश्यन्तु पाण्डुपुत्रास्ते विष्णुवासवयोरिव ॥ १५ ॥ 'आज पाण्डव भगवान् विष्णु और इन्द्रके समान शक्तिशाली द्रोणपुत्र तथा राधापुत्र दोनोंके पराक्रमको देखें' ॥ १५ ॥ सर्व एव भवन्तश्च शक्ताः प्रत्येकशोऽपि वा । पाण्डुपुत्रान् रणे हन्तुं ससैन्यान् किमु संहताः ॥ १६ ॥ वीर्यवन्तः कृतास्त्राश्च द्रक्ष्यथाद्य परस्परम् । 'आप सभी योद्धाओंमेंसे प्रत्येक वीर रणभूमिमें सेनासहित पाण्डवोंको मार डालनेकी शक्ति रखता है। फिर जब आपलोग संगठित होकर युद्ध करें तो क्या नहीं कर सकते हैं? आप पराक्रमी और अस्त्रविद्याके विद्वान् हैं; अतः आज एक-दूसरेको अपना-अपना पुरुषार्थ दिखावें' ॥ १६ १/२ ॥

संजय उवाच एवमुक्त्वा ततः कर्णं चक्रे सेनापतिं तदा । तव पुत्रो महावीर्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ ॥ १७ ॥ संजय कहते हैं—निष्पाप नरेश! ऐसा कहकर आपके महापराक्रमी पुत्र दुर्योधनने अपने भाइयोंके साथ मिलकर कर्णको सेनापति बनाया ॥ १७ ॥ सैनापत्यमथावाप्य कर्णो राजन् महारथः । सिंहनादं विनद्योच्चैः प्रायुध्यत रणोत्कटः ॥ १८ ॥ राजन्! सेनापतिका पद पाकर महारथी कर्ण उच्चस्वरसे सिंहनाद करके रणोन्मत्त होकर युद्ध करने लगा ॥ स सृंजयानां सर्वेषां पञ्चालानां च मारिष । केकयानां विदेहानां चकार कदनं महत् ॥ १९ ॥ मान्यवर! उसने समस्त सृंजयों, पांचालों, केकयों और विदेहोंका महान् संहार किया ॥ १९ ॥ तस्येषुधाराः शतशः प्रादुरासञ्छरासनात् । अग्रे पुङ्खे च संसक्ता यथा भ्रमरपङ्क्तयः ॥ २० ॥ उसके धनुषसे सैकड़ों बाणधाराएँ, जो अग्रभाग और पुच्छभागमें परस्पर सटी हुई थीं, भ्रमरपंक्तियोंके समान प्रकट होने लगीं ॥ २० ॥ स पीडयित्वा पञ्चालान् पाण्डवांश्च तरस्विनः । हत्वा सहस्रशो योधानर्जुनेन निपातितः ॥ २१ ॥ वह पांचालों और वेगशाली पाण्डवोंको पीड़ित करके सहस्रों योद्धाओंको मारकर अन्तमें अर्जुनके हाथसे मारा गया ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्यं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संजयवाक्य नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ।। ३ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1598)

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चतुर्थोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका शोक और समस्त स्त्रियोंकी व्याकुलता

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
शोकस्यान्तमपश्यन् वै हतं मेने सुयोधनम् ॥ १ ॥
विह्वलः पतितो भूमौ नष्टचेता इव द्विपः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! यह सुनकर अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने यह मान लिया कि अब दुर्योधन भी मारा ही गया। उन्हें अपने शोकका कहीं अन्त नहीं दिखायी देता था। वे अचेत हुए हाथीके समान व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १ ½ ॥

तस्मिन् निपतिते भूमौ विह्वले राजसत्तमे ॥ २ ॥
आर्तनादो महानासीत् स्त्रीणां भरतसत्तम ।
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! राजाओंमें सर्वश्रेष्ठ धृतराष्ट्रके व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर जानेसे महलमें स्त्रियोंका महान् आर्तनाद गूँज उठा ॥ २ ½ ॥

स शब्दः पृथिवीं कृत्स्नां पूरयामास सर्वशः ॥ ३ ॥
शोकार्णवे महाघोरे निमग्ना भरतस्त्रियः ।
रुरुदुर्दुःखशोकार्ता भृशमुद्विग्नचेतसः ॥ ४ ॥
रोदनका वह शब्द वहाँके समूचे भूमण्डलमें व्याप्त हो गया। भरतकुलकी स्त्रियाँ अत्यन्त घोर शोक-समुद्रमें डूब गयीं, उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो गया और वे दुःख-शोकसे कातर हो फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ ३-४ ॥

राजानं च समासाद्य गान्धारी भरतर्षभ ।
निःसंज्ञा पतिता भूमौ सर्वाण्यन्तःपुराणि च ॥ ५ ॥
भरतभूषण! गान्धारी देवी राजा धृतराष्ट्रके समीप आकर बेहोश हो भूमिपर गिर गयीं। अन्तःपुरकी सारी स्त्रियोंकी यही दशा हुई ॥ ५ ॥

ततस्ताः संजयो राजन् समाश्वासयदातुराः ।
मुह्यमानाः सुबहुशो मुञ्चन्त्यो वारि नेत्रजम् ॥ ६ ॥
राजन्! तब संजयने नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाती हुई राजमहलकी उन बहुसंख्यक महिलाओंको, जो आतुर एवं मूर्च्छित हो रही थीं, धीरे-धीरे धीरज बँधाया ॥ ६ ॥

समाश्वस्ताः स्त्रियस्तास्तु वेपमाना मुहुर्मुहुः ।
कदलय इव वातेन धूयमानाः समन्ततः ॥ ७ ॥
आश्वासन पाकर भी वे स्त्रियाँ चारों ओरसे वायु-द्वारा हिलाये जाते हुए केलेके वृक्षोंकी भाँति बारंबार काँप रही थीं ॥ ७ ॥

