महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भृशं समृद्धो ज्वलनः प्रतापी ॥ ६३ ॥ एवं स नाराचगणप्रतापी शरार्चिरुच्चावचतिग्मतेजाः । ददाह सर्वां तव पुत्रसेना- ममृष्यमाणस्तरसा तरस्वी ॥ ६४ ॥ जैसे वनचरोंद्वारा वनके भीतर लगायी हुई आग धीरे-धीरे बढ़कर प्रज्वलित एवं महान् तापसे युक्त हो घास-फूसके ढेरको, बहुसंख्यक वृक्षोंको और सूखी हुई लतावल्लरियोंको भी जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार नाराचसमूहोंद्वारा ताप देनेवाले, बाणरूपी ज्वालाओंसे युक्त, वेगवान्, प्रचण्ड तेजस्वी और अमर्षमें भरे हुए अर्जुनने समरांगणमें आपके पुत्रकी सारी रथसेनाको शीघ्रतापूर्वक भस्म कर डाला ॥ ६३-६४ ॥
तस्येषवः प्राणहराः सुमुक्ता नासज्जन् वै वर्मसु रुक्मपुङ्खाः । न च द्वितीयं प्रमुमोच बाणं नरे हये वा परमद्विपे वा ॥ ६५ ॥ उनके अच्छी तरह छोड़े हुए सुवर्णमय पंखवाले प्राणान्तकारी बाण कवचोंपर नहीं अटकते थे। उन्हें छेदकर भीतर घुस जाते थे। वे मनुष्य, घोड़े अथवा विशालकाय हाथीपर भी दूसरा बाण नहीं छोड़ते थे (एक ही बाणसे उसका काम तमाम कर देते थे) ॥ ६५ ॥
अनेकरूपाकृतिभिर्हि बाणै- र्महारथानीकमनुप्रविश्य । स एवैकस्तव पुत्रस्य सेनां जघान दैत्यानिव वज्रपाणिः ॥ ६६ ॥ जैसे वज्रधारी इन्द्र दैत्योंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार एकमात्र अर्जुनने ही रथियोंकी विशाल सेनामें प्रवेश करके अनेक रूप-रंगवाले बाणोंद्वारा आपके पुत्रकी सेनाका विनाश कर दिया ॥ ६६ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2631)
पञ्चविंशोऽध्यायः
अर्जुन और भीमसेनद्वारा कौरवोंकी रथसेना एवं गजसेनाका संहार, अश्वत्थामा आदिके द्वारा दुर्योधनकी खोज, कौरवसेनाका पलायन तथा सात्यकिद्वारा संजयका पकड़ा जाना
संजय उवाच
पश्यतां यतमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् ।
संकल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनंजयः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! यद्यपि कौरवयोद्धा युद्धसे पीछे न हटनेवाले शूरवीर थे और विजयके लिये पूरा प्रयत्न कर रहे थे तो भी उनके देखते-देखते अर्जुनने गाण्डीव धनुषसे उनके संकल्पको व्यर्थ कर दिया ॥ १ ॥
इन्द्राशनिसमस्पर्शानविषह्यान् महौजसः ।
विसृजन् दृश्यते बाणान् धारा मुञ्चन्निवाम्बुदः ॥ २ ॥
जैसे बादल पानीकी धारा गिराता है, उसी प्रकार वे बाणोंकी वर्षा करते दिखायी देते थे। उन बाणोंका स्पर्श इन्द्रके वज्रकी भाँति कठोर था। वे बाण असह्य एवं महान् शक्तिशाली थे ॥ २ ॥
तत् सैन्यं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं किरीटिना ।
सम्प्रदुद्राव संग्रामात् तव पुत्रस्य पश्यतः ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! किरीटधारी अर्जुनकी मार खाकर वह बची हुई सेना आपके पुत्रके देखते-देखते रणभूमिसे भाग चली ॥ ३ ॥
पितॄन् भ्रातॄन् परित्यज्य वयस्यानपि चापरे ।
हतधुर्या रथाः केचिद्धतसूतास्तथा परे ॥ ४ ॥
कुछ लोग अपने पिता और भाइयोंको छोड़कर भागे तो दूसरे लोग मित्रोंको। कितने ही रथोंके घोड़े मारे गये थे और कितनोंके सारथि ॥ ४ ॥
भग्नाक्षयुगचक्रेषाः केचिदासन् विशाम्पते ।
अन्येषां सायकाः क्षीणास्तथान्ये बाणपीडिताः ॥ ५ ॥
प्रजानाथ! किन्हींके रथोंके जूए, धुरे, पहिये और हरसे भी टूट गये थे, दूसरे योद्धाओंके बाण नष्ट हो गये और अन्य योद्धा अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हो गये थे ॥
अक्षता युगपत् केचित् प्राद्रवन् भयपीडिताः ।
केचित् पुत्रानुपादाय हतभूयिष्ठबान्धवाः ॥ ६ ॥
कुछ लोग घायल न होनेपर भी भयसे पीड़ित हो एक साथ ही भागने लगे और कुछ लोग अधिकांश बन्धु-बान्धवोंके मारे जानेपर पुत्रोंको साथ लेकर भागे ॥ ६ ॥
विचुक्रुशुः पितॄंस्त्वन्ये सहायानपरे पुनः ।
बान्धवांश्च नरव्याघ्र भ्रातॄन् सम्बन्धिनस्तथा ॥ ७ ॥
दुद्रुवुः केचिदुत्सृज्य तत्र तत्र विशाम्पते ।
बहवोऽत्र भृशं विद्धा मुह्यमाना महारथाः ॥ ८ ॥
नरव्याघ्र! कोई पिताको पुकारते थे, कोई सहायकोंको। प्रजानाथ! कुछ लोग अपने भाई-बन्धुओं और सगे-सम्बन्धियोंको जहाँ-के-तहाँ छोड़कर भाग गये। बहुत-से महारथी पार्थके बाणोंसे अत्यन्त घायल हो मूर्च्छित हो रहे थे ॥ ७-८ ॥
निःश्वसन्ति स्म दृश्यन्ते पार्थबाणहता नराः ।
तानन्ये रथमारोप्य ह्याश्वास्य च मुहूर्तकम् ॥ ९ ॥
विश्रान्ताश्च वितृष्णाश्च पुनर्युद्धाय जग्मिरे ।
अर्जुनके बाणोंसे आहत हो कितने ही मनुष्य रणभूमिमें ही पड़े-पड़े उच्छ्वास लेते दिखायी देते थे। उन्हें दूसरे लोग अपने रथपर बिठाकर घड़ी-दो-घड़ी आश्वासन दे स्वयं भी विश्राम करके प्यास बुझाकर पुनः युद्धके लिये जाते थे ॥ ९ १/२ ॥
तानपास्य गताः केचित् पुनरेव युयुत्सवः ॥ १० ॥
कुर्वन्तस्तव पुत्रस्य शासनं युद्धदुर्मदाः ।
रणभूमिमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले कितने ही युद्धाभिलाषी योद्धा उन घायलोंको वैसे ही छोड़कर आपके पुत्रकी आज्ञाका पालन करते हुए पुनः युद्धके लिये चल देते थे ॥ १० १/२ ॥
पानीयमपरे पीत्वा पर्याश्वास्य च वाहनम् ॥ ११ ॥
वर्माणि च समारोप्य केचिद् भरतसत्तम ।
समाश्वास्यापरे भ्रातॄन् निक्षिप्य शिबिरेऽपि च ॥ १२ ॥
पुत्रानन्ये पितॄनन्ये पुनर्युद्धमरोचयन् ।
भरतश्रेष्ठ! दूसरे लोग स्वयं पानी पीकर घोड़ोंकी भी थकावट दूर करते। उसके बाद कवच धारण करके लड़नेके लिये जाते थे। अन्य बहुत-से सैनिक अपने घायल बन्धुओं, पुत्रों और पिताओंको आश्वासन दे उन्हें शिविरमें रख आते। उसके बाद युद्धमें मन लगाते थे ॥ ११-१२ १/२ ॥
सज्जयित्वा रथान् केचिद् यथामुख्यं विशाम्पते ॥ १३ ॥
आप्लुत्य पाण्डवानीकं पुनर्युद्धमरोचयन् ।
प्रजानाथ! कुछ लोग अपने रथकी रणसामग्रीसे सुसज्जित करके पाण्डव-सेनापर चढ़ आते और अपनी प्रधानताके अनुसार किसी श्रेष्ठ वीरके साथ जूझना पसंद करते थे ॥
ते शूराः किङ्किणीजालैः समाच्छन्ना बभासिरे ॥ १४ ॥
त्रैलोक्यविजये युक्ता यथा दैतेयदानवाः ।
वे शूरवीर कौरव-सैनिक रथमें लगे हुए किंकिणी-समूहसे आच्छादित हो तीनों लोकोंपर विजय पानेके लिये उद्यत हुए दैत्यों और दानवोंके समान सुशोभित होते थे ॥
आगम्य सहसा केचिद् रथैः स्वर्णविभूषितैः ॥ १५ ॥
पाण्डवानामनीकेषु धृष्टद्युम्नमयोधयन् ।
कुछ लोग अपने सुवर्णभूषित रथोंके द्वारा सहसा आकर पाण्डवसेनाओंमें धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध करने लगे ॥
धृष्टद्युम्नोऽपि पाञ्चाल्यः शिखण्डी च महारथः ॥ १६ ॥
नाकुलिस्तु शतानीको रथानीकमयोधयन् ।
पांचालराजपुत्र धृष्टद्युम्न, महारथी शिखण्डी और नकुलपुत्र शतानीक—ये आपकी रथसेनाके साथ युद्ध कर रहे थे ॥ १६ १/२ ॥
पाञ्चाल्यस्तु ततः क्रुद्धः सैन्येन महताऽऽवृतः ॥ १७ ॥
अभ्यद्रवत् सुसंक्रुद्धस्तावकान् हन्तुमुद्यतः ।
तदनन्तर आपके सैनिकोंका वध करनेके लिये उद्यत हो विशाल सेनासे घिरे हुए धृष्टद्युम्नने अत्यन्त क्रोधपूर्वक आक्रमण किया ॥ १७ १/२ ॥
ततस्त्वापततस्तस्य तव पुत्रो जनाधिप ॥ १८ ॥
बाणसंघाननेकान् वै प्रेषयामास भारत ।
नरेश्वर! भरतनन्दन! उस समय आपके पुत्रने आक्रमण करनेवाले धृष्टद्युम्नपर बहुत-से बाणसमूहोंका प्रहार किया ॥
धृष्टद्युम्नस्ततो राजंस्तव पुत्रेण धन्विना ॥ १९ ॥
नाराचैरर्धनाराचैर्बहुभिः क्षिप्रकारिभिः ।
वत्सदान्तैश्च बाणैश्च कर्मारपरिमार्जितैः ॥ २० ॥
अश्वांश्च चतुरो हत्वा बाह्वोरुरसि चार्पितः ।
राजन्! आपके धनुर्धर पुत्रने बहुत-से नाराच, अर्ध-नाराच, शीघ्रकारी वत्सदान्त और कारीगरद्वारा साफ किये हुए बाणोंसे धृष्टद्युम्नके चारों घोड़ोंको मारकर उनकी दोनों भुजाओं और छातीमें भी चोट पहुँचायी ॥ १९-२० १/२ ॥
सोऽतिविद्धो महेष्वासस्तोत्रादित इव द्विपः ॥ २१ ॥
तस्याश्वांश्चतुरो बाणैः प्रेषयामास मृत्यवे ।
सारथेश्चास्य भल्लेन शिरः कायादपाहरत् ॥ २२ ॥
दुर्योधनके प्रहारसे अत्यन्त घायल हुए महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न अंकुशसे पीड़ित हुए हाथीके समान कुपित हो उठे और उन्होंने अपने बाणोंद्वारा उसके चारों घोड़ोंको मौतके हवाले कर दिया तथा एक भल्लसे उसके सारथिका भी सिर धड़से काट लिया ॥ २१-२२ ॥
ततो दुर्योधनो राजा पृष्ठमारुह्य वाजिनः । अपाक्रामद्द्रुतरथो नातिदूरमरिंदमः ॥ २३ ॥ इस प्रकार रथके नष्ट हो जानेपर शत्रुदमन राजा दुर्योधन एक घोड़ेकी पीठपर सवार हो वहाँसे कुछ दूर हट गया ॥ २३ ॥ दृष्ट्वा तु हतविक्रान्तं स्वमनीकं महाबलः । तव पुत्रो महाराज प्रययौ यत्र सौबलः ॥ २४ ॥ महाराज! अपनी सेनाका पराक्रम नष्ट हुआ देख आपका महाबली पुत्र दुर्योधन वहीं चला गया, जहाँ सुबलपुत्र शकुनि खड़ा था ॥ २४ ॥ ततो रथेषु भग्नेषु त्रिसाहस्रा महाद्विपाः । पाण्डवान् रथिनः सर्वान् समन्तात् पर्यवारयन् ॥ २५ ॥ रथसेनाके भंग हो जानेपर तीन हजार विशालकाय गजराजोंने समस्त पाण्डवरथियोंको चारों ओरसे घेर लिया ॥ ते वृताः समरे पञ्च गजानीकेन भारत । अशोभन्त महाराज ग्रहा व्याप्ता घनैख्रिव ॥ २६ ॥ भरतनन्दन! महाराज! समरांगणमें गजसेनासे घिरे हुए पाँचों पाण्डव मेघोंसे आवृत हुए पाँच ग्रहोंके समान शोभा पाते थे ॥ २६ ॥ ततोऽर्जुनो महाराज लब्धलक्ष्यो महाभुजः । विनिर्ययौ रथेनैव श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ॥ २७ ॥ राजेन्द्र! तब भगवान् श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं, वे श्वेतवाहन महाबाहु अर्जुन अपने बाणोंका लक्ष्य पाकर रथके द्वारा आगे बढ़े ॥ २७ ॥ तैः समन्तात् परिवृतः कुञ्जरैः पर्वतोपमैः । नाराचैर्विमलैस्तीक्ष्णैर्गजानीकमयोधयत् ॥ २८ ॥ उन्हें चारों ओरसे पर्वताकार हाथियोंने घेर रखा था। वे तीखी धारवाले निर्मल नाराचोंद्वारा उस गजसेनाके साथ युद्ध करने लगे ॥ २८ ॥ तत्रैकबाणनिहतानपश्याम महागजान् । पतितान् पात्यमानांश्च निर्भिन्नान् सव्यसाचिना ॥ २९ ॥ वहाँ हमने देखा कि सव्यसाची अर्जुनके एक ही बाणकी चोट खाकर बड़े-बड़े हाथियोंके शरीर विदीर्ण होकर गिर गये हैं और लगातार गिराये जा रहे हैं ॥ २९ ॥ भीमसेनस्तु तान् दृष्ट्वा नागान् मत्तगजोपमः । करेणादाय महतीं गदामभ्यपतद् बली ॥ ३० ॥ अथाप्लुत्य रथात् तूर्णं दण्डपाणिरिवान्तकः ।
