महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ॥ ३ ॥
* भोजका अर्थ है भोजवंशी कृतवर्मा।
अध्याय (पृष्ठ 2997)
चतुर्थोऽध्यायः
कृपाचार्यका कल प्रातःकाल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना
कृप उवाच
दिष्ट्या ते प्रतिकर्तव्ये मतिर्जातेयमच्युत ।
न त्वां वारयितुं शक्तो वज्रपाणिरपि स्वयम् ।। १ ।।
**कृपाचार्य बोले—**तात! तुम अपनी टेकसे टलने-वाले नहीं हो, सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे मनमें बदला लेनेका दृढ़ विचार उत्पन्न हुआ। तुम्हें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी इस कार्यसे रोक नहीं सकते ।। १ ।।
अनुयास्यावहे त्वां तु प्रभाते सहितावुभौ ।
अद्य रात्रौ विश्रमस्व विमुक्तकवचध्वजः ।। २ ।।
आज रातमें कवच और ध्वजा खोलकर विश्राम करो। कल सबेरे हम दोनों एक साथ होकर तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे ।। २ ।।
अहं त्वामनुयास्यामि कृतवर्मा च सात्वतः ।
परानभिमुखं यान्तं रथावास्थाय दंशितौ ।। ३ ।।
जब तुम शत्रुओंका सामना करनेके लिये आगे बढ़ोगे, उस समय मैं और सात्वतवंशी कृतवर्मा दोनों ही कवच धारण करके रथोंपर आरूढ़ हो तुम्हारे साथ चलेंगे ।। ३ ।।
आवाभ्यां सहितः शत्रून् श्वो निहन्ता समागमे ।
विक्रम्य रथिनां श्रेष्ठ पञ्चालान् सपदानुगान् ।। ४ ।।
रथियोंमें श्रेष्ठ वीर! कल सबेरेके संग्राममें हम दोनोंके साथ रहकर तुम अपने शत्रु पांचालों और उनके सेवकोंको बलपूर्वक मार डालना ।। ४ ।।
शक्तस्त्वमसि विक्रम्य विश्रमस्व निशामिमाम् ।
चिरं ते जाग्रतस्तात स्वप तावन्निशामिमाम् ।। ५ ।।
तात! तुम पराक्रम दिखाकर शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ हो, अतः इस रातमें विश्राम कर लो। तुम्हें जागते हुए बहुत देर हो गयी है, अब इस रातमें सो लो ।। ५ ।।
विश्रान्तश्च विनिद्रश्च स्वस्थचित्तश्च मानद ।
समेत्य समरे शत्रून् वधिष्यसि न संशयः ।। ६ ।।
मानद! थकावट दूर करके नींद पूरी कर लेनेसे तुम्हारा चित्त स्वस्थ हो जायगा। फिर तुम समरभूमिमें जाकर शत्रुओंका वध कर सकोगे, इसमें संशय नहीं है ।। ६ ।।
न हि त्वां रथिनां श्रेष्ठं प्रगृहीतवरायुधम् ।
जेतुमुत्सहते शश्वदपि देवेषु वासवः ॥ ७ ॥
तुम रथियोंमें श्रेष्ठ हो, तुमने अपने हाथमें उत्तम आयुध ले रखा है। तुम्हें देवताओंके राजा इन्द्र भी कभी जीतनेका साहस नहीं कर सकते हैं ॥ ७ ॥
कृपेण सहितं यान्तं गुप्तं च कृतवर्मणा ।
को द्रौणिं युधि संरब्धं योधयेदपि देवराट् ॥ ८ ॥
जब कृतवर्मासे सुरक्षित हो द्रोणपुत्र अश्वत्थामा मुझ कृपाचार्यके साथ कुपित होकर युद्धके लिये प्रस्थान करेगा, उस समय कौन वीर, वह देवराज इन्द्र ही क्यों न हो, उसका सामना कर सकता है? ॥ ८ ॥
ते वयं निशि विश्रान्ता विनिद्रा विगतज्वराः ।
प्रभातायां रजन्यां वै निहनिष्याम शात्रवान् ॥ ९ ॥
अतः हमलोग रातमें विश्राम करके निद्रारहित और विगतज्वर हो प्रातःकाल अपने शत्रुओंका संहार करेंगे ॥ ९ ॥
तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि मम चैव न संशयः ।
सात्वतोऽपि महेष्वासो नित्यं युद्धेषु कोविदः ॥ १० ॥
इसमें संशय नहीं कि तुम्हारे और मेरे पास भी दिव्यास्त्र हैं तथा महाधनुर्धर कृतवर्मा भी युद्ध करनेकी कलामें सदा ही कुशल हैं ॥ १० ॥
ते वयं सहितास्तात सर्वान् शत्रून् समागतान् ।
प्रसह्य समरे हत्वा प्रीतिं प्राप्स्याम पुष्कलाम् ॥ ११ ॥
तात! हम सब लोग एक साथ होकर समरांगणमें सामने आये हुए समस्त शत्रुओंका संहार करके अत्यन्त हर्षका अनुभव करेंगे ॥ ११ ॥
विश्रमस्व त्वमव्यग्रः स्वप चेमां निशां सुखम् ।
अहं च कृतवर्मा च त्वां प्रयान्तं नरोत्तमम् ॥ १२ ॥
अनुयास्याव सहितौ धन्विनौ परतापनौ ।
रथिनं त्वरया यान्तं रथमास्थाय दंशितौ ॥ १३ ॥
तुम व्यग्रता छोड़कर विश्राम करो और इस रातमें सुखपूर्वक सो लो। कल सबेरे युद्धके लिये प्रस्थान करते समय तुम-जैसे नरश्रेष्ठ वीरके पीछे शत्रुओंको संताप देनेवाले हम और कृतवर्मा धनुष लेकर एक साथ चलेंगे। बड़ी उतावलीके साथ आगे बढ़ते हुए रथी अश्वत्थामाके साथ हम दोनों भी कवच धारण करके रथपर आरूढ़ हो यात्रा करेंगे ॥ १२-१३ ॥
स गत्वा शिविरं तेषां नाम विश्राव्य चाहवे ।
ततः कर्तासि शत्रूणां युध्यतां कदनं महत् ॥ १४ ॥
उस अवस्था में शत्रुओंके शिविरमें जाकर युद्धके लिये अपने नामकी घोषणा करके सामने आकर जूझते हुए उन शत्रुओंका बड़ा भारी संहार मचा देना ॥ १४ ॥
कृत्वा च कदनं तेषां प्रभाते विमलेऽहनि ।
विहरस्व यथा शक्रः सूदयित्वा महासुरान् ॥ १५ ॥
जैसे इन्द्र बड़े-बड़े असुरोंका विनाश करके सुखपूर्वक विचरते हैं, उसी प्रकार तुम भी कल प्रातःकाल निर्मल दिन निकल आनेपर उन शत्रुओंका विनाश करके इच्छानुसार विहार करो ॥ १५ ॥
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं पञ्चालानां वरूथिनीम् ।
दैत्यसेनाभिव क्रुद्धः सर्वदानवसूदनः ॥ १६ ॥