राजानं विदुरश्चापि प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । आश्वासयामास तदा सिञ्चंस्तोयेन कौरवम् ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् विदुरने भी ऐश्वर्यशाली कुरुवंशी प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रके ऊपर जल छिड़ककर उन्हें होशमें लानेकी चेष्टा की ॥ ८ ॥ स लब्ध्वा शनकैः संज्ञां ताश्च दृष्ट्वा स्त्रियो नृपः । उन्मत्त इव राजेन्द्र स्थितस्तूष्णीं विशाम्पते ॥ ९ ॥ राजेन्द्र! प्रजानाथ! धीरे-धीरे होशमें आनेपर धृतराष्ट्र अपने घरकी स्त्रियोंको वहाँ उपस्थित जान पागलके समान चुपचाप बैठे रह गये ॥ ९ ॥ ततो ध्यात्वा चिरं कालं निःश्वस्य च पुनः पुनः । स्वान् पुत्रान् गर्हयामास बहु मेने च पाण्डवान् ॥ १० ॥ तदनन्तर दीर्घकालतक चिन्ता करनेके पश्चात् वे बारंबार लंबी साँस खींचते हुए अपने पुत्रोंकी निन्दा और पाण्डवोंकी अधिक प्रशंसा करने लगे ॥ १० ॥ गर्हयंश्चात्मनो बुद्धिं शकुनेः सौबलस्य च । ध्यात्वा तु सुचिरं कालं वेपमानो मुहुर्मुहुः ॥ ११ ॥ उन्होंने अपनी और सुबलपुत्र शकुनिकी बुद्धिको भी कोसा। फिर बहुत देरतक चिन्तामग्न रहनेके पश्चात् वे बारंबार काँपने लगे ॥ ११ ॥ संस्तभ्य च मनो भूयो राजा धैर्यसमन्वितः । पुनर्गावलगणिं सूतं पर्यपृच्छत संजयम् ॥ १२ ॥ फिर मनको किसी तरह स्थिर करके राजाने धैर्य धारण किया और गवल्गणके पुत्र सारथि संजयसे इस प्रकार पूछा— ॥ १२ ॥ यत् त्वया कथितं वाक्यं श्रुतं संजय तन्मया । कच्चिद् दुर्योधनः सूत न गतो वै यमक्षयम् ॥ १३ ॥ जये निराशः पुत्रो मे सततं जयकामुकः । ब्रूहि संजय तत्त्वेन पुनरुक्तां कथामिमाम् ॥ १४ ॥ ‘संजय! तुमने जो बात कही है, वह तो मैंने सुन ली, किंतु एक बात बताओ। निरन्तर विजयकी इच्छा रखनेवाला मेरा पुत्र दुर्योधन अपनी विजयसे निराश हो कहीं यमराजके लोकमें तो नहीं चला गया? संजय! तुम इस कही हुई बातको भी फिर यथार्थरूपसे कह सुनाओ' ॥ १३-१४ ॥ एवमुक्तोऽब्रवीत् सूतो राजानं जनमेजय । हतो वैकर्तनो राजन् सह पुत्रैर्महारथः ॥ १५ ॥ भ्रातृभिश्च महेष्वासैः सूतपुत्रैस्तनुत्यजैः । जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर सारथि संजय राजासे इस प्रकार बोला—‘राजन्! महारथी वैकर्तन कर्ण अपने पुत्रों तथा शरीरका मोह छोड़कर युद्ध करनेवाले महाधनुर्धर

सूतजातीय भाइयोंके साथ मार डाला गया ।। दुःशासनश्च निहतः पाण्डवेन यशस्विना । पीतं च रुधिरं कोपाद् भीमसेनेन संयुगे ।। १६ ।। ‘साथ ही यशस्वी पाण्डुपुत्र भीमसेनने रणभूमिमें दुःशासनको मार दिया और क्रोधपूर्वक उसका खून भी पी लिया’ ।। १६ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि धृतराष्ट्रशोको नाम चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें धृतराष्ट्रका शोक नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ।। ४ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1601)

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पञ्चमोऽध्यायः

संजयका धृतराष्ट्रको कौरवपक्षके मारे गये प्रमुख वीरोंका परिचय देना

वैशम्पायन उवाच

इति श्रुत्वा महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
अब्रवीत् संजयं सूतं शोकसंविग्नमानसः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! उपर्युक्त समाचार सुनकर अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रका हृदय शोकसे व्याकुल हो गया। वे अपने सारथि संजयसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

दुष्प्रणीतेन मे तात पुत्रस्यादीर्घजीविनः ।
हतं वैकर्तनं श्रुत्वा शोको मर्माणि कृन्तति ॥ २ ॥
‘तात अपने अल्पायु पुत्रके अन्यायसे वैकर्तन कर्णके मारे जानेका समाचार सुनकर जो शोक उमड़ आया है, वह मेरे मर्मस्थानोंको छेदे डालता है ॥ २ ॥

तस्य मे संशयं छिन्धि दुःखपारं तितीर्षतः ।
कुरूणां सृञ्जयानां च के च जीवन्ति के मृताः ॥ ३ ॥
‘मैं इस अपार दुःखसे पार पाना चाहता हूँ। तुम मेरे इस संदेहका निवारण करो कि कौरवों तथा सृंजयोंनेसे कौन-कौन जीवित हैं और कौन-कौन मर गये हैं?’ ॥ ३ ॥

संजय उवाच

हतः शान्तनवो राजन् दुराधर्षः प्रतापवान् ।
हत्वा पाण्डवयोधानामर्बुदं दशभिर्दिनैः ॥ ४ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! दुर्जय एवं प्रतापी वीर शान्तनुनन्दन भीष्म दस दिनोंमें पाण्डवदलके दस करोड़ योद्धाओंका संहार करके मारे गये हैं ॥ ४ ॥

तथा द्रोणो महेष्वासः पञ्चालानां रथव्रजान् ।
निहत्य युधि दुर्धर्षः पश्चाद् रुक्मरथो हतः ॥ ५ ॥
इसी प्रकार सुवर्णमय रथवाले दुर्धर्ष वीर महाधनुर्धर द्रोणाचार्य भी पांचालरथियोंके समुदायोंका संहार करके मारे गये हैं ॥ ५ ॥

हतशेषस्य भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना ।
अर्धं निहत्य सैन्यस्य कर्णो वैकर्तनो हतः ॥ ६ ॥
भीष्म और महात्मा द्रोणके मारनेसे जो पाण्डव-सेना बच गयी थी, उसके आधे भागका विनाश करके वैकर्तन कर्ण मारा गया है ॥ ६ ॥

