महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
विश्वामित्र बोले— भूखे हुए महर्षि अगस्त्यने वातापि नामक असुरको खा लिया था। मैं तो क्षुधाके कारण भारी आपत्तिमें पड़ गया हूँ; अतः यह कुत्तेकी जाँघ अवश्य खाऊँगा ॥ ७१ ॥
श्वपच उवाच
भिक्षामन्यामाहरेति न च कर्तुमिहार्हसि ।
न नूनं कार्यमेतद् वै हर कामं श्वजाघनीम् ॥ ७२ ॥
चाण्डालने कहा— मुने! आप दूसरी भिक्षा ले आइये। इसे ग्रहण करना आपके लिये उचित नहीं है। आपकी इच्छा हो तो यह कुत्तेकी जाँघ ले जाइये; परंतु मैं निश्चितरूपसे कहता हूँ कि आपको इसका भक्षण नहीं करना चाहिये ॥ ७२ ॥
विश्वामित्र उवाच
शिष्टा वै कारणं धर्मे तद्वृत्तमनुवर्तये ।
परां मेध्याशनामेनां भक्ष्यां मन्ये श्वजाघनीम् ॥ ७३ ॥
विश्वामित्र बोले— शिष्टपुरुष ही धर्मकी प्रवृत्तिके कारण हैं। मैं उन्हींके आचारका अनुसरण करता हूँ; अतः इस कुत्तेकी जाँघको मैं पवित्र भोजनके समान ही भक्षणीय मानता हूँ ॥ ७३ ॥
श्वपच उवाच
असता यत् समाचीर्णं न च धर्मः सनातनः ।
नाकार्यमिह कार्यं वै मा छलेनाशुभं कृथाः ॥ ७४ ॥
चाण्डालने कहा— किसी असाधु पुरुषने यदि कोई अनुचित कार्य किया हो तो वह सनातन धर्म नहीं माना जायगा; अतः आप यहाँ न करनेयोग्य कर्म न कीजिये। कोई बहाना लेकर पाप करनेपर उतारू न हो जाइये ॥
विश्वामित्र उवाच
न पातकं नावमतमृषिः सन् कर्तुमर्हति ।
समौ च श्वमृगौ मन्ये तस्माद् भोक्ष्ये श्वजाघनीम् ॥ ७५ ॥
विश्वामित्र बोले— कोई श्रेष्ठ ऋषि ऐसा कर्म नहीं कर सकता, जो पातक हो अथवा जिसकी निन्दा की गयी हो। कुत्ते और मृग दोनों ही पशु होनेके कारण मेरे मतमें समान हैं, अतः मैं यह कुत्तेकी जाँघ अवश्य खाऊँगा ॥ ७५ ॥
श्वपच उवाच
यद् ब्राह्मणार्थे कृतमर्थितेन
तेनर्षिणा तदवस्थाधिकारे ।
स वै धर्मो यत्र न पापमस्ति सर्वैरुपायैर्गुरवो हि रक्ष्याः ॥ ७६ ॥ **चाण्डालने कहा—**महर्षि अगस्त्यने ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये प्रार्थना की जानेपर वैसी अवस्थामें वातापिका भक्षणरूप कार्य किया था (उनके वैसा करनेसे बहुतसे ब्राह्मणोंकी रक्षा हो गयी; अन्यथा वह राक्षस उन सबको खा जाता; अतः महर्षिका वह कार्य धर्म ही था)। धर्म वही है, जिसमें लेशमात्र भी पाप न हो। ब्राह्मण गुरुजन हैं; अतः सभी उपायोंसे उनकी एवं उनके धर्मकी रक्षा करनी चाहिये ॥ ७६ ॥
विश्वामित्र उवाच
मित्रं च मे ब्राह्मणस्यायमात्मा प्रियश्च मे पूज्यतमश्च लोके । तं धर्तुकामोऽहमिमां जिहीर्षे नृशंसनामीदृशानां न बिभ्ये ॥ ७७ ॥ विश्वामित्र बोले—(यदि अगस्त्यने ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये वह कार्य किया था तो मैं भी मित्रकी रक्षाके लिये उसे करूँगा) यह ब्राह्मणका शरीर मेरा मित्र ही है। यही जगत्में मेरे लिये परम प्रिय और आदरणीय है। इसीको जीवित रखनेके लिये मैं यह कुत्तेकी जाँघ ले जाना चाहता हूँ, अतः ऐसे नृशंस कर्मोंसे मुझे तनिक भी भय नहीं होता है ॥ ७७ ॥
श्वपच उवाच
कामं नरा जीवितं संत्यजन्ति न चाभक्ष्ये क्वचित् कुर्वन्ति बुद्धिम् । सर्वान् कामान् प्राप्नुवन्तीह विद्वन् प्रियस्व कामं सहितः क्षुधैव ॥ ७८ ॥ **चाण्डालने कहा—**विद्वन्! अच्छे पुरुष अपने प्राणोंका परित्याग भले ही कर दें, परंतु वे कभी अभक्ष्य-भक्षणका विचार नहीं करते हैं। इसीसे वे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं; अतः आप भी भूखके साथ ही—उपवासद्वारा ही अपनी मनःकामनाकी पूर्ति कीजिये ॥ ७८ ॥
विश्वामित्र उवाच
स्थाने भवेत् संशयः प्रेत्यभावे निःसंशयः कर्मणां वै विनाशः । अहं पुनर्व्रतनित्यः शमात्मा मूलं रक्ष्यं भक्षयिष्याम्यभक्ष्यम् ॥ ७९ ॥
**विश्वामित्र बोले—**यदि उपवास करके प्राण दे दिया जाय तो मरनेके बाद क्या होगा? यह संशययुक्त बात है; परंतु ऐसा करनेसे पुण्यकर्मोंका विनाश होगा, इसमें संशय नहीं है, (क्योंकि शरीर ही धर्माचरणका मूल है) अतः मैं जीवनरक्षाके पश्चात् फिर प्रतिदिन व्रत एवं शम, दम आदिमें तत्पर रहकर पापकर्मोंका प्रायश्चित्त कर लूँगा। इस समय तो धर्मके मूलभूत शरीरकी ही रक्षा करना आवश्यक है; अतः मैं इस अभक्ष्य पदार्थका भक्षण करूँगा ॥ ७९॥
बुद्ध्यात्मके व्यक्तमस्तीति पुण्यं
मोहात्मके यत्र यथा श्वभक्ष्ये ।
यद्यप्येतत् संशयात्मा चरामि
नाहं भविष्यामि यथा त्वमेव ॥ ८० ॥
यह कुत्तेका मांस-भक्षण दो प्रकारसे हो सकता है—एक बुद्धि और विचारपूर्वक तथा दूसरा अज्ञान एवं आसक्तिपूर्वक। बुद्धि एवं विचारद्वारा सोचकर धर्मके मूल तथा ज्ञानप्राप्तिके साधनभूत शरीरकी रक्षामें पुण्य है, यह बात स्वतः स्पष्ट हो जाती है। इसी तरह मोह एवं आसक्तिपूर्वक उस कार्यमें प्रवृत्त होनेसे दोषका होना भी स्पष्ट ही है। यद्यपि मैं मनमें संशय लेकर यह कार्य करने जा रहा हूँ तथापि मेरा विश्वास है कि मैं इस मांसको खाकर तुम्हारे-जैसा चाण्डाल नहीं बन जाऊँगा। (तपस्याद्वारा इसके दोषका मार्जन कर लूँगा) ॥ ८० ॥
