महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जाता है ।। १२ ।।
इति सर्वान् गुणानेतान् यथोक्तान् योऽनुवर्तते ।
अनुभूयेह भद्राणि प्रेत्य स्वर्गे महीयते ।। १३ ।।
जो राजा यथार्थरूपसे बताये गये इन सभी गुणोंका अनुवर्तन करता है, वह इस जगत्में कल्याणका अनुभव करके मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।।
वैशम्पायन उवाच
इदं वचः शान्तनवस्य शुश्रुवान्
युधिष्ठिरः पाण्डवमुख्यसंवृतः ।
तदा ववन्दे च पितामहं नृपो
यथोक्तमेतच्च चकार बुद्धिमान् ।। १४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मका यह उपदेश सुनकर पाण्डवोंसे और प्रधान राजाओंसे घिरे हुए बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरने उन्हें प्रणाम किया और उन्होंने जैसा बताया था, वैसा ही किया ।। १४ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सप्ततितमोऽध्यायः ।। ७० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७० ।।
धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन
एकसप्ततितमोऽध्यायः
धर्मपूर्वक प्रजाका पालन ही राजाका महान् धर्म है, इसका प्रतिपादन
युधिष्ठिर उवाच
कथं राजा प्रजा रक्षन्नाधिबन्धेन युज्यते ।
धर्मेण नापराध्नोति तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! किस प्रकार प्रजाका पालन करनेवाला राजा चिन्तामें नहीं पड़ता और धर्मके विषयमें अपराधी नहीं होता, यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
समासेनैव ते राजन् धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान् ।
विस्तरेणैव धर्माणां न जात्वन्तमवाप्नुयात् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! मैं संक्षेपसे ही तुम्हारे लिये सनातन राजधर्मोंका वर्णन करूँगा। विस्तारसे वर्णन आरम्भ करूँ तो उन धर्मोंका कभी अन्त ही नहीं हो सकता ॥ २ ॥
धर्मनिष्ठान् श्रुतवतो वेदव्रतसमाहितान् ।
अर्चयित्वा यजेथास्त्वं गृहे गुणवतो द्विजान् ॥ ३ ॥
प्रत्युत्थायोपसंगृह्य चरणावभिवाद्य च ।
अथ सर्वाणि कुर्वीथाः कार्याणि सपुरोहितः ॥ ४ ॥
जब घरपर वेदव्रतपरायण, शास्त्रज्ञ एवं धर्मिष्ठ गुणवान् ब्राह्मण पधारें, उस समय उन्हें देखते ही खड़े हो उनका स्वागत करो। उनके चरण पकड़कर प्रणाम करो और उनकी विधिपूर्वक अर्चन करके पूजा करो। तदनन्तर पुरोहितको साथ लेकर समस्त आवश्यक कार्य सम्पन्न करो ॥ ३-४ ॥
धर्मकार्याणि निर्वर्त्य मङ्गलानि प्रयुज्य च ।
ब्राह्मणान् वाचयेथास्त्वमर्थसिद्धिर्जयाशिषः ॥ ५ ॥
पहले संध्या-वन्दन आदि धार्मिक कृत्य पूर्ण करके माङ्गलिक वस्तुओंका दर्शन करनेके पश्चात् ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराओ और अर्थसिद्धि एवं विजयके लिये उनके आशीर्वाद ग्रहण करो ॥ ५ ॥
आर्जवेन च सम्पन्नो धृत्या बुद्ध्या च भारत ।
यथार्थं प्रतिगृह्णीयात् कामक्रोधौ च वर्जयेत् ॥ ६ ॥
भरतनन्दन! राजाको चाहिये कि वह सरल स्वभावसे सम्पन्न हो, धैर्य तथा बुद्धिके बलसे सत्यको ही ग्रहण करे और काम-क्रोधका परित्याग कर दे ।। ६ ।।
कामक्रोधौ पुरस्कृत्य योऽर्थं राजानुतिष्ठति । न स धर्मं न चाप्यर्थं प्रतिगृह्णाति बालिशः ।। ७ ।। जो राजा काम और क्रोधका आश्रय लेकर धन पैदा करना चाहता है, वह मूर्ख न तो धर्मको पाता है और न धन ही उसके हाथ लगता है ।। ७ ।।
मा स्म लुब्धांश्च मूर्खांश्च कामार्थे च प्रयुयुजः । अलुब्धान् बुद्धिसम्पन्नान् सर्वकर्मसु योजयेत् ।। ८ ।। तुम लोभी और मूर्ख मनुष्योंको काम और अर्थके साधनमें न लगाओ। जो लोभरहित और बुद्धिमान् हों, उन्हींको समस्त कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये ।। ८ ।।
मूर्खो ह्यधिकृतोऽर्थेषु कार्याणामविशारदः । प्रजाः क्लिश्नात्ययोगेन कामक्रोधसमन्वितः ।। ९ ।। जो कार्यसाधनमें कुशल नहीं है और काम तथा क्रोधके वशमें पड़ा हुआ है, ऐसे मूर्ख मनुष्यको यदि अर्थसंग्रहका अधिकारी बना दिया जाय तो वह अनुचित उपायसे प्रजाओंको क्लेश पहुँचाता है ।। ९ ।।
बलिषष्ठेन शुक्लेन दण्डेनाथापराधिनाम् । शास्त्रानीतेन लिप्सेथा वेतनेन धनागमम् ।। १० ।। प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें ग्रहण करके; उचित शुल्क या टैक्स लेकर, अपराधियोंको आर्थिक दण्ड देकर तथा शास्त्रके अनुसार व्यापारियोंकी रक्षा आदि करनेके कारण उनके दिये हुए वेतन लेकर इन्हीं उपायों तथा मार्गोंसे राजाको धन-संग्रहकी इच्छा रखनी चाहिये ।। १० ।।
