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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

सकता। परंतु आप तो इनमें कोई नियत सम्बन्ध ही नहीं मानते हैं, अतः आपका कथन प्रसिद्धिके विपरीत है॥

श्वेतकेतुरुवाच
न विकूलोऽत्र कथितो नाकाशं हि विना जगत्।
सम्बन्धस्तत्र नास्त्येव तद्वदित्येष मन्यताम्॥
**श्वेतकेतुने कहा—**मैंने प्रसिद्धिके विपरीत कुछ नहीं कहा है। देखो, आकाशके बिना पृथ्वी अथवा पार्थिव जगत् टिक नहीं सकता तथापि इनमें कोई नित्य सम्बन्ध नहीं है। शब्द और अर्थका सम्बन्ध भी वैसा ही मानना चाहिये॥

सुवर्चलोवाच
सदाहङ्कारशब्दोऽयं व्यक्तमात्मनि संश्रितः।
न वाचस्तत्र वर्तन्ते इति मिथ्या भविष्यति॥
**सुवर्चला बोली—**यह 'अहम्' शब्द सदा ही आत्माके अर्थमें स्पष्टरूपसे प्रयुक्त होता है; परंतु 'यतो वाचो निवर्तन्ते' इस श्रुतिके अनुसार वहाँ वाणीकी पहुँच नहीं है; अतः आत्माके लिये 'अहम्' पदका प्रयोग भी मिथ्या ही होगा॥

श्वेतकेतुरुवाच
अहंशब्दो ह्यहंभावो नात्मभावे शुभव्रते।
न वर्तते परेऽचिन्त्ये वाचः सगुणलक्षणाः॥
**श्वेतकेतुने कहा—**शुभव्रते! अहम् शब्दका आत्म-भावमें प्रयोग नहीं होता; किंतु अहम् भावका ही आत्म-भावमें प्रयोग होता है; क्योंकि सगुण पदार्थके बोधक वचन अचिन्त्य परब्रह्म परमात्माका बोध करानेमें असमर्थ हैं॥
मृण्मये हि घटे भावस्ताद्ग्भाव इहेष्यते।
अयं भावः परेऽचिन्त्ये ह्यात्मभावो यथा च तत्॥
जैसे मिट्टीके घड़ेमें मृत्तिका-भाव होता है, उसी प्रकार परमात्मासे उत्पन्न हुए प्रत्येक पदार्थमें परमात्मभाव अभीष्ट है; अतएव अचिन्त्य परब्रह्म परमात्मामें अहम् भाव ही आत्मभाव है और वही यथार्थ है॥
अहं त्वमेतदित्येव परे संकल्पना मया।
तस्माद् वाचो न वर्तन्त इति नैव विरुध्यते॥
'मैं', 'तुम' और 'यह'—ये सब नाम परब्रह्म परमात्मामें हमलोगोंद्वारा कल्पित हैं (वास्तविक नहीं है), अतः 'उस परमात्मातक वाणीकी पहुँच नहीं हो पाती' श्रुतिके इस कथनसे कोई विरोध नहीं है॥
तस्माद् वामेन वर्तन्ते मनसा भीरु सर्वशः।

यथाकाशगतं विश्वं संसक्तमिव लक्ष्यते ।। अतएव भीरु! मनुष्य भ्रान्तचित्तद्वारा ही अहम् आदि पदोंका प्रयोग करता है। जैसे आकाशमें स्थित सम्पूर्ण विश्व उसमें सटा हुआ-सा दीखता है, उसी प्रकार परमात्मामें स्थित हुआ सारा दृश्य-प्रपंच उससे जुड़ा हुआ-सा जान पड़ता है ।। संसर्गे सति सम्बन्धात् तद् विकारं भविष्यति । अनाकाशगतं सर्वं विकारे च सदा गतम् ।। ब्रह्मके साथ जगत्‌का जो सम्बन्ध है, उसी सम्बन्धसे यह उसीका कार्य जान पड़ता है। जैसे सारा जगत् आकाशसे पृथक् है तो भी उसके विकारोंसे सम्बन्ध होनेके कारण सदा उससे मिश्रित ही रहता है, उसी प्रकार जगत्‌से ब्रह्मका कोई सम्पर्क नहीं है तो भी यह उसीसे उत्पन्न होनेके कारण तद्रूप माना जाता है ।। तद् ब्रह्म परमं शुद्धमनौपम्यं न शक्यते । न दृश्यते तथा तच्च दृश्यते च मतिर्मम ।। वह ब्रह्म परम शुद्ध और उपमारहित है; अतः वाणी-द्वारा उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इन चर्मचक्षुओंसे उसको नहीं देखा जा सकता है तथा ज्ञानदृष्टिसे उसका साक्षात्कार होता है, ऐसा मेरा मत है ।।

सुवर्चलोवाच

निर्विकारं ह्यमूर्त्तिं च निरयं सर्वगं तथा । दृश्यते च वियन्नित्यं दृगात्मा तेन दृश्यते ।। **सुवर्चला बोली—**तब तो यह मानना होगा कि जिस प्रकार निर्विकार, निराकार, निःसीम और सर्वव्यापी आकाशका सर्वदा ही दर्शन होता है, उसीके समान ज्ञानस्वरूप आत्माका भी दर्शन होता है ।।

श्वेतकेतुरुवाच

त्वचा स्पृशति वै वायुमाकाशस्थं पुनः पुनः । तत्स्थं गन्धं तथाऽऽघ्राति ज्योतिः पश्यति चक्षुषा ।। **श्वेतकेतुने कहा—**मनुष्य त्वचाद्वारा आकाशमें स्थित वायुका बारंबार स्पर्श करता है, नासिकाद्वारा आकाशवर्ती गन्धको बारंबार सूँघता है और नेत्रद्वारा आकाशस्थित ज्योतिका दर्शन करता है ।। तमोरश्मिगणंश्चैव मेघजालं तथैव च । वर्षं तारागणं चैव नाकाशं दृश्यते पुनः ।। इसके सिवा अन्धकार, किरणसमूह, मेघोंकी घटा, वर्षा तथा तारागणका भी बारंबार दर्शन होता है; परंतु आकाश दृष्टिगोचर नहीं होता ।। आकाशस्याप्यथाकाशं सद्रूपमिति निश्चितम् ।

तदर्थे कल्पिता ह्येते तत् सत्यो विष्णुरेव च ।।

सत्स्वरूप परमात्मा उस आकाशका भी आकाश है, अर्थात् उसे भी अवकाश

देनेवाला महाकाश है; यह निश्चित है, उन्हींके लिये और उन्हींके द्वारा इस सम्पूर्ण जगत्की

सृष्टि हुई है। वे ही सत्य तथा सर्वव्यापी हैं ।।

यानि नामानि गौणानि ह्युपचारात् परात्मनि ।

न चक्षुषा न मनसा न चान्येन परो विभुः ।।

चिन्त्यते सूक्ष्मया बुद्ध्या वाचा वक्तुं न शक्यते ।

भगवान्के जो गुण-सम्बन्धी नाम हैं, वे परमात्मामें औपचारिक हैं। नेत्र, मन तथा अन्य

किसी इन्द्रियके द्वारा भी उस सर्वव्यापी परमात्माका ग्रहण नहीं हो सकता। वाणीद्वारा भी

उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। केवल सूक्ष्म बुद्धिद्वारा उनका चिन्तन एवं साक्षात्कार

किया जा सकता है ।।

एतत् प्रपञ्चमखिलं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।

महाघटोऽल्पकश्चैव यथा मह्यां प्रतिष्ठितौ ।।

यह सारा प्रपंच (समष्टि एवं व्यष्टि-जगत्) उन्हीं परमात्मामें प्रतिष्ठित है। ठीक उसी

तरह, जैसे बड़ा और छोटा घड़ा पृथ्वीपर स्थित होते हैं ।।

न च स्त्री न पुमांश्चैव तथैव न नपुंसकः ।

केवलज्ञानमात्रं तत् तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ।।

वह परमात्मा न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है, केवल ज्ञानस्वरूप है। उसीके

आधारपर यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ।।

भूमिसंस्थानयोगेन वस्तुसंस्थानयोगतः ।

रसभेदा यथा तोये प्रकृत्यामात्मनस्तथा ।।

जैसे एक ही जलमें मृत्तिकाविशेष एवं बीज आदि द्रव्यविशेषके संयोगसे रसभेद उत्पन्न

होते हैं, उसी प्रकार प्रकृति और आत्माके संयोगसे गुण-कर्मके अनुसार अनेक प्रकारकी

सृष्टि प्रकट होती है ।।

तद्वाक्यस्मरणान्नित्यं तृप्तिं वारि पिबन्निव ।

प्राप्नोति ज्ञानमखिलं तेन तत् सुखमेधते ।।

जैसे प्यासा मनुष्य पानी पीकर तृप्ति लाभ करता है, उसी प्रकार साधक ब्रह्मबोधक

वाक्यको स्मरण करके सदा तृप्ति एवं सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है और उस ज्ञानसे उसका

सुख उत्तरोत्तर अभ्युदयको प्राप्त होता है ।।

सुवर्चलोवाच

अनेन साध्यं किं स्याद् वै शब्देनेति मतिर्मम ।

वेदगम्यः परोऽचिन्त्य इति पौराणिका विदुः ।।

निरर्थको यथा लोके तद्वत् स्यादिति मे मतिः ।

निरीक्ष्यैवं यथान्यायं वक्तुमर्हसि मेऽनघ ।।

सुवर्चला बोली—निष्पाप मुने! इस शब्दसे क्या सिद्ध होनेवाला है? मेरी तो ऐसी

धारणा है कि शब्दसे कुछ भी होने-जानेवाला नहीं है। परंतु पौराणिक विद्वान् ऐसा मानते हैं

कि परमात्मा अचिन्त्य एवं वेदगम्य हैं। जैसे लोकमें बहुत-से शब्द निरर्थक होते हैं, उसी

प्रकार वैदिक शब्द भी हो सकते हैं। मेरी बुद्धिमें तो यही बात आती है; अतः आप इस

विषयमें यथोचित विचार करके मुझे यथार्थ बात बतानेकी कृपा करें ।।

श्वेतकेतुरुवाच

वेदगम्यं परं शुद्धमिति सत्या परा श्रुतिः ।

व्याहत्या नैतदित्याह व्युपलिङ्गे च वर्तते ।।

श्वेतकेतुने कहा— 'शुद्धस्वरूप परब्रह्म परमात्मा वेदगम्य हैं' श्रुतिका यह कथन परम

सत्य है। इस विषयमें नास्तिकोंका कहना है कि परब्रह्मकी प्रत्यक्ष उपलब्धि न होनेसे उक्त

श्रुतिका कथन व्याघात दोषसे दूषित होनेके कारण सत्य नहीं है। इसका उत्तर आस्तिक यों

देते हैं कि सूक्ष्म शरीरविशिष्ट स्थूल देहमें जीवात्मारूपसे परब्रह्मकी ही उपलब्धि होती है;

अतः श्रुतिका पूर्वोक्त कथन यथार्थ ही है ।।

निरर्थको न चैवास्ति शब्दो लौकिक उत्तमे ।

अनन्वयास्तथा शब्दा निरर्था इति लौकिकैः ।।

उत्तम अंगोंवाली देवि! कोई लौकिक शब्द भी निरर्थक नहीं है; फिर वैदिक शब्द तो

व्यर्थ हो ही कैसे सकता है। जिन शब्दोंका परस्पर अन्वय नहीं होता—जो एक दूसरेसे

असम्बद्ध होते हैं, उन्हींको लौकिक पुरुष निरर्थक बताते हैं ।।

गृह्यन्ते तद्वदित्येव न वर्तन्ते परात्मनि ।

अगोचरत्वं वचसां युक्तमेवं तथा शुभे ।।

किंतु शुभे! लौकिक शब्दोंकी ही भाँति वैदिक शब्द भी यद्यपि सार्थक समझे जाते हैं,

तथापि वे साक्षात् परमात्माका बोध करानेमें असमर्थ हैं; क्योंकि परमात्माको वाणीका

अगोचर बताया गया है और उनकी अगोचरता युक्तिसंगत भी है ।।

साधनस्योपदेशाच्च ह्युपायस्य च सूचनात् ।

उपलक्षणयोगेन व्यावृत्या च प्रदर्शनात् ।।

वेदगम्यः परः शुद्ध इति मे धीयते मतिः ।

वेदोंमें ब्रह्मकी उपासना अथवा उसकी प्राप्तिके साधनका उपदेश है। उपासनाके उपाय

भी सूचित किये गये हैं। (जैसे ग्रहणकालमें चन्द्रमा और सूर्यके साथ राहुका दर्शन होता है

उसी प्रकार) उपलक्षण-योगसे प्रत्येक शरीरमें जीवात्मारूपसे ब्रह्मकी ही स्थितिका प्रदर्शन

किया गया है। इसके सिवा नेति-नेति आदि निषेधात्मक वचनोंद्वारा अनात्मवस्तुके

बाधपूर्वक ब्रह्मके स्वरूपकी ओर संकेत किया गया है। इसलिये शुद्धस्वरूप परमात्मा एकमात्र वेदगम्य हैं, यही मेरी सुनिश्चित धारणा है ।।

अध्यात्मध्यानसम्भूतं भूतं दीपवत् स्फुटम् ।।
ज्ञाने विद्धि शुभाचारे तेन यान्ति परां गतिम् ।
शुभ आचरणोंवाली देवि! तुम्हें यह विदित हो कि अध्यात्मतत्त्वके चिन्तनसे नित्य-ज्ञान दीपककी भाँति स्पष्टरूपसे प्रकाशित होने लगता है। उस ज्ञानसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होते हैं ।।

यदि मे व्याहृतं गुह्यं श्रुतं न तु त्वया शुभे ।।
तथ्यमित्येव वा शुद्धे ज्ञानं ज्ञानविलोचने ।
शुभे! शुद्धस्वरूपे! ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न देवि! मैंने यह जो गूढ़ एवं यथार्थ ब्रह्मज्ञानका विषय बताया है, इसे तुमने सुना है या नहीं? ।।