श्वपच उवाच
गोपनीयमिदं दुःखमिति मे निश्चिता मतिः ।
दुष्कृतोऽब्राह्मणः सत्रं यस्त्वामहमुपालभे ॥ ८१ ॥
**चाण्डालने कहा—**यह कुत्तेका मांस खाना आपके लिये अत्यन्त दुःखदायक पाप है। इससे आपको बचना चाहिये। यह मेरा निश्चित विचार है, इसीलिये मैं महान् पापी और ब्राह्मणेतर होनेपर भी आपको बारंबार उलाहना दे रहा हूँ। अवश्य ही यह धर्मका उपदेश करना मेरे लिये धूर्ततापूर्ण चेष्टा ही है ॥ ८१ ॥
विश्वामित्र उवाच
पिबन्त्येवोदकं गावो मण्डूकेषु रुवत्स्वपि ।
न तेऽधिकारो धर्मेऽस्ति मा भूरात्मप्रशंसकः ॥ ८२ ॥
**विश्वामित्र बोले—**मेढकोंके टर्र-टर्र करते रहनेपर भी गौएँ जलाशयोंमें जल पीती ही हैं। (वैसे ही तुम्हारे मना करनेपर भी मैं तो यह अभक्ष्य-भक्षण करूँगा ही)। तुम्हें धर्मोपदेश देनेका कोई अधिकार नहीं है; अतः तुम अपनी प्रशंसा करनेवाले न बनो ॥ ८२ ॥
श्वपच उवाच
सुहृद् भूत्वानुशासे त्वां कृपा हि त्वयि मे द्विज । यदिदं श्रेय आधत्स्व मा लोभात् पातकं कृथाः ॥ ८३ ॥ चाण्डालने कहा— ब्रह्मन्! मैं तो आपका हितैषी सुहृद् बनकर ही यह धर्माचरणकी सलाह दे रहा हूँ; क्योंकि आपपर मुझे दया आ रही है। यह जो कल्याणकी बात बता रहा हूँ, इसे आप ग्रहण करें। लोभवश पाप न करें ॥
विश्वामित्र उवाच
सुहृन्मे त्वं सुखेप्सुश्चेदापदो मां समुद्धर । जानेऽहं धर्मतोऽऽत्मानं शौनीमुत्सृज जाघनीम् ॥ ८४ ॥ विश्वामित्र बोले— भैया! यदि तुम मेरे हितैषी सुहृद् हो और मुझे सुख देना चाहते हो तो इस विपत्तिसे मेरा उद्धार करो। मैं अपने धर्मको जानता हूँ। तुम तो यह कुत्तेकी जाँघ मुझे दे दो ॥ ८४ ॥
श्वपच उवाच
नैवोत्सहे भवतो दातुमेतां नोपेक्षितुं ह्रियमाणं स्वमन्नम् । उभौ स्यावः पापलोकावलिप्तौ दाता चाहं ब्राह्मणस्त्वं प्रतीच्छन् ॥ ८५ ॥ चाण्डालने कहा— ब्रह्मन्! मैं यह अभक्ष्य वस्तु आपको नहीं दे सकता और मेरे इस अन्नका आपके द्वारा अपहरण हो, इसकी उपेक्षा भी नहीं कर सकता। इसे देनेवाला मैं और लेनेवाले आप ब्राह्मण दोनों ही पापलिप्त होकर नरकमें पड़ेंगे ॥ ८५ ॥
विश्वामित्र उवाच
अद्याहमेतद् वृजिनं कर्म कृत्वा जीवंश्चरिष्यामि महापवित्रम् । स पूतात्मा धर्ममेवाभिपत्स्ये यदेतयोर्गुरु तद् वै ब्रवीहि ॥ ८६ ॥ विश्वामित्र बोले— आज यह पापकर्म करके भी यदि मैं जीवित रहा तो परम पवित्र धर्मका अनुष्ठान करूँगा। इससे मेरे तन, मन पवित्र हो जायँगे और मैं धर्मका ही फल प्राप्त करूँगा। जीवित रहकर धर्माचरण करना और उपवास करके प्राण देना—इन दोनोंमें कौन बड़ा है, यह मुझे बताओ ॥ ८६ ॥
श्वपच उवाच
आत्मैव साक्षी कुलधर्मकृत्ये त्वमेव जानासि यदत्र दुष्कृतम् ।
यो ह्याद्रियाद् भक्ष्यमिति श्वमांसं मन्ये न तस्यास्ति विवर्जनीयम् ॥ ८७ ॥ चाण्डालने कहा—किस कुलके लिये कौन-सा कार्य धर्म है, इस विषयमें यह आत्मा ही साक्षी है। इस अभक्ष्य-भक्षणमें जो पाप है, उसे आप भी जानते हैं। मेरी समझमें जो कुत्तेके मांसको भक्षणीय बताकर उसका आदर करे, उसके लिये इस संसारमें कुछ भी त्याज्य नहीं है ॥ ८७ ॥
विश्वामित्र उवाच
उपादाने खादने चास्ति दोषः कार्यात्यये नित्यमत्रापवादः । यस्मिन् हिंसा नानृतं वाच्यलेशो- ऽभक्ष्यक्रिया यत्र न तद्गरीयः ॥ ८८ ॥ विश्वामित्र बोले—चाण्डाल! मैं इसे मानता हूँ कि तुमसे दान लेने और इस अभक्ष्य वस्तुको खानेमें दोष है फिर भी जहाँ न खानेसे प्राण जानेकी सम्भावना हो, वहाँके लिये शास्त्रोंमें सदा ही अपवाद वचन मिलते हैं। जिसमें हिंसा और असत्यका तो दोष है ही नहीं, लेशमात्र निन्दारूप दोष है। प्राण जानेके अवसरोंपर भी जो अभक्ष्य-भक्षणका निषेध ही करनेवाले वचन हैं, वे गुरुतर अथवा आदरणीय नहीं हैं ॥ ८८ ॥
श्वपच उवाच
यद्येष हेतुस्तव खादने स्या- न्न ते वेदः कारणं नार्यधर्मः । तस्माद् भक्ष्येऽभक्षणे वा द्विजेन्द्र दोषं न पश्यामि यथेदमत्र ॥ ८९ ॥ चाण्डालने कहा—द्विजेन्द्र! यदि इस अभक्ष्य वस्तु-को खानेमें आपके लिये यह प्राणरक्षारूपी हेतु ही प्रधान है तब तो आपके मतमें न वेद प्रमाण है और न श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार-धर्म ही। अतः मैं आपके लिये भक्ष्य वस्तुके अभक्षणमें अथवा अभक्ष्य वस्तुके भक्षणमें कोई दोष नहीं देख रहा हूँ, जैसा कि यहाँ आपका इस मांसके लिये यह महान् आग्रह देखा जाता है ॥ ८९ ॥
विश्वामित्र उवाच
नैवातिपापं भक्ष्यमाणस्य दृष्टं सुरां तु पीत्वा पततीति शब्दः । अन्योन्यकार्याणि यथा तथैव न पापमात्रेण कृतं हिनस्ति ॥ ९० ॥
**विश्वामित्र बोले—**अखाद्य वस्तु खानेवालेको ब्रह्महत्या आदिके समान महान् पातक लगता हो, ऐसा कोई शास्त्रीय वचन देखनेमें नहीं आता। हाँ, शराब पीकर ब्राह्मण पतित हो जाता है, ऐसा शास्त्रवाक्य स्पष्टरूपसे उपलब्ध होता है; अतः वह सुरापान अवश्य त्याज्य है। जैसे दूसरे-दूसरे कर्म निषिद्ध हैं, वैसा ही अभक्ष्य-भक्षण भी है। आपत्तिके समय एक बार किये हुए किसी सामान्य पापसे किसीके आजीवन किये हुए पुण्यकर्मका नाश नहीं होता ।। ९० ।।
श्वपच उवाच
