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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

१६४-

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चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

नृशंस अर्थात् अत्यन्त नीच पुरुषके लक्षण

युधिष्ठिर उवाच

आनृशंस्यं विजानामि दर्शनेन सतां सदा ।
नृशंसान्न विजानामि तेषां कर्म च भारत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतनन्दन! सदा श्रेष्ठ पुरुषोंके सेवन और दर्शनसे मैं इस बातको तो जानता हूँ कि कोमलतापूर्ण बर्ताव कैसे किया जाता है? परंतु नृशंस मनुष्यों और उनके कर्मोंका मुझे विशेष ज्ञान नहीं है ॥ १ ॥

कण्टकान् कूपमग्निं च वर्जयन्ति यथा नराः ।
तथा नृशंसकर्माणं वर्जयन्ति नरा नरम् ॥ २ ॥
जैसे मनुष्य रास्तेमें मिले हुए काँटों, कुओं और आगको बचाकर चलते हैं, उसी प्रकार मनुष्य नृशंस कर्म करनेवाले पुरुषको भी दूरसे ही त्याग देते हैं ॥ २ ॥

नृशंसो दह्यते नित्यं प्रेत्य चेह च भारत ।
तस्मात् त्वं ब्रूहि कौरव्य तस्य धर्मविनिश्चयम् ॥ ३ ॥
भारत! कुरुनन्दन! नृशंस मनुष्य इसलोक और परलोकमें भी सदा ही शोककी आगसे जलता रहता है; अतः आप मुझे नृशंस मनुष्य और उसके धर्म-कर्मका यथार्थ परिचय दीजिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

स्पृहा स्याद् गर्हिता चैव विधित्सा चैव कर्मणाम् ।
आक्रोष्टा कृश्यते चैव वञ्चितो बुद्धयते स च ॥ ४ ॥

दत्तानुकीर्तिर्विषमः क्षुद्रो नैकृतिकः शठः ।
असंविभागी मानी च तथा सङ्गी विकत्थनः ॥ ५ ॥

सर्वातिशङ्की पुरुषो बलीशः कृपणोऽथवा ।
वर्गप्रशंसी सततमश्रमद्वेषसंकरी ॥ ६ ॥

हिंसाविहारः सततमविशेषगुणागुणः ।
बह्वलीकोऽमनस्वी च लुब्धोऽत्यर्थं नृशंसकृत् ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जिसके मनमें बड़ी घृणित इच्छाएँ रहती हैं, जो हिंसाप्रधान कुत्सित कर्मोंको आरम्भ करना चाहता है, स्वयं दूसरोंकी निन्दा करता है और दूसरे उसकी निन्दा करते हैं, जो अपनेको दैवसे वञ्चित समझता और पापमें प्रवृत्त होता है, दिये हुए दानका बारंबार बखान करता है, जिसके मनमें विषमता भरी रहती है, जो नीच कर्म

करनेवाला, दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला और शठ है, भोग्य वस्तुओंको दूसरोंको दिये बिना ही अकेले भोगता है, जिसके भीतर अभिमान भरा हुआ है, जो विषयोंमें आसक्त और अपनी प्रशंसाके लिये व्यर्थ ही बढ़-बढ़कर बातें बनानेवाला है, जिसके मनमें सबके प्रति संदेह बना रहता है, जो कौएकी तरह वंचक दृष्टि रखनेवाला है, जिसमें कृपणता कूट- कूटकर भरी है, जो अपने ही वर्गके लोगोंकी प्रशंसा करता, सदा आश्रमोंसे द्वेष रखता और वर्णसंकरता फैलाता है, सदा हिंसाके लिये ही जिसका घूमना-फिरना होता है, जो गुणको भी अवगुणके समान समझता और बहुत झूठ बोलता है, जिसके मनमें उदारता नहीं है और जो अत्यन्त लोभी है, ऐसा मनुष्य ही नृशंस कर्म करनेवाला कहा गया है ।। ४—७ ।।

धर्मशीलं गुणोपेतं पापमित्यवगच्छति । आत्मशीलप्रमाणे न विश्वसिति कस्यचित् ।। ८ ।। वह धर्मात्मा और गुणवान् पुरुषको ही पापी मानता है और अपने स्वभावको आदर्श मानकर किसीपर विश्वास नहीं करता है ।। ८ ।।

परेषां यत्र दोषः स्यात् तद् गुह्यं सम्प्रकाशयेत् । समानेष्वेव दोषेषु वृत्त्यर्थमुपघातयेत् ।। ९ ।। जहाँ दूसरोंकी बदनामी होती हो, वहाँ उनके गुप्त दोषोंको भी प्रकट कर देता है और अपने तथा दूसरेके अपराध बारबर होनेपर भी वह आजीविकाके लिये दूसरेका ही सर्वनाश करता है ।। ९ ।।

तथोपकारिणं चैव मन्यते वञ्चितं परम् । दत्त्वापि च धनं काले संतपत्युपकारिणे ।। १० ।। जो उसका उपकार करता है, उसको वह अपने जालमें फँसा हुआ समझता है और उपकारीको भी यदि कभी धन देता है तो उसके लिये बहुत समयतक पश्चात्ताप करता रहता है ।। १० ।।

भक्ष्यं पेयमथालेह्यं यच्चान्यत् साधु भोजनम् । प्रेक्षमाणेषु योऽश्रीयान्नृशंसमिति तं वदेत् ।। ११ ।। जो मनुष्य दूसरोंके देखते रहनेपर भी उत्तम भक्ष्य, पेय, लेह्य तथा दूसरे-दूसरे भोज्य पदार्थोंको अकेला ही खा जाता है, उसको भी नृशंस ही कहना चाहिये ।। ११ ।।

ब्राह्मणेभ्यः प्रदायाग्रं यः सुहृद्भिः सहाश्नुते । स प्रेत्य लभते स्वर्गमिह चानन्त्यमश्नुते ।। १२ ।। जो पहले ब्राह्मणको देकर पीछे अपने सुहृदोंके साथ स्वयं भोजन करता है, वह इस लोकमें अनन्त सुख भोगता है और मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ।। १२ ।।

एष ते भरतश्रेष्ठ नृशंसः परिकीर्तितः । सदा विवर्जनीयो हि पुरुषेण विजानता ।। १३ ।।

भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नके अनुसार यहाँ नृशंस मनुष्यका परिचय दिया गया है। विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह सदा उससे बचकर रहे ।। १३ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि नृशंसाख्याने चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १६४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें नृशंसका वर्णनविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १६४ ।।

नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन

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पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

नाना प्रकारके पापों और उनके प्रायश्चित्तोंका वर्णन

भीष्म उवाच

हृतार्थो यक्ष्यमाणश्च सर्ववेदान्तगश्च यः।
आचार्यपितृकार्यार्थं स्वाध्यायार्थमथापि च ॥ १ ॥
एते वै साधवो दृष्टा ब्राह्मणा धर्मभिक्षवः।
निःस्वेभ्यो देयमेतेभ्यो दानं विद्या च भारत ॥ २ ॥

**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! सम्पूर्ण वेदों और उपनिषदोंका पारंगत विद्वान् ब्राह्मण यदि यज्ञ करनेवाला हो तथा उसका धन चोर चुरा ले गये हों तो राजाका कर्तव्य है कि वह उसे आचार्यकी दक्षिणा देने, पितरोंका श्राद्ध करने तथा वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय करनेके लिये धन दे। भरतनन्दन! ये श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रायः धर्मके लिये धनकी भिक्षा माँगते देखे गये हैं। इन्हें दान और विद्याध्ययनके लिये धन देना चाहिये ॥ १-२ ॥