दापयित्वा करं धर्म्यं राष्ट्रं नीत्या यथाविधि । तथैतं कल्पयेद् राजा योगक्षेममतन्द्रितः ।। ११ ।। प्रजासे धर्मानुकूल कर ग्रहण करके राज्यका नीतिके अनुसार विधिपूर्वक पालन करते हुए राजाको आलस्य छोड़कर प्रजावर्गके योगक्षेमकी व्यवस्था करनी चाहिये ।। ११ ।।
गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम् । अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः ।। १२ ।। जो राजा आलस्य छोड़कर रण-द्वेषसे रहित हो सदा प्रजाकी रक्षा करता है, दान देता है तथा निरन्तर धर्म एवं न्यायमें तत्पर रहता है, उसके प्रति प्रजावर्गके सभी लोग अनुरक्त होते हैं ।। १२ ।।
मा स्माधर्मेण लोभेन लिप्सेथास्त्वं धनागमम् । धर्मार्थावध्रुवौ तस्य यो न शास्त्रपरो भवेत् ।। १३ ।।
राजन्! तुम लोभवश अधर्ममार्गसे धन पानेकी कभी इच्छा न करना; क्योंकि जो लोग शास्त्रके अनुसार नहीं चलते हैं, उनके धर्म और अर्थ दोनों ही अस्थिर एवं अनिश्चित होते हैं॥ १३॥ अपशास्त्रपरो राजा धर्मार्थान्नाधिगच्छति। अस्थाने चास्य तद् वित्तं सर्वमेव विनश्यति॥ १४॥ शास्त्रसे विपरीत चलनेवाला राजा न तो धर्मकी सिद्धि कर पाता है और न अर्थकी ही। यदि उसे धन मिल भी जाय तो वह सारा ही बुरे कामोंमें नष्ट हो जाता है॥ १४॥ अर्थमूलोऽपि हिंसां च कुरुते स्वयमात्मनः। करैरशास्त्रदृष्टैर्हि मोहात् सम्पीडयन् प्रजाः॥ १५॥ जो धनका लोभी राजा मोहवश प्रजासे शास्त्रविरुद्ध अधिक कर लेकर उसे कष्ट पहुँचाता है, वह अपने ही हाथों अपना विनाश करता है॥ १५॥ ऊधश्छिन्द्यात् तु यो धेन्वाः क्षीरार्थी न लभेत् पयः। एवं राष्ट्रमयोगेन पीडितं न विवर्धते॥ १६॥ जैसे दूध चाहनेवाला मनुष्य यदि गायका थन काट ले तो इससे वह दूध नहीं पा सकता, उसी प्रकार राज्यमें रहनेवाली प्रजाका अनुचित उपायसे शोषण किया जाय तो उससे राष्ट्रकी उन्नति नहीं होती॥ १६॥ यो हि दोग्ध्रीमुपास्ते च स नित्यं विन्दते पयः। एवं राष्ट्रमुपायेन भुञ्जानो लभते फलम्॥ १७॥ जो दूध देनेवाली गायकी प्रतिदिन सेवा करता है, वही दूध पाता है; इसी प्रकार उचित उपायसे राष्ट्रकी रक्षा करनेवाला राजा ही उससे लाभ उठाता है॥ १७॥ अथ राष्ट्रमुपायेन भुज्यमानं सुरक्षितम्। जनयत्यतुलां नित्यं कोशवृद्धिं युधिष्ठिर॥ १८॥ युधिष्ठिर! न्यायसंगत उपायसे राष्ट्रको सुरक्षित रखते हुए उसका उपभोग किया जाय अर्थात् करके रूपमें उससे धन लिया जाय तो वह सदा राजाके कोशकी अनुपम वृद्धि करता है॥ १८॥ दोग्ध्री धान्यं हिरण्यं च मही राज्ञा सुरक्षिता। नित्यं स्वेभ्यः परेभ्यश्च तृप्ता माता यथा पयः॥ १९॥ जैसे माता स्वयं तृप्त रहनेपर ही बालकको यथेष्ट दूध पिलाती है, उसी प्रकार राजासे सुरक्षित होनेपर ही यह दुधारू गायके समान पृथ्वी राजाके स्वजनों तथा दूसरे लोगोंको सदा अन्न एवं सुवर्ण देती है॥ १९॥ मालाकारोपमो राजन् भव माऽऽङ्गारिकोपमः। तथायुक्तश्चिरं राज्यं भोक्तं शक्ष्यसि पालयन्॥ २०॥
युधिष्ठिर! तुम मालीके समान बनो। कोयला बनानेवालेके समान न बनो (माली वृक्षकी जड़को सींचता और उसकी रक्षा करता है, तब उससे फल और फूल ग्रहण करता है, परंतु कोयला बनानेवाला वृक्षको समूल नष्ट कर देता है; उसी प्रकार तुम भी माली बनकर राज्यरूपी उद्यानको सींचकर सुरक्षित रखो और फल-फूलकी तरह प्रजासे न्यायोचित कर लेते रहो, कोयला बनानेवालेकी तरह सारे राज्यको जलाकर भस्म न करो), ऐसा करके प्रजापालनमें तत्पर रहकर तुम दीर्घकालतक राज्यका उपभोग कर सकोगे ।। २० ।।
परचक्राभियानेन यदि ते स्याद् धनक्षयः ।
अथ साम्नैव लिप्सेथा धनमब्राह्मणेषु यत् ।। २१ ।।
यदि शत्रुओंके आक्रमणसे तुम्हारे धनका नाश हो जाय तो भी सान्त्वनापूर्ण मधुर वाणीद्वारा ही ब्राह्मणेतर प्रजासे धन लेनेकी इच्छा रखो ।। २१ ।।
मा स्म ते ब्राह्मणं दृष्ट्वा धनस्थं प्रचलन्मनः ।
अन्त्यायामप्यवस्थायां किमु स्फीतस्य भारत ।। २२ ।।
भरतनन्दन! धनसम्पन्न अवस्थाकी तो बात ही क्या है? तुम अत्यन्त निर्धन अवस्थामें पड़ जाओ तो भी ब्राह्मणको धनी देखकर उसका धन लेनेके लिये तुम्हारा मन चञ्चल नहीं होना चाहिये ।। २२ ।।
धनानि तेभ्यो दद्यास्त्वं यथाशक्ति यथार्हतः ।
सान्त्वयन् परिरक्षंश्च स्वर्गमाप्स्यसि दुर्जयम् ।। २३ ।।
राजन्! तुम ब्राह्मणोंको सान्त्वना देते और उनकी रक्षा करते हुए उन्हें यथाशक्ति यथायोग्य धन देते रहना, इससे तुम्हें दुर्जय स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी ।। २३ ।।
एवं धर्मेण वृत्तेन प्रजास्त्वं परिपालय ।
स्वन्तं पुण्यं यशो नित्यं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ।। २४ ।।
कुरुनन्दन! इस प्रकार तुम धर्मानुकूल बर्ताव करते हुए प्रजाजनोंका पालन करो। इससे परिणाममें सुखद पुण्य तथा चिरस्थायी यश प्राप्त कर लोगे ।। २४ ।।
