महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
समझती हूँ, समयके उलट-फेरसे प्रेरित होकर यह सम्पूर्ण जगत्का विनाश हुआ है, जो स्वभावसे ही रोमांचकारी है। यह काण्ड अवश्यम्भावी था, इसीलिये प्राप्त हुआ है। जब संधि करानेके विषयमें श्रीकृष्णकी अनुनय-विनय सफल नहीं हुई, उस समय परम बुद्धिमान् विदुरजीने जो महत्त्वपूर्ण बात कही थी, उसीके अनुसार यह सब कुछ सामने आया है।। ४०—४२ १/२ ।। तस्मिन्नपरिहार्येऽर्थे व्यतीते च विशेषतः ॥ ४३ ॥ मा शुचो न हि शोच्यास्ते संग्रामे निधनं गताः । यथैवाहं तथैव त्वं को नावाश्वासयिष्यति । ममैव ह्यपराधेन कुलमग्र्यं विनाशितम् ॥ ४४ ॥ ‘जब यह विनाश किसी तरह टल नहीं सकता था, विशेषतः जब सब कुछ होकर समाप्त हो गया, तो अब तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। वे सभी वीर संग्राममें मारे गये हैं, अतः शोक करनेके योग्य नहीं हैं। आज जैसी मैं हूँ, वैसी ही तुम भी हो। हम दोनोंको कौन धीरज बँधायेगा? मेरे ही अपराधसे इस श्रेष्ठ कुलका संहार हुआ है’ ।। ४३-४४ ।।
इति श्रीमद्भारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि पृथापुत्रदर्शने पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें कुन्तीको अपने पुत्रोंका दर्शनविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५ ।।
(स्त्रीविलापपर्व)
(स्त्रीविलापपर्व)
षोडशोऽध्यायः
वेदव्यासजीके वरदानसे दिव्य दृष्टिसम्पन्न हुई गान्धारीका युद्धस्थलमें मारे गये योद्धाओं तथा रोती हुई बहुओंको देखकर श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तु गान्धारी कुरूणामवकर्तनम् ।
अपश्यत्तत्र तिष्ठन्ती सर्वं दिव्येन चक्षुषा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर गान्धारी देवीने वहीं खड़ी रहकर अपनी दिव्य दृष्टिसे कौरवोंका वह सारा विनाशस्थल देखा ॥ १ ॥
पतिव्रता महाभागा समानव्रतचारिणी ।
उग्रेण तपसा युक्ता सततं सत्यवादिनी ॥ २ ॥
गान्धारी बड़ी ही पतिव्रता, परम सौभाग्यवती, पतिके समान व्रतका पालन करनेवाली, उग्र तपस्यासे युक्त तथा सदा सत्य बोलनेवाली थीं ॥ २ ॥
वरदानेन कृष्णस्य महर्षेः पुण्यकर्मणः ।
दिव्यज्ञानबलोपेता विविधं पर्यदेवयत् ॥ ३ ॥
पुण्यात्मा महर्षि व्यासके वरदानसे वे दिव्य ज्ञान-बलसे सम्पन्न हो गयी थीं; अतः रणभूमिका दृश्य देखकर अनेक प्रकारसे विलाप करने लगीं ॥ ३ ॥
ददर्श सा बुद्धिमती दूरादपि यथान्तिके ।
रणाजिरं नृवीराणामद्भुतं लोमहर्षणम् ॥ ४ ॥
बुद्धिमती गान्धारीने नरवीरोंके उस अद्भुत एवं रोमांचकारी समरांगणको दूरसे भी उसी तरह देखा, जैसे निकटसे देखा जाता है ॥ ४ ॥
अस्थिकेशवसाकीर्णं शोणितौघपरिप्लुतम् ।
शरीरैर्बहुसाहस्रैर्विनिकीर्णं समन्ततः ॥ ५ ॥
वह रणक्षेत्र हड्डियों, केशों और चर्बियोंसे भरा था, रक्तके प्रवाहसे आप्लावित हो रहा था, कई हजार लाशें वहाँ चारों ओर बिखरी हुई थीं ॥ ५ ॥
गजाश्वरथयोधानामावृतं रुधिराविलैः ।
शरीरैरशिरस्कैश्च विदेहेश्च शिरोगणैः ॥ ६ ॥
हाथीसवार, घुड़सवार तथा रथी योद्धाओंके रक्तसे मलिन हुए बिना सिरके अगणित धड़ और बिना धड़के असंख्य मस्तक उस रणभूमिको ढँके हुए थे ॥ ६ ॥
गजाश्वनरनारीणां निःस्वनैरभिसंवृतम् ।
शृगालबककाकोलकङ्ककाकनिषेवितम् ॥ ७ ॥
हाथियों, घोड़ों, मनुष्यों और स्त्रियोंके आर्तनादसे वह सारा युद्धस्थल गूँज रहा था। सियार, बगुले, काले कौए, कंक और काक उस भूमिका सेवन करते थे ॥ ७ ॥
रक्षसां पुरुषादानां मोदनं कुरराकुलम् ।
अशिवाभिः शिवाभिश्च नादितं गृध्रसेवितम् ॥ ८ ॥
वह स्थान नरभक्षी राक्षसोंको आनन्द दे रहा था। वहाँ सब ओर कुरर पक्षी छा रहे थे। अमंगलमयी गीदड़ियाँ अपनी बोली बोल रही थीं, गीध सब ओर बैठे हुए थे ॥ ८ ॥
ततो व्यासाभ्यनुज्ञातो धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
पाण्डुपुत्राश्च ते सर्वे युधिष्ठिरपुरोगमाः ॥ ९ ॥
उस समय भगवान् व्यासकी आज्ञा पाकर राजा धृतराष्ट्र तथा युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डव रणभूमिकी ओर चले ॥ ९ ॥
वासुदेवं पुरस्कृत्य हतबन्धुं च पार्थिवम् ।
कुरुस्त्रियः समासाद्य जग्मुरायोधनं प्रति ॥ १० ॥
जिनके बन्धु-बान्धव मारे गये थे, उन राजा धृतराष्ट्र तथा भगवान् श्रीकृष्णको आगे करके कुरुकुलकी स्त्रियोंको साथ ले वे सब लोग युद्धस्थलमें गये ॥ १० ॥
समासाद्य कुरुक्षेत्रं ताः स्त्रियो निहतेश्वराः ।
अपश्यन्त हतांस्तत्र पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄन् पतीन् ॥ ११ ॥
क्रव्यादैर्भक्ष्यमाणान् वै गोमायुबलवायसैः ।
भूतैः पिशाचै रक्षोभिर्विविधैश्च निशाचरैः ॥ १२ ॥
कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर उन अनाथ स्त्रियोंने वहाँ मारे गये अपने पुत्रों, भाइयों, पिताओं तथा पतियोंके शरीरोंको देखा, जिन्हें मांसभक्षी जीव-जन्तु, गीदड़समूह, कौए, भूत, पिशाच, राक्षस और नाना प्रकारके निशाचर नोच-नोचकर खा रहे थे ॥ ११-१२ ॥
