महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सोऽयं मां समनुप्राप्तः प्रत्यक्षं भवतां हि यः।
पृथिवीं पालयित्वाहमेतां निष्ठामुपागतः॥ २४॥
‘वही यह विनाशका समय अब मुझे भी प्राप्त हुआ है, जिसे आपलोग प्रत्यक्ष देख रहे हैं। एक दिन मैं सारी पृथ्वीका पालन करता था और आज इस अवस्थाको पहुँच गया हूँ॥ २४॥
दिष्ट्या नाहं परावृत्तो युद्धे कस्यांचिदापदि।
दिष्ट्याहं निहतः पापैश्छलेनैव विशेषतः॥ २५॥
‘तो भी मुझे इस बातकी खुशी है कि कैसी ही आपत्ति क्यों न आयी, मैं युद्धमें कभी पीछे नहीं हटा। पापियोंने मुझे मारा भी तो छलसे॥ २५॥
उत्साहश्च कृतो नित्यं मया दिष्ट्या युयुत्सता।
दिष्ट्या चास्मिन् हतो युद्धे निहतज्ञातिबान्धवः॥ २६॥
‘सौभाग्यवश मैंने रणभूमिमें जूझनेकी इच्छा रखकर सदा ही उत्साह दिखाया है और भाई-बन्धुओंके मारे जानेपर स्वयं भी युद्धमें ही प्राण-त्याग कर रहा हूँ, इससे मुझे विशेष संतोष है॥ २६॥
दिष्ट्या च वोऽहं पश्यामि मुक्तानस्माज्जनक्षयात्।
स्वस्तियुक्तांश्च कल्यांश्च तन्मे प्रियमनुत्तमम्॥ २७॥
‘सौभाग्यकी बात है कि मैं आपलोगोंको इस नरसंहारसे मुक्त देख रहा हूँ। साथ ही आपलोग सकुशल एवं कुछ करनेमें समर्थ हैं—यह मेरे लिये और भी उत्तम एवं प्रसन्नताकी बात है॥ २७॥
मा भवन्तोऽत्र तप्यन्तां सौहृदान्निधनेन मे।
यदि वेदाः प्रमाणं वो जिता लोका मयाक्षयाः॥ २८॥
‘आपलोगोंका मुझपर स्वाभाविक स्नेह है, इसलिये मेरी मृत्युसे यहाँ आपलोगोंको जो दुःख और संताप हो रहा है, वह नहीं होना चाहिये। यदि आपकी दृष्टिमें वेदशास्त्र प्रामाणिक हैं तो मैंने अक्षय लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया॥ २८॥
मन्यमानः प्रभावं च कृष्णस्यामिततेजसः।
तेन न च्यावितश्चाहं क्षत्रधर्मात् स्वनुष्ठितात्॥ २९॥
स मया समनुप्राप्तो नास्मि शोच्यः कथंचन।
‘मैं अमित तेजस्वी श्रीकृष्णके अद्भुत प्रभावको मानता हुआ भी कभी उनकी प्रेरणासे अच्छी तरह पालन किये हुए क्षत्रियधर्मसे विचलित नहीं हुआ। मैंने उस धर्मका फल प्राप्त किया है; अतः किसी प्रकार भी मैं शोकके योग्य नहीं हूँ॥ २९ १/२॥
कृतं भवद्भिः सदृशमनुरूपमिवात्मनः॥ ३०॥
यतितं विजये नित्यं दैवं तु दुरतिक्रमम्।
'आपलोगोंने अपने स्वरूपके अनुरूप योग्य पराक्रम प्रकट किया और सदा मुझे विजय दिलानेकी ही चेष्टा की; तथापि दैवके विधानका उल्लंघन करना किसीके लिये भी सर्वथा कठिन है' ॥ ३० १/२ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं बाष्पव्याकुललोचनः ॥ ३१ ॥
तूष्णीं बभूव राजेन्द्र रुजासौ विह्वलो भृशम् ।
राजेन्द्र! इतना कहते-कहते दुर्योधनकी आँखें आँसुओंसे भर आयीं और वह वेदनासे अत्यन्त व्याकुल होकर चुप हो गया—उससे कुछ बोला नहीं गया ॥ ३१ १/२ ॥
तथा दृष्ट्वा तु राजानं बाष्पशोकसमन्वितम् ॥ ३२ ॥
द्रौणिः क्रोधेन जज्वल यथा वह्निर्जगत्क्षये ।
राजा दुर्योधनको शोकके आँसू बहाते देख अश्वत्थामा प्रलयकालकी अग्निके समान क्रोधसे प्रज्वलित हो उठा ॥ ३२ १/२ ॥
स च क्रोधसमाविष्टः पाणौ पाणिं निपीड्य च ॥ ३३ ॥
बाष्पविह्वलया वाचा राजानमिदमब्रवीत् ।
रोषके आवेशमें भरकर उसने हाथपर हाथ दबाया और अश्रुगद्गद वाणीद्वारा उसने राजा दुर्योधनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३३ १/२ ॥
पिता मे निहतः क्षुद्रैः सुनृशंसेन कर्मणा ॥ ३४ ॥
न तथा तेन तप्यामि यथा राजंस्त्वयाद्य वै ।
'राजन्! नीच पाण्डवोंने अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मके द्वारा मेरे पिताका वध किया था; परंतु उसके कारण भी मैं उतना संतप्त नहीं हूँ, जैसा कि आज तुम्हारे वधके कारण मुझे कष्ट हो रहा है' ॥ ३४ १/२ ॥
शृणु चेदं वचो मह्यं सत्येन वदतः प्रभो ॥ ३५ ॥
इष्टापूर्तेन दानेन धर्मेण सुकृतेन च ।
अद्याहं सर्वपञ्चालान् वासुदेवस्य पश्यतः ॥ ३६ ॥
सर्वोपायैर्हि नेष्यामि प्रेतराजनिवेशनम् ।
अनुज्ञां तु महाराज भवान् मे दातुमर्हति ॥ ३७ ॥
'प्रभो! मैं सत्यकी शपथ खाकर जो कह रहा हूँ, मेरी इस बातको सुनो। मैं अपने इष्ट, आपूर्त, दान, धर्म तथा अन्य शुभ कर्मोंकी शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज श्रीकृष्णके देखते-देखते सम्पूर्ण पांचालोंको सभी उपायोंद्वारा यमराजके लोकमें भेज दूँगा। महाराज! इसके लिये तुम मुझे आज्ञा दे दो' ॥ ३५—३७ ॥
इति श्रुत्वा तु वचनं द्रोणपुत्रस्य कौरवः ।
मनसः प्रीतिजननं कृपं वचनमब्रवीत् ॥ ३८ ॥
आचार्य शीघ्रं कलशं जलपूर्णं समानय ।
द्रोणपुत्रका यह मनको प्रसन्न करनेवाला वचन सुनकर कुरुराज दुर्योधनने कृपाचार्यसे कहा—‘आचार्य! आप शीघ्र ही जलसे भरा हुआ कलश ले आइये’ ।। ३८ १/२ ।।
स तद् वचनमाज्ञाय राज्ञो ब्राह्मणसत्तमः ।। ३९ ।।
कलशं पूर्णमादाय राज्ञोऽन्तिकमुपागमत् ।
राजाकी वह बात मानकर ब्राह्मणशिरोमणि कृपाचार्य जलसे भरा हुआ कलश ले उसके समीप आये ।। ३९ १/२ ।।
तमब्रवीन्महाराज पुत्रस्तव विशाम्पते ।। ४० ।।
ममाज्ञया द्विजश्रेष्ठ द्रोणपुत्रोऽभिषिच्यताम् ।