अस्थानतो हीनतः कुत्सिताद् वा
तद् विद्वांसं बाधते साधुवृत्तम् ।
श्वानं पुर्नयो लभतेऽभिषङ्गात्
तेनापि दण्डः सहितव्य एव ।। ९१ ।।
**चाण्डालने कहा—**जो अयोग्य स्थानसे, अनुचित कर्मसे तथा निन्दित पुरुषसे कोई निषिद्ध वस्तु लेना चाहता है, उस विद्वान्को उसका सदाचार ही वैसा करनेसे रोकता है (अतः आपको तो ज्ञानी और धर्मात्मा होनेके कारण स्वयं ही ऐसे निन्द्य कर्मसे दूर रहना चाहिये); परंतु जो बारंबार अत्यन्त आग्रह करके कुत्तेका मांस ग्रहण कर रहा है, उसीको इसका दण्ड भी सहन करना चाहिये (मेरा इसमें कोई दोष नहीं है) ।। ९१ ।।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा निवृत्ते मातङ्गः कौशिकं तदा ।
विश्वामित्रो जहारैव कृतबुद्धिः श्वजाघनीम् ।। ९२ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! ऐसा कहकर चाण्डाल मुनिको मना करनेके कार्यसे निवृत्त हो गया। विश्वामित्र तो उसे लेनेका निश्चय कर चुके थे; अतः कुत्तेकी जाँघ ले ही गये ।। ९२ ।।
ततो जग्राह स श्वाङ्गं जीवितार्थी महामुनिः ।
सदारस्तामुपाहृत्य वने भोक्तुमियेष सः ।। ९३ ।।
जीवित रहनेकी इच्छावाले उन महामुनिने कुत्तेके शरीरके उस एक भागको ग्रहण कर लिया और उसे वनमें ले जाकर पत्नीसहित खानेका विचार किया ।। ९३ ।।
अथास्य बुद्धिरभवद् विधिनाहं श्वजाघनीम् ।
भक्षयामि यथाकामं पूर्वं संतर्प्य देवताः ।। ९४ ।।
इतनेहीमें उनके मनमें यह विचार उठा कि मैं कुत्तेकी जाँघके इस मांसको विधिपूर्वक पहले देवताओंको अर्पण करूँगा और उन्हें संतुष्ट करके फिर अपनी इच्छानुसार उसे खाऊँगा ।। ९४ ।।
ततोऽग्निमुपसंहृत्य ब्राह्मेण विधिना मुनिः ।
ऐन्द्राग्नेयेन विधिना चरुं श्रपयत स्वयम् ॥ ९५ ॥ ऐसा सोचकर मुनिने वेदोक्त विधिसे अग्निकी स्थापना करके इन्द्र और अग्निदेवताके उद्देश्यसे स्वयं ही चरु पकाकर तैयार किया ॥ ९५ ॥ ततः समारभत् कर्म दैवं पित्र्यं च भारत । आहूय देवानिन्द्रादीन् भागं भागं विधिक्रमात् ॥ ९६ ॥ भरतनन्दन! फिर उन्होंने देवकर्म और पितृकर्म आरम्भ किया। इन्द्र आदि देवताओंका आवाहन करके उनके लिये क्रमशः विधिपूर्वक पृथक्-पृथक् भाग अर्पित किया ॥ ९६ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु प्रववर्ष स वासवः । संजीवयन् प्रजाः सर्वा जनयामास चौषधीः ॥ ९७ ॥ इसी समय इन्द्रने समस्त प्रजाको जीवनदान देते हुए बड़ी भारी वर्षा की और अन्न आदि ओषधियोंको उत्पन्न किया ॥ ९७ ॥ विश्वामित्रोऽपि भगवांस्तपसा दग्धकिल्बिषः । कालेन महता सिद्धिमवाप परमाद्भुताम् ॥ ९८ ॥ भगवान् विश्वामित्र भी दीर्घकालतक निराहार व्रत एवं तपस्या करके अपने सारे पाप दग्ध कर चुके थे; अतः उन्हें अत्यन्त अद्भुत सिद्धि प्राप्त हुई ॥ ९८ ॥ स संहृत्य च तत् कर्म अनास्वाद्य च तद्धविः । तोषयामास देवांश्च पितूंश्च द्विजसत्तमः ॥ ९९ ॥ उन द्विजश्रेष्ठ मुनिने वह कर्म समाप्त करके उस हविष्यका आस्वादन किये बिना ही देवताओं और पितरोंको संतुष्ट कर दिया और उन्हींकी कृपासे पवित्र भोजन प्राप्त करके उसके द्वारा जीवनकी रक्षा की ॥ ९९ ॥ एवं विद्वानदीनात्मा व्यसनस्थो जिजीविषुः । सर्वोपायैरुपायज्ञो दीनमात्मानमुद्धरेत् ॥ १०० ॥ राजन्! इस प्रकार संकटमें पड़कर जीवनकी रक्षा चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको दीनचित्त न होकर कोई उपाय ढूँढ़ निकालना चाहिये और सभी उपायोंसे अपने आपका आपत्कालमें परिस्थितिसे उद्धार करना चाहिये ॥ १०० ॥ एतां बुद्धिं समास्थाय जीवितव्यं सदा भवेत् । जीवन् पुण्यमवाप्नोति पुरुषो भद्रमश्नुते ॥ १०१ ॥ इस बुद्धिका सहारा लेकर सदा जीवित रहनेका प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि जीवित रहनेवाला पुरुष पुण्य करनेका अवसर पाता और कल्याणका भागी होता है ॥ १०१ ॥ तस्मात् कौन्तेय विदुषा धर्माधर्मविनिश्चये । बुद्धिमास्थाय लोकेऽस्मिन् वर्तितव्यं कृतात्मना ॥ १०२ ॥ अतः कुन्तीनन्दन! अपने मनको वशमें रखनेवाले विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इस जगत्में धर्म और अधर्मका निर्णय करनेके लिये अपनी ही विशुद्ध बुद्धिका आश्रय लेकर
यथायोग्य बर्ताव करे ।। १०२ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि विश्वामित्रश्वपचसंवादे एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें विश्वामित्र और चाण्डालका संवादविषयक एकसौ इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४१ ।।
आपत्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश
द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
आपत्कालमें राजाके धर्मका निश्चय तथा उत्तम ब्राह्मणोंके सेवनका आदेश