जैसे सम्पूर्ण दानवोंका संहार करनेवाले इन्द्र कुपित होनेपर दैत्योंकी सेनाको जीत लेते हैं, उसी प्रकार तुम भी रणभूमिमें पांचालोंकी विशाल वाहिनीपर विजय पानेमें समर्थ हो ॥ १६ ॥
मया त्वां सहितं संख्ये गुप्तं च कृतवर्मणा ।
न सहेत विभुः साक्षाद् वज्रपाणिरपि स्वयंम् ॥ १७ ॥
युद्धस्थलमें जब तुम मेरे साथ खड़े होओगे और कृतवर्मा तुम्हारी रक्षामें लगे होंगे, उस समय हाथमें वज्र लिये हुए साक्षात् देवसम्राट् इन्द्र भी तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे ॥ १७ ॥
न चाहं समरे तात कृतवर्मा न चैव हि ।
अनििर्जित्य रणे पाण्डून् न च यास्यामि कर्हिचित् ॥ १८ ॥
तात! समरांगणमें मैं और कृतवर्मा पाण्डवोंको परास्त किये बिना कभी पीछे नहीं हटेंगे ॥ १८ ॥
हत्वा च समरे क्रुद्धान् पञ्चालान् पाण्डुभिः सह ।
निवर्तिष्यामहे सर्वे हता वा स्वर्गगा वयम् ॥ १९ ॥
समरांगणमें कुपित हुए पांचालोंको पाण्डवोंसहित मारकर ही हम सब लोग पीछे हटेंगे अथवा स्वयं ही मारे जाकर स्वर्गलोककी राह लेंगे ॥ १९ ॥
सर्वोपायैः सहायास्ते प्रभाते वयमाहवे ।
सत्यमेतन्महाबाहो प्रब्रवीमि तवानघ ॥ २० ॥
निष्पाप महाबाहु वीर! कल प्रातःकाल हमलोग सभी उपायोंसे युद्धमें तुम्हारे सहायक होंगे। मैं तुमसे यह सच्ची बात कह रहा हूँ ॥ २० ॥
एवमुक्तस्ततो द्रौणिर्मातुलेन हितं वचः ।
अब्रवीन्मातुलं राजन् क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २१ ॥
राजन्! मामाके इस प्रकार हितकारक वचन कहनेपर द्रोणकुमार अश्वत्थामाने क्रोधसे लाल आँखें करके उनसे कहा— ॥ २१ ॥
आतुरस्य कुतो निद्रा नरस्यामर्षितस्य च ।
अर्थांश्चिन्तयतश्चापि कामयानस्य वा पुनः । तदिदं समनुप्राप्तं पश्य मेऽद्य चतुष्टयम् ॥ २२ ॥ 'मामाजी! जो मनुष्य शोकसे आतुर हो, अमर्षसे भरा हुआ हो, नाना प्रकारके कार्योंकी चिन्ता कर रहा हो अथवा किसी कामनामें आसक्त हो, उसे नींद कैसे आ सकती है? देखिये, ये चारों बातें आज मेरे ऊपर एक साथ आ पड़ी हैं ॥ २२ ॥ यस्य भागश्चतुर्थो मे स्वप्नमह्नाय नाशयेत् । किं नाम दुःखं लोकेऽस्मिन् पितुर्वधमनुस्मरन् ॥ २३ ॥ हृदयं निर्दहन्मेऽद्य रात्र्यहानि न शाम्यति । 'इन चारोंका एक चौथाई भाग जो क्रोध है, वही मेरी निद्राको तत्काल नष्ट किये देता है। अपने पिताके वधकी घटनाका बारंबार स्मरण करके इस संसारमें कौन-सा ऐसा दुःख है, जिसका मुझे अनुभव न होता हो। वह दुःखकी आग रात-दिन मेरे हृदयको जलाती हुई अबतक बुझ नहीं पा रही है ॥ २३ १/२ ॥ यथा च निहतः पापैः पिता मम विशेषतः ॥ २४ ॥ प्रत्यक्षमपि ते सर्वं तन्मे मर्माणि कृन्तति । कथं हि मादृशो लोके मुहूर्तपि जीवति ॥ २५ ॥ 'इन पापियोंने विशेषतः मेरे पिताजीको जिस प्रकार मारा था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा है। वह घटना मेरे मर्मस्थानोंको छेदे डालती है। ऐसी अवस्थामें मेरे-जैसा वीर इस जगत्में दो घड़ी भी कैसे जीवित रह सकता है? ॥ २४-२५ ॥ द्रोणो हतेति यद् वाचः पञ्चालानां शृणोम्यहम् । धृष्टद्युम्नमहत्वा तु नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २६ ॥ 'द्रोणाचार्य धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये' यह बात जब मैं पांचालोंके मुखसे सुनता आ रहा हूँ, तब धृष्टद्युम्नका वध किये बिना जीवित नहीं रह सकता ॥ स मे पितुर्वधाद् वध्यः पञ्चाला ये च संगताः । विलापो भग्नसक्थस्य यस्तु राज्ञो मया श्रुतः ॥ २७ ॥ स पुनर्हृदयं कस्य क्रूरस्यापि न निर्दहेत् । 'धृष्टद्युम्न तो पिताजीका वध करनेके कारण मेरा वध्य होगा और उसके संगी-साथी जो पांचाल हैं, वे भी उसका साथ देनेके कारण मारे जायँगे। इधर जिसकी जाँघें तोड़ डाली गयी हैं, उस राजा दुर्योधनका जो विलाप मैंने अपने कानों सुना है, वह किस क्रूर मनुष्यके भी हृदयको शोक-दग्ध नहीं कर देगा? ॥ २७ १/२ ॥ कस्य ह्यकरुणस्यापि नेत्राभ्यामश्रु नाव्रजेत् ॥ २८ ॥ नृपतेर्भग्नसक्थस्य श्रुत्वा तादृग् वचः पुनः । 'टूटी जाँघवाले राजा दुर्योधनकी वैसी बात पुनः सुनकर किस निष्ठुरके भी नेत्रोंसे आँसू नहीं बह चलेगा? ॥ २८ १/२ ॥
यश्चायं मित्रपक्षो मे मयि जीवति निर्जितः ।। २९ ।। शोकं मे वर्धयत्येष वारिवेग इवार्णवम्। एकाग्रमनसो मेऽद्य कुतो निद्रा कुतः सुखम् ।। ३० ।। ‘मेरे जीते-जी जो यह मेरा मित्र-पक्ष परास्त हो गया, वह मेरे शोककी उसी प्रकार वृद्धि कर रहा है, जैसे जलका वेग समुद्रको बढ़ा देता है। आज मेरा मन एक ही कार्यकी ओर लगा हुआ है, फिर मुझे नींद कैसे आ सकती है और मुझे सुख भी कैसे मिल सकता है? ।।
वासुदेवार्जुनाभ्यां च तानहं परिरक्षितान् । अविषह्यतमान् मन्ये महेन्द्रेणापि सत्तम् ।। ३१ ।। ‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मामाजी! पाण्डव और पांचाल जब श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सुरक्षित हों, उस दशामें मैं उन्हें देवराज इन्द्रके लिये भी अत्यन्त असह्य एवं अजेय मानता हूँ ।।
