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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

'अधर्मसे विजय प्राप्त करके किस बुद्धिमान् पुरुषको हर्ष होगा? जैसा कि पापी पाण्डुपुत्र भीमसेनको हो रहा है ।। १४ १/२ ।।

किन्नु चित्रमितस्त्वद्य भग्नसक्थस्य यन्मम ।। १५ ।। क्रुद्धेन भीमसेनेन पादेन मृदितं शिरः ।

'आज जब मेरी जाँघें टूट गयी हैं; ऐसी दशामें कुपित हुए भीमसेनने मेरे मस्तकको जो पैरसे ठुकराया है, इससे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है? ।। १५ १/२ ।।

प्रतपन्तं श्रिया जुष्टं वर्तमानं च बन्धुषु ।। १६ ।। एवं कुर्यान्नरो यो हि स वै संजय पूजितः ।

'संजय! जो अपने तेजसे तप रहा हो, राजलक्ष्मीसे सेवित हो और अपने सहायक बन्धुओंके बीचमें विद्यमान हो, ऐसे शत्रुके साथ जो उक्त बर्ताव करे, वही वीर पुरुष सम्मानित होता है (मरे हुएको मारनेमें क्या बड़ाई है) ।। १६ १/२ ।।

अभिज्ञौ युद्धधर्मस्य मम माता पिता च मे ।। १७ ।। तौ हि संजय दुःखार्तौ विज्ञाप्यौ वचनान्मम । इष्टं भृत्या भृताः सम्यग् भूः प्रशास्ता ससागरा ।। १८ ।।

'मेरे माता-पिता युद्धधर्मके ज्ञाता हैं। वे दोनों मेरी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो जायेंगे। तुम मेरे कहनेसे उन्हें यह संदेश देना कि मैंने यज्ञ किये, जो भरण-पोषण करनेयोग्य थे, उनका पालन किया और समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका अच्छी तरह शासन किया ।। १७-१८ ।।'

मूर्ध्नि स्थितममित्राणां जीवतामेव संजय । दत्ता दाया यथाशक्ति मित्राणां च प्रियं कृतम् ।। १९ ।। अमित्रा बाधिताः सर्वे को नु स्वन्ततरो मया ।

'संजय! मैंने जीवित शत्रुओंके ही मस्तकपर पैर रखा। यथाशक्ति धनका दान और मित्रोंका प्रिय किया। साथ ही सम्पूर्ण शत्रुओंको सदा ही क्लेश पहुँचाया। संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जिसका अन्त मेरे समान सुन्दर हुआ हो? ।। १९ १/२ ।।'

मानिता बान्धवाः सर्वे वश्यः सम्पूजितो जनः ।। २० ।। त्रितयं सेवितं सर्वं को नु स्वन्ततरो मया ।

'मैंने सभी बन्धु-बान्धवोंको सम्मान दिया। अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले लोगोंका सत्कार किया और धर्म, अर्थ एवं काम सबका सेवन कर लिया। मेरे समान सुन्दर अन्त किसका हुआ होगा? ।। २० १/२ ।।'

आज्ञप्तं नृपमुख्येषु मानः प्राप्तः सुदुर्लभः ।। २१ ।। आजानेयैस्तथा यातं को नु स्वन्ततरो मया ।

'बड़े-बड़े राजाओंपर हुक्म चलाया, अत्यन्त दुर्लभ सम्मान प्राप्त किया तथा आजानेय (अरबी) घोड़ोंपर सवारी की, मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? ।। २१½ ।। यातानि परराष्ट्राणि नृपा भुक्ताश्च दासवत् ।। २२ ।। प्रियेभ्यः प्रकृतं साधु को नु स्वन्ततरो मया । 'दूसरे राष्ट्रोंपर आक्रमण किया और कितने ही राजाओंसे दासकी भाँति सेवाएँ लीं। जो अपने प्रिय व्यक्ति थे, उनकी सदा ही भलाई की। फिर मुझसे अच्छा अन्त किसका हुआ होगा? ।। २२½ ।। अधीतं विधिवद् दत्तं प्राप्तमायुर्निरामयम् ।। २३ ।। स्वधर्मेण जिता लोकाः को नु स्वन्ततरो मया । दिष्ट्या नाहं जितः संख्ये परान् प्रेष्यवदाश्रितः ।। २४ ।। दिष्ट्या मे विपुला लक्ष्मीर्मृते त्वन्यगता विभो । 'विधिवत् वेदोंका स्वाध्याय किया, नाना प्रकारके दान दिये और रोगरहित आयु प्राप्त की। इसके सिवा, मैंने अपने धर्मके द्वारा पुण्यलोकोंपर विजय पायी है। फिर मेरे समान अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? सौभाग्यकी बात है कि मैं न तो युद्धमें कभी पराजित हुआ और न दासकी भाँति कभी शत्रुओंकी शरण ली। सौभाग्यसे मेरे अधिकारमें विशाल राजलक्ष्मी रही है, जो मेरे मरनेके बाद ही दूसरेके हाथमें गयी है ।। २३-२४½ ।। यदिष्टं क्षत्रबन्धूनां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् ।। २५ ।। निधनं तन्मया प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मया । 'अपने धर्मका पालन करनेवाले क्षत्रिय-बन्धुओंको जो अभीष्ट है, वैसी ही मृत्यु मुझे प्राप्त हुई है; अतः मुझसे अच्छा अन्त और किसका हुआ होगा? ।। २५½ ।। दिष्ट्या नाहं परावृत्तो वैरात् प्राकृतवज्जितः ।। २६ ।। दिष्ट्या न विमतिं कांचिद् भजित्वा तु पराजितः । 'हर्षकी बात है कि मैं युद्धमें पीठ दिखाकर भागा नहीं। निम्नश्रेणीके मनुष्यकी भाँति हार मानकर वैरसे कभी पीछे नहीं हटा तथा कभी किसी दुर्विचारका आश्रय लेकर पराजित नहीं हुआ—यह भी मेरे लिये गौरवकी ही बात है ।। २६½ ।। सुप्तं वाथ प्रमत्तं वा यथा हन्याद् विषेण वा ।। २७ ।। एवं व्युत्क्रान्तधर्मेण व्युत्क्रम्य समयं हतः । 'जैसे कोई सोये अथवा पागल हुए मनुष्यको मार दे या धोखेसे जहर देकर किसीकी हत्या कर डाले, उसी प्रकार धर्मका उल्लंघन करनेवाले पापी भीमसेनने गदायुद्धकी मर्यादाका उल्लंघन करके मुझे मारा है ।। २७½ ।। अश्वत्थामा महाभागः कृतवर्मा च सात्वतः ।। २८ ।। कृपः शारद्वतश्चैव वक्तव्या वचनान्मम ।