सैनापत्येन भद्रं ते मम चेदिच्छसि प्रियम् ।। ४१ ।।
महाराज! प्रजानाथ! तब आपके पुत्रने उनसे कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! आपका कल्याण हो। यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मेरी आज्ञासे द्रोणपुत्रका सेनापतिके पदपर अभिषेक कीजिये ।। ४०-४१ ।।
राज्ञो नियोगाद् योद्धव्यं ब्राह्मणेन विशेषतः ।
वर्तता क्षत्रधर्मेण ह्येवं धर्मविदो विदुः ।। ४२ ।।
‘ब्राह्मणको विशेषतः राजाकी आज्ञासे क्षत्रिय-धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए युद्ध करना चाहिये—ऐसा धर्मज्ञ पुरुष मानते हैं’ ।। ४२ ।।
राज्ञस्तु वचनं श्रुत्वा कृपः शारद्वतस्तथा ।
द्रौणिं राज्ञो नियोगेन सैनापत्येऽभ्यषेचयत् ।। ४३ ।।
राजाकी वह बात सुनकर शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने उसकी आज्ञाके अनुसार अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेक किया ।। ४३ ।।
सोऽभिषिक्तो महाराज परिष्वज्य नृपोत्तमम् ।
प्रययौ सिंहनादेन दिशः सर्वा विनादयन् ।। ४४ ।।
महाराज! अभिषेक हो जानेपर अश्वत्थामाने नृपश्रेष्ठ दुर्योधनको हृदयसे लगाया और अपने सिंहनादसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वहाँसे प्रस्थान किया ।।
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र शोणितेन परिप्लुतः ।
तां निशां प्रतिपेदेऽथ सर्वभूतभयावहाम् ।। ४५ ।।
राजेन्द्र! खूनमें डूबे हुए दुर्योधनने भी सम्पूर्ण भूतोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली वह रात वहीं व्यतीत की ।। ४५ ।।
अपक्रम्य तु ते तूर्णं तस्मादायोधनान्नृप ।
शोकसंविग्नमनसश्चिन्ताध्यानपराभवन् ।। ४६ ।।
नरेश्वर! शोकसे व्याकुलचित्त हुए वे तीनों महारथी उस युद्धभूमिसे तुरंत ही दूर हट गये और चिन्ता एवं कर्तव्यके विचारमें निमग्न हो गये ।। ४६ ।।
॥ शल्यपर्व सम्पूर्णम् ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि अश्वत्थामसैनापत्याभिषेके पञ्चषष्टितमोऽध्यायः॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेकविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६५ ॥
॥ शल्यपर्व सम्पूर्णम् ॥
| अनुष्टुप् | बड़े श्लोक | बड़े श्लोकोंको अनुष्टुप् माननेपर | कुल | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये | ३५३१ | (११५) | १५८= | ३६८९= |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये | ४२ | (५) | ६ ॥। = | ४८ ॥। = |
| शल्यपर्वकी कुल श्लोकसंख्या | ३७३८ |
सौप्तिकपर्व
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीमहाभारतम्
सौप्तिकपर्व
प्रथमोऽध्यायः
तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायण भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।
संजय उवाच
ततस्ते सहिता वीराः प्रयाता दक्षिणामुखाः ।
उपास्तमनवेलायां शिबिराभ्याशमागताः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! दुर्योधनकी आज्ञाके अनुसार कृपाचार्यके द्वारा अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो जानेके अनन्तर वे तीनों वीर अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा एक साथ दक्षिण दिशाकी ओर चले और सूर्यास्तके समय सेनाकी छावनीके निकट जा पहुँचे ॥ १ ॥
विमुच्य वाहांस्त्वरिता भीता समभवंस्तदा ।
गहनं देशमासाद्य प्रच्छन्ना न्यविशन्त ते ॥ २ ॥
शत्रुओंको पता न लग जाय, इस भयसे वे सब-के-सब डरे हुए थे, अतः बड़ी उतावलीके साथ वनके गहन प्रदेशमें जाकर उन्होंने घोड़ोंको खोल दिया और छिपकर एक स्थानपर वे जा बैठे ॥ २ ॥
सेनानिवेशमभितो नातिदूरमवस्थिताः ।
निकृत्ता निशितैः शस्त्रैः समन्तात् क्षतविक्षताः ॥ ३ ॥
जहाँ सेनाकी छावनी थी, उस स्थानके पास थोड़ी ही दूरपर वे तीनों विश्राम करने लगे। उनके शरीर तीखे शस्त्रोंके आघातसे घायल हो गये थे। वे सब ओरसे क्षत-विक्षत हो रहे थे॥ ३॥
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य पाण्डवानेव चिन्तयन् ।
श्रुत्वा च निनदं घोरं पाण्डवानां जयैषिणाम् ॥ ४ ॥
अनुसारभयाद् भीताः प्राङ्मुखाः प्राद्रवन् पुनः ।
वे गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए पाण्डवोंकी ही चिन्ता करने लगे। इतनेहीमें विजयाभिलाषी पाण्डवोंकी भयंकर गर्जना सुनकर उन्हें यह भय हुआ कि पाण्डव कहीं हमारा पीछा न करने लगें; अतः वे पुनः घोड़ोंको रथमें जोतकर पूर्व दिशाकी ओर भाग चले ॥ ४ ½ ॥
ते मुहूर्तात् ततो गत्वा श्रान्तवाहाः पिपासिताः ॥ ५ ॥
नामृष्यन्त महेष्वासाः क्रोधामर्षवशं गताः ।
राज्ञो वधेन संतप्ता मुहूर्तं समवस्थिताः ॥ ६ ॥
दो ही घड़ीमें उस स्थानसे कुछ दूर जाकर क्रोध और अमर्षके वशीभूत हुए वे महाधनुर्धर योद्धा प्याससे पीड़ित हो गये। उनके घोड़े भी थक गये। उनके लिये यह अवस्था असह्य हो उठी थी। वे राजा दुर्योधनके मारे जानेसे बहुत दुःखी हो एक मुहूर्ततक वहाँ चुपचाप खड़े रहे ॥ ५-६ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