धर्मेण व्यवहारेण प्रजाः पालय पाण्डव ।
युधिष्ठिर यथा युक्तो नाधिबन्धेन योक्ष्यसे ।। २५ ।।
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! तुम धर्मानुकूल बर्ताव करते हुए प्रजाका पालन करते रहो, जिससे युक्त रहकर तुम्हें कभी भी चिन्ता या पश्चात्ताप न हो ।। २५ ।।
एष एव परो धर्मो यद् राजा रक्षति प्रजाः ।
भूतानां हि यथा धर्मो रक्षणं परमा दया ।। २६ ।।
राजा जो प्रजाकी रक्षा करता है, यही उसका सबसे बड़ा धर्म है। समस्त प्राणियोंकी रक्षा तथा उनके प्रति परम दया ही महान् धर्म है ।। २६ ।।
तस्मादेवं परं धर्मं मन्यन्ते धर्मकोविदाः ।
यो राजा रक्षणे युक्तो भूतेषु कुरुते दयाम् ।। २७ ।।
इसलिये जो राजा प्रजापालनमें तत्पर रहकर प्राणियोंपर दया करता है, उसके इस बर्तावको धर्मज्ञ पुरुष परम धर्म मानते हैं ॥ २७ ॥
यदह्ना कुरुते पापमरक्षन् भयत: प्रजा: ।
राजा वर्षसहस्रेण तस्यान्तमधिगच्छति ॥ २८ ॥
राजा प्रजाकी भयसे रक्षा न करनेके कारण एक दिनमें जिस पापका भागी होता है, उसका परिणाम उसे एक हजार वर्षोंतक भोगना पड़ता है ॥ २८ ॥
यदह्ना कुरुते धर्मं प्रजा धर्मेण पालयन् ।
दशवर्षसहस्राणि तस्य भुंक्ते फलं दिवि ॥ २९ ॥
और प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करनेके कारण राजा एक दिनमें जिस धर्मका भागी होता है, उसका फल वह दस हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें रहकर भोगता है ॥ २९ ॥
स्विष्टि: स्वधीति: सुतपा लोकाञ्जयति यावत: ।
क्षणेन तानवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ३० ॥
उत्तम यज्ञके द्वारा गृहस्थ-धर्मका, उत्तम स्वाध्यायके द्वारा ब्रह्मचर्यका तथा श्रेष्ठ तपके द्वारा वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाला पुरुष जितने पुण्यलोकोंपर अधिकार प्राप्त करता है, धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करनेवाला राजा उन्हें क्षणभरमें पा लेता है ॥ ३० ॥
एवं धर्मं प्रयत्नेन कौन्तेय परिपालय ।
तत: पुण्यफलं लब्ध्वा नाधिबन्धेन योक्ष्यसे ॥ ३१ ॥
कुन्तीनन्दन! इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक धर्मका पालन करो। इससे पुण्यका फल पाकर तुम कभी चिन्तामें नहीं पड़ोगे ॥ ३१ ॥
स्वर्गलोके सुमहतीं श्रियं प्राप्स्यसि पाण्डव ।
असम्भवश्च धर्मानामीदृशानामराजसु ॥ ३२ ॥
पाण्डुनन्दन! धर्मपालन करनेसे स्वर्गलोकमें तुम्हें बड़ी भारी सुख-सम्पत्ति प्राप्त होगी। जो राजा नहीं हैं, उन्हें ऐसे धर्मोंका लाभ मिलना असम्भव है ॥ ३२ ॥
तस्माद् राजैव नान्योऽस्ति यो धर्मफलमाप्नुयात् ।
स राज्यं धृतिमान् प्राप्य धर्मेण परिपालय ।
इन्द्रं तर्पय सोमेन कामैश्च सुहृदो जनान् ॥ ३३ ॥
इसलिये धर्मात्मा राजा ही ऐसे धर्मका फल पाता है, दूसरा नहीं। तुम धैर्यवान् तो हो ही। यह राज्य पाकर धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। यज्ञमें सोमरसद्वारा इन्द्रको तृप्त करो और मनोवांछित वस्तु प्रदान करके सुहृदोंको संतुष्ट करो ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि एकसप्ततितमोऽध्याय: ॥ ७१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।
अध्याय (पृष्ठ 497)
द्विसप्ततितमोऽध्यायः
राजाके लिये सदाचारी विद्वान् पुरोहितकी आवश्यकता तथा प्रजापालनका महत्त्व
भीष्म उवाच
य एव तु सतो रक्षेदसतःश्च निवर्तयेत् ।
स एव राज्ञः कर्तव्यो राजन् राजपुरोहितः ॥ १ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! राजाको चाहिये कि वह एक ऐसे विद्वान् ब्राह्मणको अपना पुरोहित बनाये, जो उसके सत्कर्मोंकी रक्षा करे और उसे असत् कर्मसे दूर रखे (तथा जो उसके शुभकी रक्षा और अशुभका निवारण करे) ॥ १ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पुरूरवस ऐलस्य संवादं मातरिश्वनः ॥ २ ॥
इस विषयमें विद्वान् लोग इला कुमार पुरूरवा तथा वायुके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥
पुरूरवा उवाच
कुतःस्विद् ब्राह्मणो जातो वर्णाश्चापि कुतस्त्रयः ।
कस्माच्च भवति श्रेष्ठस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
**पुरूरवाने पूछा—**वायुदेव! ब्राह्मणकी उत्पत्ति किससे हुई है? अन्य तीनों वर्ण भी किससे उत्पन्न हुए हैं तथा ब्राह्मण उन सबसे श्रेष्ठ क्यों है? यह मुझे स्पष्टरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥
मातरिश्वोवाच
ब्राह्मणो मुखतः सृष्टो ब्रह्मणो राजसत्तम ।
बाहुभ्यां क्षत्रियः सृष्ट ऊरुभ्यां वैश्य एव च ॥ ४ ॥