रुद्राक्रीडनिभं दृष्ट्वा तदा विशसनं स्त्रियः ।
महार्हेभ्योऽथ यानेभ्यो विक्रोशन्त्यो निपेतरे ॥ १३ ॥
रुद्रकी क्रीडास्थलीके समान उस रणभूमिको देखकर वे स्त्रियाँ अपने बहुमूल्य रथोंसे क्रन्दन करती हुई नीचे गिर पड़ीं ॥ १३ ॥
अदृष्टपूर्वं पश्यन्त्यो दुःखार्ता भरतस्त्रियः ।
शरीरेष्वस्खलन्नन्याः पतन्त्यश्चापरा भुवि ॥ १४ ॥
जिसे कभी देखा नहीं था, उस अद्भुत रणक्षेत्रको देखकर भरतकुलकी कुछ स्त्रियाँ दुःखसे आतुर हो लाशोंपर गिर पड़ीं और दूसरी बहुत-सी स्त्रियाँ धरतीपर गिर
गयीं ॥ १४ ॥
श्रान्तानां चाप्यनाथानां नासीत् काचन चेतना ।
पाञ्चालकुरुयोषाणां कृपणं तदभून्महत् ॥ १५ ॥
उन थकी-माँदी और अनाथ हुई पांचालों तथा कौरवोंकी स्त्रियोंको वहाँ चेत नहीं रह गया था। उन सबकी बड़ी दयनीय दशा हो गयी थी ॥ १५ ॥
दुःखोपहतचित्ताभिः समन्तादनुनादितम् ।
दृष्ट्वाऽऽयोधनमत्युग्रं धर्मज्ञा सुबलात्मजा ॥ १६ ॥
ततः सा पुण्डरीकाक्षमामन्त्र्य पुरुषोत्तमम् ।
कुरूणां वैशसं दृष्ट्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥
दुःखसे व्याकुलचित्त हुई युवतियोंके करुण-क्रन्दनसे वह अत्यन्त भयंकर युद्धस्थल सब ओरसे गूँज उठा। यह देखकर धर्मको जाननेवाली सुबलपुत्री गान्धारीने कमलनयन श्रीकृष्णको सम्बोधित करके कौरवोंके उस विनाशपर दृष्टिपात करते हुए कहा—॥ १६-१७ ॥
पश्यैताः पुण्डरीकाक्ष स्नुषा मे निहतेश्वराः ।
प्रकीर्णकेशाः क्रोशन्तीः कुररीरिव माधव ॥ १८ ॥
‘कमलनयन माधव! मेरी इन विधवा पुत्रवधुओंकी ओर देखो, जो केश बिखराये कुररीकी भाँति विलाप कर रही हैं ॥ १८ ॥
अमूस्त्वभिसमागम्य स्मरन्त्यो भर्तृजान् गुणान् ।
पृथगेवाभ्यधावन्त्यः पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄन् पतीन् ॥ १९ ॥
‘वे अपने पतियोंके गुणोंका स्मरण करती हुई उनकी लाशोंके पास जा रही हैं और पतियों, भाइयों, पिताओं तथा पुत्रोंके शरीरोंकी ओर पृथक्-पृथक् दौड़ रही हैं ॥ १९ ॥
वीरसूभिर्महाराज हतपुत्राभिरावृतम् ।
क्वचिच्च वीरपत्नीभिर्हतवीराभिरावृतम् ॥ २० ॥
‘महाराज! कहीं तो जिनके पुत्र मारे गये हैं उन वीरप्रसविनी माताओंसे और कहीं जिनके पति वीरगतिको प्राप्त हो गये हैं, उन वीरपत्नियोंसे यह युद्धस्थल घिर गया है ॥ २० ॥
शोभितं पुरुषव्याघ्रैः कर्णभीष्माभिमन्युभिः ।
द्रोणद्रुपदशल्यैश्च ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥ २१ ॥
‘पुरुषसिंह कर्ण, भीष्म, अभिमन्यु, द्रोण, द्रुपद और शल्य-जैसे वीरोंसे, जो प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी थे, यह रणभूमि सुशोभित है ॥ २१ ॥
काञ्चनैः कवचैर्निष्कैर्मणिभिश्च महात्मनाम् ।
अङ्गदैर्हस्तकेयूरैः स्रग्भिश्च समलङ्कृतम् ॥ २२ ॥
‘उन महामनस्वी वीरोंके सुवर्णमय कवचों, निष्कों, मणियों, अंगदों, केयूरों और हारोंसे समरांगण विभूषित दिखायी देता है ।। २२ ।। वीरबाहुविसृष्टाभिः शक्तिभिः परिघैरपि । खड्गैश्च विविधैस्तीक्ष्णैः सशरैश्च शरासनैः ।। २३ ।। क्रव्यादसंघैर्मुदितैस्तिष्ठद्भिः सहितैः क्वचित् । क्वचिदाक्रीडमानैश्च शयानैश्चापरैः क्वचित् ।। २४ ।। एतदेवंविधं वीर सम्पश्यायोधनं विभो । पश्यमाना हि दह्यामि शोकेनाहं जनार्दन ।। २५ ।। ‘कहीं वीरोंकी भुजाओंसे छोड़ी गयी शक्तियाँ पड़ी हैं, कहीं परिघ, नाना प्रकारके तीखे खड्ग और बाणसहित धनुष गिरे हुए हैं। कहीं झुंड-के-झुंड मांसभक्षी जीव-जन्तु आनन्दमग्न होकर एक साथ खड़े हैं, कहीं वे खेल रहे हैं और कहीं दूसरे-दूसरे जन्तु सोये पड़े हैं। वीर! प्रभो! इस प्रकार इन सबसे भरे हुए युद्धस्थलको देखो। जनार्दन! मैं तो इसे देखकर शोकसे दग्ध हुई जाती हूँ ।। २३—२५ ।। पञ्चालानां कुरूणां च विनाशे मधुसूदन । पञ्चानामपि भूतानामहं वधमचिन्तयम् ।। २६ ।। ‘मधुसूदन! इन पांचाल और कौरववीरोंके मारे जानेसे तो मेरे मनमें यह धारणा हो रही है कि पाँचों भूतोंका ही विनाश हो गया ।। २६ ।। तान् सुपर्णाश्च गृध्राश्च कर्षयन्त्यसृगुक्षिताः । विगृह्य चरणैर्गृध्रा भक्षयन्ति सहस्रशः ।। २७ ।। ‘उन वीरोंको खूनसे भीगे हुए गरुड़ और गीध इधर-उधर खींच रहे हैं। सहस्रों गीध उनके पैर पकड़-पकड़कर खा रहे हैं ।। २७ ।। जयद्रथस्य कर्णस्य तथैव द्रोणभीष्मयोः । अभिमन्योर्विनाशं च कश्चिन्तयितुमर्हति ।। २८ ।। ‘इस युद्धमें जयद्रथ, कर्ण, द्रोणाचार्य, भीष्म और अभिमन्यु-जैसे वीरोंका विनाश हो जायगा, यह कौन सोच सकता था? ।। २८ ।। अवध्यकल्पान् निहतान् गतसत्त्वानचेतसः । गृध्रकङ्कवटश्येनश्वशृगालादनीकृतान् ।। २९ ।। ‘जो अवध्य समझे जाते थे, वे भी मारे गये और अचेत एवं प्राणशून्य होकर यहाँ पड़े हैं। गीध, कंक, बटेर, बाज, कुत्ते और सियार उन्हें अपना आहार बना रहे हैं ।। २९ ।। अमर्षवशमापन्नान् दुर्योधनवशे स्थितान् । पश्येमान् पुरुषव्याघ्रान् संशान्तान् पावकानिव ।। ३० ।। ‘दुर्योधनके अधीन रहकर अमर्षके वशीभूत हो ये पुरुषसिंह वीरगण बुझी हुई आगके समान शान्त हो गये हैं। इनकी ओर दृष्टिपात तो करो ।। ३० ।।