विविंशतिर्महाराज राजपुत्रो महाबलः । आनर्तयोधान् शतशो निहत्य निहतो रणे ॥ ७ ॥ महाराज! महाबली राजकुमार विविंशति रणभूमिमें सैकड़ों आनर्तदेशीय योद्धाओंको मारकर मरा है ॥ ७ ॥

तथा पुत्रो विकर्णस्ते क्षत्रव्रतमनुस्मरन् । क्षीणवाहायुधः शूरः स्थितोऽभिमुखतः परान् ॥ ८ ॥ घोररूपान् परिक्लेशान् दुर्योधनकृतान् बहून् । प्रतिज्ञां स्मरता चैव भीमसेनेन पातितः ॥ ९ ॥ इसी प्रकार आपका शूरवीर पुत्र विकर्ण क्षत्रियोचित व्रतका स्मरण करके वाहनों और आयुधोंके नष्ट हो जानेपर भी शत्रुओंके सामने डटा हुआ था, परंतु दुर्योधनके दिये हुए बहुत-से भयंकर क्लेशों और अपनी प्रतिज्ञाको याद करके भीमसेनने उसे मार गिराया ॥ ८-९ ॥

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ राजपुत्रौ महारथौ । कृत्वा त्वसुकरं कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥ १० ॥ अवन्तीदेशके महारथी राजकुमार विन्द और अनुविन्द भी दुष्कर कर्म करके यमलोकको चले गये ॥ १० ॥

सिंधुराष्ट्रमुखानीह दश राष्ट्राणि यानि ह । वशे तिष्ठन्ति वीरस्य यः स्थितस्तव शासने ॥ ११ ॥ अक्षौहिणीर्दशैकां च विनिर्जित्य शितैः शरैः । अर्जुनेन हतो राजन् महावीर्यो जयद्रथः ॥ १२ ॥ राजन्! जिस वीरके शासनमें सिन्धु, सौबीर आदि दस राष्ट्र थे, जो सदा आपकी आज्ञाके अधीन रहा करता था, उस महापराक्रमी जयद्रथको अर्जुनने आपकी ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंको हराकर तीखे बाणोंसे मार डाला ॥ ११-१२ ॥

तथा दुर्योधनसुतस्तरस्वी युद्धदुर्मदः । वर्तमानः पितुः शास्त्रे सौभद्रेण निपातितः ॥ १३ ॥ दुर्योधनके रणदुर्मद वेगशाली पुत्र लक्ष्मणको, जो सदा पिताकी आज्ञाके अधीन रहता था, सुभद्राकुमारने मार गिराया ॥ १३ ॥

तथा दौःशासनिः शूरो बाहुशाली रणोत्कटः । द्रौपदेयेन सङ्गम्य गमितो यमसादनम् ॥ १४ ॥ अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाला रणोन्मत्त शूर दुःशासनकुमार द्रौपदीके पुत्रसे टक्कर लेकर यमलोकमें जा पहुँचा ॥ १४ ॥

किरातानामधिपतिः सागरानूपवासिनाम् । देवराजस्य धर्मात्मा प्रियो बहुमतः सखा ॥ १५ ॥

भगदत्तो महीपालः क्षत्रधर्मरतः सदा । धनंजयेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ १६ ॥ जो सागर-तटवर्ती किरातोंके स्वामी तथा देवराज इन्द्रके अत्यन्त आदरणीय प्रिय सखा थे, सदा क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहनेवाले वे धर्मात्मा राजा भगदत्त भी अर्जुनके साथ पराक्रम दिखाकर यमराजके लोकमें चले गये ॥ १६ ॥

तथा कौरवदायादो न्यस्तशस्त्रो महायशाः । हतो भूरिश्रवा राजन् शूरः सात्यकिना युधि ॥ १७ ॥ राजन्! कौरववंशी महायशस्वी शूरवीर भूरिश्रवा, जो अपने अस्त्र-शस्त्रोंका परित्याग कर चुके थे, युद्धस्थलमें सात्यकिके हाथसे मारे गये ॥ १७ ॥

श्रुतायुरपि चाम्बष्ठः क्षत्रियाणां धुरंधरः । चरन्नभीतवत् संख्ये निहतः सव्यसाचिना ॥ १८ ॥ अम्बष्ठदेशके राजा क्षत्रिय-धुरंधर श्रुतायु भी, जो समरांगणमें निर्भय-से विचरते थे, सव्यसाची अर्जुनके हाथसे मारे गये ॥ १८ ॥

तव पुत्रः सदामर्षी कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः । दुःशासनो महाराज भीमसेनेन पातितः ॥ १९ ॥ महाराज! जो अस्त्र-विद्याका विद्वान् तथा युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाला था, सदा अमर्षमें भरे रहनेवाले आपके उस पुत्र दुःशासनको भीमसेनने मार गिराया ॥ १९ ॥

यस्य राजन् गजानीकं बहुसाहस्रमद्भुतम् । सुदक्षिणः स संग्रामे निहतः सव्यसाचिना ॥ २० ॥ राजन्! जिसके अधिकारमें कई हजार हाथियोंकी अद्भुत सेना थी, वह सुदक्षिण भी संग्राममें सव्यसाची अर्जुनके बाणोंका निशाना बन गया ॥ २० ॥

कोसलानामधिपतिर्हत्वा बहुमतान् परान् । सौभद्रेण हि विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ २१ ॥ कोशलनरेश शत्रुपक्षके अत्यन्त सम्मानित वीरोंका वध करके सुभद्राकुमार अभिमन्युके साथ पराक्रम दिखाते हुए यमलोकके पथिक बन गये ॥ २१ ॥

बहुशो योधयित्वा तु भीमसेनं महारथम् । मद्रराजात्मजः शूरः परेषां भयवर्धनः । असिचर्मधरः श्रीमान् सौभद्रेण निपातितः ॥ २२ ॥ जो महारथी भीमसेनके साथ भी कई बार युद्ध कर चुका था, ढाल और तलवार लेकर शत्रुओंका भय बढ़ानेवाला वह मद्रराजका शूरवीर तेजस्वी पुत्र सुभद्राकुमार अभिमन्युके द्वारा मार डाला गया ॥ २२ ॥

समः कर्णस्य समरे यः स कर्णस्य पश्यतः । वृषसेनो महातेजाः शीघ्रास्त्रो दृढविक्रमः ॥ २३ ॥

