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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मनुबृहस्पतिसंवादे चतुरधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मनु और बृहस्पतिका संवादविषयक दो सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०४ ॥

२०५-

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पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः

परब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय

मनुरुवाच

दुःखोपघाते शारीरे मानसे चाप्युपस्थिते ।
यस्मिन् न शक्यते कर्तुं यत्नस्तं नानुचिन्तयेत् ॥ १ ॥
**मनुजी कहते हैं—**बृहस्पते! जब मनुष्यपर कोई ऐसा शारीरिक या मानसिक दुःख आ पड़े, जिसके रहते हुए साधन करना अशक्य हो जाय, तब उस दुःखका चिन्तन करना छोड़ दे ॥ १ ॥

भैषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तयेत् ।
चिन्त्यमानं हि चाभ्येति भूयश्चापि प्रवर्तते ॥ २ ॥
दुःखको दूर करनेके लिये सबसे अच्छी दवा यही है कि उसका चिन्तन छोड़ दिया जाय; क्योंकि चिन्तन करनेसे वह सामने आता है और अधिकाधिक बढ़ता रहता है ॥ २ ॥

प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः ।
एतद् विज्ञानसामर्थ्यं न बालैः समतामियात् ॥ ३ ॥
अतः मानसिक दुःखको बुद्धि एवं विचारद्वारा तथा शारीरिक कष्टको ओषधियोंद्वारा दूर करे, यही विज्ञानकी सामर्थ्य है, जिससे मनुष्य दुःखमें पड़नेपर बच्चोंके समान बैठकर रोये नहीं ॥ ३ ॥

अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः ।
आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डितः ॥ ४ ॥
यौवन, रूप, जीवन, धन-संग्रह, आरोग्य और प्रियजनोंका समागम—ये सब अनित्य हैं। विवेकशील पुरुषोंको इनमें आसक्त नहीं होना चाहिये ॥ ४ ॥

न जानपदिकं दुःखमेकः शोचितुमर्हति ।
अशोचन् प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥ ५ ॥
जो दुःख सारे देशपर है, उसके लिये किसी एक व्यक्तिको शोक नहीं करना चाहिये। यदि उसे टालनेका कोई उपाय दिखायी दे तो शोक न करके उस दुःखके निवारणका प्रयत्न करना चाहिये ॥ ५ ॥

सुखाद् बहुतरं दुःखं जीविते नास्ति संशयः ।
स्निग्धस्य चेन्द्रियार्थेषु मोहान्मरणमप्रियम् ॥ ६ ॥
इसमें संदेह नहीं कि जीवनमें सुखकी अपेक्षा दुःख ही अधिक है। जो पुरुष विषयोंमें अधिक आसक्त होता है, वह मोहवश मरणरूप अप्रिय कष्ट भोगता है ॥ ६ ॥

परित्यजति यो दुःखं सुखं वाप्युभयं नरः ।

अभ्येति ब्रह्म सोऽत्यन्तं न ते शोचन्ति पण्डिताः ।। ७ ।।
जो मनुष्य सुख और दुःख दोनोंको छोड़ देता है, वह अक्षय ब्रह्मको प्राप्त होता है, अतः वे ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करते हैं ।। ७ ।।
दुःखमर्था हि युज्यन्ते पालनेन च ते सुखम् ।
दुःखेन चाधिगम्यन्ते नाशमेषां न चिन्तयेत् ।। ८ ।।
विषयोंके उपार्जनमें दुःख है। उनकी रक्षामें भी तुम्हें सुख नहीं मिल सकता। दुःखसे ही उनकी उपलब्धि होती है; अतः उनका नाश हो जाय तो चिन्ता नहीं करनी चाहिये ।। ८ ।।
ज्ञानं ज्ञेयाभिनिर्वृत्तं विद्धि ज्ञानगुणं मनः ।
प्रज्ञाकरणसंयुक्तं ततो बुद्धिः प्रवर्तते ।। ९ ।।
बृहस्पते! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि ज्ञेयरूपमें परमात्मासे ज्ञान प्रकट होता है और मन ज्ञानका गुण (कार्य) है। जब वह ज्ञानेन्द्रियोंसे युक्त होता है, तब बुद्धि कर्मोंमें प्रवृत्त होती है ।। ९ ।।
यदा कर्मगुणैर्हीना बुद्धिर्मनसि वर्तते ।
तदा प्रज्ञायते ब्रह्म ध्यानयोगसमाधिना ।। १० ।।
जिस समय बुद्धि कर्म-संस्कारोंसे रहित होकर हृदयमें स्थित हो जाती है, उसी समय ध्यानयोगजनित समाधिके द्वारा ब्रह्मका भलीभाँति ज्ञान हो जाता है ।।
सेयं गुणवती बुद्धिर्गुणेष्वेवाभिवर्तते ।
अपरादभिनिःसृत्य गिरेः शृङ्गादिवोदकम् ।। ११ ।।
अन्यथा जैसे जलकी धारा पर्वतके शिखरसे निकलकर ढालकी ओर बहती है, उसी प्रकार यह गुणवती बुद्धि अज्ञानके कारण परमात्मासे नियुक्त होकर रूप आदि गुणोंकी ओर बहने लग जाती है ।। ११ ।।
यदा निर्गुणमाप्नोति ध्यानं मनसि पूर्वजम् ।
तदा प्रज्ञायते ब्रह्म निकषं निकषे यथा ।। १२ ।।
परंतु जब साधक सबके आदिकारण निर्गुण ध्येयतत्त्वको ध्यानद्वारा अन्तःकरणमें प्राप्त कर लेता है, तब कसौटीपर कसे हुए सुवर्णके समान ब्रह्मके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान होता है ।। १२ ।।
मनस्त्वपहृतं पूर्वमिन्द्रियार्थनिदर्शकम् ।
न समक्षगुणापेक्षि निर्गुणस्य निदर्शकम् ।। १३ ।।
परंतु इन्द्रियोंके विषयोंको दिखानेवाला मन जब पहलेसे ही विषयोंकी ओर अपहृत हो जाता है, तब वह विषयरूप गुणोंकी अपेक्षा रखनेवाला मन निर्गुण तत्त्वका दर्शन करानेमें समर्थ नहीं होता ।। १३ ।।
सर्वाण्येतानि संवार्य द्वाराणि मनसि स्थितः ।
मनस्येकाग्रतां कृत्वा तत्परं प्रतिपद्यते ।। १४ ।।

समस्त इन्द्रियोंको रोककर संकल्पमात्रसे मनमें स्थित हो उन सबको हृदयमें एकत्र करके साधक उससे भी परे विद्यमान परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥

यथा महान्ति भूतानि निवर्तन्ते गुणक्षये । तथेन्द्रियाण्युपादाय बुद्धिर्मनसि वर्तते ॥ १५ ॥ जिस प्रकार गुणोंका क्षय होनेपर पञ्चमहाभूत निवृत्त हो जाते हैं, उसी प्रकार बुद्धि समस्त इन्द्रियोंको लेकर हृदयमें स्थित हो जाती है ॥ १५ ॥

यदा मनसि सा बुद्धिर्वर्ततेऽन्तरचारिणी । व्यवसायगुणोपेता तदा सम्पद्यते मनः ॥ १६ ॥ जब निश्चयात्मिका बुद्धि अन्तर्मुखी होकर हृदयमें स्थित होती है, तब मन विशुद्ध हो जाता है ॥ १६ ॥