‘महाभाग अश्वत्थामा, सात्वतवंशी कृतवर्मा तथा शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य—इन सबको मेरी यह बात सुना देना ।। २८ १/२ ।।
अधर्मेण प्रवृत्तानां पाण्डवानांमनेकशाः ।। २९ ।।
विश्वासं समयघ्नानां न यूयं गन्तुमर्हथ ।
‘पाण्डवोंने अधर्ममें प्रवृत्त होकर अनेकों बार युद्धकी मर्यादा तोड़ी है; अतः आपलोग कभी उनका विश्वास न करें’ ।। २९ १/२ ।।
वार्तिकांश्चाब्रवीद् राजा पुत्रस्ते सत्यविक्रमः ।। ३० ।।
अधर्माद् भीमसेनेन निहतोऽहं यथा रणे ।
सोऽहं द्रोणं स्वर्गगतं कर्णशल्यावुभौ तथा ।। ३१ ।।
वृषसेनं महावीर्यं शकुनिं चापि सौबलम् ।
जलसन्धं महावीर्यं भगदत्तं च पार्थिवम् ।। ३२ ।।
सोमदत्तं महेष्वासं सैन्धवं च जयद्रथम् ।
दुःशासनपुरोगांश्च भ्रातॄनात्मसमांस्तथा ।। ३३ ।।
दौःशासनिं च विक्रान्तं लक्ष्मणं चात्मजावुभौ ।
एतांश्चान्यांश्च सुबहून् मदीयांश्च सहस्रशः ।। ३४ ।।
पृष्ठतोऽनुगमिष्यामि सार्थहीनो यथाध्वगः ।
इसके बाद आपके सत्यपराक्रमी पुत्र राजा दुर्योधनने संदेशवाहक दूतोंसे इस प्रकार कहा— ‘भीमसेनने रणभूमिमें अधर्मसे मेरा वध किया है। अब मैं स्वर्गमें गये हुए द्रोणाचार्य, कर्ण, शल्य, महापराक्रमी वृषसेन, सुबलपुत्र शकुनि, महाबली जलसन्ध, राजा भगदत्त, महाधनुर्धर सोमदत्त, सिंधुराज जयद्रथ, अपने ही समान पराक्रमी दुःशासन आदि बन्धुगण, विक्रमशाली दुःशासनकुमार और अपने पुत्र लक्ष्मण—इन सबके तथा और भी जो बहुत-से मेरे पक्षके सहस्रों योद्धा मारे गये हैं, उन सबके पीछे मैं स्वर्ग जाऊँगा। मेरी दशा उस पथिकके समान है, जो अपने साथियोंसे बिछड़ गया हो ।। ३०—३४ १/२ ।।
कथं भ्रातॄन् हतान् श्रुत्वा भर्तारं च स्वसा मम ।। ३५ ।।
रोरूयमाणा दुःखार्ता दुःशला सा भविष्यति ।
‘हाय! अपने भाइयों और पतिकी मृत्युका समाचार सुनकर दुःखसे आतुर हो अत्यन्त रोदन करती हुई मेरी बहिन दुःशलाकी क्या दशा होगी? ।। ३५ १/२ ।।
स्नुषाभिः प्रस्नुषाभिश्च वृद्धो राजा पिता मम ।। ३६ ।।
गान्धारीसहितश्चैव कां गतिं प्रतिपत्स्यति ।
‘पुत्रों और पौत्रोंकी बिलखती हुई बहुओंके साथ मेरे बूढ़े पिता राजा धृतराष्ट्र माता गान्धारीसहित किस अवस्थाको पहुँच जायँगे? ।। ३६ १/२ ।।
नूनं लक्ष्मणमातापि हतपुत्रा हतेश्वरा ।। ३७ ।।

विनाशं यास्यति क्षिप्रं कल्याणी पृथुलोचना ।
'निश्चय ही जिसके पति और पुत्र मारे गये हैं, वह कल्याणमयी विशाललोचना लक्ष्मणकी माता भी सारा समाचार सुनकर तुरंत ही प्राण दे देगी ॥ ३७१/२ ॥
यदि जानाति चार्वाकः परिव्राड् वाग्विारदः ॥ ३८ ॥
करिष्यति महाभागो ध्रुवं चापचितिं मम ।
'संन्यासीके वेषमें सब ओर घूमनेवाले प्रवचनकुशल चार्वाकको* यदि मेरी दशा ज्ञात हो जायगी तो वे महाभाग निश्चय ही मेरे वैरका बदला लेंगे ॥ ३८१/२ ॥
समन्तपञ्चके पुण्ये त्रिषु लोकेषु विश्रुते ॥ ३९ ॥
अहं निधनमासाद्य लोकान् प्राप्स्यामि शाश्वतान् ।
'तीनों लोकोंमें विख्यात पुण्यमय समन्त-पंचकक्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होकर अब मैं सनातन लोकोंमें जाऊँगा' ॥ ३९१/२ ॥
ततो जनसहस्राणि बाष्पपूर्णानि मारिष ॥ ४० ॥
प्रलापं नृपतेः श्रुत्वा व्यद्रवन्त दिशो दश ।
मान्यवर! राजा दुर्योधनका यह विलाप सुनकर हजारों मनुष्योंकी आँखोंमें आँसू भर आये और वे दसों दिशाओंमें भाग चले ॥ ४०१/२ ॥
ससागरवना घोरा पृथिवी सचराचरा ॥ ४१ ॥
चचालाथ सनिर्ह्रादा दिशश्चैवाविलाभवन् ।
उस समय समुद्र, वन और चराचर प्राणियोंसहित यह पृथ्वी भयानक रूपसे हिलने लगी। सब ओर वज्रकी-सी गर्जना होने लगी और सारी दिशाएँ मलिन हो गयीं ॥ ४११/२ ॥
ते द्रोणपुत्रमासाद्य यथावृत्तं न्यवेदयन् ॥ ४२ ॥
व्यवहारं गदायुद्धे पार्थिवस्य च पातनम् ।
तदाख्याय ततः सर्वे द्रोणपुत्रस्य भारत ॥
(वार्तिका दुःखसंतप्ताः शोकोपहतचेतसः ।)
ध्यात्वा च सुचिरं कालं जग्मुरार्ता यथागतम् ॥ ४३ ॥
उन संदेशवाहकोंने आकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामासे यथावत् समाचार कह सुनाया। भारत! गदायुद्धमें भीमसेनका जैसा व्यवहार हुआ तथा राजाको जिस प्रकार धराशायी किया गया, वह सारा वृत्तान्त द्रोणपुत्रको बताकर दुःखसे संतप्त हो वे बहुत देरतक चिन्तामें डूबे रहे। फिर शोकसे व्याकुलचित्त एवं आर्त होकर जैसे आये थे वैसे चले गये ॥ ४२-४३ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि दुर्योधनविलापे चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधनका विलापविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४३ १/२ श्लोक हैं।)


* आचार्य नीलकण्ठकी सम्मतिके अनुसार चार्वाक संन्यासी मुनिके वेषमें विचरनेवाला एक नास्तिक राक्षस था।

अध्याय (पृष्ठ 2967)

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

दुर्योधनकी दशा देखकर अश्वत्थामाका विषाद, प्रतिज्ञा और सेनापतिके पदपर अभिषेक

संजय उवाच

वार्तिकानां सकाशात् तु श्रुत्वा दुर्योधनं हतम् ।
हतशिष्टास्ततो राजन् कौरवाणां महारथाः ॥ १ ॥
विनिर्भिन्नाः शितैर्बाणैर्गदातोमरशक्तिभिः ।
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ॥ २ ॥
त्वरिता जवनैरश्वैरायोधानमुपागमन् ।
**संजय कहते हैं—**राजन्! संदेशवाहकोंके मुखसे दुर्योधनके मारे जानेका समाचार सुनकर मरनेसे बचे हुए कौरव महारथी अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा—जो स्वयं भी तीखे बाण, गदा, तोमर और शक्तियोंके प्रहारसे विशेष घायल हो चुके थे, तेज चलनेवाले घोड़ोंसे जुते हुए रथपर सवार हो तुरंत ही युद्धभूमिमें आये ॥ १-२ १/२ ॥