मतवाले हाथीके समान पराक्रमी बलवान् भीमसेन उन गजराजोंको आते देख तुरंत ही रथसे कूदकर हाथमें विशाल गदा लिये दण्डधारी यमराजके समान उनपर टूट पड़े ॥ ३० १/२ ॥
तमुद्यतगदं दृष्ट्वा पाण्डवानां महारथम् ॥ ३१ ॥ वित्रेसुस्तावकाः सैन्याः शकृन्मूत्रे च सुस्रुवुः । पाण्डव-महारथी भीमसेनको गदा उठाये देख आपके सैनिक भयसे थर्रा उठे और मल-मूत्र करने लगे ॥ ३१ १/२ ॥
आविग्नं च बलं सर्वं गदाहस्ते वृकोदरे ॥ ३२ ॥ गदया भीमसेनेन भिन्नकुम्भान् रजस्वलान् । धावमानानपश्याम कुञ्जरान् पर्वतोपमान् ॥ ३३ ॥ भीमसेनके गदा हाथमें लेते ही सारी कौरवसेना उद्विग्न हो उठी। हमने देखा, भीमसेनकी गदासे उन धूलिधूसर पर्वताकार हाथियोंके कुम्भस्थल फट गये हैं और वे इधर-उधर भाग रहे हैं ॥ ३२-३३ ॥
प्राद्रवन् कुञ्जरास्ते तु भीमसेनगदाहताः । पेतुरार्तस्वरं कृत्वा छिन्नपक्षा इवाद्रयः ॥ ३४ ॥ भीमसेनकी गदासे घायल हो वे हाथी भाग चले और आर्तनाद करके पंख कटे हुए पर्वतोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३४ ॥
प्रभिन्नकुम्भांस्तु बहून् द्रवमाणानितस्ततः । पतमानांश्च सम्प्रेक्ष्य वित्रेसुस्तव सैनिकाः ॥ ३५ ॥ कुम्भस्थल फट जानेके कारण इधर-उधर भागते और गिरते हुए बहुत-से हाथियोंको देखकर आपके सैनिक संत्रस्त हो उठे ॥ ३५ ॥
युधिष्ठिरोऽपि संक्रुद्धो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । गार्ध्रपत्रैः शितैर्बाणैर्निन्युर्वै यमसादनम् ॥ ३६ ॥ युधिष्ठिर तथा माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव भी अत्यन्त कुपित हो गीधकी पाँखोंसे युक्त पैने बाणोंद्वारा उन हाथियोंको यमलोक भेजने लगे ॥ ३६ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु समरे पराजित्य नराधिपम् । अपक्रान्ते तव सुते हयपृष्ठं समाश्रिते ॥ ३७ ॥ दृष्ट्वा च पाण्डवान् सर्वान् कुञ्जरैः परिवारितान् । धृष्टद्युम्नो महाराज सहसा समुपाद्रवत् ॥ ३८ ॥ पुत्रः पाञ्चालराजस्य जिघांसुः कुञ्जरान् ययौ ।
उधर धृष्टद्युम्नने समरांगणमें राजा दुर्योधनको पराजित कर दिया था। महाराज! जब
आपका पुत्र घोड़ेकी पीठपर सवार हो वहाँसे भाग गया, तब समस्त पाण्डवोंको हाथियोंसे
घिरा हुआ देखकर धृष्टद्युम्नने सहसा उस गजसेनापर धावा किया। पांचालराजके पुत्र
धृष्टद्युम्न उन हाथियोंको मार डालनेके लिये वहाँसे चल दिये ।। ३७-३८ १/२ ।।
अदृष्ट्वा तु रथानीके दुर्योधनमरिंदमम् ।। ३९ ।।
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ।
अपृच्छन् क्षत्रियांस्तत्र क्व नु दुर्योधनो गतः ।। ४० ।।
इधर रथसेनामें शत्रुदमन दुर्योधनको न देखकर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वतवंशी
कृतवर्माने समस्त क्षत्रियोंसे पूछा—'राजा दुर्योधन कहाँ चले गये? ।।
तेऽपश्यमाना राजानं वर्तमाने जनक्षये ।
मन्वाना निहतं तत्र तव पुत्रं महारथाः ।। ४१ ।।
विवर्णवदना भूत्वा पर्यपृच्छन्त ते सुतम् ।
वर्तमान जनसंहारमें राजाको न देखकर वे महारथी आपके पुत्रको मारा गया मान बैठे
और मुँह उदास करके सबसे आपके पुत्रका पता पूछने लगे ।। ४१ १/२ ।।
आहुः केचिद्धते सूते प्रयातो यत्र सौबलः ।। ४२ ।।
हित्वा पाञ्चालराजस्य तदनीकं दुरुत्सहम् ।
कुछ लोगोंने कहा—‘सारथिके मारे जानेपर पांचालराजकी उस दुःसह सेनाको
त्यागकर राजा दुर्योधन वहीं गये हैं, जहाँ शकुनि हैं' ।। ४२ १/२ ।।
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र क्षत्रिया भृशविक्षताः ।। ४३ ।।
दुर्योधनेन किं कार्यं द्रक्ष्यध्वं यदि जीवति ।
युध्यध्वं सहिताः सर्वे किं वो राजा करिष्यति ।। ४४ ।।
दूसरे अत्यन्त घायल हुए क्षत्रिय वहाँ इस प्रकार कहने लगे—‘अरे! दुर्योधनसे यहाँ
क्या काम है? यदि वे जीवित होंगे तो तुम सब लोग उन्हें देख ही लोगे। इस समय तो सब
लोग एक साथ होकर केवल युद्ध करो। राजा तुम्हारी क्या (सहायता) करेंगे' ।। ४३-४४ ।।
ते क्षत्रियाः क्षतैर्गात्रैर्हतभूयिष्ठवाहनाः ।
शरैः सम्पीड्यमानास्तु नातिव्यक्तमथाब्रुवन् ।। ४५ ।।
इदं सर्वं बलं हन्मो येन स्म परिवारिताः ।
एते सर्वे गजान् हत्वा उपयान्ति स्म पाण्डवाः ।। ४६ ।।
वहाँ जो क्षत्रिय युद्ध कर रहे थे, उनके अधिकांश वाहन नष्ट हो गये थे। शरीर क्षत-
विक्षत हो रहे थे। वे बाणोंसे पीड़ित होकर कुछ अस्पष्ट वाणीमें बोले—‘हमलोग जिससे