गुणवद्भिर्गुणोपेतं यदा ध्यानगुणं मनः । तदा सर्वान् गुणान् हित्वा निर्गुणं प्रतिपद्यते ॥ १७ ॥ शब्दादि गुणोंसे युक्त इन्द्रियोंके सम्बन्धसे उन गुणोंसे घिरा हुआ मन जब ध्यानजनित गुणोंसे सम्पन्न होता है, तब उन समस्त गुणोंको त्यागकर निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ १७ ॥

अव्यक्तस्येह विज्ञाने नास्ति तुल्यं निदर्शनम् । यत्र नास्ति पदन्यासः कस्तं विषयमाप्नुयात् ॥ १८ ॥ उस अव्यक्त ब्रह्मका बोध करानेके लिये इस संसारमें कोई योग्य दृष्टान्त नहीं है। जहाँ वाणीका व्यापार ही नहीं है, उस वस्तुको कौन वर्णनका विषय बना सकता है ॥ १८ ॥

तपसा चानुमानेन गुणैर्जात्या श्रुतेन च । निनीषेत् परं ब्रह्म विशुद्धेनान्तरात्मना ॥ १९ ॥ इसलिये तपसे, अनुमानसे, शम आदि गुणोंसे, जातिगत धर्मोंके पालनसे तथा शास्त्रोंके स्वाध्यायसे अन्तःकरणको विशुद्ध करके उसके द्वारा परब्रह्मको प्राप्त करनेकी इच्छा करे ॥ १९ ॥

गुणहीनो हि तं मार्गं बहिः समनुवर्तते । गुणाभावात् प्रकृत्या वा निस्तर्क्यं ज्ञेयसम्मितम् ॥ २० ॥ उक्त तपस्या आदि गुणोंसे रहित मनुष्य बाहर रहकर बाह्य मार्गका ही अनुसरण करता है। वह ज्ञेयस्वरूप परमात्मा गुणोंसे अतीत होनेके कारण स्वभावसे ही तर्कका विषय नहीं है ॥ २० ॥

नैर्गुण्याद् ब्रह्म चाप्नोति सगुणत्वान्निवर्तते । गुणप्रचारिणी बुद्धिर्हुताशन इवेन्धने ॥ २१ ॥ जैसे अग्नि सूखे काठमें विचरण करती है, उसी प्रकार बुद्धि भी शब्द, स्पर्श आदि गुणोंमें विचरती रहती है। जब वह उन गुणोंका सम्बन्ध छोड़ देती है, तब निर्गुण होनेके

कारण ब्रह्मको प्राप्त होती है और जबतक गुणोंमें आसक्त रहती है, तबतक गुणोंसे सम्बन्धित होनेके कारण ब्रह्मको न पाकर लौट आती है ॥ २१ ॥

यथा पञ्च विमुक्तानि इन्द्रियाणि स्वकर्मभिः ।
तथा हि परमं ब्रह्म विमुक्तं प्रकृतेः परम् ॥ २२ ॥
जैसे पाँचों इन्द्रियाँ अपने कार्यरूप शब्द आदि गुणोंसे भिन्न हैं, उसी प्रकार परब्रह्म परमात्मा भी प्रकृतिसे सर्वथा परे है ॥ २२ ॥

एवं प्रकृतितः सर्वे प्रवर्तन्ते शरीरिणः ।
निवर्तन्ते निवृत्तौ च स्वर्गं चैवोपयान्ति च ॥ २३ ॥
इस प्रकार समस्त प्राणी प्रकृतिसे उत्पन्न होते और यथासमय उसीमें लयको प्राप्त होते हैं। उस लय अथवा मृत्युके पश्चात् वे पुण्य और पापके फलस्वरूप स्वर्ग और नरकमें जाते हैं ॥ २३ ॥

पुरुषः प्रकृतिर्बुद्धिर्विषयाश्चेन्द्रियाणि च ।
अहंकारोऽभिमानश्च समूहो भूतसंज्ञकः ॥ २४ ॥
पुरुष, प्रकृति, बुद्धि, पाँच विषय, दस इन्द्रियाँ, अहंकार, मन और पंच महाभूत—इन पचीस तत्त्वोंका समूह ही प्राणी नामसे कहा जाता है ॥ २४ ॥

एतस्याद्या प्रवृत्तिस्तु प्रधानात् सम्प्रवर्तते ।
द्वितीया मिथुनव्यक्तिमविशेषान्नियच्छति ॥ २५ ॥
बुद्धि आदि तत्त्वसमूहकी प्रथम सृष्टि प्रकृतिसे ही हुई है। तदनन्तर दूसरी बारसे उनकी सामान्यतः मैथुन-धर्मसे नियमपूर्वक अभिव्यक्ति होने लगी है ॥ २५ ॥

धर्मादुत्कृष्यते श्रेयस्तथाश्रेयोऽप्यधर्मतः ।
रागवान् प्रकृतिं ह्येति विरक्तो ज्ञानवान् भवेत् ॥ २६ ॥
धर्म करनेसे श्रेयकी वृद्धि होती है और अधर्म करनेसे मनुष्यका अकल्याण होता है। विषयासक्त पुरुष प्रकृतिको प्राप्त होता है और विरक्त आत्मज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाता है ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मनुबृहस्पतिसंवादे
पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मनु और बृहस्पतिका संवादविषयक दो सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०५ ॥

परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति

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षडधिकद्विशततमोऽध्यायः

परमात्मतत्त्वका निरूपण—मनु-बृहस्पति-संवादकी समाप्ति

मनुरुवाच

यदा तैः पञ्चभिः पञ्च युक्तानि मनसा सह ।
अथ तद् रक्ष्यते ब्रह्म मणौ सूत्रमिवापितम् ॥ १ ॥
**मनुजी कहते हैं—**बृहस्पते! जिस समय मनुष्य शब्द आदि पाँच विषयोंसहित पाँचों ज्ञानेन्द्रियों और मनको काबूमें कर लेता है, उस समय वह मणियोंमें ओतप्रोत तागेके समान सर्वत्र व्याप्त परब्रह्मका साक्षात्कार कर लेता है ॥ १ ॥

तदेव च यथा सूत्रं सुवर्णे वर्तते पुनः ।
मुक्तास्वथ प्रवालेषु मृन्मये राजते तथा ॥ २ ॥
तद्वद् गोऽश्वमनुष्येषु तद्वद्धस्तिमृगादिषु ।
तद्वत् कीटपतङ्गेषु प्रसक्तात्मा स्वकर्मभिः ॥ ३ ॥
जैसे वही तागा सोनेकी लड़ियोंमें, मोतियोंमें, मूँगोंमें और मिट्टीकी मालाके दानोंमें ओतप्रोत होकर सुशोभित होता है, उसी प्रकार एक ही परमात्मा गौ, अश्व, मनुष्य, हाथी, मृग और कीट-पतंग आदि समस्त शरीरोंमें व्याप्त है! विषयासक्त जीवात्मा अपने-अपने कर्मके अनुसार भिन्न-भिन्न शरीर धारण करता है ॥

येन येन शरीरेण यद्यत्कर्म करोत्ययम् ।
तेन तेन शरीरेण तत् तत् फलमुपाश्नुते ॥ ४ ॥
यह मनुष्य जिस-जिस शरीरसे जो-जो कर्म करता है, उस-उस शरीरसे उसी-उसी कर्मका फल भोगता है ॥ ४ ॥

