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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 3132)

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अष्टमोऽध्यायः

व्यासजीका संहारको अवश्यम्भावी बताकर धृतराष्ट्रको समझाना

वैशम्पायन उवाच

विदुरस्य तु तद् वाक्यं निशम्य कुरुसत्तमः ।
पुत्रशोकाभिसंतप्तः पपात भुवि मूर्च्छितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! विदुरजीके ये वचन सुनकर कुरुश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्र पुत्रशोकसे संतप्त एवं मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १ ॥

तं तथा पतितं भूमौ निःसंज्ञं प्रेक्ष्य बान्धवाः ।
कृष्णद्वैपायनश्चैव क्षत्ता च विदुरस्तथा ॥ २ ॥
संजयः सुहृदश्चान्ये द्वाःस्था ये चास्य सम्मताः ।
जलेन सुखशीतेन तालवृन्तैश्च भारत ॥ ३ ॥
पस्पृशुश्च करैर्गात्रं वीजमानाश्च यत्नतः ।
अन्वासन् सुचिरं कालं धृतराष्ट्रं तथागतम् ॥ ४ ॥
उन्हें इस प्रकार अचेत होकर भूमिपर गिरा देख सभी भाई-बन्धु, व्यासजी, विदुर, संजय, सुहृद्गण तथा जो विश्वसनीय द्वारपाल थे, वे सभी शीतल जलके छींटे देकर ताड़के पंखोंसे हवा करने और उनके शरीरपर हाथ फेरने लगे। उस बेहोशीकी अवस्थामें वे बड़े यत्नके साथ धृतराष्ट्रको होशमें लानेके लिये देरतक आवश्यक उपचार करते रहे ॥ २—४ ॥

अथ दीर्घस्य कालस्य लब्धसंज्ञो महीपतिः ।
विललाप चिरं कालं पुत्राधिभिरभिप्लुतः ॥ ५ ॥
तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् राजा धृतराष्ट्रको चेत हुआ और वे पुत्रोंकी चिन्तामें डूबकर बड़ी देरतक विलाप करते रहे ॥ ५ ॥

धिगस्तु खलु मानुष्यं मानुषेषु परिग्रहे ।
यतो मूलानि दुःखानि सम्भवन्ति मुहुर्मुहुः ॥ ६ ॥
वे बोले—‘इस मनुष्यजन्मको धिक्कार है! इसमें भी विवाह आदि करके परिवार बढ़ाना तो और भी बुरा है; क्योंकि उसीके कारण बारंबार नाना प्रकारके दुःख प्राप्त होते हैं ॥ ६ ॥

पुत्रनाशेऽर्थनाशे च ज्ञातिसम्बन्धिनामथ ।
प्राप्यते सुमहद् दुःखं विषाग्निप्रतिमं विभो ॥ ७ ॥

‘प्रभो! पुत्र, धन, कुटुम्ब और सम्बन्धियोंका नाश होनेपर तो विष पीने और आगमें जलनेके समान बड़ा भारी दुःख भोगना पड़ता है ॥ ७ ॥ येन दह्यन्ति गात्राणि येन प्रज्ञा विनश्यति । येनाभिभूतः पुरुषो मरणं बहु मन्यते ॥ ८ ॥ ‘उस दुःखसे सारा शरीर जलने लगता है, बुद्धि नष्ट हो जाती है और उस असह्य शोकसे पीड़ित हुआ पुरुष जीनेकी अपेक्षा मर जाना अधिक अच्छा समझता है ॥ तदिदं व्यसनं प्राप्तं मया भाग्यविपर्ययात् । तस्यान्तं नाधिगच्छामि ऋते प्राणविमोक्षणात् ॥ ९ ॥ ‘आज भाग्यके फेरसे वही यह स्वजनोंके विनाशका महान् दुःख मुझे प्राप्त हुआ है। अब प्राण त्याग देनेके सिवा और किसी उपायद्वारा मैं इस दुःखसे पार नहीं पा सकता ॥ ९ ॥ तथैवाहं करिष्यामि अद्यैव द्विजसत्तम । इत्युक्त्वा तु महात्मानं पितरं ब्रह्मवित्तमम् ॥ १० ॥ धृतराष्ट्रोऽभवन्मूढः स शोकं परमं गतः । अभूच्च तूष्णीं राजासौ ध्यायमानो महीपते ॥ ११ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! इसलिये आज ही मैं अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा।’ अपने ब्रह्मवेत्ता पिता महात्मा व्यासजीसे ऐसा कहकर राजा धृतराष्ट्र अत्यन्त शोकमें डूब गये और सुध-बुध खो बैठे। राजन्! पुत्रोंका ही चिन्तन करते हुए वे बूढ़े नरेश वहाँ मौन होकर बैठे रह गये ॥ १०-११ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । पुत्रशोकाभिसंतप्तं पुत्रं वचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥ उनकी बात सुनकर शक्तिशाली महात्मा श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यास पुत्रशोकसे संतप्त हुए अपने बेटेसे इस प्रकार बोले— ॥ १२ ॥

व्यास उवाच

धृतराष्ट्र महाबाहो यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु । श्रुतवानसि मेधावी धर्मार्थकुशलः प्रभो ॥ १३ ॥ **व्यासजीने कहा—**महाबाहु धृतराष्ट्र! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। प्रभो! तुम वेदशास्त्रोंके ज्ञानसे सम्पन्न, मेधावी तथा धर्म और अर्थके साधनमें कुशल हो ॥ १३ ॥ न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् वेदितव्यं परंतप । अनित्यतां हि मर्त्यानां विजानासि न संशयः ॥ १४ ॥