तत्रापश्यन् महात्मानं धार्तराष्ट्रं निपातितम् ॥ ३ ॥
प्रभग्नं वायुवेगेन महाशालं यथा वने ।
भूमौ विचेष्टमानं तं रुधिरेण समुक्षितम् ॥ ४ ॥
महागजमिवारण्ये व्याधेन विनिपातितम् ।
विवर्तमानं बहुशो रुधिरौघपरिप्लुतम् ॥ ५ ॥
वहाँ आकर उन्होंने देखा कि महामनस्वी धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन मार गिराया गया है, मानो वनमें कोई विशाल शालवृक्ष वायुके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो। खूनसे लथपथ हो दुर्योधन पृथ्वीपर पड़ा छटपटा रहा था, मानो जंगलमें किसी व्याधने बहुत बड़े हाथीको मार गिराया हो। रक्तकी धारामें डूबा हुआ वह बारंबार करवटें बदल रहा था ॥ ३–५ ॥

यदृच्छया निपतितं चक्रमादित्यगोचरम् ।
महावातसमुत्थेन संशुष्कमिव सागरम् ॥ ६ ॥
पूर्णचन्द्रमिव व्योम्नि तुषारावृतमण्डलम् ।
रेणुध्वस्तं दीर्घभुजं मातङ्गमिव विक्रमे ॥ ७ ॥
जैसे दैवेच्छासे सूर्यका चक्र गिर पड़ा हो, बहुत बड़ी आँधी चलनेसे समुद्र सूख गया हो, आकाशमें पूर्ण चन्द्रमण्डलपर कुहरा छा गया हो, वही दशा उस समय दुर्योधनकी हुई थी। मतवाले हाथीके समान पराक्रमी और विशाल भुजाओंवाला वह वीर धूलमें सन गया था ॥ ६-७ ॥

वृतं भूतगणैर्घोरैः क्रव्यादैश्च समन्ततः ।
यथा धनं लिप्समानैर्भृत्यैर्नृपतिसत्तमम् ॥ ८ ॥
जैसे धन चाहनेवाले भृत्यगण किसी श्रेष्ठ राजाको घेरे रहते हैं, उसी प्रकार भयंकर मांसभक्षी भूतोंने चारों ओरसे उसे घेर रखा था ॥ ८ ॥
भ्रुकुटीकृतवक्त्रान्तं क्रोधादुद्वृत्तचक्षुषम् ।
सामर्षं तं नरव्याघ्रं व्याघ्रं निपतितं यथा ॥ ९ ॥
उसके मुँहपर भौंहें तनी हुई थीं, आँखें क्रोधसे चढ़ी हुई थीं और गिरे हुए व्याघ्रके समान वह नरश्रेष्ठ वीर अमर्षमें भरा हुआ दिखायी देता था ॥ ९ ॥
ते तं दृष्ट्वा महेष्वासं भूतले पतितं नृपम् ।
मोहमभ्यागमन् सर्वे कृपप्रभृतयो रथाः ॥ १० ॥
महाधनुर्धर राजा दुर्योधनको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देख कृपाचार्य आदि सभी महारथी मोहके वशीभूत हो गये ॥
अवतीर्य रथेभ्यश्च प्राद्रवन् राजसंनिधौ ।
दुर्योधनं च सम्प्रेक्ष्य सर्वे भूमावुपाविशन् ॥ ११ ॥
वे अपने रथोंसे उतरकर राजाके पास दौड़े गये और दुर्योधनको देखकर सब लोग उसके पास ही जमीनपर बैठ गये ॥ ११ ॥
ततो द्रौणिर्महाराज बाष्पपूर्णेक्षणः श्वसन् ।
उवाच भरतश्रेष्ठं सर्वलोकेश्वरेश्वरम् ॥ १२ ॥
महाराज! उस समय अश्वत्थामाकी आँखोंमें आँसू भर आये। वह सिसकता हुआ सम्पूर्ण जगत्के राजाधिराज भरतश्रेष्ठ दुर्योधनसे इस प्रकार बोला— ॥ १२ ॥
न नूनं विद्यते सत्यं मानुषे किंचिदेव हि ।
यत्र त्वं पुरुषव्याघ्र शेषे पांसुषु रूषितः ॥ १३ ॥
'पुरुषसिंह! निश्चय ही इस मनुष्यलोकमें कुछ भी सत्य नहीं है, सभी नाशवान् हैं, जहाँ तुम्हारे-जैसा राजा धूलमें सना हुआ लोट रहा है ॥ १३ ॥
भूत्वा हि नृपतिः पूर्वं समाज्ञाप्य च मेदिनीम् ।
कथमेकोऽद्य राजेन्द्र तिष्ठसे निर्जने वने ॥ १४ ॥
'राजेन्द्र! तुम पहले सम्पूर्ण जगत्के मनुष्योंपर आधिपत्य रखकर सारे भूमण्डलपर हुक्म चलाते थे। वही तुम आज अकेले इस निर्जन वनमें कैसे पड़े हुए हो? ॥ १४ ॥
दुःशासनं न पश्यामि नापि कर्णं महारथम् ।
नापि तान् सुहृदः सर्वान् किमिदं भरतर्षभ ॥ १५ ॥
'भरतश्रेष्ठ! न तो मैं दुःशासनको देखता हूँ और न महारथी कर्णको। अन्य सब सुहृदोंका भी मुझे दर्शन नहीं हो रहा है, यह क्या बात है? ॥ १५ ॥
दुःखं नूनं कृतान्तस्य गतिं ज्ञातुं कथंचन ।

