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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

क्रमं प्रणीय शिक्षां च प्रणयित्वा स गालवः ॥ १०४ ॥ बाभ्रव्य-गोत्रमें उत्पन्न हुए वे महर्षि गालव भगवान् नारायणसे वर एवं परम उत्तम योग पाकर वेदके क्रमविभाग एवं शिक्षाका प्रणयन करके सबसे पहले क्रमविभागके पारंगत विद्वान् हुए थे ॥ १०३-१०४ ॥

कण्डरीकोऽथ राजा च ब्रह्मदत्तः प्रतापवान् । जातीमरणजं दुःखं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः ॥ १०५ ॥ सप्तजातिषु मुख्यत्वाद् योगानां सम्पदं गतः । कण्डरीक-कुलमें उत्पन्न हुए प्रतापी राजा ब्रह्मदत्तने सात जन्मोंके जन्म-मृत्युसम्बन्धी दुःखोंका बार-बार स्मरण करके तीव्रतम वैराग्यके कारण शीघ्र ही योगजनित ऐश्वर्य प्राप्त कर लिया था ॥ १०५ १/२ ॥

पुराहमात्मजः पार्थ प्रथितः कारणान्तरे ॥ १०६ ॥ धर्मस्य कुरुशार्दूल ततोऽहं धर्मजः स्मृतः । कुरुश्रेष्ठ! कुन्तीकुमार! पूर्वकालमें किसी कारणवश मैं धर्मके पुत्ररूपसे प्रसिद्ध हुआ था। इसीलिये मुझे ‘धर्मज’ कहा गया है ॥ १०६ १/२ ॥

नरनारायणौ पूर्वं तपस्तेपतुरव्ययम् ॥ १०७ ॥ धर्मयानं समारूढौ पर्वते गन्धमादने । तत्कालसमये चैव दक्षयज्ञो बभूव ह ॥ १०८ ॥ पहले नर और नारायणने जब धर्ममय रथपर आरूढ हो गन्धमादन पर्वतपर अक्षय तप किया था, उसी समय प्रजापति दक्षका यज्ञ आरम्भ हुआ ॥ १०७-१०८ ॥

न चैवाकल्पयद् भागं दक्षो रुद्रस्य भारत । ततो दधीचिवचनाद् दक्षयज्ञमपाहरत् ॥ १०९ ॥ भारत! उस यज्ञमें दक्षने रुद्रके लिये भाग नहीं दिया था; इसलिये दधीचिके कहनेसे रुद्रदेवने दक्षके यज्ञका विध्वंस कर डाला ॥ १०९ ॥

ससर्ज शूलं कोपेन प्रज्वलन्तं मुहुर्मुहुः । तच्छूलं भस्मसात्कृत्वा दक्षयज्ञं सविस्तरम् ॥ ११० ॥ आवयोः सहसागच्छद् बदर्याश्रममन्तिकात् । रुद्रने क्रोधपूर्वक अपने प्रज्वलित त्रिशूलका बारंबार प्रयोग किया। वह त्रिशूल दक्षके विस्तृत यज्ञको भस्म करके सहसा बदरिकाश्रममें हम दोनों (नर और नारायण) के निकट आ पहुँचा ॥ ११० १/२ ॥

वेगेन महता पार्थ पतन्नारायणोरसि ॥ १११ ॥ ततस्तत् तेजसाऽऽविष्टः केशा नारायणस्य ह । बभूवुर्मुञ्जवर्णास्तु ततोऽहं मुञ्जकेशवान् ॥ ११२ ॥

पार्थ! उस समय नारायणकी छातीमें वह त्रिशूल बड़े वेगसे जा लगा। उससे निकलते हुए तेजकी लपेटमें आकर नारायणके केश मूँजके समान रंगवाले हो गये। इससे मेरा नाम 'मुञ्जकेश' हो गया ॥ १११-११२ ॥

तच्च शूलं विनिर्धूतं हुंकारेण महात्मना ।
जगाम शंकरकरं नारायणसमाहतम् ॥ ११३ ॥
तब महात्मा नारायणने हुंकारध्वनिके द्वारा उस त्रिशूलको पीछे हटा दिया। नारायणके हुंकारसे प्रतिहत होकर वह शंकरजीके हाथमें चला गया ॥ ११३ ॥

अथ रुद्र उपाधावत् तावृषी तपसान्वितौ ।
तत एनं समुद्भूतं कण्ठे जग्राह पाणिना ॥ ११४ ॥
नारायणः स विश्वात्मा तेनास्य शितिकण्ठता ।
यह देख रुद्र तपस्यामें लगे हुए उन ऋषियोंपर टूट पड़े। तब विश्वात्मा नारायणने अपने हाथसे उन आक्रमणकारी रुद्रदेवका गला पकड़ लिया। इसीसे उनका कण्ठ नीला हो जानेके कारण वे 'नीलकण्ठ' के नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ११४ १/२ ॥

अथ रुद्रविधातार्थमिषीकां नर उद्धरन् ॥ ११५ ॥
मन्त्रैश्च संयुयोजाशु सोऽभवत् परशुर्महान् ।
इसी समय रुद्रका विनाश करनेके लिये नरने एक सींक निकाली और उसे मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके शीघ्र ही छोड़ दिया। वह सींक एक बहुत बड़े परशुके रूपमें परिणत हो गयी ॥ ११५ १/२ ॥

क्षिप्तश्च सहसा तेन खण्डनं प्राप्तवांस्तदा ॥ ११६ ॥
ततोऽहं खण्डपरशुः स्मृतः परशुखण्डनात् ।
नरका चलाया हुआ वह परशु सहसा रुद्रके द्वारा खण्डित कर दिया गया। मेरे परशुका खण्डन हो जानेसे मैं 'खण्डपरशु' कहलाया ॥ ११६ १/२ ॥

अर्जुन उवाच

अस्मिन् युद्धे तु वार्ष्णेय त्रैलोक्यशमने तदा ॥ ११७ ॥
को जयं प्राप्तवांस्तत्र शंसैतन्मे जनार्दन ।
अर्जुनने पूछा—वृष्णिनन्दन! त्रिलोकीका संहार करनेवाले उस युद्धके उपस्थित होनेपर वहाँ रुद्र और नारायणमेंसे किसको विजय प्राप्त हुई? जनार्दन! आप यह बात मुझे बताइये ॥ ११७ १/२ ॥

श्रीभगवानुवाच

तयोः संलग्नयोर्युद्धे रुद्रनारायणात्मनोः ॥ ११८ ॥
उद्विग्नाः सहसा कृत्स्नाः सर्वे लोकास्तदाभवन् ।
नागृह्णात् पावकः शुभ्रं मखेषु सुहुतं हविः ॥ ११९ ॥

श्रीभगवान् बोले— अर्जुन! रुद्र और नारायण जब इस प्रकार परस्पर युद्धमें संलग्न हो गये, उस समय सम्पूर्ण लोकोंके समस्त प्राणी सहसा उद्विग्न हो उठे। अग्निदेव यज्ञोंमें विधिपूर्वक होम किये गये विशुद्ध हविष्यको भी ग्रहण नहीं कर पाते थे ॥ ११८-११९ ॥

वेदा न प्रतिभान्ति स्म ऋषीणां भावितात्मनाम् ।
देवान् रजस्तमश्चैव समाविविशतुस्तदा ॥ १२० ॥
पवित्रात्मा ऋषियोंको वेदोंका स्मरण नहीं हो पाता था। उस समय देवताओंमें रजोगुण और तमोगुणका आवेश हो गया था ॥ १२० ॥

वसुधा संचकम्पे च नभश्च विचचाल ह ।
निष्प्रभाणि च तेजांसि ब्रह्मा चैवासनच्युतः ॥ १२१ ॥
अगाच्छोषं समुद्रश्च हिमवांश्च व्यशीर्यत ।
पृथ्वी काँपने लगी, आकाश विचलित हो गया। समस्त तेजस्वी पदार्थ (ग्रह-नक्षत्र आदि) निष्प्रभ हो गये। ब्रह्मा अपने आसनसे गिर पड़े। समुद्र सूखने लगा और हिमालय पर्वत विदीर्ण होने लगा ॥ १२१ १/२ ॥