शत्रुसंतापी नरेश! जाननेयोग्य जो कोई भी तत्त्व है, वह तुमसे अज्ञात नहीं है। तुम मानव-जीवनकी अनित्यताको अच्छी तरह जानते हो, इसमें संशय नहीं है ॥ १४ ॥ अध्रुवे जीवलोके च स्थाने वा शाश्वते सति । जीविते मरणान्ते च कस्माच्छोचसि भारत ॥ १५ ॥ भरतनन्दन! जब जीव-जगत् अनित्य है, सनातन परम पद नित्य है और इस जीवनका अन्त मृत्युमें ही है, तब तुम इसके लिये शोक क्यों करते हो? ॥ १५ ॥ प्रत्यक्षं तव राजेन्द्र वैरस्यास्य समुद्भवः । पुत्रं ते कारणं कृत्वा कालयोगेन कारितः ॥ १६ ॥ राजेन्द्र! तुम्हारे पुत्रको निमित्त बनाकर कालकी प्रेरणासे इस वैरकी उत्पत्ति तो तुम्हारे सामने ही हुई थी ॥ अवश्यं भवितव्ये च कुरूणां वैशसे नृप । कस्माच्छोचसि तान् शूरान् गतान् परमिकां गतिम् ॥ १७ ॥ नरेश्वर! जब कौरवोंका यह विनाश अवश्यम्भावी था, तब परम गतिको प्राप्त हुए शूरवीरोंके लिये तुम क्यों शोक कर रहे हो? ॥ १७ ॥ जानता च महाबाहो विदुरेण महात्मना । यतितं सर्वयत्नेन शमं प्रति जनेश्वर ॥ १८ ॥ महाबाहु नरेश्वर! महात्मा विदुर इस भावी परिणामको जानते थे, इसीलिये इन्होंने सारी शक्ति लगाकर संधिके लिये प्रयत्न किया था ॥ १८ ॥ न च दैवकृतो मार्गः शक्यो भूतेन केनचित् । घटतापि चिरं कालं नियन्तुमिति मे मतिः ॥ १९ ॥ मेरा तो ऐसा विश्वास है कि दीर्घ कालतक प्रयत्न करके भी कोई प्राणी दैवके विधानको रोक नहीं सकता ॥ देवतानां हि यत् कार्यं मया प्रत्यक्षतः श्रुतम् । तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथा स्थैर्यं भवेत् तव ॥ २० ॥ देवताओंका जो कार्य मैंने प्रत्यक्ष अपने कानोंसे सुना है, वह तुम्हें बता रहा हूँ, जिससे तुम्हारा मन स्थिर हो सके ॥ २० ॥ पुराहं त्वरितो यातः सभामैन्द्रीं जितक्लमः । अपश्यं तत्र च तदा समवेतान् दिवौकसः ॥ २१ ॥ पूर्वकालकी बात है, एक बार मैं यहाँसे शीघ्रतापूर्वक इन्द्रकी सभामें गया। वहाँ जानेपर भी मुझे कोई थकावट नहीं हुई; क्योंकि मैं इन सबपर विजय पा चुका हूँ। वहाँ उस समय मैंने देखा कि इन्द्रकी सभामें सम्पूर्ण देवता एकत्र हुए हैं ॥ २१ ॥ नारदप्रमुखाश्चापि सर्वे देवर्षयोऽनघ । तत्र चापि मया दृष्टा पृथिवी पृथिवीपते ॥ २२ ॥

कार्यार्थमुपसम्प्राप्ता देवतानां समीपतः ।
अनघ! वहाँ नारद आदि समस्त देवर्षि भी उपस्थित थे। पृथ्वीनाथ! मैंने वहीं इस पृथ्वीको भी देखा, जो किसी कार्यके लिये देवताओंके पास गयी थी ॥ २२ १/२ ॥
उपगम्य तदा धात्री देवानाह समागतान् ॥ २३ ॥
यत् कार्यं मम युष्माभिर्ब्रह्मणः सदने तदा ।
प्रतिज्ञातं महाभागास्तच्छीघ्रं संविधीयताम् ॥ २४ ॥
उस समय विश्वधारिणी पृथ्वीने वहाँ एकत्र हुए देवताओंके पास जाकर कहा—‘महाभाग देवताओ! आपलोगोंने उस दिन ब्रह्माजीकी सभामें मेरे जिस कार्यको सिद्ध करनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसे शीघ्र पूर्ण कीजिये’ ॥
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा विष्णुर्लोकनमस्कृतः ।
उवाच वाक्यं प्रहसन् पृथिवीं देवसंसदि ॥ २५ ॥
धृतराष्ट्रस्य पुत्राणां यस्तु ज्येष्ठः शतस्य वै ।
दुर्योधन इति ख्यातः स ते कार्यं करिष्यति ॥ २६ ॥
तं च प्राप्य महीपालं कृतकृत्या भविष्यसि ।
उसकी बात सुनकर विश्ववन्दित भगवान् विष्णुने देवसभामें पृथ्वीकी ओर देखकर हँसते हुए कहा—‘शुभे! धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंमें जो सबसे बड़ा और दुर्योधननामसे विख्यात है, वही तेरा कार्य सिद्ध करेगा। उसे राजाके रूपमें पाकर तू कृतार्थ हो जायगी ॥ २५-२६ १/२ ॥
तस्यार्थे पृथिवीपालाः कुरुक्षेत्रं समागताः ॥ २७ ॥
अन्योन्यं घातयिष्यन्ति दृढैः शस्त्रैः प्रहारिणः ।
‘उसके लिये सारे भूपाल कुरुक्षेत्रमें एकत्र होंगे और सुदृढ़ शस्त्रोंद्वारा परस्पर प्रहार करके एक-दूसरेका वध कर डालेंगे ॥ २७ १/२ ॥
ततस्ते भविता देवि भारस्य युधि नाशनम् ॥ २८ ॥
गच्छ शीघ्रं स्वकं स्थानं लोकान् धारय शोभने ।
‘देवि! इस प्रकार उस युद्धमें तेरे भारका नाश हो जायगा। शोभने! अब तू शीघ्र अपने स्थानपर जा और समस्त लोकोंको पूर्ववत् धारण कर’ ॥ २८ १/२ ॥
य एष ते सुतो राजन् लोकसंहारकारणात् ॥ २९ ॥
कलेरंशः समुत्पन्नो गान्धार्या जठरे नृप ।
अमर्षी चपलश्चापि क्रोधनो दुष्प्रसाधनः ॥ ३० ॥
राजन्! नरेश्वर! यह जो तुम्हारा पुत्र दुर्योधन था, वह सारे जगत्‌का संहार करनेके लिये कलिका मूर्तिमान् अंश ही गान्धारीके पेटसे पैदा हुआ था। वह अमर्षशील, क्रोधी, चंचल और कूटनीतिसे काम लेनेवाला था ॥
दैवयोगात् समुत्पन्ना भ्रातरश्चास्य तादृशाः ।