अन्यत्र दक्षिणादानं देयं भरतसत्तम।
अन्येभ्योऽपि बहिर्वेदि चाकृतान्नं विधीयते ॥ ३ ॥

भरतश्रेष्ठ! इससे भिन्न परिस्थितिमें ब्राह्मणको केवल दक्षिणा देनी चाहिये और ब्राह्मणेतर मनुष्योंको भी यज्ञवेदीसे बाहर कच्चा अन्न देनेका विधान है ॥ ३ ॥

सर्वरत्नानि राजा हि यथार्हं प्रतिपादयेत्।
ब्राह्मणा एव वेदाश्च यज्ञाश्च बहुदक्षिणाः।
अन्योन्यं विभवाचारा यजन्ते गुणतः सदा ॥ ४ ॥

राजाको चाहिये कि वह ब्राह्मणोंको उनकी योग्यताके अनुसार सब प्रकारके रत्नोंका दान करे; क्योंकि ब्राह्मण ही वेद एवं बहुसंख्यक दक्षिणावाले यज्ञरूप हैं। अपनी सम्पत्तिके अनुसार समस्त कार्योंका आयोजन करनेवाले वे ब्राह्मण सदा आपसमें मिलकर गुणयुक्त यज्ञका अनुष्ठान करते हैं ॥ ४ ॥

यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये।
अधिकं चापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति ॥ ५ ॥

जिस ब्राह्मणके पास अपने पालनीय कुटुम्बी-जनोंके भरण-पोषणके लिये तीन वर्षतक उपभोगमें आने लायक पर्याप्त धन हो अथवा उससे भी अधिक वैभव विद्यमान हो, वही सोमपानका अधिकारी है—उसे ही सोमयागका अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ५ ॥

यज्ञश्चेत् प्रतिरुद्धः स्यादंशेनैकेन यज्वनः।

ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ॥ ६ ॥
यो वैश्यः स्याद् बहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः ।
कुटुम्बात् तस्य तद् वित्तं यज्ञार्थं पार्थिवो हरेत् ॥ ७ ॥
यदि धर्मात्मा राजाके रहते हुए किसी यज्ञकर्ताका, विशेषतः ब्राह्मणका यज्ञ धनके बिना अधूरा रह जाय—उसके एक अंशकी पूर्ति शेष रह जाय तो राजाको चाहिये कि उसके राज्यमें जो बहुत पशुओं तथा वैभवसे सम्पन्न वैश्य हो, यदि वह यज्ञ तथा सोमयागसे रहित हो तो उसके कुटुम्बसे उस धनको यज्ञके लिये ले ले ॥ ६-७ ॥

आहरेदथ नो किञ्चित् कामं शूद्रस्य वेश्मनः ।
न हि यज्ञेषु शूद्रस्य किञ्चिदस्ति परिग्रहः ॥ ८ ॥
किंतु राजा अपनी इच्छाके अनुसार शूद्रके घरसे थोड़ा-सा भी धन न ले आवे; क्योंकि यज्ञोंमें शूद्रका किंचिन्मात्र भी अधिकार नहीं है ॥ ८ ॥

योऽनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः ।
तयोरपि कुटुम्बाभ्यामाहरेदविचारयन् ॥ ९ ॥
जिस वैश्यके पास एक सौ गौएँ हों और वह अग्निहोत्र न करता हो, तथा जिसके पास एक हजार गौएँ हों और वह यज्ञ न करता हो, उन दोनोंके कुटुम्बोंसे राजा बिना विचारे ही धन उठा लावे ॥ ९ ॥

अदातृभ्यो हरेद् वित्तं विख्याप्य नृपतिः सदा ।
तथैवाचरतो धर्मो नृपतेः स्यादथाखिलः ॥ १० ॥
जो धन रहते हुए उसका दान न करते हों, ऐसे लोगोंके इस दोषको विख्यात करके राजा सदा धर्मके लिये उनका धन ले ले, ऐसा आचरण करनेवाले राजाको सम्पूर्ण धर्मकी प्राप्ति होती है ॥ १० ॥

तथैव शृणु मे भक्तं भक्तानि षडनश्नतः ।
अश्वस्तनविधानेन हर्तव्यं हीनकर्मणः ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर! इसी प्रकार मैं अन्नके विषयमें जो बात बता रहा हूँ, उसे सुनो। यदि ब्राह्मण अन्नाभावके कारण लगातार छः समयतक उपवास कर जाय तो उस अवस्थामें वह किसी निकृष्ट कर्म करनेवाले मनुष्यके घरसे उतने धनका अपहरण कर सकता है, जिससे उसके एक दिनका भोजन चल जाय और दूसरे दिनके लिये कुछ बाकी न रहे ॥ ११ ॥

खलात् क्षेत्रात् तथा रामाद् यतो वाप्युपपद्यते ।
आख्यातव्यं नृपस्यैतत् पृच्छतेऽपृच्छतेऽपि वा ॥ १२ ॥
खलिहानसे, खेतसे, बगीचेसे अथवा जहाँसे भी अन्न मिल सके, वहींसे वह भोजनमात्रके लिये अन्न उठा लावे और उसके बाद राजा पूछे या न पूछे उसके पास जाकर अपनी वह बात उसे कह दे ॥ १२ ॥

न तस्मै धारयेद् दण्डं राजा धर्मेण धर्मवित् ।

क्षत्रियस्य तु बालिश्याद् ब्राह्मणः क्लिश्यते क्षुधा ॥ १३ ॥
उस दशामें धर्मज्ञ राजा धर्मके अनुसार उसे दण्ड न दे; क्योंकि क्षत्रिय राजाकी नादानीसे ही ब्राह्मणको भूखका कष्ट उठाना पड़ता है ॥ १३ ॥

श्रुतशीले समाज्ञाय वृत्तिमस्य प्रकल्पयेत् ।
अथैनं परिरक्षेत् पिता पुत्रमिवौरसम् ॥ १४ ॥
राजा उसके शास्त्रज्ञान और स्वभावका परिचय प्राप्त करके उसके लिये उचित आजीविकाकी व्यवस्था करे और जैसे पिता अपने औरस पुत्रकी रक्षा करता है, उसी प्रकार वह उस ब्राह्मणकी रक्षा करे ॥ १४ ॥

इष्टिं वैश्वानरीं नित्यं निर्वपेदब्दपर्यये ।
अनुकल्पः परो धर्मो धर्मवादैस्तु केवलम् ॥ १५ ॥
प्रतिवर्ष किये जानेवाले आग्रयण आदि यज्ञ यदि न किये जा सके हों तो उनके बदले प्रतिदिन वैश्वानरी इष्टि समर्पित करे। मुख्य कर्मके स्थानमें जो गौण कार्य किया जाता है, उसका नाम अनुकल्प है, धर्मज्ञ पुरुषोंद्वारा बताया गया अनुकल्प भी परम धर्म ही है ॥ १५ ॥

विश्वेदेवैश्च साध्यैश्च ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः ।
आपत्सु मरणाद् भीतैर्विधिः प्रतिनिधीकृतः ॥ १६ ॥
क्योंकि विश्वेदेव, साध्य, ब्राह्मण और महर्षि—इन सब लोगोंने मृत्युसे डरकर आपत्कालके विषयमें प्रत्येक विधिक प्रतिनिधि नियत कर दिया है ॥ १६ ॥

प्रभुः प्रथमकल्पस्य योऽनुकल्पे न वर्तते ।
न साम्परायिकं तस्य दुर्मतेर्विद्यते फलम् ॥ १७ ॥
जो मुख्य विधिके अनुसार कर्म करनेमें समर्थ होकर भी गौण विधिसे काम चलाता है, उस दुर्बुद्धि मनुष्यको पारलौकिक फलकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १७ ॥