**वायुने कहा—**नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके मुखसे ब्राह्मणकी, दोनों भुजाओंसे क्षत्रियकी तथा दोनों ऊरुओंसे वैश्यकी सृष्टि हुई है ॥ ४ ॥
वर्णानां परिचर्यार्थं त्रयाणां भरतर्षभ ।
वर्णश्चतुर्थः पश्चात् तु पद्भ्यां शूद्रो विनिर्मितः ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसके बाद इन तीनों वर्णोंकी सेवाके लिये ब्रह्माजीके दोनों पैरोंसे चौथे वर्ण शूद्रकी रचना हुई ॥ ५ ॥
ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामनुजायते ।
ईश्वरः सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये ॥ ६ ॥
ब्राह्मण जन्मकालसे ही भूतलपर धर्मकोशकी रक्षाके लिये अन्य सब वर्णोंका नियन्ता होता है ।। ६ ।। अतः पृथिव्या यन्तारं क्षत्रियं दण्डधारिणम् । द्वितीयं वर्णमकरोत् प्रजानामनुगुप्तये ।। ७ ।। तदनन्तर ब्रह्माजीने पृथ्वीपर शासन करनेवाले और दण्डधारणमें समर्थ दूसरे वर्ण क्षत्रियको प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये नियुक्त किया ।। ७ ।। वैश्यस्तु धनधान्येन त्रीन् वर्णान् विध्यादिमान् । शूद्रो ह्येतान् परिचरेदिति ब्रह्मानुशासनम् ।। ८ ।। वैश्य धन-धान्यके द्वारा इन तीनों वर्णोंका पोषण करे और शूद्र शेष तीनों वर्णोंकी सेवामें संलग्न रहे, यह ब्रह्माजीका आदेश है ।। ८ ।।
ऐल उवाच
द्विजस्य क्षत्रबन्धोर्वा कस्येयं पृथिवी भवेत् । धर्मतः सह वित्तेन सम्यग् वायो प्रचक्ष्व मे ।। ९ ।। पुरूरवाने पूछा—वायुदेव! धन-धान्यसहित यह पृथ्वी धर्मतः किसकी है? ब्राह्मणकी या क्षत्रियकी? यह मुझे ठीक-ठीक बताइये ।। ९ ।।
वायुरुवाच
विप्रस्य सर्वमेवैतद् यत्र किञ्चिज्जगतीगतम् । ज्येष्ठेनाभिजनेनेह तद्धर्मकुशला विदुः ।। १० ।। वायुदेवने कहा—राजन्! धर्मनिपुण विद्वान् ऐसा मानते हैं कि उत्तम स्थानसे उत्पन्न और ज्येष्ठ होनेके कारण इस पृथ्वीपर जो कुछ है, वह सब ब्राह्मणका ही है ।। १० ।। स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च । गुरुर्हि सर्ववर्णानां ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च वै द्विजः ।। ११ ।। ब्राह्मण अपना ही खाता, अपना ही पहनता और अपना ही देता है। निश्चय ही ब्राह्मण सब वर्णोंका गुरु, ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है ।। ११ ।। पत्यभावे यथैव स्त्री देवरं कुरुते पतिम् । आनन्तर्यात् तथा क्षत्रं पृथिवी कुरुते पतिम् । एष ते प्रथमः कल्प आपद्यन्यो भवेत् ततः ।। १२ ।। जैसे वाग्दानके अनन्तर पतिके मर जानेपर स्त्री देवरको पति बनाती है*, उसी प्रकार पृथ्वी ब्राह्मणके बाद ही क्षत्रियका पतिरूपमें वरण करती है, यह तुम्हें मैंने अनादि कालसे प्रचलित प्रथम श्रेणीका नियम बताया है। आपत्तिकालमें इसमें फेर-फार भी हो सकता है ।। १२ ।। यदि स्वर्गं परं स्थानं स्वधर्मं परिमार्गसि ।
यत् किञ्चिज्जयसे भूमिं ब्राह्मणाय निवेदय ।। १३ ।।
श्रुतवृत्तोपपन्नाय धर्मज्ञाय तपस्विने ।
स्वधर्मपरितृप्ताय यो न वित्तपरो भवेत् ।। १४ ।।
यदि तुम स्वधर्म-पालनके फलस्वरूप स्वर्गलोकमें उत्तम स्थानकी खोज कर रहे हो (चाहते हो) तो जितनी भूमिपर तुम विजय प्राप्त करो, वह सब शास्त्र और सदाचारसे सम्पन्न, धर्मज्ञ, तपस्वी तथा स्वधर्मसे संतुष्ट ब्राह्मणको पुरोहित बनाकर सौंप दो, जो कि धनोपार्जनमें आसक्त न हो ।। १३-१४ ।।
यो राजानं नयेद् बुद्ध्या सर्वतः परिपूर्णया ।
ब्राह्मणो हि कुले जातः कृतप्रज्ञो विनीतवान् ।। १५ ।।
श्रेयो नयति राजानं ब्रुवंश्चित्रां सरस्वतीम् ।
राजा चरति यद् धर्मं ब्राह्मणेन निदर्शितम् ।। १६ ।।
तथा जो सर्वतोभावसे परिपूर्ण अपनी बुद्धिके द्वारा राजाको सन्मार्गपर ले जा सके; क्योंकि जो ब्राह्मण उत्तम कुलमें उत्पन्न, विशुद्ध बुद्धिसे युक्त और विनयशील होता है, वह विचित्र वाणी बोलकर राजाको कल्याणके पथपर ले जाता है। जो ब्राह्मणका बताया हुआ धर्म है, उसीको राजा आचरणमें लाता है ।। १५-१६ ।।
शुश्रूषुरनहंवादी क्षत्रधर्मव्रते स्थितः ।
तावता सत्कृतः प्राज्ञश्चिरं यशसि तिष्ठति ।। १७ ।।
तस्य धर्मस्य सर्वस्य भागी राजपुरोहितः ।
क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाला, अहंकारशून्य तथा पुरोहितकी बात सुननेके लिये उत्सुक, उतनेसे ही सम्मानको प्राप्त हुआ विद्वान् नरेश चिरकालतक यशस्वी बना रहता है तथा राजपुरोहित उसके सम्पूर्ण धर्मका भागीदार होता है ।। १७ १/२ ।।
एवमेव प्रजाः सर्वा राजानमभिसंश्रिताः ।। १८ ।।
सम्यग्वृत्ताः स्वधर्मस्था न कुतश्चिद् भयान्विताः ।
इस प्रकार राजाके आश्रयमें रहकर सारी प्रजा सदाचारपरायण, अपने-अपने धर्ममें तत्पर और सब ओरसे निर्भय हो जाती है ।। १८ १/२ ।।