नानारूपवदस्यैवमैश्वर्यं दृश्यते शुभे ।
न वायुस्तन्न सूर्यस्तन्नाग्निस्तत् तु परं पदम् ।।
अनेन पूर्णमेतद्धि हृदि भूतमिहेष्यते ।
शुभे! परब्रह्म परमात्माका ऐश्वर्य नाना रूपोंमें दिखायी देता है। वायुकी वहाँतक पहुँच नहीं है। सूर्य और अग्नि उस परमपदस्वरूप परमेश्वरको प्रकाशित नहीं कर सकते। परमात्मासे ही यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है और वे ही प्रत्येक प्राणीके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं ।।

एतावदात्मविज्ञानमेतावद् यदहं स्मृतम् ।।
आवयोर्न च सत्त्वे वै तस्मादज्ञानबन्धनम् ।
इतना ही परमात्मविज्ञान है। इतना ही अहम् पदार्थ माना गया है। हम दोनोंकी सत्ता नित्य नहीं है, ऐसी धारणा अज्ञानके कारण होती है ।।

भीष्म उवाच

एवं सुवर्चला हृष्टा प्रोक्ता भर्त्रा यथार्थवत् ।
परिचर्यमाणा ह्यनिशं तत्त्वबुद्धिसमन्विता ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! अपने पति श्वेतकेतुके इस प्रकार यथार्थ उपदेश देनेपर सुवर्चला आनन्दमग्न हो गयी। वह निरन्तर तत्त्वज्ञाननिष्ठ रहकर तदनुरूप आचरण करने लगी ।।

भर्ता च तामनुप्रेक्ष्य नित्यनैमित्तिकान्वितः ।
परमात्मनि गोविन्दे वासुदेवे महात्मनि ।।
समाधाय च कर्माणि तन्मयत्वेन भावितः ।
कालेन महता राजन् प्राप्नोति परमां गतिम् ।।

श्वेतकेतु पत्नीको साथ रखकर नित्य-नैमित्तिक कर्मोंमें संलग्न रहते थे। वे सबके हृदयमें निवास करनेवाले महामना परमात्मा गोविन्दको अपने समस्त कर्म समर्पित करके उन्हींके ध्यानमें तन्मय रहा करते थे। राजन्! इस प्रकार दीर्घकालतक परमात्मचिन्तन करके उन्होंने परमगति प्राप्त कर ली ।। एतत् ते कथितं राजन् यस्मात् त्वं परिपृच्छसि । गार्हस्थ्यं च समाधाय गतौ जायापती परम् ॥) नरेश्वर! तुमने जो प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें मैंने यह प्रसंग सुनाया है। इस प्रकार वे दोनों पति-पत्नी गृहस्थधर्मका आश्रय लेकर परमात्माको प्राप्त हो गये ।।

युधिष्ठिर उवाच

किं कुर्वन् सुखमाप्नोति किं कुर्वन् दुःखमाप्नुयात् । किं कुर्वन्निर्भयो लोके सिद्धश्चरति भारत ॥ १ ॥ **युधिष्ठिरने पूछा—**भारत! मनुष्य क्या उपाय करनेसे सुख पाता है; क्या करनेसे दुःख उठाता है और कौन-सा काम करनेसे वह सिद्धकी भाँति संसारमें निर्भय होकर विचरता है ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

दममेव प्रशंसन्ति वृद्धाः श्रुतिसमाधयः । सर्वेषामेव वर्णानां ब्राह्मणस्य विशेषतः ॥ २ ॥ **भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! मनोयोगपूर्वक वेदार्थका विचार करनेवाले वृद्ध पुरुष सामान्यतः सभी वर्णोंके लिये और विशेषतः ब्राह्मणके लिये मन और इन्द्रियोंके संयमरूप 'दम' की ही प्रशंसा करते हैं ॥ २ ॥ नादान्तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपपद्यते । क्रिया तपश्च सत्यं च दमे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ३ ॥ जिसने दमका पालन नहीं किया है, उसे अपने कर्मोंमें यथोचित सफलता नहीं मिलती; क्योंकि क्रिया, तप और सत्य—ये सभी दमके आधारपर ही प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ३ ॥ दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं दम उच्यते । विपाप्मा निर्भयो दान्तः पुरुषो विन्दते महत् ॥ ४ ॥ 'दम' तेजकी वृद्धि करता है। 'दम' परम पवित्र बताया गया है, मन और इन्द्रियोंका संयम करनेवाला पुरुष पाप और भयसे रहित होकर 'महत्' पदको प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥ सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिबुद्ध्यते । सुखं लोके विपर्येति मनश्चास्य प्रसीदति ॥ ५ ॥

दमका पालन करनेवाला मनुष्य सुखसे सोता, सुखसे जागता और सुखसे ही संसारमें विचरता है तथा उसका मन भी प्रसन्न रहता है ॥ ५ ॥

तेजो दमेन ध्रियते तन्न तीक्ष्णोऽधिगच्छति ।
अमित्रांश्च बहून् नित्यं पृथगात्मनि पश्यति ॥ ६ ॥
दमसे ही तेजको धारण किया जाता है, जिसमें दमका अभाव है, वह तीव्र कामवाला रजोगुणी पुरुष उस तेजको नहीं धारण कर सकता और सदा काम, क्रोध आदि बहुत-से शत्रुओंको अपनेसे पृथक् अनुभव करता है ॥ ६ ॥

क्रव्याद्भ्य इव भूतानामदान्तेभ्यः सदा भयम् ।
तेषां विप्रतिषेधार्थं राजा सृष्टः स्वयम्भुवा ॥ ७ ॥
जिन्होंने मन और इन्द्रियोंका दमन नहीं किया है, उनसे समस्त प्राणियोंको उसी प्रकार सदा भय बना रहता है, जैसे मांसभक्षी व्याघ्र आदि जन्तुओंसे भय हुआ करता है। ऐसे उद्दण्ड मनुष्योंकी उच्छृंखल प्रवृत्तिको रोकनेके लिये ही ब्रह्माजीने राजाकी सृष्टि की है ॥ ७ ॥

आश्रमेषु च सर्वेषु दम एव विशिष्यते ।
यच्च तेषु फलं धर्मे भूयो दान्ते तदुच्यते ॥ ८ ॥
चारों आश्रमोंमें दमको ही श्रेष्ठ बताया गया है। उन सब आश्रमोंमें धर्मका पालन करनेसे जो फल मिलता है, दमनशील पुरुषको वह फल और अधिक मात्रामें उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥

तेषां लिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदयो दमः ।
अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः श्रद्दधानता ॥ ९ ॥
अक्रोध आर्जवं नित्यं नातिवादोऽभिमानिता ।
गुरुपूजानसूया च दया भूतेष्वपैशुनम् ॥ १० ॥
जनवादमृषावादस्तुतिनिन्दाविवर्जनम् ।
साधुकामश्च स्पृहयेन्नायतिं प्रत्ययेषु च ॥ ११ ॥
अब मैं उन लक्षणोंका वर्णन करूँगा, जिनकी उत्पत्तिमें दम ही कारण है। कृपणताका अभाव, उत्तेजनाका न होना, संतोष, श्रद्धा, क्रोधका न आना, नित्य सरलता, अधिक बकवाद न करना, अभिमानका त्याग, गुरुसेवा, किसीके गुणोंमें दोष‌दृष्टि न करना, समस्त जीवोंपर दया करना, किसीकी चुगली न करना, लोकापवाद, असत्यभाषण तथा निन्दा-स्तुति आदिको त्याग देना, सत्पुरुषोंके संगकी इच्छा तथा भविष्यमें आनेवाले सुखकी स्पृहा और दुःखकी चिन्ता न करना— ॥ ९—११ ॥