घिरे हैं, इस सारी सेनाको मार डालें। ये सारे पाण्डव गजसेनाका संहार करके हमारे समीप
चले आ रहे हैं' ।। ४५-४६ ।।
श्रुत्वा तु वचनं तेषामश्वत्थामा महाबलः ।
भित्त्वा पाञ्चालराजस्य तदनीकं दुरुत्सहम् ॥ ४७ ॥
कृपश्च कृतवर्मा च प्रययौ यत्र सौबलः ।
रथानीकं परित्यज्य शूराः सुदृढधन्विनः ॥ ४८ ॥
उनकी बात सुनकर महाबली अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा—ये सभी दृढ़ धनुर्धर शूरवीर पांचालराजकी उस दुःसह सेनाका व्यूह तोड़कर, रथसेनाका परित्याग करके जहाँ शकुनि था, वहीं जा पहुँचे ॥ ४७-४८ ॥
ततस्तेषु प्रयातेषु धृष्टद्युम्नपुरस्कृताः ।
आययुः पाण्डवा राजन् विनिघ्नन्तः स्म तावकम् ॥ ४९ ॥
राजन्! उन सबके आगे बढ़ जानेपर धृष्टद्युम्न आदि पाण्डव आपकी सेनाका संहार करते हुए वहाँ आ पहुँचे ॥
दृष्ट्वा तु तानापततः सम्प्रहृष्टान् महारथान् ।
पराक्रान्तास्ततो वीरा निराशा जीविते तदा ॥ ५० ॥
हर्ष और उत्साहमें भरे हुए उन महारथियोंको आक्रमण करते देख आपके पराक्रमी वीर उस समय जीवनसे निराश हो गये ॥ ५० ॥
विवर्णमुखभूयिष्ठमभवत् तावकं बलम् ।
परिक्षीणायुधान् दृष्ट्वा तानहं परिवारितान् ॥ ५१ ॥
राजन् बलेन द्वयङ्गेन त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ।
आत्मना पञ्चमोऽयुध्यं पाञ्चालस्य बलेन ह ॥ ५२ ॥
आपकी सेनाके अधिकांश योद्धाओंका मुख उदास हो गया। उन सबके आयुध नष्ट हो गये थे और वे चारों ओरसे घिर गये थे। राजन्! उन सबकी वैसी अवस्था देख मैं जीवनका मोह छोड़कर अन्य चार महारथियोंको साथ ले हाथी और घोड़े दो अंगोंवाली सेनासे मिलकर धृष्टद्युम्नकी सेनाके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५१-५२ ॥
तस्मिन् देशे व्यवस्थाय यत्र शारद्वतः स्थितः ।
सम्प्राद्रुता वयं पञ्च किरीटिशरपीडिताः ॥ ५३ ॥
धृष्टद्युम्नं महारौद्रं तत्र नोऽभूद् रणो महान् ।
जितास्तेन वयं सर्वे व्यपयाम रणात् ततः ॥ ५४ ॥
मैं उसी स्थानमें स्थित होकर युद्ध कर रहा था, जहाँ कृपाचार्य मौजूद थे; परंतु किरीटधारी अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित होकर हम पाँचों वहाँसे भागकर महाभयंकर धृष्टद्युम्नके पास जा पहुँचे। वहाँ उनके साथ हमलोगोंका बड़ा भारी युद्ध हुआ। उन्होंने हम सबको परास्त कर दिया। तब हम वहाँसे भी भाग निकले ॥ ५३-५४ ॥
अथापश्यं सात्यकिं तमुपायान्तं महारथम् ।
रथैश्चतुःशतैर्वीरो मामभ्यद्रवदाहवे ॥ ५५ ॥
इतनेमें ही मैंने महारथी सात्यकिको अपने पास आते देखा। वीर सात्यकिने युद्धस्थलमें चार सौ रथियोंके साथ मुझपर धावा किया ।। ५५ ।। धृष्टद्युम्नादहं मुक्तः कथंचिच्छ्रान्तवाहनात् । पतितो माधवानीकं दुष्कृती नरकं यथा ।। ५६ ।। थके हुए वाहनोंवाले धृष्टद्युम्नसे किसी प्रकार छूटा तो मैं सात्यकिकी सेनामें आ फँसा; जैसे कोई पापी नरकमें गिर गया हो ।। ५६ ।। तत्र युद्धमभूद् घोरं मुहूर्तमतिदारुणम् । सात्यकिस्तु महाबाहुर्मम हत्वा परिच्छदम् ।। ५७ ।। जीवग्राहमगृह्णान्मां मूर्च्छितं पतितं भुवि । वहाँ दो घड़ीतक बड़ा भयंकर एवं घोर युद्ध हुआ। महाबाहु सात्यकिने मेरी सारी युद्धसामग्री नष्ट कर दी और जब मैं मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब मुझे जीवित ही पकड़ लिया ।। ५७ १/२ ।। ततो मुहूर्तादिव तद् गजानीकमवध्यत ।। ५८ ।। गदया भीमसेनेन नाराचैरर्जुनेन च । तदनन्तर दो ही घड़ीमें भीमसेनने गदासे और अर्जुनने नाराचोंसे उस गज-सेनाका संहार कर डाला ।। अभिपिष्टैर्महानागैः समन्तात् पर्वतोपमैः ।। ५९ ।। नातिप्रसिद्धैव गतिः पाण्डवानामजायत । चारों ओर पर्वताकार विशालकाय हाथी पड़े थे, जो भीमसेन और अर्जुनके आघातोंसे पिस गये थे। उनके कारण पाण्डवोंका आगे बढ़ना अत्यन्त दुष्कर हो गया था ।। रथमार्गं ततश्चक्रे भीमसेनो महाबलः ।। ६० ।। पाण्डवानां महाराज व्याकर्षन्महागजान् । महाराज! तब महाबली भीमसेनने बड़े-बड़े हाथियोंको खींचकर हटाया और पाण्डवोंके लिये रथ जानेका मार्ग बनाया ।। ६० १/२ ।। अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ।। ६१ ।। अपश्यन्तो रथानीके दुर्योधनमरिंदमम् । राजानं मृगयामासुस्तव पुत्रं महारथम् ।। ६२ ।। इधर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा—ये रथ-सेनामें आपके महारथी पुत्र शत्रुदमन राजा दुर्योधनको न देखकर उसकी खोज करने लगे ।। ६१-६२ ।। परित्यज्य च पाञ्चाल्यं प्रयाता यत्र सौबलः । राज्ञोऽदर्शनसंविग्ना वर्तमाने जनक्षये ।। ६३ ।। वे धृष्टद्युम्नका सामना करना छोड़कर जहाँ शकुनि था, वहाँ चले गये। वर्तमान नरसंहारमें राजा दुर्योधनको न देखनेके कारण वे उद्विग्न हो उठे थे ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि दुर्योधनापयाने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें दुर्योधनका पलायनविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2640)