राष्ट्रे चरन्ति यं धर्मं राज्ञा साध्वभिरक्षिताः ।। १९ ।।
चतुर्थं तस्य धर्मस्य राजा भागं तु विन्दति ।
राजाके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित हुए मनुष्य राज्यमें जिस धर्मका आचरण करते हैं, उसका एक चौथाई भाग राजा भी प्राप्त कर लेता है ।। १९ १/२ ।।
देवा मनुष्याः पितरो गन्धर्वोरगराक्षसाः ।। २० ।।
यज्ञमेवोपजीवन्ति नास्ति चेष्टमराजके ।
देवता, मनुष्य, पितर, गन्धर्व, नाग और राक्षस—ये सबके सब यज्ञका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं; परंतु जहाँ कोई राजा नहीं है, उस राज्यमें यज्ञ नहीं होता है ॥ २० १/२ ॥
इतो दत्तेन जीवन्ति देवताः पितरस्तथा ॥ २१ ॥
राजन्यैवास्य धर्मस्य योगक्षेमः प्रतिष्ठितः ।
देवता और पितर भी इस मर्त्यलोकसे ही दिये गये यज्ञ और श्राद्धसे जीवन यापन करते हैं। अतः इस धर्मका योगक्षेम राजापर ही अवलम्बित है ॥ २१ १/२ ॥
छायायामप्सु वायौ च सुखमुष्णेऽधिगच्छति ॥ २२ ॥
अग्नौ वाससि सूर्ये च सुखं शीतेऽधिगच्छति ।
जब गर्मी पड़ती है, उस समय मनुष्य छायामें, जलमें और वायुमें सुखका अनुभव करता है। इसी प्रकार सर्दी पड़नेपर अग्नि और सूर्यके तापसे तथा कपड़ा ओढ़नेसे उसे सुख मिलता है (परंतु अराजकताका भय उपस्थित होनेपर मनुष्यको कहीं किसी वस्तुसे भी सुख प्राप्त नहीं होता है) ॥ २२ १/२ ॥
शब्दे स्पर्शे रसे रूपे गन्धे च रमते मनः ॥ २३ ॥
तेषु भोगेषु सर्वेषु न भीतो लभते सुखम् ।
अभयस्य हि यो दाता तस्यैव सुमहत् फलम् ।
न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥ २४ ॥
साधारण अवस्थामें प्रत्येक मनुष्यका मन शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धमें आनन्दका अनुभव करता है; परंतु भयभीत मनुष्यको उन सभी भोगोंमें कोई सुख नहीं मिलता है, इसलिये जो अभयदान करनेवाला है, उसीको महान् फलकी प्राप्ति होती है; क्योंकि तीनों लोकोंमें प्राणदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है ॥
इन्द्रो राजा यमो राजा धर्मो राजा तथैव च ।
राजा बिभर्ति रूपाणि राज्ञा सर्वमिदं धृतम् ॥ २५ ॥
राजा इन्द्र है, राजा यमराज है तथा राजा ही धर्मराज है। राजा अनेक रूप धारण करता है और राजाने ही इस सम्पूर्ण जगत्को धारण कर रखा है ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥
* यस्या म्रियते कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः । तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ॥ (मनु० ९।६९)
विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः
विद्वान् सदाचारी पुरोहितकी आवश्यकता तथा ब्राह्मण और क्षत्रियमें मेल रहनेसे लाभविषयक राजा पुरूरवाका उपाख्यान
भीष्म उवाच
राज्ञा पुरोहितः कार्यो भवेद् विद्वान् बहुश्रुतः ।
उभौ समीक्ष्य धर्मार्थावप्रमेयावनन्तरम् ॥ १ ॥
**भीष्मजी बोले—**राजन्! राजाको चाहिये कि धर्म और अर्थकी गतिको अत्यन्त गहन समझकर अविलम्ब किसी ऐसे ब्राह्मणको पुरोहित बना ले, जो विद्वान् और बहुश्रुत हो ॥ १ ॥
धर्मात्मा मन्त्रविद् येषां राज्ञां राजन् पुरोहितः ।
राजा चैवंगुणो येषां कुशलं तेषु सर्वशः ॥ २ ॥
राजन्! जिन राजाओंका पुरोहित धर्मात्मा एवं सलाह देनेमें कुशल होता है और जिनका राजा भी ऐसे ही गुणोंसे सम्पन्न (धर्मपरायण एवं गुप्त बातोंका जाननेवाला) होता है, उन राजा और प्रजाओंका सब प्रकारसे भला होता है ॥ २ ॥
(तेषामर्थश्च कामश्च धर्मश्चेति विनिश्चयः ।
श्लोकांश्चौशनसा गीतांस्तान् निबोध युधिष्ठिर ॥
उच्छिष्टः स भवेद् राजा यस्य नास्ति पुरोहितः ।
उनके धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी निश्चय ही सिद्धि होती है। युधिष्ठिर! इस विषयमें शुक्राचार्यके गाये हुए कुछ श्लोक हैं, उन्हें तुम सुनो। जिस राजाके पास पुरोहित नहीं है, वह उच्छिष्ट (अपवित्र) हो जाता है ॥
रक्षसामसुराणां च पिशाचोरगपक्षिणाम् ।
शत्रूणां च भवेद् वध्यो यस्य नास्ति पुरोहितः ॥
जिसके पास पुरोहित नहीं है, वह राजा राक्षसों, असुरों, पिशाचों, नागों, पक्षियोंका तथा शत्रुओंका वध्य होता है ॥
ब्रूयात् कार्याणि सततं महोत्पातानि यानि च ।
इष्टमङ्गलयुक्तानि तथाऽऽन्तःपुरिकाणि च ॥
पुरोहितको चाहिये कि राजाके लिये जो सदा आवश्यक कर्तव्य हों, जो-जो बड़े बड़े उत्पात होने-वाले हों, जो अभीष्ट तथा माङ्गलिक कृत्य हों तथा जो अन्तःपुरसे सम्बन्ध