न ब्राह्मणो निवेदेत किंचिद् राजनि वेदवित् ।
स्ववीर्याद् राजवीर्याच्च स्ववीर्यं बलवत्तरम् ॥ १८ ॥
वेदज्ञ ब्राह्मणको चाहिये कि वह राजाके निकट अपनी आवश्यकता निवेदन न करे; क्योंकि ब्राह्मणकी अपनी शक्ति तथा राजाकी शक्तिमेंसे उसकी अपनी ही शक्ति प्रबल है ॥ १८ ॥

तस्माद् राज्ञः सदा तेजो दुःसहं ब्रह्मवादिनाम् ।
कर्ता शास्ता विधाता च ब्राह्मणो देव उच्यते ॥ १९ ॥
अतः ब्रह्मवादियोंका तेज राजाके लिये सदा दुःसह है। ब्राह्मण इस जगत्का कर्ता, शासक, धारण-पोषण करनेवाला और देवता कहलाता है ॥ १९ ॥

तस्मिन्नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कामीरयेद् गिरम् ।
क्षत्रियो बाहुवीर्येण तरेदापदमात्मनः ॥ २० ॥

धनैर्वैश्यश्च शूद्रश्च मन्त्रैर्होमैश्च वै द्विजः । अतः उसके प्रति अमङ्गलसूचक बात न कहे। रूखे वचन न बोले। क्षत्रिय अपने बाहुबलसे, वैश्य और शूद्र धनके बलसे तथा ब्राह्मण मन्त्र एवं हवनकी शक्तिसे अपनी विपत्तिसे पार हो सकता है ॥ २० १/२ ॥ नैव कन्या न युवतिर्नामन्त्रज्ञो न बालिशः ॥ २१ ॥ परिवेष्टाग्निहोत्रस्य भवेन्नासंस्कृतस्तथा । न कन्या, न युवती, न मन्त्र न जाननेवाला, न मूर्ख और न संस्कारहीन पुरुष ही अग्निमें हवन करनेका अधिकारी है ॥ २१ १/२ ॥ नरकं निपतन्त्येते जुह्वानाः स च यस्य तत् । तस्माद् वैतानकुशलो होता स्याद् वेदपारगः ॥ २२ ॥ यदि ये हवन करते हैं तो स्वयं तो नरकमें पड़ते ही हैं, जिसका वह यज्ञ है, वह भी नरकमें गिरता है। अतः जो यज्ञकर्ममें कुशल और वेदोंका पारङ्गत विद्वान् हो, वही होता हो सकता है ॥ २२ ॥ प्राजापत्यमदत्त्वाश्वमग्न्याधेयस्य दक्षिणाम् । अनाहिताग्निरिति स प्रोच्यते धर्मदर्शिभिः ॥ २३ ॥ जो अग्निहोत्र आरम्भ करके प्रजापति देवताके लिये अश्वरूप दक्षिणाका दान नहीं करता, धर्मदर्शी पुरुष उसे अनाहिताग्नि कहते* हैं ॥ २३ ॥ पुण्यानि यानि कुर्वीत श्रद्दधानो जितेन्द्रियः । अनाप्तदक्षिणैर्यज्ञैर्न यजेत कथञ्चन ॥ २४ ॥ मनुष्य जो भी पुण्यकर्म करे उसे श्रद्धापूर्वक और जितेन्द्रिय भावसे करे। पर्याप्त दक्षिणा दिये बिना किसी तरह यज्ञ न करे ॥ २४ ॥ प्रजाः पशूंश्च स्वर्गं च हन्ति यज्ञो ह्यदक्षिणः । इन्द्रियाणि यशः कीर्तिमायुश्चाप्यवकृन्तति ॥ २५ ॥ बिना दक्षिणाका यज्ञ प्रजा और पशुका नाश करता है; और स्वर्गकी प्राप्तिमें भी विघ्न डाल देता है। इतना ही नहीं वह इन्द्रिय, यश, कीर्ति तथा आयुको भी क्षीण करता है ॥ २५ ॥ उदक्यामासते ये च द्विजाः केचिदनग्नयः । होमं चाश्रोत्रियं येषां ते सर्वे पापकर्मिणः ॥ २६ ॥ जो ब्राह्मण रजस्वला स्त्रीके साथ समागम करते हैं, जिन्होंने घरमें अग्निकी स्थापना नहीं की है; तथा जो अवैदिक रीतिसे हवन करते हैं, वे सभी पापाचारी हैं ॥ २६ ॥ उदपानोदके ग्रामे ब्राह्मणो वृषलीपतिः । उषित्वा द्वादश समाः शूद्रकर्मैव गच्छति ॥ २७ ॥

जिस गाँवमें एक ही कुएँका पानी सब लोग पीते हैं, वहाँ बारह वर्षोंतक निवास करनेसे तथा शूद्रजातिकी स्त्रीके साथ विवाह कर लेनेसे ब्राह्मण भी शूद्र हो जाता है ॥ २७ ॥ अभार्यां शयने बिभ्रच्छूद्रं वृद्धं च वै द्विजः । अब्राह्मणं मन्यमानस्तृणेष्वासीत पृष्ठतः । तथा संशुध्यते राजन् शृणु चात्र वचो मम ॥ २८ ॥ यदि ब्राह्मण अपनी पत्नीके सिवा दूसरी स्त्रीको शय्यापर बिठा ले अथवा बड़े-बूढ़े शूद्रको या ब्राह्मणेतर—क्षत्रिय या वैश्यको सम्मान देता हुआ ऊँचे आसनपर बैठाकर स्वयं चटाईपर बैठे तो वह ब्राह्मणत्वसे गिर जाता है। राजन्! उसकी शुद्धि जिस प्रकार होती है, वह मुझसे सुनो ॥ २८ ॥ यदेकरात्रेण करोति पापं निकृष्टवर्णं ब्राह्मणः सेवमानः । स्थानासनाभ्यां विहरन् व्रती स त्रिभिर्वर्षैः शमयेदात्मपापम् ॥ २९ ॥ यदि ब्राह्मण एक रात भी किसी नीच वर्णके मनुष्यकी सेवा करे अथवा उसके साथ एक जगह रहे या एक आसनपर बैठे तो इससे जो पाप लगता है, उसको वह तीन वर्षों तक व्रतका पालन करते हुए पृथ्वीपर विचरनेसे दूर कर सकता है ॥ २९ ॥ न नर्मयुक्तमनृतं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन् न विवाहकाले । न गुर्वर्थं नात्मनो जीवितार्थे पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ ३० ॥ राजन्! परिहासमें, स्त्रीके पास, विवाहके अवसर-पर, गुरुके हितके लिये अथवा अपने प्राण बचानेके उद्देश्यसे बोला गया असत्य हानिकारक नहीं होता। इन पाँच अवसरोंपर असत्य बोलना पाप नहीं बताया गया है ॥ ३० ॥ श्रद्दधानः शुभां विद्यां हीनादपि समाप्नुयात् । सुवर्णमपि चामेध्यादाददीताविचारयन् ॥ ३१ ॥ नीच वर्णके पुरुषके पास भी उत्तम विद्या हो तो उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण करनी चाहिये और सोना अपवित्र स्थानमें भी पड़ा हो तो उसे बिना हिच-किचाहटके उठा लेना चाहिये ॥ ३१ ॥ स्त्रीरत्नं दुष्कुलाच्चापि विषादप्यमृतं पिबेत् । अदूष्या हि स्त्रियो रत्नमाप इत्येव धर्मतः ॥ ३२ ॥ नीच कुलसे भी उत्तम स्त्रीको ग्रहण कर ले, विषके स्थानसे भी अमृत मिले तो उसे पी ले; क्योंकि स्त्रियाँ, रत्न और जल—ये धर्मतः दूषणीय नहीं होते हैं ॥ ३२ ॥ गोब्राह्मणहितार्थं च वर्णानां संकरेषु च ।