षड्विंशोऽध्यायः
भीमसेनके द्वारा धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका और बहुत-सी चतुरंगिणी सेनाका वध
संजय उवाच
गजानीके हते तस्मिन् पाण्डुपुत्रेण भारत ।
वध्यमाने बले चैव भीमसेनेन संयुगे ॥ १ ॥
चरन्तं च तथा दृष्ट्वा भीमसेनमरिंदमम् ।
दण्डहस्तं यथा क्रुद्धमन्तकं प्राणहारिणम् ॥ २ ॥
समेत्य समरे राजन् हतशेषाः सुतास्तव ।
अदृश्यमाने कौरव्ये पुत्रे दुर्योधने तव ॥ ३ ॥
सोदर्याः सहिता भूत्वा भीमसेनमुपाद्रवन् ।
**संजय कहते हैं—**राजन्! भरतनन्दन! पाण्डुपुत्र भीमसेनके द्वारा आपकी गजसेना तथा दूसरी सेनाका भी संहार हो जानेपर जब आपका पुत्र कुरुवंशी दुर्योधन कहीं दिखायी नहीं दिया, तब मरनेसे बचे हुए आपके सभी पुत्र एक साथ हो गये और समरांगणमें दण्डधारी, प्राणान्तकारी यमराजके समान कुपित हुए शत्रुदमन भीमसेनको विचरते देख सब मिलकर उनपर टूट पड़े ॥
दुर्मर्षणः श्रुतान्तश्च जैत्रो भूरिबलो रविः ॥ ४ ॥
जयत्सेनः सुजातश्च तथा दुर्विषहोऽरिहा ।
दुर्विमोचननामा च दुष्प्रधर्षस्तथैव च ॥ ५ ॥
श्रुतर्वा च महाबाहुः सर्वे युद्धविशारदाः ।
इत्येते सहिता भूत्वा तव पुत्राः समन्ततः ॥ ६ ॥
भीमसेनमभिद्रुत्य रुरुधुः सर्वतोदिशम् ।
दुर्मर्षण, श्रुतान्त (चित्रांग), जैत्र, भूरिबल (भीमबल), रवि, जयत्सेन, सुजात, दुर्विषह (दुर्विगाह), शत्रुनाशक दुर्विमोचन, दुष्प्रधर्ष (दुष्प्रधर्षण) और महाबाहु श्रुतर्वा—ये सभी आपके युद्धविशारद पुत्र एक साथ हो सब ओरसे भीमसेनपर धावा करके उनकी सम्पूर्ण दिशाओंको रोककर खड़े हो गये ॥ ४—६ ½ ॥
ततो भीमो महाराज स्वरथं पुनरास्थितः ॥ ७ ॥
मुमोच निशितान् बाणान् पुत्राणां तव मर्मसु ।
महाराज! तब भीम पुनः अपने रथपर आरूढ़ हो आपके पुत्रोंके मर्मस्थानोंमें तीखे बाणोंका प्रहार करने लगे ॥
ते कीर्यमाणा भीमेन पुत्रास्तव महारणे ।। ८ ।।
भीमसेनम्पाकर्षन् प्रवणादिव कुञ्जरम् ।
उस महासमरमें जब भीमसेन आपके पुत्रोंपर बाणोंका प्रहार करने लगे, तब वे भीमसेनको उसी प्रकार दूरतक खींच ले गये, जैसे शिकारी नीचे स्थानसे हाथीको खींचते हैं ।। ८ १/२ ।।
ततः क्रुद्धो रणे भीमः शिरो दुर्मर्षणस्य ह ।। ९ ।।
क्षुरप्रेण प्रमथ्याशु पातयामास भूतले ।
तब रणभूमिमें क्रुद्ध हुए भीमसेनने एक क्षुरप्रसे दुर्मर्षणका मस्तक शीघ्रतापूर्वक पृथ्वीपर काट गिराया ।।
ततोऽपरेण भल्लेन सर्वावरणभेदिना ।। १० ।।
श्रुतान्तमवधीद् भीमस्तव पुत्रं महारथः ।
तत्पश्चात् समस्त आवरणोंका भेदन करनेवाले दूसरे भल्लके द्वारा महारथी भीमसेनने आपके पुत्र श्रुतान्तका अन्त कर दिया ।। १० १/२ ।।
जयत्सेनं ततो विद्ध्वा नाराचेन हसन्निव ।। ११ ।।
पातयामास कौरव्यं रथोपस्थादरिंदमः ।
फिर हँसते-हँसते उन शत्रुदमन वीरने कुरुवंशी जयत्सेनको नाराचसे घायल करके उसे रथकी बैठकसे नीचे गिरा दिया ।। ११ १/२ ।।
स पपात रथाद् राजन् भूमौ तूर्णं ममार च ।। १२ ।।
श्रुतर्वा तु ततो भीमं क्रुद्धो विव्याध मारिष ।
शतेन गृध्रवाजानां शराणां नतपर्वणाम् ।। १३ ।।
राजन्! जयत्सेन रथसे पृथ्वीपर गिरा और तुरंत मर गया। मान्यवर नरेश! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए श्रुतर्वाने गीधकी पाँख और झुकी हुई गाँठवाले सौ बाणोंसे भीमसेनको बींध डाला ।। १२-१३ ।।
ततः क्रुद्धो रणे भीमो जैत्रं भूरिबलं रविम् ।
त्रीनेतांस्त्रिभिरानर्च्छद् विषाग्निप्रतिमैः शरैः ।। १४ ।।
यह देख भीमसेन क्रोधसे जल उठे और उन्होंने रणभूमिमें विष और अग्निके समान भयंकर तीन बाणोंद्वारा जैत्र, भूरिबल और रवि—इन तीनोंपर प्रहार किया ।। १४ ।।
ते हता न्यपतन् भूमौ स्यन्दनेभ्यो महारथाः ।
वसन्ते पुष्पशबला निकृत्ता इव किंशुकाः ।। १५ ।।
उन बाणोंद्वारा मारे गये वे तीनों महारथी वसन्त-ऋतुमें कटे हुए पुष्पयुक्त पलाशके वृक्षोंकी भाँति रथोंसे पृथ्वीपर गिर पड़े ।। १५ ।।
ततोऽपरेण भल्लेन तीक्ष्णेन च परंतपः ।
दुर्विमोचनमाहत्य प्रेषयामास मृत्यवे ।। १६ ।।
इसके बाद शत्रुओंको संताप देनेवाले भीमसेनने दूसरे तीखे भल्लसे दुर्विमोचनको मारकर मृत्युके लोकमें भेज दिया ।। १६ ।।
स हतः प्रापतद् भूमौ स्वरथाद् रथिनां वरः ।
गिरेस्तु कूटजो भग्नॊ मारुतेनेव पादपः ।। १७ ।।
रथियोंमें श्रेष्ठ दुर्विमोचन उस भल्लकी चोट खाकर अपने रथसे भूमिपर गिर पड़ा, मानो पर्वतके शिखरपर उत्पन्न हुआ वृक्ष वायुके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो ।। १७ ।।
दुष्प्रधर्षं ततश्चैव सुजातं च सुतं तव ।
एकैकं न्यहनत् संख्ये द्वाभ्यां द्वाभ्यां चमूमुखे ।। १८ ।।
तदनन्तर भीमसेनने आपके पुत्र दुष्प्रधर्ष और सुजातको रणक्षेत्रमें सेनाके मुहानेपर दो-दो बाणोंसे मार गिराया ।। १८ ।।
तौ शिलीमुखविद्धाङ्गौ पेततू रथसत्तमौ ।
ततः पतन्तं समरे अभिवीक्ष्य सुतं तव ।। १९ ।।
भल्लेन पातयामास भीमो दुर्विषहं रणे ।