न चापि शक्तः संयन्तुं कोपमेतं समुत्थितम् । तं न पश्यामि लोकेऽस्मिन् यो मां कोपान्निवर्तयेत् ।। ३२ ।। ‘इस समय जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, इसे मैं स्वयं भी रोक नहीं सकता। इस संसारमें किसी भी ऐसे पुरुषको नहीं देख रहा हूँ, जो मुझे क्रोधसे दूर हटा दे ।।
तथैव निश्चिता बुद्धिरेषा साधु मता मम । वार्तिकैः कथ्यमानस्तु मित्राणां मे पराभवः ।। ३३ ।। पाण्डवानां च विजयो हृदयं दहतीव मे । ‘इसी प्रकार मैंने जो अपनी बुद्धिमें शत्रुओंके संहारका यह दृढ़ निश्चय कर लिया है, यही मुझे अच्छा प्रतीत होता है। जब संदेशवाहक दूत मेरे मित्रोंकी पराजय और पाण्डवोंकी विजयका समाचार कहने लगते हैं, तब वह मेरे हृदयको दग्ध-सा कर देता है ।।
अहं तु कदनं कृत्वा शत्रूणामद्य सौप्तिके । ततो विश्रमिता चैव स्वप्ता च विगतज्वरः ।। ३४ ।। ‘मैं तो आज सोते समय शत्रुओंका संहार करके निश्चिन्त होनेपर ही विश्राम करूँगा और नींद लूँगा' ।।
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिमन्त्रणायां चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।। इस प्रकार महाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ।। ४ ।।
अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवाद तथा तीनोंका पाण्डवोंके शिविरकी ओर प्रस्थान
पञ्चमोऽध्यायः
अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवाद तथा तीनोंका पाण्डवोंके शिविरकी ओर प्रस्थान
कृप उवाच
शुश्रूषुरपि दुर्मेधाः पुरुषोऽनियतेन्द्रियः ।
नालं वेदयितुं कृत्स्नौ धर्मार्थाविति मे मतिः ॥ १ ॥
**कृपाचार्य बोले—**अश्वत्थामन्! मेरा विचार है कि जिस मनुष्यकी बुद्धि दुर्भावनासे युक्त है तथा जिसने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें नहीं रखा है, वह धर्म और अर्थकी बातोंको सुननेकी इच्छा रखनेपर भी उन्हें पूर्णरूपसे समझ नहीं सकता ॥ १ ॥
तथैव तावन्मेधावी विनयं यो न शिक्षते ।
न च किंचन जानाति सोऽपि धर्मार्थनिश्चयम् ॥ २ ॥
इसी प्रकार मेधावी होनेपर भी जो मनुष्य विनय नहीं सीखता, वह भी धर्म और अर्थके निर्णयको थोड़ा भी नहीं समझ पाता है ॥ २ ॥
चिरं ह्यपि जडः शूरः पण्डितं पर्युपास्य हि ।
न स धर्मान् विजानाति दर्वी सूपरसानिव ॥ ३ ॥
जिसकी बुद्धिपर जडता छा रही हो, वह शूरवीर योद्धा दीर्घकालतक विद्वान्की सेवामें रहनेपर भी धर्मोंका रहस्य नहीं जान पाता। ठीक उसी तरह जैसे करछुल दालमें डूबी रहनेपर भी उसके स्वादको नहीं जानती है ॥ ३ ॥
मुहूर्तमपि तं प्राज्ञः पण्डितं पर्युपास्य हि ।
क्षिप्रं धर्मान् विजानाति जिह्वा सूपरसानिव ॥ ४ ॥
जैसे जिह्वा दालके स्वादको जानती है, उसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष यदि दो घड़ी भी विवेकशीलकी सेवामें रहे तो वह शीघ्र ही धर्मोंका रहस्य जान लेता है ॥ ४ ॥
शुश्रूषुस्त्वेव मेधावी पुरुषो नियतेन्द्रियः ।
जानीयादागमान् सर्वान् ग्राह्यं च न विरोधयेत् ॥ ५ ॥
अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला मेधावी पुरुष यदि विद्वानोंकी सेवामें रहे और उनसे कुछ सुननेकी इच्छा रखे तो वह सम्पूर्ण शास्त्रोंको समझ लेता है तथा ग्रहण करनेयोग्य वस्तुका विरोध नहीं करता ॥ ५ ॥
अनेयस्त्ववमानी यो दुरात्मा पापपूरुषः ।
दिष्टमुत्सृज्य कल्याणं करोति बहुपापकम् ॥ ६ ॥
परंतु जिसे सन्मार्गपर नहीं ले जाया जा सकता, जो दूसरोंकी अवहेलना करनेवाला है तथा जिसका अन्तःकरण दूषित है, यह पापात्मा पुरुष बताये हुए कल्याणकारी पथको छोड़कर बहुत-से पापकर्म करने लगता है ॥ ६ ॥
नाथवन्तं तु सुहृदः प्रतिषेधन्ति पातकात् ।
निवर्तते तु लक्ष्मीवान् नालक्ष्मीवान् निवर्तते ॥ ७ ॥
जो सनाथ है, उसे उसके हितैषी सुहृद् पापकर्मोंसे रोकते हैं, जो भाग्यवान् है—जिसके भाग्यमें सुख भोगना बदा है, वह मना करनेपर उस पापकर्मसे रुक जाता है; परंतु जो भाग्यहीन है, वह उस दुष्कर्मसे नहीं निवृत्त होता है ॥ ७ ॥
यथा ह्युच्चावचैर्वाक्यैः क्षिप्तचित्तो नियम्यते ।
तथैव सुहृदा शक्यो न शक्यस्त्ववसीदति ॥ ८ ॥
जैसे मनुष्य विक्षिप्त चित्तवाले पागलको नाना प्रकारके ऊँच-नीच वचनोंद्वारा समझा-बुझाकर या डरा-धमकाकर काबूमें लाते हैं, उसी प्रकार सुहृद्गण भी अपने स्वजनको समझा-बुझाकर और डाँट-डपटकर वशमें रखनेकी चेष्टा करते हैं। जो वशमें आ जाता है, वह तो सुखी होता है और जो किसी तरह काबूमें नहीं आ सकता, वह दुःख भोगता है ॥ ८ ॥
तथैव सुहृदं प्राज्ञं कुर्वाणं कर्म पापकम् ।
प्राज्ञाः सम्प्रतिषेधन्ति यथाशक्ति पुनः पुनः ॥ ९ ॥
इसी तरह विद्वान् पुरुष पापकर्ममें प्रवृत्त होनेवाले अपने बुद्धिमान् सुहृद्को भी यथाशक्ति बारंबार मना करते हैं ॥ ९ ॥
स कल्याणे मनः कृत्वा नियम्यात्मानमात्मना ।
कुरु मे वचनं तात येन पश्चान्न तप्स्यसे ॥ १० ॥
तात! तुम भी स्वयं ही अपने मनको काबूमें करके उसे कल्याणसाधनमें लगाकर मेरी बात मानो, जिससे तुम्हें पश्चात्ताप न करना पड़े ॥ १० ॥
न वधः पूज्यते लोके सुप्तानामिह धर्मतः ।
तथैवापास्तशस्त्राणां विमुक्तरथवाजिनाम् ॥ ११ ॥
ये च ब्रूयुस्तवास्मीति ये च स्युः शरणागताः ।