तस्मिन्नेवं समुत्पन्ने निमित्ते पाण्डुनन्दन ॥ १२२ ॥
ब्रह्मा वृतो देवगणैर्ऋषिभिश्च महात्मभिः ।
आजगामाशु तं देशं यत्र युद्धमवर्तत ॥ १२३ ॥
पाण्डुनन्दन! ऐसे अपशकुन प्रकट होनेपर ब्रह्माजी देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंको साथ ले शीघ्र उस स्थानपर आये, जहाँ वह युद्ध हो रहा था ॥ १२२-१२३ ॥

सोऽञ्जलिप्रग्रहो भूत्वा चतुर्वक्त्रो निरुक्तगः ।
उवाच वचनं रुद्रं लोकानामस्तु वै शिवम् ॥ १२४ ॥
न्यस्यायुधानि विश्वेश जगतो हितकाम्यया ।
निरुक्तगम्य भगवान् चतुर्मुखने हाथ जोड़कर रुद्रदेवसे कहा—‘प्रभो! समस्त लोकोंका कल्याण हो! विश्वेश्वर! आप जगत्‌के हितकी कामनासे अपने हथियार रख दीजिये ॥ १२४ १/२ ॥

यदक्षरमथाव्यक्तमीशं लोकस्य भावनम् ॥ १२५ ॥
कूटस्थं कर्तृ निर्द्वन्द्वमकतेति च यं विदुः ।
व्यक्तिभावगतस्यास्य एका मूर्तिरियं शुभा ॥ १२६ ॥
‘जो सम्पूर्ण जगत्‌का उत्पादक, अविनाशी और अव्यक्त ईश्वर हैं, जिन्हें ज्ञानी पुरुष कूटस्थ, निर्द्वन्द्व, कर्ता और अकर्ता मानते हैं, व्यक्त-भावको प्राप्त हुए उन्हीं परमेश्वरकी यह एक कल्याणमयी मूर्ति है ॥

नरो नारायणश्चैव जातौ धर्मकुलोद्भवौ ।
तपसा महता युक्तौ देवश्रेष्ठौ महाव्रतौ ॥ १२७ ॥

'धर्मकुलमें उत्पन्न हुए ये दोनों महाव्रती देवश्रेष्ठ नर और नारायण महान् तपस्यासे युक्त हैं ॥ १२७ ॥ अहं प्रसादजस्तस्य कुतश्चित् कारणान्तरे । त्वं चैव क्रोधजस्तात पूर्वसर्गे सनातनः ॥ १२८ ॥ 'किसी निमित्तसे उन्हीं नारायणके कृपाप्रसादसे मेरा जन्म हुआ है। तात! आप भी पूर्वसर्गमें उन्हीं भगवान्‌के क्रोधसे उत्पन्न हुए सनातन पुरुष हैं ॥ १२८ ॥ मया च सार्धं वरद विबुधैश्च महर्षिभिः । प्रसाद्याशु लोकानां शान्तिर्भवतु मा चिरम् ॥ १२९ ॥ 'वरद! आप देवताओं और महर्षियोंके तथा मेरे साथ शीघ्र इन भगवान्‌को प्रसन्न कीजिये, जिससे सम्पूर्ण जगत्‌में शीघ्र ही शान्ति स्थापित हो' ॥ १२९ ॥ ब्रह्मणा त्वेवमुक्तस्तु रुद्रः क्रोधाग्निमुत्सृजन् । प्रसादयामास ततो देवं नारायणं प्रभुम् । शरणं च जगामाद्यं वरेण्यं वरदं प्रभुम् ॥ १३० ॥ ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर रुद्रदेवने अपनी क्रोधाग्निका त्याग किया। फिर आदिदेव, वरेण्य, वरदायक, सर्वसमर्थ भगवान् नारायणको प्रसन्न किया और उनकी शरण ली ॥ १३० ॥ ततोऽथ वरदो देवो जितक्रोधो जितेन्द्रियः । प्रीतिमानभवत् तत्र रुद्रेण सह संगतः ॥ १३१ ॥ तब क्रोध और इन्द्रियोंको जीत लेनेवाले वरदायक देवता नारायण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए और रुद्रदेवसे गले मिले ॥ १३१ ॥ ऋषिभिर्ब्रह्मणा चैव विबुधैश्च सुपूजितः । उवाच देवमीशानमीशः स जगतो हरिः ॥ १३२ ॥ यस्त्वां वेत्ति स मां वेत्ति यस्त्वामनु स मामनु । नावयोरन्तरं किंचिन्मा तेऽभूद् बुद्धिरन्यथा ॥ १३३ ॥ तदनन्तर देवताओं, ऋषियों और ब्रह्माजीसे अत्यन्त पूजित हो जगदीश्वर श्रीहरिने रुद्रदेवसे कहा—'प्रभो! जो तुम्हें जानता है, वह मुझे भी जानता है। जो तुम्हारा अनुगामी है, वह मेरा भी अनुगामी है। हम दोनोंमें कुछ भी अन्तर नहीं है। तुम्हारे मनमें इसके विपरीत विचार नहीं होना चाहिये ॥ १३२-१३३ ॥ अद्यप्रभृति श्रीवत्सः शूलाङ्को मे भवत्वयम् । मम पाण्यङ्कितश्चापि श्रीकण्ठस्त्वं भविष्यसि ॥ १३४ ॥ 'आजसे तुम्हारे शूलका यह चिह्न मेरे वक्षः-स्थलमें 'श्रीवत्स' के नामसे प्रसिद्ध होगा और तुम्हारे कण्ठमें मेरे हाथके चिह्नसे अंकित होनेके कारण तुम भी 'श्रीकण्ठ' कहलाओगे' ॥ १३४ ॥

श्रीभगवानुवाच

एवं लक्षणमुत्पाद्य परस्परकृतं तदा ।
सख्यं चैवातुलं कृत्वा रुद्रेण सहितावृषी ॥ १३५ ॥
तपस्तेपतुरव्यग्रौ विसृज्य त्रिदिवौकसः ।
एष ते कथितः पार्थ नारायणजयो मृधे ॥ १३६ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—‘पार्थ! इस प्रकार अपने-अपने शरीरमें एक दूसरेके द्वारा किये हुए ऐसे लक्षण (चिह्न) उत्पन्न करके वे दोनों ऋषि रुद्रदेवके साथ अनुपम मैत्री स्थापित कर देवताओंको विदा करनेके पश्चात् शान्तचित्त हो पूर्ववत् तपस्या करने लगे। इस प्रकार मैंने तुम्हें युद्धमें नारायणकी विजयका वृत्तान्त बताया है ॥ १३५-१३६ ॥

नामानि चैव गुह्यानि निरुक्तानि च भारत ।
ऋषिभिः कथितानीह यानि संकीर्तितानि ते ॥ १३७ ॥
भारत! मेरे जो गोपनीय नाम हैं, उनकी व्युत्पत्ति मैंने बतायी है। ऋषियोंने मेरे जो नाम निश्चित किये हैं, उनका भी मैंने तुमसे वर्णन किया है ॥ १३७ ॥

एवं बहुविधे रूपैश्चरामीह वसुन्धराम् ।
ब्रह्मलोकं च कौन्तेय गोलोकं च सनातनम् ॥ १३८ ॥
कुन्तीनन्दन! इस प्रकार अनेक तरहके रूप धारण करके मैं इस पृथ्वीपर विचरता हूँ, ब्रह्मलोकमें रहता हूँ और सनातन गोलोकमें विहार करता हूँ ॥ १३८ ॥