स पपात हतो वाहात् पश्यतां सर्वधन्विनाम् ।। २० ।।
वे दोनों महारथी वीर बाणोंसे सारा शरीर बिंध जानेके कारण रणभूमिमें गिर पड़े। तत्पश्चात् आपके पुत्र दुर्विषहको संग्राममें चढ़ाई करते देख भीमसेनने एक भल्लसे मार गिराया। उस भल्लकी चोट खाकर दुर्विषह सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते रथसे नीचे जा गिरा ।। १९-२० ।।
दृष्ट्वा तु निहतान् भ्रातॄन् बहूनेकेन संयुगे ।
अमर्षवशमापन्नः श्रुतर्वा भीममभ्ययात् ।। २१ ।।
युद्धस्थलमें एकमात्र भीमके द्वारा अपने बहुत-से भाइयोंको मारा गया देख श्रुतर्वा अमर्षके वशीभूत हो भीमसेनका सामना करनेके लिये आ पहुँचा ।। २१ ।।
विक्षिपन् सुमहच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ।
विसृजन् सायकांश्चैव विषाग्निप्रतिमान् बहून् ।। २२ ।।
वह अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको खींचकर उसके द्वारा विष और अग्निके समान भयंकर बहुतेरे बाणोंकी वर्षा कर रहा था ।। २२ ।।
स तु राजन् धनुश्छित्त्वा पाण्डवस्य महामृधे ।
अथैनं छिन्नधन्वानं विंशत्या समवाकिरत् ।। २३ ।।
राजन्! उसने उस महासमरमें पाण्डुपुत्रके धनुषको काटकर कटे हुए धनुषवाले भीमसेनको बीस बाणोंसे घायल कर दिया ।। २३ ।।
ततोऽन्यद् धनुरदाय भीमसेनो महाबलः ।
अवाकिरत् तव सुतं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।। २४ ।।
तब महाबली भीमसेन दूसरा धनुष लेकर आपके पुत्रपर बाणोंकी वर्षा करने लगे और बोले—‘खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ २४ ॥
महदासीत् तयोर्युद्धं चित्ररूपं भयानकम् ।
यादृशं समरे पूर्वं जम्भवासवयोर्युधि ॥ २५ ॥
उस समय उन दोनोंमें विचित्र, भयानक और महान् युद्ध होने लगा। पूर्वकालमें रणक्षेत्रमें जम्भ और इन्द्रका जैसा युद्ध हुआ था, वैसा ही उन दोनोंका भी हुआ ॥ २५ ॥
तयोस्तत्र शितैर्मुक्तैर्यमदण्डनिभैः शरैः ।
समाच्छन्ना धरा सर्वा खं दिशो विदिशस्तथा ॥ २६ ॥
उन दोनोंके छोड़े हुए यमदण्डके समान तीखे बाणोंसे सारी पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ और विदिशाएँ आच्छादित हो गयीं ॥ २६ ॥
ततः श्रुतर्वा संक्रुद्धो धनुरादाय सायकैः ।
भीमसेनं रणे राजन् बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ २७ ॥
राजन्! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए श्रुतर्वाने धनुष लेकर अपने बाणोंसे रणभूमिमें भीमसेनकी दोनों भुजाओं और छातीमें प्रहार किया ॥ २७ ॥
सोऽतिविद्धो महाराज तव पुत्रेण धन्विना ।
भीमः संचुक्षुभे क्रुद्धः पर्वणीव महोदधिः ॥ २८ ॥
महाराज! आपके धनुर्धर पुत्रद्वारा अत्यन्त घायल कर दिये जानेपर भीमसेनका क्रोध भड़क उठा और वे पूर्णिमाके दिन उमड़ते हुए महासागरके समान बहुत ही क्षुब्ध हो उठे ॥ २८ ॥
ततो भीमो रुषाविष्टः पुत्रस्य तव मारिष ।
सारथिं चतुरश्चाश्वान् शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ २९ ॥
आर्य! फिर रोषसे आविष्ट हुए भीमसेनने अपने बाणोंद्वारा आपके पुत्रके सारथि और चारों घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया ॥ २९ ॥
विरथं तं समालक्ष्य विशिखैर्लोमवाहिभिः ।
अवाकिरदमेयात्मा दर्शयन् पाणिलाघवम् ॥ ३० ॥
अमेय आत्मबलसे सम्पन्न भीमसेन श्रुतर्वाको रथहीन हुआ देख अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए उसके ऊपर पक्षियोंके पंखसे युक्त होकर उड़नेवाले बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥
श्रुतर्वा विरथो राजन्नाददे खड्गचर्मणी ।
अथास्याददतः खड्गं शतचन्द्रं च भानुमत् ॥ ३१ ॥
क्षुरप्रेण शिरः कायात् पातयामास पाण्डवः ।
राजन्! रथहीन हुए श्रुतर्वाने अपने हाथोंमें ढाल और तलवार ले ली। वह सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त ढाल तथा अपनी प्रभासे चमकती हुई तलवार ले ही रहा था कि पाण्डुपुत्र भीमसेनने एक क्षुरप्रद्वारा उसके मस्तकको धड़से काट गिराया ।। ३११/२ ।।
छिन्नोत्तमाङ्गस्य ततः क्षुरप्रेण महात्मना ।। ३२ ।।
पपात कायः स रथाद् वसुधामनुनादयन् ।
महामनस्वी भीमसेनके क्षुरप्रसे मस्तक कट जानेपर उसका धड़ वसुधाको प्रतिध्वनित करता हुआ रथसे नीचे गिर पड़ा ।। ३२१/२ ।।
तस्मिन् निपतिते वीरे तावका भयमोहिताः ।। ३३ ।।
अभ्यद्रवन्त संग्रामे भीमसेनं युयुत्सवः ।
उस वीरके गिरते ही आपके सैनिक भयसे व्याकुल होनेपर भी संग्राममें जूझनेकी इच्छासे भीमसेनकी ओर दौड़े ।। ३३१/२ ।।
तानापतत एवाशु हतशेषाद् बलार्णवात् ।। ३४ ।।
दंशितान् प्रतिजग्राह भीमसेनः प्रतापवान् ।
मरनेसे बचे हुए सैन्यसमूहसे निकलकर शीघ्रतापूर्वक अपने ऊपर आक्रमण करते हुए उन कवचधारी योद्धाओंको प्रतापी भीमसेनने आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। ३४१/२ ।।
ते तु तं वै समासाद्य परिवव्रुः समन्ततः ।। ३५ ।।