अश्रद्धेयमिदं कर्म कृतं भीमेन संजय ।
यत् स नागायुतप्राणः पुत्रो मम निपातितः ॥ ७ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! मेरे पुत्र दुर्योधनमें दस हजार हाथियोंका बल था तो भी उसे भीमसेनने मार गिराया। उनके द्वारा जो यह कार्य किया गया है, इसपर सहसा विश्वास नहीं होता ॥ ७ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां वज्रसंहननो युवा ।
पाण्डवैः समरे पुत्रो निहतो मम संजय ॥ ८ ॥
संजय! मेरा पुत्र नवयुवक था। उसका शरीर वज्रके समान कठोर था और इसीलिये वह सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अवध्य था, तथापि पाण्डवोंने समरांगणमें उसका वध कर डाला ॥ ८ ॥
न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक्यं गावलगणे नरैः ।
यत् समेत्य रणे पार्थैः पुत्रो मम निपातितः ॥ ९ ॥
गवलगणकुमार! कुन्तीके पुत्रोंने मिलकर रणभूमिमें जो मेरे पुत्रको धराशायी कर दिया है, इससे जान पड़ता है कि कोई भी मनुष्य दैवके विधानका उल्लंघन नहीं कर
सकता ॥ ९ ॥ अद्रिसारमयं नूनं हृदयं मम संजय । हतं पुत्रशतं श्रुत्वा यन्न दीर्णं सहस्रधा ॥ १० ॥ संजय! निश्चय ही मेरा हृदय पत्थरके सारतत्त्वका बना हुआ है, जो अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेका समाचार सुनकर भी इसके सहस्रों टुकड़े नहीं हो गये ॥ १० ॥ कथं हि वृद्धमिथुनं हतपुत्रं भविष्यति । न ह्यहं पाण्डवेयस्य विषये वस्तुमुत्सहे ॥ ११ ॥ हाय! अब हम दोनों बूढ़े पति-पत्नी अपने पुत्रोंके मारे जानेसे कैसे जीवित रहेंगे? मैं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके राज्यमें नहीं रह सकता ॥ ११ ॥ कथं राज्ञः पिता भूत्वा स्वयं राजा च संजय । प्रेष्यभूतः प्रवर्तेयं पाण्डवेयस्य शासनात् ॥ १२ ॥ संजय! मैं राजाका पिता और स्वयं भी राजा ही था। अब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी आज्ञाके अधीन हो दासकी भाँति कैसे जीवननिर्वाह करूँगा? ॥ १२ ॥ आज्ञाप्य पृथिवीं सर्वां स्थित्वा मूर्ध्नि च संजय । कथमद्य भविष्यामि प्रेष्यभूतो दुरन्तकृत् ॥ १३ ॥ संजय! पहले समस्त भूमण्डलपर मेरी आज्ञा चलती थी और मैं सबका शिरमौर था; ऐसा होकर अब मैं दूसरोंका दास बनकर कैसे रहूँगा। मैंने स्वयं ही अपने जीवनकी अन्तिम अवस्थाको दुःखमय बना दिया है! ॥ कथं भीमस्य वाक्यानि श्रोतुं शक्ष्यामि संजय । येन पुत्रशतं पूर्णमेकेन निहतं मम ॥ १४ ॥ ओह! जिसने अकेले ही मेरे पूरे-के-पूरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला, उस भीमसेनकी बातोंको मैं कैसे सुन सकूँगा? ॥ १४ ॥ कृतं सत्यं वचस्तस्य विदुरस्य महात्मनः । अकुर्वता वचस्तेन मम पुत्रेण संजय ॥ १५ ॥ संजय! मेरे पुत्रने मेरी बात न मानकर महात्मा विदुरके कहे हुए वचनको सत्य कर दिखाया ॥ १५ ॥ अधर्मेण हते तात पुत्रे दुर्योधने मम । कृतवर्मा कृपो द्रौणिः किमकुर्वत संजय ॥ १६ ॥ तात संजय! अब यह बताओ कि मेरे पुत्र दुर्योधनके अधर्मपूर्वक मारे जानेपर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामाने क्या किया? ॥ १६ ॥
संजय उवाच
गत्वा तु तावका राजन् नातिदूरमवस्थिताः ।
अपश्यन्त वनं घोरं नानाद्रुमलतावृतम् ॥ १७ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! आपके पक्षके वे तीनों वीर वहाँसे थोड़ी ही दूरपर जाकर खड़े हो गये। वहाँ उन्होंने नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे भरा हुआ एक भयंकर वन देखा ॥ १७ ॥
ते मुहूर्तं तु विश्रम्य लब्धतोयैर्हयोत्तमैः । सूर्यास्तमनवेलायां समासेदुर्महद् वनम् ॥ १८ ॥ नानामृगगणैर्जुष्टं नानापक्षिगणावृतम् । नानाद्रुमलताच्छन्नं नानाव्यालनिषेवितम् ॥ १९ ॥ उस स्थानपर थोड़ी देरतक ठहरकर उन सब लोगोंने अपने उत्तम घोड़ोंको पानी पिलाया और सूर्यास्त होते-होते वे उस विशाल वनमें जा पहुँचे, जहाँ अनेक प्रकारके मृग और भाँति-भाँतिके पक्षी निवास करते थे, तरह-तरहके वृक्षों और लताओंने उस वनको व्याप्त कर रखा था और अनेक जातिके सर्प उसका सेवन करते थे ॥ १८-१९ ॥
नानातोयैः समाकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम् । पद्मिनीशतसंछन्नं नीलोत्पलसमायुतम् ॥ २० ॥ उसमें जहाँ-तहाँ अनेक प्रकारके जलाशय थे, भाँति-भाँतिके पुष्प उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे, शत-शत रक्तकमल और असंख्य नीलकमल वहाँके जलाशयोंमें सब ओर छा रहे थे ॥ २० ॥
प्रविश्य तद् वनं घोरं वीक्षमाणाः समन्ततः । शाखासहस्रसंछन्नं न्यग्रोधं ददृशुस्ततः ॥ २१ ॥ उस भयंकर वनमें प्रवेश करके सब ओर दृष्टि डालनेपर उन्हें सहस्रों शाखाओंसे आच्छादित एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया ॥ २१ ॥
उपेत्य तु तदा राजन् न्यग्रोधं ते महारथाः । ददृशुर्द्विपदां श्रेष्ठाः श्रेष्ठं तं वै वनस्पतिम् ॥ २२ ॥ राजन्! मनुष्योंमें श्रेष्ठ उन महारथियोंने पास जाकर उस उत्तम वनस्पति (बरगद)-को देखा ॥ २२ ॥