यथा ह्येकरसा भूमिरोषध्यर्थानुसारिणी ।
तथा कर्मानुगा बुद्धिरन्तरात्मानुदर्शिनी ॥ ५ ॥
जैसे भूमिमें एक ही रस होता है तो भी उसमें जैसा बीज बोया जाता है, उसीके अनुसार वह उसमें रस उत्पन्न करती है, उसी तरह अन्तरात्मासे ही प्रकाशित बुद्धि पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार ही एक शरीरसे दूसरे शरीरको प्राप्त होती है ॥ ५ ॥

ज्ञानपूर्वा भवेल्लिप्सा लिप्सापूर्वाभिसंधिता ।
अभिसंधिपूर्वकं कर्म कर्ममूलं ततः फलम् ॥ ६ ॥
मनुष्यको पहले तो विषयका ज्ञान होता है; फिर उसके मनमें उसे पानेकी इच्छा उत्पन्न होती है। उसके बाद 'इस कार्यको सिद्ध करूँ' यह निश्चय और प्रयत्न आरम्भ होता है।

फिर कर्म सम्पन्न होता और उसका फल मिलता है ॥ ६ ॥
फलं कर्मात्मकं विद्यात् कर्म ज्ञेयात्मकं तथा ।
ज्ञेयं ज्ञानात्मकं विद्याज्ज्ञानं सदसदात्मकम् ॥ ७ ॥
इस प्रकार फलको कर्मस्वरूप समझे। कर्मको जाननेमें आनेवाले पदार्थोंका रूप समझे और ज्ञेयको ज्ञानरूप समझे तथा ज्ञानका स्वरूप कार्य और कारण जाने ॥ ७ ॥
ज्ञानानां च फलानां च ज्ञेयानां कर्मणां तथा ।
क्षयान्ते यत् फलं विद्याज्ज्ञानं ज्ञेयप्रतिष्ठितम् ॥ ८ ॥
ज्ञान, फल, ज्ञेय और कर्म—इन सबका अन्त होनेपर जो प्राप्तव्य फलरूपसे शेष रहता है, उसको ही तुम ज्ञेयमात्रमें व्याप्त होकर स्थित हुआ ज्ञानस्वरूप परमात्मा समझो ॥ ८ ॥
महद्धि परमं भूतं यत् प्रपश्यन्ति योगिनः ।
अबुधास्तं न पश्यन्ति ह्यात्मस्थं गुणबुद्धयः ॥ ९ ॥
उस परम महान् तत्त्वको योगिजन ही देख पाते हैं। विषयोंमें आसक्त अज्ञानी मनुष्य अपने भीतर ही विराजमान उस परब्रह्म परमात्माको नहीं देख सकते हैं ॥ ९ ॥
पृथिवीरूपतो रूपमपामिह महत्तरम् ।
अद्भ्यो महत्तरं तेजस्तेजसः पवनो महान् ॥ १० ॥
पवनाच्च महद् व्योम तस्मात् परतरं मनः ।
मनसो महती बुद्धिर्बुद्धेः कालो महान् स्मृतः ॥ ११ ॥
कालात् स भगवान् विष्णुर्र्यस्य सर्वमिदं जगत् ।
नादिर्न मध्यं नैवान्तस्तस्य देवस्य विद्यते ॥ १२ ॥
इस जगत्में पृथिवीके रूपसे जलका ही रूप महान् है। जलसे तेज अति महान् है, तेजसे पवन महान् है, पवनसे आकाश महान् है, आकाशसे मन परतर है अर्थात् सूक्ष्म, श्रेष्ठ और महान् है। मनसे बुद्धि महान् है, बुद्धिसे काल अर्थात् प्रकृति महान् है और कालसे भगवान् विष्णु अनन्त, सूक्ष्म, श्रेष्ठ और महान् हैं। यह सारा जगत् उन्हींकी सृष्टि है। उन भगवान् विष्णुका न कोई आदि है, न मध्य है और न अन्त ही है ॥
अनादित्वादमध्यत्वादनन्तत्वाच्च सोऽव्ययः ।
अत्येति सर्वदुःखानि दुःखं ह्यन्तवदुच्यते ॥ १३ ॥
वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित होनेके कारण ही अविनाशी हैं; अतएव सम्पूर्ण दुःखोंसे परे हैं, क्योंकि विनाशशील वस्तु ही दुःखरूप हुआ करती है ॥ १३ ॥
तद् ब्रह्म परमं प्रोक्तं तद्धाम परमं पदम् ।
तद् गत्वा कालविषयाद् विमुक्ता मोक्षमाश्रिताः ॥ १४ ॥
अविनाशी विष्णु ही परब्रह्म कहे जाते हैं। वे ही परमधाम और परमपद हैं। उन्हें प्राप्त कर लेनेपर जीव कालके राज्यसे मुक्त हो मोक्षधाममें स्थित हो जाते हैं ॥

गुणेष्वेते प्रकाशन्ते निर्गुणत्वात् ततः परम् । निवृत्तिलक्षणो धर्मस्तथाऽऽनन्त्याय कल्पते ॥ १५ ॥ ये वध्य जीव गुणोंमें अर्थात् गुणोंके कार्यरूप शरीर आदिके सम्बन्धसे व्यक्त हो रहे हैं; परंतु परमात्मा निर्गुण होनेके कारण उनसे अत्यन्त परे हैं। जो निवृत्तिरूप धर्म (निष्काम कर्म) है, वह अक्षय पद (मोक्ष) की प्राप्ति करानेमें समर्थ है ॥ १५ ॥

ऋचो यजूंषि सामानि शरीराणि व्यपाश्रिताः । जिह्वाग्रेषु प्रवर्तन्ते यत्नसाध्या विनाशिनः ॥ १६ ॥ ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद—ये अध्ययनकालमें शरीरके आश्रित रहते हैं और जिह्वाके अग्रभागपर प्रकट होते हैं; इसीलिये वे यत्नसाध्य और विनाशशील हैं अर्थात् इनका लुप्त होना स्वाभाविक है ॥ १६ ॥

न चैवमिष्यते ब्रह्म शरीराश्रयसम्भवम् । न यत्नसाध्यं तद् ब्रह्म नादिमध्यं न चान्तवत् ॥ १७ ॥ किंतु परब्रह्म परमात्मा इस प्रकार शरीरका आश्रय लेकर प्रकट होनेपर भी वेदाध्ययनकी भाँति यत्नसाध्य नहीं है; क्योंकि उनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है ॥

ऋचामादिस्तथा साम्नां यजुषामादिरुच्यते । अन्तश्चादिमतां दृष्टो न त्वादिर्ब्रह्मणः स्मृतः ॥ १८ ॥ वही ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदका आदि कहलाता है। जिनका कोई आदि होता है, उन पदार्थोंका अन्त होता देखा गया है। ब्रह्मका कोई भी आदि नहीं बताया गया है ॥

अनादित्वादनन्तत्वात्तदनन्तमथाव्ययम् । अव्ययत्वाच्च निर्दुःखं द्वन्द्वाभावस्ततः परम् ॥ १९ ॥ वह अनादि और अनन्त होनेके कारण अक्षय और अविनाशी है। अविनाशी होनेसे ही दुःखरहित है। उसमें हर्ष और शोक आदि द्वन्द्वोंका अभाव है; अतएव वह सबसे परे है ॥ १९ ॥