लोकानां च भवान् यत्र शेषे पांसुषु रूषितः ॥ १६ ॥ ‘निश्चय ही काल और लोकोंकी गतिको जानना किसी प्रकार भी कठिन ही है, जिसके अधीन होकर आप धूलमें सने हुए पड़े हैं ॥ १६ ॥ एष मूर्धाभिषिक्तानामग्रे गत्वा परंतपः । सतृणं ग्रसते पांसुं पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ १७ ॥ ‘अहो! ये मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे चलनेवाले शत्रुसंतापी महाराज दुर्योधन तिनकोंसहित धूल फाँक रहे हैं। यह कालका उलट-फेर तो देखो ॥ १७ ॥ क्व ते तदमलं छत्रं व्यजनं क्व च पार्थिव । सा च ते महती सेना क्व गता पार्थिवोत्तम ॥ १८ ॥ ‘नृपश्रेष्ठ! महाराज! कहाँ है आपका वह निर्मल छत्र, कहाँ है व्यजन और कहाँ गयी आपकी वह विशाल सेना? ॥ १८ ॥ दुर्विज्ञेया गतिर्नूनं कार्याणां कारणान्तरे । यद् वै लोकगुरुर्भूत्वा भवानेतां दशां गतः ॥ १९ ॥ ‘किस कारणसे कौन-सा कार्य होगा, इसको समझ लेना निश्चय ही बहुत कठिन है; क्योंकि सम्पूर्ण जगत्‌के आदरणीय नरेश होकर भी आज तुम इस दशाको पहुँच गये ॥ १९ ॥ अध्रुवा सर्वमर्त्येषु श्रीरुपालक्ष्यते भृशम् । भवतो व्यसनं दृष्ट्वा शक्रविस्पर्धिनो भृशम् ॥ २० ॥ ‘तुम तो अपनी साम्राज्य-लक्ष्मीके द्वारा इन्द्रकी समानता करनेवाले थे। आज तुमपर भी यह संकट आया हुआ देखकर निश्चय हो गया कि किसी भी मनुष्यकी सम्पत्ति सदा स्थिर नहीं देखी जा सकती’ ॥ २० ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा दुःखितस्य विशेषतः । उवाच राजन् पुत्रस्ते प्राप्तकालमिदं वचः ॥ २१ ॥ विमृज्य नेत्रे पाणिभ्यां शोकजं बाष्पमुत्सृजन् । कृपादीन् स तदा वीरान् सर्वानैव नराधिपः ॥ २२ ॥ राजन्! अत्यन्त दुःखी हुए अश्वत्थामाकी वह बात सुनकर आपके पुत्र राजा दुर्योधनके नेत्रोंसे शोकके आँसू बहने लगे। उसने दोनों हाथोंसे नेत्रोंको पोंछा और कृपाचार्य आदि समस्त वीरोंसे यह समयोचित वचन कहा— ॥ २१-२२ ॥ ईदृशो लोकधर्मोऽयं धात्रा निर्दिष्ट उच्यते । विनाशः सर्वभूतानां कालपर्यायमागतः ॥ २३ ॥ ‘मित्रो! इस मर्त्यलोकका ऐसा ही धर्म (नियम) है। विधाताने ही इसका निर्देश किया है, ऐसा कहा जाता है; इसलिये कालक्रमसे एक-न-एक दिन सम्पूर्ण प्राणियोंके विनाशकी घड़ी आ ही जाती है ॥ २३ ॥

सोऽयं मां समनुप्राप्तः प्रत्यक्षं भवतां हि यः।
पृथिवीं पालयित्वाहमेतां निष्ठामुपागतः॥ २४॥
‘वही यह विनाशका समय अब मुझे भी प्राप्त हुआ है, जिसे आपलोग प्रत्यक्ष देख रहे हैं। एक दिन मैं सारी पृथ्वीका पालन करता था और आज इस अवस्थाको पहुँच गया हूँ॥ २४॥

दिष्ट्या नाहं परावृत्तो युद्धे कस्यांचिदापदि।
दिष्ट्याहं निहतः पापैश्छलेनैव विशेषतः॥ २५॥
‘तो भी मुझे इस बातकी खुशी है कि कैसी ही आपत्ति क्यों न आयी, मैं युद्धमें कभी पीछे नहीं हटा। पापियोंने मुझे मारा भी तो छलसे॥ २५॥

उत्साहश्च कृतो नित्यं मया दिष्ट्या युयुत्सता।
दिष्ट्या चास्मिन् हतो युद्धे निहतज्ञातिबान्धवः॥ २६॥
‘सौभाग्यवश मैंने रणभूमिमें जूझनेकी इच्छा रखकर सदा ही उत्साह दिखाया है और भाई-बन्धुओंके मारे जानेपर स्वयं भी युद्धमें ही प्राण-त्याग कर रहा हूँ, इससे मुझे विशेष संतोष है॥ २६॥

दिष्ट्या च वोऽहं पश्यामि मुक्तानस्माज्जनक्षयात्।
स्वस्तियुक्तांश्च कल्यांश्च तन्मे प्रियमनुत्तमम्॥ २७॥
‘सौभाग्यकी बात है कि मैं आपलोगोंको इस नरसंहारसे मुक्त देख रहा हूँ। साथ ही आपलोग सकुशल एवं कुछ करनेमें समर्थ हैं—यह मेरे लिये और भी उत्तम एवं प्रसन्नताकी बात है॥ २७॥

मा भवन्तोऽत्र तप्यन्तां सौहृदान्निधनेन मे।
यदि वेदाः प्रमाणं वो जिता लोका मयाक्षयाः॥ २८॥
‘आपलोगोंका मुझपर स्वाभाविक स्नेह है, इसलिये मेरी मृत्युसे यहाँ आपलोगोंको जो दुःख और संताप हो रहा है, वह नहीं होना चाहिये। यदि आपकी दृष्टिमें वेदशास्त्र प्रामाणिक हैं तो मैंने अक्षय लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया॥ २८॥

मन्यमानः प्रभावं च कृष्णस्यामिततेजसः।
तेन न च्यावितश्चाहं क्षत्रधर्मात् स्वनुष्ठितात्॥ २९॥
स मया समनुप्राप्तो नास्मि शोच्यः कथंचन।
‘मैं अमित तेजस्वी श्रीकृष्णके अद्भुत प्रभावको मानता हुआ भी कभी उनकी प्रेरणासे अच्छी तरह पालन किये हुए क्षत्रियधर्मसे विचलित नहीं हुआ। मैंने उस धर्मका फल प्राप्त किया है; अतः किसी प्रकार भी मैं शोकके योग्य नहीं हूँ॥ २९ १/२॥

कृतं भवद्भिः सदृशमनुरूपमिवात्मनः॥ ३०॥
यतितं विजये नित्यं दैवं तु दुरतिक्रमम्।

'आपलोगोंने अपने स्वरूपके अनुरूप योग्य पराक्रम प्रकट किया और सदा मुझे विजय दिलानेकी ही चेष्टा की; तथापि दैवके विधानका उल्लंघन करना किसीके लिये भी सर्वथा कठिन है' ॥ ३० १/२ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं बाष्पव्याकुललोचनः ॥ ३१ ॥
तूष्णीं बभूव राजेन्द्र रुजासौ विह्वलो भृशम् ।
राजेन्द्र! इतना कहते-कहते दुर्योधनकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं और वह वेदनासे अत्यन्त व्याकुल होकर चुप हो गया—उससे कुछ बोला नहीं गया ॥ ३१ १/२ ॥
तथा दृष्ट्वा तु राजानं बाष्पशोकसमन्वितम् ॥ ३२ ॥
द्रौणिः क्रोधेन जज्वल यथा वह्निर्जगत्क्षये ।
राजा दुर्योधनको शोकके आँसू बहाते देख अश्वत्थामा प्रलयकालकी अग्निके समान क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ३२ १/२ ॥
स च क्रोधसमाविष्टः पाणौ पाणिं निपीड्य च ॥ ३३ ॥
बाष्पविह्वलया वाचा राजानमिदमब्रवीत् ।
रोषके आवेशमें भरकर उसने हाथपर हाथ दबाया और अश्रुगद्गद वाणीद्वारा उसने राजा दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३३ १/२ ॥
पिता मे निहतः क्षुद्रैः सुनृशंसेन कर्मणा ॥ ३४ ॥
न तथा तेन तप्यामि यथा राजंस्त्वयाद्य वै ।
'राजन्! नीच पाण्डवोंने अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मके द्वारा मेरे पिताका वध किया था; परंतु उसके कारण भी मैं उतना संतप्त नहीं हूँ, जैसा कि आज तुम्हारे वधके कारण मुझे कष्ट हो रहा है' ॥ ३४ १/२ ॥
शृणु चेदं वचो मह्यं सत्येन वदतः प्रभो ॥ ३५ ॥
इष्टापूर्तेन दानेन धर्मेण सुकृतेन च ।
अद्याहं सर्वपञ्चालान् वासुदेवस्य पश्यतः ॥ ३६ ॥
सर्वोपायैर्हि नेष्यामि प्रेतराजनिवेशनम् ।
अनुज्ञां तु महाराज भवान् मे दातुमर्हति ॥ ३७ ॥
'प्रभो! मैं सत्यकी शपथ खाकर जो कह रहा हूँ, मेरी इस बातको सुनो। मैं अपने इष्ट, आपूर्त, दान, धर्म तथा अन्य शुभ कर्मोंकी शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज श्रीकृष्णके देखते-देखते सम्पूर्ण पांचालोंको सभी उपायोंद्वारा यमराजके लोकमें भेज दूँगा। महाराज! इसके लिये तुम मुझे आज्ञा दे दो' ॥ ३५—३७ ॥
इति श्रुत्वा तु वचनं द्रोणपुत्रस्य कौरवः ।
मनसः प्रीतिजननं कृपं वचनमब्रवीत् ॥ ३८ ॥
आचार्य शीघ्रं कलशं जलपूर्णं समानय ।