अवैरकृत् सूपचारः समो निन्दाप्रशंसयोः ।
सुवृत्तः शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्माऽऽत्मवान् प्रभुः ॥ १२ ॥
प्राप्य लोके च सत्कारं स्वर्गं वै प्रेत्य गच्छति ।

जितेन्द्रिय पुरुष किसीके साथ वैर नहीं करता। उसका सबके साथ अच्छा बर्ताव होता

है। वह निन्दा और स्तुतिमें समान भाव रखनेवाला, सदाचारी, शीलवान्, प्रसन्नचित्त,

धैर्यवान् तथा दोषोंका दमन करनेमें समर्थ होता है। वह इहलोकमें सम्मान पाता और

मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ।। १२ १/२ ।।

दुर्गमं सर्वभूतानां प्रापयन् मोदते सुखी ।। १३ ।।

सर्वभूतहिते युक्तो न स्म यो द्विषते जनम् ।

महाह्रद इवाक्षोभ्यः प्रज्ञातृप्तः प्रसीदति ।। १४ ।।

दमनशील पुरुष समस्त प्राणियोंको दुर्लभ वस्तुएँ देकर—दूसरोंको सुख पहुँचाकर

स्वयं सुखी और प्रमुदित होता है। जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगा रहता और किसीसे

द्वेष नहीं करता है, वह बहुत बड़े जलाशयकी भाँति गम्भीर होता है। उसके मनमें कभी

क्षोभ नहीं होता तथा वह सदा ज्ञानानन्दसे तृप्त एवं प्रसन्न रहता है ।। १३-१४ ।।

अभयं यस्य भूतेभ्यः सर्वेषामभयं यतः ।

नमस्यः सर्वभूतानां दान्तो भवति बुद्धिमान् ।। १५ ।।

जो समस्त प्राणियोंसे निर्भय है तथा जिससे सम्पूर्ण प्राणी निर्भय हो गये हैं, वह

दमनशील एवं बुद्धिमान् पुरुष सब जीवोंके लिये वन्दनीय होता है ।। १५ ।।

न हृष्यति महत्यर्थे व्यसने च न शोचति ।

स वै परिमितप्रज्ञः स दान्तो द्विज उच्यते ।। १६ ।।

जो बहुत बड़ी सम्पत्ति पाकर हर्षसे फूल नहीं उठता और संकटमें पड़नेपर शोक नहीं

करता, वह द्विज सूक्ष्म बुद्धिसे युक्त एवं जितेन्द्रिय कहलाता है ।। १६ ।।

कर्मभिः श्रुतिसम्पन्नः सद्भिराचरितैः शुचिः ।

सदैव दमसंयुक्तस्तस्य भुङ्क्ते महाफलम् ।। १७ ।।

जो वेदशास्त्रोंका ज्ञाता और सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए शुभ कर्मोंसे पवित्र है

तथा जिसने सदा ही दमका पालन किया है, वह अपने शुभकर्मका महान् फल भोगता

है ।। १७ ।।

अनसूया क्षमा शान्तिः संतोषः प्रियवादिता ।

सत्यं दानमनायासो नैष मार्गो दुरात्मनाम् ।। १८ ।।

किसीके दोष न देखना, हृदयमें क्षमाभाव रखना, शान्ति, संतोष, मीठे वचन बोलना,

सत्य, दान तथा क्रियामें परिश्रमका बोध न होना—से सद्गुण हैं। दुरात्मा पुरुष इस मार्गसे

नहीं चलते हैं ।। १८ ।।

कामक्रोधौ च लोभश्च परस्येष्यांविकत्थना ।

कामक्रोधौ वशे कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।। १९ ।।

विक्रम्य घोरे तपसि ब्राह्मणः संशितव्रतः ।

कालाकाङ्क्षी चरेल्लोकान् निरपाय इवात्मवान् ।। २० ।।

उनमें तो काम, क्रोध, लोभ, दूसरोंके प्रति डाह और अपनी झूठी प्रशंसा आदि दुर्गुण ही भरे रहते हैं; इसलिये उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणको चाहिये कि वह जितेन्द्रिय होकर काम और क्रोधको वशमें करे तथा ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उत्साहके साथ घोर तपस्यामें संलग्न हो जाय एवं मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ विघ्न-बाधाओंसे रहित हो धैर्यपूर्वक सम्पूर्ण जगत्‌में विचरे ॥ १९-२० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दमप्रशंसायां विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२० ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दमकी प्रशंसाविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १०८ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १२८ १/३ श्लोक हैं)


* 'चष्टे इति चक्षुः'—जो देखता है, वह चक्षु है। इस व्युत्पत्तिका अनुसार सर्वद्रष्टा परमात्मा ही चक्षुः पदका वाच्यार्थ है।

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⬅ विषय-सूची (TOC)

एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन

युधिष्ठिर उवाच

द्विजातयो व्रतोपेता यदिदं भुञ्जते हविः ।
अन्नं ब्राह्मणकामाय कथमेतत् पितामह ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! व्रतयुक्त द्विजगण वेदोक्त सकामकर्मोंके फलकी इच्छासे हविष्यान्नका भोजन करते हैं, उनका यह काय उचित है या नहीं? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अवेदोक्तव्रतोपेता भुञ्जानाः कार्यकारिणः ।
वेदोक्तेषु च भुञ्जाना व्रतलुब्धा युधिष्ठिर ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो लोग अवैदिक व्रतका आश्रय ले हविष्यान्नका भोजन करते हैं, वे स्वेच्छाचारी हैं और जो वेदोक्त व्रतोंमें प्रवृत्त हो सकाम यज्ञ करते और उसमें खाते हैं, वे भी उस व्रतके फलोंके प्रति लोलुप कहे जाते हैं (अतः उन्हें भी बारंबार इस संसारमें आना पड़ता है) ॥ २ ॥

युधिष्ठिर उवाच

यदिदं तप इत्याहुरुपवासं पृथग्जनाः ।
एतत् तपो महाराज उताहो किं तपो भवेत् ॥ ३ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**महाराज! संसारके साधारण लोग जो उपवासको ही तप कहते हैं, क्या वास्तवमें यही तप है या दूसरा। यदि दूसरा है तो उस तपका क्या स्वरूप है? ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

मासपक्षोपवासेन मन्यन्ते यत् तपो जनाः ।
आत्मतन्त्रोपघातस्तु न तपस्तत्सतां मतम् ॥ ४ ॥

**भीष्मजीने कहा—**राजन्! साधारण जन जो महीने-पंद्रह दिन उपवास करके उसे तप मानते हैं, उनका वह कार्य धर्मके साधनभूत शरीरका शोषण करनेवाला है; अतः श्रेष्ठ पुरुषोंके मतमें वह तप नहीं है ॥ ४ ॥

त्यागश्च संनतिश्चैव शिष्यते तप उत्तमम् ।
सदोपवासी च भवेद् ब्रह्मचारी सदा भवेत् ॥ ५ ॥