अदृष्टतोऽनुपायाच्च प्रतिसंधेश्च कर्मणः । न तेन मर्त्याः पश्यन्ति येन गच्छन्ति तत् पदम् ॥ २० ॥ परंतु दुर्भाग्य, साधनहीनता और कर्मफलविषयक आसक्तिके कारण जिससे परमात्माकी प्राप्ति होती है, मनुष्य उस मार्गका दर्शन नहीं कर पाते हैं ॥ २० ॥

विषयेषु च संसर्गाच्छाश्वतस्य च दर्शनात् । मनसा चान्यदाकांक्षन् परं न प्रतिपद्यते ॥ २१ ॥ मनुष्योंकी विषयोंमें आसक्ति है; क्योंकि विषय-सुख सदा रहनेवाले हैं; ऐसी उनकी भावना है तथा वे अपने मनसे सांसारिक पदार्थोंको पानेकी इच्छा रखते हैं; इसीलिये उन्हें परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती है ॥

गुणान् यदिह पश्यन्ति तदिच्छन्त्यपरे जनाः ।

परं नैवाभिकांक्षन्ति निर्गुणत्वाद् गुणार्थिनः ।। २२ ।।

संसारी मनुष्य इस संसारमें जिन-जिन विषयोंको देखते हैं, उन्हींको पाना चाहते हैं।

सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हें पानेके लिये उनके मनमें इच्छा नहीं होती है; क्योंकि वे

गुणार्थी (विषयाभिलाषी) होते हैं और परमात्मा निर्गुण (गुणातीत) हैं ।। २२ ।।

गुणैर्यस्त्ववरैर्युक्तः कथं विद्यात् परान् गुणान् ।

अनुमानाद्धि गन्तव्यं गुणैरवयवैः परम् ।। २३ ।।

भला, जो इन तुच्छ विषयोंमें फँसा हुआ है, वह परमदिव्य गुणोंको कैसे जान सकता

है? जैसे धूमसे अग्निका अनुमान होता है, उसी प्रकार नित्यत्व आदि स्वरूपभूत दिव्य

गुणोंद्वारा परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका दिग्दर्शन हो सकता है ।। २३ ।।

सूक्ष्मेण मनसा विद्मो वाचा वक्तुं न शक्नुमः ।

मनो हि मनसा ग्राह्यं दर्शनेन च दर्शनम् ।। २४ ।।

हम ध्यानद्वारा शुद्ध और सूक्ष्म हुए मनसे परमात्माके स्वरूपका अनुभव तो कर सकते

हैं, किंतु वाणीद्वारा उसका वर्णन नहीं कर सकते; क्योंकि मनके द्वारा ही मानसिक

विषयका ग्रहण हो सकता है और ज्ञानके द्वारा ही ज्ञेयको जाना जा सकता है ।। २४ ।।

ज्ञानेन निर्मलीकृत्य बुद्धिं बुद्ध्या मनस्तथा ।

मनसा चेन्द्रियग्राममक्षरं प्रतिपद्यते ।। २५ ।।

इसलिये ज्ञानके द्वारा बुद्धिको, बुद्धिके द्वारा मनको तथा मनके द्वारा इन्द्रिय-

समुदायको निर्मल एवं शुद्ध करके अविनाशी परमात्माको प्राप्त किया जा सकता है ।।

बुद्धिप्रवीणो मनसा समृद्धो

निराशिषं निर्गुणमभ्युपैति ।

परं त्यजन्तीह विलोड्यमाना

हुताशनं वायुरिवेन्धनस्थम् ।। २६ ।।

बुद्धिमें प्रवीण अर्थात् विशुद्ध और सूक्ष्म बुद्धिसे सम्पन्न एवं मानसिक बलसे युक्त हुआ

पुरुष, समस्त इच्छासे अतीत निर्गुण ब्रह्मको प्राप्त होता है। जैसे वायु काठमें रहनेवाले

अदृश्य अग्निको बिना प्रज्वलित किये ही छोड़ देता है, वैसे ही कामनाओंसे विकल हुए

पुरुष भी अपने शरीरके भीतर स्थित परमात्माका त्याग कर देते हैं अर्थात् उसे जानने और

पानेकी चेष्टा नहीं करते ।।

गुणादाने विप्रयोगे च तेषां

मनः सदा बुद्धिपरावराभ्याम् ।

अनेनैव विधिना सम्प्रवृत्तो

गुणापाये ब्रह्म शरीरमेति ।। २७ ।।

जब साधक साधनरूप गुणोंको धारण कर लेता है और उन सांसारिक पदार्थोंसे मनको

हटा लेता है, तब उसका मन बुद्धिजन्य अच्छे-बुरे भावोंसे रहित होकर निरन्तर निर्मल रहता

है। इस प्रकार साधनमें लगा हुआ साधक जब गुणोंसे अतीत हो जाता है, तब ब्रह्मके स्वरूपका साक्षात् कर लेता है ॥ २७ ॥

अव्यक्तात्मा पुरुषो व्यक्तकर्मा
सोऽव्यक्तत्वं गच्छति ह्यन्तकाले ।
तैरेवायं चेन्द्रियैर्वर्धमानै-
र्ग्लायद्भिर्वाऽऽवर्ततेऽकामरूपः ॥ २८ ॥

पुरुषका आत्मा (वास्तविक स्वरूप) अव्यक्त है और उसके कर्म शरीररूपमें व्यक्त हैं। अतः वह अन्तकालमें अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है। परंतु कामनाओंसे तद्रूप हुआ वह जीव उन बढ़ी हुई विषयप्रबल इन्द्रियोंसे युक्त होकर पुनः संसारमें आ जाता है अर्थात् पुनः शरीरको धारण कर लेता है ॥ २८ ॥

सर्वैरयं चेन्द्रियैः सम्प्रयुक्तो
देहं प्राप्तः पञ्चभूताश्रयः स्यात् ।
नासामर्थ्याद् गच्छति कर्मणेह
हीनस्तेन परमेणाव्ययेन ॥ २९ ॥

सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे संयुक्त होकर यह देहधारी जीव पंचभूतस्वरूप शरीरके आश्रित हो जाता है। ज्ञान और उपासना आदिकी शक्तिके बिना वह केवल कर्मोंद्वारा परमात्माको नहीं पाता। अतः वह उस अविनाशी परमेश्वरसे वंचित रह जाता है ॥ २९ ॥

पृथ्व्यां नरः पश्यति नान्तमस्या
ह्यन्तश्चास्या भविता चेति विद्धि ।
परं नयन्तीह विलोड्यमानं
यथा प्लवं वायुरिवार्णवस्थम् ॥ ३० ॥

इस भूतलपर रहनेवाला मनुष्य यद्यपि इस पृथ्वीका अन्त नहीं देखता है तो भी कहीं-न-कहीं इसका अन्त अवश्य है, ऐसा समझो। जैसे समुद्रमें लहरोंद्वारा ऊपर-नीचे होते हुए जहाजको प्रवाहके अनुकूल बहती हुई हवा तटपर लगा देती है, उसी प्रकार संसारसमुद्रमें गोता लगाते हुए मनुष्यको अनुकूल वातावरण संसारसागरसे पार कर देता है ॥

दिवाकरो गुणमुपलभ्य निर्गुणो
यथा भवेदपगतरश्मिमण्डलः ।
तथा ह्यसौ मुनिरिह निर्विशेषवान्
स निर्गुणं विशति ब्रह्म चाव्ययम् ॥ ३१ ॥