द्रोणपुत्रका यह मनको प्रसन्न करनेवाला वचन सुनकर कुरुराज दुर्योधनने कृपाचार्यसे कहा—‘आचार्य! आप शीघ्र ही जलसे भरा हुआ कलश ले आइये’ ।। ३८ १/२ ।।

स तद् वचनमाज्ञाय राज्ञो ब्राह्मणसत्तमः ।। ३९ ।।
कलशं पूर्णमादाय राज्ञोऽन्तिकमुपागमत् ।
राजाकी वह बात मानकर ब्राह्मणशिरोमणि कृपाचार्य जलसे भरा हुआ कलश ले उसके समीप आये ।। ३९ १/२ ।।

तमब्रवीन्महाराज पुत्रस्तव विशाम्पते ।। ४० ।।
ममाज्ञया द्विजश्रेष्ठ द्रोणपुत्रोऽभिषिच्यताम् ।
सैनापत्येन भद्रं ते मम चेदिच्छसि प्रियम् ।। ४१ ।।
महाराज! प्रजानाथ! तब आपके पुत्रने उनसे कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मेरी आज्ञासे द्रोणपुत्रका सेनापतिके पदपर अभिषेक कीजिये ।। ४०-४१ ।।

राज्ञो नियोगाद् योद्धव्यं ब्राह्मणेन विशेषतः ।
वर्तता क्षत्रधर्मेण ह्येवं धर्मविदो विदुः ।। ४२ ।।
‘ब्राह्मणको विशेषतः राजाकी आज्ञासे क्षत्रिय-धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए युद्ध करना चाहिये—ऐसा धर्मज्ञ पुरुष मानते हैं’ ।। ४२ ।।

राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा कृपः शारद्वतस्तथा ।
द्रौणिं राज्ञो नियोगेन सैनापत्येऽभ्यषेचयत् ।। ४३ ।।
राजाकी वह बात सुनकर शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने उसकी आज्ञाके अनुसार अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेक किया ।। ४३ ।।

सोऽभिषिक्तो महाराज परिष्वज्य नृपोत्तमम् ।
प्रययौ सिंहनादेन दिशः सर्वा विनादयन् ।। ४४ ।।
महाराज! अभिषेक हो जानेपर अश्वत्थामाने नृपश्रेष्ठ दुर्योधनको हृदयसे लगाया और अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वहाँसे प्रस्थान किया ।।

दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र शोणितेन परिप्लुतः ।
तां निशां प्रतिपेदेऽथ सर्वभूतभयावहाम् ।। ४५ ।।
राजेन्द्र! खूनमें डूबे हुए दुर्योधनने भी सम्पूर्ण भूतोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली वह रात वहीं व्यतीत की ।। ४५ ।।

अपक्रम्य तु ते तूर्णं तस्मादायोधनान्नृप ।
शोकसंविग्नमनसश्चिन्ताध्यानपराभवन् ।। ४६ ।।
नरेश्वर! शोकसे व्याकुलचित्त हुए वे तीनों महारथी उस युद्धभूमिसे तुरंत ही दूर हट गये और चिन्ता एवं कर्तव्यके विचारमें निमग्न हो गये ।। ४६ ।।

॥ शल्यपर्व सम्पूर्णम् ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि अश्वत्थामसैनापत्याभिषेके पञ्चषष्टितमोऽध्यायः॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेकविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६५ ॥


॥ शल्यपर्व सम्पूर्णम् ॥


अनुष्टुप्बड़े श्लोकबड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपरकुल
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये३५३१(११५)१५८=३६८९=
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये४२(५)६ ॥। =४८ ॥। =
शल्यपर्वकी कुल श्लोकसंख्या३७३८

सौप्तिकपर्व

⬅ विषय-सूची (TOC)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

सौप्तिकपर्व

प्रथमोऽध्यायः

तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायण भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।

संजय उवाच
ततस्ते सहिता वीराः प्रयाता दक्षिणामुखाः ।
उपास्तमनवेलायां शिबिराभ्याशमागताः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! दुर्योधनकी आज्ञाके अनुसार कृपाचार्यके द्वारा अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो जानेके अनन्तर वे तीनों वीर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा एक साथ दक्षिण दिशाकी ओर चले और सूर्यास्तके समय सेनाकी छावनीके निकट जा पहुँचे ॥ १ ॥

विमुच्य वाहांस्त्वरिता भीता समभवंस्तदा ।
गहनं देशमासाद्य प्रच्छन्ना न्यविशन्त ते ॥ २ ॥
शत्रुओंको पता न लग जाय, इस भयसे वे सब-के-सब डरे हुए थे, अतः बड़ी उतावलीके साथ वनके गहन प्रदेशमें जाकर उन्होंने घोड़ोंको खोल दिया और छिपकर एक स्थानपर वे जा बैठे ॥ २ ॥

सेनानिवेशमभितो नातिदूरमवस्थिताः ।
निकृत्ता निशितैः शस्त्रैः समन्तात् क्षतविक्षताः ॥ ३ ॥

जहाँ सेनाकी छावनी थी, उस स्थानके पास थोड़ी ही दूरपर वे तीनों विश्राम करने लगे। उनके शरीर तीखे शस्त्रोंके आघातसे घायल हो गये थे। वे सब ओरसे क्षत-विक्षत हो रहे थे॥ ३॥
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य पाण्डवानेव चिन्तयन् ।
श्रुत्वा च निनदं घोरं पाण्डवानां जयैषिणाम् ॥ ४ ॥
अनुसारभयाद् भीताः प्राङ्मुखाः प्राद्रवन् पुनः ।
वे गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए पाण्डवोंकी ही चिन्ता करने लगे। इतनेहीमें विजयाभिलाषी पाण्डवोंकी भयंकर गर्जना सुनकर उन्हें यह भय हुआ कि पाण्डव कहीं हमारा पीछा न करने लगें; अतः वे पुनः घोड़ोंको रथमें जोतकर पूर्व दिशाकी ओर भाग चले ॥ ४ ½ ॥
ते मुहूर्तात् ततो गत्वा श्रान्तवाहाः पिपासिताः ॥ ५ ॥
नामृष्यन्त महेष्वासाः क्रोधामर्षवशं गताः ।
राज्ञो वधेन संतप्ता मुहूर्तं समवस्थिताः ॥ ६ ॥
दो ही घड़ीमें उस स्थानसे कुछ दूर जाकर क्रोध और अमर्षके वशीभूत हुए वे महाधनुर्धर योद्धा प्याससे पीड़ित हो गये। उनके घोड़े भी थक गये। उनके लिये यह अवस्था असह्य हो उठी थी। वे राजा दुर्योधनके मारे जानेसे बहुत दुःखी हो एक मुहूर्ततक वहाँ चुपचाप खड़े रहे ॥ ५-६ ॥