अभिमन्योर्वधं श्रुत्वा प्रतिज्ञामपि चात्मनः । धनंजयेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ २४ ॥ जो समरभूमिमें कर्णके समान ही पराक्रमी था, शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाला, सुदृढ़ बल-विक्रमसे सम्पन्न और महान् तेजस्वी था, वह कर्णपुत्र वृषसेन अभिमन्युका वध सुनकर की हुई अपनी प्रतिज्ञाको याद रखनेवाले अर्जुनके साथ भिड़कर कर्णके देखते-देखते उनके द्वारा यमलोक पहुँचा दिया गया ॥ २३-२४ ॥

नित्यं प्रसक्तवैरो यः पाण्डवैः पृथिवीपतिः । विश्राव्य वैरं पार्थेन श्रुतायुः स निपातितः ॥ २५ ॥ जो पाण्डवोंके साथ सदा वैर बाँधे रखता था, उस राजा श्रुतायुको कुन्तीकुमार अर्जुनने उसकी शत्रुताका स्मरण कराकर मार डाला ॥ २५ ॥

शल्यपुत्रस्तु विक्रान्तः सहदेवेन मारिष । हतो रुक्मरथो राजन् भ्राता मातुलजो युधि ॥ २६ ॥ माननीय नरेश! शल्यका पराक्रमी पुत्र रुक्मरथ, जो सहदेवका ममेरा भाई था, युद्धमें सहदेवके ही हाथसे मारा गया ॥ २६ ॥

राजा भगीरथो वृद्धो बृहत्क्षत्रश्च केकयः । पराक्रमन्तौ विक्रान्तौ निहतौ वीर्यवत्तरौ ॥ २७ ॥ बूढ़े राजा भगीरथ और केकयनरेश बृहत्क्षत्र—ये दोनों अत्यन्त बलवान् और पराक्रमी वीर थे, जो युद्धमें पराक्रम दिखाते हुए मारे गये ॥ २७ ॥

भगदत्तसुतो राजन् कृतप्रज्ञो महाबलः । श्येनवच्चरता संख्ये नकुलेन निपातितः ॥ २८ ॥ राजन्! भगदत्तके विद्वान् और महाबली पुत्रको युद्धमें बाजकी तरह झपटनेवाले नकुलने मार गिराया ॥

पितामहस्तव तथा बाह्लीकः सह बाह्लीकैः । निहतो भीमसेनेन महाबलपराक्रमः ॥ २९ ॥ आपके पितामह बाह्लीक भी महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। वे भीमसेनके हाथसे बाह्लीक योद्धाओंसहित मारे गये ॥ २९ ॥

जयत्सेनस्तथा राजञ्जारासंधिर्महाबलः । मागधो निहतः संख्ये सौभद्रेण महात्मना ॥ ३० ॥ राजन्! जरासंधके महाबलवान् पुत्र मगधवासी जयत्सेनको महामना सुभद्राकुमारने युद्धमें मार डाला ॥

पुत्रस्ते दुर्मुखो राजन् दुःसहश्च महारथः । गदया भीमसेनेन निहतौ शूरमानिनौ ॥ ३१ ॥

नरेश्वर! आपके पुत्र दुर्मुख और महारथी दुःसह—ये दोनों अपनेको शूरवीर माननेवाले योद्धा थे, जो भीमसेनकी गदासे मारे गये ॥ ३१ ॥ दुर्मर्षणो दुर्विषहो दुर्जयश्च महारथः । कृत्वा त्वसुकरं कर्म गता वैवस्वतक्षयम् ॥ ३२ ॥ इसी प्रकार दुर्मर्षण, दुर्विषह और महारथी दुर्जय दुष्कर कर्म करके यमराजके लोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ३२ ॥ उभौ कलिङ्गवृषकौ भ्रातरौ युद्धदुर्मदौ । कृत्वा चासुकरं कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥ ३३ ॥ युद्धदुर्मद कलिंग और वृषक ये दोनों भाई भी दुष्कर पराक्रम प्रकट करके यमलोकके अतिथि हो चुके हैं ॥ सचिवो वृषवर्मा ते शूरः परमवीर्यवान् । भीमसेनेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ ३४ ॥ आपके मन्त्री परम पराक्रमी शूरवीर वृषवर्मा भीमसेनके द्वारा बलपूर्वक यमलोक पहुँचा दिये गये ॥ ३४ ॥ तथैव पौरवो राजा नागायुतबलो महान् । समरे पाण्डुपुत्रेण निहतः सव्यसाचिना ॥ ३५ ॥ इसी प्रकार दस हजार हाथियोंके समान बलशाली महान् राजा पौरवको समरांगणमें पाण्डुकुमार सव्यसाची अर्जुनने मार डाला ॥ ३५ ॥ वसातयो महाराज द्विसाहस्राः प्रहारिणः । शूरसेनाश्च विक्रान्ताः सर्वे युधि निपातिताः ॥ ३६ ॥ महाराज! प्रहारकुशल दो हजार वसातिलोग और पराक्रमी शूरसेन—ये सब-के-सब युद्धमें मार डाले गये हैं ॥ अभीषाहाः कवचिनः प्रहरन्तो रणोत्कटाः । शिबयश्च रथोदाराः कालिङ्गसहिता हताः ॥ ३७ ॥ रणमें उन्मत्त होकर प्रहार करनेवाले कवचधारी अभीषाह और उदार रथी शिबि—ये सब कलिंगराजसहित मारे गये हैं ॥ ३७ ॥ गोकुले नित्यसंवृद्धा युद्धे परमकोपनाः । तेऽपावृत्तकवीराश्च निहताः सव्यसाचिना ॥ ३८ ॥ जो सदा गोकुलमें पले हैं, युद्धमें अत्यन्त कुपित होकर लड़ते हैं और जिन्होंने कभी युद्धमें पीठ दिखाना नहीं सीखा है, वे गोपाल भी अर्जुनके हाथसे मारे जा चुके हैं ॥ ३८ ॥ श्रेणयो बहुसाहस्राः संशप्तकगणाश्च ये । ते सर्वे पार्थमासाद्य गता वैवस्वतक्षयम् ॥ ३९ ॥