तेऽवतीर्य रथेभ्यश्च विप्रमुच्य च वाजिनः । उपस्पृश्य यथान्यायं संध्यामन्वासत प्रभो ॥ २३ ॥ प्रभो! वहाँ रथोंसे उतरकर उन तीनोंने अपने घोड़ोंको खोल दिया और यथोचितरूपसे स्नान आदि करके संध्योपासना की ॥ २३ ॥
ततोऽस्तं पर्वतश्रेष्ठमनुप्राप्ते दिवाकरे । सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी समपद्यत ॥ २४ ॥ तदनन्तर सूर्यदेवके पर्वतश्रेष्ठ अस्ताचलपर पहुँच जानेपर धायकी भाँति सम्पूर्ण जगत्को अपनी गोदमें विश्राम देनेवाली रात्रिदेवीका सर्वत्र आधिपत्य हो गया ॥ २४ ॥
ग्रहनक्षत्रताराभिः सम्पूर्णाभिरलंकृतम् । नभोऽशुकमिवाभाति प्रेक्षणीयं समन्ततः ॥ २५ ॥ सम्पूर्ण ग्रहों, नक्षत्रों और ताराओंसे अलंकृत हुआ आकाश जरीकी साड़ीके समान सब ओरसे देखनेयोग्य प्रतीत होता था ॥ २५ ॥
इच्छया ते प्रवल्गन्ति ये सत्त्वा रात्रिचारिणः । दिवाचराश्च ये सत्त्वास्ते निद्रावशमागताः ॥ २६ ॥ रात्रिमें विचरनेवाले प्राणी अपनी इच्छाके अनुसार उछल-कूद मचाने लगे और जो दिनमें विचरनेवाले जीव-जन्तु थे, वे निद्राके अधीन हो गये ॥ २६ ॥
रात्रिंचराणां सत्त्वानां निर्घोषोऽभूत् सुदारुणः । क्रव्यादाश्च प्रमुदिता घोरा प्राप्ता च शर्वरी ॥ २७ ॥ रात्रिमें घूमने-फिरनेवाले जीवोंका अत्यन्त भयंकर शब्द प्रकट होने लगा। मांसभक्षी प्राणी प्रसन्न हो गये और वह भयंकर रात्रि सब ओर व्याप्त हो गयी ॥ २७ ॥
तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे दुःखशोकसमन्विताः । कृतवर्मा कृपो द्रौणिरुपोपविविशुः समम् ॥ २८ ॥ रात्रिका प्रथम प्रहर बीत रहा था। उस भयंकर वेलामें दुःख और शोकसे संतप्त हुए कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा एक साथ ही आस-पास बैठ गये ॥ २८ ॥
तत्रोपविष्टाः शोचन्तो न्यग्रोधस्य समीपतः । तमेवार्थमतिक्रान्तं कुरुपाण्डवयोः क्षयम् ॥ २९ ॥ निद्रया च परीताङ्गा निषेदुर्धरणीतले । श्रमेण सुदृढं युक्ता विक्षता विविधैः शरैः ॥ ३० ॥ वटवृक्षके समीप बैठकर कौरवों तथा पाण्डव-योद्धाओंके उसी विनाशकी बीती हुई बातके लिये शोक करते हुए वे तीनों वीर निद्रासे सारे अंग शिथिल हो जानेके कारण पृथ्वीपर लेट गये। उस समय वे भारी थकावटसे चूर-चूर हो रहे थे और नाना प्रकारके बाणोंसे उनके सारे अंग क्षत-विक्षत हो गये थे ॥ २९-३० ॥
ततो निद्रावशं प्राप्तौ कृपभोजौ महारथौ । सुखोचितावदुःखार्हौ निषण्णौ धरणीतले ॥ ३१ ॥ तदनन्तर कृपाचार्य और कृतवर्मा—इन दोनों महारथियोंको गाढ़ी नींद आ गयी। वे सुख भोगनेके योग्य थे, दुःख पानेके योग्य कदापि नहीं थे, तो भी धरतीपर ही सो गये थे ॥ ३१ ॥
तौ तु सुप्तौ महाराज श्रमशोकसमन्वितौ । महार्हशयनोपेतौ भूमावेव ह्यनाथवत् ॥ ३२ ॥ क्रोधामर्षवशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत । न वै स्म स जगामाथ निद्रां सर्प इव श्वसन् ॥ ३३ ॥
महाराज! बहुमूल्य शय्या एवं सुखसामग्रीसे सम्पन्न होनेपर भी उन दोनों वीरोंको परिश्रम और शोकसे पीड़ित हो अनाथकी भाँति पृथ्वीपर ही पड़ा देख द्रोणपुत्र अश्वत्थामा क्रोध और अमर्षके वशीभूत हो गया। भारत! उस समय उसे नींद नहीं आयी। वह सर्पके समान लंबी साँस खींचता रहा ॥ ३२-३३ ॥
न लेभे स तु निद्रां वै दह्यमानो हि मन्युना ।
वीक्षाञ्चक्रे महाबाहुस्तद् वनं घोरदर्शनम् ॥ ३४ ॥
क्रोधसे जलते रहनेके कारण नींद उसके पास फटकने नहीं पाती थी। उस महाबाहु वीरने भयंकर दिखायी देनेवाले उस वनकी ओर बारंबार दृष्टिपात किया ॥ ३४ ॥
वीक्षमाणो वनोद्देशं नानासत्त्वैर्निषेवितम् ।
अपश्यत महाबाहुर्न्यग्रोधं वायसैर्वृतम् ॥ ३५ ॥
नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंसे सेवित वनस्थलीका निरीक्षण करते हुए महाबाहु अश्वत्थामाने कौओंसे भरे हुए वटवृक्षपर दृष्टिपात किया ॥ ३५ ॥
तत्र काकसहस्राणि तां निशां पर्यणामयन् ।
सुखं स्वपन्ति कौरव्य पृथक् पृथगुपाश्रयाः ॥ ३६ ॥
कुरुनन्दन! उस वृक्षपर सहस्रों कौए रातमें बसेरा ले रहे थे। वे पृथक्-पृथक् घोंसलोंका आश्रय लेकर सुखकी नींद सो रहे थे ॥ ३६ ॥
सुप्तेषु तेषु काकेषु विश्रब्धेषु समन्ततः ।
सोऽपश्यत् सहसा यान्तमुलूकं घोरदर्शनम् ॥ ३७ ॥
उन कौओंके सब ओर निर्भय होकर सो जानेपर अश्वत्थामाने देखा कि सहसा एक भयानक उल्लू उधर आ निकला ॥ ३७ ॥
महास्वनं महाकायं हर्यक्षं बभ्रुपिङ्गलम् ।
सुदीर्घघोणानखरं सुपर्णमिव वेगितम् ॥ ३८ ॥
उसकी बोली बड़ी भयंकर थी। डील-डौल भी बड़ा था। आँखें काले रंगकी थीं, उसका शरीर भूरा और पिंगलवर्णका था। उसकी चोंच और पंजे बहुत बड़े थे और वह गरुड़के समान वेगशाली जान पड़ता था ॥ ३८ ॥
सोऽथ शब्दं मृदुं कृत्वा लीयमान इवाण्डजः ।
न्यग्रोधस्य ततः शाखां प्रार्थयामास भारत ॥ ३९ ॥
भरतनन्दन! वह पक्षी कोमल बोली बोलकर छिपता हुआ-सा बरगदकी उस शाखापर आनेकी इच्छा करने लगा ॥ ३९ ॥
संनिपत्य तु शाखायां न्यग्रोधस्य विहङ्गमः ।
सुप्ताञ्जघान सुबहून् वायसान् वायसान्तकः ॥ ४० ॥
कौओंके लिये कालरूपधारी उस विहंगमने वटवृक्षकी उस शाखापर बड़े वेगसे आक्रमण किया और सोये हुए बहुत-से कौओंको मार डाला ॥ ४० ॥