ततस्तु संवृतो भीमस्तावकान् निशितैः शरैः ।
पीडयामास तान् सर्वान् सहस्राक्ष इवासुरान् ।। ३६ ।।
वे योद्धा भीमसेनके पास पहुँचकर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। तब जैसे इन्द्र असुरोंको नष्ट करते हैं, उसी प्रकार घिरे हुए भीमसेनने पैने बाणोंद्वारा आपके उन समस्त सैनिकोंको पीड़ित करना आरम्भ किया ।। ३५-३६ ।।
ततः पञ्चशतान् हत्वा सवरूथान् महारथान् ।
जघान कुञ्जरानीकं पुनः सप्तशतं युधि ।। ३७ ।।
हत्वा शतसहस्राणि पत्तीनां परमेषुभिः ।
वाजिनां च शतान्यष्टौ पाण्डवः स्म विराजते ।। ३८ ।।
तदनन्तर भीमसेनने आवरणोंसहित पाँच सौ विशाल रथोंका संहार करके युद्धमें सात सौ हाथियोंकी सेनाको पुनः मार गिराया। फिर उत्तम बाणोंद्वारा एक लाख पैदलों और सवारोंसहित आठ सौ घोड़ोंका वध करके पाण्डव भीमसेन विजयश्रीसे सुशोभित होने लगे ।। ३७-३८ ।।
भीमसेनस्तु कौन्तेयो हत्वा युद्धे सुतांस्तव ।
मेने कृतार्थमात्मानं सफलं जन्म च प्रभो ।। ३९ ।।
प्रभो! इस प्रकार कुन्तीपुत्र भीमसेनने युद्धमें आपके पुत्रोंका विनाश करके अपने-आपको कृतार्थ और जन्मको सफल हुआ समझा ।। ३९ ।।
तं तथा युद्ध्यमानं च विनिघ्नन्तं च तावकान् । ईक्षितुं नोत्सहन्ते स्म तव सैन्या नराधिप ॥ ४० ॥ नरेश्वर! इस तरह युद्ध और आपके पुत्रोंका वध करते हुए भीमसेनको आपके सैनिक देखनेका भी साहस नहीं कर पाते थे ॥ ४० ॥ विद्राव्य च कुरून् सर्वांस्तांश्च हत्वा पदानुगान् । दोर्भ्यां शब्दं ततश्चक्रे त्रासयानो महाद्विपान् ॥ ४१ ॥ समस्त कौरवोंको भगाकर और उनके अनुगामी सैनिकोंका संहार करके भीमसेनने बड़े-बड़े हाथियोंको डराते हुए अपनी दोनों भुजाओंद्वारा ताल ठोंकनेका शब्द किया ॥ ४१ ॥ हतभूयिष्ठयोधा तु तव सेना विशाम्पते । किंचिच्छेषा महाराज कृपणं समपद्यत ॥ ४२ ॥ प्रजानाथ! महाराज! आपकी सेनाके अधिकांश योद्धा मारे गये और बहुत थोड़े सैनिक शेष रह गये; अतः वह सेना अत्यन्त दीन हो गयी थी ॥ ४२ ॥ इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि एकादशधार्तराष्ट्रवधे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें धृतराष्ट्रके ग्यारह पुत्रोंका वधविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2646)
सप्तविंशोऽध्यायः
श्रीकृष्ण और अर्जुनकी बातचीत, अर्जुनद्वारा सत्यकर्मा, सत्येषु तथा पैंतालीस पुत्रों और सेनासहित सुशर्माका वध तथा भीमके द्वारा धृतराष्ट्रपुत्र सुदर्शनका अन्त
संजय उवाच
दुर्योधनो महाराज सुदर्शंश्चापि ते सुतः ।
हतशेषौ तदा संख्ये वाजिमध्ये व्यवस्थितौ ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! उस समय आपके पुत्र दुर्योधन और सुदर्शन ये—दो ही बच गये थे। दोनों ही घुड़सवारोंके बीचमें खड़े थे ॥ १ ॥
ततो दुर्योधनं दृष्ट्वा वाजिमध्ये व्यवस्थितम् ।
उवाच देवकीपुत्रः कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ॥ २ ॥
तदनन्तर दुर्योधनको घुड़सवारोंके बीचमें खड़ा देख देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने कुन्तीकुमार अर्जुनसे इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
शत्रवो हतभूयिष्ठा ज्ञातयः परिपालिताः ।
गृहीत्वा संजयं चासौ निवृत्तः शिनिपुङ्गवः ॥ ३ ॥
परिश्रान्तश्च नकुलः सहदेवश्च भारत ।
योधयित्वा रणे पापान् धार्तराष्ट्रान् सहानुगान् ॥ ४ ॥
‘भरतनन्दन! शत्रुओंके अधिकांश योद्धा मारे गये और अपने कुटुम्बी जनोंकी रक्षा हुई। उधर देखो, वे शिनिप्रवर सात्यकि संजयको कैद करके उसे साथ लिये लौटे आ रहे हैं। रणभूमिमें सेवकोंसहित धृतराष्ट्रके पापी पुत्रोंसे युद्ध करके दोनों भाई नकुल और सहदेव भी बहुत थक गये हैं ॥ ३-४ ॥
दुर्योधनमभित्यज्य त्रय एते व्यवस्थिताः ।
कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिश्चैव महारथः ॥ ५ ॥
‘उधर कृपाचार्य, कृतवर्मा और महारथी अश्वत्थामा—ये तीनों युद्धभूमिमें दुर्योधनको छोड़कर कहीं अन्यत्र स्थित हैं ॥ ५ ॥
असौ तिष्ठति पाञ्चाल्यः श्रिया परमया युतः ।
दुर्योधनबलं हत्वा सह सर्वैः प्रभद्रकैः ॥ ६ ॥
‘इधर, सम्पूर्ण प्रभद्रकोंसहित दुर्योधनकी सेनाका संहार करके पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न अपनी सुन्दर कान्तिसे सुशोभित हो रहे हैं ॥ ६ ॥
असौ दुर्योधनः पार्थ वाजिमध्ये व्यवस्थितः ।
छत्रेण ध्रियमाणेन प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥
‘पार्थ! वह रहा दुर्योधन, जो छत्र धारण किये घुड़सवारोंके बीचमें खड़ा है और बारंबार इधर ही देख रहा है ॥ ७ ॥
प्रतिव्यूह्य बलं सर्वं रणमध्ये व्यवस्थितः ।
एनं हत्वा शितैर्बाणैः कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ ८ ॥
‘वह अपनी सारी सेनाका व्यूह बनाकर युद्धभूमिमें खड़ा है। तुम इसे पैने बाणोंसे मारकर कृतकृत्य हो जाओगे ॥ ८ ॥