मया त्वं रक्षितो युद्धे महान्तं प्राप्तवाञ्जयम् ।
यस्तु ते सोऽग्रतो याति युद्धे सम्प्रत्युपस्थिते ॥ १३९ ॥
तं विद्धि रुद्रं कौन्तेय देवदेवं कपर्दिनम् ।
कालः स एव कथितः क्रोधजेति मया तव ॥ १४० ॥
मुझसे सुरक्षित होकर तुमने महाभारत युद्धमें महान् विजय प्राप्त की है। कुन्तीनन्दन! युद्ध उपस्थित होनेपर जो पुरुष तुम्हारे आगे-आगे चलते थे, उन्हें तुम जटाजूटधारी देवाधिदेव रुद्र समझो। उन्हींको मैंने तुमसे क्रोधद्वारा उत्पन्न बताया है। वे ही काल कहे गये हैं ॥

निहतास्तेन वै पूर्वं हतवानसि यान् रिपून् ।
अप्रमेयप्रभावं तं देवदेवमुमापतिम् ।
नमस्व देवं प्रयतो विश्वेशं हरमक्षयम् ॥ १४१ ॥
तुमने जिन शत्रुओंको मारा है, वे पहले ही रुद्रदेवके हाथसे मार दिये गये थे। उनका प्रभाव अप्रमेय है। तुम उन देवाधिदेव, उमावल्लभ विश्वनाथ, पापहारी एवं अविनाशी महादेवजीको संयतचित्त होकर नमस्कार करो ॥

यश्च ते कथितः पूर्वं क्रोधजेति पुनः पुनः ।
तस्य प्रभाव एवाग्रे यच्छ्रुतं ते धनंजय ॥ १४२ ॥

धनंजय! जिन्हें क्रोधज बताकर मैंने तुमसे बारंबार उनका परिचय दिया है और पहले तुमने जो कुछ सुन रक्खा है, वह सब उन रुद्रदेवका ही प्रभाव है ॥ १४२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
द्विचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं)


* सूर्य और चन्द्रमा ही अग्नि एवं सोम हैं। वे जगत्‌को हर्ष प्रदान करनेके कारण ‘हृषी’ कहलाते हैं। वे ही भगवान्‌के केश अर्थात् किरणें हैं, इसलिये भगवान्‌का नाम ‘हृषीकेश’ है।
* ‘कृष्ण’ नामकी दूसरी व्युत्पत्ति भी इस प्रकार है—कृष् नाम है सत्‌का और ण कहते हैं आनन्दको। इन दोनोंसे उपलक्षित सच्चिदानन्दघन श्यामसुन्दर गोलोकविहारी नन्दनन्दन श्रीकृष्ण कहलाते हैं।
* वेदमन्त्रके दो-दो पदका उच्चारण करके पहले-पहलेको छोड़ते जाना और उत्तरोत्तर पदको मिलाकर दो-दो पदोंका एक साथ पाठ करते रहना क्रमविभाग कहलाता है। जैसे—‘अग्निमीले पुरोहितम्’ इस मन्त्रका क्रमपाठ इस प्रकार है—‘अग्नि मीले ईले पुरोहितं पुरोहितं यज्ञस्य’ इत्यादि। अक्षरविभागका अर्थ है पदविभाग—एक-एक पदको अलग-अलग करके पढ़ना। यथा ‘अग्निम् ईले पुरोहितम्’ इत्यादि।

जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना

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त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर-नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना

शौनक उवाच

सौते सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् ।
यच्छ्रुत्वा मुनयः सर्वे विस्मयं परमं गताः ॥ १ ॥
शौनकनै कहा—सूतनन्दन! आपने यह बहुत बड़ा आख्यान सुनाया है। इसे सुनकर समस्त ऋषियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ है ॥ १ ॥

सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् ।
न तथा फलदं सौते नारायणकथा यथा ॥ २ ॥
सूतकुमार! सम्पूर्ण ऋषि-आश्रमोंकी यात्रा करना और समस्त तीर्थोंमें स्नान करना भी वैसा फलदायक नहीं है, जैसी कि भगवान् नारायणकी कथा है ॥ २ ॥

पाविताङ्गाः स्म संवृत्ताः श्रुत्वेमामादितः कथाम् ।
नारायणाश्रयां पुण्यां सर्वपापप्रमोचनीम् ॥ ३ ॥
समस्त पापोंसे छुड़ानेवाली नारायणसम्बन्धिनी इस पुण्यमयी कथाको आरम्भसे ही सुनकर हमारे तन-मन पवित्र हो गये ॥ ३ ॥

दुर्दर्शो भगवान् देवः सर्वलोकनमस्कृतः ।
सब्रह्मकैः सुरैः कृत्स्नैरन्यैश्चैव महर्षिभिः ॥ ४ ॥
सर्वलोकवन्दित भगवान् नारायणदेवका दर्शन तो ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवताओं तथा अन्यान्य महर्षियोंके लिये भी दुर्लभ है ॥ ४ ॥

दृष्टवान् नारदो यत्तु देवं नारायणं हरिम् ।
नूनमेतद्ध्यनुमतं तस्य देवस्य सूतज ॥ ५ ॥
सूतनन्दन! नारदजीने जो देवदेव नारायण हरिका दर्शन कर लिया, यह निश्चय ही उन भगवान्‌की अनुमतिसे ही सम्भव हुआ ॥ ५ ॥

यद् दृष्टवान् जगन्नाथमनिरुद्धतनौ स्थितम् ।
यत् प्राद्रवत् पुनर्भूयो नारदो देवसत्तमौ ॥ ६ ॥
नरनारायणौ द्रष्टुं कारणं तद् ब्रवीहि मे ।

नारदजीने जो अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित हुए जगन्नाथ श्रीहरिका दर्शन किया और पुनः जो वे वहाँसे देवश्रेष्ठ नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये उनके पास दौड़े गये, इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ॥ ६ १/२ ॥

सौतिरुवाच

तस्मिन् यज्ञे वर्तमाने राज्ञः पारिक्षितस्य वै ॥ ७ ॥ कर्मान्तरेषु विधिवद् वर्तमानेषु शौनक । कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषिं वेदनिधिं प्रभुम् ॥ ८ ॥ परिपप्रच्छ राजेन्द्रः पितामहपितामहम् । **सूतपुत्रने कहा—**शौनक! राजा जनमेजयका वह यज्ञ विधिपूर्वक चल रहा था। उसमें विभिन्न कर्मोंके बीचमें अवकाश मिलनेपर राजेन्द्र जनमेजयने अपने पितामहोंके पितामह वेदनिधि भगवान् कृष्णद्वैपायन महर्षि व्याससे इस प्रकार पूछा ॥ ७-८ १/२ ॥

जनमेजय उवाच

श्वेतद्वीपान्निवृत्तेन नारदेन सुरर्षिणा ॥ ९ ॥ ध्यायता भगद्वाक्यं चेष्टितं किमतः परम् । **जनमेजय बोले—**भगवन्! भगवान् नारायणके कथनपर विचार करते हुए देवर्षि नारद जब श्वेतद्वीपसे लौट आये, तब उसके बाद उन्होंने क्या किया? ॥ ९ १/२ ॥

बदर्याश्रममागम्य समागम्य च तावृषी ॥ १० ॥ कियन्तं कालमवसत् कां कथां पृष्टवांश्च सः । बदरिकाश्रममें आकर उन दोनों ऋषियोंसे मिलनेके पश्चात् नारदजीने वहाँ कितने समयतक निवास किया और उन दोनोंसे कौन-सी कथा पूछी? ॥ १० १/२ ॥

इदं शतसहस्राद्धि भारताख्यानविस्तरात् ॥ ११ ॥ आमन्थ्य मतिमन्थेन ज्ञानोदधिमनुत्तमम् । एक लाख श्लोकोंसे युक्त विस्तृत महाभारत इतिहाससे निकालकर जो आपने यह सारभूत कथा सुनायी है, यह बुद्धिरूपी मथानीके द्वारा ज्ञानके उत्तम समुद्रको मथकर निकाले गये अमृतके समान है ॥ ११ १/२ ॥