धृतराष्ट्र उवाच
अश्रद्धेयमिदं कर्म कृतं भीमेन संजय ।
यत् स नागायुतप्राणः पुत्रो मम निपातितः ॥ ७ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! मेरे पुत्र दुर्योधनमें दस हजार हाथियोंका बल था तो भी उसे भीमसेनने मार गिराया। उनके द्वारा जो यह कार्य किया गया है, इसपर सहसा विश्वास नहीं होता ॥ ७ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां वज्रसंहननो युवा ।
पाण्डवैः समरे पुत्रो निहतो मम संजय ॥ ८ ॥
संजय! मेरा पुत्र नवयुवक था। उसका शरीर वज्रके समान कठोर था और इसीलिये वह सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अवध्य था, तथापि पाण्डवोंने समरांगणमें उसका वध कर डाला ॥ ८ ॥
न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक्यं गावलगणे नरैः ।
यत् समेत्य रणे पार्थैः पुत्रो मम निपातितः ॥ ९ ॥
गवलगणकुमार! कुन्तीके पुत्रोंने मिलकर रणभूमिमें जो मेरे पुत्रको धराशायी कर दिया है, इससे जान पड़ता है कि कोई भी मनुष्य दैवके विधानका उल्लंघन नहीं कर

सकता ॥ ९ ॥ अद्रिसारमयं नूनं हृदयं मम संजय । हतं पुत्रशतं श्रुत्वा यन्न दीर्णं सहस्रधा ॥ १० ॥ संजय! निश्चय ही मेरा हृदय पत्थरके सारतत्त्वका बना हुआ है, जो अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेका समाचार सुनकर भी इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो गये ॥ १० ॥ कथं हि वृद्धमिथुनं हतपुत्रं भविष्यति । न ह्यहं पाण्डवेयस्य विषये वस्तुमुत्सहे ॥ ११ ॥ हाय! अब हम दोनों बूढ़े पति-पत्नी अपने पुत्रोंके मारे जानेसे कैसे जीवित रहेंगे? मैं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके राज्यमें नहीं रह सकता ॥ ११ ॥ कथं राज्ञः पिता भूत्वा स्वयं राजा च संजय । प्रेष्यभूतः प्रवर्तेयं पाण्डवेयस्य शासनात् ॥ १२ ॥ संजय! मैं राजाका पिता और स्वयं भी राजा ही था। अब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी आज्ञाके अधीन हो दासकी भाँति कैसे जीवननिर्वाह करूँगा? ॥ १२ ॥ आज्ञाप्य पृथिवीं सर्वां स्थित्वा मूर्ध्नि च संजय । कथमद्य भविष्यामि प्रेष्यभूतो दुरन्तकृत् ॥ १३ ॥ संजय! पहले समस्त भूमण्डलपर मेरी आज्ञा चलती थी और मैं सबका शिरमौर था; ऐसा होकर अब मैं दूसरोंका दास बनकर कैसे रहूँगा। मैंने स्वयं ही अपने जीवनकी अन्तिम अवस्थाको दुःखमय बना दिया है! ॥ कथं भीमस्य वाक्यानि श्रोतुं शक्ष्यामि संजय । येन पुत्रशतं पूर्णमेकेन निहतं मम ॥ १४ ॥ ओह! जिसने अकेले ही मेरे पूरे-के-पूरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला, उस भीमसेनकी बातोंको मैं कैसे सुन सकूँगा? ॥ १४ ॥ कृतं सत्यं वचस्तस्य विदुरस्य महात्मनः । अकुर्वता वचस्तेन मम पुत्रेण संजय ॥ १५ ॥ संजय! मेरे पुत्रने मेरी बात न मानकर महात्मा विदुरके कहे हुए वचनको सत्य कर दिखाया ॥ १५ ॥ अधर्मेण हते तात पुत्रे दुर्योधने मम । कृतवर्मा कृपो द्रौणिः किमकुर्वत संजय ॥ १६ ॥ तात संजय! अब यह बताओ कि मेरे पुत्र दुर्योधनके अधर्मपूर्वक मारे जानेपर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामाने क्या किया? ॥ १६ ॥

संजय उवाच

गत्वा तु तावका राजन् नातिदूरमवस्थिताः ।

अपश्यन्त वनं घोरं नानाद्रुमलतावृतम् ॥ १७ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! आपके पक्षके वे तीनों वीर वहाँसे थोड़ी ही दूरपर जाकर खड़े हो गये। वहाँ उन्होंने नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे भरा हुआ एक भयंकर वन देखा ॥ १७ ॥

ते मुहूर्तं तु विश्रम्य लब्धतोयैर्हयोत्तमैः । सूर्यास्तमनवेलायां समासेदुर्महद् वनम् ॥ १८ ॥ नानामृगगणैर्जुष्टं नानापक्षिगणावृतम् । नानाद्रुमलताच्छन्नं नानाव्यालनिषेवितम् ॥ १९ ॥ उस स्थानपर थोड़ी देरतक ठहरकर उन सब लोगोंने अपने उत्तम घोड़ोंको पानी पिलाया और सूर्यास्त होते-होते वे उस विशाल वनमें जा पहुँचे, जहाँ अनेक प्रकारके मृग और भाँति-भाँतिके पक्षी निवास करते थे, तरह-तरहके वृक्षों और लताओंने उस वनको व्याप्त कर रखा था और अनेक जातिके सर्प उसका सेवन करते थे ॥ १८-१९ ॥

नानातोयैः समाकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम् । पद्मिनीशतसंछन्नं नीलोत्पलसमायुतम् ॥ २० ॥ उसमें जहाँ-तहाँ अनेक प्रकारके जलाशय थे, भाँति-भाँतिके पुष्प उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे, शत-शत रक्तकमल और असंख्य नीलकमल वहाँके जलाशयोंमें सब ओर छा रहे थे ॥ २० ॥

प्रविश्य तद् वनं घोरं वीक्षमाणाः समन्ततः । शाखासहस्रसंछन्नं न्यग्रोधं ददृशुस्ततः ॥ २१ ॥ उस भयंकर वनमें प्रवेश करके सब ओर दृष्टि डालनेपर उन्हें सहस्रों शाखाओंसे आच्छादित एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया ॥ २१ ॥

उपेत्य तु तदा राजन् न्यग्रोधं ते महारथाः । ददृशुर्द्विपदां श्रेष्ठाः श्रेष्ठं तं वै वनस्पतिम् ॥ २२ ॥ राजन्! मनुष्योंमें श्रेष्ठ उन महारथियोंने पास जाकर उस उत्तम वनस्पति (बरगद)-को देखा ॥ २२ ॥