युधिष्ठिर उवाच
यदि घोरं समुद्दिष्टमश्रद्धेयमित्रानृतम् ।
अस्ति स्विद् दस्युमर्यादा यामहं परिवर्जये ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— यदि महापुरुषोंके लिये भी ऐसा भयंकर कर्म (संकटकालमें) कर्तव्यरूपसे बता दिया गया तो दुराचारी डाकुओं और लुटेरोंके दुष्कर्मोंकी कौन-सी ऐसी सीमा रह गयी है, जिसका मुझे सदा ही परित्याग करना चाहिये? (इससे अधिक घोर कर्म तो दस्यु भी नहीं कर सकते) ॥ १ ॥
सम्मुह्यामि विषीदामि धर्मो मे शिथिलीकृतः ।
उद्यमं नाधिगच्छामि कदाचित् परिसान्त्वयन् ॥ २ ॥
आपके मुँहसे यह उपाख्यान सुनकर मैं मोहित एवं विषादग्रस्त हो रहा हूँ। आपने मेरा धर्मविषयक उत्साह शिथिल कर दिया। मैं अपने मनको बारंबार समझा रहा हूँ तो भी अब कदापि इसमें धर्मविषयक उद्यमके लिये उत्साह नहीं पाता हूँ ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
नैतच्छ्रुत्वाऽऽगमादेव तव धर्मानुशासनम् ।
प्रज्ञासमवहारोऽयं कविभिः सम्भृतं मधु ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— वत्स! मैंने केवल शास्त्रसे ही सुनकर तुम्हारे लिये यह धर्मोपदेश नहीं किया है। जैसे अनेक स्थानसे अनेक प्रकारके फूलोंका रस लाकर मक्खियाँ मधुका संचय करती हैं, उसी प्रकार विद्वानोंने यह नाना प्रकारकी बुद्धियों (विचारों) का संकलन किया है (ऐसी बुद्धियोंका कदाचित् संकटकालमें उपयोग किया जा सकता है। ये सदा काममें लेनेके लिये नहीं कही गयी हैं; अतः तुम्हारे मनमें मोह या विषाद नहीं होना चाहिये) ॥ ३ ॥
बह्व्यः प्रतिविधातव्याः प्रज्ञा राज्ञा ततस्ततः ।
नैकशाखेन धर्मेण यत्रैषा सम्प्रवर्तते ॥ ४ ॥
युधिष्ठिर! राजाको इधर-उधरसे नाना प्रकारके मनुष्योंके निकटसे भिन्न-भिन्न प्रकारकी बुद्धियाँ सीखनी चाहिये। उसे एक ही शाखावाले धर्मको लेकर नहीं बैठे रहना चाहिये। जिस राजामें संकटके समय यह बुद्धि स्फुरित होती है, वह आत्मरक्षाका कोई उपाय निकाल लेता है ॥ ४ ॥
बुद्धिसंजननो धर्म आचारश्च सतां सदा । ज्ञेयो भवति कौरव्य सदा तद् विद्धि मे वचः ॥ ५ ॥ कुरूनन्दन! धर्म और सत्पुरुषोंका आचार—ये बुद्धिसे ही प्रकट होते हैं और सदा उसीके द्वारा जाने जाते हैं। तुम मेरी इस बातको अच्छी तरह समझ लो ॥
बुद्धिश्रेष्ठा हि राजानश्चरन्ति विजयैषिणः । धर्मः प्रतिविधातव्यो बुद्ध्या राज्ञा ततस्ततः ॥ ६ ॥ विजयकी अभिलाषा रखनेवाले एवं बुद्धिमें श्रेष्ठ सभी राजा धर्मका आचरण करते हैं। अतः राजाको इधर-उधरसे बुद्धिके द्वारा शिक्षा लेकर धर्मका भलीभाँति आचरण करना चाहिये ॥ ६ ॥
नैकशाखेन धर्मेण राज्ञो धर्मो विधीयते । दुर्बलस्य कुतः प्रज्ञा पुरस्तादनुपाहृता ॥ ७ ॥ एक शाखावाले (एकदेशीय) धर्मसे राजाका धर्म-निर्वाह नहीं होता। जिसने पहले अध्ययनकालमें एकदेशीय धर्मविषयक बुद्धिकी शिक्षा ली, उस दुर्बल राजाको पूर्ण प्रज्ञा कहाँसे प्राप्त हो सकती है? ॥ ७ ॥
अद्वैधज्ञः पथि द्वैधे संशयं प्राप्तुमर्हति । बुद्धिद्वैधं वेदितव्यं पुरस्तादेव भारत ॥ ८ ॥ एक ही धर्म या कर्म किसी समय धर्म माना जाता है और किसी समय अधर्म। उसकी जो यह दो प्रकारकी स्थिति है, उसीका नाम द्वैध है। जो इस द्विविधतत्त्वको नहीं जानता, वह द्वैधमार्गपर पहुँचकर संशयमें पड़ जाता है। भरतनन्दन! बुद्धिके द्वैधको पहले ही अच्छी तरह समझ लेना चाहिये ॥ ८ ॥
पार्श्वतः करणं प्राज्ञो विष्टम्भित्वा प्रकारयेत् । जनस्तच्चरितं धर्मं विजानात्यन्यथान्यथा ॥ ९ ॥ बुद्धिमान् पुरुष विचार करते समय पहले अपने प्रत्येक कार्यको गुप्त रखकर उसे प्रारम्भ करे; फिर उसे सर्वत्र प्रकाशित करे; अन्यथा उसके द्वारा आचरणमें लाये हुए धर्मको लोग किसी और ही रूपमें समझने लगते हैं ॥ ९ ॥
अमिथ्याज्ञानिनः केचिन्मिथ्याविज्ञानिनः परे । तद्वै यथायथं बुद्ध्वा ज्ञानमाददते सताम् ॥ १० ॥ कुछ लोग यथार्थ ज्ञानी होते हैं और कुछ लोग मिथ्या ज्ञानी, इस बातको ठीक-ठीक समझकर राजा सत्यज्ञानसम्पन्न सत्पुरुषोंके ही ज्ञानको ग्रहण करते हैं ॥ १० ॥
परिमुष्णन्ति शास्त्राणि धर्मस्य परिपन्थिनः । वैषम्यमर्थविद्यानां निरर्थाः ख्यापयन्ति ते ॥ ११ ॥ धर्मद्रोही मनुष्य शास्त्रोंकी प्रामाणिकतापर डाका डालते हैं, उन्हें अग्राह्य और अमान्य बताते हैं। वे अर्थज्ञानसे शून्य मनुष्य अर्थशास्त्रकी विषमताका मिथ्या प्रचार करते
हैं ।। ११ ।।
आजिजीविषवो विद्यां यशःकामौ समन्ततः ।
ते सर्वे नृप पापिष्ठा धर्मस्य परिपन्थिनः ।। १२ ।।
नरेश्वर! जो जीविकाकी इच्छासे विद्याका उपार्जन करते हैं, सम्पूर्ण दिशाओंमें उसी विद्याके बलसे यश पानेकी इच्छा और मनोवांछित पदार्थोंको प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखते हैं, वे सभी पापात्मा और धर्मद्रोही हैं ।। १२ ।।
अपक्वमतयो मन्दा न जानन्ति यथातथम् ।
यथा ह्यशास्त्रकुशलाः सर्वत्रायुक्तिनिष्ठिता ।। १३ ।।