उनके मतमें तो त्याग और विनय ही उत्तम तप है। इनका पालन करनेवाला मनुष्य नित्य उपवासी और सदा ब्रह्मचारी है ।। ५ ।।
मुनिश्च स्यात् सदा विप्रो दैवतं च सदा भवेत् ।
कुटुम्बिको धर्मकामः सदास्वप्रश्च भारत ।। ६ ।।
भरतनन्दन! त्यागी और विनयी ब्राह्मण सदा मुनि और सर्वदा देवता समझा जाता है। वह कुटुम्बके साथ रहकर भी निरन्तर धर्मपालनकी इच्छा रखे और निद्रा तथा आलस्यको कभी पास न आने दे ।। ६ ।।
अमांसादी सदा च स्यात् पवित्रश्च सदा भवेत् ।
अमृताशी सदा च स्याद् देवतातिथिपूजकः ।। ७ ।।
मांस कभी न खाय, सदा पवित्र रहे, वैश्वदेव आदि यज्ञसे बचे हुए अमृतमय अन्नका भोजन तथा देवता और अतिथियोंकी पूजा करे ।। ७ ।।
विघसाशी सदा च स्यात् सदा चैवातिथिव्रतः ।
श्रद्दधानः सदा च स्याद् देवताद्विजपूजकः ।। ८ ।।
उसे सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोक्ता, अतिथिसेवाका व्रती, श्रद्धालु तथा देवता और ब्राह्मणोंका पूजक होना चाहिये ।। ८ ।।

युधिष्ठिर उवाच
कथं सदोपवासी स्याद् ब्रह्मचारी कथं भवेत् ।
विघसाशी कथं च स्यात् सदा चैवातिथिव्रतः ।। ९ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! मनुष्य नित्य उपवास करनेवाला कैसे हो सकता है? वह सतत ब्रह्मचारी कैसे रह सकता है? वह किस प्रकार अन्न ग्रहण करे, जिससे सदा यज्ञशिष्ट अन्नका भोक्ता हो सके तथा वह निरन्तर अतिथिसेवाका व्रत भी कैसे निभा सकता है? ।। ९ ।।

भीष्म उवाच
अन्तरा प्रातराशं च सायमाशं तथैव च ।
सदोपवासी स भवेद् यो न भुङ्क्तेऽन्तरा पुनः ।। १० ।।
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! जो प्रतिदिन प्रातःकालके सिवा फिर शामको ही भोजन करे और बीचमें कुछ न खाय, वह नित्य उपवास करनेवाला होता है ।। १० ।।
भार्यां गच्छन् ब्रह्मचारी ऋतौ भवति वै द्विजः ।
ऋतवादी भवेन्नित्यं ज्ञाननित्यश्च यो नरः ।। ११ ।।
जो द्विज केवल ऋतुस्नानके समय ही पत्नीके साथ समागम करता, सदा सत्य बोलता और नित्य ज्ञानमें स्थित रहता है, वह सदा ब्रह्मचारी ही होता है ।। ११ ।।
न भक्षयेत् तथा मांसममांसाशी भवत्यपि ।

दाननित्यः पवित्रश्च अस्वप्रश्च दिवाऽस्वपन् ॥ १२ ॥ तथा जो कभी मांस न खाय, वह अमांसाहारी होता है। जो नित्य दान करनेवाला है, वह पवित्र माना जाता है। जो दिनमें कभी नहीं सोता, वह सदा जागनेवाला समझा जाता है ॥ १२ ॥

भृत्यातिथिषु यो भुङ्क्ते भुक्तवत्सु सदा सदा । अमृतं केवलं भुङ्क्ते इति विद्धि युधिष्ठिर ॥ १३ ॥ युधिष्ठिर! जो सदा भरण-पोषण करनेके योग्य पिता-माता आदि कुटुम्बीजनों, सेवकों तथा अतिथियोंके भोजन कर लेनेपर ही खाता है, वह केवल अमृत भोजन करता है; ऐसा समझो ॥ १३ ॥

(अदत्त्वा योऽतिथिभ्योऽन्नं न भुङ्क्ते सोऽतिथिप्रियः । अदत्त्वान्नं दैवतेभ्यो यो न भुङ्क्ते स दैवतम् ॥) जो अतिथियोंको अन्न दिये बिना स्वयं भी नहीं खाता, वह अतिथिप्रिय है तथा जो देवताओंको अन्न दिये बिना भोजन नहीं करता, वह देवभक्त है ॥

अभुक्तवत्सु नाश्नानः सततं यस्तु वै द्विजः । अभोजनेन तेनास्य जितः स्वर्गो भवत्युत ॥ १४ ॥ जो द्विज भृत्यों और अतिथियोंके भोजन न करनेपर स्वयं भी कभी अन्न ग्रहण नहीं करता, वह भोजन न करनेके उस पुण्यसे स्वर्गलोकपर विजय पा लेता है ॥ १४ ॥

देवताभ्यः पितृभ्यश्च भृत्येभ्योऽतिथिभिः सह । अवशिष्टं तु योऽश्नाति तमाहुर्विघसाशिनम् ॥ १५ ॥ देवगण, पितृगण, माता-पिता तथा अतिथियों-सहित भृत्यवर्गसे अवशिष्ट अन्नको ही जो भोजन करता है, उसे विघसाशी (यज्ञशिष्ट अन्नका भोक्ता कहते हैं ॥ १५ ॥

तेषां लोका ह्यपर्यन्ताः सदने ब्रह्मणा सह । उपस्थिताश्चाप्सरोभिः परियान्ति दिवौकसः ॥ १६ ॥ ऐसे पुरुषोंको अक्षयलोक प्राप्त होते हैं। ब्रह्माजी तथा अप्सराओंसहित समस्त देवता उनके घरपर आकर उनकी परिक्रमा किया करते हैं ॥ १६ ॥

देवताभिश्च ये सार्धं पितृभिश्चोपभुञ्जते । रमन्ते पुत्रपौत्रैश्च तेषां गतिरनुत्तमा ॥ १७ ॥ जो देवताओं और पितरोंके साथ (अर्थात् उन्हें उनका भाग अर्पण करके) भोजन करते हैं, वे इस लोकमें पुत्र-पौत्रोंके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं और परलोकमें भी उन्हें परम उत्तम गति प्राप्त होती है ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि अमृतप्राशनिको नाम एकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें अमृतभोजन-सम्बन्धी दो सौ
इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १८ श्लोकः हैं)

२२२-

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द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

सनत्कुमारजीका ऋषियोंको भगवत्स्वरूपका उपदेश देना

युधिष्ठिर उवाच

केचिदाहुर्द्विजा लोके त्रिधा राजन्ननेकधा ।
न प्रत्ययो न चान्यच्च दृश्यते ब्रह्म नैव तत् ॥
नानाविधानि शास्त्राणि युक्ताश्चैव पृथग्विधाः ।
किमधिष्ठाय तिष्ठामि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**राजन्! जगत्में कुछ विद्वान् जड और चेतन अथवा प्रकृति और पुरुष दो तत्त्वोंका प्रतिपादन करते हैं। कुछ लोग जीव, ईश्वर और प्रकृति—इन तीन तत्त्वोंका वर्णन करते हैं और कितने ही विद्वान् अनेक तत्त्वोंका निरूपण करते रहते हैं; अतः कहीं न विश्वास किया जा सकता है, न अविश्वास। इसके सिवा वह परब्रह्म परमात्मा दिखायी नहीं देता है। नाना प्रकारके शास्त्र हैं और भिन्न-भिन्न प्रकारसे उनका वर्णन किया गया है; इसलिये पितामह! मैं किस सिद्धान्तका आश्रय लेकर रहूँ, यह मुझे बताइये ॥