रखनेवाले वृत्तान्त हों, वे सब राजाको बतावे ॥ गीतनृत्ताधिकारेषु सम्मतेषु महीपतेः । कर्तव्यं करणीयं वै वैश्वदेवबलिस्तथा ॥ राजाको प्रिय लगनेवाले जो गीत और नृत्यसम्बन्धी कार्य हों, उनमें करनेयोग्य कर्तव्यका पुरोहित निर्देश करे, बलिवैश्वदेवकर्मका सम्पादन करे ॥ नक्षत्रस्यानुकूल्येन यः संजातो नरेश्वरः । राजशास्त्रविनीतश्च श्रेयान् राज्ञः पुरोहितः ॥ जो राजा अनुकूल नक्षत्रमें उत्पन्न हुआ है तथा राजशास्त्रकी पूर्ण शिक्षा प्राप्त कर चुका है, उससे भी श्रेष्ठ उसका पुरोहित होना चाहिये ॥ अथान्यानां निमित्तानामुत्पातानामथार्थवित् ॥ शत्रुपक्षक्षयज्ञश्च श्रेयान् सज्ञः पुरोहितः ।) जो भिन्न-भिन्न प्रकारके निमित्तों और उत्पातोंका रहस्य जानता हो तथा शत्रुपक्षके विनाशकी प्रणालीका भी जानकार हो, ऐसा श्रेष्ठतम पुरुष राजाका पुरोहित होना चाहिये ॥ उभौ प्रजा वर्धयतो देवान् सर्वान् सुतान् पितॄन् । भवेयातां स्थितौ धर्मे श्रद्धेयौ सुतपस्विनौ ॥ ३ ॥ परस्परस्य सुहृदौ विहितौ समचेतसौ । ब्रह्मक्षत्रस्य सम्मानात् प्रजा सुखमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥ यदि राजा और पुरोहित धर्मनिष्ठ, श्रद्धेय तथा तपस्वी हों, एक-दूसरेके प्रति सौहार्द रखते हों और समान हृदयवाले हों तो वे दोनों मिलकर प्रजाकी वृद्धि करते हैं तथा सम्पूर्ण देवताओं एवं पितरोंको तृप्त करके पुत्र और प्रजावर्गको भी अभ्युदयशील बनाते हैं। ऐसे ब्राह्मण (पुरोहित) और क्षत्रिय (राजा) का सम्मान करनेसे प्रजाको सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ३-४ ॥ विमाननात् तयोरेव प्रजा नश्येयुरेव हि । ब्रह्मक्षत्रं हि सर्वेषां वर्णानां मूलमुच्यते ॥ ५ ॥ उन दोनोंका अनादर करनेसे प्रजाका विनाश ही होता है, क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय सभी वर्णोंके मूल कहे जाते हैं ॥ ५ ॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ऐलकश्यपसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ६ ॥ इस विषयमें राजा पुरूरवा और महर्षि कश्यपके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। युधिष्ठिर! तुम उसे सुनो ॥ ६ ॥
ऐल उवाच
यदा हि ब्रह्म प्रजहाति क्षत्रं
क्षत्रं यदा वा प्रजहाति ब्रह्म । अन्वग्बलं कतमेऽस्मिन् भजन्ते तथा वर्णाः कतमेऽस्मिन् ध्रियन्ते ॥ ७ ॥ पुरूरवाने पूछा—महर्षे! ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों साथ रहकर ही सबल होते हैं; परंतु जब ब्राह्मण (पुरोहित) किसी कारणसे क्षत्रियको छोड़ देता है अथवा जब राजा ब्राह्मणका परित्याग कर देता है, तब अन्य वर्णके लोग इन दोनोंमेंसे किसका आश्रय ग्रहण करते हैं? तथा दोनोंमेंसे कौन सबको आश्रय देता है? ॥
कश्यप उवाच
विद्धं राष्ट्रं क्षत्रियस्य भवति ब्रह्म क्षत्रं यत्र विरुद्ध्यतीह । अन्वग्बलं दस्यवस्तद् भजन्ते तथा वर्णं तत्र विदन्ति सन्तः ॥ ८ ॥ कश्यपने कहा—राजन्! श्रेष्ठ पुरुष इस बातको जानते हैं कि संसारमें जहाँ ब्राह्मण क्षत्रियसे विरोध करता है, वहाँ क्षत्रियका राज्य छिन्न-भिन्न हो जाता है और लुटेरे दल-बलके साथ आकर उसपर अधिकार जमा लेते हैं तथा वहाँ निवास करनेवाले सभी वर्णके लोगोंको अपने अधीन कर लेते हैं ॥ ८ ॥
नैषां ब्रह्म च वर्धते नोत पुत्रा न गर्गरो मथ्यते नो यजन्ते । नैषां पुत्रा वेदमधीयते च यदा ब्रह्म क्षत्रियाः संत्यजन्ति ॥ ९ ॥ जब क्षत्रिय ब्राह्मणको त्याग देते हैं, तब उनका वेदाध्ययन आगे नहीं बढ़ता, उनके पुत्रोंकी भी वृद्धि नहीं होती, उनके यहाँ दही-दूधका मटका नहीं मथा जाता और न वे यज्ञ ही कर पाते हैं। इतना ही नहीं, उन ब्राह्मणोंके पुत्रोंका वेदाध्ययन भी नहीं हो पाता ॥ ९ ॥
नैषामर्थो वर्धते जातु गेहे नाधीयते सुप्रजा नो यजन्ते । अपध्वस्ता दस्युभूता भवन्ति ये ब्राह्मणान् क्षत्रियाः संत्यजन्ति ॥ १० ॥ जो क्षत्रिय ब्राह्मणोंको त्याग देते हैं, उनके घरमें कभी धनकी वृद्धि नहीं होती। उनकी संतानें न तो पढ़ती हैं और न यज्ञ ही करती हैं। वे पदभ्रष्ट होकर डाकुओंकी भाँति लूटपाट करने लगते हैं ॥ १० ॥
एतौ हि नित्यं संयुक्तावितरेतरधारणे । क्षत्रं वै ब्रह्मणो योनिर्योनिः क्षत्रस्य वै द्विजाः ॥ ११ ॥
वे दोनों ब्राह्मण और क्षत्रिय सदा एक-दूसरेसे मिलकर रहें, तभी वे एक-दूसरेकी रक्षा करनेमें समर्थ होते हैं। ब्राह्मणकी उन्नतिका आधार क्षत्रिय होता है और क्षत्रियकी उन्नतिका आधार ब्राह्मण ॥ ११ ॥
उभावेतौ नित्यमभिप्रपन्नौ
सम्प्राप्तुमर्हतीं सम्प्रतिष्ठाम् ।
तयोः संधिर्भिद्यते चेत् पुराण-
स्ततः सर्वं भवति हि सम्प्रमूढम् ॥ १२ ॥
ये दोनों जातियाँ जब सदा एक-दूसरेके आश्रित होकर रहती हैं, तब बड़ी भारी प्रतिष्ठा प्राप्त करती हैं और यदि इनकी प्राचीन कालसे चली आती हुई मैत्री टूट जाती है, तो सारा जगत् मोहग्रस्त एवं किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है ॥ १२ ॥