नवनीतं यथा दध्नो मलयाच्चन्दनं यथा ॥ १२ ॥ आरण्यकं च वेदेभ्य ओषधिभ्योऽमृतं यथा । समुद्धृतमिदं ब्रह्मन् कथामृतमिदं तथा ॥ १३ ॥ ब्रह्मन्! जैसे दहीसे मक्खन, मलयपर्वतसे चन्दन, वेदोंसे आरण्यक और ओषधियोंसे अमृत निकाला गया है, उसी प्रकार आपने यह कथारूपी अमृत निकालकर रखा है ॥ १२-१३ ॥

तपोनिधे त्वयोक्तं हि नारायणकथाश्रयम् ।

स ईशो भगवान् देवः सर्वभूतात्मभावनः ॥ १४ ॥ तपोनिधे! आपने भगवान् नारायणकी कथासे सम्बन्ध रखनेवाली जो बातें कही हैं, वे सब इस ग्रन्थकी सारभूत हैं। सबके ईश्वर भगवान् नारायणदेव सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाले हैं ॥ १४ ॥ अहो नारायणं तेजो दुर्दर्शं द्विजसत्तम । यत्राविशन्ति कल्पान्ते सर्वे ब्रह्मादयः सुराः ॥ १५ ॥ ऋषयश्च सगन्धर्वा यच्च किंचिच्चराचरम् । न ततोऽस्ति परं मन्ये पावनं दिवि चेह च ॥ १६ ॥ द्विजश्रेष्ठ! उन भगवान् नारायणका तेज अद्भुत है। मनुष्यके लिये उसकी ओर देखना भी कठिन है। कल्पके अन्तमें जिनके भीतर ब्रह्मा आदि सम्पूर्ण देवता, ऋषि, गन्धर्व तथा जो कुछ भी चराचर जगत् है, वह सब विलीन हो जाता है, उनसे बढ़कर परम पावन एवं महान् इस भूतल और स्वर्गलोकमें मैं दूसरे किसीको नहीं मानता ॥ १५-१६ ॥ सर्वाश्रमाभिगमनं सर्वतीर्थावगाहनम् । न तथा फलदं चापि नारायणकथा यथा ॥ १७ ॥ सम्पूर्ण ऋषि-आश्रमोंकी यात्रा करना और समस्त तीर्थोंमें स्नान करना भी वैसा फल देनेवाला नहीं है, जैसा कि भगवान् नारायणकी कथा प्रदान करती है ॥ १७ ॥ सर्वथा पाविताः स्मेह श्रुत्वेमामादितः कथाम् । हरेर्विश्वेश्वरस्येह सर्वपापप्रणाशनीम् ॥ १८ ॥ सम्पूर्ण विश्वके स्वामी श्रीहरिकी कथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। उसे आरम्भसे ही सुनकर हम सब लोग यहाँ सर्वथा पवित्र हो गये हैं ॥ १८ ॥ न चित्रं कृतवांस्तत्र यदार्यो मे धनंजयः । वासुदेवसहायो यः प्राप्तवाञ्जयमुत्तमम् ॥ १९ ॥ मेरे पितामह अर्जुनने जो भगवान् वासुदेवकी सहायता पाकर उत्तम विजय प्राप्त कर ली, वह वहाँ उन्होंने कोई अद्भुत कार्य नहीं किया है ॥ १९ ॥ न चास्य किंचिदप्राप्यं मन्ये लोकेष्वपि त्रिषु । त्रैलोक्यनाथो विष्णुः स यथाऽऽसीत् साह्यकृत् स वै ॥ २० ॥ त्रिलोकीनाथ भगवान् कृष्ण ही जब उनके सहायक थे, तब उनके लिये तीनों लोकोंमें किसी वस्तुकी प्राप्ति असम्भव रही हो, यह मैं नहीं मानता ॥ धन्याश्च सर्व एवासन् ब्रह्मंस्ते मम पूर्वजाः । हिताय श्रेयसे चैव येषामासीज्जनार्दनः ॥ २१ ॥ ब्रह्मन्! मेरे सभी पूर्वज धन्य थे, जिनका हित और कल्याण करनेके लिये साक्षात् जनार्दन तैयार रहते थे ॥ तपसाथ सुदृश्यो हि भगवान् लोकपूजितः ।

यं दृष्टवन्तस्ते साक्षाच्छ्रीवत्साङ्कविभूषणम् ।। २२ ।। लोकपूजित भगवान् नारायणका दर्शन तो तपस्यासे ही हो सकता है; किंतु मेरे पितामहोंने श्रीवत्सके चिह्नसे विभूषित उन भगवान्‌का साक्षात् दर्शन अनायास ही पा लिया था ।। २२ ।।

तेभ्यो धन्यतरश्चैव नारदः परमेष्ठिजः । न चाल्पतेजसमृषिं वेद्मि नारदमव्ययम् ।। २३ ।। श्वेतद्वीपं समासाद्य येन दृष्टः स्वयं हरिः । देवप्रसादानुगतं व्यक्तं तत् तस्य दर्शनम् ।। २४ ।। उन सबसे भी अधिक धन्यवादके योग्य ब्रह्मपुत्र नारदजी हैं। मैं अविनाशी नारदजीको कम तेजस्वी ऋषि नहीं समझता, जिन्होंने श्वेतद्वीपमें पहुँचकर साक्षात् श्रीहरिका दर्शन प्राप्त कर लिया। उनका वह भगवद्-दर्शन स्पष्ट ही उन भगवान्‌की कृपाका फल है ।।

तद् दृष्टवांस्तदा देवमनिरुद्धतनौ स्थितम् । बदरीमाश्रमं यत् तु नारदः प्राद्रवत् पुनः ।। २५ ।। नरनारायणौ द्रष्टुं किं तु तत् कारणं मुने । मुने! नारदजीने उस समय श्वेतद्वीपमें जाकर जो अनिरुद्ध-विग्रहमें स्थित नारायणदेवका साक्षात्कार किया तथा पुनः नर-नारायणका दर्शन करनेके लिये जो बदरिकाश्रमको प्रस्थान किया, इसका क्या कारण है? ।। २५ १/२ ।।

श्वेतद्वीपान्निवृत्तश्च नारदः परमेष्ठिजः ।। २६ ।। बदरीमाश्रमं प्राप्य समागम्य च तावृषी । कियन्तं कालमवसत् प्रश्नान् कान् पृष्टवांश्च ह ।। २७ ।। ब्रह्मपुत्र नारदजी श्वेतद्वीपसे लौटनेपर जब बदरिकाश्रममें पहुँचकर उन दोनों ऋषियोंसे मिले, तब वहाँ उन्होंने कितने समयतक निवास किया? और वहाँ उनसे किन-किन प्रश्नोंको पूछा? ।। २६-२७ ।।

श्वेतद्वीपादुपावृत्ते तस्मिन् वा सुमहात्मनि । किमब्रूतां महात्मानौ नरनारायणावृषी ।। २८ ।। तदेतन्मे यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमर्हसि । श्वेतद्वीपसे लौटे हुए उन नारदजीसे महात्मा नर-नारायण ऋषियोंने क्या बात की थी? ये सब बातें आप यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें ।। २८ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे ।। २९ ।। यस्य प्रसादाद् वक्ष्यामि नारायणकथामिमाम् ।