भीष्म उवाच

स्वे स्वे युक्ता महात्मानः शास्त्रेषु प्रभविष्णवः ।
वर्तन्ते पण्डिता लोके को विद्वान् कश्च पण्डितः ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! शास्त्रोंके विचारमें प्रभावशाली सभी महात्मा अपने-अपने सिद्धान्तके प्रतिपादनमें स्थित हैं। ऐसे पण्डित इस जगत्में बहुत हैं; परंतु उनमें वास्तवमें कौन तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् है और कौन शास्त्रचर्चामें पण्डित है? यह कहना कठिन है ॥

सर्वेषां तत्त्वमज्ञाय यथारुचि तथा भवेत् ।
अस्मिन्नर्थे पुराभूतमितिहासं पुरातनम् ॥
महाविवादसंयुक्तमृषीणां भावितात्मनाम् ।
सबके तत्त्वको भलीभाँति समझकर जैसी रुचि हो, उसीके अनुसार आचरण करे। इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है। एक समय बहुत-से भावितात्मा मुनियोंका इसी विषयको लेकर आपसमें बड़ा भारी वाद-विवाद हुआ था ॥

हिमवत्पार्श्व आसीना ऋषयः संशितव्रताः ॥
षण्णां तानि सहस्राणि ऋषीणां गणमाहितम् ।
हिमालय पर्वतके पार्श्वभागमें कठोर व्रतका पालन करनेवाले छः हजार ऋषियोंकी एक बैठक हुई थी ॥

तत्र केचिद् ध्रुवं विश्वं सेश्वरं तु निरीश्वरम् । प्राकृतं कारणं नास्ति सर्वं नैवमिदं जगत् ॥ उनमेंसे कुछ लोग इस जगत्‌को ध्रुव (सदा रहनेवाला) बताते थे, कुछ इसे ईश्वरसहित कहते थे और कुछ लोग बिना ईश्वरके ही जगत्‌की उत्पत्तिका प्रतिपादन करते थे। कुछ लोगोंका कहना था कि इसका कोई प्राकृत कारण नहीं है तथा कुछ लोगोंका मत यह था कि वास्तवमें इस सम्पूर्ण जगत्‌की सत्ता है ही नहीं ।।

अनेन चापरे विप्राः स्वभावं कर्म चापरे । पौरुषं कर्म दैवं च यत् स्वभावादिरेव तम् ॥ इसी प्रकार दूसरे ब्राह्मणोंमेंसे कुछ लोग स्वभावको, कितने ही कर्मको, बहुतेरे पुरुषार्थको, दूसरे लोग दैवको और अन्य बहुत-से लोग स्वभाव-कर्म आदि सभीको जगत्‌का कारण बताते थे ।।

नानाहेतुशतैर्युक्ता नानाशास्त्रप्रवर्तकाः । स्वभावाद् ब्राह्मणा राजञ्जिगीषन्तः परस्परम् ॥ वे नाना प्रकारके शास्त्रोंके प्रवर्तक थे तथा अनेक प्रकारकी सैकड़ों युक्तियोंद्वारा अपने मतका पोषण करते थे। राजन्! वे सभी ब्राह्मण स्वभावसे ही इस शास्त्रार्थमें एक दूसरेको पराजित करनेकी इच्छा करते थे ।।

ततस्तु मूलमुद्भूतं वादिप्रत्यर्थिसंयुतम् । पात्रदण्डविघातं च वल्कलाजिनवाससाम् ॥ एके मन्युसमापन्नास्ततः शान्ता द्विजोत्तमाः । वशिष्ठमब्रुवन् सर्वे त्वं नो ब्रूहि सनातनम् ॥ नाहं जानामि विप्रेन्द्राः प्रत्युवाच स तान् प्रभुः । तदनन्तर उन वादी और प्रतिवादियोंमें मूलभूत प्रश्नको लेकर बड़ा भारी वाद-विवाद खड़ा हो गया। उनमेंसे कितने ही क्रोधमें भरकर एक दूसरेके पात्र, दण्ड, वल्कल, मृगचर्म और वस्त्रोंको भी नष्ट करने लगे। तत्पश्चात् शान्त होनेपर वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि वशिष्ठसे बोले—'प्रभो! आप ही हमें सनातन तत्त्वका उपदेश करें।' यह सुनकर वशिष्ठने उत्तर दिया—'विप्रवरो! मैं उस सनातन तत्त्वके विषयमें कुछ नहीं जानता' ।।

ते सर्वे सहिता विप्रा नारदमृषिमब्रुवन् ॥ त्वं नो ब्रूहि महाभाग तत्त्वविच्च भवानसि । तब वे सब ब्राह्मण एक साथ नारदमुनिसे बोले—'महाभाग! आप ही हमें सनातन तत्त्वका उपदेश करें; क्योंकि आप तत्त्ववेत्ता हैं' ।।

नाहं द्विजा विजानामि क्व हि गच्छाम संगताः ।। इति तानाह भगवांस्ततः प्राह च स द्विजान् । को विद्वानिह लोकेऽस्मिन्नमोहोऽमृतमद्भुतम् ॥

तब भगवान् नारदने उन ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रगण! मैं उस तत्त्वको नहीं जानता। हम सब लोग मिलकर कहीं और चलें। इस जगत्में कौन ऐसा विद्वान् है, जिसमें मोह न हो तथा जो उस अद्भुत अमृततत्त्वके प्रतिपादनमें समर्थ हो' ।।
तच्च ते शुश्रुवुर्वाक्यं ब्राह्मणा ह्यशरीरिणः ।
सनद्धाम द्विजा गत्वा पृच्छध्वं स च वक्ष्यति ।।
यह बातचीत हो ही रही थी कि उन ब्राह्मणोंने किसी अदृश्य देवताकी बात सुनी—'ब्राह्मणो! सनत्कुमारके आश्रमपर जाकर पूछो। वे तुम्हें तत्त्वज्ञानका उपदेश करेंगे' ।।
तमाह कश्चिद् द्विजवर्यसत्तमो
विभाण्डको मण्डितवेदराशिः ।
कस्त्वं भवानर्थविभेदमध्ये
न दृश्यसे वाक्यमुदीरयंश्च ।।
उस समय वेदराशिके ज्ञानसे सुशोभित विभाण्डक नामक किन्हीं ब्राह्मणशिरोमणिने उस अदृश्य देवतासे पूछा—'हम लोगोंमें तत्त्वके विषयमें मतभेद उत्पन्न हो गया है; ऐसी स्थितिमें आप कौन हैं, जो बात तो कर रहे हैं, किंतु दीखते नहीं हैं' ।।
अथाहेदं तं भगवान् सनन्तं
महामुने विद्धि मां पण्डितोऽसि ।
ऋषिं पुराणं सततैकरूपं
यमक्षयं वेदविदो वदन्ति ।
(भीष्मजी कहते हैं—राजन्!) तब भगवान् सनत्कुमारने उनसे कहा—'महामुने! तुम तो पण्डित हो। तुम मुझे सदा एकरूपसे ही विचरण करनेवाला पुरातन ऋषि सनत्कुमार समझो। मैं वही हूँ, जिसे वेदवेत्ता पुरुष अक्षय बताते हैं' ।।
पुनस्तमाहेदमसौ महात्मा
स्वरूपसंस्थं वद आह पार्थ ।
त्वमेकोऽस्मदृषिपुङ्गवाद्य
न सत्स्वरूपमथवा पुनः किम् ।।
कुन्तीनन्दन! तब उन महात्मा विभाण्डकने पुनः उनसे कहा—'आदिमुनिप्रवर! आप अपने स्वरूपका परिचय दीजिये। केवल आप ही हमसे विलक्षण जान पड़ते हैं, आपका स्वरूप हमारे सामने प्रत्यक्ष नहीं है। अथवा यदि आपका भी कोई स्वरूप है तो वह कैसा है?' ।।
अथाह गम्भीरतरानुपादं
वाक्यं महात्मा ह्यशरीर आदिः ।
न ते मुने श्रोत्रमुखेऽपि चास्यं
न पादहस्तौ प्रपदात्मकेन ।।