संशप्तकगणोंकी कई हजार श्रेणियाँ थीं। वे सभी अर्जुनका सामना करके यमराजके लोकमें चले गये ॥ ३९ ॥ स्यालौ तव महाराज राजानौ वृषकाचलौ । त्वदर्थमतिविक्रान्तौ निहतौ सव्यसाचिना ॥ ४० ॥ महाराज! आपके दोनों साले राजा वृषक और अचल, जो आपके लिये अत्यन्त पराक्रम प्रकट करते थे, अर्जुनके द्वारा मार डाले गये ॥ ४० ॥ उग्रकर्मा महेष्वासो नामतः कर्मतस्तथा । शाल्वराजो महाबाहुर्भीमसेनेन पातितः ॥ ४१ ॥ जो महान् धनुर्धर तथा नाम और कर्मसे भी उग्रकर्मा थे, उन महाबाहु शाल्वराजको भीमसेनेने मार गिराया ॥ ४१ ॥ ओघवांश्च महाराज बृहन्तः सहितौ रणे । पराक्रमन्तौ मित्रार्थे गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥ ४२ ॥ महाराज! मित्रके लिये रणभूमिमें पराक्रम प्रकट करनेवाले ओघवान् और बृहन्त—ये दोनों एक साथ यमलोकको प्रस्थान कर चुके हैं ॥ ४२ ॥ तथैव रथिनां श्रेष्ठः क्षेमधूर्तिर्विशाम्पते । निहतो गदया राजन् भीमसेनेन संयुगे ॥ ४३ ॥ प्रजानाथ! नरेश्वर! इसी प्रकार रथियोंमें श्रेष्ठ क्षेमधूर्तिको भी युद्धस्थलमें भीमसेनेने अपनी गदासे मार डाला ॥ ४३ ॥ तथा राजन् महेष्वासो जलसंधो महाबलः । सुमहत् कदनं कृत्वा हतः सात्यकिना रणे ॥ ४४ ॥ राजन्! महाधनुर्धर महाबली जलसंध रणभूमिमें शत्रु-सेनाका महान् संहार करके अन्तमें सात्यकिके हाथसे मारे गये ॥ ४४ ॥ अलम्बुषो राक्षसेन्द्रः खरबन्धुरयानवान् । घटोत्कचेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ ४५ ॥ घटोत्कचने पराक्रम करके गर्दभयुक्त सुन्दर रथवाले राक्षसराज अलम्बुषको यमलोक पहुँचा दिया है ॥ ४५ ॥ राधेयः सूतपुत्रश्च भ्रातरश्च महारथाः । केकयाः सर्वशश्चापि निहताः सव्यसाचिना ॥ ४६ ॥ सूतपुत्र राधानन्दन कर्ण, उसके महारथी भाई तथा समस्त केकय भी सव्यसाची अर्जुनके हाथसे मारे गये ॥ ४६ ॥ मालवा मद्रकाश्चैव द्राविडाश्चोग्रकर्मिणः । यौधेयाश्च ललित्थाश्च क्षुद्रकाश्चाप्युशीनराः ॥ ४७ ॥ मावेल्लकास्तुण्डिकेराः सावित्रीपुत्रकाश्च ये ।

प्राच्योदीच्याः प्रतीच्याश्च दाक्षिणात्याश्च मारिष ।। ४८ ।।
पत्तीनां निहताः संघा हयानां प्रयुतानि च ।
रथव्रजाश्च निहता हताश्च वरवारणाः ।। ४९ ।।
मालव, मद्रक, भयंकर कर्म करनेवाले द्राविड़, यौधेय, ललित्थ, क्षुद्रक, उशीनर, मावेल्लक, तुण्डिकेर, सावित्रीपुत्र, प्राच्य, उदीच्य, प्रतीच्य और दाक्षिणात्य, पैदलसमूह, दस लाख घोड़े, रथोंके समूह और बड़े-बड़े गजराज अर्जुनके हाथसे मारे गये हैं ।। ४७—४९ ।।
सध्वजाः सायुधाः शूराः सवर्म्माम्बरभूषणाः ।
कालेन महता यत्ताः कुशलैर्ये च वर्धिताः ।। ५० ।।
ते हताः समरे राजन् पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा ।
राजन्! पालननिपुण पुरुषोंने जिनका दीर्घकालसे पालन-पोषण किया था, जो युद्धमें सदा सावधान रहनेवाले शूरवीर थे, वे सभी अनायास ही महान् कर्म करनेवाले अर्जुनके हाथसे ध्वज, आयुध, कवच, वस्त्र और आभूषणोंसहित समरांगणमें मारे गये ।। ५० १/२ ।।
अन्ये तथामितबलाः परस्परवधैषिणः ।। ५१ ।।
एते चान्ये च बहवो राजानः सगणा रणे ।
हताः सहस्रशो राजन् यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ५२ ।।
महाराज! एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखनेवाले असीम बलशाली अन्यान्य योद्धा भी मौतके घाट उतर चुके हैं। राजन्! ये तथा और भी बहुत-से नरेश रणभूमिमें अपने दलबलके साथ सहस्रोंकी संख्यामें मारे गये हैं। आप मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, वह सब मैंने बता दिया ।। ५१-५२ ।।
एवमेष क्षयो वृत्तः कर्णार्जुनसमागमे ।
महेन्द्रेण यथा वृत्रो यथा रामेण रावणः ।। ५३ ।।
यथा कृष्णेन नरको मुरुश्च नरकारिणा ।
कार्तवीर्यश्च रामेण भार्गवेण यथा हतः ।। ५४ ।।
सज्ञातिबान्धवः शूरः समरे युद्धदुर्मदः ।
रणे कृत्वा महद् युद्धं घोरं त्रैलोक्यमोहनम् ।। ५५ ।।
यथा स्कन्देन महिषो यथा रुद्रेण चान्धकः ।
तथार्जुनेन स हतो द्वैरथे युद्धदुर्मदः ।। ५६ ।।
सामात्यबान्धवो राजन् कर्णः प्रहरतां वरः ।