वैश्यो गृह्णीत शस्त्राणि परित्राणार्थमात्मनः ॥ ३३ ॥
गौ और ब्राह्मणोंका हित, वर्णसंकरताका निवारण तथा अपनी रक्षा करनेके लिये वैश्य भी हथियार उठा सकता है ॥ ३३ ॥

सुरापानं ब्रह्महत्या गुरुतल्पमथापि वा ।
अनिर्देश्यानि मन्यन्ते प्राणान्तमिति धारणा ॥ ३४ ॥
मदिरापान, ब्रह्महत्या तथा गुरुपत्नीगमन—इन महापापोंसे छूटनेके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं बताया गया है। किसी भी उपायसे अपने प्राणोंका अन्त कर देना ही उन पापोंका प्रायश्चित्त होगा, ऐसी विद्वानोंकी धारणा है ॥ ३४ ॥

सुवर्णहरणं स्तैन्यं विप्रस्वं चेति पातकम् ।
विहरन् मद्यपानाच्च अगम्यागमनादपि ॥ ३५ ॥
पतितैः सम्प्रयोगाच्च ब्राह्मणीयोनितस्तथा ।
अचिरेण महाराज पतितो वै भवत्युत ॥ ३६ ॥
सुवर्णकी चोरी, अन्य वस्तुओंकी चोरी तथा ब्राह्मणका धन छीन लेना—यह महान् पाप है। महाराज! मदिरापान और अगम्या स्त्रीके साथ गमन करनेसे, पतितोंके साथ सम्पर्क रखनेसे तथा ब्राह्मणेतर होकर ब्राह्मणीके साथ समागम करनेसे स्वेच्छाचारी पुरुष शीघ्र ही पतित हो जाता है ॥ ३५-३६ ॥

संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् ।
याजनाध्यापनाद् यौनान्न तु यानासनाशनात् ॥ ३७ ॥
पतितके साथ रहनेसे, उसका यज्ञ करानेसे और उसे पढ़ानेसे मनुष्य एक वर्षमें पतित हो जाता है; परंतु उसकी संतानके साथ अपनी संतानका विवाह करनेसे, एक सवारी या एक आसन पर बैठनेसे तथा उसके साथमें भोजन करनेसे वह एक वर्षमें नहीं, किंतु तत्काल पतित हो जाता है ॥ ३७ ॥

एतानि हित्वातोऽन्यानि निर्देश्यानीति भारत ।
निर्देश्यानेन विधिना कालेनाव्यसनी भवेत् ॥ ३८ ॥
भरतनन्दन! उपर्युक्त पाप अनिर्देश्य (प्रायश्चित्त-रहित) कहे गये हैं। इन्हें छोड़कर और जितने पाप हैं, वे निर्देश्य हैं—शास्त्रमें उनका प्रायश्चित्त बताया गया है। उसके अनुसार प्रायश्चित्त करके पापका व्यसन छोड़ देना चाहिये ॥ ३८ ॥

अन्नं वीर्यं ग्रहीतव्यं प्रेतकर्मण्यपातिते ।
त्रिषु त्वेतेषु पूर्वेषु न कुर्वीत विचारणाम् ॥ ३९ ॥
पूर्वोक्त (शराबी, ब्रह्महत्यारा और गुरुपत्नीगामी) तीन पापियोंके मरनेपर उनकी दाहादिक क्रिया किये बिना ही कुटुम्बीजनोंको उनके अन्न और धनपर अधिकार कर लेना चाहिये। इसमें कुछ अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३९ ॥

अमात्यान् वा गुरून् वापि जह्याद् धर्मेण धार्मिकः ।

प्रायश्चित्तमकुर्वाणैर्नैतैरर्हति संविदम् ॥ ४० ॥
धार्मिक राजा अपने मन्त्री और गुरुजनोंको भी पतित हो जानेपर धर्मानुसार त्याग दे और जबतक ये अपने पापोंका प्रायश्चित्त न कर लें, तबतक इनके साथ बातचीत न करे ॥ ४० ॥

अधर्मकारी धर्मेण तपसा हन्ति किल्बिषम् ।
ब्रुवन् स्तेन इति स्तेनं तावत् प्राप्नोति किल्बिषम् ॥ ४१ ॥
पापाचारी मनुष्य यदि धर्माचरण और तपस्या करे तो अपने पापको नष्ट कर देता है। चोरको ‘यह चोर है’ ऐसा कह देनेमात्रसे चोरके बराबर पापका भागी होना पड़ता है ॥ ४१ ॥

अस्तेनं स्तेन इत्युक्त्वा द्विगुणं पापमाप्नुयात् ।
त्रिभागं ब्रह्महत्यायाः कन्या प्राप्नोति दुष्यती ॥ ४२ ॥
जो चोर नहीं है, उसको चोर कह देनेसे मनुष्यको चोरसे दूना पाप लगता है। कुमारी कन्या यदि अपनी इच्छासे चरित्रभ्रष्ट हो जाय तो उसे ब्रह्महत्याका तीन चौथाई पाप भोगना पड़ता है ॥ ४२ ॥

यस्तु दूषयिता तस्याः शेषं प्राप्नोति पाप्मनः ।
ब्राह्मणानवगर्हेह स्पृष्ट्वा गुरुतरं भवेत् ॥ ४३ ॥
और जो उसे कलंकित करनेवाला पुरुष है, वह शेष एक चौथाई पापका भागी होता है। इस जगत्में ब्राह्मणोंको गाली देकर या उन्हें तिरस्कारपूर्वक धक्के देकर हटानेसे मनुष्यको बड़ा भारी पाप लगता है ॥ ४३ ॥

वर्षाणां हि शतं तावत् प्रतिष्ठां नाधिगच्छति ।
सहस्रं चैव वर्षाणां निपत्य नरकं वसेत् ॥ ४४ ॥
सौ वर्षोंतक तो उसे प्रेतकी भाँति भटकना पड़ता है, कहीं भी ठहरनेके लिये ठौर नहीं मिलता। फिर एक हजार वर्षोंतक उसे नरकमें गिरकर रहना पड़ता है ॥ ४४ ॥

तस्मान्नैवावगर्हेत नैव जातु निपातयेत् ।
शोणितं यावतः पांसून् संगृह्णीयाद् द्विजक्षतात् ॥ ४५ ॥
तावतीः स समा राजन् नरके प्रतिपद्यते ।
अतः न ब्राह्मणको गाली दे और न उसे कभी धरती पर गिरावे। राजन्! ब्राह्मणके शरीरमें घाव हो जानेपर उससे निकला हुआ रक्त धूलके जितने कणोंको भिगोता है, उसे चोट पहुँचानेवाला मनुष्य उतने ही वर्षोंतक नरकमें पड़ा रहता है ॥ ४५½ ॥

भ्रूणहाऽऽहवमध्ये तु शुद्ध्यते शस्त्रपातात्ः ॥ ४६ ॥
आत्मानं जुहुयादग्नौ समिद्धे तेन शुद्ध्यते ।