केषांचिदच्छिनत् पक्षान् शिरांसि च चकर्त ह ।
चरणांश्चैव केषांचिद् बभञ्ज चरणायुधः ॥ ४१ ॥
उसने अपने पंजोंसे ही अस्त्रका काम लेकर किन्हीं कौओंके पंख नोच डाले, किन्हींके सिर काट लिये और किन्हींके पैर तोड़ डाले ॥ ४१ ॥
क्षणेनाहन् स बलवान् येऽस्य दृष्टिपथे स्थिताः ।
तेषां शरीरावयवैः शरीरैश्च विशाम्पते ॥ ४२ ॥
न्यग्रोधमण्डलं सर्वं संछन्नं सर्वतोऽभवत् ।
प्रजानाथ! उस बलवान् उल्लूने, जो-जो कौए उसकी दृष्टिमें आ गये, उन सबको क्षणभरमें मार डाला। इससे वह सारा वटवृक्ष कौओंके शरीरों तथा उनके विभिन्न अवयवोंद्वारा सब ओरसे आच्छादित हो गया ॥ ४२ १/२ ॥
तांस्तु हत्वा ततः काकान् कौशिको मुदितोऽभवत् ॥ ४३ ॥
प्रतिकृत्य यथाकामं शत्रूणां शत्रुसूदनः ।
वह शत्रुओंका संहार करनेवाला उलूक उन कौओंका वध करके अपने शत्रुओंसे इच्छानुसार भरपूर बदला लेकर बहुत प्रसन्न हुआ ॥ ४३ १/२ ॥
तद् दृष्ट्वा सोपधं कर्म कौशिकेन कृतं निशि ॥ ४४ ॥
तद्भावकृतसंकल्पो द्रौणिरेकोऽन्वचिन्तयत् ।
रात्रिमें उल्लूके द्वारा किये गये उस कपटपूर्ण क्रूर कर्मको देखकर स्वयं भी वैसा ही करनेका संकल्प लेकर अश्वत्थामा अकेला ही विचार करने लगा— ॥ ४४ १/२ ॥
उपदेशः कृतोऽनेन पक्षिणा मम संयुगे ॥ ४५ ॥
शत्रूणां क्षपणे युक्तः प्राप्तः कालश्च मे मतः ।
‘इस पक्षीने युद्धमें क्या करना चाहिये, इसका उपदेश मुझे दे दिया। मैं समझता हूँ कि मेरे लिये इसी प्रकार शत्रुओंके संहार करनेका समय प्राप्त हुआ है ॥
नाद्य शक्या मया हन्तुं पाण्डवा जितकाशिनः ॥ ४६ ॥
बलवन्तः कृतोत्साहाः प्राप्तलक्ष्याः प्रहारिणः ।
‘पाण्डव इस समय विजयसे उल्लसित हो रहे हैं। वे बलवान्, उत्साही और प्रहार करनेमें कुशल हैं। उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त हो गया है। ऐसी अवस्थामें आज मैं अपनी शक्तिसे उनका वध नहीं कर सकता ॥
राज्ञः सकाशात् तेषां तु प्रतिज्ञातो वधो मया ॥ ४७ ॥
पतङ्गाग्निसमां वृत्तिमास्थायात्मविनाशिनीम् ।
न्यायतो युध्यमानस्य प्राणत्यागो न संशयः ॥ ४८ ॥
‘इधर मैंने राजा दुर्योधनके समीप पाण्डवोंके वधकी प्रतिज्ञा कर ली है। परंतु यह कार्य वैसा ही है, जैसा पतंगोंका आगमें कूद पड़ना। मैंने जिस वृत्तिका आश्रय लेकर पूर्वोक्त
प्रतिज्ञा की है, वह मेरा ही विनाश करनेवाली है। इसमें संदेह नहीं कि यदि मैं न्यायके अनुसार युद्ध करूँगा तो मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा॥ ४७-४८॥ छद्मना च भवेत् सिद्धिः शत्रूणां च क्षयो महान्। तत्र संशयितादर्थाद् योऽर्थो निःसंशयो भवेत्॥ ४९॥ तं जना बहु मन्यन्ते ये च शास्त्रविशारदाः। 'यदि छलसे काम लूँ तो अवश्य मेरे अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो सकती है। शत्रुओंका महान् संहार भी तभी सम्भव होगा। जहाँ सिद्धि मिलनेमें संदेह हो, उसकी अपेक्षा उस उपायका अवलम्बन करना उत्तम है, जिसमें संशयके लिये स्थान न हो। साधारण लोग तथा शास्त्रज्ञ पुरुष भी उसीका अधिक आदर करते हैं॥ यच्चाप्यत्र भवेद् वाच्यं गर्हितं लोकनिन्दितम्॥ ५०॥ कर्तव्यं तन्मनुष्येण क्षत्रधर्मेण वर्तता। 'इस लोकमें जिस कार्यको गर्हणीय समझा जाता हो, जिसकी सब लोग भरपेट निन्दा करते हों, वह भी क्षत्रिय-धर्मके अनुसार बर्ताव करनेवाले मनुष्यके लिये कर्तव्य माना गया है॥ ५० १/२॥ निन्दितानि च सर्वाणि कुत्सितानि पदे पदे॥ ५१॥ सोपधानि कृतान्येव पाण्डवैरकृतात्मभिः। 'अपवित्र अन्तःकरणवाले पाण्डवोंने भी तो पद-पदपर ऐसे कार्य किये हैं, जो सब-के-सब निन्दा और घृणाके योग्य रहे हैं। उनके द्वारा भी अनेक कपटपूर्ण कर्म किये ही गये हैं॥ ५१ १/२॥ अस्मिन्नर्थे पुरा गीता श्रूयन्ते धर्मचिन्तकैः॥ ५२॥ श्लोका न्यायमवेक्षद्भिस्तत्त्वार्थस्तत्त्वदर्शिभिः। 'इस विषयमें न्यायपर दृष्टि रखनेवाले धर्मचिन्तक एवं तत्त्वदर्शी पुरुषोंने प्राचीन कालमें ऐसे श्लोकोंका गान किया है, जो तात्त्विक अर्थका प्रतिपादन करनेवाले हैं। वे श्लोक इस प्रकार सुने जाते हैं—॥ ५२ १/२॥ परिश्रान्ते विदीर्णे वा भुञ्जाने वापि शत्रुभिः॥ ५३॥ प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रहर्तव्यं रिपोर्बलम्। 'शत्रुओंकी सेना यदि बहुत थक गयी हो, तितर-बितर हो गयी हो, भोजन कर रही हो, कहीं जा रही हो अथवा किसी स्थानविशेषमें प्रवेश कर रही हो तो भी विपक्षियोंको उसपर प्रहार करना ही चाहिये॥ ५३ १/२॥ निद्रार्तमर्धरात्रे च तथा नष्टप्रणायकम्॥ ५४॥ भिन्नयोधं बलं यच्च द्विधा युक्तं च यद् भवेत्।
'जो सेना आधी रातके समय नींदमें अचेत पड़ी हो, जिसका नायक नष्ट हो गया हो, जिसके योद्धाओंमें फूट हो गयी हो और जो दुविधामें पड़ गयी हो, उसपर भी शत्रुको अवश्य प्रहार करना चाहिये' ॥ ५४ १/२ ॥
इत्येवं निश्चयं चक्रे सुप्तानां निशि मारणे ॥ ५५ ॥ पाण्डूनां सह पञ्चालैर्द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । इस प्रकार विचार करके प्रतापी द्रोणपुत्रने रातको सोते समय पांचालोंसहित पाण्डवोंको मार डालनेका निश्चय किया ॥ ५५ १/२ ॥