शयाना ये पुरा सर्वे मृदूनि शयनानि च ।
विपन्नास्तेऽद्य वसुधां विवृतामधिशेरते ॥ ३१ ॥
'जो लोग पहले कोमल बिछौनोंपर सोया करते थे, वे सभी आज मरकर नंगी भूमिपर सो रहे हैं ॥ ३१ ॥
बन्दिभिः सततं काले स्तुवद्भिरभिनन्दिताः ।
शिवानाम्शिवा घोराः शृण्वन्ति विविधा गिरः ॥ ३२ ॥
'जिन्हें सदा ही समय-समयपर स्तुति करनेवाले बन्दीजन अपने वचनोंद्वारा आनन्दित करते थे, वे ही अब सियारिनोंकी अमंगलसूचक भाँति-भाँतिकी बोलियाँ सुन रहे हैं ॥ ३२ ॥
ये पुरा शेरते वीराः शयनेषु यशस्विनः ।
चन्दनागुरुदिग्धाङ्गास्तेऽद्य पांसुषु शेरते ॥ ३३ ॥
'जो यशस्वी वीर पहले अपने अंगोंमें चन्दन और अगुरुचूर्णसे चर्चित हो सुखदायिनी शय्याओंपर सोते थे, वे ही आज धूलमें लोट रहे हैं ॥ ३३ ॥
तेषामाभरणान्येते गृध्रगोमायुवायसाः ।
आक्षिपन्ति शिवा घोरा विनदन्त्यः पुनः पुनः ॥ ३४ ॥
'उनके आभूषणोंको ये गीध, गीदड़, कौए और भयानक गीदड़ियाँ बारंबार चिल्लाती हुई इधर-उधर फेंकती हैं ॥ ३४ ॥
बाणान् विनिशितान् पीतान् निस्त्रिंशान् विमला गदाः ।
युद्धाभिमानिनः सर्वे जीवन्त इव बिभ्रति ॥ ३५ ॥
'ये सभी युद्धाभिमानी वीर जीवित पुरुषोंकी भाँति इस समय भी तीखे बाण, पानीदार तलवार और चमकीली गदाएँ हाथोंमें लिये हुए हैं ॥ ३५ ॥
सुरूपवर्णा बहवः क्रव्यादैरवघट्टिताः ।
ऋषभप्रतिरूपाश्च शेरते हरितस्रजः ॥ ३६ ॥
'सुन्दर रूप और कान्तिवाले, साँड़ोंके समान हृष्ट-पुष्ट तथा हरे रंगके हार पहने हुए बहुत-से योद्धा यहाँ सोये पड़े हैं और मांसभक्षी जन्तु इन्हें उलट-पलट रहे हैं ॥ ३६ ॥
अपरे पुनरालिङ्ग्य गदाः परिघबाहवः ।
शेरतेऽभिमुखाः शूरा दयिता इव योषितः ॥ ३७ ॥
'परिघके समान मोटी बाँहोंवाले दूसरे शूरवीर प्रेयसी युवतियोंकी भाँति गदाओंका आलिंगन करके सम्मुख सो रहे हैं ॥ ३७ ॥
बिभ्रतः कवचान्यन्ये विमलान्यायुधानि च ।
न धर्षयन्ति क्रव्यादा जीवन्तीति जनार्दन ॥ ३८ ॥
'जनार्दन! बहुत-से योद्धा चमकीले कवच और आयुध धारण किये हुए हैं, जिससे उन्हें जीवित समझकर मांसभक्षी जन्तु उनपर आक्रमण नहीं करते हैं ॥ ३८ ॥
क्रव्यादैः कृष्यमाणानामपरेषां महात्मनाम् । शातकौम्भ्यः स्रजश्चित्रा विप्रकीर्णाः समन्ततः ॥ ३९ ॥ 'दूसरे महामनस्वी वीरोंको मांसाहारी जीव इधर-उधर खींच रहे हैं, जिससे सोनेकी बनी हुई उनकी विचित्र मालाएँ सब ओर बिखर गयी हैं ॥ ३९ ॥
एते गोमायवो भीमा निहतानां यशस्विनाम् । कण्ठान्तरगतान् हारानाक्षिपन्ति सहस्रशः ॥ ४० ॥ 'यहाँ मारे गये यशस्वी वीरोंके कण्ठमें पड़े हुए हारोंको ये सहस्रों भयानक गीदड़ खींचते और झटकते हैं ॥ ४० ॥
सर्वेष्वपररात्रेषु यानानन्दन्त बन्दिनः । स्तुतिभिश्च पराग्र्याभिरुपचारैश्च शिक्षिताः ॥ ४१ ॥ तानिमाः परिदेवन्ति दुःखार्ताः परमाङ्गनाः । कृपणं वृष्णिशार्दूल दुःखशोकार्दिता भृशम् ॥ ४२ ॥ 'वृष्णिसिंह! प्रायः प्रत्येक रात्रिके पिछले पहरमें सुशिक्षित बन्दीजन उत्तम स्तुतियों और उपचारोंद्वारा जिन्हें आनन्दित करते थे, उन्हींके पास आज ये दुःख और शोकसे अत्यन्त पीड़ित हुई सुन्दरी युवतियाँ करुण विलाप कर रही हैं ॥ ४१-४२ ॥
रक्तोत्पलवनानीव विभान्ति रुचिराणि च । मुखानि परमस्त्रीणां परिशुष्काणि केशव ॥ ४३ ॥ 'केशव! इन सुन्दरियोंके सूखे हुए सुन्दर मुख लाल कमलोंके समूहकी भाँति शोभा पा रहे हैं ॥ ४३ ॥
रुदिताद् विरता ह्येता ध्यायन्त्यः सपरिच्छदाः । कुरुस्त्रियोऽभिगच्छन्ति तेन तेनैव दुःखिताः ॥ ४४ ॥ 'ये कुरुकुलकी स्त्रियाँ रोना बंद करके स्वजनोंका चिन्तन करती हुई परिजनोंसहित उन्हींकी खोजमें जाती और दुःखी होकर उन-उन व्यक्तियोंसे मिल रही हैं ॥ ४४ ॥
एतान्यादित्यवर्णानि तपनीयनिभानि च । रोषरोदनताम्राणि वक्त्राणि कुरुयोषिताम् ॥ ४५ ॥ 'कौरववंशकी युवतियोंके ये सूर्य और सुवर्णके समान कान्तिमान् मुख रोष और रोदनसे ताम्रवर्णके हो गये हैं ।।
श्यामानां वरवर्णानां गौरीणामेकवाससाम् । दुर्योधनवरस्त्रीणां पश्य वृन्दानि केशव ॥ ४६ ॥ 'केशव! सुन्दर कान्तिसे सम्पन्न, एकवस्त्रधारिणी तथा श्याम-गौरवर्णवाली दुर्योधनकी इन सुन्दरी स्त्रियोंकी टोलियोंको देखो ॥ ४६ ॥
आसामपरिपूर्णार्थं निशम्य परिदेवितम् । इतरेतरसंक्रन्दान्न विजानन्ति योषितः ॥ ४७ ॥