सम्पूर्ण जगत्‌का प्रकाशक सूर्य प्रकाशरूपी गुणको पाकर भी अस्ताचलको जाते समय अपने किरणसमूहको समेटकर जैसे निर्गुण हो जाता है, उसी प्रकार भेदभावसे रहित हुआ मुनि यहाँ अविनाशी निर्गुण ब्रह्ममें प्रवेश कर जाता है ॥ ३१ ॥

अनागतं सुकृतवतां परां गतिं

स्वयम्भुवं प्रभवनिधानमव्ययम् । सनातनं यदमृतमव्ययं ध्रुवं निचाय्य तत् परममृतत्वमश्नुते ॥ ३२ ॥ जो कहींसे आया हुआ नहीं है, नित्य विद्यमान है, पुण्यवानोंकी परमगति है, स्वयम्भू (अजन्मा) है, सबकी उत्पत्ति और प्रलयका स्थान है, अविनाशी एवं सनातन है, अमृत, अविकारी एवं अचल है, उस परमात्माका ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य परममोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि मनुबृहस्पतिसंवादे षडधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें मनु और बृहस्पतिका संवादरूप दो सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ २०६ ॥

२०७-

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सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः

श्रीकृष्णसे सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका तथा उनकी महिमाका कथन

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ पुण्डरीकाक्षमच्युतम् ।
कर्तारमकृतं विष्णुं भूतानां प्रभवाप्ययम् ॥ १ ॥
नारायणं हृषीकेशं गोविन्दमपराजितम् ।
तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ श्रोतुमिच्छामि केशवम् ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने कहा— भरतश्रेष्ठ! महाप्राज्ञ पितामह! कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले, सबके कर्ता, अकृत (नित्य सिद्ध), सर्वव्यापी तथा सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। ये कभी किसीसे पराजित नहीं होते। ये ही नारायण, हृषीकेश, गोविन्द और केशव—इन नामोंसे भी विख्यात हैं। मैं इनके स्वरूपका तात्त्विक विवेचन सुनना चाहता हूँ॥

भीष्म उवाच

श्रुतोऽयमर्थो रामस्य जामदग्न्यस्य जल्पतः ।
नारदस्य च देवर्षेः कृष्णद्वैपायनस्य च ॥ ३ ॥
भीष्मजी बोले— युधिष्ठिर! मैंने इस विषयका विवेचन जमदग्निनन्दन परशुराम, देवर्षि नारद तथा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीके मुँहसे सुना है॥ ३॥
असितो देवलस्तात वाल्मीकिश्च महातपाः ।
मार्कण्डेयश्च गोविन्दे कथयन्त्यद्भुतं महत् ॥ ४ ॥
तात! असित, देवल, महातपस्वी वाल्मीकि और महर्षि मार्कण्डेयजी भी इन भगवान् गोविन्दके विषयमें बड़ी अद्भुत बातें कहा करते हैं॥ ४॥
केशवो भरतश्रेष्ठ भगवानीश्वरः प्रभुः ।
पुरुषः सर्वमित्येव श्रूयते बहुधा विभुः ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्ण सबके ईश्वर और प्रभु हैं। श्रुतिमें 'पुरुष एवेदँ सर्वम्'* इत्यादि वचनोंद्वारा इन्हीं सर्वव्यापी श्रीकृष्णकी महिमाका नाना प्रकारसे निरूपण किया गया है॥ ५॥
किं तु यानि विदुर्लोके ब्राह्मणाः शार्ङ्गधन्वनि ।
माहात्म्यानि महाबाहो शृणु तानि युधिष्ठिर ॥ ६ ॥

महाबाहु युधिष्ठिर! जगत्में शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्णके जिन माहात्म्योंको ब्राह्मणलोग जानते हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ६ ॥ यानि चाहर्मनुष्येन्द्र ये पुराणविदो जनाः । कर्माणि त्विह गोविन्दे कीर्तयिष्यामि तान्यहम् ॥ ७ ॥ नरेन्द्र! पुराणवेत्ता पुरुष गोविन्दकी जिन-जिन लीलाओं तथा चरित्रोंका वर्णन करते हैं, उनका मैं यहाँ वर्णन करूँगा ॥ ७ ॥ महाभूतानि भूतात्मा महात्मा पुरुषोत्तमः । वायुर्ज्योतिस्तथा चापः खं च गां चान्वकल्पयत् ॥ ८ ॥ सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा महात्मा पुरुषोत्तमने आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी— इन पाँच महाभूतोंकी रचना की है ॥ ८ ॥ स सृष्ट्वा पृथिवीं चैव सर्वभूतेश्वरः प्रभुः । अप्स्वेव भवनं चक्रे महात्मा पुरुषोत्तमः ॥ ९ ॥ सर्वभूतेश्वर, प्रभु, महात्मा पुरुषोत्तमने इस पृथ्वीकी सृष्टि करके जलमें ही अपना निवासस्थान बनाया ॥ ९ ॥ सर्वतेजोमयस्तस्मिन् शयानः पुरुषोत्तमः । सोऽग्रजं सर्वभूतानां संकर्षणमकल्पयत् ॥ १० ॥ आश्रयं सर्वभूतानां मनसेतीह शुश्रुम । उसमें शयन करते हुए सर्वतेजोमय पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने मनसे ही सम्पूर्ण प्राणियोंके अग्रज तथा आश्रय संकर्षणको उत्पन्न किया, यह हमने सुना है ॥ स धारयति भूतानि उभे भूतभविष्यती ॥ ११ ॥ ततस्तस्मिन् महाबाहौ प्रादुर्भूते महात्मनि । भास्करप्रतिमं दिव्यं नाभ्यां पद्ममजायत ॥ १२ ॥ वे संकर्षण ही समस्त भूतोंको धारण करते हैं तथा वे ही भूत और भविष्यके भी आधार हैं। उन महाबाहु महात्मा संकर्षणका प्रादुर्भाव होनेके पश्चात् श्रीहरिकी नाभिसे एक दिव्य कमल प्रकट हुआ, जो सूर्यके समान प्रकाशमान था ॥ ११-१२ ॥ स तत्र भगवान् देवः पुष्करे भ्राजयन् दिशः । ब्रह्मा समभवत् तात सर्वभूतपितामहः ॥ १३ ॥ तात! उस कमलसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हुए समस्त प्राणियोंके पितामह देवस्वरूप भगवान् ब्रह्मा उत्पन्न हुए ॥ १३ ॥ तस्मिन्नपि महाबाहौ प्रादुर्भूते महात्मनि । तमसा पूर्वजो जज्ञे मधुर्नाम महासुरः ॥ १४ ॥ उन महाबाहु महात्मा ब्रह्माजीकी भी उत्पत्ति हो जानेपर वहाँ तमोगुणसे मधुनामक महान् असुर प्रकट हुआ, जो असुरोंका पूर्वज था ॥ १४ ॥