जिनकी बुद्धि परिपक्व नहीं हुई है, वे मन्दमति मानव यथार्थ तत्त्वको नहीं जानते हैं। शास्त्रज्ञानमें निपुण न होकर सर्वत्र असंगत युक्तिपर ही अवलम्बित रहते हैं ।। १३ ।।
परिमुष्णन्ति शास्त्राणि शास्त्रदोषानुदर्शिनः ।
विज्ञानमर्थविद्यानां न सम्यगिति वर्तते ।। १४ ।।
निरन्तर शास्त्रके दोष देखनेवाले लोग शास्त्रोंकी मर्यादा लूटते हैं और यह कहा करते हैं कि अर्थशास्त्रका ज्ञान समीचीन नहीं है ।। १४ ।।
निन्दया परविद्यानां स्वविद्यां ख्यापयन्ति च ।
वागस्त्रा वाक्छरीभूता दृग्धविद्याफला इव ।। १५ ।।
वाणी ही जिनका अस्त्र है तथा जिनकी बोली ही बाण के समान लगती है, वे मानो विद्याके फल तत्त्वज्ञानसे ही विद्रोह करते हैं। ऐसे लोग दूसरोंकी विद्याकी निन्दा करके अपनी विद्याकी अच्छाईका मिथ्या प्रचार करते हैं ।। १५ ।।
तान् विद्यावणिजो विद्धि राक्षसानिव भारत ।
व्याजेन सद्भिर्विहितो धर्मस्ते परिहास्यति ।। १६ ।।
भरतनन्दन! ऐसे लोगोंको तुम विद्याका व्यापार करनेवाले तथा राक्षसोंके समान परद्रोही समझो। उनकी बहानेबाजीसे तुम्हारा सत्पुरुषोंद्वारा प्रतिपादित एवं आचरित धर्म नष्ट हो जायगा ।। १६ ।।
न धर्मवचनं वाचा नैव बुद्ध्येति नः श्रुतम् ।
इति बार्हस्पतं ज्ञानं प्रोवाच मघवा स्वयम् ।। १७ ।।
हमने सुना है कि केवल वचनद्वारा अथवा केवल बुद्धि (तर्क) के द्वारा ही धर्मका निश्चय नहीं होता है, अपितु शास्त्रवचन और तर्क दोनोंके समुच्चयद्वारा उसका निर्णय होता है—यही बृहस्पतिका मत है, जिसे स्वयं इन्द्रने बताया है ।। १७ ।।
न त्वेव वचनं किंचिदनिमित्तादिहोच्यते ।
सुविनीतेन शास्त्रेण न व्यवस्यन्त्यथापरे ।। १८ ।।
विद्वान् पुरुष अकारण कोई बात नहीं कहते हैं और दूसरे बहुत-से मनुष्य भलीभाँति सीखे हुए शास्त्रके अनुसार कार्य करनेकी चेष्टा नहीं करते हैं ।। १८ ।।
लोकयात्रामिहैके तु धर्मं प्राहर्मनीषिणः । समुद्दिष्टं सतां धर्मं स्वयमूहेत पण्डितः ॥ १९ ॥ इस जगत्में कोई-कोई मनीषी पुरुष शिष्ट पुरुषोंद्वारा परिचालित लोकाचारको ही धर्म कहते हैं, परंतु विद्वान् पुरुष स्वयं ही ऊहापोह करके सत्पुरुषोंके शास्त्रविहित धर्मका निश्चय कर ले ॥ १९ ॥
अमर्षाच्छास्त्रसम्मोहादविज्ञानाच्च भारत । शास्त्रं प्राज्ञस्य वदतः समूहे यात्यदर्शनम् ॥ २० ॥ भरतनन्दन! जो बुद्धिमान् होकर शास्त्रको ठीक-ठीक न समझते हुए मोहमें आबद्ध होकर बड़े जोशके साथ शास्त्रका प्रवचन करता है, उसके उस कथनका लोकसमाजमें कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ॥ २० ॥
आगतागमया बुद्ध्या वचनेन प्रशस्यते । अज्ञानाज्ज्ञानहेतुत्वाद् वचनं साधु मन्यते ॥ २१ ॥ वेद-शास्त्रोंके द्वारा अनुमोदित, तर्कयुक्त बुद्धिके द्वारा जो बात कही जाती है, उसीसे शास्त्रकी प्रशंसा होती है अर्थात् शास्त्रकी वही बात लोगोंके मनमें बैठती है। दूसरे लोग अज्ञातविषयका ज्ञान करानेके लिये केवल तर्कको ही श्रेष्ठ मानते हैं, परंतु यह उनकी नासमझी ही है ॥ २१ ॥
अनया हतमेवेदमिति शास्त्रमपार्थकम् । दैतेयानुशना प्राह संशयच्छेदनं पुरा ॥ २२ ॥ वे लोग केवल तर्कको प्रधानता देकर अमुक युक्तिसे शास्त्रकी यह बात कट जाती है; इसलिये यह व्यर्थ है, ऐसा कहते हैं; किंतु यह कथन भी अज्ञानके ही कारण है (अतः तर्कसे शास्त्रका और शास्त्रसे तर्कका बोध न करके दोनोंके सहयोगसे जो कर्तव्य निश्चित हो, उसीका पालन करना चाहिये)। पूर्वकालमें यह संशय-नाशक बात स्वयं शुक्राचार्यने दैत्योंसे कही थी ॥ २२ ॥
ज्ञानमप्यपदिश्यं हि यथा नास्ति तथैव तत् । तं तथा छिन्नमूलेन सन्नोदयितुमर्हसि ॥ २३ ॥ जो संशयात्मक ज्ञान है, उसका होना और न होना बराबर है; अतः तुम उस संशयका मूलोच्छेद करके उसे दूर हटा दो (संशयरहित ज्ञानका आश्रय लो) ॥ २३ ॥
अनव्यवहितं यो वा नेदं वाक्यमुपाश्नुते । उग्रायैव हि सृष्टोऽसि कर्मणे न त्वमीक्षसे ॥ २४ ॥ यदि तुम मेरे इस नीतियुक्त कथनको नहीं स्वीकार करते हो तो तुम्हारा यह व्यवहार उचित नहीं है; क्योंकि तुम (क्षत्रिय होनेके कारण) उग्र (हिंसापूर्ण) कर्मके लिये ही विधाताद्वारा रचे गये हो। इस बातकी ओर तुम्हारी दृष्टि नहीं जा रही है ॥ २४ ॥
अङ्ग मामन्ववेक्षस्व राजन्याय बुभूषते ।
यथा प्रमुच्यते त्वन्यो यदर्थं न प्रमोदते ॥ २५ ॥
वत्स युधिष्ठिर! मेरी ओर तो देखो, मैंने क्या किया है। भूमण्डलका राज्य पानेकी इच्छावाले क्षत्रिय राजाओंके साथ मैंने वही बर्ताव किया है, जिससे वे संसारबन्धनसे मुक्त हो जायँ (अर्थात् उन सबको मैंने युद्धमें मारकर स्वर्गलोक भेज दिया)। यद्यपि मेरे इस कार्यका दूसरे लोग अनुमोदन नहीं करते थे—मुझे क्रूर और हिंसक कहकर मेरी निन्दा करते थे (तो भी मैंने किसीकी परवा न करके अपने कर्तव्यका पालन किया, इसी प्रकार तुम अपने कर्तव्यपथपर दृढ़तापूर्वक डटे रहो) ॥ २५ ॥
अजोऽश्वः क्षत्रमित्येतत् सदृशं ब्रह्मणा कृतम् ।