शकुनिर्मातुलश्चैव कर्णश्च परमः सखा ॥ ३१ ॥
दैवयोगसे उसके भाई भी वैसे ही उत्पन्न हुए। मामा शकुनि और परम मित्र कर्ण भी उसी विचारके मिल गये ॥ ३१ ॥
समुत्पन्ना विनाशार्थं पृथिव्यां सहिता नृपाः ।
यादृशो जायते राजा तादृशोऽस्य जनो भवेत् ॥ ३२ ॥
ये सब नरेश शत्रुओंका विनाश करनेके लिये ही एक साथ इस भूमण्डलपर उत्पन्न हुए थे। जैसा राजा होता है, वैसे ही उसके स्वजन और सेवक भी होते हैं ॥ ३२ ॥
अधर्मो धर्मतां याति स्वामी चेद् धार्मिको भवेत् ।
स्वामिनो गुणदोषाभ्यां भृत्याः स्युर्नात्र संशयः ॥ ३३ ॥
यदि स्वामी धार्मिक हो तो अधर्मी सेवक भी धार्मिक बन जाते हैं। सेवक स्वामीके ही गुण-दोषोंसे युक्त होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ३३ ॥
दुष्टं राजानमासाद्य गतास्ते तनया नृप ।
एतमर्थं महाबाहो नारदो वेद तत्त्ववित् ॥ ३४ ॥
महाबाहु नरेश्वर! दुष्ट राजाको पाकर तुम्हारे सभी पुत्र उसीके साथ नष्ट हो गये। इस बातको तत्त्ववेत्ता नारदजी जानते हैं ॥ ३४ ॥
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कथं ते शोकनाशः स्यात् प्राणेषु च दया प्रभो । स्नेहश्च पाण्डुपुत्रेषु ज्ञात्वा दैवकृतं विधिम् ॥ ४० ॥ प्रभो! नारदजीकी वह बात सुनकर उस समय पाण्डव बहुत चिन्तित हो गये थे। इस प्रकार मैंने तुमसे देवताओंका यह सारा सनातन रहस्य बताया है, जिससे किसी तरह तुम्हारे शोकका नाश हो। तुम अपने प्राणोंपर दया कर सको और देवताओंका विधान समझकर पाण्डुके पुत्रोंपर भी तुम्हारा स्नेह बना रहे ॥ ३९-४० ॥

एष चार्थो महाबाहो पूर्वमेव मया श्रुतः । कथितो धर्मराजस्य राजसूये क्रतूत्तमे ॥ ४१ ॥ महाबाहो! यह बात मैंने बहुत पहले ही सुन रखी थी और क्रतुश्रेष्ठ राजसूयमें धर्मराज युधिष्ठिरको बता भी दी थी ॥ ४१ ॥

यतितं धर्मपुत्रेण मया गुह्ये निवेदिते । अविग्रहे कौरवाणां दैवं तु बलवत्तरम् ॥ ४२ ॥ मेरे द्वारा उस गुप्त रहस्यके बता दिये जानेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने बहुत प्रयत्न किया कि कौरवोंमें परस्पर कलह न हो; परंतु दैवका विधान बड़ा प्रबल होता है ॥

अनतिक्रमणीयो हि विधी राजन् कथंचन । कृतान्तस्य तु भूतेन स्थावरेण चरेण च ॥ ४३ ॥ राजन्! दैव अथवा कालके विधानको चराचर प्राणियोंमेंसे कोई भी किसी तरह लाँघ नहीं सकता ॥ ४३ ॥

भवान् धर्मपरो यत्र बुद्धिश्रेष्ठश्च भारत । मुह्यते प्राणिनां ज्ञात्वा गतिं चागतिमेव च ॥ ४४ ॥ भरतनन्दन! तुम धर्मपरायण और बुद्धिमें श्रेष्ठ हो। तुम्हें प्राणियोंके आवागमनका रहस्य भी ज्ञात है, तो भी क्यों मोहके वशीभूत हो रहे हो? ॥ ४४ ॥

त्वां तु शोकेन संतप्तं मुह्यमानं मुहुर्मुहुः । ज्ञात्वा युधिष्ठिरो राजा प्राणानपि परित्यजेत् ॥ ४५ ॥ तुम्हें बारंबार शोकसे संतप्त और मोहित होते जानकर राजा युधिष्ठिर अपने प्राणोंका भी परित्याग कर देंगे ॥

कृपालुर्नित्यशो वीरस्तिर्यग्योनिगतेष्वपि । स कथं त्वयि राजेन्द्र कृपां नैव करिष्यति ॥ ४६ ॥ राजेन्द्र! वीर युधिष्ठिर पशु-पक्षी आदि योनिके प्राणियोंपर भी सदा दयाभाव बनाये रखते हैं; फिर तुमपर वे कैसे दया नहीं करेंगे? ॥ ४६ ॥

मम चैव नियोगेन विधेश्चाप्यनिवर्तनात् । पाण्डवानां च कारुण्यात् प्राणान् धारय भारत ॥ ४७ ॥

अतः भारत! मेरी आज्ञा मानकर, विधाताका विधान टल नहीं सकता, ऐसा समझकर तथा पाण्डवोंपर करुणा करके तुम अपने प्राण धारण करो ॥ ४७ ॥
एवं ते वर्तमानस्य लोके कीर्तिर्भविष्यति ।
धर्मार्थः सुमहांस्तात तप्तं स्याच्च तपश्चिरात् ॥ ४८ ॥
तात! ऐसा बर्ताव करनेसे संसारमें तुम्हारी कीर्ति बढ़ेगी, महान् धर्म और अर्थकी सिद्धि होगी तथा दीर्घ कालतक तपस्या करनेका तुम्हें फल प्राप्त होगा ॥ ४८ ॥
पुत्रशोकं समुत्पन्नं हुताशं ज्वलितं यथा ।
प्रज्ञाम्भसा महाभाग निर्वापय सदा सदा ॥ ४९ ॥
महाभाग! प्रज्वलित आगके समान जो तुम्हें यह पुत्रशोक प्राप्त हुआ है, इसे विचाररूपी जलके द्वारा सदाके लिये बुझा दो ॥ ४९ ॥

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा तस्य वचनं व्यासस्यामिततेजसः ।
मुहूर्तं समनुध्यायन् धृतराष्ट्रोऽभ्यभाषत ॥ ५० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! अमित तेजस्वी व्यासजीका यह वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र दो घड़ीतक कुछ सोच-विचार करते रहे; फिर इस प्रकार बोले— ॥ ५० ॥
महता शोकजालेन प्रणुन्नोऽस्मि द्विजोत्तम ।
नात्मानमवबुध्यामि मुह्यमानो मुहुर्मुहुः ॥ ५१ ॥
‘विप्रवर! मुझे महान् शोकजालने सब ओरसे जकड़ रखा है। मैं अपने-आपको ही नहीं समझ पा रहा हूँ। मुझे बारंबार मूर्च्छा आ जाती है ॥ ५१ ॥
इदं तु वचनं श्रुत्वा तव देवनियोगजम् ।
धारयिष्याम्यहं प्राणान् घटिष्ये न तु शोचितुम् ॥ ५२ ॥
‘अब आपका यह वचन सुनकर कि सब कुछ देवताओंकी प्रेरणासे हुआ है, मैं अपने प्राण धारण करूँगा और यथाशक्ति इस बातके लिये भी प्रयत्न करूँगा कि मुझे शोक न हो’ ॥ ५२ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यासः सत्यवतीसुतः ।
धृतराष्ट्रस्य राजेन्द्र तत्रैवान्तरधीयत ॥ ५३ ॥
राजेन्द्र! धृतराष्ट्रका यह वचन सुनकर सत्यवतीनन्दन व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ५३ ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे
अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शोकका निवारणविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥

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अध्याय (पृष्ठ 3140)

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नवमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका शोकातुर हो जाना और विदुरजीका उन्हें पुनः शोकनिवारणके लिये उपदेश

जनमेजय उवाच

गते भगवति व्यासे धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
किमचेष्टत विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— विप्रर्षे! भगवान् व्यासके चले जानेपर राजा धृतराष्ट्रने क्या किया? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥
तथैव कौरवो राजा धर्मपुत्रो महामनाः ।
कृपप्रभृतयश्चैव किमकुर्वत ते त्रयः ॥ २ ॥
इसी प्रकार कुरुवंशी राजा महामनस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिरने तथा कृप आदि तीनों महारथियोंने क्या किया? ॥
अश्वत्थाम्नः श्रुतं कर्म शापश्चान्योन्यकारितः ।
वृत्तान्तमुत्तरं ब्रूहि यदभाषत संजयः ॥ ३ ॥
अश्वत्थामाका कर्म तो मैंने सुन लिया, परस्पर जो शाप दिये गये, उनका हाल भी मालूम हो गया। अब आगेका वृत्तान्त बताइये, जिसे संजयने धृतराष्ट्रको सुनाया हो ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

हते दुर्योधने चैव हते सैन्ये च सर्वशः ।
संजयो विगतप्रज्ञो धृतराष्ट्रमुपस्थितः ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! दुर्योधन तथा उसकी सारी सेनाओंके मारे जानेपर संजयकी दिव्य दृष्टि चली गयी और वह धृतराष्ट्रकी सभामें उपस्थित हुआ ॥ ४ ॥

संजय उवाच

आगम्य नानादेशेभ्यो नानाजनपदेश्वराः ।
पितृलोकं गता राजन् सर्वे तव सुतैः सह ॥ ५ ॥
संजय बोला— राजन्! नाना जनपदोंके स्वामी विभिन्न देशोंसे आकर सब-के-सब आपके पुत्रोंके साथ पितृलोकके पथिक बन गये ॥ ५ ॥
याच्यमानेन सततं तव पुत्रेण भारत ।
घातिता पृथिवी सर्वा वैरस्यान्तं विधित्सता ॥ ६ ॥
भारत! आपके पुत्रसे सब लोगोंने सदा शान्तिके लिये याचना की, तो भी उसने वैरका अन्त करनेकी इच्छासे सारे भूमण्डलका विनाश करा दिया ॥ ६ ॥

पुत्राणामथ पौत्राणां पितॄणां च महीपते ।
आनुपूर्व्येण सर्वेषां प्रेतकार्याणि कारय ॥ ७ ॥
महाराज! अब आप क्रमशः अपने ताऊ, चाचा, पुत्र और पौत्रोंका मृतकसम्बन्धी कर्म करवाइये ॥ ७ ॥

वैशम्पायन उवाच

तच्छ्रुत्वा वचनं घोरं संजयस्य महीपतिः ।
गतासुरिव निश्चेष्टो न्यपतत् पृथिवीतले ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! संजयका यह घोर वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र प्राणशून्यकी भाँति निश्चेष्ट हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ८ ॥
तं शयानमुपागम्य पृथिव्यां पृथिवीपतिम् ।
विदुरः सर्वधर्मज्ञ इदं वचनमब्रवीत् ॥ ९ ॥
पृथिवीपति धृतराष्ट्रको पृथ्वीपर सोया देख सब धर्मोंके ज्ञाता विदुरजी उनके पास आये और इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥
उत्तिष्ठ राजन् किं शेषे मा शुचो भरतर्षभ ।
एषा वै सर्वसत्त्वानां लोकेश्वर परा गतिः ॥ १० ॥
'राजन्! उठिये, क्यों सो रहे हैं? भरतश्रेष्ठ! शोक न कीजिये। लोकनाथ! समस्त प्राणियोंकी यही अन्तिम गति है ॥ १० ॥
अभावादीनि भूतानि भावमध्यानि भारत ।
अभावनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ ११ ॥
'भरतनन्दन! सभी प्राणी जन्मसे पहले अव्यक्त थे, बीचमें व्यक्त हुए और अन्तमें मृत्युके बाद फिर अव्यक्त ही हो जायँगे, ऐसी दशामें उनके लिये शोक करनेकी क्या बात है? ॥ ११ ॥
न शोचन् मृतमन्वेति न शोचन् म्रियते नरः ।
एवं सांसिद्धिके लोके किमर्थमनुशोचसि ॥ १२ ॥
'शोक करनेवाला मनुष्य न तो मरे हुएके साथ जाता है और न स्वयं ही मरता है। जब लोककी यही स्वाभाविक स्थिति है, तब आप किसलिये बारंबार शोक कर रहे हैं? ॥ १२ ॥
अयुध्यमानो म्रियते युध्यमानस्तु जीवति ।
कालं प्राप्य महाराज न कश्चिदतिवर्तते ॥ १३ ॥
'महाराज! जो युद्ध नहीं करता, वह भी मरता है और युद्ध करनेवाला भी जीवित बच जाता है। कालको पाकर कोई भी उसका उल्लंघन नहीं कर सकता ॥ १३ ॥
कालः कर्षति भूतानि सर्वाणि विविधानि च ।
न कालस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यः कुरुसत्तम ॥ १४ ॥