तब उस अदृश्य आदि-महात्माने गम्भीर स्वरमें यह बात कही—'मुने! तुम्हारे न तो कान है, न मुख है, न हाथ है, न पैर है और न पैरोंके पंजे ही हैं'॥ ब्रुवन् मुनीन् सत्यमथो निरीक्ष्य स्वमाह विद्वान् मनसा निगम्य । ऋषे कथं वाक्यमिदं ब्रवीषि न चास्य मन्ता न च विद्यते चेत् ॥ न शुश्रुवुस्ततस्तत् तु प्रतिवाक्यं द्विजोत्तमाः । निरीक्ष्यमाणा आकाशं प्रहसन्तस्ततस्ततः ॥ मुनियोंसे बातचीत करते हुए विद्वान् विभाण्डकने अपने विषयमें जब यह सब सत्य देखा तो मन-ही-मन विचार करके कहा—'ऋषे! आप ऐसी बात क्यों कहते हैं? यदि इसको जाननेवाला या न जाननेवाला कोई न रहे, तब क्या होगा?' परंतु इसका उत्तर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फिर नहीं सुनायी दिया। वे हँसते हुए आकाशकी ओर देखते ही रह गये ॥ आश्चर्यमिति मत्वा ते ययुर्हैमं महागिरिम् । सनत्कुमारसंकाशं सगणा मुनिसत्तमाः ॥ 'यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है' ऐसा मानकर वे सभी मुनिश्रेष्ठ दल-बलसहित सुवर्णमय महागिरि मेरुपर सनत्कुमारजीके पास गये ॥ तं पर्वतं समारुह्य ददृशुर्ध्यानमाश्रिताः । कुमारं देवमर्हन्तं वेदपाराविवर्जितम् ॥ उस पर्वतपर आरूढ़ हो ध्यानका आश्रय ले उन ऋषियोंने पूजनीय देव सनत्कुमारको देखा, जो निरन्तर वेदके पारायणमें लगे हुए थे ॥ ततः संवत्सरे पूर्णे प्रकृतिस्थं महामुनिम् । सनत्कुमारं राजेन्द्र प्रणिपत्य द्विजाः स्थिताः ॥ आगतान् भगवानाह ज्ञाननिर्धूतकल्मषः । ज्ञातं मया मुनिगणा वाक्यं तदशरीरिणः ॥ कार्यमद्य यथाकामं पृच्छध्वं मुनिपुङ्गवाः । राजेन्द्र! एक वर्ष पूर्ण होनेपर जब महामुनि सनत्कुमार प्रकृतिस्थ हुए, तब वे ब्राह्मण उन्हें प्रणाम करके खड़े हो गये। ज्ञानसे जिनके सारे पाप धुल गये थे, उन भगवान् सनत्कुमारने वहाँ पधारे हुए ऋषियोंसे कहा—'मुनिगण! अदृश्य देवताने जो बात कही है, वह मुझे ज्ञात है; अतः आज आपलोगोंके प्रश्नोंका उत्तर देना है। मुनिवरो! आप इच्छानुसार प्रश्न करें'॥ तमब्रुवन् प्राञ्जलयो महामुनिं द्विजोत्तमं ज्ञाननिधिं सुनिर्मलम् । कथं वयं ज्ञाननिधिं वरेण्यं

यक्ष्यामहे विश्वरूपं कुमार ।।
(भीष्मजी कहते हैं—) तब उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर परम निर्मल ज्ञाननिधि द्विजश्रेष्ठ महामुनि सनत्कुमारसे कहा—'कुमार! हमलोग ज्ञानके भण्डार और सर्वश्रेष्ठ विश्वरूप परमेश्वरका किस प्रकार यजन करें? ।।
प्रसीद नो भगवन् ज्ञानलेशं
मधु प्रयाताय सुखाय सन्तः ।
यत् तत्पदं विश्वरूपं महामुने
तत्र ब्रूहि किं कुत्र महानुभाव ।।
'भगवन्! महामुने! महानुभाव! आप हमपर प्रसन्न होइये और हमें ज्ञानरूपी मधुर अमृतका लेशमात्र दान दीजिये; क्योंकि संत अपने शरणागतोंको सदा सुख देते हैं। वह जो विश्वरूप पद है, वह क्या है? यह हमें बताइये' ।।
स तैर्वियुक्तो भगवान् महात्मा
यः संगवान् सत्यवित् तच्छृणुष्व ।
उनके इस प्रकार विशेष अनुरोध करनेपर परब्रह्म परमात्मामें आसक्तचित्त सत्यवेत्ता महात्मा भगवान् सनत्कुमारने जो कुछ कहा, उसे सुनो ।।
अनेकसाहस्रकलेषु चैव
प्रसन्नधातुं च शुभाज्ञया सत् ।।
वे अनेक सहस्र ऋषियोंके बीचमें बैठे थे। उन्होंने उनके शुभ निवेदनसे सत्स्वरूप आनन्दमय परमेश्वरका इस प्रकार प्रतिपादन प्रारम्भ किया ।।
यथाह पूर्वं युष्मासु ह्यशरीरी द्विजोत्तमाः ।
तथैव वाक्यं तत् सत्यमजानन्तश्च कीर्तितम् ।।
**सनत्कुमार बोले—**द्विजोत्तमो! आपलोगोंके बीचमें पहले अदृश्य देवताने जो कुछ कहा था, उनका वह कथन उसी रूपमें सत्य है। आपलोगोंने उसे न जानते हुए ही उसके साथ वार्तालाप किया था ।।
शृणुध्वं परमं कारणमस्ति । स एव सर्व विद्वान् बिभेति न गच्छति । कुत्राहं कस्य नाहं केन केनेत्यवर्तमानो विजानाति ।
सुनिये, वह विश्वरूप परमात्मा सबका परम कारण है। जो उस सर्वस्वरूप परमेश्वरको जानता है, वह न तो भयभीत होता है और न कहीं जाता है। मैं कहाँ हूँ? किसका हूँ? किसका नहीं हूँ? किस-किस साधनसे कार्य करता हूँ? इत्यादि विचारोंमें न पड़कर परमात्माको अनुभव करता है ।।
स युगत्तो व्यापी । स पृथक् स्थितः । तदपरमार्थम् ।
वह परमात्मा युग-युगमें व्यापक है। वह जडात्मक प्रपंचसे अत्यन्त भिन्न रूपमें पृथक् स्थित है। उस परमात्मासे भिन्न जो कोई भी जड वस्तु है, उसकी पारमार्थिक सत्ता नहीं