राजन्! इस प्रकार कर्ण और अर्जुनके संग्राममें यह भारी संहार हुआ है। जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरको, श्रीरामचन्द्रजीने रावणको, नरकशत्रु श्रीकृष्णने नरक और मुरुको तथा भृगुवंशी परशुरामने तीनों लोकोंको मोहित करनेवाला अत्यन्त घोर युद्ध करके समरांगणमें रणदुर्मद शूरवीर कृतवीर्यकुमार अर्जुनको उसके भाई-बन्धुओंसहित मार डाला था, जैसे स्कन्दने महिषासुरका और रुद्रने अन्धकासुरका संहार किया था, उसी प्रकार अर्जुनने योद्धाओंमें श्रेष्ठ युद्धदुर्मद कर्णको द्वैरथयुद्धमें उसके मन्त्री और बन्धुओंसहित मार डाला ।। ५३—५६ १/२ ।।

जयाशा धार्तराष्ट्राणां वैरस्य च मुखं यतः ॥ ५७ ॥
तीर्णस्तत् पाण्डवो राजन् यत् पुरा नावबुध्यसे ।
उच्यमानो महाराज बन्धुभिर्हितकाङ्क्षिभिः ॥ ५८ ॥
तदिदं समनुप्राप्तं व्यसनं सुमहात्ययम् ।

जिससे आपके पुत्रोंने विजयकी आशा लगा रखी थी, जो वैरका मुख बना हुआ था, उससे पाण्डुपुत्र अर्जुन पार हो गये। महाराज! पहले आपने हितैषी बन्धुओंके कहनेपर भी जिसकी ओर ध्यान नहीं दिया, वही यह महान् विनाशकारी संकट प्राप्त हुआ है ।। ५७-५८ १/२ ।।

पुत्राणां राज्यकामानां त्वया राजन् हितैषिणा ॥ ५९ ॥
अहितान्येव चीर्णानि तेषां तत् फलमागतम् ॥ ६० ॥

राजन्! आपने राज्यकी कामना रखनेवाले अपने पुत्रोंके हितकी इच्छा रखते हुए सदा उन पाण्डवोंके अहित ही किये हैं; आपके उन्हीं कर्मोंका यह फल प्राप्त हुआ है ।। ५९-६० ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संजय-वाक्यविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1609)

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षष्ठोऽध्यायः

कौरवोंद्वारा मारे गये प्रधान-प्रधान पाण्डव-पक्षके वीरोंका परिचय

धृतराष्ट्र उवाच

आख्याता मामकास्तात निहता युधि पाण्डवैः ।
हतांश्च पाण्डवेयानां मामकैर्ब्रूहि संजय ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा— तात संजय! तुमने युद्धमें पाण्डवोंद्वारा मारे गये मेरे पक्षके वीरोंके नाम बताये हैं। अब मेरे योद्धाओंद्वारा मारे गये पाण्डव-योद्धाओंका परिचय दो ॥ १ ॥

संजय उवाच

कुन्तयो युधि विक्रान्ता महासत्त्वा महाबलाः ।
सानुबन्धाः सहामात्या गाङ्गेयेन निपातिताः ॥ २ ॥
संजयने कहा— राजन्! अत्यन्त धीर, महान् बलवान् और पराक्रमी जो कुन्तिभोजदेशके योद्धा थे, उन्हें गंगानन्दन भीष्मने मन्त्रियों तथा सगे-सम्बन्धियोंसहित मार गिराया ॥ २ ॥

नारायणा बलभद्राः शूराश्च शतशोऽपरे ।
अनुरक्ताश्च वीरेण भीष्मेण युधि पातिताः ॥ ३ ॥
पाण्डवोंमें अनुराग रखनेवाले जो नारायण और बलभद्र नामवाले सैकड़ों शूरवीर थे, उन्हें भी वीरवर भीष्मने युद्धमें धराशायी कर दिया ॥ ३ ॥

समः किरीटिना संख्ये वीर्येण च बलेन च ।
सत्यजित् सत्यसंधेन द्रोणेन निहतो युधि ॥ ४ ॥
सत्यजित् संग्राममें किरीटधारी अर्जुनके समान बल और पराक्रमसे सम्पन्न था, जिसे युद्धस्थलमें सत्यप्रतिज्ञ द्रोणाचार्यने मार डाला ॥ ४ ॥

पञ्चालानां महेष्वासाः सर्वे युद्धविशारदाः ।
द्रोणेन सह संगम्य गता वैवस्वतक्षयम् ॥ ५ ॥
युद्धकी कलामें कुशल सम्पूर्ण पांचाल महाधनुर्धर द्रोणाचार्यसे टक्कर लेकर यमलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ५ ॥

तथा विराटद्रुपदौ वृद्धौ सहसुतौ नृपौ ।
पराक्रमन्तौ मित्रार्थे द्रोणेन निहतौ रणे ॥ ६ ॥
मित्रके लिये पराक्रम करनेवाले बूढ़े राजा विराट और द्रुपद अपने पुत्रोंसहित द्रोणाचार्यके द्वारा रणभूमिमें मारे गये हैं ॥ ६ ॥

यो बाल एव समरे सम्मितः सव्यसाचिना । केशवेन च दुर्धर्षो बलदेवेन वा विभो ॥ ७ ॥ परेषां कदनं कृत्वा महारथविशारदः । परिवार्य महामात्रैः षड्भिः परमकै रथैः ॥ ८ ॥ अशक्नुवद्भिर्बीभत्सुमभिमन्युर्निपातितः । जो बाल्यावस्थामें ही दुर्धर्ष वीर था और सव्यसाची अर्जुन, भगवान् श्रीकृष्ण अथवा बलदेवजीके समान समझा जाता था तथा जो महान् रथयुद्धमें विशेष कुशल था, वह अभिमन्यु शत्रुओंका संहार करके छः बड़े-बड़े महारथियोंद्वारा, जिनका अर्जुनपर वश नहीं चलता था, चारों ओरसे घेरकर मार डाला गया ॥ ७-८ १/२ ॥

कृतं तं विरथं वीरं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥ दौःशासनिर्महाराज सौभद्रं हतवान् रणे । महाराज! क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहनेवाला वीर सुभद्राकुमार अभिमन्यु रथहीन कर दिया गया था, उस अवस्थामें दुःशासनके पुत्रने उसे रणभूमिमें मारा था ॥ ९ १/२ ॥