**वैशम्पायनजीने कहा—**अमिततेजस्वी भगवान् व्यासको नमस्कार है, जिनके कृपाप्रसादसे मैं भगवान् नारायणकी यह कथा कह रहा हूँ॥ २९ १/२ ॥ प्राप्य श्वेतं महाद्वीपं दृष्ट्वा च हरिमव्ययम्॥ ३०॥ निवृत्तो नारदो राजंस्तरसा मेरुमागमत्। हृदयेनोद्वहन् भारं यदुक्तं परमात्मना ॥ ३१ ॥ राजन्! श्वेतनामक महाद्वीपमें जाकर वहाँ अविनाशी श्रीहरिका दर्शन करके जब नारदजी लौटे, तब बड़े वेगसे मेरुपर्वतपर आ पहुँचे। परमात्मा श्रीहरिने उनसे जो कुछ कहा था, उस कार्यभारको वे हृदयसे ढो रहे थे ॥ ३०-३१ ॥ पश्चादस्याभवद् राजन्नात्मनः साध्वसं महत्। यद् गत्वा दूरमध्वानं क्षेमी पुनरिहागतः ॥ ३२ ॥ नरेश्वर! तत्पश्चात् उनके मनमें यह सोचकर बड़ा भारी विस्मय हुआ कि मैं इतनी दूरका मार्ग तय करके पुनः यहाँ सकुशल कैसे लौट आया? ॥ ३२ ॥ मेरोः प्रचक्राम ततः पर्वतं गन्धमादनम्। निपपात च खात् तूर्णं विशालां बदरीमनु ॥ ३३ ॥ तदनन्तर वे मेरुसे गन्धमादन पर्वतकी ओर चले और बदरीविशालतीर्थके समीप तुरंत ही आकाशसे नीचे उतर पड़े ॥ ३३ ॥ ततः स ददृशे देवौ पुराणावृषिसत्तमौ। तपश्चरन्तौ सुमहदात्मनिष्ठौ महाव्रतौ ॥ ३४ ॥ वहाँ उन्होंने उन दोनों पुरातन देवता ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायणका दर्शन किया, जो आत्मनिष्ठ हो महान् व्रत लेकर बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे ॥ ३४ ॥ तेजसाभ्यधिकौ सूर्यात् सर्वलोकविरोचनात्। श्रीवत्सलक्षणौ पूज्यौ जटामण्डलधारिणौ ॥ ३५ ॥ वे दोनों सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करनेवाले सूर्यसे भी अधिक तेजस्वी थे। उन पूज्य महात्माओंके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सके चिह्न सुशोभित हो रहे थे और वे अपने मस्तकपर जटामण्डल धारण किये हुए थे ॥ जालपादभुजौ तौ तु पादयोश्चक्रलक्षणौ। व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ तथा मुष्कचतुष्किणौ ॥ ३६ ॥ षष्टिदन्तावष्टदंष्ट्रौ मेघौघसदृशस्वनौ। स्वाक्यौ पृथुललाटौ च सुभ्रू सुहनुनासिकौ ॥ ३७ ॥ उनके हाथोंमें हंसका और चरणोंमें चक्रका चिह्न था। विशाल वक्षःस्थल, बड़ी-बड़ी भुजाएँ, अण्डकोशमें चार-चार बीज, मुखमें साठ दाँत और आठ दाढ़ें, मेघके समान गम्भीर स्वर, सुन्दर मुख, चौड़े ललाट, बाँकी भौंहें, सुन्दर ठोढ़ी और मनोहर नासिकासे उन दोनोंकी अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ ३६-३७ ॥

आतपत्रेण सदृशे शिरसी देवयोस्तयोः । एवं लक्षणसम्पन्नौ महापुरुषसंज्ञितौ ॥ ३८ ॥ तौ दृष्ट्वा नारदो हृष्टस्ताभ्यां च प्रतिपूजितः । स्वागतेनाभिभाष्याथ पृष्टश्चानामयं तथा ॥ ३९ ॥ उन दोनों देवताओंके मस्तक छत्रके समान प्रतीत होते थे। ऐसे शुभलक्षणोंसे सम्पन्न उन दोनों महापुरुषोंका दर्शन करके नारदजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। भगवान् नर और नारायणने भी नारदजीका स्वागत-सत्कार करके उनका कुशल-समाचार पूछा ॥ ३८-३९ ॥ बभूवान्तर्गतमतिर्निरीक्ष्य पुरुषोत्तमौ । सदोगतास्तत्र ये वै सर्वभूतनमस्कृताः ॥ ४० ॥ श्वेतद्वीपे मया दृष्टास्तादृशावृषिसत्तमौ । तदनन्तर नारदजीने उन दोनों पुरुषोत्तमोंकी ओर देखकर मन-ही-मन विचार किया, अहो! मैंने श्वेतद्वीपमें भगवान्‌की सभाके भीतर जिन सर्वभूतवन्दित सदस्योंको देखा था, ये दोनों ऋषिश्रेष्ठ भी वैसे ही हैं ॥ इति संचिन्त्य मनसा कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् ॥ ४१ ॥ स चोपविविशे तत्र पीठे कुशमये शुभे । मन-ही-मन ऐसा सोचकर वे उन दोनोंकी प्रदक्षिणा करके एक सुन्दर कुशासनपर बैठ गये ॥ ४१ १/२ ॥ ततस्तौ तपसां वासौ यशसां तेजसामपि ॥ ४२ ॥ ऋषी शमदमोपेतौ कृत्वा पौर्वाह्लिकं विधिम् । पश्चान्नारदमव्यग्रौ पाद्यार्घ्याभ्यामथार्चतः ॥ ४३ ॥ तदनन्तर तपस्या, यश और तेजके भी निवासस्थान वे शम-दमसम्पन्न दोनों ऋषि पूर्वाह्नकालका नित्य कर्म पूर्ण करके फिर शान्त-भावसे पाद्य और अर्घ्य आदि निवेदन करके नारदजीकी पूजा करने लगे ॥ ४२-४३ ॥ पीठयोश्चोपविष्टौ तौ कृतातिथ्याह्निकौ नृप । तेषु तत्रोपविष्टेषु स देशोऽभिव्यराजत ॥ ४४ ॥ आज्याहुतिमहाज्वालैर्यज्ञवाटो यथाग्निभिः । नरेश्वर! अपने नित्यकर्म तथा नारदजीका आतिथ्य-सत्कार करके वे दोनों ऋषि भी कुशासनपर बैठ गये। वहाँ उन तीनोंके बैठ जानेपर वह प्रदेश घीकी आहुतिसे प्रज्वलित विशाल लपटोंवाले तीन अग्नियोंसे प्रकाशित यज्ञमण्डपकी भाँति सुशोभित होने लगा ॥ ४४ १/२ ॥ अथ नारायणस्तत्र नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥ ४५ ॥ सुखोपविष्टं विश्रान्तं कृतातिथ्यं सुखस्थितम् ।

इसके बाद वहाँ आतिथ्य ग्रहण करके सुखपूर्वक बैठकर विश्राम करते हुए नारदजीसे नारायणने इस प्रकार कहा ॥ ४५ १/२ ॥

नरनारायणावूचतुः

अपिदानीं स भगवान् परमात्मा सनातनः ॥ ४६ ॥
श्वेतद्वीपे त्वया दृष्ट आवयोः प्रकृतिः परा ।
नर-नारायण बोले—देवर्षे! क्या तुमने इस समय श्वेतद्वीपमें जाकर हम दोनोंका परम कारणरूप सनातन परमात्मा भगवान्‌का दर्शन कर लिया? ॥ ४६ १/२ ॥

नारद उवाच

दृष्टो मे पुरुषः श्रीमान् विश्वरूपधरोऽव्ययः ॥ ४७ ॥
सर्वे लोका हि तत्रस्थास्तथा देवाः सहर्षिभिः ।
नारदजीने कहा—भगवन्! मैंने विश्वरूपधारी उन अविनाशी एवं कान्तिमान् परम पुरुषका दर्शन कर लिया। ऋषियोंसहित देवता तथा सम्पूर्ण लोक उन्हींके भीतर विराजमान हैं ॥ ४७ १/२ ॥

अद्यापि चैनं पश्यामि युवां पश्यन् सनातनौ ॥ ४८ ॥
यैर्लक्षणैरुपेतः स हरिरव्यक्तरूपधृक् ।
तैर्लक्षणैरुपेतौ हि व्यक्तरूपधरौ युवाम् ॥ ४९ ॥
मैं इस समय भी आप दोनों सनातन पुरुषोंको देखकर यहीं श्वेतद्वीपनिवासी भगवान्‌की झाँकी कर रहा हूँ। वहाँ मैंने अव्यक्तरूपधारी श्रीहरिको जिन लक्षणोंसे सम्पन्न देखा था, आप दोनों व्यक्तरूपधारी पुरुष भी उन्हीं लक्षणोंसे सुशोभित हैं ॥ ४८-४९ ॥