'काल सभी विविध प्राणियोंको खींचता है। कुरुश्रेष्ठ! कालके लिये न तो कोई प्रिय है और न कोई द्वेषका पात्र ही ।। १४ ।। यथा वायुस्तृणाग्राणि संवर्तयति सर्वतः । तथा कालवशं यान्ति भूतानि भरतर्षभ ।। १५ ।। 'भरतश्रेष्ठ! जैसे वायु तिनकोंको सब ओर उड़ाती और गिराती रहती है, उसी प्रकार सारे प्राणी कालके अधीन होकर आते-जाते रहते हैं ।। १५ ।। एकसार्थप्रयातानां सर्वेषां तत्र गामिनाम् । यस्य कालः प्रयात्यग्रे तत्र का परिदेवना ।। १६ ।। 'एक साथ आये हुए सभी प्राणियोंको एक दिन वहीं जाना है। जिसका काल आ गया, वह पहले चला जाता है; फिर उसके लिये व्यर्थ शोक क्यों? ।। १६ ।। यांश्चापि निहतान् युद्धे राजंस्त्वमनुशोचसि । न शोच्या हि महात्मानः सर्वे ते त्रिदिवं गताः ।। १७ ।। 'राजन्! जो लोग युद्धमें मारे गये हैं और जिनके लिये आप बारंबार शोक कर रहे हैं, वे महामनस्वी वीर शोक करनेके योग्य नहीं हैं, वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें चले गये ।। १७ ।। न यज्ञैर्दक्षिणावद्भिर्न तपोभिर्न विद्यया । तथा स्वर्गमुपायान्ति यथा शूरास्तनुत्यजः ।। १८ ।। 'अपने शरीरका त्याग करनेवाले शूरवीर जिस तरह स्वर्गमें जाते हैं, उस तरह दक्षिणावाले यज्ञों, तपस्याओं तथा विद्यासे भी कोई नहीं जा सकता ।। १८ ।। सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः । सर्वे चाभिमुखाः क्षीणास्तत्र का परिदेवना ।। १९ ।। 'वे सभी वीर वेदवेत्ता और अच्छी तरह ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले थे। वे सब-के-सब शत्रुओंका सामना करते हुए मारे गये थे; अतः उनके लिये शोक करनेकी क्या आवश्यकता है? ।। १९ ।। शरीराग्निषु शूराणां जुहुवुस्ते शराहुतीः । हूयमानान् शरांश्चैव सेहुरुत्तमपूरुषाः ।। २० ।। 'उन श्रेष्ठ पुरुषोंने शूरवीरोंके शरीररूपी अग्नियोंमें बाणरूपी हविष्यकी आहुतियाँ दी थीं और अपने शरीरमें जिनका हवन किया गया था, उन बाणोंका आघात सहन किया था ।। २० ।। एवं राजंस्तवाचक्षे स्वर्ग्यं पन्थानमुत्तमम् । न युद्धादधिकं किंचित् क्षत्रियस्येह विद्यते ।। २१ ।। 'राजन्! मैं तुम्हें स्वर्गप्राप्तिका सबसे उत्तम मार्ग बता रहा हूँ। इस जगत्में क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर स्वर्गसाधक दूसरा कोई उपाय नहीं है ।। २१ ।। क्षत्रियास्ते महात्मानः शूराः समितिशोभनाः ।

आशिषं परमां प्राप्ता न शोच्याः सर्व एव हि ॥ २२ ॥
‘वे सभी महामनस्वी क्षत्रिय वीर युद्धमें शोभा पानेवाले थे। वे उत्तम भोगोंसे सम्पन्न पुण्यलोकोंमें जा पहुँचे हैं, अतः उन सबके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ २२ ॥

आत्मनाऽऽत्मानमाश्वास्य मा शुचः पुरुषर्षभ ।
नाद्य शोकाभिभूतस्त्वं कार्यमुत्स्रष्टुमर्हसि ॥ २३ ॥
‘पुरुषप्रवर! आप स्वयं ही अपने मनको आश्वासन देकर शोकको त्याग दीजिये। आज शोकसे व्याकुल होकर आपको अपने कर्तव्य कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये’ ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि विदुरवाक्ये नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें विदुरजीका वाक्यविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 3144)

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दशमोऽध्यायः

स्त्रियों और प्रजाके लोगोंके सहित राजा धृतराष्ट्रका रणभूमिमें जानेके लिये नगरसे बाहर निकलना

वैशम्पायन उवाच

विदुरस्य तु तद् वाक्यं श्रुत्वा तु पुरुषर्षभः ।
युज्यतां यानमित्युक्त्वा पुनर्वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! विदुरकी यह बात सुनकर पुरुषश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रने रथ जोतनेकी आज्ञा देकर पुनः इस प्रकार कहा ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

शीघ्रमानय गान्धारीं सर्वाश्च भरतस्त्रियः ।
वधूं कुन्तीमुपादाय याश्चान्यास्तत्र योषितः ॥ २ ॥

**धृतराष्ट्र बोले—**गान्धारीको तथा भरतवंशी अन्य सब स्त्रियोंको शीघ्र ले आओ तथा वधू कुन्तीको साथ लेकर वहाँ जो दूसरी स्त्रियाँ हों, उन्हें भी बुला लो ॥ २ ॥

एवमुक्त्वा स धर्मात्मा विदुरं धर्मवित्तमम् ।
शोकविप्रहतज्ञानो यानमेवान्वपद्यत ॥ ३ ॥

परम धर्मज्ञ विदुरजीसे ऐसा कहकर शोकसे जिनकी ज्ञानशक्ति नष्ट-सी हो गयी थी, वे धर्मात्मा राजा धृतराष्ट्र रथपर सवार हुए ॥ ३ ॥

गान्धारी पुत्रशोकार्ता भर्तुर्वचननोदिता ।
सह कुन्त्या यतो राजा सह स्त्रीभिरुपाद्रवत् ॥ ४ ॥

गान्धारी पुत्रशोकसे पीड़ित हो रही थीं, पतिकी आज्ञा पाकर वे कुन्ती तथा अन्य स्त्रियोंके साथ जहाँ राजा धृतराष्ट्र थे, वहाँ आयीं ॥ ४ ॥

ताः समासाद्य राजानं भृशं शोकसमन्विताः ।
आमन्त्र्यान्योन्यमीयुः स्म भृशमुच्चुक्रुशुस्ततः ॥ ५ ॥

वहाँ राजाके पास पहुँचकर अत्यन्त शोकमें डूबी हुई वे सारी स्त्रियाँ एक-दूसरीको पुकार-पुकारकर परस्पर गलेसे लग गयीं और जोर-जोरसे फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ ५ ॥

ताः समाश्वासयत् क्षत्ता ताभ्यश्चार्ततरः स्वयम् ।
अश्रुकण्ठीः समारोप्य ततोऽसौ निर्ययौ पुरात् ॥ ६ ॥

विदुरजीने उन सब स्त्रियोंको आश्वासन दिया। वे स्वयं भी उनसे अधिक आर्त हो गये थे। आँसुओंसे गद्गद कण्ठ हुई उन सबको रथपर चढ़ाकर वे नगरसे बाहर निकले ॥ ६ ॥