विमुक्तमूर्धजा ये च ये चापि हतवाहनाः ॥ १२ ॥
जो सोये हुए हों, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये हों, रथ और घोड़े खोल दिये हों, 'जो मैं आपका ही हूँ' ऐसा कह रहे हों, जो शरणमें आ गये हों, जिनके बाल खुले हुए हों तथा जिनके वाहन नष्ट हो गये हों, इस लोकमें ऐसे लोगोंका वध करना धर्मकी दृष्टिसे अच्छा नहीं समझा जाता ॥ ११-१२ ॥
अद्य स्वप्स्यन्ति पञ्चाला विमुक्तकवचा विभो ।
विश्वस्ता रजनीं सर्वे प्रेता इव विचेतसः ॥ १३ ॥
यस्तेषां तदवस्थानां द्रुह्येत पुरुषोऽनृजुः । व्यक्तं स नरके मज्जेदगाधे विपुलेऽप्लवे ॥ १४ ॥ प्रभो! आज रातमें समस्त पांचाल कवच उतारकर निश्चिन्त हो मुर्दोंके समान अचेत सो रहे होंगे। उस अवस्थामें जो क्रूर मनुष्य उनके साथ द्रोह करेगा, वह निश्चय ही नौकारहित अगाध एवं विशाल नरकके समुद्रमें डूब जायगा ॥ १३-१४ ॥ सर्वास्त्रविदुषां लोके श्रेष्ठस्त्वमसि विश्रुतः । न च ते जातु लोकेऽस्मिन् सुसूक्ष्ममपि किल्बिषम् ॥ १५ ॥ संसारके सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें तुम श्रेष्ठ हो। तुम्हारी सर्वत्र ख्याति है। इस जगत्में अबतक कभी तुम्हारा छोटे-से-छोटा दोष भी देखनेमें नहीं आया है ॥ त्वं पुनः सूर्यसंकाशः श्वोभूत उदिते रवौ । प्रकाशे सर्वभूतानां विजेता युधि शात्रवान् ॥ १६ ॥ कल सबेरे सूर्योदय होनेपर तुम सूर्यके समान प्रकाशित हो उजालेमें युद्ध छेड़कर समस्त प्राणियोंके सामने पुनः शत्रुओंपर विजय प्राप्त करना ॥ १६ ॥ असम्भावितरूपं हि त्वयि कर्म विगर्हितम् । शुक्ले रक्तमिव न्यस्तं भवेदिति मतिर्मम ॥ १७ ॥ जैसे सफेद वस्त्रमें लाल रंगका धब्बा लग जाय, उस प्रकार तुममें निन्दित कर्मका होना सम्भावनासे परेकी बात है, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १७ ॥
अश्वत्थामोवाच
एवमेव यथाऽऽत्थ त्वं मातुलेह न संशयः । तैस्तु पूर्वमयं सेतुः शतधा विदलीकृतः ॥ १८ ॥ अश्वत्थामा बोला—मामाजी! आप जैसा कहते हैं, निःसंदेह वही ठीक है; परंतु पाण्डवोंने ही पहले इस धर्म-मर्यादाके सैकड़ों टुकड़े कर डाले हैं ॥ १८ ॥ प्रत्यक्षं भूमिपालानां भवतां चापि संनिधौ । न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥ १९ ॥ धृष्टद्युम्नने समस्त राजाओंके सामने और आपलोगोंके निकट ही मेरे उस पिताको मार गिराया, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये थे ॥ १९ ॥ कर्णश्च पतिते चक्रे रथस्य रथिनां वरः । उत्तमे व्यसने मग्नो हतो गाण्डीवधन्वना ॥ २० ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णको भी गाण्डीवधारी अर्जुनने उस अवस्थामें मारा था, जब कि उनके रथका पहिया गड्ढेमें गिरकर फँस गया था और इसीलिये वे भारी संकटमें पड़े हुए थे ॥ २० ॥ तथा शान्तनवो भीष्मो न्यस्तशस्त्रो निरायुधः ।
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य हतो गाण्डीवधन्वना ॥ २१ ॥ इसी प्रकार शान्तनुनन्दन भीष्म जब हथियार डालकर अस्त्रहीन हो गये, उस अवस्थामें शिखण्डीको आगे करके गाण्डीवधारी धनंजयने उनका वध किया था ॥ २१ ॥ भूरिश्रवा महेष्वासस्तथा प्रायगतो रणे । क्रोशतां भूमिपालानां युयुधानेन पातितः ॥ २२ ॥ महाधनुर्धर भूरिश्रवा तो रणभूमिमें अनशन व्रत लेकर बैठ गये थे। उस अवस्थामें समस्त भूमिपाल चिल्ला-चिल्लाकर रोकते ही रह गये; परंतु सात्यकिने उन्हें मार गिराया ॥ २२ ॥ दुर्योधनश्च भीमेन समेत्य गदया रणे । पश्यतां भूमिपालानामधर्मेण निपातितः ॥ २३ ॥ भीमसेनने भी सम्पूर्ण राजाओंके देखते-देखते रणभूमिमें गदायुद्ध करते समय दुर्योधनको अधर्मपूर्वक गिराया था ॥ २३ ॥ एकाकी बहुभिस्तत्र परिवार्य महारथैः । अधर्मेण नरव्याघ्रो भीमसेनेन पातितः ॥ २४ ॥ नरश्रेष्ठ राजा दुर्योधन अकेला था और बहुत-से महारथियोंने उसे वहाँ घेर रखा था, उस दशामें भीमसेनने उसको धराशायी किया है ॥ २४ ॥ विलापो भग्नसक्थस्य यो मे राज्ञः परिश्रुतः । वार्तिकानां कथयतां स मे मर्माणि कृन्तति ॥ २५ ॥ टूटी जाँघोंवाले राजा दुर्योधनका जो विलाप मैंने सुना है और संदेशवाहक दूतोंके मुखसे जो समाचार मुझे ज्ञात हुआ है, वह सब मेरे मर्मस्थानोंको विदीर्ण किये देता है ॥ २५ ॥ एवं चाधार्मिकाः पापाः पञ्चाला भिन्नसेतवः । तानेवं भिन्नमर्यादान् किं भवान् न निगर्हति ॥ २६ ॥ इस प्रकार वे सब-के-सब पापी और अधार्मिक हैं। पांचालोंने भी धर्मकी मर्यादा तोड़ डाली है। इस तरह मर्यादा भंग करनेवाले उन पाण्डवों और पांचालोंकी आप निन्दा क्यों नहीं करते हैं? ॥ २६ ॥ पितृहन्तॄनहं हत्वा पञ्चालान् निशि सौप्तिके । कामं कीटः पतङ्गो वा जन्म प्राप्य भवामि वै ॥ २७ ॥ पिताकी हत्या करनेवाले पांचालोंका रातको सोते समय वध करके मैं भले ही दूसरे जन्ममें कीट या पतंग हो जाऊँ, सब कुछ स्वीकार है ॥ २७ ॥ त्वरे चाहमनेनाद्य यदिदं मे चिकीर्षितम् । तस्य मे त्वरमाणस्य कुतो निद्रा कुतः सुखम् ॥ २८ ॥
इस समय मैं जो कुछ करना चाहता हूँ, उसीको पूर्ण करनेके उद्देश्यसे उतावला हो रहा हूँ। इतनी उतावलीमें रहते हुए मुझे नींद कहाँ और सुख कहाँ? ।।