तेऽवतीर्य रथेभ्यश्च विप्रमुच्य च वाजिनः । उपस्पृश्य यथान्यायं संध्यामन्वासत प्रभो ॥ २३ ॥ प्रभो! वहाँ रथोंसे उतरकर उन तीनोंने अपने घोड़ोंको खोल दिया और यथोचितरूपसे स्नान आदि करके संध्योपासना की ॥ २३ ॥

ततोऽस्तं पर्वतश्रेष्ठमनुप्राप्ते दिवाकरे । सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी समपद्यत ॥ २४ ॥ तदनन्तर सूर्यदेवके पर्वतश्रेष्ठ अस्ताचलपर पहुँच जानेपर धायकी भाँति सम्पूर्ण जगत्को अपनी गोदमें विश्राम देनेवाली रात्रिदेवीका सर्वत्र आधिपत्य हो गया ॥ २४ ॥

ग्रहनक्षत्रताराभिः सम्पूर्णाभिरलंकृतम् । नभोऽशुकमिवाभाति प्रेक्षणीयं समन्ततः ॥ २५ ॥ सम्पूर्ण ग्रहों, नक्षत्रों और ताराओंसे अलंकृत हुआ आकाश जरीकी साड़ीके समान सब ओरसे देखनेयोग्य प्रतीत होता था ॥ २५ ॥

इच्छया ते प्रवल्गन्ति ये सत्त्वा रात्रिचारिणः । दिवाचराश्च ये सत्त्वास्ते निद्रावशमागताः ॥ २६ ॥ रात्रिमें विचरनेवाले प्राणी अपनी इच्छाके अनुसार उछल-कूद मचाने लगे और जो दिनमें विचरनेवाले जीव-जन्तु थे, वे निद्राके अधीन हो गये ॥ २६ ॥

रात्रिंचराणां सत्त्वानां निर्घोषोऽभूत् सुदारुणः । क्रव्यादाश्च प्रमुदिता घोरा प्राप्ता च शर्वरी ॥ २७ ॥ रात्रिमें घूमने-फिरनेवाले जीवोंका अत्यन्त भयंकर शब्द प्रकट होने लगा। मांसभक्षी प्राणी प्रसन्न हो गये और वह भयंकर रात्रि सब ओर व्याप्त हो गयी ॥ २७ ॥

तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे दुःखशोकसमन्विताः । कृतवर्मा कृपो द्रौणिरुपोपविविशुः समम् ॥ २८ ॥ रात्रिका प्रथम प्रहर बीत रहा था। उस भयंकर वेलामें दुःख और शोकसे संतप्त हुए कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा एक साथ ही आस-पास बैठ गये ॥ २८ ॥

तत्रोपविष्टाः शोचन्तो न्यग्रोधस्य समीपतः । तमेवार्थमतिक्रान्तं कुरुपाण्डवयोः क्षयम् ॥ २९ ॥ निद्रया च परीताङ्गा निषेदुर्धरणीतले । श्रमेण सुदृढं युक्ता विक्षता विविधैः शरैः ॥ ३० ॥ वटवृक्षके समीप बैठकर कौरवों तथा पाण्डव-योद्धाओंके उसी विनाशकी बीती हुई बातके लिये शोक करते हुए वे तीनों वीर निद्रासे सारे अंग शिथिल हो जानेके कारण पृथ्वीपर लेट गये। उस समय वे भारी थकावटसे चूर-चूर हो रहे थे और नाना प्रकारके बाणोंसे उनके सारे अंग क्षत-विक्षत हो गये थे ॥ २९-३० ॥

ततो निद्रावशं प्राप्तौ कृपभोजौ महारथौ । सुखोचितावदुःखार्हौ निषण्णौ धरणीतले ॥ ३१ ॥ तदनन्तर कृपाचार्य और कृतवर्मा—इन दोनों महारथियोंको गाढ़ी नींद आ गयी। वे सुख भोगनेके योग्य थे, दुःख पानेके योग्य कदापि नहीं थे, तो भी धरतीपर ही सो गये थे ॥ ३१ ॥

तौ तु सुप्तौ महाराज श्रमशोकसमन्वितौ । महार्हशयनोपेतौ भूमावेव ह्यनाथवत् ॥ ३२ ॥ क्रोधामर्षवशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत । न वै स्म स जगामाथ निद्रां सर्प इव श्वसन् ॥ ३३ ॥

महाराज! बहुमूल्य शय्या एवं सुखसामग्रीसे सम्पन्न होनेपर भी उन दोनों वीरोंको परिश्रम और शोकसे पीड़ित हो अनाथकी भाँति पृथ्वीपर ही पड़ा देख द्रोणपुत्र अश्वत्थामा क्रोध और अमर्षके वशीभूत हो गया। भारत! उस समय उसे नींद नहीं आयी। वह सर्पके समान लंबी साँस खींचता रहा ॥ ३२-३३ ॥

न लेभे स तु निद्रां वै दह्यमानो हि मन्युना ।
वीक्षाञ्चक्रे महाबाहुस्तद् वनं घोरदर्शनम् ॥ ३४ ॥
क्रोधसे जलते रहनेके कारण नींद उसके पास फटकने नहीं पाती थी। उस महाबाहु वीरने भयंकर दिखायी देनेवाले उस वनकी ओर बारंबार दृष्टिपात किया ॥ ३४ ॥

वीक्षमाणो वनोद्देशं नानासत्त्वैर्निषेवितम् ।
अपश्यत महाबाहुर्न्यग्रोधं वायसैर्वृतम् ॥ ३५ ॥
नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंसे सेवित वनस्थलीका निरीक्षण करते हुए महाबाहु अश्वत्थामाने कौओंसे भरे हुए वटवृक्षपर दृष्टिपात किया ॥ ३५ ॥

तत्र काकसहस्राणि तां निशां पर्यणामयन् ।
सुखं स्वपन्ति कौरव्य पृथक् पृथगुपाश्रयाः ॥ ३६ ॥
कुरुनन्दन! उस वृक्षपर सहस्रों कौए रातमें बसेरा ले रहे थे। वे पृथक्-पृथक् घोंसलोंका आश्रय लेकर सुखकी नींद सो रहे थे ॥ ३६ ॥

सुप्तेषु तेषु काकेषु विश्रब्धेषु समन्ततः ।
सोऽपश्यत् सहसा यान्तमुलूकं घोरदर्शनम् ॥ ३७ ॥
उन कौओंके सब ओर निर्भय होकर सो जानेपर अश्वत्थामाने देखा कि सहसा एक भयानक उल्लू उधर आ निकला ॥ ३७ ॥

महास्वनं महाकायं हर्यक्षं बभ्रुपिङ्गलम् ।
सुदीर्घघोणानखरं सुपर्णमिव वेगितम् ॥ ३८ ॥
उसकी बोली बड़ी भयंकर थी। डील-डौल भी बड़ा था। आँखें काले रंगकी थीं, उसका शरीर भूरा और पिंगलवर्णका था। उसकी चोंच और पंजे बहुत बड़े थे और वह गरुड़के समान वेगशाली जान पड़ता था ॥ ३८ ॥

सोऽथ शब्दं मृदुं कृत्वा लीयमान इवाण्डजः ।
न्यग्रोधस्य ततः शाखां प्रार्थयामास भारत ॥ ३९ ॥
भरतनन्दन! वह पक्षी कोमल बोली बोलकर छिपता हुआ-सा बरगदकी उस शाखापर आनेकी इच्छा करने लगा ॥ ३९ ॥