नात्र पारं लभते पारगामी
महागाधे नौरिव सम्प्रपन्ना ।
चातुर्वर्ण्यं भवति हि सम्प्रमूढं
प्रजास्ततः क्षयसंस्था भवन्ति ॥ १३ ॥
जैसे महान् एवं अगाध समुद्रमें टूटी हुई नौका पार नहीं पहुँच पाती, उसी प्रकार उस अवस्थामें मनुष्य अपनी जीवनयात्राको कुशलपूर्वक पूर्ण नहीं कर पाते हैं। चारों वर्णोंकी प्रजापर मोह छा जाता है और वह नष्ट होने लगती है ॥ १३ ॥
ब्रह्मवृक्षो रक्ष्यमाणो मधु हेम च वर्षति ।
अरक्ष्यमाणः सततमश्रु पापं च वर्षति ॥ १४ ॥
ब्राह्मणरूपी वृक्षकी यदि रक्षा की जाती है तो वह मधुर सुख और सुवर्णकी वर्षा करता है और यदि उसकी रक्षा नहीं की गयी तो उससे निरन्तर दुःखके आँसुओं और पापकी वृष्टि होती है ॥ १४ ॥
न ब्रह्मचारी चरणादपेतो
यदा ब्रह्म ब्रह्मणि त्राणमिच्छेत् ।
आश्चर्यतो वर्षति तत्र देव-
स्तत्राभीक्ष्णं दुःसहाश्चाविशन्ति ॥ १५ ॥
जहाँ ब्रह्मचारी ब्राह्मण लुटेरोंके उपद्रवसे विवश हो वेदकी शाखाके स्वाध्यायसे वञ्चित होता है और उसके लिये अपनी रक्षा चाहता है, वहाँ इन्द्रदेव यदि पानी बरसावें तो आश्चर्यकी ही बात है (वहाँ प्रायः वर्षा नहीं होती है) तथा महामारी और दुर्भिक्ष आदि दुःसह उपद्रव आ पहुँचते हैं ॥ १५ ॥
स्त्रियं हत्वा ब्राह्मणं वापि पापः
सभायां यत्र लभतेऽनुवादम् ।
राज्ञः सकाशे न बिभेति चापि
ततो भयं विद्यते क्षत्रियस्य ॥ १६ ॥ जब पापात्मा मनुष्य किसी स्त्री अथवा ब्राह्मणकी हत्या करके लोगोंकी सभामें साधुवाद या प्रशंसा पाता है तथा राजाके निकट भी पापसे भय नहीं मानता, उस समय क्षत्रिय राजाके लिये बड़ा भारी भय उपस्थित होता है ॥ १६ ॥
पापैः पापे क्रियमाणे हि चैव ततो रुद्रो जायते देव एषः । पापैः पापाः संजनयन्ति रुद्रं ततः सर्वान् साध्वसाधून् हिनस्ति ॥ १७ ॥ इलानन्दन! जब बहुत-से पापी पापाचार करने लगते हैं, तब ये संहारकारी रुद्रदेव प्रकट हो जाते हैं। पापात्मा पुरुष अपने पापोंद्वारा ही रुद्रको प्रकट करते हैं; फिर वे रुद्रदेव साधु और असाधु सब लोगोंका संहार कर डालते हैं ॥ १७ ॥
ऐल उवाच
कुतो रुद्रः कीदृशो वापि रुद्रः सत्त्वैः सत्त्वं दृश्यते वध्यमानम् । एतत् सर्वं कश्यप मे प्रचक्ष्व कुतो रुद्रो जायते देव एषः ॥ १८ ॥ पुरूरवाने पूछा—कश्यपजी! ये रुद्रदेव कहाँसे आते हैं और कैसे हैं? इस जगत्में तो प्राणियोंद्वारा ही प्राणियोंका वध होता देखा जाता है; फिर ये रुद्रदेव किससे उत्पन्न होते हैं? ये सब बातें मुझे बताइये ॥ १८ ॥
कश्यप उवाच
आत्मा रुद्रो हृदये मानवानां स्वं स्वं देहं परदेहं च हन्ति । वातोत्पातैः सदृशं रुद्रमाहु- र्देवैर्जीमूतैः सदृशं रूपमस्य ॥ १९ ॥ कश्यपने कहा—राजन्! ये रुद्रदेव मनुष्योंके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं और समय आनेपर अपने तथा दूसरेके शरीरोंका नाश करते हैं। विद्वान् पुरुष रुद्रको उत्पात-वायु (तूफानी हवा) के समान वेगवान् कहते हैं और उनका रूप बादलोंके समान बताते हैं ॥ १९ ॥
ऐल उवाच
न वै वातः परिवृणोति कश्चि- न्न जीमूतो वर्षति नापि देवः ।
तथायुक्तो दृश्यते मानुषेषु
कामद्वेषाद् बध्यते मुह्यते च ॥ २० ॥
पुरूरवाने कहा— कोई भी हवा किसीको आवृत नहीं करती है, न अकेले मेघ ही पानी बरसाता है, रुद्रदेव भी वर्षा नहीं करते हैं। जैसे वायु और बादलको आकाशमें संयुक्त देखा जाता है, उसी प्रकार मनुष्योंमें आत्मा मन, इन्द्रिय आदिसे संयुक्त ही देखा जाता है और वह राग द्वेषके कारण मोहग्रस्त होता है तथा मारा जाता है ॥ २० ॥
कश्यप उवाच
यथैकगेहे जातवेदाः प्रदीप्तः
कृत्स्नं ग्रामं दहते चत्वरं वा ।
विमोहनं कुरुते देव एष
ततः सर्वं स्पृश्यते पुण्यपापैः ॥ २१ ॥
कश्यपने कहा— जैसे एक घरमें लगी हुई आग प्रज्वलित हो आँगन तथा सारे गाँवको जला देती है, उसी प्रकार ये रुद्रदेव किसी एक प्राणीके भीतर विशेषरूपसे प्रकट हो दूसरोंके मनमें भी मोह उत्पन्न करते हैं; फिर सारे जगत्का पुण्य और पापसे सम्बन्ध हो जाता है ॥ २१ ॥
ऐल उवाच
यदि दण्डः स्पृशतेऽपुण्यपापं
पापैः पापे क्रियमाणे विशेषात् ।
कस्य हेतोः सुकृतं नाम कुर्याद्
दुष्कृतं वा कस्य हेतोर्न कुर्यात् ॥ २२ ॥
पुरूरवाने पूछा— यदि पापियोंद्वारा विशेषरूपसे पाप और पुण्यात्माओंद्वारा विशेषरूपसे पुण्य किये जानेपर पुण्य-पापसे रहित आत्माको भी दण्ड भोगना पड़ता है, तब किसलिये कोई पुण्य करे और किसलिये पाप न करे? ॥ २२ ॥
कश्यप उवाच
असंत्यागात् पापकृतामपापां-
स्तुल्यो दण्डः स्पृशते मिश्रभावात् ।
शुष्केणार्द्रं दह्यते मिश्रभावा-