न स जातः पुमाँल्लोके कश्चिन्न स भविष्यति ।
यो मे व्यावर्तयेदेतां वधे तेषां कृतां मतिम् ॥ २९ ॥
इस संसारमें ऐसा कोई पुरुष न तो पैदा हुआ है और न होगा ही, जो उन पांचालोंके वधके लिये किये गये मेरे इस दृढ़ निश्चयको पलट दे ।। २९ ।।
संजय उवाच
एवमुक्त्वा महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
एकान्ते योजयित्वाश्वान् प्रायादभिमुखः परान् ॥ ३० ॥
संजय कहते हैं— महाराज! ऐसा कहकर प्रतापी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा एकान्तमें घोड़ोंको जोतकर शत्रुओंकी ओर चल दिया ।। ३० ।।
तमब्रूतां महात्मानौ भोजशारद्वतावुभौ ।
किमर्थं स्यन्दनो युक्तः किञ्च कार्यं चिकीर्षितम् ॥ ३१ ॥
उस समय भोजवंशी कृतवर्मा और शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य दोनों महामनस्वी वीरोंने उससे कहा— 'अश्वत्थामन्! तुमने किसलिये रथको जोता है? तुम इस समय कौन-सा कार्य करना चाहते हो? ।। ३१ ।।
एकसार्थप्रयातौ स्वस्त्वया सह नरर्षभ ।
समदुःखसुखौ चापि नावां शङ्कितुमर्हसि ॥ ३२ ॥
'नरश्रेष्ठ! हम दोनों एक साथ तुम्हारी सहायताके लिये चले हैं। तुम्हारे दुःख-सुखमें हमारा समान भाग होगा, तुम्हें हम दोनोंपर संदेह नहीं करना चाहिये' ।।
अश्वत्थामा तु संक्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् ।
ताभ्यां तथ्यं तथाऽऽचख्यौ यदस्यात्मचिकीर्षितम् ॥ ३३ ॥
उस समय अश्वत्थामा पिताके वधका स्मरण करके रोषसे आगबबूला हो रहा था। उसके मनमें जो कुछ करनेकी इच्छा थी, वह सब उसने उन दोनोंसे ठीक-ठीक कह सुनाया ।। ३३ ।।
हत्वा शतसहस्राणि योधानां निशितैः शरैः ।
न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥ ३४ ॥
वह बोला— 'मेरे पिता अपने तीखे बाणोंसे लाखों योद्धाओंका वध करके जब अस्त्र-शस्त्र नीचे डाल चुके थे, उस अवस्थामें धृष्टद्युम्नने उन्हें मारा है ।। ३४ ।।
तं तथैव हनिष्यामि न्यस्तधर्माणमद्य वै ।
पुत्रं पाञ्चालराजस्य पापं पापेन कर्मणा ॥ ३५ ॥
'अतः धर्मका परित्याग करनेवाले उस पापी पांचालराजकुमारको भी मैं उसी प्रकार पापकर्मद्वारा ही मार डालूँगा ।। ३५ ।। कथं च निहतः पापः पाञ्चाल्यः पशुवन्मया । शस्त्रेण विजिताँल्लोकान् नाप्नुयादिति मे मतिः ।। ३६ ।। 'मेरा ऐसा निश्चय है कि मेरे हाथसे पशुकी भाँति मारे गये पापी पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नको किसी तरह भी अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा मिलनेवाले पुण्यलोकोंकी प्राप्ति न हो!! ।। ३६ ।। क्षिप्रं संनद्धकवचौ सखड्गावात्तकार्मुकौ । मामास्थाय प्रतीक्षेतां रथवर्यौ परंतपौ ।। ३७ ।। 'आप दोनों रथियोंमें श्रेष्ठ और शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर हैं। शीघ्र ही कवच बाँधकर खड्ग और धनुष लेकर रथपर बैठ जाइये तथा मेरी प्रतीक्षा कीजिये' ।। ३७ ।। इत्युक्त्वा रथमास्थाय प्रायादभिमुखः परान् । तमन्वगात् कृपो राजन् कृतवर्मा च सात्वतः ।। ३८ ।। राजन्! ऐसा कहकर अश्वत्थामा रथपर आरूढ़ हो शत्रुओंकी ओर चल दिया। कृपाचार्य और सात्वतवंशी कृतवर्मा भी उसीके मार्गका अनुसरण करने लगे ।। ३८ ।। ते प्रयाता व्यरोचन्त परानभिमुखास्तयः । हूयमाना यथा यज्ञे समिद्धा हव्यवाहनाः ।। ३९ ।। शत्रुओंकी ओर जाते समय वे तीनों तेजस्वी वीर यज्ञमें आहुति पाकर प्रज्वलित हुए तीन अग्नियोंकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे ।। ३९ ।। ययुश्च शिविरं तेषां सम्प्रसुप्तजनं विभो । द्वारदेशं तु सम्प्राप्य द्रौणिस्तस्थौ महारथः ।। ४० ।। प्रभो! वे तीनों पाण्डवों और पांचालोंके उस शिविरके पास गये, जहाँ सब लोग सो गये थे। शिविरके द्वारपर पहुँचकर महारथी अश्वत्थामा खड़ा हो गया ।। ४० ।।
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिगमने पञ्चमोऽध्यायः ।। ५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाका प्रयाणविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।
अध्याय (पृष्ठ 3008)
षष्ठोऽध्यायः
अश्वत्थामाका शिविर-द्वारपर एक अद्भुत पुरुषको देखकर उसपर अस्त्रोंका प्रहार करना और अस्त्रोंके अभावमें चिन्तित हो भगवान् शिवकी शरणमें जाना
धृतराष्ट्र उवाच
द्वारदेशे ततो द्रौणिमवस्थितमवेक्ष्य तौ ।
अकुर्वातां भोजकृपौ किं संजय वदस्व मे ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! अश्वत्थामाको शिविरके द्वारपर खड़ा देख कृतवर्मा और कृपाचार्यने क्या किया? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥
संजय उवाच
कृतवर्माणमामन्त्र्य कृपं च स महारथः ।
द्रौणिर्मन्युपरीतात्मा शिबिरद्वारमागमत् ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! कृतवर्मा और कृपाचार्यको आमन्त्रित करके महारथी अश्वत्थामा क्रोधपूर्ण हृदयसे शिविरके द्वारपर आया ॥ २ ॥
तत्र भूतं महाकायं चन्द्रार्कसदृशद्युतिम् ।
सोऽपश्यद् द्वारमाश्रित्य तिष्ठन्तं लोमहर्षणम् ॥ ३ ॥