संनिपत्य तु शाखायां न्यग्रोधस्य विहङ्गमः ।
सुप्ताञ्जघान सुबहून् वायसान् वायसान्तकः ॥ ४० ॥
कौओंके लिये कालरूपधारी उस विहंगमने वटवृक्षकी उस शाखापर बड़े वेगसे आक्रमण किया और सोये हुए बहुत-से कौओंको मार डाला ॥ ४० ॥

केषांचिदच्छिनत् पक्षान् शिरांसि च चकर्त ह ।
चरणांश्चैव केषांचिद् बभञ्ज चरणायुधः ॥ ४१ ॥
उसने अपने पंजोंसे ही अस्त्रका काम लेकर किन्हीं कौओंके पंख नोच डाले, किन्हींके सिर काट लिये और किन्हींके पैर तोड़ डाले ॥ ४१ ॥

क्षणेनाहन् स बलवान् येऽस्य दृष्टिपथे स्थिताः ।
तेषां शरीरावयवैः शरीरैश्च विशाम्पते ॥ ४२ ॥
न्यग्रोधमण्डलं सर्वं संछन्नं सर्वतोऽभवत् ।
प्रजानाथ! उस बलवान् उल्लूने, जो-जो कौए उसकी दृष्टिमें आ गये, उन सबको क्षणभरमें मार डाला। इससे वह सारा वटवृक्ष कौओंके शरीरों तथा उनके विभिन्न अवयवोंद्वारा सब ओरसे आच्छादित हो गया ॥ ४२ १/२ ॥

तांस्तु हत्वा ततः काकान् कौशिको मुदितोऽभवत् ॥ ४३ ॥
प्रतिकृत्य यथाकामं शत्रूणां शत्रुसूदनः ।
वह शत्रुओंका संहार करनेवाला उलूक उन कौओंका वध करके अपने शत्रुओंसे इच्छानुसार भरपूर बदला लेकर बहुत प्रसन्न हुआ ॥ ४३ १/२ ॥

तद् दृष्ट्वा सोपधं कर्म कौशिकेन कृतं निशि ॥ ४४ ॥
तद्भावकृतसंकल्पो द्रौणिरेकोऽन्वचिन्तयत् ।
रात्रिमें उल्लूके द्वारा किये गये उस कपटपूर्ण क्रूर कर्मको देखकर स्वयं भी वैसा ही करनेका संकल्प लेकर अश्वत्थामा अकेला ही विचार करने लगा— ॥ ४४ १/२ ॥

उपदेशः कृतोऽनेन पक्षिणा मम संयुगे ॥ ४५ ॥
शत्रूणां क्षपणे युक्तः प्राप्तः कालश्च मे मतः ।
‘इस पक्षीने युद्धमें क्या करना चाहिये, इसका उपदेश मुझे दे दिया। मैं समझता हूँ कि मेरे लिये इसी प्रकार शत्रुओंके संहार करनेका समय प्राप्त हुआ है ॥

नाद्य शक्या मया हन्तुं पाण्डवा जितकाशिनः ॥ ४६ ॥
बलवन्तः कृतोत्साहाः प्राप्तलक्ष्याः प्रहारिणः ।
‘पाण्डव इस समय विजयसे उल्लसित हो रहे हैं। वे बलवान्, उत्साही और प्रहार करनेमें कुशल हैं। उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त हो गया है। ऐसी अवस्थामें आज मैं अपनी शक्तिसे उनका वध नहीं कर सकता ॥

राज्ञः सकाशात् तेषां तु प्रतिज्ञातो वधो मया ॥ ४७ ॥
पतङ्गाग्निसमां वृत्तिमास्थायात्मविनाशिनीम् ।
न्यायतो युध्यमानस्य प्राणत्यागो न संशयः ॥ ४८ ॥
‘इधर मैंने राजा दुर्योधनके समीप पाण्डवोंके वधकी प्रतिज्ञा कर ली है। परंतु यह कार्य वैसा ही है, जैसा पतंगोंका आगमें कूद पड़ना। मैंने जिस वृत्तिका आश्रय लेकर पूर्वोक्त

प्रतिज्ञा की है, वह मेरा ही विनाश करनेवाली है। इसमें संदेह नहीं कि यदि मैं न्यायके अनुसार युद्ध करूँगा तो मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा॥ ४७-४८॥ छद्मना च भवेत् सिद्धिः शत्रूणां च क्षयो महान्। तत्र संशयितादर्थाद् योऽर्थो निःसंशयो भवेत्॥ ४९॥ तं जना बहु मन्यन्ते ये च शास्त्रविशारदाः। 'यदि छलसे काम लूँ तो अवश्य मेरे अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो सकती है। शत्रुओंका महान् संहार भी तभी सम्भव होगा। जहाँ सिद्धि मिलनेमें संदेह हो, उसकी अपेक्षा उस उपायका अवलम्बन करना उत्तम है, जिसमें संशयके लिये स्थान न हो। साधारण लोग तथा शास्त्रज्ञ पुरुष भी उसीका अधिक आदर करते हैं॥ यच्चाप्यत्र भवेद् वाच्यं गर्हितं लोकनिन्दितम्॥ ५०॥ कर्तव्यं तन्मनुष्येण क्षत्रधर्मेण वर्तता। 'इस लोकमें जिस कार्यको गर्हणीय समझा जाता हो, जिसकी सब लोग भरपेट निन्दा करते हों, वह भी क्षत्रिय-धर्मके अनुसार बर्ताव करनेवाले मनुष्यके लिये कर्तव्य माना गया है॥ ५० १/२॥ निन्दितानि च सर्वाणि कुत्सितानि पदे पदे॥ ५१॥ सोपधानि कृतान्येव पाण्डवैरकृतात्मभिः। 'अपवित्र अन्तःकरणवाले पाण्डवोंने भी तो पद-पदपर ऐसे कार्य किये हैं, जो सब-के-सब निन्दा और घृणाके योग्य रहे हैं। उनके द्वारा भी अनेक कपटपूर्ण कर्म किये ही गये हैं॥ ५१ १/२॥ अस्मिन्नर्थे पुरा गीता श्रूयन्ते धर्मचिन्तकैः॥ ५२॥ श्लोका न्यायमवेक्षद्भिस्तत्त्वार्थस्तत्त्वदर्शिभिः। 'इस विषयमें न्यायपर दृष्टि रखनेवाले धर्मचिन्तक एवं तत्त्वदर्शी पुरुषोंने प्राचीन कालमें ऐसे श्लोकोंका गान किया है, जो तात्त्विक अर्थका प्रतिपादन करनेवाले हैं। वे श्लोक इस प्रकार सुने जाते हैं—॥ ५२ १/२॥ परिश्रान्ते विदीर्णे वा भुञ्जाने वापि शत्रुभिः॥ ५३॥ प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रहर्तव्यं रिपोर्बलम्। 'शत्रुओंकी सेना यदि बहुत थक गयी हो, तितर-बितर हो गयी हो, भोजन कर रही हो, कहीं जा रही हो अथवा किसी स्थानविशेषमें प्रवेश कर रही हो तो भी विपक्षियोंको उसपर प्रहार करना ही चाहिये॥ ५३ १/२॥ निद्रार्तमर्धरात्रे च तथा नष्टप्रणायकम्॥ ५४॥ भिन्नयोधं बलं यच्च द्विधा युक्तं च यद् भवेत्।