ततः प्रणादः संजज्ञे सर्वेषु कुरुवेश्मसु ।

आकुमारं पुरं सर्वमभवच्छोककर्षितम् ॥ ७ ॥ तदनन्तर कौरवोंके सभी घरोंमें बड़ा भारी आर्तनाद होने लगा। बूढ़ोंसे लेकर बच्चोंतक सारा नगर शोकसे व्याकुल हो उठा ॥ ७ ॥

अदृष्टपूर्वा या नार्यः पुरा देवगणैरपि । पृथग्जनेन दृश्यन्ते तास्तदा निहतेश्वराः ॥ ८ ॥ जिन स्त्रियोंको पहले कभी देवताओंने भी नहीं देखा था, उन्हींको उस समय पतियोंके मारे जानेपर साधारण लोग देख रहे थे ॥ ८ ॥

प्रकीर्य केशान् सुशुभान् भूषणान्यवमुच्य च । एकवस्त्रधरा नार्यः परिपेतुरनाथवत् ॥ ९ ॥ वे नारियाँ अपने सुन्दर केश बिखराये सारे आभूषण उतारकर एक ही वस्त्र धारण किये अनाथकी भाँति रणभूमिकी ओर जा रही थीं ॥ ९ ॥

श्वेतपर्वतरूपेभ्यो गृहेभ्यस्तास्त्वपाक्रमन् । गुहाभ्य इव शैलानां पृषत्यो हतयूथपाः ॥ १० ॥ कौरवोंके घर श्वेत पर्वतके समान जान पड़ते थे। उनसे जब वे स्त्रियाँ बाहर निकलीं, उस समय जिनका यूथपति मारा गया हो, पर्वतोंकी गुफासे निकली हुई उन चितकबरी हरिणियोंके समान दिखायी देने लगीं ॥ १० ॥

**तान्युदीर्णानि नारीणां तदा वृन्दान्यनेक turn / शः -> तान्युदीर्णानि नारीणां तदा वृन्दान्यनेकशः । शोकार्तान्यद्रवन् राजन् किशोरीणामिवाङ्गने ॥ ११ ॥ राजन्! राजभवनके विशाल आँगनमें एकत्र हुई उन किशोरी स्त्रियोंके अनेक समुदाय शोकसे पीड़ित होकर रणभूमिकी ओर उसी प्रकार चले, जैसे बछेडियाँ शिक्षाभूमिपर लायी जाती हैं ॥ ११ ॥

प्रगृह्य बाहून् क्रोशन्त्यः पुत्रान् भ्रातृन् पितॄनपि । दर्शयन्तीव ता ह स्म युगान्ते लोकसंक्षयम् ॥ १२ ॥ एक-दूसरीके हाथ पकड़कर पुत्रों, भाइयों और पिताओंके नाम ले-लेकर रोती हुई वे कुरुकुलकी नारियाँ प्रलयकालमें लोक-संहारका दृश्य दिखाती हुई-सी जान पड़ती थीं ॥ १२ ॥

विलपन्त्यो रुदत्यश्च धावमानास्ततस्ततः । शोकेनोपहतज्ञानाः कर्तव्यं न प्रजज्ञिरे ॥ १३ ॥ शोकसे उनकी ज्ञानशक्ति लुप्त-सी हो गयी थी। वे रोती और विलाप करती हुई इधर-उधर दौड़ रही थीं। उन्हें कोई कर्तव्य नहीं सूझ रहा था ॥ १३ ॥

व्रीडां जग्मुः पुरा याः स्म सखीनामपि योषितः । ता एकवस्त्रा निर्लज्जाः श्वश्रूणां पुरतोऽभवन् ॥ १४ ॥

जो युवतियाँ पहले सखियोंके सामने आनेमें भी लजाती थीं, वे ही उस दिन लाज छोड़कर एक वस्त्र धारण किये अपनी सासुओंके सामने उपस्थित हो गयी थीं ॥ १४ ॥

परस्परं सुसूक्ष्मेषु शोकेष्वाश्वासयंस्तदा ।
ताः शोकविह्वला राजन्नवैक्षन्त परस्परम् ॥ १५ ॥
राजन्! जो नारियाँ छोटे-से-छोटे शोकमें भी एक दूसरीके पास जाकर आश्वासन दिया करती थीं, वे ही शोकसे व्याकुल हो परस्पर दृष्टिपातमात्र कर रही थीं ॥

ताभिः परिवृतो राजा रुदतीभिः सहस्रशः ।
निर्ययौ नगराद् दीनस्तूर्णमायोधनं प्रति ॥ १६ ॥
उन रोती हुई सहस्रों स्त्रियोंसे घिरे हुए दुःखी राजा धृतराष्ट्र नगरसे युद्धस्थलमें जानेके लिये तुरंत निकल पड़े ॥ १६ ॥

शिल्पिनो वणिजो वैश्याः सर्वकर्मोपजीविनः ।
ते पार्थिवं पुरस्कृत्य निर्ययुर्नगराद् बहिः ॥ १७ ॥
कारीगर, व्यापारी वैश्य तथा सब प्रकारके कर्मोंसे जीवन-निर्वाह करनेवाले लोग राजाको आगे करके नगरसे बाहर निकले ॥ १७ ॥

तासां विक्रोशमानानामार्तानां कुरुसंक्षये ।
प्रादुरासीन्महान् शब्दो व्यथयन् भुवनान्युत ॥ १८ ॥
कौरवोंका संहार हो जानेपर आर्तभावसे रोती और विलपती हुई उन नारियोंका महान् आर्तनाद सम्पूर्ण लोकोंको व्यथित करता हुआ प्रकट होने लगा ॥ १८ ॥

युगान्तकाले सम्प्राप्ते भूतानां दह्यतामिव ।
अभावः स्यादयं प्राप्त इति भूतानि मेनिरे ॥ १९ ॥
प्रलयकाल आनेपर दग्ध होते हुए प्राणियोंके चीखने-चिल्लानेके समान उन स्त्रियोंके रोनेका वह महान् शब्द गूँज रहा था। सब प्राणी ऐसा समझने लगे कि यह संहारकाल आ पहुँचा है ॥ १९ ॥

भृशमुद्विग्नमनसस्ते पौराः कुरुसंक्षये ।
प्राक्रोशन्त महाराज स्वनुरक्तास्तदा भृशम् ॥ २० ॥
महाराज! कुरुकुलका संहार हो जानेसे अत्यन्त उद्विग्नचित्त हुए पुरवासी जो राजवंशके साथ पूर्ण अनुराग रखते थे, जोर-जोरसे रोने लगे ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्गमने दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रका नगरसे निकलनाविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥

अध्याय (पृष्ठ 3147)

एकादशोऽध्यायः

राजा धृतराष्ट्रसे कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्माकी भेंट और कृपाचार्यका कौरव-पाण्डवोंकी सेनाके विनाशकी सूचना देना

वैशम्पायन उवाच

क्रोशमात्रं ततो गत्वा ददृशुस्तान् महारथान् ।
शारद्वतं कृपं द्रौणिं कृतवर्माणमेव च ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वे सब लोग हस्तिनापुरसे एक ही कोसकी दूरीपर पहुँचे होंगे कि उन्हें शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य, द्रोणकुमार अश्वत्थामा और कृतवर्मा—ये तीनों महारथी दिखायी दिये ॥ १ ॥

ते तु दृष्ट्वैव राजानं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् ।
अश्रुकण्ठा विनिःश्वस्य रुदन्तमिदमब्रुवन् ॥ २ ॥
रोते हुए ऐश्वर्यशाली प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रको देखते ही आँसुओंसे उनका गला भर आया और वे इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥

पुत्रस्तव महाराज कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
गतः सानुचरो राजन् शक्रलोकं महीपते ॥ ३ ॥
‘पृथ्वीनाथ महाराज! आपका पुत्र अत्यन्त दुष्कर कर्म करके अपने सेवकोंसहित इन्द्रलोकमें जा पहुँचा है ॥ ३ ॥

दुर्योधनबलान्मुक्ता वयमेव त्रयो रथाः ।
सर्वमन्यत् परिक्षीणं सैन्यं ते भरतर्षभ ॥ ४ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! दुर्योधनकी सेनासे केवल हम तीन रथी ही जीवित बचे हैं। आपकी अन्य सारी सेना नष्ट हो गयी’ ॥ ४ ॥

इत्येवमुक्त्वा राजानं कृपः शारद्वतस्ततः ।
गान्धारीं पुत्रशोकार्तामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
राजा धृतराष्ट्रसे ऐसा कहकर शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य पुत्रशोकसे पीड़ित हुई गान्धारीसे इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥

अभीता युद्ध्यमानास्ते घ्नन्तः शत्रुगणान् बहून् ।
वीरकर्माणि कुर्वाणाः पुत्रास्ते निधनं गताः ॥ ६ ॥
‘देवि! आपके सभी पुत्र निर्भय होकर जूझते और बहुसंख्यक शत्रुओंका संहार करते हुए वीरोचित कर्म करके वीरगतिको प्राप्त हुए हैं ॥ ६ ॥

ध्रुवं सम्प्राप्य लोकांस्ते निर्मलान् शस्त्रनिर्जितान् । भास्वरं देहमास्थाय विहरन्त्यमरा इव ॥ ७ ॥ ‘निश्चय ही वे शस्त्रोंद्वारा जीते हुए निर्मल लोकोंमें पहुँचकर तेजस्वी शरीर धारण करके वहाँ देवताओंके समान विहार करते होंगे ॥ ७ ॥ न हि कश्चिद्धि शूराणां युद्ध्यमानः पराङ्मुखः । शस्त्रेण निधनं प्राप्तो न च कश्चित् कृताञ्जलिः ॥ ८ ॥ ‘उन शूरवीरोंमेंसे कोई भी युद्ध करते समय पीठ नहीं दिखा सका है। किसीने भी शत्रुके सामने हाथ नहीं जोड़े हैं। सभी शस्त्रके द्वारा मारे गये हैं ॥ ८ ॥ एवं तां क्षत्रियस्याहुः पुराणाः परमां गतिम् । शस्त्रेण निधनं संख्ये तन्न शोचितुमर्हसि ॥ ९ ॥ ‘इस प्रकार युद्धमें जो शस्त्रद्वारा मृत्यु होती है, उसे प्राचीन महर्षि क्षत्रियके लिये उत्तम गति बताते हैं; अतः उनके लिये आपको शोक नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥ न चापि शत्रवस्तेषामृद्ध्यन्ते राज्ञि पाण्डवाः । शृणु यत् कृतमस्माभिरश्वत्थामपुरोगमैः ॥ १० ॥ ‘महारानी! उनके शत्रु पाण्डव भी विशेष लाभमें नहीं हैं। अश्वत्थामाको आगे करके हमने जो कुछ किया है, उसे सुनिये ॥ १० ॥ अधर्मेण हतं श्रुत्वा भीमसेनेन ते सुतम् । सुप्तं शिबिरमासाद्य पाण्डूनां कदनं कृतम् ॥ ११ ॥ ‘भीमसेनेने आपके पुत्रको अधर्मसे मारा है, यह सुनकर हमलोग भी पाण्डवोंके सोते हुए शिविरमें जा पहुँचे और पाण्डववीरोंका संहार कर डाला ॥ ११ ॥ पञ्चाला निहताः सर्वे धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रौपदेयाश्च पातिताः ॥ १२ ॥ ‘द्रुपदके पुत्र धृष्टद्युम्न आदि सारे पांचाल मार डाले गये और द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंको भी हमने मार गिराया ॥ तथा विशसनं कृत्वा पुत्रशत्रुगणस्य ते । प्राद्रवाम रणे स्थातुं न हि शक्ष्यामहे त्रयः ॥ १३ ॥ ‘इस प्रकार आपके पुत्रके शत्रुओंका रणभूमिमें संहार करके हम तीनों भागे जा रहे हैं। अब यहाँ ठहर नहीं सकते ॥ १३ ॥ ते हि शूरा महेष्वासाः क्षिप्रमेष्यन्ति पाण्डवाः । अमर्षवशमापन्ना वैरं प्रतिजिहीर्षवः ॥ १४ ॥ ‘क्योंकि अमर्षमें भरे हुए वे महाधनुर्धर वीर पाण्डव वैरका बदला लेनेकी इच्छासे शीघ्र यहाँ आयेंगे ॥ १४ ॥ ते हतानात्मजान् श्रुत्वाप्रमत्ताः पुरुषर्षभाः ।