वसानं चर्म वैयाघ्रं महारुधिरविस्रवम् ।
कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥ ४ ॥
बाहुभिः स्वायतैः पीनैर्नानाप्रहरणोद्यतैः ।
बद्धाङ्गदमहासर्पं ज्वालामालाकुलाननम् ॥ ५ ॥
दंष्ट्राकरालवदनं व्यादितास्यं भयानकम् ।
नयनानां सहस्रैश्च विचित्रैरभिभूषितम् ॥ ६ ॥
वहाँ उसने चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी एक विशालकाय अद्भुत प्राणीको देखा, जो द्वार रोककर खड़ा था, उसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे। उस महापुरुषने व्याघ्रका ऐसा चर्म धारण कर रखा था, जिससे बहुत अधिक रक्त चू रहा था, वह काले मृगचर्मकी चादर ओढ़े और सर्पोंका यज्ञोपवीत पहने हुए था। उसकी विशाल और मोटी भुजाएँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये प्रहार करनेको उद्यत जान पड़ती थीं। उनमें बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प बँधे हुए थे तथा उसका मुख आगकी लपटोंसे व्याप्त दिखायी देता था। उसने मुँह फैला रखा था, जो दाढ़ोंके कारण विकराल जान पड़ता था। वह भयानक पुरुष सहस्रों विचित्र नेत्रोंसे सुशोभित था ॥ ३—६ ॥
नैव तस्य वपुः शक्यं प्रवक्तुं वेष एव च ।
सर्वथा तु तदालक्ष्य स्फुटेयुरपि पर्वताः ॥ ७ ॥
उसके शरीर और वेषका वर्णन नहीं किया जा सकता। सर्वथा उसे देख लेनेपर पर्वत भी भयके मारे विदीर्ण हो सकते थे ॥ ७ ॥
तस्यास्यान्नासिकाभ्यां च श्रवणाभ्यां च सर्वशः ।
तेभ्यश्चाक्षिसहस्रेभ्यः प्रादुरासन् महार्चिषः ॥ ८ ॥
उसके मुखसे, दोनों नासिकाओंसे, कानोंसे और हजारों नेत्रोंसे भी सब ओर आगकी बड़ी-बड़ी लपटें निकल रही थीं ॥ ८ ॥
तथा तेजोमरीचिभ्यः शङ्खचक्रगदाधराः ।
प्रादुरासन् हृषीकेशाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ९ ॥
उसके तेजकी किरणोंसे शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले सैकड़ों, हजारों विष्णु प्रकट हो रहे थे ॥ ९ ॥
तदत्यद्भुतमालोक्य भूतं लोकभयंकरम् ।
द्रौणिरव्यथितो दिव्यैरस्त्रवर्षैरवाकिरत् ॥ १० ॥
सम्पूर्ण जगत्को भयभीत करनेवाले उस अद्भुत प्राणीको देखकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा भयभीत नहीं हुआ, अपितु उसके ऊपर दिव्य अस्त्रोंकी वर्षा करने लगा ॥ १० ॥
द्रौणिमुक्तान् शरांस्तांस्तु तद् भूतं महदग्रसत् ।
उदधेरिव वार्योघान् पावको वडवामुखः ॥ ११ ॥
परंतु जैसे बड़वानल समुद्रकी जलराशिको पी जाता है, उसी प्रकार उस महाभूतने अश्वत्थामाके छोड़े हुए सारे बाणोंको अपना ग्रास बना लिया ॥ ११ ॥
अग्रसत् तांस्तथाभूतं द्रौणिना प्रहितान् शरान् ।
अश्वत्थामा तु सम्प्रेक्ष्य शरौघांस्तान् निरर्थकान् ॥ १२ ॥
रथशक्तिं मुमोचासौ दीप्तामग्निशिखामिव ।
अश्वत्थामाने जो-जो बाण छोड़े, उन सबको वह महाभूत निगल गया। अपने बाण-समूहोंको व्यर्थ हुआ देख अश्वत्थामाने प्रज्वलित अग्निशिखाके समान देदीप्यमान रथशक्ति छोड़ी ॥ १२ ½ ॥
सा तमाहत्य दीप्ताग्रा रथशक्तिरदीर्यत ॥ १३ ॥
युगान्ते सूर्यमाहत्य महोल्केव दिवश्च्युता ।
उसका अग्रभाग तेजसे प्रकाशित हो रहा था। वह रथ-शक्ति उस महापुरुषसे टकराकर उसी प्रकार विदीर्ण हो गयी, जैसे प्रलयकालमें आकाशसे गिरी हुई बड़ी भारी उल्का सूर्यसे टकराकर नष्ट हो जाती है ॥
अथ हेमत्सरुं दिव्यं खड्गमाकाशवर्चसम् ॥ १४ ॥
कोशात् समुद्बबर्हाशु बिलाद् दीप्तमिवोरगम् । तब अश्वत्थामाने सोनेकी मूठसे सुशोभित तथा आकाशके समान निर्मल कान्तिवाली अपनी दिव्य तलवार तुरंत ही म्यानसे बाहर निकाली, मानो प्रज्वलित सर्पको बिलसे बाहर निकाला गया हो ॥ १४ १/२ ॥
ततः खड्गवरं धीमान् भूताय प्राहिणोत् तदा ॥ १५ ॥ स तदासाद्य भूतं वै बिलं नकुलवद् ययौ । फिर बुद्धिमान् द्रोणपुत्रने वह अच्छी-सी तलवार तत्काल ही उस महाभूतपर चला दी; परंतु वह उसके शरीरमें लगकर उसी तरह विलीन हो गयी, जैसे कोई नेवला बिलमें घुस गया हो ॥ १५ १/२ ॥
ततः स कुपितो द्रौणिरिन्द्रकेतुनिभां गदाम् ॥ १६ ॥ ज्वलन्तीं प्राहिणोत् तस्मै भूतं तामपि चाग्रसत् । तदनन्तर कुपित हुए अश्वत्थामाने उसके ऊपर अपनी इन्द्रध्वजके समान प्रकाशित होनेवाली गदा चलायी; परंतु वह भूत उसे भी लील गया ॥ १६ १/२ ॥
ततः सर्वायुधाभावे वीक्षमाणस्ततस्ततः ॥ १७ ॥ अपश्यत् कृतमाकाशमनाकाशं जनार्दनैः । इस प्रकार जब उसके सारे अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गये, तब वह इधर-उधर देखने लगा। उस समय उसे सारा आकाश असंख्य विष्णुओंस भरा दिखायी दिया ॥
तदद्भुततमं दृष्ट्वा द्रोणपुत्रो निरायुधः ॥ १८ ॥ अब्रवीदतिसंतप्तः कृपवाक्यमनुस्मरन् । अस्त्रहीन अश्वत्थामा यह अत्यन्त अद्भुत दृश्य देखकर कृपाचार्यके वचनोंको बारंबार स्मरण करता हुआ अत्यन्त संतप्त हो उठा और मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगा — ॥ १८ १/२ ॥
ब्रुवतामप्रियं पथ्यं सुहृदां न शृणोति यः ॥ १९ ॥ स शोचत्यापदं प्राप्य यथाहमतिवर्त्य तौ । ‘जो पुरुष अप्रिय किंतु हितकर वचन बोलनेवाले अपने सुहृदोंकी सीख नहीं सुनता है, वह विपत्तिमें पड़कर उसी तरह शोक करता है, जैसे मैं अपने उन दोनों सुहृदोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके कष्ट पा रहा हूँ ॥