तस्मादभीक्ष्णं भूतानां यात्रा काचित् प्रसिद्ध्यति ॥ २६ ॥
बकरा, घोड़ा और क्षत्रिय-इन तीनोंको ब्रह्माजीने एकसा बनाया है। इनके द्वारा समस्त प्राणियोंकी बारंबार कोई-न-कोई जीवनयात्रा सिद्ध होती रहती है ॥ २६ ॥
यस्त्ववध्यवधे दोषः स वध्यस्यावधे स्मृतः ।
सा चैव खलु मर्यादा यामयं परिवर्जयेत् ॥ २७ ॥
अवध्य मनुष्यका वध करनेमें जो दोष माना गया है, वही वध्यका वध न करनेमें भी है। वह दोष ही अकर्तव्यकी वह मर्यादा (सीमा) है, जिसका क्षत्रिय राजाको परित्याग करना चाहिये ॥ २७ ॥
तस्मात् तीक्ष्णः प्रजा राजा स्वधर्मे स्थापयेत् ततः ।
अन्योन्यं भक्षयन्तो हि प्रचरेयुर्वृका इव ॥ २८ ॥
अतः तीक्ष्ण स्वभाववाला राजा ही प्रजाको अपने-अपने धर्ममें स्थापित कर सकता है; अन्यथा प्रजावर्गके सब लोग भेड़ियोंके समान एक दूसरेको लूट-खसोटकर खाते हुए स्वच्छन्द विचरने लगें ॥ २८ ॥
यस्य दस्युगणा राष्ट्रे ध्वांक्षा मत्स्यान् जलादिव ।
विहरन्ति परस्वानि स वै क्षत्रियपांसनः ॥ २९ ॥
जिसके राज्यमें डाकुओंके दल जलसे मछलियोंको पकड़नेवाले बगुलेके समान पराये धनका अपहरण करते हैं, वह राजा निश्चय ही क्षत्रियकुलका कलंक है ॥ २९ ॥
कुलीनान् सचिवान् कृत्वा वेदविद्यासमन्वितान् ।
प्रशाधि पृथिवीं राजन् प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ ३० ॥
राजन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा वेदविद्यासे सम्पन्न पुरुषोंको मन्त्री बनाकर प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए तुम इस पृथिवीका शासन करो ॥ ३० ॥
विहीनं कर्मणान्यायं यः प्रगृह्णाति भूमिपः ।
उपायस्याविशेषज्ञं तद् वै क्षत्रं नपुंसकम् ॥ ३१ ॥
जो राजा सत्कर्मसे रहित, न्यायशून्य तथा कार्यसाधनके उपायोंसे अनभिज्ञ पुरुषको सचिवके रूपमें अपनाता है, वह नपुंसक क्षत्रिय है ॥ ३१ ॥
नैवोग्रं नैव चानुग्रं धर्मेणेह प्रशस्यते । उभयं न व्यतिक्रामेदग्रो भूत्वा मृदुर्भव ॥ ३२ ॥ युधिष्ठिर! राजधर्मके अनुसार केवल उग्रभाव अथवा केवल मृदुभावकी प्रशंसा नहीं की जाती है। उन दोनोंमेंसे किसीका भी परित्याग नहीं करना चाहिये। इसलिये तुम पहले उग्र होकर फिर मृदु होओ ॥ ३२ ॥
कष्टः क्षत्रियधर्मोऽयं सौहृदं त्वयि मे स्थितम् । उग्रकर्मणि सृष्टोऽसि तस्माद् राज्यं प्रशाधि वै ॥ ३३ ॥ वत्स! यह क्षत्रियधर्म कष्टसाध्य है। तुम्हारे ऊपर मेरा स्नेह है, इसलिये कहता हूँ। विधाताने तुम्हें उग्र कर्मके लिये ही उत्पन्न किया है; इसलिये तुम अपने धर्ममें स्थित होकर राज्यका शासन करो ॥ ३३ ॥
अशिष्टनिग्रहो नित्यं शिष्टस्य परिपालनम् । एवं शुक्रोऽब्रवीद् धीमानापत्सु भरतर्षभ ॥ ३४ ॥ भरतश्रेष्ठ! आपत्तिकालमें भी सदा दुष्टोंका दमन और शिष्ट पुरुषोंका पालन करना चाहिये, ऐसा बुद्धिमान् शुक्राचार्यका कथन है ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अस्ति चेदिह मर्यादा यामन्यो नाभिलङ्घयेत् । पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३५ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! इस जगत्में यदि कोई ऐसी मर्यादा है, जिसका दूसरा कोई उल्लंघन नहीं कर सकता तो मैं उसके विषयमें आपसे पूछता हूँ। आप वही मुझे बताइये ॥ ३५ ॥
भीष्म उवाच
ब्राह्मणानेव सेवेत विद्यावृद्धांस्तपस्विनः । श्रुतचारित्रवृत्ताढ्यान् पवित्रं ह्येतदुत्तमम् ॥ ३६ ॥ भीष्मजीने कहा—राजन्! विद्यामें बढ़े-चढ़े तपस्वी तथा शास्त्रज्ञान, उत्तम चरित्र एवं सदाचारसे सम्पन्न ब्राह्मणोंका ही सेवन करे, यह परम उत्तम एवं पवित्र कार्य है ॥ ३६ ॥
या देवतासु वृत्तिस्ते सास्तु विप्रेषु नित्यदा । क्रुद्धैर्हि विप्रैः कर्माणि कृतानि बहुधा नृप ॥ ३७ ॥ नरेश्वर! देवताओंके प्रति जो तुम्हारा बर्ताव है, वही भाव और बर्ताव ब्राह्मणोंके प्रति भी सदैव होना चाहिये; क्योंकि क्रोधमें भरे हुए ब्राह्मणोंने अनेक प्रकारके अद्भुत कर्म कर डाले हैं ॥ ३७ ॥
प्रीत्या यशो भवेन्मुख्यमप्रीत्या परमं भयम् । प्रीत्या ह्यमृतवद् विप्राः क्रुद्धाश्चैव विषं यथा ॥ ३८ ॥
ब्राह्मणोंकी प्रसन्नतासे श्रेष्ठ यशका विस्तार होता है। उनकी अप्रसन्नतासे महान् भयकी प्राप्ति होती है। प्रसन्न होनेपर ब्राह्मण अमृतके समान जीवनदायक होते हैं और कुपित होनेपर विषके तुल्य भयंकर हो उठते हैं ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४२ ॥
शरणं पाल्यानस्य यो धर्मस्तं वदस्व मे ॥ १ ॥
त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
शरणागतकी रक्षा करनेके विषयमें एक बहेलिये और कपोत-कपोतीका प्रसंग, सर्दीसे पीड़ित हुए बहेलियेका एक वृक्षके नीचे जाकर सोना
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