तमुग्रमुग्रकर्माणमुग्रं कर्म समास्थितम् । ब्रह्मणोपचितिं कुर्वन् जघान पुरुषोत्तमः ॥ १५ ॥ उसका स्वभाव बड़ा ही उग्र था। वह सदा ही भयानक कर्म करनेवाला था। भयंकर कर्म करनेका निश्चय लेकर आये हुए उस असुरको पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीका हित करनेके लिये मार डाला ॥ १५ ॥ तस्य तात वधात् सर्वे देवदानवमानवाः । मधुसूदनमित्याहूर्ऋषभं सर्वसात्वताम् ॥ १६ ॥ तात! उस मधुका वध करनेके कारण ही सम्पूर्ण देवता, दानव और मानव—इन सर्वसात्वतशिरोमणि श्रीकृष्णको मधुसूदन कहते हैं ॥ १६ ॥ ब्रह्मानुससृजे पुत्रान् मानसान् दक्षसप्तमान् । मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ॥ १७ ॥ ब्रह्माजीने सात मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया, जिनमें दक्ष प्रजापति सातवें थे (ये ही सबसे प्रथम उत्पन्न हुए थे)। शेष छः पुत्रोंके नाम इस प्रकार हैं—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु ॥ १७ ॥ मरीचिः कश्यपं तात पुत्रमग्रजमग्रजः । मानसं जनयामास तेजसं ब्रह्मवित्तमम् ॥ १८ ॥ तात! इन छः पुत्रोंमें सबसे बड़े थे मरीचि। उन्होंने अपने मनसे ही ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ कश्यप नामक श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया, जो बड़े ही तेजस्वी हैं ॥ १८ ॥ अङ्गुष्ठात् ससृजे ब्रह्मा मरीचेरपि पूर्वजम् । सोऽभवद् भरतश्रेष्ठ दक्षो नाम प्रजापतिः ॥ १९ ॥ भरतश्रेष्ठ! ब्रह्माजीने दक्षको अपने अँगूठेसे उत्पन्न किया था। वे मरीचिसे भी बड़े थे। इसलिये प्रजापतिके पदपर दक्ष प्रतिष्ठित हुए ॥ १९ ॥ तस्य पूर्वमजायन्त दश तिस्रश्च भारत । प्रजापतेर्दुहितरस्तासां ज्येष्ठाभवद् दितिः ॥ २० ॥ भरतनन्दन! प्रजापति दक्षके पहले तेरह कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जिनमें दिति सबसे बड़ी थी ॥ २० ॥ सर्वधर्मविशेषज्ञः पुण्यकीर्तिर्महायशाः । मारीचः कश्यपस्तात सर्वासामभवत् पतिः ॥ २१ ॥ तात! सम्पूर्ण धर्मोंके विशेषज्ञ, पुण्यकीर्ति, महायशस्वी मरीचिनन्दन कश्यप उन सब कन्याओंके पति हुए ॥ २१ ॥ उत्पाद्य तु महाभागस्तासामवरजा दश । ददौ धर्माय धर्मज्ञो दक्ष एव प्रजापतिः ॥ २२ ॥

तदनन्तर धर्मके ज्ञाता महाभाग प्रजापति दक्षने दस कन्याएँ और उत्पन्न कीं, जो पूर्वोक्त तेरह कन्याओंसे छोटी थीं। उन सबका विवाह उन्होंने धर्मके साथ कर दिया ।। २२ ।।

धर्मस्य वसवः पुत्रा रुद्राश्चामिततेजसः ।
विश्वेदेवाश्च साध्याश्च मरुत्वन्तश्च भारत ।। २३ ।।
भरतनन्दन! धर्मके वसु, अमित तेजस्वी रुद्र, विश्वेदेव, साध्य तथा मरुद्गण—ये बहुत-से पुत्र हुए ।।

अपराश्च यवीयस्यस्ताभ्योऽन्याः सप्तविंशतिः ।
सोमस्तासां महाभागः सर्वासामभवत् पतिः ।। २४ ।।
इतरास्तु व्यजायन्त गन्धर्वांस्तुरगान् द्विजान् ।
गाश्च किंपुरुषान्मत्स्यानुद्भिज्जांश्च वनस्पतीन् ।। २५ ।।
तत्पश्चात् दक्षके अन्य सत्ताईस कन्याएँ हुईं, जो पूर्वोक्त कन्याओंसे छोटी थीं। महाभाग सोम उन सबके पति हुए। इन सबके अतिरिक्त भी दक्षके बहुत-सी कन्याएँ हुईं, जिन्होंने गन्धर्वों, अश्वों, पक्षियों, गौओं, किम्पुरुषों, मत्स्यों, उद्भिज्जों और वनस्पतियोंको जन्म दिया ।। २४-२५ ।।

आदित्यानदितिर्जज्ञे देवश्रेष्ठान् महाबलान् ।
तेषां विष्णुर्वामनोऽभूद् गोविन्दश्चाभवत् प्रभुः ।। २६ ।।
अदितिने देवताओंमें श्रेष्ठ महाबली आदित्योंको उत्पन्न किया। उन आदित्योंमें सर्वव्यापी भगवान् गोविन्द भी वामनरूपसे प्रकट हुए ।। २६ ।।

तस्य विक्रमणाच्चापि देवानां श्रीर्व्यवर्धत ।
दानवाश्च पराभूता दैतेयी चासुरी प्रजा ।। २७ ।।
उनके विक्रमसे अर्थात् विराट्रूप धारणकर तीन पैडमें त्रिलोकीको नाप लेनेके कारण देवताओंकी श्रीवृद्धि हुई। दानव पराजित हुए तथा दैत्यों और असुरोंकी प्रजा भी पराभवको प्राप्त हुई ।। २७ ।।

विप्रचित्तिप्रधानांश्च दानवानसृजद् दनुः ।
दितिस्तु सर्वानसुरान् महासत्त्वानजीजनत् ।। २८ ।।
दनुने दानवोंको जन्म दिया, जिनमें विप्रचित्ति आदि दानव प्रमुख थे। दिति समस्त असुरों—महान् शक्तिशाली दैत्योंकी जननी हुई ।। २८ ।।

अहोरात्रं च कालं च यथर्तु मधुसूदनः ।
पूर्वाह्नं चापराह्नं च सर्वमेवानुकल्पयत् ।। २९ ।।
इन्हीं श्रीमधुसूदनने दिन-रात, ऋतुके अनुसार काल, पूर्वाह्न तथा अपराह्न आदि समस्त काल-विभागकी व्यवस्था की ।। २९ ।।

प्रध्याय सोऽसृजन्मेघांस्तथा स्थावरजङ्गमान् ।

पृथिवीं सोऽसृजद् विश्वां सहितां भूरितेजसा ॥ ३० ॥ उन्होंने ही अपने मनके संकल्पसे मेघों, स्थावर-जंगम प्राणियों तथा समस्त पदार्थोंसहित महान् तेजसे संयुक्त समूची पृथ्वीकी सृष्टि की ॥ ३० ॥

ततः कृष्णो महाभागः पुनरेव युधिष्ठिर । ब्राह्मणानां शतं श्रेष्ठं मुखदेवाऽसृजत् प्रभुः ॥ ३१ ॥ युधिष्ठिर! तदनन्तर महाभाग श्रीकृष्णने पुनः सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मुखसे ही उत्पन्न किया ॥ ३१ ॥

बाहुभ्यां क्षत्रियशतं वैश्यानामूरुतः शतम् । पद्भ्यां शूद्रशतं चैव केशवो भरतर्षभ ॥ ३२ ॥ भरतश्रेष्ठ! इन केशवने सैकड़ों क्षत्रियोंको अपनी दोनों भुजाओंसे, सैकड़ों वैश्योंको अपनी जाँघोंसे तथा सैकड़ों शूद्रोंको दोनों पैरोंसे उत्पन्न किया ॥ ३२ ॥

स एवं चतुरो वर्णान् समुत्पाद्य महातपाः । अध्यक्षं सर्वभूतानां धातारमकरोत् स्वयम् ॥ ३३ ॥ इस प्रकार इन महातपस्वी श्रीहरिने चारों वर्णोंको उत्पन्न करके स्वयं ही धाताको सम्पूर्ण भूतोंका अध्यक्ष बनाया ॥ ३३ ॥