शास्त्रदृष्टानविद्वान् यः समतीत्य जिघांसति ॥ २० ॥ स पथः प्रच्युतो धर्मात् कुपथे प्रतिहन्यते । ‘जो मूर्ख शास्त्रदर्शी पुरुषोंकी आज्ञाका उल्लंघन करके दूसरोंकी हिंसा करना चाहता है, वह धर्ममार्गसे भ्रष्ट हो कुमार्गमें पड़कर स्वयं ही मारा जाता है ॥ २० १/२ ॥
गोब्राह्मणनृपस्त्रीषु सख्युर्मातुर्गुरोस्तथा ॥ २१ ॥
हीनप्राणजडान्धेषु सुप्तभीतोत्थितेषु च । मत्तोन्मत्तप्रमत्तेषु न शस्त्राणि च पातयेत् ॥ २२ ॥ 'गौ, ब्राह्मण, राजा, स्त्री, मित्र, माता, गुरु, दुर्बल, जड, अन्धे, सोये हुए, डरे हुए, मतवाले, उन्मत्त और असावधान पुरुषोंपर मनुष्य शस्त्र न चलाये ॥ २१-२२ ॥ इत्येवं गुरुभिः पूर्वमुपदिष्टं नृणां सदा । सोऽहमुत्क्रम्य पन्थानं शास्त्रदिष्टं सनातनम् ॥ २३ ॥ अमार्गेणैवमारभ्य घोरामापदमागतः । 'इस प्रकार गुरुजनोंने पहले-से ही सब लोगोंको सदाके लिये यह शिक्षा दे रखी है। परंतु मैं उस शास्त्रोक्त सनातन मार्गका उल्लंघन करके बिना रास्तेके ही चलकर इस प्रकार अनुचित कर्मका आरम्भ करके भयंकर आपत्तिमें पड़ गया हूँ ॥ २३ १/२ ॥ तां चापदं घोरतरां प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २४ ॥ यदुद्यम्य महत् कृत्यं भयादपि निवर्तते । अशक्तश्चैव तत् कर्तुं कर्म शक्तिबलादिह ॥ २५ ॥ 'मनीषी पुरुष उसीको अत्यन्त भयंकर आपत्ति बताते हैं, जब कि मनुष्य किसी महान् कार्यका आरम्भ करके भयके कारण भी उससे पीछे हट जाता है और शक्ति-बलसे यहाँ उस कर्मको करनेमें असमर्थ हो जाता है ॥ २४-२५ ॥ न हि दैवाद् गरीयो वै मानुषं कर्म कथ्यते । मानुष्यं कुर्वतः कर्म यदि दैवान्न सिध्यति ॥ २६ ॥ स पथः प्रच्युतो धर्माद् विपदं प्रतिपद्यते । 'मानव-कर्म (पुरुषार्थ)-को दैवसे बढ़कर नहीं बताया गया है। पुरुषार्थ करते समय यदि दैववश सिद्धि नहीं प्राप्त हुई तो मनुष्य धर्ममार्गसे भ्रष्ट होकर विपत्तिमें फँस जाता है ॥ २६ १/२ ॥ प्रतिज्ञानं ह्यविज्ञानं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ २७ ॥ यदारभ्य क्रियां काञ्चिद् भयादिह निवर्तते । 'यदि मनुष्य किसी कार्यको आरम्भ करके यहाँ भयके कारण उससे निवृत्त हो जाता है तो ज्ञानी पुरुष उसकी उस कार्यको करनेकी प्रतिज्ञाको अज्ञान या मूर्खता बताते हैं ॥ २७ १/२ ॥ तदिदं दुष्प्रणीतेन भयं मां समुपस्थितम् ॥ २८ ॥ न हि द्रोणसुतः संख्ये निवर्तेत कथंचन । इदं च सुमहद् भूतं दैवदण्डमिवोद्यतम् ॥ २९ ॥ 'इस समय अपने ही दुष्कर्मके कारण मुझपर यह भय आ पहुँचा है। द्रोणाचार्यका पुत्र किसी प्रकार भी युद्धसे पीछे नहीं हट सकता; परंतु क्या करूँ, यह महाभूत मेरे मार्गमें विघ्न डालनेके लिये दैवदण्डके समान उठ खड़ा हुआ है ॥ २८-२९ ॥
न चैतदभिजानामि चिन्तयन्नपि सर्वथा । ध्रुवं येयमधर्मे मे प्रवृत्ता कलुषा मतिः ॥ ३० ॥ तस्याः फलमिदं घोरं प्रतिघाताय कल्पते । तदिदं दैवविहितं मम संख्ये निवर्तनम् ॥ ३१ ॥ ‘मैं सब प्रकारसे सोचने-विचारनेपर भी नहीं समझ पाता कि यह कौन है? निश्चय ही जो मेरी यह कलुषित बुद्धि अधर्ममें प्रवृत्त हुई है, उसीका विघात करनेके लिये यह भयंकर परिणाम सामने आया है, अतः आज युद्धसे मेरा पीछे हटना दैवके विधानसे ही सम्भव हुआ है॥ ३०-३१ ॥
नान्यत्र दैवादुद्यन्तुमिह शक्यं कथंचन । सोऽहमद्य महादेवं प्रपद्ये शरणं विभुम् ॥ ३२ ॥ दैवदण्डमिमं घोरं स हि मे नाशयिष्यति । ‘दैवकी अनुकूलताके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है, जिससे किसी प्रकार फिर यहाँ युद्धविषयक उद्योग किया जा सके; इसलिये आज मैं सर्वव्यापी भगवान् महादेवजीकी शरण लेता हूँ। वे ही मेरे सामने आये हुए इस भयानक दैवदण्डका नाश करेंगे॥ ३२ १/२ ॥
कपर्दिनं देवदेवमुमापतिमनामयम् ॥ ३३ ॥ कपालमालिनं रुद्रं भगनेत्रहरं हरम् । स हि देवोऽत्यगाद् देवांस्तपसा विक्रमेण च । तस्माच्छरणमभ्येमि गिरिशं शूलपाणिनम् ॥ ३४ ॥ ‘भगवान् शंकर तपस्या और पराक्रममें सब देवताओंसे बढ़कर हैं; अतः मैं उन्हीं रोग-शोकसे रहित, जटाजूटधारी, देवताओंके भी देवता, भगवती उमाके प्राणवल्लभ, कपाल-मालाधारी, भगनेत्र-विनाशक, पापहारी, त्रिशूलधारी एवं पर्वतपर शयन करनेवाले रुद्रदेवकी शरणमें जाता हूँ’ ॥ ३३-३४ ॥
इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिचिन्तायां षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी चिन्ताविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3013)
सप्तमोऽध्यायः
अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना
संजय उवाच
एवं संचिन्तयित्वा तु द्रोणपुत्रो विशाम्पते ।
अवतीर्य रथोपस्थाद् देवेशं प्रणतः स्थितः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**प्रजानाथ! ऐसा सोचकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा रथकी बैठकसे उतर पड़ा और देवेश्वर महादेवजीको प्रणाम करके खड़ा हो इस प्रकार स्तुति करने लगा ॥ १ ॥