दृष्टौ युवां मया तत्र तस्य देवस्य पार्श्वतः ।
इहैव चागतोऽस्म्यद्य विसृष्टः परमात्मना ॥ ५० ॥
इतना ही नहीं, मैंने आप दोनोंको वहाँ भी परमदेवके पास उपस्थित देखा था और उन्हीं परमात्माके भेजनेसे आज मैं फिर यहाँ आया हूँ ॥ ५० ॥

को हि नाम भवेत् तस्य तेजसा यशसा श्रिया ।
सदृशस्त्रिषु लोकेषु ऋते धर्मात्मजौ युवाम् ॥ ५१ ॥
तीनों लोकोंमें धर्मके पुत्र आप दोनों महापुरुषोंके सिवा दूसरा कौन है, जो तेज, यश और श्रीमें उन्हीं परमेश्वरके समान हो ॥ ५१ ॥

तेन मे कथितः कृत्स्नो धर्मः क्षेत्रज्ञसंज्ञितः ।
प्रादुर्भावाश्च कथिता भविष्या इह ये यथा ॥ ५२ ॥
उन भगवान् श्रीहरिने मुझसे सम्पूर्ण धर्मका वर्णन किया था। क्षेत्रज्ञका भी परिचय दिया था और यहाँ भविष्यमें उनके जो अवतार जैसे होनेवाले हैं, उन्हें भी बताया था ॥ ५२ ॥

तत्र ये पुरुषाः श्वेताः पञ्चेन्द्रियविवर्जिताः । प्रतिबुद्धाश्च ते सर्वे भक्ताश्च पुरुषोत्तमम् ॥ ५३ ॥ वहाँ जो चन्द्रमाके समान गौरवर्णके पुरुष थे, वे सब-के-सब पाँचों इन्द्रियोंसे रहित अर्थात् पाञ्च-भौतिक शरीरसे शून्य, ज्ञानवान् तथा पुरुषोत्तम श्रीविष्णुके भक्त थे ॥ ५३ ॥

तेऽर्चयन्ति सदा देवं तैः सार्धं रमते च सः । प्रियभक्तो हि भगवान् परमात्मा द्विजप्रियः ॥ ५४ ॥ वे सदा उन नारायणदेवकी पूजा-अर्चा करते रहते हैं और भगवान् भी सदा उनके साथ प्रसन्नतापूर्वक क्रीड़ा करते रहते हैं। भगवान्‌को अपने भक्त बहुत ही प्रिय हैं तथा वे परमात्मा श्रीहरि ब्राह्मणोंके भी प्रेमी हैं ॥ ५४ ॥

रमते सोऽर्च्यमानो हि सदा भागवतप्रियः । विश्वभुक् सर्वगो देवो माधवो भक्तवत्सलः ॥ ५५ ॥ वे विश्वका पालन करनेवाले सर्वव्यापी भगवान् बड़े भक्तवत्सल हैं। भगवद्भक्तोंके प्रेमी और प्रियतम श्रीहरि उनसे पूजित हो वहाँ सदा सुप्रसन्न रहते हैं ॥

स कर्ता कारणं चैव कार्यं चातिबलद्युतिः । हेतुश्चाज्ञा विधानं च तत्त्वं चैव महायशाः ॥ ५६ ॥ वे ही कर्ता, कारण और कार्य हैं। उनका बल और तेज अनन्त है। वे महायशस्वी भगवान् ही हेतु, आज्ञा, विधि और तत्त्वरूप हैं ॥ ५६ ॥

तपसा योज्य सोऽऽत्मानं श्वेतद्वीपात् परं हि यत् । तेज इत्यभिविख्यातं स्वयम्भासाऽवभासितम् ॥ ५७ ॥ वे अपने आपको तपस्यामें लगाकर श्वेतद्वीपसे भी परे प्रकाशमान तेजोमय स्वरूपसे विख्यात हैं। उनका वह तेज अपने ही प्रकाशसे प्रकाशित है ॥ ५७ ॥

शान्तिः सा त्रिषु लोकेषु विहिता भावितात्मना । एतया शुभया बुद्ध्या नैष्ठिकं व्रतमास्थितः ॥ ५८ ॥ उन पूतात्मा परमात्माने तीनों लोकोंमें उस शान्तिका विस्तार किया है। अपनी इस कल्याणमयी बुद्धिके द्वारा वे नैष्ठिक व्रतका आश्रय लेकर स्थित हैं ॥ ५८ ॥

न तत्र सूर्यस्तपति न सोमोऽभिविराजते । न वायुर्वाति देवेशे तपश्चरति दुष्करम् ॥ ५९ ॥ वहाँ सूर्य नहीं तपते, चन्द्रमा नहीं प्रकाशित होते तथा दुष्कर तपस्यामें लगे हुए देवेश्वर श्रीहरिके समीप यह लौकिक वायु भी नहीं चलती है ॥ ५९ ॥

वेदीमष्टनलोत्सेधां भूमावास्थाय विश्वकृत् । एकपादस्थितो देव ऊर्ध्वबाहुरुदङ्मुखः ॥ ६० ॥ वहाँकी भूमिपर एक ऊँची वेदी बनी है, जिसकी ऊँचाई आठ अंगुलियोंकी लंबाईके बराबर है। उसपर आरूढ़ हो वे विश्वकर्ता परमात्मा दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये और उत्तरकी

ओर मुँह किये एक पैरसे खड़े हैं ।। साङ्गानावर्तयन् वेदांस्तपस्तेपे सुदुश्वरम् । यद् ब्रह्मा ऋषयश्चैव स्वयं पशुपतिश्च यत् ॥ ६१ ॥ शेषाश्च विबुधश्रेष्ठा दैत्यदानवराक्षसाः । नागाः सुपर्णा गन्धर्वाः सिद्धा राजर्षयश्च ये ॥ ६२ ॥ हव्यं कव्यं च सततं विधियुक्तं प्रयुञ्जते । कृत्स्नं तु तस्य देवस्य चरणावुपतिष्ठति ॥ ६३ ॥ वे अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंकी आवृत्ति करते हुए अत्यन्त कठोर तपस्यामें संलग्न हैं। ब्रह्मा, स्वयं महादेव, सम्पूर्ण ऋषि और शेष, श्रेष्ठ देवता तथा दैत्य, दानव, राक्षस, नाग, गरुड, गन्धर्व, सिद्ध एवं राजर्षिगण सदा विधिपूर्वक जो हव्य और कव्य अर्पण करते हैं, वह सब कुछ उन्हीं भगवान्‌के चरणोंमें उपस्थित होता है ।। ६१—६३ ।।

याः क्रियाः सम्प्रयुक्ताश्च एकान्तगतबुद्धिभिः । ताः सर्वाः शिरसा देवः प्रतिगृह्णाति वै स्वयम् ॥ ६४ ॥ जिनकी बुद्धि अनन्य भावसे एकमात्र भगवान्‌में ही लगी हुई है, उन भक्तोंद्वारा जो क्रियाएँ समर्पित की जाती हैं, उन सबको वे भगवान् स्वयं शिरोधार्य करते हैं ।। ६४ ।।

न तस्यान्यः प्रियतरः प्रतिबुद्धैर्महात्मभिः । विद्यते त्रिषु लोकेषु ततोऽस्यैकान्तिकं गतः ॥ ६५ ॥ वहाँके ज्ञानी-महात्मा भक्तोंसे बढ़कर भगवान्‌को तीनों लोकोंमें दूसरा कोई प्रिय नहीं है; अतः मैं अनन्य भावसे उन्हींकी शरणमें गया हूँ ।। ६५ ।।