शरणं पाल्यानस्य यो धर्मस्तं वदस्व मे ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— परमबुद्धिमान् पितामह! आप सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं; अतः मुझे यह बताइये कि शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्राणीको किस धर्मकी प्राप्ति होती है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
महान् धर्मो महाराज शरणागतपालने ।
अर्हः प्रष्टुं भवांश्चैव प्रश्नं भरतसत्तम ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— महाराज! शरणागतकी रक्षा करनेमें महान् धर्म है। भरतश्रेष्ठ! तुम्हीं ऐसा प्रश्न पूछनेके अधिकारी हो ॥ २ ॥
शिबिप्रभृतयो राजन् राजानः शरणागतान् ।
परिपाल्य महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ ३ ॥
राजन्! शिबि आदि महात्मा राजाओंने तो शरणागतोंकी रक्षा करके ही परम सिद्धि प्राप्त कर ली थी ॥
श्रूयते च कपोतेन शत्रुः शरणमागतः ।
पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ ४ ॥
यह भी सुना जाता है कि एक कबूतरने शरणमें आये हुए शत्रु का यथायोग्य सत्कार किया था और अपना मांस खानेके लिये उसको निमन्त्रित किया था ॥
युधिष्ठिर उवाच
कथं कपोतेन पुरा शत्रुः शरणमागतः ।
स्वमांसं भोजितः कां च गतिं लेभे स भारत ॥ ५ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! प्राचीनकालमें कबूतरने शरणागत शत्रुको किस प्रकार अपना मांस खिलाया और ऐसा करनेसे उसे कौन-सी सद्गति प्राप्त हुई ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच
शृणु राजन् कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् । नृपतेर्मुचुकुन्दस्य कथितां भार्गवेन वै ॥ ६ ॥ **भीष्मजीने कहा—**राजन्! वह दिव्य कथा सुनो, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है। परशुरामजीने राजा मुचुकुन्दको यह कथा सुनायी थी ॥ ६ ॥
इममर्थं पुरा पार्थ मुचुकुन्दो नराधिपः । भार्गवं परिपप्रच्छ प्रणतः पुरुषर्षभ ॥ ७ ॥ पुरुषप्रवर कुन्तीनन्दन! पहलेकी बात है, राजा मुचुकुन्दने परशुरामजीको प्रणाम करके उनसे यही प्रश्न किया था ॥ ७ ॥
तस्मै शुश्रूषमाणाय भार्गवोऽकथयत् कथाम् । इमां यथा कपोतेन सिद्धिः प्राप्ता नराधिप ॥ ८ ॥ नरेश्वर! तब परशुरामजीने सुननेके लिये उत्सुक हुए मुचुकुन्दको कबूतरने जिस प्रकार सिद्धि प्राप्ति की थी, वह कथा कह सुनायी ॥ ८ ॥
मुनिरुवाच
धर्मनिश्चयसंयुक्तां कामार्थसहितां कथाम् । शृणुष्वावहितो राजन् गदतो मे महाभुज ॥ ९ ॥ **मुनि बोले—**महाबाहो! यह कथा धर्मके निर्णयसे युक्त तथा अर्थ और कामसे सम्पन्न है। राजन्! तुम सावधान होकर मेरे मुखसे इस कथाको सुनो ॥ ९ ॥
कश्चित् क्षुद्रसमाचारः पृथिव्यां कालसम्मितः । विचचार महारण्ये घोरः शकुनिलुब्धकः ॥ १० ॥ एक समयकी बात है किसी महान् वनमें कोई भयंकर बहेलिया चारों ओर विचर रहा था। वह बड़े खोटे आचार-विचारका था। पृथिवीपर वह कालके समान जान पड़ता था ॥ १० ॥
काकोल इव कृष्णाङ्गो रक्ताक्षः कालसम्मितः । दीर्घजङ्घो ह्रस्वपादो महावक्त्रो महाहनुः ॥ ११ ॥ उसका सारा शरीर 'काकोल' जातिके कौओंके समान काला था। आँखें लाल-लाल थीं। वह देखनेपर काल-सा प्रतीत होता था। बड़ी-बड़ी पिंडलियाँ, छोटे-छोटे पैर, विशाल मुख और लंबी-सी ठोढ़ी—यही उसकी हुलिया थी ॥ ११ ॥
नैव तस्य सुहृत् कश्चिन्न सम्बन्धी न बान्धवाः । स हि तैः सम्परित्यक्तस्तेन रौद्रेण कर्मणा ॥ १२ ॥ उसके न कोई सुहृद्, न सम्बन्धी और न भाई-बन्धु ही थे। उसके भयानक क्रूर-कर्मके कारण सबने उसे त्याग दिया था ॥ १२ ॥
नरः पापसमाचारस्त्यक्तव्यो दूरतो बुधैः ।
आत्मानं योऽभिसंधत्ते सोऽन्यस्य स्यात् कथं हितः ॥ १३ ॥
वास्तवमें जो पापाचारी हो, उसे विज्ञ पुरुषोंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये। जो अपने आपको धोखा देता है, वह दूसरेका हितैषी कैसे हो सकता है? ॥ १३ ॥
ये नृशंसा दुरात्मानः प्राणिप्राणहरा नराः ।
उद्वेजनीया भूतानां व्याला इव भवन्ति ते ॥ १४ ॥
जो मनुष्य क्रूर, दुरात्मा तथा दूसरे प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण करनेवाले होते हैं, उन्हें सर्पोंके समान सभी जीवोंकी ओरसे उद्वेग प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
स वै क्षारकमादाय द्विजान् हत्वा वने सदा ।
चकार विक्रयं तेषां पतङ्गानां जनाधिप ॥ १५ ॥
नरेश्वर! वह प्रतिदिन जाल लेकर वनमें जाता और बहुत-से पक्षियोंको मारकर उन्हें बाजारमें बेंच दिया करता था ॥ १५ ॥
एवं तु वर्तमानस्य तस्य वृत्तिं दुरात्मनः ।
अगमत् सुमहान् कालो न चाधर्ममबुध्यत ॥ १६ ॥
यही उसका नित्यका काम था। इसी वृत्तिसे रहते हुए उस दुरात्माको वहाँ दीर्घ काल व्यतीत हो गया, किंतु उसे अपने इस अधर्मका बोध नहीं हुआ ॥ १६ ॥
तस्य भार्यासहायस्य रममाणस्य शाश्वतम् ।
दैवयोगविमूढस्य नान्या वृत्तिररोचत ॥ १७ ॥
सदा अपनी स्त्रीके साथ विहार करता हुआ वह बहेलिया दैवयोगसे ऐसा मूढ़ हो गया था कि उसे दूसरी कोई वृत्ति अच्छी ही नहीं लगती थी ॥ १७ ॥
ततः कदाचित् तस्याथ वनस्थस्य समन्ततः ।