'एक-दूसरीकी रोदन-ध्वनिसे मिल जानेके कारण इनके विलापका अर्थ पूर्णरूपसे समझमें नहीं आता, उसे सुनकर अन्य स्त्रियाँ भी कुछ नहीं समझ पाती हैं।। एता दीर्घमिवोच्छ्वस्य विक्रुश्य च विलप्य च। विस्पन्दमाना दुःखेन वीरा जहति जीवितम्॥ ४८॥ 'ये वीर वनिताएँ लंबी साँस खींचकर स्वजनोंको पुकार-पुकारकर करुण विलाप करके दुःखसे छटपटाती हुई अपने प्राण त्याग देना चाहती हैं।। ४८।। बह्व्यो दृष्ट्वा शरीराणि क्रोशन्ति विलपन्ति च। पाणिभिश्चापरा घ्नन्ति शिरांसि मृदुपाणयः॥ ४९॥ 'बहुत-सी स्त्रियाँ स्वजनोंकी लाशोंको देखकर रोती, चिल्लाती और विलाप करती हैं। कितनी ही कोमल हाथोंवाली कामिनियाँ अपने हाथोंसे सिर पीट रही हैं।। शिरोभिः पतितैर्हस्तैः सर्वाङ्गैर्यूथशः कृतैः। इतरेतरसम्पृक्तैराकीर्णा भाति मेदिनी॥ ५०॥ 'कटकर गिरे हुए मस्तकों, हाथों और सम्पूर्ण अंगोंके ढेर लगे हैं। वे सभी एकके ऊपर एक करके पड़े हैं। उनसे यहाँकी सारी पृथ्वी ढँकी हुई जान पड़ती है।। विशिरस्कानथो कायान् दृष्ट्वा ह्येताननिन्दितान्। मुह्यन्त्यनुगता नार्यो विदेहानि शिरांसि च॥ ५१॥ 'इन बिना मस्तकके सुन्दर धड़ों और बिना धड़के मस्तकोंको देख-देखकर ये अनुगामिनी स्त्रियाँ मूर्च्छित-सी हो रही हैं।। ५१।। शिरः कायेन संधाय प्रेक्षमाणा विचेतसः। अपश्यन्त्योऽपरं तत्र नेदमस्येति दुःखिताः॥ ५२॥ 'कितनी ही अचेत-सी होकर स्वजनोंकी खोज करनेवाली स्त्रियाँ एक मस्तकको निकटवर्ती धड़के साथ जोड़ करके देखती हैं और जब वह मस्तक उससे नहीं जुड़ता तथा दूसरा कोई मस्तक वहाँ देखनेमें नहीं आता तो वे दुःखी होकर कहने लगती हैं कि यह तो उनका सिर नहीं है।। ५२।। बाहूरुचरणानन्यान् विशिखोन्मथितान् पृथक्। संदधत्योऽसुखाविष्टा मूर्च्छन्त्येताः पुनः पुनः॥ ५३॥ 'बाणोंसे कट-कटकर अलग हुई बाँहों, जाँघों और पैरोंको जोड़ती हुई ये दुःखी अबलाएँ बारंबार मूर्च्छित हो जाती हैं।। ५३।। उत्कृत्तशिरसश्चान्यान् विजग्धान् मृगपक्षिभिः। दृष्ट्वा काश्चिन्न जानन्ति भर्तॄन् भरतयोषितः॥ ५४॥ 'कितनी ही लाशोंके सिर कटकर गायब हो गये हैं, कितनोंको मांसभक्षी पशुओं और पक्षियोंने खा डाला है; अतः उनको देखकर भी ये हमारे ही पति हैं, इस रूपमें भरतकुलकी स्त्रियाँ पहचान नहीं पाती हैं।। ५४।।
पाणिभिश्चापरा घ्नन्ति शिरांसि मधुसूदन । प्रेक्ष्य भ्रातॄन् पितॄन् पुत्रान् पतींश्च निहतान् परैः ॥ ५५ ॥ ‘मधुसूदन! देखो, बहुत-सी स्त्रियाँ शत्रुओंद्वारा मारे गये भाइयों, पिताओं, पुत्रों और पतियोंको देखकर अपने हाथोंसे सिर पीट रही हैं ॥ ५५ ॥
बाहुभिश्च सखड्गैश्च शिरोभिश्च सकुण्डलैः । अगम्यकल्पा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥ ५६ ॥ ‘खड्गयुक्त भुजाओं और कुण्डलोंसहित मस्तकोंसे ढँकी हुई इस पृथ्वीपर चलना-फिरना असम्भव हो गया है। यहाँ मांस और रक्तकी कीच जम गयी है ॥ ५६ ॥
न दुःखेषूचिताः पूर्वं दुःखं गाहन्त्यनिन्दिताः । भ्रातृभिः पतिभिः पुत्रैरूपाकीर्णा वसुंधरा ॥ ५७ ॥ ‘ये सती साध्वी सुन्दरी स्त्रियाँ पहले कभी ऐसे दुःखमें नहीं पड़ी थीं; किंतु आज दुःखके समुद्रमें डूब रही हैं। यह सारी पृथ्वी इनके भाइयों, पतियों और पुत्रोंसे ढँक गयी है ॥ ५७ ॥
यूथानीव किशोरीणां सुकेशीनां जनार्दन । स्नुषाणां धृतराष्ट्रस्य पश्य वृन्दान्यनेक Unix? -> वृन्दान्यनेक अनेकशः ॥ ५८ ॥ ‘जनार्दन! देखो, महाराज धृतराष्ट्रकी सुन्दर केशोंवाली पुत्रवधुओंकी ये कई टोलियाँ बछेड़ियोंके झुंडके समान दिखायी दे रही हैं ॥ ५८ ॥
इतो दुःखतरं किं नु केशव प्रतिभाति मे । यदिमाः कुर्वते सर्वा रवमुच्चावचं स्त्रियः ॥ ५९ ॥ ‘केशव! मेरे लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा कि ये सारी बहुएँ यहाँ आकर अनेक प्रकारसे आर्तनाद कर रही हैं ॥ ५९ ॥
नूनमाचरितं पापं मया पूर्वेषु जन्मसु । या पश्यामि हतान् पुत्रान् पौत्रान् भ्रातॄंश्च माधव ॥ ६० ॥ ‘माधव! निश्चय ही मैंने पूर्वजन्मोंमें कोई बड़ा भारी पाप किया है, जिससे आज अपने पुत्रों, पौत्रों और भाइयोंको यहाँ मारा गया देख रही हूँ' ॥ ६० ॥
एवमार्ता विलपती समाभाष्य जनार्दनम् । गान्धारी पुत्रशोकार्ता ददर्श निहतं सुतम् ॥ ६१ ॥ भगवान् श्रीकृष्णको सम्बोधित करके पुत्रशोकसे व्याकुल हो इस प्रकार आर्तविलाप करती हुई गान्धारीने युद्धमें मारे गये अपने पुत्र दुर्योधनको देखा ॥ ६१ ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि आयोधनदर्शने षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें युद्धदर्शनविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६ ।।
अध्याय (पृष्ठ 3181)
सप्तदशोऽध्यायः
दुर्योधन तथा उसके पास रोती हुई पुत्रवधूको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप
वैशम्पायन उवाच
दुर्योधनं हतं दृष्ट्वा गान्धारी शोककर्शिता ।
सहसा न्यपतद् भूमौ छिन्नेव कदली वने ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! दुर्योधनको मारा गया देखकर शोकसे पीड़ित हुई गान्धारी वनमें कटे हुए केलेके वृक्षकी तरह सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ीं ॥ १ ॥
सा तु लब्ध्वा पुनः संज्ञां विक्रुश्य च विलप्य च ।
दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य शयानं रुधिरोक्षितम् ॥ २ ॥
परिष्वज्य च गान्धारी कृपणं पर्यदेवयत् ।
हा हा पुत्रेति शोकार्ता विललापाकुलेन्द्रिया ॥ ३ ॥
पुनः होशमें आनेपर अपने पुत्रको पुकार-पुकारकर वे विलाप करने लगीं। दुर्योधनको खूनसे लथपथ होकर सोया देख उसे हृदयसे लगाकर गान्धारी दीन होकर रोने लगीं। उनकी सारी इन्द्रियाँ व्याकुल हो उठी थीं। वे शोकसे आतुर हो ‘हा पुत्र! हा पुत्र!’ कहकर विलाप करने लगीं ॥ २-३ ॥
सुगूढजत्रुविपुलं हारनिष्कविभूषितम् ।
वारिणा नेत्रजेनोरः सिंचन्ती शोकतापिता ॥ ४ ॥
दुर्योधनके गलेकी विशाल हड्डी मांससे छिपी हुई थी। उसने गलेमें हार और निष्क पहन रखे थे। उन आभूषणोंसे विभूषित बेटेके वक्षःस्थलको आँसुओंसे सींचती हुई गान्धरी शोकाग्निसे संतप्त हो रही थीं ॥ ४ ॥
समीपस्थं हृषीकेशमिदं वचनमब्रवीत् ।
उपस्थितेऽस्मिन् संग्रामे ज्ञातीनां संक्षये विभो ॥ ५ ॥
मामयं प्राह वार्ष्णेय प्राञ्जलिर्नृपसत्तमः ।
अस्मिन् ज्ञातिसमुद्धर्षे जयमम्बा ब्रवीतु मे ॥ ६ ॥
वे पास ही खड़े हुए श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहने लगीं—‘वृष्णिनन्दन! प्रभो! भाई-बन्धुओंका विनाश करनेवाला जब यह भीषण संग्राम उपस्थित हुआ था, उस समय इस नृपश्रेष्ठ दुर्योधनने मुझसे हाथ जोड़कर कहा—‘माताजी! कुटुम्बीजनोंके इस संग्राममें आप मुझे मेरी विजयके लिये आशीर्वाद दें’ ॥ ५-६ ॥
इत्युक्ते जानती सर्वमहं स्वव्यसनागमम् ।
अब्रवं पुरुषव्याघ्र यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ७ ॥ ‘पुरुषसिंह श्रीकृष्ण! उसके ऐसा कहनेपर मैं यह सब जानती थी कि मुझपर बड़ा भारी संकट आनेवाला है, तथापि मैंने उससे यही कहा—‘जहाँ धर्म है, वहीं विजय है’ ॥ ७ ॥
यथा च युध्यमानस्त्वं न वै मुह्यसि पुत्रक । ध्रुवं शस्त्रजिताँल्लोकान् प्राप्स्यस्यमरवत् प्रभो ॥ ८ ॥ ‘बेटा! शक्तिशाली पुत्र! यदि तुम युद्ध करते हुए धर्मसे मोहित न होओगे तो निश्चय ही देवताओंके समान शस्त्रोंद्वारा जीते हुए लोकोंको प्राप्त कर लोगे’ ॥ ८ ॥
इत्येवमब्रुवं पूर्वं नैनं शोचामि वै प्रभो । धृतराष्ट्रं तु शोचामि कृपणं हतबान्धवम् ॥ ९ ॥ ‘प्रभो! यह बात मैंने पहले ही कह दी थी; इसलिये मुझे इस दुर्योधनके लिये शोक नहीं हो रहा है। मैं तो इन दीन राजा धृतराष्ट्रके लिये शोकमग्न हो रही हूँ, जिनके सारे भाई-बन्धु मार डाले गये ॥ ९ ।
अमर्षणं युधां श्रेष्ठं कृतास्त्रं युद्धदुर्मदम् । शयानं वीरशयने पश्य माधव मे सुतम् ॥ १० ॥ ‘माधव! अमर्षशील, योद्धाओंमें श्रेष्ठ, अस्त्र-विद्याके ज्ञाता, रणदुर्मद तथा वीरशय्यापर सोये हुए मेरे इस पुत्रको देखो तो सही ॥ १० ॥
योऽयं मूर्धाभिषिक्तानामग्रे याति परंतपः । सोऽयं पांसुषु शेतेऽद्य पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ ११ ॥ ‘शत्रुओंको संताप देनेवाला जो दुर्योधन मूर्धाभिषिक्त राजाओंके आगे-आगे चलता था, वही आज यह धूलमें लोट रहा है। कालके इस उलट-फेरको तो देखो ॥ ११ ॥
ध्रुवं दुर्योधनो वीरो गतिं न सुलभां गतः । तथा ह्यभिमुखः शेते शयने वीरसेविते ॥ १२ ॥ ‘निश्चय ही वीर दुर्योधन उस उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है, जो सबके लिये सुलभ नहीं है; क्योंकि यह वीरसेवित शय्यापर सामने मुँह किये सो रहा है ॥ १२ ॥
यं पुरा पर्युपासीना रमयन्ति वरस्त्रियः । तं वीरशयने सुप्तं रमयन्त्यशिवाः शिवाः ॥ १३ ॥ ‘पूर्वकालमें जिसके पास बैठकर सुन्दरी स्त्रियाँ उसका मनोरंजन करती थीं, वीरशय्यापर सोये हुए आज उसी वीरका ये अमंगलकारिणी गीदड़ियाँ मन-बहलाव करती हैं ॥ १३ ॥
यं पुरा पर्युपासीना रमयन्ति महीक्षितः । महीतलेस्थं निहतं गृध्रास्तं पर्युपासते ॥ १४ ॥
'जिसके पास पहले राजा लोग बैठकर उसे आनन्द प्रदान करते थे, आज मरकर धरतीपर पड़े उसी वीरके पास गीध बैठे हुए हैं ।। १४ ।। यं पुरा व्यजनै रम्यैरुपवीजन्ति योषितः । तमद्य पक्षव्यजनैरुपवीजन्ति पक्षिणः ॥ १५ ॥ 'पहले जिसके पास खड़ी होकर युवतियाँ सुन्दर पंखे झला करती थीं, आज उसीको पक्षीगण अपनी पाँखोंसे हवा करते हैं ।। १५ ।। एष शेते महाबाहुर्बलवान् सत्यविक्रमः । सिंहेनेव द्विपः संख्ये भीमसेनेन पातितः ॥ १६ ॥ 'यह महाबाहु सत्यपराक्रमी बलवान् वीर दुर्योधन भीमसेनके द्वारा गिराया जाकर युद्धस्थलमें सिंहके मारे हुए गजराजके समान सो रहा है ।। १६ ।। पश्य दुर्योधनं कृष्ण शयानं रुधिरोक्षितम् । निहतं भीमसेनेन गदां सम्मृज्य भारतम् ॥ १७ ॥ 'श्रीकृष्ण! भीमसेनकी चोट खाकर खूनसे लथपथ हो गदा लिये धरतीपर सोये हुए दुर्योधनको अपनी आँखसे देख लो ।। १७ ।। अक्षौहिणीर्महाबाहुर्दश चैकां च केशव । आनयद् यः पुरा संख्ये सोऽनयान्निधनं गतः ॥ १८ ॥ 'केशव! जिस महाबाहु वीरने पहले ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंको जुटा लिया था, वही अपनी अनीतिके कारण युद्धमें मार डाला गया ।। १८ ।। एष दुर्योधनः शेते महेष्वासो महाबलः । शार्दूल इव सिंहेन भीमसेनेन पातितः ॥ १९ ॥ 'सिंहके मारे हुए दूसरे सिंहके समान भीमसेनके हाथों मारा गया यह महाबली महाधनुर्धर दुर्योधन सो रहा है ।। १९ ।। विदुरं ह्यवमत्यैष पितरं चैव मन्दभाक् । बालो वृद्धावमानेन मन्दो मृत्युवशं गतः ॥ २० ॥ 'यह मूर्ख और अभागा बालक विदुर तथा अपने पिताका अपमान करके बड़े-बूढ़ोंकी अवहेलनाके पापसे ही कालके गालमें चला गया है ।। २० ।। निःसपना मही यस्य त्रयोदश समाः स्थिता । स शेते निहतो भूमौ पुत्रो मे पृथिवीपतिः ॥ २१ ॥ 'यह सारी पृथ्वी तेरह वर्षोंतक निष्कण्टकभावसे जिसके अधिकारमें रही है, वही मेरा पुत्र पृथ्वीपति दुर्योधन आज मारा जाकर पृथ्वीपर पड़ा है ।। २१ ।। अपश्यं कृष्ण पृथिवीं धार्तराष्ट्रानुशासिताम् । पूर्णां हस्तिगवाश्वैश्च वार्ष्णेय न तु तच्चिरम् ॥ २२ ॥
‘वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! मैंने दुर्योधनद्वारा शासित हुई इस पृथ्वीको हाथी, घोड़े और गौओंसे भरी-पूरी देखा था; किंतु वह राज्य चिरस्थायी न रह सका ॥ २२ ॥ तामेवाद्य महाबाहो पश्याम्यन्यानुशासिताम् । हीनां हस्तिगवाश्वेन किं नु जीवामि माधव ॥ २३ ॥ ‘महाबाहु माधव! आज उसी पृथ्वीको मैं देखती हूँ कि वह दूसरेके शासनमें जाकर हाथी, घोड़े और गाय-बैलोंसे हीन हो गयी है; फिर मैं किसलिये जीवन धारण करूँ? ॥ २३ ॥ इदं कष्टतरं पश्य पुत्रस्यापि वधान्मम । यदिमाः पर्युपासन्ते हतान् शूरान् रणे स्त्रियः ॥ २४ ॥ ‘मेरे लिये पुत्रके वधसे भी अधिक कष्ट देनेवाली बात यह है कि स्त्रियाँ रणभूमिमें मारे गये अपने शूरवीर पतियोंके पास बैठी रो रही हैं। इनकी दयनीय दशा तो देखो ॥ २४ ॥ प्रकीर्णकेशां सुश्रोणीं दुर्योधनशुभाङ्कगाम् । रुक्मवेदिनिभां पश्य कृष्ण लक्ष्मणमातरम् ॥ २५ ॥ श्रीकृष्ण! सुवर्णकी वेदीके समान तेजस्विनी तथा सुन्दर कटि-प्रदेशवाली उस लक्ष्मणकी माताको तो देखो, जो दुर्योधनके शुभ-अंकमें स्थित हो केश खोले रो रही है ॥ २५ ॥ नूनमेषा पुरा बाला जीवमाने महीभुजे । भुजावाश्रित्य रमते सुभुजस्य मनस्विनी ॥ २६ ॥ ‘पहले जब राजा दुर्योधन जीवित था, तब निश्चय ही यह मनस्विनी बाला सुन्दर बाहोंवाले अपने वीर पतिकी दोनों भुजाओंका आश्रय लेकर इसी तरह उसके साथ सानन्द क्रीड़ा करती रही होगी ॥ २६ ॥ कथं नु शतधा नेदं हृदयं मम दीर्यते । पश्यन्त्या निहतं पुत्रं पुत्रेण सहितं रणे ॥ २७ ॥ ‘रणभूमिमें वही मेरा पुत्र अपने पुत्रके साथ ही मार डाला गया है, इसे इस अवस्थामें देखकर मेरे इस हृदयके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते? ॥ २७ ॥ पुत्रं रुधिरसंसिक्तमुपजिघ्रत्यनिन्दिता । दुर्योधनं तु वामोरुः पाणिना परिमार्जती ॥ २८ ॥ ‘सुन्दर जाँघोंवाली मेरी सती साध्वी पुत्रवधू कभी खूनसे भीगे हुए अपने पुत्र लक्ष्मणका मुँह सूँघती है तो कभी पति दुर्योधनका शरीर अपने हाथसे पोंछती है ॥ किं नु शोचति भर्तारं पुत्रं चैषा मनस्विनी । तथा ह्यवस्थिता भाति पुत्रं चाप्यभिवीक्ष्य सा ॥ २९ ॥ स्वशिरः पञ्चशाखाभ्यामभिहत्यायतक्षणा । पतत्युरसि वीरस्य कुरुराजस्य माधव ॥ ३० ॥
'पता नहीं, यह मनस्विनी बहू पुत्रके लिये शोक करती है या पतिके लिये? कुछ ऐसी ही अवस्थामें वह जान पड़ती है। माधव! वह देखो, वह विशाललोचना वधू पुत्रकी ओर देखकर दोनों हाथोंसे सिर पीटती हुई अपने वीर पति कुरुराजकी छातीपर गिर पड़ी है।। २९-३० ।।
पुण्डरीकनिभा भाति पुण्डरीकान्तरप्रभा ।
मुखं विमृज्य पुत्रस्य भर्तुश्चैव तपस्विनी ।। ३१ ।।
'कमलपुष्पके भीतरी भागकी-सी मनोहर कान्तिवाली मेरी तपस्विनी पुत्रवधू जो प्रफुल्ल कमलके समान सुशोभित हो रही है, कभी अपने पुत्रका मुँह पोंछती है तो कभी अपने पतिका ।। ३१ ।।
यदि सत्यागमाः सन्ति यदि वै श्रुतयस्तथा ।
ध्रुवं लोकानवाप्तोऽयं नृपो बाहुबलार्जितान् ।। ३२ ।।
'श्रीकृष्ण! यदि वेद-शास्त्र सत्य हैं तो मेरा पुत्र यह राजा दुर्योधन निश्चय ही अपने बाहुबलसे प्राप्त हुए पुण्यमय लोकोंमें गया है' ।। ३२ ।।
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि दुर्योधनदर्शने सप्तदशोऽध्यायः ।। १७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें दुर्योधनका दर्शनविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७ ।।
अध्याय (पृष्ठ 3186)
अष्टादशोऽध्यायः
अपने अन्य पुत्रों तथा दुःशासनको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप
गान्धार्युवाच
पश्य माधव पुत्रान्मे शतसंख्याञ्जितक्लमान् ।
गदया भीमसेनेन भूयिष्ठं निहतान् रणे ॥ १ ॥
गान्धारी बोलीं—माधव! जो परिश्रमको जीत चुके थे, उन मेरे सौ पुत्रोंको देखो, जिन्हें रणभूमिमें प्रायः भीमसेनेने अपनी गदासे मार डाला है ॥ १ ॥
इदं दुःखतरं मेऽद्य यदिमा मुक्तमूर्धजाः ।