सपत्नानां निहन्ता च महत्या सेनया वृतः ॥ १० ॥ अम्बष्ठस्य सुतः श्रीमान् मित्रहेतोः पराक्रमन् । आसाद्य लक्ष्मणं वीरं दुर्योधनसुतं रणे ॥ ११ ॥ सुमहत् कदनं कृत्वा गतो वैवस्वतक्षयम् । शत्रुहन्ता श्रीमान् अम्बष्ठपुत्र अपनी विशाल सेनासे घिरकर मित्रोंके लिये पराक्रम दिखा रहा था। वह शत्रु-सेनाका महान् संहार करके रणभूमिमें दुर्योधनके वीर पुत्र लक्ष्मणसे टक्कर ले यमलोकमें जा पहुँचा ॥

बृहन्तः सुमहेश्वासः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः ॥ १२ ॥ दुःशासनेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् । अस्त्र-विद्याके विशेषज्ञ रणदुर्मद महाधनुर्धर बृहन्तको दुःशासनने बलपूर्वक यमलोक पहुँचाया था ॥ १२ १/२ ॥

मणिमान् दण्डधारश्च राजानौ युद्धदुर्मदौ ॥ १३ ॥ पराक्रमन्तौ मित्रार्थे द्रोणेन युधि पातितौ । युद्धमें उन्मत्त होकर जूझनेवाले राजा मणिमान् और दण्डधार मित्रोंके लिये पराक्रम दिखाते थे। उन दोनोंको द्रोणाचार्यने युद्धमें मार गिराया है ॥ १३ १/२ ॥

अंशुमान् भोजराजस्तु सहसैन्यो महारथः ॥ १४ ॥ भारद्वाजेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् । सेनासहित भोजराज महारथी अंशुमान्‌को भरद्वाजनन्दन द्रोणने पराक्रम करके यमलोक पहुँचाया है ॥ १४ १/२ ॥

सामुद्रश्चित्रसेनश्च सह पुत्रेण भारत ॥ १५ ॥ समुद्रसेनेन बलाद् गमितो यमसादनम् । भारत! समुद्रतटवर्ती राज्यके अधिपति चित्रसेन अपने पुत्रके साथ युद्धमें आकर समुद्रसेनके द्वारा बलपूर्वक यमलोक भेज दिया गया ॥ १५ १/२ ॥ अनूपवासी नीलश्च व्याघ्रदत्तश्च वीर्यवान् ॥ १६ ॥ अश्वत्थाम्ना विकर्णेन गमितो यमसादनम् । समुद्रतटवासी नील और पराक्रमी व्याघ्रदत्त—इन दोनोंको क्रमशः अश्वत्थामा और विकर्णने यमलोक पहुँचा दिया ॥ १६ १/२ ॥ चित्रायुधश्चित्रयोधी कृत्वा च कदनं महत् ॥ १७ ॥ चित्रमार्गेण विक्रम्य विकर्णेन हतो मृधे । विचित्र युद्ध करनेवाले चित्रायुध समरमें विचित्र रीतिसे पराक्रम करते हुए कौरव-सेनाका महान् संहार करके अन्तमें विकर्णके हाथसे मारे गये ॥ १७ १/२ ॥ वृकोदरसमो युद्धे वृतः कैकेययोधिभिः ॥ १८ ॥ कैकेयेन च विक्रम्य भ्रात्रा भ्राता निपातितः । केकयदेशीय योद्धाओंसे घिरे हुए भीमके समान पराक्रमी केकयराजकुमारको उन्हींके भाई दूसरे केकयराजकुमारने बलपूर्वक मार गिराया ॥ १८ १/२ ॥ जनमेजयो गदायोधी पर्वतीयः प्रतापवान् ॥ १९ ॥ दुर्मुखेन महाराज तव पुत्रेण पातितः । महाराज! प्रतापी पर्वतीय राजा जनमेजय गदायुद्धमें कुशल थे। उन्हें आपके पुत्र दुर्मुखने धराशायी कर दिया ॥ रोचमानौ नरव्याघ्रौ रोचमानौ ग्रहाविव ॥ २० ॥ द्रोणेन युगपद् राजन् दिवं सम्प्रापितौ शरैः । राजन्! दो चमकते हुए ग्रहोंके समान नरश्रेष्ठ रोचमान, जो एक ही नामके दो भाई थे, द्रोणाचार्यके द्वारा बाणोंसे एक साथ ही स्वर्गलोक पहुँचा दिये गये ॥ नृपाश्च प्रतियुध्यन्तः पराक्रान्ता विशाम्पते ॥ २१ ॥ कृत्वा नसुकरं कर्म गता वैवस्वतक्षयम् । प्रजानाथ! और भी बहुत-से पराक्रमी नरेश आपकी सेनाका सामना करते हुए दुष्कर पराक्रम करके यमलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ २१ १/२ ॥ पुरुजित् कुन्तिभोजश्च मातुलौ सव्यसाचिनः ॥ २२ ॥ संग्रामनिर्जिताँल्लोकान् गमितौ द्रोणसायकैः ।

पुरुजित् और कुन्तिभोज दोनों सव्यसाची अर्जुनके मामा थे। द्रोणाचार्यके सायकोंने उन्हें भी उन लोकोंमें पहुँचा दिया, जो संग्राममें मारे जानेवाले वीरोंको प्राप्त होते हैं ॥ २२ १/२ ॥

अभिभूः काशिराजश्च काशिकैर्बहुभिर्वृतः ॥ २३ ॥
वसुदानस्य पुत्रेण न्यासितो देहमाहवे ।
काशिराज अभिभू बहुतेरे काशीनिवासी योद्धाओंसे घिरे हुए थे। वसुदानके पुत्रने युद्धस्थलमें उनसे उनके शरीरका परित्याग करवा दिया ॥ २३ १/२ ॥

अमितौजा युधामन्युरुत्तमौजाश्च वीर्यवान् ॥ २४ ॥
निहत्य शतशः शूरानस्मदीयैर्निपातिताः ।
अमितौजा, युधामन्यु तथा पराक्रमी उत्तमौजा ये सैकड़ों शूरवीरोंका संहार करके हमारे सैनिकोंद्वारा मारे गये ॥ २४ १/२ ॥

मित्रवर्मा च पाञ्चाल्यः क्षत्रधर्मा च भारत ॥ २५ ॥
द्रोणेन परमेष्वासौ गमितौ यमसादनम् ।
भारत! पांचालयोद्धा मित्रवर्मा और क्षत्रधर्मा महाधनुर्धर थे। उन्हें भी द्रोणाचार्यने यमलोक पहुँचा दिया ॥ २५ १/२ ॥