गजानीकं हतं दृष्ट्वा त्वां च प्राप्तमरिंदम ।
यावन्न विद्रवन्त्येते तावज्जहि सुयोधनम् ॥ ९ ॥
‘शत्रुदमन! गजसेनाका वध और तुम्हारा आगमन हुआ देख ये कौरव-योद्धा जबतक भाग नहीं जाते तभीतक दुर्योधनको मार डालो ॥ ९ ॥
यातु कश्चित्तु पाञ्चाल्यं क्षिप्रमागज्यतामिति ।
परिश्रान्तबलस्तात नैष मुच्येत किल्बिषी ॥ १० ॥
‘अपने दलका कोई पुरुष पांचालराज धृष्टद्युम्नके पास जाय और कहे कि ‘आप शीघ्रतापूर्वक चलें।' तात! यह पापात्मा दुर्योधन अब बच नहीं सकता, क्योंकि इसकी सारी सेना थक गयी है ॥ १० ॥
हत्वा तव बलं सर्वं संग्रामे धृतराष्ट्रजः ।
जितान् पाण्डुसुतान् मत्वा रूपं धारयते महत् ॥ ११ ॥
‘दुर्योधन समझता है कि ‘संग्रामभूमिमें तुम्हारी सारी सेनाका संहार करके पाण्डवोंको पराजित कर दूँगा।' इसीलिये वह अत्यन्त उग्र रूप धारण कर रहा है ॥
निहतं स्वबलं दृष्ट्वा पीडितं चापि पाण्डवैः ।
ध्रुवमेष्यति संग्रामे वधायैवात्मनो नृपः ॥ १२ ॥
‘परंतु अपनी सेनाको पाण्डवोंद्वारा पीड़ित एवं मारी गयी देख राजा दुर्योधन निश्चय ही अपने विनाशके लिये ही युद्धस्थलमें पदार्पण करेगा' ॥ १२ ॥
एवमुक्तः फाल्गुनस्तु कृष्णं वचनमब्रवीत् ।
धृतराष्ट्रसुताः सर्वे हता भीमेन माधव ॥ १३ ॥
यावेतावास्थितौ कृष्ण तावद्य न भविष्यतः ।
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुन उनसे इस प्रकार बोले—‘माधव! धृतराष्ट्रके प्रायः सभी पुत्र भीमसेनके हाथसे मारे गये हैं। श्रीकृष्ण! ये जो दो पुत्र खड़े हैं, इनका भी आज अन्त हो जायगा ॥ १३ ½ ॥
हतो भीष्मो हतो द्रोणः कर्णो वैकर्तनो हतः ॥ १४ ॥
मद्रराजो हतः शल्यो हतः कृष्ण जयद्रथः ।
अध्याय (पृष्ठ 2648)
‘श्रीकृष्ण! भीष्म मारे जा चुके, द्रोणका भी अन्त हो गया, वैकर्तन कर्ण भी मार डाला गया, मद्रराज शल्यका भी वध हो गया और जयद्रथ भी यमलोक पहुँच गया ।।
श्रीकृष्ण दुर्योधनकी ओर संकेत करते हुए उसे मारनेके लिये अर्जुनको प्रेरित कर रहे हैं
हयाः पञ्चशताः शिष्टाः शकुनेः सौबलस्य च ।। १५ ।।
रथानां तु शते शिष्टे द्वे एव तु जनार्दन ।
दन्तिनां च शतं साग्रं त्रिसाहस्राः पदातयः ।। १६ ।।
‘सुबलपुत्र शकुनिके पास पाँच सौ घुड़सवारोंकी सेना अभी शेष है। जनार्दन! उसके पास दो सौ रथ, सौसे कुछ अधिक हाथी और तीन हजार पैदल सैनिक भी शेष रह गये हैं ।। १५-१६ ।।
अश्वत्थामा कृपश्चैव त्रिगर्ताधिपतिस्तथा ।
उलूकः शकुनिश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ।। १७ ।।
एतद् बलमभूच्छेषं धार्तराष्ट्रस्य माधव ।
‘माधव! दुर्योधनकी सेनामें अश्वत्थामा, कृपाचार्य, त्रिगर्तराज सुशर्मा, उलूक, शकुनि और सात्वतवंशी कृतवर्मा—ये थोड़े-से ही वीर सैनिक शेष रह गये हैं ।। मोक्षो न नूनं कालात् तु विद्यते भुवि कस्यचित् ।। १८ ।। तथा विनिहते सैन्ये पश्य दुर्योधनं स्थितम् । अद्याह्ना हि महाराजो हतामित्रो भविष्यति ।। १९ ।। ‘निश्चय ही इस पृथ्वीपर किसीको भी कालसे छुटकारा नहीं मिलता, तभी तो इस प्रकार अपनी सेनाका संहार होनेपर भी दुर्योधन युद्धके लिये खड़ा है, उसे देखिये। आजके दिन महाराज युधिष्ठिर शत्रुहीन हो जायेंगे ।। न हि मे मोक्ष्यते कश्चित् परेषामिह चिन्तये । ये त्वद्य समरं कृष्ण न हास्यन्ति मदोत्कटाः ।। २० ।। तान् वै सर्वान् हनिष्यामि यद्यपि स्युर्न मानुषाः । ‘श्रीकृष्ण! मैं सोचता हूँ कि आज शत्रुदलका कोई भी योद्धा यहाँ मेरे हाथसे बचकर नहीं जा सकेगा। जो मदोन्मत्त वीर आज युद्ध छोड़कर भाग नहीं जायँगे, उन सबको, वे मनुष्य न होकर देवता या दैत्य ही क्यों न हों, मैं मार डालूँगा ।। २० १/२ ।। अद्य युद्धे सुसंक्रुद्धो दीर्घं राज्ञा प्रजागरम् ।। २१ ।। अपनेष्यामि गान्धारं घातयित्वा शितैः शरैः । ‘आज मैं अत्यन्त कुपित हो गान्धारराज शकुनिको पैने बाणोंसे मरवाकर राजा युधिष्ठिरके दीर्घकालीन जागरणरूपी रोगको दूर कर दूँगा ।। २१ १/२ ।। निकृत्या वै दुराचारो यानि रत्नानि सौबलः ।। २२ ।। सभायामहरद् द्यूते पुनस्तान्याहराम्यहम् । ‘दुराचारी सुबलपुत्र शकुनिने द्यूतसभामें छल करके जिन रत्नोंको हर लिया था, उन सबको मैं वापस ले लूँगा ।। अद्य ता अपि रोत्स्यन्ति सर्वा नागपुरे स्त्रियः ।। २३ ।। श्रुत्वा पतींश्च पुत्रांश्च पाण्डवैर्निहतान् युधि । ‘आज हस्तिनापुरकी वे सारी स्त्रियाँ भी युद्धमें पाण्डवोंके हाथसे अपने पतियों और पुत्रोंको मारा गया सुनकर फूट-फूटकर रोयेंगी ।। २३ १/२ ।। समाप्तमद्य वै कर्म सर्वं कृष्ण भविष्यति ।। २४ ।। अद्य दुर्योधनो दीप्तां श्रियं प्राणांश्च मोक्ष्यति । ‘श्रीकृष्ण! आज हमलोगोंका सारा कार्य समाप्त हो जायगा। आज दुर्योधन अपनी उज्ज्वल राजलक्ष्मी और प्राणोंको भी खो बैठेगा ।। २४ १/२ ।। नापयाति भयात् कृष्ण संग्रामाद् यदि चेन्मम ।। २५ ।। निहतं विद्धि वार्ष्णेय धार्तराष्ट्रं सुबालिशम् ।