गर्भके बच्चेकी हत्या करनेवाला यदि युद्धमें शस्त्रोंके आघातसे मर जाय तो उसकी शुद्धि हो जाती है अथवा प्रज्वलित अग्निमें कूदकर अपने आपको होम दे तो वह शुद्ध हो जाता है ॥ ४६ १/२ ॥

सुरापो वारुणीमुष्णां पीत्वा पापाद् विमुच्यते ॥ ४७ ॥ तया स काये निर्दग्धे मृत्युं वा प्राप्य शुद्ध्यति । लोकांश्च लभते विप्रो नान्यथा लभते हि सः ॥ ४८ ॥ मदिरा पीनेवाला पुरुष यदि मदिराको खूब गरम करके पी ले तो पापसे छुटकारा पा जाता है, अथवा उससे शरीर जल जानेके कारण उसकी मृत्यु हो जाय तो वह शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध हो जानेपर ही वह ब्राह्मण शुद्ध लोकोंको प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं ॥ ४७-४८ ॥

गुरुतल्पमधिष्ठाय दुरात्मा पापचेतनः । स्त्र्याकारां प्रतिमां लिंग्य मृत्युना सोऽभिशुद्ध्यति ॥ ४९ ॥ पापपूर्ण विचार रखनेवाला दुरात्मा पुरुष यदि गुरुपत्नी-गमनका पाप कर बैठे तो वह लोहेकी गरम की हुई नारी-प्रतिमाका आलिङ्गन करके प्राण दे देनेपर ही उस पापसे शुद्ध होता है ॥ ४९ ॥

अथवा शिश्नवृषणावादायाञ्जलिना स्वयम् ॥ ५० ॥ नैर्ऋतीं दिशमास्थाय निपतेत् स त्वजिह्मगः । ब्राह्मणार्थेऽपि वा प्राणान् संत्यजेत् तेन शुद्ध्यति ॥ ५१ ॥ अथवा अपने शिश्न और अण्डकोषको स्वयं ही काटकर अञ्जलिमें लेकर सीधे नैर्ऋत्य-दिशाकी ओर जाता हुआ गिर पड़े या ब्राह्मणके लिये प्राणोंका परित्याग कर दे तो शुद्ध हो जाता है ॥ ५०-५१ ॥

अश्वमेधेन वापीष्ट्वा अथवा गोसवेन वा । अग्निष्टोमेन वा सम्यगिह प्रेत्य च पूज्यते ॥ ५२ ॥ अथवा अश्वमेधयज्ञ, गोसव नामक यज्ञ या अग्निष्टोम यज्ञके द्वारा भलीभाँति यजन करके वह इहलोक तथा परलोकमें पूजित होता है ॥ ५२ ॥

तथैव द्वादशसमाः कपाली ब्रह्महा भवेत् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं स्वकर्म ख्यापयन् मुनिः ॥ ५३ ॥ एवं वा तपसा युक्तो ब्रह्महा सवनी भवेत् । ब्रह्महत्या करनेवाला मनुष्य उस मरे हुए ब्राह्मणकी खोपड़ी लेकर अपना पापकर्म लोगोंको सुनाता रहे और बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सबेरे, शाम तथा दोपहर तीनों समय स्नान करे। इस प्रकार वह तपस्यामें संलग्न रहे। इससे उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ५३ १/२ ॥

एवं तु समभिज्ञातामात्रेयीं वा निपातयेत् ॥ ५४ ॥

द्विगुणा ब्रह्महत्या वै आत्रेयीनिधने भवेत् ।

इसी तरह जो जान-बूझकर गर्भिणी स्त्रीकी हत्या करता है; उसे उस गर्भिणी-वधके

कारण दो ब्रह्महत्याओंका पाप लगता है ।। ५४ १/२ ।।

सुरापो नियताहारो ब्रह्मचारी क्षितीशयः ।। ५५ ।।

ऊर्ध्वं त्रिभ्योऽपि वर्षेभ्यो यजेताग्निष्टुता परम् ।

ऋषभैकसहस्रं वा गा दत्त्वा शौचमाप्नुयात् ।। ५६ ।।

मदिरा पीनेवाला मनुष्य मिताहारी और ब्रह्मचारी होकर पृथ्वीपर शयन करे। इस तरह

तीन वर्षोंतक रहनेके बाद 'अग्निष्टोम' यज्ञ करे। तत्पश्चात् एक हजार बैल या इतनी ही गौएँ

ब्राह्मणोंको दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है ।। ५५-५६ ।।

वैश्यं हत्वा तु वर्षे द्वे ऋषभैकशतं च गाः ।

शूद्रं हत्वाब्दमेवैकमृषभं च शतं च गाः ।। ५७ ।।

यदि वैश्यकी हत्या कर दे तो दो वर्षोंतक पूर्वोक्त नियमसे रहनेके बाद एक सौ बैल

और एक सौ गौओंका दान करे, तथा शूद्रकी हत्या कर देनेपर हत्यारेको एक वर्षतक

पूर्वोक्त नियमसे रहकर एक बैल और सौ गौओंका दान करना चाहिये ।। ५७ ।।

श्ववराहखरान् हत्वा शौद्रमेव व्रतं चरेत् ।

मार्जारचाषमण्डूकान् काकं व्यालं च मूषिकम् ।। ५८ ।।

उक्तः पशुसमो दोषो राजन् प्राणिनिपातनात् ।

कुत्ते, सूअर और गदहोंकी हत्या करके मनुष्य शूद्रवध-सम्बन्धी व्रतका ही आचरण करे।

राजन्! बिल्ली, नीलकण्ठ, मेढक, कौआ, साँप और चूहा आदि प्राणियोंको मारनेसे भी

उक्त पशुवधके ही समान पाप बताया गया है ।। ५८ १/२ ।।

प्रायश्चित्तान्यथान्यानि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।। ५९ ।।

अल्पे वाप्यथ शोचेत पृथक् संवत्सरं चरेत् ।

त्रीणि श्रोत्रियभार्यायां परदारे च द्वे स्मृते ।। ६० ।।

काले चतुर्थे भुञ्जानो ब्रह्मचारी व्रती भवेत् ।

स्थानासनाभ्यां विहरेत् त्रिरह्नाभ्युपयन्नपः ।

एवमेव निराकर्ता यश्चाग्नीनपविध्यति ।। ६१ ।।

अब दूसरे प्रायश्चित्तोंका भी क्रमशः वर्णन करता हूँ। अनजानमें कीड़ों-मकोड़ोंका वध

आदि छोटा पाप हो जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करे। इतनेहीसे उसकी शुद्धि हो जाती

है। गोवधके सिवा अन्य जितने उपपातक हैं उनमेंसे प्रत्येकके लिये एक-एक वर्षतक

व्रतका आचरण करे। श्रोत्रियकी पत्नीसे व्यभिचार करनेपर तीन वर्षतक और अन्य

परस्त्रियोंसे समागम करनेपर दो वर्षोंतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए दिनके चौथे

पहरमें एक बार भोजन करे। अपने लिये पृथक् स्थान और आसनकी व्यवस्था रखते हुए

घूमता रहे। दिनमें तीन बार जलसे स्नान करे। ऐसा करनेसे ही वह अपने उपर्युक्त पापोंका

निवारण कर सकता है। जो अग्निको भ्रष्ट करता है, उसके लिये भी यही प्रायश्चित्त है ॥ ५९—६१ ॥