वेदविद्याविधातारं ब्रह्माणममितद्युतिम् । भूतमातृगणाध्यक्षं विरूपाक्षं च सोऽसृजत् ॥ ३४ ॥ वे ही वेदविद्याको धारण करनेवाले अमित तेजस्वी ब्रह्मा हुए। फिर श्रीहरिने भूतों और मातृगणोंके अध्यक्ष विरूपाक्ष (रुद्र) की रचना की ॥ ३४ ॥

शासितारं च पापानां पितॄणां समवर्तिनम् । असृजत् सर्वभूतात्मा निधिपं च धनेश्वरम् ॥ ३५ ॥ सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा श्रीहरिने पापियोंको दण्ड देनेवाले तथा पितरोंके समवर्ती यमराजको और सम्पूर्ण निधियोंके पालक धनाध्यक्ष कुबेरको उत्पन्न किया ॥ ३५ ॥

यादसामसृजन्नाथं वरुणं च जलेश्वरम् । वासवं सर्वदेवानामध्यक्षमकरोत् प्रभुः ॥ ३६ ॥ इसी प्रकार उन्होंने जल-जन्तुओंके स्वामी जलेश्वर वरुणकी सृष्टि की। उन्हीं भगवान्ने इन्द्रको सम्पूर्ण देवताओंका अध्यक्ष बनाया ॥ ३६ ॥

यावद्यावदभूच्छ्रद्धा देहं धारयितुं नृणाम् । तावत् तावदजीवंस्ते नासीद् यमकृतं भयम् ॥ ३७ ॥ पहले मनुष्योंको जितने दिनोंतक शरीर धारण करनेकी इच्छा होती, उतने दिनोंतक वे जीवित रहते थे। उन्हें यमराजका कोई भय नहीं होता था ॥ ३७ ॥

न चैषां मैथुनो धर्मो बभूव भरतर्षभ । संकल्पादेव चैतेषामपत्यमुपपद्यते ॥ ३८ ॥

भरतश्रेष्ठ! पहलेके लोगोंमें मैथुनधर्मकी प्रवृत्ति नहीं हुई थी। इन सबको संकल्पसे ही संतान पैदा होती थी॥ ३८॥
ततस्त्रेतायुगे काले संस्पर्शाज्जायते प्रजा।
न ह्यभून्मैथुनो धर्मस्तेषामपि जनाधिप॥ ३९॥
तदनन्तर त्रेतायुगका समय आनेपर स्पर्श करनेमात्रसे संतानकी उत्पत्ति होने लगी। नरेश्वर! उस समयके लोगोंमें भी मैथुन-धर्मका प्रचार नहीं हुआ था॥ ३९॥
द्वापरे मैथुनो धर्मः प्रजानामभवन्नृप।
तथा कलियुगे राजन् द्वन्द्वमापेदिरे जनाः॥ ४०॥
नरेश्वर! द्वापरयुगमें प्रजाके मनमें मैथुनधर्मका सूत्रपात हुआ। राजन्! उसी तरह कलियुगमें भी लोग मैथुनधर्मको प्राप्त होने लगे॥ ४०॥
एष भूतपतिस्तात स्वध्यक्षश्च तथोच्यते।
निरपेक्षांश्च कौन्तेय कीर्तयिष्यामि तच्छृणु॥ ४१॥
तात कुन्तीनन्दन! ये भगवान् श्रीकृष्ण ही भूतनाथ एवं सबके अध्यक्ष कहे जाते हैं। अब जो नरकका दर्शन करनेवाले हैं, उनका वर्णन करता हूँ, सुनो॥ ४१॥
दक्षिणापथजन्मानः सर्वे नरवरान्ध्रकाः।
गुहाः पुलिन्दाः शबराश्चुचुका मद्रकैः सह॥ ४२॥
नरेश्वर! दक्षिण भारतमें जन्म लेनेवाले सभी आन्ध्र, गुह, पुलिन्द, शबर, चूचुक और मद्रक-ये सब-के-सब म्लेच्छ हैं॥ ४२॥
उत्तरापथजन्मानः कीर्तयिष्यामि तानपि।
यौनकाम्बोजगान्धाराः किराता बर्बरैः सह॥ ४३॥
एते पापकृतस्तात चरन्ति पृथिवीमिमाम्।
तात! अब उत्तर भारतमें जन्म लेनेवाले म्लेच्छोंका वर्णन करूँगा; यौन, काम्बोज, गान्धार, किरात और बर्बर—ये सब-के-सब पापाचारी होकर इस सारी पृथ्वीपर विचरते रहते हैं॥ ४३ १/२॥
श्वपाकबलगृध्राणां सधर्माणो नराधिप॥ ४४॥
नैते कृतयुगे तात चरन्ति पृथिवीमिमाम्।
नरेश्वर! ये सब-के-सब चाण्डाल, कौए और गीधोंके समान आचार-विचारवाले हैं। ये सत्ययुगमें इस पृथ्वीपर नहीं विचरण करते हैं॥ ४४ १/२॥
त्रेताप्रभृति वर्धन्ते ते जना भरतर्षभ॥ ४५॥
ततस्तस्मिन् महाघोरे संध्याकाल उपस्थिते।
राजानः समसज्जन्त समासाद्येतरेतरम्॥ ४६॥
भरतश्रेष्ठ! त्रेतासे वे लोग बढ़ने लगे थे। तदनन्तर त्रेता और द्वापरका महाघोर संध्याकाल उपस्थित होनेपर राजालोग एक दूसरेसे टक्कर लेकर युद्धमें आसक्त

हुए॥ ४५-४६॥ एवमेष कुरुश्रेष्ठ प्रादुर्भूतो महात्मना। कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार महात्मा श्रीकृष्णने इस लोकको उत्पन्न किया है॥ ४६ १/२ ॥ (तपः स्वरूपो महादेवः कृष्णो देवकिनन्दनः। तस्य प्रसादाद् दुःखस्य नाशं प्राप्स्यसि मानद॥ एकः कर्ता स कृष्णश्च ज्ञानिनां परमा गतिः। सबको मान देनेवाले नरेश! महान् देवता भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्ण तपस्यारूप ही हैं। उन्हींकी कृपासे तुम्हारे सारे दुःखोंका नाश हो जायगा। एकमात्र जगत्स्रष्टा श्रीकृष्ण ज्ञानियोंकी परमगति हैं॥ इदमाश्रित्य देवेन्द्रो देवा रुद्रास्तथाश्विनौ॥ स्वे स्वे पदे विविशिरे भुक्तिमुक्तिविदो जनाः। तपस्यारूप इन श्रीकृष्णका आश्रय लेकर देवराज इन्द्र अन्यान्य देवता, रुद्रगण, दोनों अश्विनीकुमार तथा भोग और मोक्षके तत्त्वको जाननेवाले महर्षि अपने-अपने पदपर प्रतिष्ठित रहते हैं॥ श्रूयतामस्य सद्भावः सम्यग्ज्ञानं यथा तव। भूतानामन्तरात्मासौ स नित्यपदसंवृतः॥ वे सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं तथा नित्य वैकुण्ठधाममें अपनी योगमायासे आवृत्त होकर निवास करते हैं। उनकी सत्ता और महत्ताको तुम श्रवण करो, जिससे तुम्हें श्रीकृष्णतत्त्वका ज्ञान हो जाय॥ पुरा देवऋषिः श्रीमान् नारदः परमार्थवान्। चचार पृथिवीं कृत्स्नां तीर्थान्यनुचरन् प्रभुः॥ पहलेकी बात है परमार्थसे सम्पन्न देवर्षि श्रीनारदजी भूमण्डलके सम्पूर्ण तीर्थोंमें विचरण करते हुए घूम रहे थे॥ हिमवत्पादमाश्रित्य विचार्य च पुनः पुनः। स ददर्श हृदं तत्र पद्मोत्पलसमाकुलम्॥ वे हिमालयके समीपवर्ती पर्वतपर बारंबार विचरण करके एक ऐसे स्थानपर गये, जहाँ उन्हें कमल और उत्पलसे भरा हुआ एक सरोवर दिखायी दिया॥ ततः स्नात्वा महातेजा वाग्यतो नियतेन्द्रियः। तुष्टाव पुरुषव्याघ्रो जिज्ञासुश्च तदद्भुतम्॥ तत्पश्चात् महातेजस्वी पुरुषप्रवर नारदने उस सरोवरमें मौनभावसे स्नान करके इन्द्रियोंको संयममें रखकर उस भगवान्‌के स्वरूपका अद्भुत रहस्य जाननेके लिये भगवान्‌की स्तुति की॥ ततो वर्षशते पूर्णे भगवाँल्लोकभावनः।