हतपुत्रा रणे बालाः परिधावन्ति मे स्नुषाः ॥ २ ॥
सबसे अधिक दुःख मुझे आज यह देखकर हो रहा है कि ये मेरी बालवधुएँ, जिनके पुत्र भी मारे जा चुके हैं, रणभूमिमें केश खोले चारों ओर अपने स्वजनोंकी खोजमें दौड़ रही हैं ॥ २ ॥
प्रासादतलचारिण्यश्चरणैर्भूषणान्वितैः ।
आपन्ना यत् स्पृशन्तीमां रुधिराद्रां वसुन्धराम् ॥ ३ ॥
ये महलकी अट्टालिकाओंमें आभूषणभूषित चरणोंद्वारा विचरण करनेवाली थीं; परंतु आज विपत्तिकी मारी हुई ये इस खूनसे भीगी हुई वसुधाका स्पर्श कर रही हैं ॥ ३ ॥
कृच्छादुत्सारयन्ति स्म गृध्रगोमायुवायसान् ।
दुःखेनार्ता विघूर्णन्त्यो मत्ता इव चरन्त्युत ॥ ४ ॥
ये दुःखसे आतुर हो पगली स्त्रियोंके समान झूमती हुई सब ओर विचरती हैं तथा बड़ी कठिनाईसे गीधों, गीदड़ों और कौओंको लाशोंके पाससे दूर हटा रही हैं ॥ ४ ॥
एषान्या त्वनवद्याङ्गी करसम्मितमध्यमा ।
घोरमायोधनं दृष्ट्वा निपतत्यतिदुःखिता ॥ ५ ॥
यह पतली कमरवाली सर्वाङ्गसुन्दरी दूसरी वधू युद्धस्थलका भयानक दृश्य देखकर अत्यन्त दुःखी हो पृथ्वीपर गिर पड़ती है ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा मे पार्थिवसुतामेतां लक्ष्मणमातरम् ।
राजपुत्रीं महाबाहो मनो न ह्युपशाम्यति ॥ ६ ॥
महाबाहो! यह लक्ष्मणकी माता एक भूमिपालकी बेटी है, इस राजकुमारीकी दशा देखकर मेरा मन किसी तरह शान्त नहीं होता है ॥ ६ ॥
भ्रातॄंश्चान्याः पितॄंश्चान्याः पुत्रांश्च निहतान् भुवि ।
दृष्ट्वा परिपतन्त्येताः प्रगृह्य सुमहाभुजान् ॥ ७ ॥ कुछ स्त्रियाँ रणभूमिमें मारे गये अपने भाइयोंको, कुछ पिताओंको और कुछ पुत्रोंको देखकर उन महाबाहु वीरोंको पकड़ लेती और वहीं गिर पड़ती हैं ॥ ७ ॥
मध्यमानां तु नारीणां वृद्धानां चापराजित । आक्रन्दं हतबन्धूनां दारुणे वैशसे शृणु ॥ ८ ॥ अपराजित वीर! इस दारुण संग्राममें जिनके बन्धु-बान्धव मारे गये हैं, उन अधेड़ और बूढ़ी स्त्रियोंका यह करुणाजनक क्रन्दन सुनो ॥ ८ ॥
रथनीडानि देहांश्च हतानां गजवाजिनाम् । आश्रित्य श्रममोहार्ताः स्थिताः पश्य महाभुज ॥ ९ ॥ महाबाहो! देखो, ये स्त्रियाँ परिश्रम और मोहसे पीड़ित हो टूटे हुए रथोंकी बैठकों तथा मारे गये हाथी-घोड़ोंकी लाशोंका सहारा लेकर खड़ी हैं ॥ ९ ॥
अन्यां चापहृतं कायाच्चारुकुण्डलमुन्नसम् । स्वस्य बन्धोः शिरः कृष्ण गृहीत्वा पश्य तिष्ठतीम् ॥ १० ॥ श्रीकृष्ण! देखो, वह दूसरी स्त्री किसी आत्मीय जनके मनोहर कुण्डलोंसे सुशोभित और ऊँची नासिकावाले कटे हुए मस्तकको लेकर खड़ी है ॥ १० ॥
पूर्वजातिकृतं पापं मन्ये नाल्पमिवानघ । एताभिर्निरवद्याभिर्मया चैवाल्पमेधया ॥ ११ ॥ यदिदं धर्मराजेन पातितं नो जनार्दन । न हि नाशोऽस्ति वार्ष्णेय कर्मणोः शुभपापयोः ॥ १२ ॥ अनघ! मैं समझती हूँ कि इन अनिन्द्य सुन्दरी अबलाओंने तथा मन्द बुद्धिवाली मैंने भी पूर्वजन्मोंमें कोई बड़ा भारी पाप किया है, जिसके फलस्वरूप धर्मराजने हमलोगोंको बड़ी भारी विपत्तिमें डाल दिया है। जनार्दन! वृष्णिनन्दन! जान पड़ता है कि किये हुए पुण्य और पापकर्मोंका उनके फलका उपभोग किये बिना नाश नहीं होता है ॥ ११-१२ ॥
प्रत्यग्रवयसः पश्य दर्शनीयकुचाननाः । कुलेषु जाता ह्रीमत्यः कृष्णपक्ष्मक्षिमूर्धजाः ॥ १३ ॥ हंसगद्गदभाषिण्यो दुःखशोकप्रमोहिताः । सारस्य इव वाशन्त्यः पतिताः पश्य माधव ॥ १४ ॥ माधव! देखो, इन महिलाओंकी नयी अवस्था है। इनके वक्षःस्थल और मुख दर्शनीय हैं। इनकी आँखोंकी बरौनियाँ और सिरके केश काले हैं। ये सब-की-सब कुलीन और सलज्ज हैं। ये हंसके समान गद्गद स्वरमें बोलती हैं; परंतु आज दुःख और शोकसे मोहित हो चहचहाती सारसियोंके समान रोती-बिलखती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ी हैं ॥ १३-१४ ॥
फुल्लपद्मप्रकाशानि पुण्डरीकाक्ष योषिताम् । अनवद्यानि वक्त्राणि तापयत्येष रश्मिवान् ॥ १५ ॥
कमलनयन! खिले हुए कमलके समान प्रकाशित होनेवाले युवतियोंके इन सुन्दर मुखोंको ये सूर्यदेव संतप्त कर रहे हैं ॥ १५ ॥ ईर्षूणां मम पुत्राणां वासुदेवावरोधनम् । मत्तमातङ्गदर्पाणां पश्यन्त्यद्य पृथग्जनाः ॥ १६ ॥ वासुदेव! मतवाले हाथीके समान घमंडमें चूर रहनेवाले मेरे ईर्ष्यालु पुत्रोंकी इन रानियोंको आज साधारण लोग देख रहे हैं ॥ १६ ॥ शतचन्द्राणि चर्माणि ध्वजांश्चादित्यवर्चसः । रौक्माणि चैव वर्माणि निष्कानपि च काञ्चनान् ॥ १७ ॥ शीर्षत्राणानि चैतानि पुत्राणां मे महीतले । पश्य दीप्तानि गोविन्द पावकान् सुहुतानिव ॥ १८ ॥ गोविन्द! देखो, मेरे पुत्रोंकी ये सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे सुशोभित ढालें, सूर्यके समान तेजस्विनी ध्वजाएँ, सुवर्णमय कवच, सोनेके निष्क तथा शिरस्त्राण घीकी उत्तम आहुति पाकर प्रज्वलित हुई अग्नियोंके समान पृथ्वीपर देदीप्यमान हो रहे हैं ॥ १७-१८ ॥ एष दुःशासनः शेते शूरेणामित्रघातिना । पीतशोणितसर्वाङ्गो युधि भीमेन पातितः ॥ १९ ॥ शत्रुघाती शूरवीर भीमसेनने युद्धमें जिसे मार गिराया तथा जिसके सारे अंगोंका रक्त पी लिया, वही यह दुःशासन यहाँ सो रहा है ॥ १९ ॥ गदया भीमसेनेन पश्य माधव मे सुतम् । द्यूतक्लेशाननुस्मृत्य द्रौपदीनोदितेन च ॥ २० ॥ माधव! देखो, द्यूतक्रीड़ाके समय पाये हुए क्लेशोंको स्मरण करके द्रौपदीसे प्रेरित हुए भीमसेनने मेरे इस पुत्रको गदासे मार डाला है ॥ २० ॥ उक्ता ह्यनेन पाञ्चाली सभायां द्यूतनिर्जिता । प्रियं चिकीर्षता भ्रातुः कर्णस्य च जनार्दन ॥ २१ ॥ सहैव सहदेवेन नकुलेनार्जुनेन च । दासीभूतासि पाञ्चालि क्षिप्रं प्रविश नो गृहान् ॥ २२ ॥ जनार्दन! इसने अपने भाई और कर्णका प्रिय करनेकी इच्छासे सभामें जूएसे जीती गयी द्रौपदीके प्रति कहा था कि 'पांचाली! तू नकुल-सहदेव तथा अर्जुनके साथ ही हमारी दासी हो गयी; अतः शीघ्र ही हमारे घरोंमें प्रवेश कर' ॥ २१-२२ ॥ ततोऽहमब्रुवं कृष्ण तदा दुर्योधनं नृपम् । मृत्युपाशपरिक्षिप्तं शकुनिं पुत्र वर्जय ॥ २३ ॥ निबोधैनं सुदुर्बुद्धिं मातुलं कलहप्रियम् । क्षिप्रमेनं परित्यज्य पुत्र शाम्यस्व पाण्डवैः ॥ २४ ॥ न बुद्ध्यसे त्वं दुर्बुद्धे भीमसेनममर्षणम् ।
वाङ्नाराचैस्तुदंस्तीक्ष्णैरुल्काभिरिव कुञ्जरम् ॥ २५ ॥
श्रीकृष्ण! उस समय मैं राजा दुर्योधनसे बोली—‘बेटा! शकुनि मौतके फंदेमें फँसा हुआ है। तुम इसका साथ छोड़ दो। पुत्र! तुम अपने इस खोटी बुद्धिवाले मामाको कलहप्रिय समझो और शीघ्र ही इसका परित्याग करके पाण्डवोंके साथ संधि कर लो। दुर्बुद्धे! तुम नहीं जानते भीमसेन कितने अमर्षशील हैं। तभी जलती लकड़ीसे हाथीको मारनेके समान तुम अपने तीखे वाग्बाणोंसे उन्हें पीड़ा दे रहे हो’ ॥ २३—२५ ॥
तानेवं रहसि क्रुद्धो वाक्शल्यानवधारयन् ।
उत्ससर्ज विषं तेषु सर्पो गोवृषभेष्विव ॥ २६ ॥
इस प्रकार एकान्तमें मैंने उन सबको डाँटा था। श्रीकृष्ण! उन्हीं वाग्बाणोंको याद करके क्रोधी भीमसेनने मेरे पुत्रोंपर उसी प्रकार क्रोधरूपी विष छोड़ा है, जैसे सर्प गाय-बैलोंको डँसकर उनमें अपने विषका संचार कर देता है ॥ २६ ॥
एष दुःशासनः शेते विक्षिप्य विपुलौ भुजौ ।
निहतो भीमसेनेन सिंहेनेव महागन्तः ॥ २७ ॥
सिंहके मारे हुए विशाल हाथीके समान भीमसेनका मारा हुआ यह दुःशासन दोनों विशाल हाथ फैलाये रणभूमिमें पड़ा हुआ है ॥ २७ ॥
अत्यर्थमकरोद् रौद्रं भीमसेनोऽत्यमर्षणः ।
दुःशासनस्य यत् क्रुद्धोऽपिबच्छोणितमाहवे ॥ २८ ॥
अत्यन्त अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने युद्धस्थलमें क्रुद्ध होकर जो दुःशासनका रक्त पी लिया, यह बड़ा भयानक कर्म किया है ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि स्त्रीविलापपर्वणि गान्धारीवाक्येऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत स्त्रीविलापपर्वमें गान्धारीवाक्यविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 3190)
एकोनविंशोऽध्यायः
विकर्ण, दुर्मुख, चित्रसेन, विविंशति तथा दुःसहको देखकर गान्धारीका श्रीकृष्णके सम्मुख विलाप
गान्धार्युवाच
एष माधव पुत्रो मे विकर्णः प्राज्ञसम्मतः ।
भूमौ विनिहतः शेते भीमेन शतधा कृतः ॥ १ ॥
**गान्धारी बोलीं—**माधव! यह मेरा पुत्र विकर्ण, जो विद्वानोंद्वारा सम्मानित होता था, भूमिपर मरा पड़ा है। भीमसेनने इसके भी सौ-सौ टुकड़े कर डाले हैं ॥ १ ॥
गजमध्ये हतः शेते विकर्णो मधुसूदन ।
नीलमेघपरिक्षिप्तः शरदीव निशाकरः ॥ २ ॥
मधुसूदन! जैसे शरत्कालमें काले मेघोंकी घटासे घिरा हुआ चन्द्रमा शोभा पा रहा हो, उसी प्रकार भीमद्वारा मारा गया विकर्ण हाथियोंकी सेनाके बीचमें सो रहा है ॥ २ ॥
अस्य चापग्रहेणैव पाणिः कृतकिणो महान् ।
कथञ्चिच्छिद्यते गृध्रैरात्तुकामैस्तलत्रवान् ॥ ३ ॥
बराबर धनुष लिये रहनेसे इसकी विशाल हथेलीमें घट्टा पड़ गया है। इसके हाथमें इस समय भी दस्ताना बँधा हुआ है; इसलिये इसे खानेकी इच्छावाले गीध बड़ी कठिनाईसे किसी-किसी तरह काट पाते हैं ॥ ३ ॥
अस्य भार्याऽऽमिषप्रेप्सून् गृध्रकाकांस्तपस्विनी ।
वारयत्यनिशं बाला न च शक्नोति माधव ॥ ४ ॥
माधव! उसकी तपस्विनी पत्नी जो अभी बालिका है, मांसलोलुप गीधों और कौओंको हटानेकी निरन्तर चेष्टा करती है; परंतु सफल नहीं हो पाती है ॥ ४ ॥
युवा वृन्दारकः शूरो विकर्णः पुरुषर्षभ ।
सुखोषितः सुखार्हश्च शेते पांसुषु माधव ॥ ५ ॥
पुरुषप्रवर माधव! विकर्ण नवयुवक, देवताके समान कान्तिमान्, शूरवीर, सुखमें पला हुआ तथा सुख भोगनेके ही योग्य था; परंतु आज धूलमें लोट रहा है ॥ ५ ॥
कर्णिनालीकनाराचैर्भिन्नमर्माणमाहवे ।
अद्यापि न जहात्येनं लक्ष्मीर्भरतसत्तमम् ॥ ६ ॥
युद्धमें कर्णी, नालीक और नाराचोंके प्रहारसे इसके मर्मस्थल विदीर्ण हो गये हैं तो भी इस भरत-भूषण वीरको अभीतक लक्ष्मी (अंगकान्ति) छोड़ नहीं रही है ॥ ६ ॥
एष संग्रामशूरेण प्रतिज्ञां पालयिष्यता ।