स क्रूरां मतिमास्थाय विनिश्चित्य मुहुर्मुहुः ॥ ५६ ॥ सुप्तौ प्राबोधयत् तौ तु मातुलं भोजमेव च । क्रूरतापूर्ण बुद्धिका आश्रय ले बारंबार उपर्युक्त निश्चय करके अश्वत्थामाने सोये हुए अपने मामा कृपाचार्यको तथा भोजवंशी कृतवर्माको भी जगाया ॥
तौ प्रबुद्धौ महात्मानौ कृपभोजौ महाबलौ ॥ ५७ ॥ नोत्तरं प्रतिपद्येतां तत्र युक्तं ह्रिया वृतौ । जागनेपर महामनस्वी महाबली कृपाचार्य और कृतवर्माने जब अश्वत्थामाका निश्चय सुना, तब वे लज्जासे गड़ गये और उन्हें कोई उचित उत्तर नहीं सूझा ॥ ५७ १/२ ॥
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा बाष्पविह्वलमब्रवीत् ॥ ५८ ॥ हतो दुर्योधनो राजा एकवीरो महाबलः । यस्यार्थे वैरमस्माभिरासक्तं पाण्डवैः सह ॥ ५९ ॥ तब अश्वत्थामा दो घड़ीतक चिन्तामग्न रहकर अश्रु-गद्गद वाणीमें इस प्रकार बोला—'संसारका अद्वितीय वीर महाबली राजा दुर्योधन मारा गया, जिसके लिये हमलोगोंने पाण्डवोंके साथ वैर बाँध रखा था ॥ ५८-५९ ॥
एकाकी बहुभिः क्षुद्रैराहवे शुद्धविक्रमः । पातितो भीमसेनेन एकादशचमूपतिः ॥ ६० ॥ 'जो किसी दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंका स्वामी था, वह राजा दुर्योधन विशुद्ध पराक्रमका परिचय देता हुआ अकेला युद्ध कर रहा था; किंतु बहुत-से नीच पुरुषोंने मिलकर युद्धस्थलमें उसे भीमसेनके द्वारा धराशायी करा दिया ॥ ६० ॥
वृकोदरेण क्षुद्रेण सुनृशंसमिदं कृतम् । मूर्धाभिषिक्तस्य शिरः पादेन परिमृद्नता ॥ ६१ ॥ 'एक मूर्धाभिषिक्त सम्राट्के मस्तकपर लात मारते हुए नीच भीमसेनने यह बड़ा ही क्रूरतापूर्ण कार्य कर डाला है ॥ ६१ ॥
विनर्दन्ति च पञ्चालाः क्ष्वेलन्ति च हसन्ति च । धमन्ति शङ्खान् शतशो हृष्टा घ्नन्ति च दुन्दुभीन् ॥ ६२ ॥
‘पांचालयोद्धा हर्षमें भरकर सिंहनाद करते, हल्ला मचाते, हँसते, सैकड़ों शंख बजाते और डंके पीटते हैं ॥ वादित्रघोषस्तुमुलो विमिश्रः शङ्खनिःस्वनैः । अनिलेनेरितो घोरो दिशः पूरयतीव ह ॥ ६३ ॥ ‘शंखध्वनिसे मिला हुआ नाना प्रकारके वाद्योंका गम्भीर एवं भयंकर घोष वायुसे प्रेरित हो सम्पूर्ण दिशाओंको भरता-सा जान पड़ता है ॥ ६३ ॥ अश्वानां हेषमाणानां गजानां चैव बृंहताम् । सिंहनादश्च शूराणां श्रूयते सुमहानयम् ॥ ६४ ॥ ‘हींसते हुए घोड़ों और चिग्घाड़ते हुए हाथियोंकी आवाजके साथ शूरवीरोंका यह महान् सिंहनाद सुनायी दे रहा है ॥ ६४ ॥ दिशं प्राचीं समाश्रित्य हृष्टानां गच्छतां भृशम् । रथनेमिस्वनाश्चैव श्रूयन्ते लोमहर्षणाः ॥ ६५ ॥ ‘हर्षमें भरकर पूर्व दिशाकी ओर वेगपूर्वक जाते हुए पाण्डव-योद्धाओंके रथोंके पहियोंके ये रोमांचकारी शब्द कानोंमें पड़ रहे हैं ॥ ६५ ॥ पाण्डवैर्धार्तराष्ट्राणां यदिदं कदनं कृतम् । वयमेव त्रयः शिष्टा अस्मिन् महति वैशसे ॥ ६६ ॥ ‘हाय! पाण्डवोंने धृतराष्ट्रके पुत्रों और सैनिकोंका जो यह विनाश किया है, इस महान् संहारसे हम तीन ही बच पाये हैं ॥ ६६ ॥ केचिन्नागशतप्राणाः केचित् सर्वास्त्रकोविदाः । निहताः पाण्डवेयैस्ते मन्ये कालस्य पर्ययम् ॥ ६७ ॥ ‘कितने ही वीर सौ-सौ हाथियोंके बराबर बलशाली थे और कितने ही सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंकी संचालन-कलामें कुशल थे; किंतु पाण्डवोंने उन सबको मार गिराया। मैं इसे समयका ही फेर समझता हूँ ॥ ६७ ॥ एवमेतेन भव्यं हि नूनं कार्येण तत्त्वतः । यथा ह्यस्येदृशी निष्ठा कृतकार्येऽपि दुष्करे ॥ ६८ ॥ ‘निश्चय ही इस कार्यसे ठीक ऐसा ही परिणाम होनेवाला था। हमलोगोंके द्वारा अत्यन्त दुष्कर कार्य किया गया तो भी इस युद्धका अन्तिम फल इस रूपमें प्रकट हुआ ॥ ६८ ॥ भवतोस्तु यदि प्रज्ञा न मोहादपनीयते । व्यापन्नेऽस्मिन् महत्यर्थे यन्नः श्रेयस्तदुच्यताम् ॥ ६९ ॥ ‘यदि आप दोनोंकी बुद्धि मोहसे नष्ट न हो गयी हो तो इस महान् संकटके समय अपने बिगड़े हुए कार्यको बनानेके उद्देश्यसे हमारे लिये क्या करना श्रेष्ठ होगा? यह बताइये’ ॥ ६९ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिमन्त्रणायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2985)
द्वितीयोऽध्यायः
कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते हुए कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा देना
कृप उवाच
श्रुतं ते वचनं सर्वं यद् यदुक्तं त्वया विभो ।
ममापि तु वचः किंचिच्छृणुष्वाद्य महाभुज ॥ १ ॥
तब कृपाचार्यने कहा—शक्तिशाली महाबाहो! तुमने जो-जो बात कही है, वह सब मैंने सुन ली। अब कुछ मेरी भी बात सुनो ॥ १ ॥
आबद्धा मानुषाः सर्वे निबद्धाः कर्मणोर्द्वयोः ।
दैवे पुरुषकारे च परं ताभ्यां न विद्यते ॥ २ ॥
सभी मनुष्य प्रारब्ध और पुरुषार्थ दो प्रकारके कर्मोंसे बँधे हुए हैं। इन दोके सिवा दूसरा कुछ नहीं है ॥ २ ॥
न हि दैवेन सिध्यन्ति कार्याण्येकेन सत्तम ।
न चापि कर्मणैकेन द्वाभ्यां सिद्धस्तु योगतः ॥ ३ ॥