इह चैवागतस्तेन विसृष्टः परमात्मना । एवं मे भगवान् देवः स्वयमाख्यातवान् हरिः । आसिष्ये तत्परो भूत्वा युवाभ्यां सह नित्यशः ॥ ६६ ॥ यहाँ भी मैं उन्हीं परमात्माके भेजनेसे आया हूँ। स्वयं भगवान् श्रीहरिने मुझसे ऐसा कहा था। अब मैं उन्हींकी आराधनामें तत्पर हो आप दोनोंके साथ यहाँ नित्य निवास करूँगा ।। ६६ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये त्रिचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४३ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४३ ।।

नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना

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चतुश्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

नर-नारायणका नारदजीकी प्रशंसा करते हुए उन्हें भगवान् वासुदेवका माहात्म्य बतलाना

नरनारायणावूचतुः

धन्योऽस्यनुगृहीतोऽसि यत् ते दृष्टः स्वयं प्रभुः।
न हि तं दृष्टवान् कश्चित् पद्मयोनिरपि स्वयम्॥ १॥
**नर-नारायणने कहा—**नारद! तुमने श्वेतद्वीपमें जाकर जो साक्षात् भगवान्‌का दर्शन कर लिया, इससे तुम धन्य हो गये। वास्तवमें भगवान्‌ने तुमपर बड़ा भारी अनुग्रह किया। तुम्हारे सिवा और किसीने, साक्षात् कमलयोनि ब्रह्माजीने भी भगवान्‌का इस प्रकार दर्शन नहीं किया॥ १॥

अव्यक्तयोनिर्भगवान् दुर्दर्शः पुरुषोत्तमः।
नारदैतद्धि नौ सत्यं वचनं समुदाहृतम्॥ २॥
नास्य भक्तात् प्रियतरो लोके कश्चन विद्यते।
ततः स्वयं दर्शितवान् स्वमात्मानं द्विजोत्तम॥ ३॥
नारद! वे भगवान् पुरुषोत्तम अव्यक्त प्रकृतिके मूल कारण हैं। उनका दर्शन मिलना अत्यन्त कठिन है। द्विजश्रेष्ठ! हम दोनों तुमसे सच कहते हैं कि भगवान्‌को इस जगत्‌में भक्तसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय नहीं है। इसलिये उन्होंने स्वयं ही तुम्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया है॥ २-३॥

तपो हि तप्यतस्तस्य यत् स्थानं परमात्मनः।
न तत् सम्प्राप्नुते कश्चिदृते ह्यावां द्विजोत्तम॥ ४॥
द्विजोत्तम! तपस्यामें लगे हुए उन परमात्माका जो स्थान है, वहाँ हम दोनोंके सिवा दूसरा कोई नहीं पहुँच सकता॥ ४॥

या हि सूर्यसहस्रस्य समस्तस्य भवेद् द्युतिः।
स्थानस्य सा भवेत् तस्य स्वयं तेन विराजता॥ ५॥
एक हजार सूर्योंके एकत्र होनेपर जितनी कान्ति हो सकती है, उतनी ही उस स्थानकी भी कान्ति है, जहाँ भगवान् विराज रहे हैं॥ ५॥

तस्मादुत्तिष्ठते विप्र देवाद् विश्वभुवः पतेः।
क्षमा क्षमावतां श्रेष्ठ यया भूमिस्तु युज्यते॥ ६॥
विप्रवर! क्षमाशीलोंमें श्रेष्ठ नारद! विश्वविधाता ब्रह्माजीके भी पति उन परमेश्वरसे ही क्षमाकी उत्पत्ति हुई है, जिससे पृथ्वीका संयोग होता है॥ ६॥

तस्माच्चोत्तिष्ठते देवात् सर्वभूतहिताद् रसः । आपो हि तेन युज्यन्ते द्रवत्वं प्राप्नुवन्ति च ॥ ७ ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंका हित चाहनेवाले उन नारायण-देवसे ही रस प्रकट हुआ है, जिसका जलके साथ संयोग है और जिसके कारण जल द्रवीभूत होता है ॥ ७ ॥

तस्मादेव समुद्भूतं तेजो रूपगुणात्मकम् । येन संयुज्यते सूर्यस्ततो लोके विराजते ॥ ८ ॥ उन्हींसे रूप-गुणविशिष्ट तेजका प्रादुर्भाव हुआ है, जिससे सूर्यदेव संयुक्त हुए हैं। इसीलिये वे लोकमें प्रकाशित हो रहे हैं ॥ ८ ॥

तस्माद् देवात् समुद्भूतः स्पर्शस्तु पुरुषोत्तमात् । येन स्म युज्यते वायुस्ततो लोकान् विवात्यसौ ॥ ९ ॥ उन्हीं भगवान् पुरुषोत्तमसे स्पर्शकी उत्पत्ति हुई है, जिससे वायुदेव संयुक्त होते हैं और उससे संयुक्त होनेके कारण ही वे सम्पूर्ण लोकोंमें प्रवाहित होते हैं ॥ ९ ॥

तस्माच्चोत्तिष्ठते शब्दः सर्वलोकेश्वरात् प्रभोः । आकाशं युज्यते येन ततस्तिष्ठत्यसंवृतम् ॥ १० ॥ उन्हीं सर्वलोकेश्वर प्रभुसे शब्दका प्रादुर्भाव होता है, जिससे आकाशका नित्य संयोग है और जिसके ही कारण वह निरावृत रहता है ॥ १० ॥

तस्माच्चोत्तिष्ठते देवात् सर्वभूतगतं मनः । चन्द्रमा येन संयुक्तः प्रकाशगुणधारणः ॥ ११ ॥ उन्हीं नारायणदेवसे सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर रहनेवाले मनकी भी उत्पत्ति हुई है। उस मनसे संयुक्त होकर ही चन्द्रमा प्रकाश-गुणको धारण करता है ॥ ११ ॥

सद्भूतोत्पादकं नाम तत् स्थानं वेदसंज्ञितम् । विद्यासहायो यत्रास्ते भगवान् हव्यकव्यभुक् ॥ १२ ॥ जहाँ भगवान् श्रीहरि हव्य और कव्यका भोग ग्रहण करते हुए विद्याशक्तिके साथ विराजमान हैं, वह वेदसंज्ञक स्थान सद्भूतोत्पादक कहलाता है ॥ १२ ॥

ये हि निष्कलुषा लोके पुण्यपापविवर्जिताः । तेषां वै क्षेममध्वानं गच्छतां द्विजसत्तम ॥ १३ ॥ सर्वलोकतमोहन्ता आदित्यो द्वारमुच्यते । द्विजश्रेष्ठ! संसारमें जो लोग पुण्य और पापसे रहित एवं निर्मल हैं, वे कल्याणमय मार्गसे भगवद्धामको प्राप्त होते हैं, उस समय सम्पूर्ण लोकोंके अन्धकारका नाश करनेवाले भगवान् सूर्य ही उनके उस मोक्षधामका द्वार बताये जाते हैं ॥ १३ १/२ ॥

आदित्यदग्धसर्वाङ्गा अदृश्याः केनचित् क्वचित् ॥ १४ ॥ परमाणुभूता भूत्वा तु तं देवं प्रविशन्त्युत ।