निरीक्षन्तः पदं शूराः क्षिप्रमेव यशस्विनि ॥ १५ ॥ 'यशस्विनि! अपने पुत्रोंके मारे जानेका समाचार सुनकर सदा सावधान रहनेवाले पुरुषप्रवर पाण्डव हमारा चरणचिह्न देखते हुए शीघ्र ही हमलोगोंका पीछा करेंगे ॥ तेषां तु कदनं कृत्वा संस्थातुं नोत्सहामहे । अनुजानीहि नो राज्ञि मा च शोके मनः कृथाः ॥ १६ ॥ 'रानीजी! उनके पुत्रों और सम्बन्धियोंका विनाश करके हम यहाँ ठहर नहीं सकते; अतः हमें जानेकी आज्ञा दीजिये और आप भी अपने मनसे शोकको निकाल दीजिये ॥ राजंस्त्वमनुजानीहि धैर्यमातिष्ठ चोत्तमम् । दिष्टान्तं पश्य चापि त्वं क्षात्रं धर्मं च केवलम् ॥ १७ ॥ (फिर वे धृतराष्ट्रसे बोले—) 'राजन्! आप भी हमें जानेकी आज्ञा प्रदान करें और महान् धैर्यका आश्रय लें, केवल क्षात्रधर्मपर दृष्टि रखकर इतना ही देखें कि उनकी मृत्यु कैसे हुई है?' ॥ १७ ॥ इत्येवमुक्त्वा राजानं कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्च भारत ॥ १८ ॥ अवेक्षमाणा राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् । गङ्गामनु महाराज तूर्णमश्वानचोदयन् ॥ १९ ॥ भारत! राजासे ऐसा कहकर उनकी प्रदक्षिणा करके कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामाने मनीषी राजा धृतराष्ट्रकी ओर देखते हुए तुरंत ही गङ्गातटकी ओर अपने घोड़े हाँक दिये ॥ १८-१९ ॥ अपक्रम्य तु ते राजन् सर्व एव महारथाः । आमन्त्र्यान्योन्यमुद्विग्नास्त्रिधा ते प्रययुस्तदा ॥ २० ॥ राजन्! वहाँसे हटकर वे सभी महारथी उद्विग्न हो एक-दूसरेसे विदा ले तीन मार्गोंपर चल दिये ॥ २० ॥ जगाम हास्तिनपुरं कृपः शारद्वतस्तदा । स्वमेव राष्ट्रं हार्दिक्यो द्रौणिर्व्यासाश्रमं ययौ ॥ २१ ॥ शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्य तो हस्तिनापुर चले गये, कृतवर्मा अपने ही देशकी ओर चल दिया और द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने व्यास-आश्रमकी राह ली ॥ २१ ॥ एवं ते प्रययुर्वीरा वीक्षमाणाः परस्परम् । भयार्ताः पाण्डुपुत्राणामागस्कृत्वा महात्मनाम् ॥ २२ ॥ महात्मा पाण्डवोंका अपराध करके भयसे पीड़ित हुए वे तीनों वीर इस प्रकार एक-दूसरेकी ओर देखते हुए वहाँसे खिसक गये ॥ २२ ॥ समेत्य वीरा राजानं तदा त्वनुदिते रवौ । विप्रजग्मुर्महात्मानो यथेच्छकमरिंदमाः ॥ २३ ॥

राजा धृतराष्ट्रसे मिलकर शत्रुओंका दमन करनेवाले वे तीनों महामनस्वी वीर सूर्योदयसे पहले ही अपने अभीष्ट स्थानोंकी ओर चल पड़े ।। २३ ।।
समासाद्याथ वै द्रौणिं पाण्डुपुत्रा महारथाः ।
व्यजयंस्ते रणे राजन् विक्रम्य तदनन्तरम् ।। २४ ।।
राजन्! तदनन्तर महारथी पाण्डवोंने द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके पास पहुँचकर उसे बलपूर्वक युद्धमें पराजित किया ।। २४ ।।

इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि कृपद्रौणिभोजदर्शने
एकादशोऽध्यायः ।। ११ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्माका दर्शनविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११ ।।

अध्याय (पृष्ठ 3151)

द्वादशोऽध्यायः

पाण्डवोंका धृतराष्ट्रसे मिलना, धृतराष्ट्रके द्वारा भीमकी लोहमयी प्रतिमाका भंग होना और शोक करनेपर श्रीकृष्णका उन्हें समझाना

वैशम्पायन उवाच

हतेषु सर्वसैन्येषु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
शुश्रुवे पितरं वृद्धं निर्यान्तं गजसाह्वयात् ॥ १ ॥
सोऽभ्ययात् पुत्रशोकार्तः पुत्रशोकपरिप्लुतम् ।
शोचमानं महाराज भ्रातृभिः सहितस्तदा ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज जनमेजय! समस्त सेनाओंका संहार हो जानेपर धर्मराज युधिष्ठिरने जब सुना कि हमारे बूढ़े ताऊ संग्राममें मरे हुए वीरोंका अन्त्येष्टिकर्म करानेके लिये हस्तिनापुरसे चल दिये हैं, तब वे स्वयं पुत्रशोकसे आतुर हो पुत्रोंके ही शोकमें डूबकर चिन्तामग्न हुए राजा धृतराष्ट्रके पास अपने सब भाइयोंके साथ गये ।। १-२ ।।
अन्वीयमानो वीरेण दाशार्हेण महात्मना ।
युयुधानेन च तथा तथैव च युयुत्सुना ॥ ३ ॥
उस समय दशार्हकुलनन्दन वीर महात्मा श्रीकृष्ण, सात्यकि और युयुत्सु भी उनके पीछे-पीछे गये ।। ३ ।।
तमन्वगात् सुदुःखार्ता द्रौपदी शोककर्शिता ।
सह पाञ्चालयोषिद्भिर्यास्तत्रासन् समागताः ॥ ४ ॥
अत्यन्त दुःखसे आतुर और शोकसे दुबली हुई द्रौपदीने भी वहाँ आयी हुई पांचाल-महिलाओंके साथ उनका अनुसरण किया ।। ४ ।।
स गङ्गामनु वृन्द्वानि स्त्रीणां भरतसत्तम ।
कुररीणामिवार्तानां क्रोशन्तीनां ददर्श ह ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! गंगातटपर पहुँचकर युधिष्ठिरने कुररीकी तरह आर्तस्वरसे विलाप करती हुई स्त्रियोंके कई दल देखे ।। ५ ।।
ताभिः परिवृतो राजा क्रोशन्तीभिः सहस्रशः ।
ऊर्ध्वबाहुभिरार्ताभी रुदतीभिः प्रियाप्रियैः ॥ ६ ॥
वहाँ पाण्डवोंके प्रिय और अप्रिय जनोंके लिये हाथ उठाकर आर्तस्वरसे रोती और करुण क्रन्दन करती हुई सहस्रों महिलाओंने राजा युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेर लिया ।।
क्व नु धर्मज्ञता राज्ञः क्व नु साद्यानृशंसता ।