त्यजत्यकारणे यश्च पितरं मातरं गुरुम् ।
पतितः स्यात्स कौरव्य यथा धर्मेषु निश्चयः ॥ ६२ ॥
ग्रासाच्छादनमात्रं तु दद्यादिति निदर्शनम् ।
(ब्रह्मचारी द्विजेभ्यश्च दत्त्वा पापात् प्रमुच्यते ।)
कुरुनन्दन! जो अकारण ही पिता, माता और गुरुका परित्याग करता है, वह पतित हो जाता है। उसे केवल अन्न और वस्त्र दे और पैतृकसम्पत्तिसे वंचित कर दे। वह ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करते हुए ब्राह्मणोंको दान दे (और पिता-माता आदिका पूर्ववत् आदर करने लगे) तो उस पापसे मुक्त हो जाता है, यही धर्मशास्त्रोंका निर्णय है ॥ ६२½ ॥

भार्यायां व्यभिचारिण्यां निरुद्धायां विशेषतः ।
यत् पुंसः परदारेषु तदेनां चारयेद् व्रतम् ॥ ६३ ॥
यदि पत्नीने व्यभिचार किया हो और विशेषतः इस कार्यमें पकड़ ली गयी हो तो परायी स्त्रीसे व्यभिचार करनेवाले पुरुषके लिये जो प्रायश्चित्तरूप व्रत बताया गया है, वही उससे भी करावे ॥ ६३ ॥

श्रेयांसं शयनं हित्वा याऽन्यं पापं निगच्छति ।
श्वभिस्तामर्दयेद् राजा संस्थाने बहुविस्तरे ॥ ६४ ॥
जो अपने श्रेष्ठ पतिको छोड़कर अन्य पापीकी शय्यापर जाती है, उस कुलटाको अत्यन्त विस्तृत मैदानमें खड़ी करके राजा कुत्तोंसे नोचवा डाले ॥ ६४ ॥

पुमांसमुन्नयेत् प्राज्ञः शयने तप्त आयसे ।
अप्यादधीत दारूणि तत्र दह्येत पापकृत् ॥ ६५ ॥
एष दण्डो महाराज स्त्रीणां भर्तृष्वतिक्रमात् ।
संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो भवेत् ॥ ६६ ॥
द्वे तस्य त्रीणि वर्षाणि चत्वारि सहसेविनि ।
कुचरः पञ्चवर्षाणि चरेद् भैक्ष्यं मुनिव्रतः ॥ ६७ ॥
इसी तरह व्यभिचारी पुरुषको बुद्धिमान् राजा लोहेकी तपायी हुई खाटपर सुलाकर ऊपरसे लकड़ी रख दे और आग लगा दे, जिससे वह पापी उसीमें जलकर भस्म हो जाय। महाराज! पतिकी अवहेलना करके परपुरुषोंसे व्यभिचार करनेवाली स्त्रियोंके लिये भी यही दण्ड है, उपर्युक्त कहे हुएमें जिन दुष्टोंके लिये प्रायश्चित्त बताया है, उनके लिये यह भी विधान है कि एक वर्षके भीतर प्रायश्चित्त न करनेपर दुष्ट पुरुषको दूना दण्ड प्राप्त होना चाहिये। जो मनुष्य दो, तीन, चार या पाँच वर्षोंतक उस पतित पुरुषके संसर्गमें रहे, वह मुनिजनोचित व्रत धारण करके उतने ही वर्षोंतक पृथ्वीपर घूमता हुआ भिक्षावृत्तिसे जीवन-निर्वाह करे ॥ ६५—६७ ॥

परिवित्तिः परिवेत्ता या चैव परिविद्यते ।

पाणिग्राहास्त्वधर्मेण सर्वे ते पतिताः स्मृताः ।। ६८ ।।

ज्येष्ठ भाईका विवाह होनेसे पहले ही यदि छोटा भाई अधर्मपूर्वक विवाह कर ले तो

ज्येष्ठको 'परिवित्ति' कहते हैं; छोटे भाईको 'परिवेत्ता' हैं और उसकी पत्नीको जिसका

परिवेदन (ग्रहण) किया जाता है, परिवेदनीया कहते हैं-ये सब-के-सब पतित माने गये

हैं ।। ६८ ।।

चरेयुः सर्व एवैते वीरहा यद् व्रतं चरेत् ।

चान्द्रायणं चरेन्मासं कृच्छ्रं वा पापशुद्धये ।। ६९ ।।

इन तीनोंको पृथक्-पृथक् अपनी शुद्धिके लिये उसी व्रतका आचरण करना चाहिये जो

यज्ञहीन ब्राह्मणके लिये बताया गया है। अथवा एक मासतक चान्द्रायण या कृच्छ्रचान्द्रायण

व्रत करे ।। ६९ ।।

परिवेत्ता प्रयच्छेत तां स्नुषां परिवित्तये ।

ज्येष्ठेन त्वभ्यनुज्ञातो यवीयानप्यनन्तरम् ।

एवं च मोक्षमाप्नोति तौ च सा चैव धर्मतः ।। ७० ।।

परिवेत्ता पुरुष उस नववधूको पतोहूके रूपमें ज्येष्ठ भाईको सौंप दे और ज्येष्ठ भाईकी

आज्ञा मिलनेपर छोटा भाई उसे पत्नीरूपमें ग्रहण करे। ऐसा करनेपर वे तीनों धर्मके

अनुसार पापसे छुटकारा पाते हैं ।। ७० ।।

अमानुषीषु गोवर्ज्यमनावृष्टिर्न दुष्यति ।

अधिष्ठात्रवमन्तारं पशूनां पुरुषं विदुः ।। ७१ ।।

पशु जातियोंमें गौओंको छोड़कर अन्य किसीकी अनजानमें हिंसा हो जाय तो वह

दोषावह नहीं मानी जाती; क्योंकि मनुष्यको पशुओंका अधिष्ठाता एवं पालक माना गया

है ।। ७१ ।।

परिधायोर्ध्ववालं तु पात्रमादाय मृन्मयम् ।

चरेत् सप्तगृहान्नित्यं स्वकर्म परिकीर्तयन् ।। ७२ ।।

तत्रैव लब्धभोजी स्याद् द्वादशाहात्स शुद्धयति ।

चरेत् संवत्सरं चापि तद् व्रतं येन कृन्तति ।। ७३ ।।

गोवध करनेवाला पापी उस गायकी पूँछको इस प्रकार धारण करे कि उसका बाल

ऊपरकी ओर रहे। फिर मिट्टीका पात्र हाथमें लेकर प्रतिदिन सात घरोंमें भिक्षा माँगे और

अपने पापकर्मकी बात कहकर लोगोंको सुनाता रहे। उन्हीं सात घरोंकी भिक्षामें जो अन्न

मिल जाय, वही खाकर रहे। ऐसा करनेसे वह बारह दिनोंमें शुद्ध हो जाता है। यदि पाप

अधिक हो तो एक वर्षतक उस व्रतका अनुष्ठान करे, जिससे वह अपने पापको नष्ट कर

देता है ।। ७२-७३ ।।

भवेत्तु मानुषेष्वेवं प्रायश्चित्तमनुत्तमम् ।

दानं वा दानशक्तेषु सर्वमेतत् प्रकल्पयेत् ॥ ७४ ॥
इस प्रकार मनुष्योंके लिये परम उत्तम प्रायश्चित्तका विधान है। उनमें जो दान करनेमें समर्थ हों, उनके लिये दानकी भी विधि है। यह सब प्रायश्चित्त विचारपूर्वक करना चाहिये ॥ ७४ ॥

अनास्तिकेषु गोमात्रं दानमेकं प्रचक्षते ।
श्ववराहमनुष्याणां कुक्कुटस्य खरस्य च ॥ ७५ ॥
मांसं मूत्रं पुरीषं च प्राश्य संस्कारमर्हति ।
अनास्तिक पुरुषोंके लिये एक गोदानमात्र ही प्रायश्चित्त बतलाया गया है। कुत्ते, सूअर, मनुष्य, मुर्गे और गदहेके मांस और मल-मूत्र खा लेनेपर द्विजका पुनः संस्कार होना चाहिये ॥ ७५ १/२ ॥

ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमादाय सोमपः ॥ ७६ ॥
अपस्त्र्यहं पिबेदुष्णं त्र्यहमुष्णं पयः पिबेत् ।
त्र्यहमुष्णं पयः पीत्वा वायुभक्षो भवेत् त्र्यहम् ॥ ७७ ॥
सोमपान करनेवाला ब्राह्मण यदि किसी शराबीकी गन्ध भी सूँघ ले तो वह तीन दिनोंतक गरम जल पीकर रहे, फिर तीन दिन गरम दूध पीये। तीन दिन गरम दूध पीनेके बाद तीन दिनतक केवल वायु पीकर रहे। इससे वह शुद्ध हो जाता है ॥ ७६-७७ ॥

एवमेतत् समुद्दिष्टं प्रायश्चित्तं सनातनम् ।
ब्राह्मणस्य विशेषेण यदज्ञानेन सम्भवेत् ॥ ७८ ॥
इस प्रकार यह सनातन प्रायश्चित्त सबके लिये बताया गया है। ब्राह्मणके लिये इसका विशेषरूपसे विधान है। अनजानमें जो पाप बन जाय, उसीके लिये प्रायश्चित्त है ॥ ७८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि प्रायश्चित्तीये
पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पापोंके प्रायश्चित्तकी
विधिविषयक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ७८ १/२ श्लोक हैं)


* जिसने अग्निकी स्थापना नहीं की है, उसे 'अनाहिताग्नि' कहा जाता है। तात्पर्य यह कि उक्त दक्षिणा दिये बिना उसके द्वारा की हुई अग्निस्थापना व्यर्थ हो जाती है।

खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन

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षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

कथान्तरमथासाद्य खड्गयुद्धविशारदः ।
नकुलः शरतल्पस्थमिदमाह पितामहम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कथाप्रसङ्गकी समाप्तिके समय अवसर पाकर खड्गयुद्धविशारद नकुलने बाणशय्यापर सोये हुए पितामह भीष्मसे इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥

नकुल उवाच

धनुः प्रहरणं श्रेष्ठमतीवात्र पितामह ।
मतस्तु मम धर्मज्ञ खड्ग एव सुसंशितः ॥ २ ॥
नकुल बोले—धर्मज्ञ पितामह! यद्यपि इस जगत्में धनुष अत्यन्त श्रेष्ठ अस्त्र समझा जाता है, तथापि मुझे तो अत्यन्त तीखा खड्ग ही अच्छा जान पड़ता है ॥ २ ॥
विशीर्णे कार्मुके राजन् प्रक्षीणेषु च वाजिषु ।
खड्गेन शक्यते युद्धे साध्वात्मा परिरक्षितुम् ॥ ३ ॥
राजन्! जब धनुष टूट जाय और घोड़े भी नष्ट हो जायँ तब भी युद्धस्थलमें खड्गके द्वारा अपने शरीरकी भलीभाँति रक्षा की जा सकती है ॥ ३ ॥
शरासनधरांश्चैव गदाशक्तिधरांस्तथा ।
एकः खड्गधरो वीरः समर्थः प्रतिबाधितुम् ॥ ४ ॥
एक ही खड्गधारी वीर धनुष, गदा और शक्ति धारण करनेवाले बहुत-से योद्धाओंको बाधा देनेमें समर्थ है ॥ ४ ॥
अत्र मे संशयश्चैव कौतूहलमतीव च ।
किंस्वित् प्रहरणं श्रेष्ठं सर्वयुद्धेषु पार्थिव ॥ ५ ॥
पृथ्वीनाथ! इस विषयमें मेरे मनमें संशय और अत्यन्त कौतूहल भी हो रहा है कि सम्पूर्ण युद्धोंमें कौन-सा आयुध श्रेष्ठ है? ॥ ५ ॥
कथं चोत्पादितः खड्गः कस्मै चार्थाय केन च ।
पूर्वाचार्यं च खड्गस्य प्रब्रूहि प्रपितामह ॥ ६ ॥
पितामह! खड्गकी उत्पत्ति कैसे और किस प्रयोजनके लिये हुई? किसने इसे उत्पन्न किया? खड्गयुद्धका प्रथम आचार्य कौन था? यह सब मुझे बताइये ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्य धीमतः ।
स तु कौशलसंयुक्तं सूक्ष्मचित्रार्थसम्मतम् ॥ ७ ॥
ततस्तस्योत्तरं वाक्यं स्वरवर्णोपपादितम् ।
शिक्षया चोपपन्नाय द्रोणशिष्याय भारत ॥ ८ ॥
उवाच स तु धर्मज्ञो धनुर्वेदस्य पारगः ।
शरतल्पगतो भीष्मो नकुलाय महात्मने ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतनन्दन! जनमेजय! बुद्धिमान् माद्रीपुत्र नकुलकी वह बात कौशलयुक्त तो थी ही, सूक्ष्म तथा विचित्र अर्थसे भी सम्पन्न थी। उसे सुनकर बाणशय्यापर सोये हुए धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् धर्मज्ञ भीष्मने शिक्षाप्राप्त महामनस्वी द्रोणशिष्य नकुलको सुन्दर स्वर एवं वर्णोंसे युक्त वाणीमें इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया ॥ ७-९ ॥

भीष्म उवाच

तत्त्वं शृणुष्व माद्रेय यदेतत् परिपृच्छसि ।
प्रबोधितोऽस्मि भवता धातुमानिव पर्वतः ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा— माद्रीनन्दन! तुम जो यह प्रश्न कर रहे हो, इसका तत्त्व सुनो। मैं तो खूनसे लथपथ हो गेरूधातुसे रँगे हुए पर्वतके समान पड़ा हुआ था। तुमने यह प्रश्न करके मुझे जगा दिया ॥ १० ॥

सलिलैकार्णवं तात पुरा सर्वमभूदिदम् ।
निष्प्रकम्पमनाकाशमनिर्देश्यमहीतलम ॥ ११ ॥
तात! पूर्वकालमें यह सम्पूर्ण जगत् जलके एकमात्र महासागरके रूपमें था। उस समय इसमें कम्पन नहीं था। आकाशका पता नहीं था। भूतलका कहीं नाम भी नहीं था ॥ ११ ॥

तमसाऽऽवृतमस्पर्शमतिगम्भीरदर्शनम् ।
निःशब्दं चाप्रमेयं च तत्र जज्ञे पितामहः ॥ १२ ॥
सब कुछ अन्धकारसे आवृत था। शब्द और स्पर्शका भी अनुभव नहीं होता था। वह एकार्णव देखनेमें बड़ा गम्भीर था। उसकी कहीं सीमा नहीं थी, उसीमें पितामह ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १२ ॥

सोऽसृजद् वातमग्निं च भास्करं चापि वीर्यवान् ।
आकाशमसृजच्चोर्ध्वमधो भूमिं च नैर्ऋतीम् ॥ १३ ॥
उन शक्तिशाली पितामहने वायु, अग्नि और सूर्यकी सृष्टि की। आकाश, ऊपर, नीचे, भूमि तथा राक्षससमूहकी भी रचना की ॥ १३ ॥

नभः सचन्द्रतारं च नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा ।

संवत्सरानृतून् मासान् पक्षानथ लवान् क्षणान् ।। १४ ।। चन्द्रमा तथा तारोंसहित आकाश, नक्षत्र, ग्रह, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, लव और क्षणोंकी सृष्टि भी उन्होंने ही की ।। १४ ।।