है ।।

यथा वायुरेकः सन् बहुधेरितः । यथावद् द्विजे मृगे व्याघ्रे च । मनुजे वेणुसंश्रयो भिद्यते वायुरथैकः । आत्मा तथासौ परमात्मासावन्य इव भाति । जैसे वायु एक होकर भी अनेक रूपोंमें संचरित होता है। पक्षी, मृग, व्याघ्र और मनुष्यमें तथा वेणुमें यथार्थ रूपसे स्थित होकर एक ही वायुके भिन्न-भिन्न स्वरूप हो जाते हैं। जो आत्मा है वही परमात्मा है; परंतु वह जीवात्मासे भिन्न-सा जान पड़ता है ।।

एवमात्मा स एव गच्छति । सर्वमात्मा पश्यन् शृणोति जिघ्रति भाषते । इस प्रकार वह आत्मा ही परमात्मा है। वही जाता है, वह आत्मा ही सबको देखता है, सबकी बातें सुनता है, सभी गंधोंको सूँघता है और सबसे बातचीत करता है ।।

चक्रेऽस्य तं महात्मानं परितो दश रश्मयः । विनिष्क्रम्य यथासूर्यमनुगच्छति तं प्रभुम् ।। सूर्यदेवके चक्रमें सब ओर दस-दस किरणें हैं, जो वहाँसे निकलकर महात्मा भगवान् सूर्यके पीछे-पीछे चलती हैं ।।

दिने दिनेऽस्तमभ्येति पुनरुद्गच्छते दिशः । तावुभौ न रवौ चास्तां तथा वित्त शरीरिणम् ।। सूर्यदेव प्रतिदिन अस्त होते और पुनः पूर्वदिशामें उदित होते हैं; परंतु वे उदय और अस्त दोनों ही सूर्यमें नहीं हैं। इसी प्रकार शरीरके अन्तर्गत अन्तर्यामीरूपसे जो भगवान् नारायण विराजमान हैं, उनको जानो (उनमें शरीर और अशरीरभाव सूर्यमें उदय-अस्तकी ही भाँति कल्पित हैं) ।।

पतिते वित्त विप्रेन्द्रा भक्षणे चरणे परः । ऊर्ध्वमेकस्तथाधस्तादेकस्तिष्ठति चापरः ।। विप्रवरो! आपलोगोंको गिरते-पड़ते, चलते-फिरते और खाते-पीते प्रत्येक कार्यके समय, ऊपर-नीचे आदि प्रत्येक देश और दिशामें एकमात्र भगवान् नारायण सर्वत्र विराज रहे हैं—ऐसा अनुभव करना चाहिये ।।

हिरण्यसदनं ज्ञेयं समेत्य परमं पदम् । आत्मना ह्यात्मदीपं तमात्मनि ह्यात्मपूरुषम् ।। उनका दिव्य सुवर्णमय धाम ही परमपद जानना चाहिये, उसे पाकर जीवन कृतार्थ हो जाता है। वह स्वयं ही अपना प्रकाशक और स्वयं ही अपने-आपमें अन्तर्यामी आत्मा है ।।

संचितं संचितं पूर्वं भ्रमरो वर्तते भ्रमन् । योऽभिमानीव जानाति न मुह्यति न हीयते ।। भौंरा पहले रसका संचय कर लेता है तब फूलके चारों ओर चक्कर लगाने लगता है, उसी प्रकार जो ज्ञानी पुरुष देहाभिमानी-जैसा बनकर लोकसंग्रहके लिये सब विषयोंका अनुभव करता है वह न तो मोहमें पड़ता है और न क्षीण ही होता है ।।

न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनं हृदा मनीषा पश्यति रूपमस्य । इज्यते यस्तु मन्त्रेण यजमानो द्विजोत्तमः ॥ कोई भी उस परमात्माको अपने चर्मचक्षुओंसे नहीं देख सकता। अन्तःकरणमें स्थित निर्मल बुद्धिके द्वारा ही उसके रूपको ज्ञानी पुरुष देख पाता है। उस परमात्माका मन्त्रद्वारा यजन किया जाता है तथा श्रेष्ठ द्विज ही उसका यजन करता है ।।

नैव धर्मी न चाधर्मी द्वन्द्वातीतो विमत्सरः । ज्ञानतृप्तः सुखं शेते ह्यमृतात्मा न संशयः ॥ वह अमृतस्वरूप परमात्मा न धर्मी है, न अधर्मी। वह द्वन्द्वोंसे अतीत और ईर्ष्या-द्वेषसे शून्य है। इसमें संदेह नहीं कि वह ज्ञानसे परितृप्त होकर सुखपूर्वक सोता है ।।

एवमेष जगत्सृष्टिं कुरुते मायया प्रभुः । न जानाति विमूढात्मा कारणं चात्मनो ह्यसौ ॥ तथा ये भगवान् अपनी मायाद्वारा जगत्की सृष्टि करते हैं। जिसका हृदय मोहसे आच्छन्न है वह अपने कारणभूत परमात्माको नहीं जानता ।।

ध्याता द्रष्टा तथा मन्ता बोद्धा दृष्टान् स एव सः । को विद्वान् परमात्मानमनन्तं लोकभावनम् ॥ यत्तु शक्यं मया प्रोक्तं गच्छध्वं मुनिपुङ्गवाः । वही ध्यान, दर्शन, मनन और देखी हुई वस्तुओंका बोध प्राप्त करनेवाला है। सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति करनेवाले उस अनन्त परमात्माको कौन जान सकता है? मुनिवरो! मुझसे जहाँतक हो सकता था मैंने इसका स्वरूप बता दिया। अब आपलोग जाइये ।।

भीष्म उवाच

एवं प्रणम्य विप्रेन्द्रा ज्ञानसागरसम्भवम् । सनत्कुमारं संदृश्य जग्मुस्ते रुचिरं पुनः ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार ज्ञानके समुद्रकी उत्पत्तिके कारणभूत मनोहर आकृतिवाले सनत्कुमारको प्रणाम करके उनका दर्शन करनेके पश्चात् वे सब ऋषि-मुनि वहाँसे चले गये ।।

तस्मात् त्वमपि कौन्तेय ज्ञानयोगपरो भव । ज्ञानमेव महाराज सर्वदुःखविनाशनम् ॥ अतः महाराज कुन्तीनन्दन! तुम भी ज्ञानयोगके साधनमें तत्पर हो जाओ। ऐसा ज्ञान ही सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाला है ।।

इदं महादुःखसमाकराणां नृणां परित्राणविनिर्मितं पुरा ।