द्रौणिरुवाच
उग्रं स्थाणुं शिवं रुद्रं शर्वमीशानमीश्वरम् ।
गिरिशं वरदं देवं भवभावनमीश्वरम् ॥ २ ॥
शितिकण्ठमजं शुक्रं दक्षक्रतुहरं हरम् ।
विश्वरूपं विरूपाक्षं बहुरूपमुमापतिम् ॥ ३ ॥
श्मशानवासिनं दृप्तं महागणपतिं विभुम् ।
खट्वाङ्गधारिणं रुद्रं जटिलं ब्रह्मचारिणम् ॥ ४ ॥
मनसा सुविशुद्धेन दुष्करेणाल्पचेतसा ।
सोऽहमात्मोपहारेण यक्ष्ये त्रिपुरघातिनम् ॥ ५ ॥
**अश्वत्थामा बोला—**प्रभो! आप उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र, शर्व, ईशान, ईश्वर और गिरिश आदि नामोंसे प्रसिद्ध वरदायक देवता तथा सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर हैं। आपके कण्ठमें नील चिह्न है। आप अजन्मा एवं शुद्धात्मा हैं। आपने ही दक्षके यज्ञका विनाश किया है। आप ही संहारकारी हर, विश्वरूप, भयानक नेत्रोंवाले, अनेक रूपधारी तथा उमादेवीके प्राणनाथ हैं। आप श्मशानमें निवास करते हैं। आपको अपनी शक्तिपर गर्व है। आप अपने महान् गणोंके अधिपति, सर्वव्यापी तथा खट्वांगधारी हैं, उपासकोंका दुःख दूर करनेवाले रुद्र हैं, मस्तकपर जटा धारण करनेवाले ब्रह्मचारी हैं। आपने त्रिपुरासुरका विनाश किया है। मैं विशुद्ध हृदयसे अपने-आपकी बलि देकर, जो मन्दमति मानवोंके लिये अति दुष्कर है, आपका यजन करूँगा ॥ २—५ ॥
स्तुतं स्तुत्यं स्तूयमानममोघं कृत्तिवाससम् ।
विलोहितं नीलकण्ठमसह्यं दुर्निवारणम् ॥ ६ ॥
शुक्रं ब्रह्मसृजं ब्रह्म ब्रह्मचारिणमेव च ।
व्रतवन्तं तपोनिष्ठमनन्तं तपतां गतिम् ॥ ७ ॥ बहुरूपं गणाध्यक्षं त्र्यक्षं पार्षदप्रियम् । धनाध्यक्षेक्षितमुखं गौरीहृदयवल्लभम् ॥ ८ ॥ कुमारपितरं पिङ्गं गोवृषोत्तमवाहनम् । तनुवाससमत्युग्रमुमाभूषणतत्परम् ॥ ९ ॥ परं परेभ्यः परमं परं यस्मान्न विद्यते । इष्वस्त्रोत्तमभर्तारं दिगन्तं देशरक्षिणम् ॥ १० ॥ हिरण्यकवचं देवं चन्द्रमौलिविभूषणम् । प्रपद्ये शरणं देवं परमेण समाधिना ॥ ११ ॥ पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याघ्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ ॥ ६—११ ॥ इमां चेदापदं घोरां तराम्यद्य सुदुष्कराम् । सर्वभूतोपहारेण यक्ष्येऽहं शुचिना शुचिम् ॥ १२ ॥ यदि मैं आज इस अत्यन्त दुष्कर और भयंकर विपत्तिसे पार पा जाऊँ तो मैं सर्वभूतमय पवित्र उपहार समर्पित करके आप परम पावन परमेश्वरकी पूजा करूँगा ॥ १२ ॥ इति तस्य व्यवसितं ज्ञात्वा योगात् सुकर्मणः । पुरस्तात् काञ्चनी वेदी प्रादुरासीन्महात्मनः ॥ १३ ॥ इस प्रकार अश्वत्थामाका दृढ़ निश्चय जानकर उसके शुभकर्मके योगसे उस महामनस्वी वीरके आगे एक सुवर्णमयी वेदी प्रकट हुई ॥ १३ ॥ तस्यां वेद्यां तदा राजंश्चित्रभानुरजायत ।
स दिशो विदिशः खं च ज्वालाभिरिव पूरयन् ॥ १४ ॥
राजन्! उस वेदीपर तत्काल ही अग्निदेव प्रकट हो गये, जो अपनी ज्वालाओंसे सम्पूर्ण दिशाओं-विदिशाओं और आकाशको परिपूर्ण-सा कर रहे थे ॥ १४ ॥
दीप्तास्यनयनाश्चात्र नैकपादशिरोभुजाः ।
रत्नचित्राङ्गदधराः समुद्यतकरास्तथा ॥ १५ ॥
द्वीपशैलप्रतीकाशाः प्रादुरासन् महागणाः ।
वहीं बहुत-से महान् गण प्रकट हो गये, जो द्वीपवर्ती पर्वतोंके समान बहुत ऊँचे कदके थे। उनके मुख और नेत्र दीप्तिसे दमक रहे थे। उन गणोंके पैर, मस्तक और भुजाएँ अनेक थीं। वे अपनी बाहोंमें रत्न-निर्मित विचित्र अंगद धारण किये हुए थे। उन सबने अपने हाथ ऊपर उठा रखे थे ॥ १५ १/२ ॥
श्ववराहोष्ट्ररूपाश्च हयगोमायुगोमुखाः ॥ १६ ॥
ऋक्षमार्जारवदना व्याघ्रद्वीपिमुखास्तथा ।
काकवक्त्राः प्लवमुखाः शुकवक्त्रास्तथैव च ॥ १७ ॥
महाजगरवक्त्राश्च हंसवक्त्राः सितप्रभाः ।
दार्वाघाटमुखाश्चापि चाषवक्त्राश्च भारत ॥ १८ ॥
उनके रूप कुत्ते, सूअर और ऊँटोंके समान थे; मुँह घोड़ों, गीदड़ों और गाय-बैलोंके समान जान पड़ते थे। किन्हींके मुख रीछोंके समान थे तो किन्हींके बिलावोंके समान। कोई बाघोंके समान मुँहवाले थे तो कोई चीतोंके। कितने ही गणोंके मुख कौओं, वानरों, तोतों, बड़े-बड़े अजगरों और हंसोंके समान थे। भारत! कितनोंकी कान्ति भी हंसोंके समान सफेद थी, कितने ही गणोंके मुख कठफोरवा पक्षी और नीलकण्ठके समान थे ॥ १६—१८ ॥
कूर्मनक्रमुखाश्चैव शिशुमारमुखास्तथा ।
महामकरवक्त्राश्च तिमिवक्त्रास्तथैव च ॥ १९ ॥
हरिवक्त्राः क्रौञ्चमुखाः कपोतेभमुखास्तथा ।
पारावतमुखाश्चैव मद्गुवक्त्रास्तथैव च ॥ २० ॥
इसी प्रकार बहुत-से गण कछुए, नाकें, सूँस, बड़े-बड़े मगर, तिमि नामक मत्स्य, मोर, क्रौंच (कुरर), कबूतर, हाथी, परेवा तथा मद्गु नामक जलपक्षीके समान मुखवाले थे ॥ १९-२० ॥
पाणिकर्णाः सहस्राक्षास्तथैव च महोदराः ।
निर्मांसाः काकवक्त्राश्च श्येनवक्त्राश्च भारत ॥ २१ ॥
तथैवाशिरसो राजन्नृक्षवक्त्राश्च भारत ।
प्रदीप्तनेत्रजिह्वाश्च ज्वालावर्णास्तथैव च ॥ २२ ॥
किन्हींके हाथोंमें ही कान थे। कितने ही हजार-हजार नेत्र और लंबे पेटवाले थे। कितनोंके शरीर मांसरहित, हड्डियोंके ढाँचे मात्र थे। भरतनन्दन! कोई कौओंके समान