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामन्! केवल दैव या प्रारब्धसे अथवा अकेले पुरुषार्थसे भी कार्योंकी सिद्धि नहीं होती है। दोनोंके संयोगसे ही सिद्धि प्राप्त होती है ॥
ताभ्यामुभाभ्यां सर्वार्था निबद्धा अधमोत्तमाः ।
प्रवृत्ताश्चैव दृश्यन्ते निवृत्ताश्चैव सर्वशः ॥ ४ ॥
उन दोनोंसे ही उत्तम-अधम सभी कार्य बँधे हुए हैं। उन्हींसे प्रवृत्ति और निवृत्ति-सम्बन्धी कार्य होते देखे जाते हैं ॥ ४ ॥
पर्जन्यः पर्वते वर्षन् किन्नु साधयते फलम् ।
कृष्टे क्षेत्रे तथा वर्षन् किन्न साधयते फलम् ॥ ५ ॥
बादल पर्वतपर वर्षा करके किस फलकी सिद्धि करता है? वही यदि जोते हुए खेतमें वर्षा करे तो वह कौन-सा फल नहीं उत्पन्न कर सकता? ॥ ५ ॥
उत्थानं चाप्यदैवस्य ह्यनुत्थानं च दैवतम् ।
व्यर्थं भवति सर्वत्र पूर्वस्तत्र विनिश्चयः ॥ ६ ॥
दैवरहित पुरुषका पुरुषार्थ व्यर्थ है और पुरुषार्थशून्य दैव भी व्यर्थ हो जाता है। सर्वत्र ये दो ही पक्ष उठाये जाते हैं। इन दोनोंमें पहला पक्ष ही सिद्धान्तभूत एवं श्रेष्ठ है (अर्थात् दैवके सहयोगके बिना पुरुषार्थ नहीं काम देता है) ॥ ६ ॥
सुवृष्टे च यथा देवे सम्यक् क्षेत्रे च कर्षिते ।
बीजं महागुणं भूयात् तथा सिद्धिर्हि मानुषी ।। ७ ।।
जैसे मेघने अच्छी तरह वर्षा की हो और खेतको भी भलीभाँति जोता गया हो, तब उसमें बोया हुआ बीज अधिक लाभदायक हो सकता है। इसी प्रकार मनुष्योंकी सारी सिद्धि दैव और पुरुषार्थके सहयोगपर ही अवलम्बित है ।। ७ ।।
तयोर्दैवं विनिश्चित्य स्वयं चैव प्रवर्तते ।
प्राज्ञाः पुरुषकारेषु वर्तन्ते दाक्ष्यमाश्रिताः ।। ८ ।।
इन दोनोंमें दैव बलवान् है। वह स्वयं ही निश्चय करके पुरुषार्थकी अपेक्षा किये बिना ही फल-साधनमें प्रवृत्त हो जाता है, तथापि विद्वान् पुरुष कुशलताका आश्रय ले पुरुषार्थमें ही प्रवृत्त होते हैं ।। ८ ।।
ताभ्यां सर्वे हि कार्यार्था मनुष्याणां नरर्षभ ।
विचेष्टन्तः स्म दृश्यन्ते निवृत्तास्तु तथैव च ।। ९ ।।
नरश्रेष्ठ! मनुष्योंके प्रवृत्ति और निवृत्ति-सम्बन्धी सारे कार्य दैव और पुरुषार्थ दोनोंसे ही सिद्ध होते देखे जाते हैं ।। ९ ।।
कृतः पुरुषकारश्च सोऽपि दैवेन सिध्यति ।
तथास्य कर्मणः कर्तुरभिनिर्वर्तते फलम् ।। १० ।।
किया हुआ पुरुषार्थ भी दैवके सहयोगसे ही सफल होता है तथा दैवकी अनुकूलतासे ही कर्ताको उसके कर्मका फल प्राप्त होता है ।। १० ।।
उत्थानं च मनुष्याणां दक्षाणां दैववर्जितम् ।
अफलं दृश्यते लोके सम्यगप्युपपादितम् ।। ११ ।।
चतुर मनुष्योंद्वारा अच्छी तरह सम्पादित किया हुआ पुरुषार्थ भी यदि दैवके सहयोगसे वंचित है तो वह संसारमें निष्फल होता दिखायी देता है ।। ११ ।।
तत्रालसा मनुष्याणां ये भवन्त्यमनस्विनः ।
उत्थानं ते विगर्हन्ति प्राज्ञानां तन्न रोचते ।। १२ ।।
मनुष्योंमें जो आलसी और मनपर काबू न रखनेवाले होते हैं, वे पुरुषार्थकी निन्दा करते हैं। परंतु विद्वानोंको यह बात अच्छी नहीं लगती ।। १२ ।।
प्रायशो हि कृतं कर्म नाफलं दृश्यते भुवि ।
अकृत्वा च पुनर्दुःखं कर्म पश्येन्महाफलम् ।। १३ ।।
प्रायः किया हुआ कर्म इस भूतलपर कभी निष्फल होता नहीं देखा जाता है; परंतु कर्म न करनेसे दुःखकी प्राप्ति ही देखनेमें आती है; अतः कर्मको महान् फलदायक समझना चाहिये ।। १३ ।।
चेष्टामकुर्वँल्लभते यदि किंचिद् यदृच्छया ।
यो वा न लभते कृत्वा दुर्दर्शौ तावुभावपि ।। १४ ।।
यदि कोई पुरुषार्थ न करके दैवेच्छासे ही कुछ पा जाता है अथवा जो पुरुषार्थ करके भी कुछ नहीं पाता, इन दोनों प्रकारके मनुष्योंका मिलना बहुत कठिन है ॥ १४ ॥
शक्नोति जीवितुं दक्षो नालसः सुखमेधते ।
दृश्यन्ते जीवलोकेऽस्मिन् दक्षाः प्रायो हितैषिणः ॥ १५ ॥
पुरुषार्थमें लगा हुआ दक्ष पुरुष सुखसे जीवन-निर्वाह कर सकता है; परंतु आलसी मनुष्य कभी सुखी नहीं होता है। इस जीव-जगत्में प्रायः तत्परतापूर्वक कर्म करनेवाले ही अपना हित साधन करते देखे जाते हैं ॥ १५ ॥
यदि दक्षः समारम्भात् कर्मणो नाश्नुते फलम् ।
नास्य वाच्यं भवेत् किञ्चिल्लब्धव्यं वाधिगच्छति ॥ १६ ॥
यदि कार्य-दक्ष मनुष्य कर्मका आरम्भ करके भी उसका कोई फल नहीं पाता है तो उसके लिये उसकी कोई निन्दा नहीं की जाती अथवा वह अपने प्राप्तव्य लक्ष्यको पा ही लेता है ॥ १६ ॥
अकृत्वा कर्म यो लोके फलं विन्दति धिष्ठितः ।
स तु वक्तव्यतां याति द्वेष्यो भवति भूयशः ॥ १७ ॥
परंतु जो इस जगत्में कोई काम न करके बैठा-बैठा फल भोगता है; वह प्रायः निन्दित होता है और दूसरोंके द्वेषका पात्र बन जाता है ॥ १७ ॥
एवमेतदनादृत्य वर्तते यस्त्वतोऽन्यथा ।
स करोत्यात्मनोऽनर्थानेष बुद्धिमतां नयः ॥ १८ ॥
इस प्रकार जो पुरुष इस मतका अनादर करके इसके विपरीत बर्ताव करता है अर्थात् जो दैव और पुरुषार्थ दोनोंके सहयोगको न मानकर केवल एकके भरोसे ही बैठा रहता है, वह अपना ही अनर्थ करता है, यही बुद्धिमानोंकी नीति है ॥ १८ ॥
हीनं पुरुषकारेण यदि दैवेन वा पुनः ।
कारणाभ्यामथैताभ्यामुत्थानमफलं भवेत् ॥ १९ ॥
पुरुषार्थहीन दैव अथवा दैवहीन पुरुषार्थ—इन दो ही कारणोंसे मनुष्यका उद्योग निष्फल होता है ॥ १९ ॥