शिखण्डितनयो युद्धे क्षत्रदेवो युधां पतिः ॥ २६ ॥
लक्ष्मणेन हतो राजंस्तव पौत्रेण भारत ।
भरतवंशी नरेश! आपके पौत्र लक्ष्मणने युद्धमें योद्धाओंके स्वामी क्षत्रदेवको, जो शिखण्डीका पुत्र था, मार डाला ॥ २६ १/२ ॥

सुचित्रश्चित्रवर्मा च पितापुत्रौ महारथौ ॥ २७ ॥
प्रचरन्तौ महावीरौ द्रोणेन निहतौ रणे ।
सुचित्र और चित्रवर्मा ये दो महावीर महारथी परस्पर पिता-पुत्र थे। रणभूमिमें विचरते हुए इन दोनोंको द्रोणाचार्यने मार डाला ॥ २७ १/२ ॥

वार्द्धक्षेमिर्महाराज समुद्र इव पर्वणि ॥ २८ ॥
आयुधक्षयमासाद्य प्रशान्तिं परमां गतः ।
महाराज! जैसे पूर्णिमाके दिन समुद्र उमड़ पड़ता है, उसी प्रकार वृद्धक्षेमका पुत्र भी युद्धमें उद्धत हो उठा था, परंतु उसके सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो गये थे, इसलिये वह प्राणशून्य हो सदाके लिये परम शान्त हो गया ॥ २८ १/२ ॥

सेनाविन्दुसुतः श्रेष्ठः शात्रवान् प्रहरन् युधि ॥ २९ ॥
बाह्लिकेन महाराज कौरवेन्द्रेण पातितः ।
राजाधिराज! सेनाविन्दुका श्रेष्ठ पुत्र रणभूमिमें शत्रुओंपर प्रहार कर रहा था। उस समय कौरवेन्द्र बाह्लीकने उसे मार गिराया ॥ २९ १/२ ॥

धृष्टकेतुर्महाराज चेदीनां प्रवरो रथः ॥ ३० ॥ कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम् । महाराज! चेदिदेशका श्रेष्ठ रथी धृष्टकेतु भी युद्धमें दुष्कर कर्म करके यमलोकका पथिक हो गया ॥ ३० १/२ ॥

तथा सत्यधृतिर्वीरः कृत्वा कदनमाहवे ॥ ३१ ॥ पाण्डवार्थे पराक्रान्तो गमितो यमसादनम् । पाण्डवोंके लिये पराक्रम प्रकट करनेवाले वीर सत्यधृतिने भी रणभूमिमें शत्रुओंका संहार करके यमलोककी राह ली ॥ ३१ १/२ ॥

सेनाबिन्दुः कुरुश्रेष्ठ कृत्वा कदनमाहवे ॥ ३२ ॥ पुत्रस्तु शिशुपालस्य सुकेतुः पृथिवीपतिः । निहत्य शात्रवान् संख्ये द्रोणेन निहतो युधि ॥ ३३ ॥ कुरुश्रेष्ठ! सेनाविन्दु भी युद्धमें शत्रुओंका संहार करके कालके गालमें चला गया। शिशुपालका पुत्र राजा सुकेतु भी युद्धमें शत्रुसैनिकोंका वध करके स्वयं भी द्रोणाचार्यके हाथसे मारा गया ॥ ३२-३३ ॥

तथा सत्यधृतिर्वीरो मदिराश्वश्च वीर्यवान् । सूर्यदत्तश्च विक्रान्तो निहतो द्रोणसायकैः ॥ ३४ ॥ इसी प्रकार वीर सत्यधृति, पराक्रमी मदिराश्व और बल-विक्रमशाली सूर्यदत्त भी द्रोणाचार्यके बाणोंसे मारे गये हैं ॥ ३४ ॥

श्रेणिमांश्च महाराज युध्यमानः पराक्रमी । कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षयम् ॥ ३५ ॥ महाराज! पराक्रमपूर्वक युद्ध करनेवाले श्रेणिमान्ने युद्धमें दुष्कर कर्म करके यमलोकके मार्गका आश्रय लिया है ॥ ३५ ॥

तथैव युधि विक्रान्तो मागधः परमास्त्रवित् । भीष्मेण निहतो राजञ्शेतेऽद्य परवीरहा ॥ ३६ ॥ राजन्! इसी प्रकार शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला और उत्तम अस्त्रोंका ज्ञाता पराक्रमी मागध वीर भी भीष्मजीके हाथसे मारा जाकर आज रणभूमिमें सो रहा है ॥ ३६ ॥

विराटपुत्रः शङ्खस्तु उत्तरश्च महारथः । कुर्वन्तौ सुमहत् कर्म गतौ वैवस्वतक्षयम् ॥ ३७ ॥ राजा विराटके पुत्र शंख और महारथी उत्तर ये दोनों युद्धमें महान् कर्म करके यमलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ३७ ॥

वसुदानश्च कदनं कुर्वाणोऽतीव संयुगे । भारद्वाजेन विक्रम्य गमितो यमसादनम् ॥ ३८ ॥

वसुदान भी युद्धस्थलमें बड़ा भारी संहार मचा रहा था। परंतु भरद्वाजनन्दन द्रोणने पराक्रम करके उसे यमलोक पहुँचा दिया ।। ३८ ।।
(पाण्ड्यराजश्च विक्रान्तो बलवान् बाहुशालिना ।
अश्वत्थाम्ना हतस्तत्र गमितो वै यमक्षयम् ॥)
अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले अश्वत्थामाने बलवान् एवं पराक्रमी पाण्ड्यराजको मारकर यमलोक पहुँचा दिया ।
एते चान्ये च बहवः पाण्डवानां महारथाः ।
हता द्रोणेन विक्रम्य यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३९ ॥
ये तथा और भी बहुत-से पाण्डव महारथी, जिनके बारेमें आप मुझसे पूछ रहे थे, द्रोणाचार्यके द्वारा बलपूर्वक मार डाले गये ।। ३९ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्ये षष्ठोऽध्यायः ।। ६ ।।
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत कर्णपर्वमें संजय-वाक्यविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ।। ६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं।)