पातयन्निव वृक्षांस्तान् सुमहान् वातसम्भ्रमः ॥ १८ ॥
तदनन्तर एक दिन वह वनमें ही घूम रहा था कि चारों ओरसे बड़े जोरकी आँधी उठी। वायुका प्रचण्ड वेग वहाँके समस्त वृक्षोंको धराशायी करता हुआ-सा जान पड़ा ॥ १८ ॥
मेघसंकुलमाकाशं विद्युन्मण्डलमण्डितम् ।
संछन्नस्तु मुहूर्तेन नौसार्थैरिव सागरः ॥ १९ ॥
वारिधारासमूहेन सम्प्रविष्टः शतक्रतुः ।
क्षणेन पूरयामास सलिलेन वसुन्धराम् ॥ २० ॥
आकाशमें मेघोंकी घटाएँ घिर आयीं, विद्युन्मण्डलसे उसकी अपूर्व शोभा होने लगी। जैसे समुद्र नौकारोहियोंके समुदायसे ढक जाता है, उसी प्रकार दो ही घड़ीमें जल-धाराओंके समूहसे आच्छादित हुए इन्द्रदेवने व्योममण्डलमें प्रवेश किया और क्षणभरमें इस पृथ्वीको जलराशिसे भर दिया ॥ १९-२० ॥
ततो धाराकुले काले सम्भ्रमन् नष्टचेतनः ।
शीतार्तस्तद् वनं सर्वमाकुलेनान्तरात्मना ॥ २१ ॥
उस समय मूसलाधार पानी बरस रहा था। बहेलिया शीतसे पीड़ित हो अचेत सा हो गया और व्याकुल हृदयसे सारे वनमें भटकने लगा ॥ २१ ॥
नैव निम्नं स्थलं वापि सोऽविन्दत विहङ्गहा ।
पूरितो हि जलौघेन तस्य मार्गो वनस्य च ॥ २२ ॥
वनका मार्ग जिसपर वह चलता था, जलके प्रवाहमें डूब गया था। उस बहेलियेको नीची-ऊँची भूमिका कुछ पता नहीं चलता था ॥ २२ ॥
पक्षिणो वर्षवेगेन हता लीनास्तदाभवन् ।
मृगसिंहवराहाश्च स्थलमाश्रित्य शेरते ॥ २३ ॥
वर्षके वेगसे बहुतेरे पक्षी मरकर धरतीपर लोट गये थे। कितने ही अपने घोंसलोंमें छिपे बैठे थे। मृग, सिंह और सूअर स्थल-भूमिका आश्रय लेकर सो रहे थे ॥
महता वातवर्षेण त्रासितास्ते वनौकसः ।
भयार्ताश्च क्षुधार्ताश्च बभ्रमुः सहिता वने ॥ २४ ॥
भारी आँधी और वर्षासे आतंकित हुए वनवासी जीव-जन्तु भय और भूखसे पीड़ित हो झुंड-के-झुंड एक साथ घूम रहे थे ॥ २४ ॥
स तु शीतहृतैर्गात्रैर्न जगाम न तस्थिवान् ।
ददर्श पतितां भूमौ कपोतीं शीतविह्वलाम् ॥ २५ ॥
बहेलियेके सारे अंग सर्दीसे ठिठुर गये थे। इसलिये न तो वह चल पाता था और न खड़ा ही हो पाता था। इसी अवस्थामें उसने धरतीपर गिरी हुई एक कबूतरी देखी, जो सर्दीके कष्टसे व्याकुल हो रही थी ॥ २५ ॥
दृष्ट्वाऽऽर्तोऽपि हि पापात्मा स तां पञ्जरकेऽक्षिपत् ।
स्वयं दुःखामिभूतोऽपि दुःखमेवाकरोत् परे ॥ २६ ॥
पापात्मा पापकारित्वात् पापमेव चकार सः ।
वह पापात्मा व्याध यद्यपि स्वयं भी बड़े कष्टमें था तो भी उसने उस कबूतरीको उठाकर पिंजड़ेमें डाल लिया। स्वयं दुःखसे पीड़ित होनेपर भी उसने दूसरे प्राणीको दुःख ही पहुँचाया। सदा पापमें ही प्रवृत्त रहनेके कारण उस पापात्माने उस समय भी पाप ही किया ॥ २६ १/२ ॥
सोऽपश्यत् तरुखण्डेषु मेघनीलवनस्पतिम् ॥ २७ ॥
सेव्यमानं विहङ्गौघैश्छायावासफलार्थिभिः ।
धात्रा परोपकाराय स साधुरिव निर्मितः ॥ २८ ॥
इतनेमें ही उसे वृक्षोंके समूहमें मेघके समान सघन एवं नील एक विशाल वृक्ष दिखायी दिया, जिसपर बहुतसे विहंग छाया, निवास और फलकी इच्छासे बसेरे लेते थे, मानो विधाताने परोपकारके लिये ही उस साधुतुल्य महान् वृक्षका निर्माण किया था ॥ २७-२८ ॥
अथाभवत् क्षणेनैव वियद् विमलतारकम् । महत्सर इवोत्फुल्लं कुमुदच्छुरितोदकम् ॥ २९ ॥ तदनन्तर एक ही क्षणमें आकाशके बादल फट गये, निर्मल तारे चमक उठे, मानो खिले हुए कुमुद-पुष्पोंसे सुशोभित जलवाला कोई विशाल सरोवर प्रकाशित हो रहा हो ॥ २९ ॥ ताराढ्यं कुमुदाकारमाकाशं निर्मलं बहु । घनैर्मुक्तं नभो दृष्ट्वा लुब्धकः शीतविह्वलः ॥ ३० ॥ दिशो विलोकयामास विगाढां प्रेक्ष्य शर्वरीम् । दूरतो मे निवेशश्च अस्माद् देशादिति प्रभो ॥ ३१ ॥ प्रभो! ताराओंसे भरा हुआ अत्यन्त निर्मल आकाश विकसित कुमुद-कुसुमोंसे सुशोभित सरोवर-सा प्रतीत होता था। आकाशको मेघोंसे मुक्त हुआ देख सर्दीसे काँपते हुए उस व्याधने सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर दृष्टिपात किया और गाढ़े अन्धकारसे भरी हुई रात्रि देखकर मन-ही-मन विचार किया कि मेरा निवासस्थान तो यहाँसे बहुत दूर है ॥ ३०-३१ ॥ कृतबुद्धिर्द्रुमे तस्मिन् वस्तुं तां रजनीं ततः । साञ्जलिः प्रणतिं कृत्वा वाक्यमाह वनस्पतिम् ॥ ३२ ॥ शरणं यामि यान्यस्मिन् दैवतानि वनस्पतौ । इसके बाद उसने उस वृक्षके नीचे ही रातभर रहनेका निश्चय किया। फिर हाथ जोड़ प्रणाम करके उस वनस्पतिसे कहा—'इस वृक्षपर जो-जो देवता हों, उन सबकी मैं शरण लेता हूँ ॥ ३२ १/२ ॥' स शिलायां शिरः कृत्वा पर्णान्यास्तीर्य भूतले । दुःखेन महताऽऽविष्टस्ततः सुष्वाप पक्षिहा ॥ ३३ ॥ ऐसा कहकर उसने पृथ्वीपर पत्ते बिछा दिये और एक शिलापर सिर रखकर महान् दुःखसे घिरा हुआ वह बहेलिया वहाँ सो गया ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतलुब्धकसंवादोपक्रमे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कपोत और व्याधके संवादका उपक्रमविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४३ ॥