सूर्यदेव उनके सम्पूर्ण अंगोंको जलाकर भस्म कर देते हैं। फिर कहीं कोई उन्हें देख नहीं पाता। वे परमाणुस्वरूप होकर उन्हीं सूर्यदेवमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ १४ १/२ ॥
तस्मादपि च निर्मुक्ता अनिरुद्धतनौ स्थिताः ॥ १५ ॥
मनोभूतास्ततो भूत्वा प्रद्युम्नं प्रविशन्त्युत ।
फिर उनसे भी मुक्त होकर वे अनिरुद्धविग्रहमें स्थित होते हैं। फिर मनोमय होकर प्रद्युम्नमें प्रवेश करते हैं ॥ १५ १/२ ॥
प्रद्युम्नाच्चापि निर्मुक्ता जीवं संकर्षणं ततः ॥ १६ ॥
विशन्ति विप्रप्रवराः सांख्या भागवतैः सह ।
प्रद्युम्नसे भी युक्त होकर वे सांख्यज्ञानसम्पन्न श्रेष्ठ ब्राह्मण भगवद्भक्तोंके साथ जीवस्वरूप संकर्षणमें प्रविष्ट होते हैं ॥ १६ १/२ ॥
ततस्त्रैगुण्यहीनास्ते परमात्मानमञ्जसा ॥ १७ ॥
प्रविशन्ति द्विजश्रेष्ठाः क्षेत्रज्ञं निर्गुणात्मकम् ।
सर्वावासं वासुदेवं क्षेत्रज्ञं विद्धि तत्त्वतः ॥ १८ ॥
तदनन्तर तीनों गुणोंसे मुक्त हो वे श्रेष्ठ द्विज अनायास ही निर्गुणस्वरूप क्षेत्रज्ञ परमात्मामें प्रवेश कर जाते हैं। तुम सबके निवासस्थान भगवान् वासुदेवको ही क्षेत्रज्ञ समझो ॥ १७-१८ ॥
समाहितमनस्काश्च नियताः संयतेन्द्रियाः ।
एकान्तभावोपगता वासुदेवं विशन्ति ते ॥ १९ ॥
जिन्होंने अपने मनको एकाग्र कर लिया है, जो शौच संतोष आदि नियमोंसे सम्पन्न और जितेन्द्रिय हैं, वे अनन्य भावसे भगवान्‌की शरणमें गये हुए भक्त साक्षात् वासुदेवमें प्रवेश करते हैं ॥ १९ ॥
आवामपि च धर्मस्य गृहे जातौ द्विजोत्तम ।
रम्यां विशालामाश्रित्य तप उग्रं समास्थितौ ॥ २० ॥
द्विजश्रेष्ठ! हम दोनों भी धर्मके घरमें अवतीर्ण हो इस रमणीय बदरिकाश्रमतीर्थका आश्रय ले कठोर तपस्यामें संलग्न हैं ॥ २० ॥
ये तु तस्यैव देवस्य प्रादुर्भावाः सुरप्रियाः ।
भविष्यन्ति त्रिलोकस्थास्तेषां स्वतीत्यथो द्विज ॥ २१ ॥
ब्रह्मन्! उन्हीं भगवान् परमदेव परमात्माके तीनों लोकोंमें जो देवप्रिय अवतार होनेवाले हैं, उनका सदा ही परम मंगल हो—यही हमारी इस तपस्याका उद्देश्य है ॥ २१ ॥
विधिना स्वेन युक्ताभ्यां यथापूर्वे द्विजोत्तम ।
आस्थिताभ्यां सर्वकृच्छ्रं व्रतं सम्यगनुत्तमम् ॥ २२ ॥
आवाभ्यामपि दृष्टस्त्वं श्वेतद्वीपे तपोधन ।
समागतो भगवता संजल्पं कृतवांस्तथा ॥ २३ ॥

सर्वं हि नौ संविदितं त्रैलोक्ये सचराचरे ।
यद् भविष्यति वृत्तं वा वर्तते वा शुभाशुभम् ।
सर्वं स ते कथितवान् देवदेवो महामुने ॥ २४ ॥
द्विजोत्तम! हम दोनोंने पूर्ववत् अपने कर्ममें संलग्न हो सर्वोत्तम एवं सम्पूर्ण कठिनाइयोंसे युक्त उत्तम व्रतमें तत्पर रहते हुए ही श्वेतद्वीपमें उपस्थित होकर वहाँ तुम्हें देखा था। तपोधन! तुम वहाँ भगवान्‌से मिले और उनके साथ वार्तालाप किया। ये सारी बातें हम दोनोंको अच्छी तरह विदित हैं। महामुने! चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें जो शुभ या अशुभ बात हो चुकी है, हो रही है, अथवा होनेवाली है, वह सब उस समय देवदेव भगवान् श्रीहरिने तुमसे कही थी ॥ २२—२४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा तयोर्वाक्यं तपस्युग्रे च वर्ततोः ।
नारदः प्राञ्जलिर्भूत्वा नारायणपरायणः ॥ २५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कठोर तपस्यामें लगे हुए भगवान् नर और नारायणकी यह बात सुनकर नारदजीने उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और नारायणकी शरण लेकर उन्हींकी आराधनामें लग गये ॥ २५ ॥

जजाप विधिवन्मन्त्रान् नारायणगतान् बहून् ।
दिव्यं वर्षसहस्रं हि नरनारायणाश्रमे ॥ २६ ॥
उन्होंने नारायणसम्बन्धी बहुत-से मन्त्रोंका विधिपूर्वक जप किया और एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक वे नर-नारायणके आश्रममें टिके रहे ॥ २६ ॥

अवसत् स महातेजा नारदो भगवानृषिः ।
तमेवाभ्यर्चयन् देवं नरनारायणौ च तौ ॥ २७ ॥
महातेजस्वी भगवान् नारद मुनि प्रतिदिन उन्हीं भगवान् वासुदेवकी तथा उन दोनों नर और नारायणकी भी आराधना करते हुए वहाँ रहने लगे ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि नारायणीये
चतुश्चत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें नारायणकी महिमाविषयक तीन सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४४ ॥

३४५-

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पञ्चचत्वारिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः

भगवान् वराहके द्वारा पितरोंके पूजनकी मर्यादाका स्थापित होना

वैशम्पायन उवाच

कस्यचित् त्वथ कालस्य नारदः परमेष्ठिजः ।
दैवं कृत्वा यथान्यायं पित्र्यं चक्रे ततः परम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! किसी समय ब्रह्मपुत्र नारदजीने शास्त्रीय विधिके अनुसार पहले देवकार्य (हवन-पूजन) करके फिर पितृकार्य (श्राद्ध-तर्पण) किया ॥ १ ॥

ततस्तं वचनं प्राह ज्येष्ठो धर्मात्मजः प्रभुः ।
क इज्यते द्विजश्रेष्ठ दैवे पित्र्ये च कल्पिते ॥ २ ॥
त्वया मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे शंस यथागमम् ।
किमेतत् क्रियते कर्म फलं वास्य किमिष्यते ॥ ३ ॥

तब धर्मके ज्येष्ठ पुत्र नरने उनसे इस प्रकार पूछा—'द्विजश्रेष्ठ! तुम बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य हो। तुम्हारे द्वारा देवकार्य और पितृकार्यके सम्पादित होनेपर उन कर्मोंसे किसकी पूजा सम्पन्न होती है? यह मुझे शास्त्रके अनुसार बताओ। तुम यह कौन-सा कर्म करते हो? और इसके द्वारा किस फलको प्राप्त करना चाहते हो? ॥ २-३ ॥

नारद उवाच

त्वयैतत् कथितं पूर्वं दैवं कर्तव्यमित्यपि ।
दैवतं च परो यज्ञः परमात्मा सनातनः ॥ ४ ॥

नारदजीने कहा— प्रभो! आपने ही पहले यह कहा था कि देवकर्म सबके लिये कर्तव्य है; क्योंकि देवकर्म उत्तम यज्ञ है और यज्ञ सनातन परमात्माका स्वरूप है ॥ ४ ॥

ततस्तद्भावितो नित्यं यजे वैकुण्ठमव्ययम् ।
तस्माच्च प्रसूतः पूर्वं ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५ ॥

अतः आपके उस उपदेशसे प्रभावित होकर मैं प्रतिदिन अविनाशी भगवान् वैकुण्ठका यजन करता हूँ। उन्हींसे सर्वप्रथम लोकपितामह ब्रह्माजी प्रकट हुए हैं ॥

मम वै पितरं प्रीतः परमेष्ठ्यप्यजीजनत् ।
अहं संकल्पजस्तस्य पुत्रः प्रथमकल्पितः ॥ ६ ॥

परमेष्ठी ब्रह्माने प्रसन्न होकर मेरे पिता प्रजापतिको उत्पन्न किया³। मैं उनका संकल्पजनित प्रथम पुत्र हूँ ॥