न्न मिश्रः स्यात् पापकृद्भिः कथंचित् ॥ २३ ॥
कश्यपने कहा— पापाचारियोंके संसर्गका त्याग न करनेसे पापहीन-धर्मात्मा पुरुषोंको भी उनसे मेल-जोल रखनेके कारण उनके समान ही दण्ड भोगना पड़ता है। ठीक उसी तरह, जैसे सूखी लकड़ियोंके साथ मिली होनेसे गीली लकड़ी भी जल जाती है। अतः
विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह पापियोंके साथ किसी तरह भी सम्पर्क न स्थापित करे ।। २३ ।।
ऐल उवाच
साध्वसाधून् धारयतीह भूमिः साध्वसाधूंस्तापयतीह सूर्यः । साध्वसाधूंश्चापि वातीह वायु- रापस्तथा साध्वसाधून् पुनन्ति ॥ २४ ॥ पुरूरवा बोले—इस जगत्में पृथिवी तो पापियों और पुण्यात्माओंको समान रूपसे धारण करती है। सूर्य भी भले-बुरोंको एक-सा ही संताप देते हैं। वायु साधु और दुष्ट दोनोंका स्पर्श करती है और जल पापी एवं पुण्यात्मा दोनोंको पवित्र करता है ।। २४ ।।
कश्यप उवाच
एवमस्मिन् वर्तते लोक एव नामुत्रैवं वर्तते राजपुत्र । प्रेत्यैतयोरन्तरावान् विशेषो यो वै पुण्यं चरते यश्च पापम् ॥ २५ ॥ कश्यपने कहा—राजकुमार! इस लोकमें ही ऐसी बात देखी जाती है, परलोकमें इस प्रकारका बर्ताव नहीं है। जो पुण्य करता है वह और जो पाप करता है वह—दोनों जब मृत्युके पश्चात् परलोकमें जाते हैं तो वहाँ उन दोनोंकी स्थितिमें बड़ा भारी अन्तर हो जाता है ।। २५ ।।
पुण्यस्य लोको मधुमान् घृतार्चि- र्हिरण्यज्योतिरमृतस्य नाभिः । तत्र प्रेत्य मोदते ब्रह्मचारी न तत्र मृत्युर्न जरा नोत दुःखम् ॥ २६ ॥ पुण्यात्माका लोक मधुरतम सुखसे भरा होता है। वहाँ घीके चिराग जलते हैं। उसमें सुवर्णके समान प्रकाश फैला रहता है। वहाँ अमृतका केन्द्र होता है। उस लोकमें न तो मृत्यु है, न बुढ़ापा है और न दूसरा ही कोई दुःख है। ब्रह्मचारी पुरुष मृत्युके पश्चात् उसी स्वर्गादि लोकमें जाकर आनन्दका अनुभव करता है ।। २६ ।।
पापस्य लोको निरयोऽप्रकाशो नित्यं दुःखं शोकभूयिष्ठमेव । तत्रात्मानं शोचति पापकर्म बह्वीः समाः प्रतपन्नप्रतिष्ठः ॥ २७ ॥
पापीका लोक नरक है, जहाँ सदा अँधेरा छाया रहता है। वहाँ प्रतिदिन दुःख तथा अधिक-से-अधिक शोक होता है। पापात्मा पुरुष वहाँ बहुत वर्षोंतक कष्ट भोगता हुआ कभी एक स्थानपर स्थिर नहीं रहता और निरन्तर अपने लिये शोक करता रहता है॥ २७॥
मिथोभेदाद् ब्राह्मणक्षत्रियाणां प्रजा दुःखं दुःसहं चाविशन्ति। एवं ज्ञात्वा कार्य एवेह नित्यं पुरोहितो नैकविद्यो नृपेण॥ २८॥
ब्राह्मण और क्षत्रियोंमें परस्पर फूट होनेसे प्रजाको दुःसह दुःख उठाना पड़ता है। इन सब बातोंको समझ-बूझकर राजाको चाहिये कि वह सदाके लिये एक सदाचारी बहुज्ञ पुरोहित बना ही ले॥ २८॥
तं चैवान्वभिषिच्येत तथा धर्मो विधीयते। अग्र्यो हि ब्राह्मणः प्रोक्तः सर्वस्यैवेह धर्मतः॥ २९॥
राजा पहले पुरोहितका वरण कर ले। उसके बाद अपना अभिषेक करावे। ऐसा करनेसे ही धर्मका पालन होता है; क्योंकि धर्मके अनुसार ब्राह्मण यहाँ सबसे श्रेष्ठ बताया गया है॥ २९॥
पूर्वं हि ब्रह्मणः सृष्टिरिति ब्रह्मविदो विदुः। ज्येष्ठेनाभिजनेनास्य प्राप्तं पूर्वं यदुत्तरम्॥ ३०॥
वेदवेत्ता विद्वानोंका यह मत है कि सबसे पहले ब्राह्मणकी ही सृष्टि हुई है; अतः ज्येष्ठ तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेके कारण प्रत्येक उत्कृष्ट वस्तुपर सबसे पहले ब्राह्मणका ही अधिकार होता है॥ ३०॥
तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ब्राह्मणः प्रसृताग्रभुक्। सर्वं श्रेष्ठं विशिष्टं च निवेद्यं तस्य धर्मतः॥ ३१॥ अवश्यमेव कर्तव्यं राज्ञा बलवतापि हि।
इसलिये ब्राह्मण सब वर्णोंका सम्माननीय और पूजनीय है। वही भोजनके लिये प्रस्तुत की हुई सब वस्तुओंको सबसे पहले भोगनेका अधिकारी है। सभी श्रेष्ठ और उत्तम पदार्थोंको धर्मके अनुसार पहले ब्राह्मणकी सेवामें ही निवेदित करना चाहिये। बलवान् राजाको भी अवश्य ऐसा ही करना चाहिये॥ ३१ १/२॥
ब्रह्म वर्धयति क्षत्रं क्षत्रतो ब्रह्म वर्धते। एवं राज्ञा विशेषेण पूज्या वै ब्राह्मणाः सदा॥ ३२॥ (राज्ञः सर्वस्य चान्यस्य स्वामी राजपुरोहितः।)
ब्राह्मण क्षत्रियको बढ़ाता है और क्षत्रियसे ब्राह्मणकी उन्नति होती है। अतः राजाको विशेषरूपसे सदा ही ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये; क्योंकि राजपुरोहित राजाका तथा
अन्य सब लोगोंका भी स्वामी है ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऐलकश्यपसंवादे
त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें पुरूरवा और कश्यपका संवादविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३९ १/३ श्लोक हैं।)