प्रादुश्चकार विश्वात्मा ऋषेः परमसौहृदात् ।।
तदनन्तर सौ वर्ष पूर्ण होनेपर लोकस्रष्टा विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि ऋषिके प्रति परम सौहार्दवश उनके सामने प्रकट हुए ।।

तमागतं जगन्नाथं सर्वकारणकारणम् ।
अखिलामरमौल्यङ्गरुकमारुणपदद्वयम् ।।
वैनतेयपदस्पर्शकिणशोभितजानुकम् ।
पीताम्बरलसत्काञ्चीदामबद्धकटीतटम् ।।
श्रीवत्सवक्षसं चारुमणिकौस्तुभकन्धरम् ।
मन्दस्मितमुखाम्भोजं चलदायतलोचनम् ।।
नम्रचापानुकरणनम्रभ्रूयुगशोभितम् ।
नानारत्नमणिवज्रस्फुरन्मकरकुण्डलम् ।।
इन्द्रनीलनिभाभं तं केयूरमुकुटोज्ज्वलम् ।
देवैरिन्द्रपुरोगैश्च ऋषिषङ्घैरभिष्टुतम् ।।
नारदो जयशब्देन ववन्दे शिरसा हरिम् ।

नारदजीने देखा, समस्त कारणोंके भी कारण भगवान् जगन्नाथ पधारे हैं। उनके युगल चरणारविन्द सम्पूर्ण देवताओंके सुवर्णमय मुकुटोंके कुंकुमसे रक्तवर्ण हो रहे हैं। गरुड़जीके ऊपर सवारी करनेसे उनके दोनों घुटनोंमें रगड़ पड़नेके कारण चिह्न बन गये हैं; जो उन घुटनोंकी शोभा बढ़ा रहे हैं। उनके श्यामसुन्दर अंगपर पीताम्बर शोभा पा रहा है और कटिप्रदेशमें किंकिणीकी लड़ें बँधी हुई हैं। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सकी सुनहरी रेखा शोभा पाती है। गलेमें मनोहर कौस्तुभमणि अपना प्रकाश बिखेर रही है। मुखारविन्दपर मन्द-मन्द मुसकानकी मनोहर घटा छा रही है। विशाल नेत्र चंचल गतिसे इधर-उधर देख रहे हैं। झुके हुए दो धनुषोंकी भाँति बाँकी भौंहें उनके मुखमण्डलकी शोभा बढ़ा रही हैं। नाना प्रकारके रत्न, मणि और हीरोंसे जटिल मकराकार कुण्डल जगमगा रहे हैं। उनकी अंगकान्ति इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है। बाँहोंमें केयूर तथा मस्तकपर मुकुटकी उज्ज्वल आभा छिटक रही है एवं इन्द्र आदि देवता और महर्षियोंके समुदाय उनकी स्तुति करते हैं। भगवान्‌की यह झाँकी देखकर जय-जयकार करते हुए नारदजीने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया ।।

ततः स भगवान् श्रीमान् मेघगम्भीरया गिरः ।
प्राहेशः सर्वभूतानां नारदं पतितं क्षितौ ।।

तदनन्तर नारदजीको पृथ्वीपर पड़ा देख सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीमान् भगवान् नारायणने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा ।।

श्रीभगवानुवाच

भद्रमस्तु ऋषे तुभ्यं वरं वरय सुव्रत । यत्ते मनसि सुव्यक्तमस्ति च प्रददामि तत् ॥ श्रीभगवान् बोले— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवर्षे! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हुई हो, उसे स्पष्ट बताओ। मैं उसे पूर्ण करूँगा॥

भीष्म उवाच

स चेमं जयशब्देन प्रसीदेत्यातुरो मुनिः । प्रोवाच हृदि संरूढं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ विवक्षितं जगन्नाथ मया ज्ञातं त्वयाच्युत । तत् प्रसीद हृषीकेश श्रोतुमिच्छामि तद्धरे ॥ भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! प्रेमसे आतुर हुए मुनिवर नारदने जय-जयकार करते हुए अपने हृदयमें नित्य विराजमान रहनेवाले शंख, चक्र और गदाधारी भगवान्‌से कहा—‘प्रभो! प्रसन्न होइये। जगन्नाथ! अच्युत! हृषीकेश! हरे! मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, वह आपको पहलेसे ही ज्ञात है। मैं उसीको सुनना चाहता हूँ। आप मुझपर कृपा करें’॥

ततः स्मयन् महाविष्णुरभ्यभाषत नारदम् । निर्द्वन्द्वा निरहङ्काराः शुचयः शुद्धलोचनाः ॥ ते मां पश्यन्ति सततं तान् पृच्छ यदिहेच्छसि । तब मुसकराते हुए भगवान् महाविष्णुने नारदजीसे कहा—‘जो लोग शीत, उष्ण आदि द्वन्द्वोंसे रहित, अहंकारशून्य, पवित्र तथा निर्दोष दृष्टिवाले महात्मा हैं वे निरन्तर मेरे उस स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं; अतः तुम यहाँ जो कुछ चाहते हो, उसके विषयमें उन्हीं महात्माओंके पास जाकर प्रश्न करो।।

ये योगिनो महाप्राज्ञा मदंशा ये व्यवस्थिताः । तेषां प्रसादं देवर्षे मत्प्रसादमवैहि तत् ॥ ‘देवर्षे! जो लोग योगी और महाज्ञानी हैं; तथा जो मेरे अंशरूपसे स्थित हैं, उनके प्रसादको तुम मेरा ही कृपाप्रसाद समझो’॥

इत्युक्त्वा स जगामाथ भगवान् भूतभावनः । तस्माद् व्रज हृषीकेशं कृष्णं देवकिनन्दनम् ॥ ऐसा कहकर भूतभावन भगवान् विष्णु वहाँसे चले गये; अतः युधिष्ठिर! तुम भी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी भगवान् देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी शरणमें जाओ ।।

एतमाराध्य गोविन्दं गता मुक्तिं महर्षयः । एष कर्ता विकर्ता च सर्वकारणकारणम् ॥