हीनं पुरुषकारेण कर्म त्विह न सिद्ध्यति ।
दैवतेभ्यो नमस्कृत्य यस्त्वर्थान् सम्यगीहते ॥ २० ॥
दक्षो दाक्षिण्यसम्पन्नो न स मोघैर्विहन्यते ।
पुरुषार्थके बिना तो यहाँ कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। जो दैवको मस्तक झुकाकर सभी कार्योंके लिये भलीभाँति चेष्टा करता है, वह दक्ष एवं उदार पुरुष असफलताओंका शिकार नहीं होता ॥ २० ½ ॥
सम्यगीहा पुनरियं यो वृद्धानुपसेवते ॥ २१ ॥
आपृच्छति च यच्छ्रेयः करोति च हितं वचः ।
यह भलीभाँति चेष्टा उसीकी मानी जाती है जो बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करता है, उनसे अपने कल्याणकी बात पूछता है और उनके बताये हुए हितकारक वचनोंका पालन करता है॥ २१ १/२ ॥ उत्थायोत्थाय हि सदा प्रष्टव्या वृद्धसम्मताः ॥ २२ ॥ ते स्म योगे परं मूलं तन्मूला सिद्धिरुच्यते । प्रतिदिन सबेरे उठ-उठकर वृद्धजनोंद्वारा सम्मानित पुरुषोंसे अपने हितकी बात पूछनी चाहिये; क्योंकि वे अप्राप्तकी प्राप्ति करानेवाले उपायके मुख्य हेतु हैं। उनका बताया हुआ वह उपाय ही सिद्धिका मूल कारण कहा जाता है ॥ २२ १/२ ॥ वृद्धानां वचनं श्रुत्वा योऽभ्युत्थानं प्रयोजयेत् ॥ २३ ॥ उत्थानस्य फलं सम्यक् तदा स लभतेऽचिरात् । जो वृद्ध पुरुषोंका वचन सुनकर उसके अनुसार कार्य आरम्भ करता है, वह उस कार्यका उत्तम फल शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है ॥ २३ १/२ ॥ रागात् क्रोधाद् भयाल्लोभाद् योऽर्थानीहति मानवः ॥ २४ ॥ अनीशश्चावमानी च स शीघ्रं भ्रश्यते श्रियः । अपने मनको वशमें न रखते हुए दूसरोंकी अवहेलना करनेवाला जो मानव राग, क्रोध, भय और लोभसे किसी कार्यकी सिद्धिके लिये चेष्टा करता है, वह बहुत जल्दी अपने ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाता है ॥ २४ १/२ ॥ सोऽयं दुर्योधनेनार्थो लुब्धेनादीर्घदर्शिना ॥ २५ ॥ असमर्थ्य समारब्धो मूढत्वादविचिन्तितः । हितबुद्धीननादृत्य सम्मन्त्र्यासाधुभिः सह ॥ २६ ॥ वार्यमाणोऽकरोद् वैरं पाण्डवैर्गुणवत्तरैः । दुर्योधन लोभी और अदूरदर्शी था। उसने मूर्खतावश न तो किसीका समर्थन प्राप्त किया और न स्वयं ही अधिक सोच-विचार किया। उसने अपना हित चाहनेवाले लोगोंका अनादर करके दुष्टोंके साथ सलाह की और सबके मना करनेपर भी अधिक गुणवान् पाण्डवोंके साथ वैर बाँध लिया ॥ २५-२६ १/२ ॥ पूर्वमप्यतिदुःशीलो न धैर्यं कर्तुमर्हति ॥ २७ ॥ तपत्यर्थे विपन्ने हि मित्राणां न कृतं वचः । पहले भी वह बड़े दुष्ट स्वभावका था। धैर्य रखना तो वह जानता ही नहीं था। उसने मित्रोंकी बात नहीं मानी; इसलिये अब काम बिगड़ जानेपर पश्चात्ताप करता है ॥ अनुवर्तामहे यत्तु तं वयं पापपूरुषम् ॥ २८ ॥ अस्मानप्यनयस्तस्मात् प्राप्तोऽयं दारुणो महान् ।
हमलोग जो उस पापीका अनुसरण करते हैं, इसीलिये हमें भी यह अत्यन्त दारुण अनर्थ प्राप्त हुआ है ॥ २८ १/२ ॥
अनेन तु ममाद्यापि व्यसनेनोपतापिता ॥ २९ ॥
बुद्धिश्चिन्तयते किंचित् स्वं श्रेयो नावबुद्ध्यते ।
इस संकटसे सर्वथा संतप्त होनेके कारण मेरी बुद्धि आज बहुत सोचने-विचारनेपर भी अपने लिये किसी हितकर कार्यका निर्णय नहीं कर पाती है ॥
मुह्यता तु मनुष्येण प्रष्टव्याः सुहृदो जनाः ॥ ३० ॥
तत्रास्य बुद्धिविनयस्तत्र श्रेयश्च पश्यति ।
जब मनुष्य मोहके वशीभूत हो हिताहितका निर्णय करनेमें असमर्थ हो जाय, तब उसे अपने सुहृदोंसे सलाह लेनी चाहिये। वहीं उसे बुद्धि और विनयकी प्राप्ति हो सकती है और वहीं उसे अपने हितका साधन भी दिखायी देता है ॥ ३० १/२ ॥
ततोऽस्य मूलं कार्याणां बुद्ध्या निश्चित्य वै बुधः ॥ ३१ ॥
तेऽत्र पृष्टा यथा ब्रूयुस्तत् कर्तव्यं तथा भवेत् ।
पूछनेपर वे विद्वान् हितैषी अपनी बुद्धिसे उसके कार्योंके मूल कारणका निश्चय करके जैसी सलाह दें, वैसा ही उसे करना चाहिये ॥ ३१ १/२ ॥
ते वयं धृतराष्ट्रं च गान्धारीं च समेत्य ह ॥ ३२ ॥
उपपृच्छामहे गत्वा विदुरं च महामतिम् ।
अतः हमलोग राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी देवी तथा परम बुद्धिमान् विदुरजीके पास चलकर पूछें ॥ ३२ १/२ ॥
ते पृष्टास्तु वदेयुर्यच्छ्रेयो नः समनन्तरम् ॥ ३३ ॥
तदस्माभिः पुनः कार्यमिति मे नैष्ठिकी मतिः ।
हमारे पूछनेपर वे लोग अब हमारे लिये जो श्रेयस्कर कार्य बतावें, वही हमें करना चाहिये; मेरी बुद्धिका तो यही दृढ़ निश्चय है ॥ ३३ १/२ ॥
अनारम्भात् तु कार्याणां नार्थः सम्पद्यते क्वचित् ॥ ३४ ॥
कृते पुरुषकारे तु येषां कार्यं न सिद्ध्यति ।
दैवेनोपहतास्ते तु नात्र कार्या विचारणा ॥ ३५ ॥
कार्यको आरम्भ न करनेसे कहीं कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है; परंतु पुरुषार्थ करनेपर भी जिनका कार्य सिद्ध नहीं होता है, वे निश्चय ही दैवके मारे हुए हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिकृपसंवादे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवादविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