ततः शरीरं लोकस्थं स्थापयित्वा पितामहः । जनयामास भगवान् पुत्रानुत्तमतेजसः ।। १५ ।। मरीचिमृषिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । वसिष्ठाङ्गिरसौ चोभौ रुद्रं च प्रभुमीश्वरम् ।। १६ ।। तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने लौकिक शरीर धारण करके मुनिवर मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अङ्गिरा तथा स्वभाव एवं ऐश्वर्यसे सम्पन्न रुद्र—इन तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया ।। १५-१६ ।।

प्राचेतसस्तथा दक्षः कन्याषष्टिमजीजनत् । ता वै ब्रह्मर्षयः सर्वाः प्रजार्थं प्रतिपेदिरे ।। १७ ।। प्रचेताओके पुत्र दक्षने साठ कन्याओंको जन्म दिया। उन सबको प्रजाकी उत्पत्तिके लिये ब्रह्मर्षियोंने पत्नीरूपमें प्राप्त किया ।। १७ ।।

ताभ्यो विश्वानि भूतानि देवाः पितृगणास्तथा । गन्धर्वाप्सरसश्चैव रक्षांसि विविधानि च ।। १८ ।। पतत्रिमृगमीनाश्च प्लवङ्गाश्च महोरगाः । तथा पक्षिगणाः सर्वे जलस्थलविचारिणः ।। १९ ।। उद्भिदः स्वेदजाश्चैव साण्डजाश्च जरायुजाः । जज्ञे तात जगत् सर्वं तथा स्थावरजङ्गमम् ।। २० ।। उन्हीं कन्याओंसे समस्त प्राणी, देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, नाना प्रकारके राक्षस, पशु, पक्षी, मत्स्य, वानर, बड़े-बड़े नाग, जल और स्थलमें विचरनेवाले सब प्रकारके पक्षिगण, उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज प्राणी उत्पन्न हुए। तात! इस प्रकार सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत् उत्पन्न हुआ ।। १८—२० ।।

भूतसर्गमिमं कृत्वा सर्वलोकपितामहः । शाश्वतं वेदपठितं धर्मं प्रयुयुजे ततः ।। २१ ।। सर्वलोकपितामह ब्रह्माने इन समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करके उनके ऊपर वेदोक्त सनातनधर्मके पालनका भार रखा ।। २१ ।।

तस्मिन् धर्मे स्थिता देवाः सहाचार्यपुरोहिताः । आदित्या वसवो रुद्राः ससाध्या मरुदश्विनः ।। २२ ।। आचार्य और पुरोहितगणोंसहित देवता, आदित्य, वसुगण, रुद्रगण, साध्यगण, मरुद्गण तथा अश्विनीकुमार—ये सभी उस सनातन धर्ममें प्रतिष्ठित हुए ।। २२ ।।

भृग्वत्र्यङ्गिरसः सिद्धाः काश्यपाश्च तपोधनाः ।

वसिष्ठगौतमागस्त्यास्तथा नारदपर्वतौ ॥ २३ ॥ ऋषयो वालखिल्याश्च प्रभासाः सिकतास्तथा । घृतपाः सोमवायव्या वैश्वानरमरीचिपाः ॥ २४ ॥ अकृष्टाश्चैव हंसाश्च ऋषयो वाग्नियोनयः । वानप्रस्थाः पृश्नयश्च स्थिता ब्रह्मानुशासने ॥ २५ ॥ भृगु, अत्रि और अङ्गिरा—ये सिद्ध मुनि, तपस्याके धनी काश्यपगण, वसिष्ठ, गौतम, अगस्त्य, देवर्षि नारद, पर्वत, वालखिल्य ऋषि, प्रभास, सिकत, घृतप (घी पीकर रहनेवाले), सोमप (सोमपान करनेवाले), वायव्य (वायु पीकर रहनेवाले), मरीचिप (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले) और वैश्वानर तथा अकृष्ट (बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए अन्नसे जीविका चलानेवाले), हंसमुनि (संन्यासी), अग्निसे उत्पन्न होनेवाले ऋषिगण, वानप्रस्थ और पृश्निगण—ये सभी महात्मा ब्रह्माजीकी आज्ञाके अधीन रहकर सनातनधर्मका पालन करने लगे ॥ २३-२५ ॥

दानवेन्द्रास्त्वतिक्रम्य तत् पितामहशासनम् । धर्मस्यापचयं चक्रुः क्रोधलोभसमन्विताः ॥ २६ ॥ परंतु दानवेश्वरोंने क्रोध और लोभसे युक्त हो ब्रह्माजीकी उस आज्ञाका उल्लंघन करके धर्मको हानि पहुँचाना आरम्भ किया ॥ २६ ॥

हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षो विरोचनः । शम्बरो विप्रचित्तिश्च विराधो नमुचिर्बलिः ॥ २७ ॥ एते चान्ये च बहवः सगणा दैत्यदानवाः । धर्मसेतुमतिक्रम्य रेमिरेऽधर्मनिश्चयाः ॥ २८ ॥ हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, विरोचन, शम्बर, विप्रचित्ति, विराध, नमुचि और बलि—ये तथा और भी बहुत-से दैत्य और दानव अपने दलके साथ धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करके अधर्म करनेका ही दृढ़ निश्चय लेकर आमोद-प्रमोदमें जीवन व्यतीत करने लगे ॥ २७-२८ ॥

सर्वे तुल्याभिजातीया यथा देवास्तथा वयम् । इत्येवं धर्ममास्थाय स्पर्धमानाः सुरर्षिभिः ॥ २९ ॥ वे सभी दैत्य कहते थे कि 'हम और देवता एक ही जातिके हैं; अतः जैसे देवता हैं वैसे हम हैं।' इस प्रकार जातीय धर्मका आश्रय लेकर दैत्यगण देवर्षियोंके साथ स्पर्धा रखने लगे ॥ २९ ॥

न प्रियं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत । त्रीनुपायानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधुः प्रजाः ॥ ३० ॥ भरतनन्दन! वे न तो प्राणियोंका प्रिय करते थे और न उनपर दयाभाव ही रखते थे। वे साम, दाम और भेद—इन तीनों उपायोंको लाँघकर केवल दण्डके द्वारा समस्त प्रजाओंको

पीड़ा देने लगे ॥ ३० ॥ न जग्मुः संविदं तैश्च दर्पादसुरसत्तमाः । अथ वै भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिरुपस्थितः ॥ ३१ ॥ तदा हिमवतः शृङ्गे सुरम्ये पद्मतारके । शतयोजनविस्तारे मणिरत्नचयाचिते ॥ ३२ ॥ वे असुरश्रेष्ठ घमण्डमें भरकर उन प्रजाओंके साथ बातचीत भी नहीं करते थे। तदनन्तर ब्रह्मर्षियोंसहित भगवान् ब्रह्मा हिमालयके सुरम्य शिखरपर उपस्थित हुए। वह इतना ऊँचा था कि आकाशके तारे उसपर विकसित कमलके समान जान पड़ते थे। उसका विस्तार सौ योजनका था। वह मणियों तथा रत्नसमूहोंसे व्याप्त था ॥ ३१-३२ ॥ तस्मिन् गिरिवरे पुत्र पुष्पितद्रुमकानने । तस्थौ स विबुधश्रेष्ठो ब्रह्मा लोकार्थसिद्धये ॥ ३३ ॥ बेटा नकुल! जहाँके वृक्ष और वन फूलोंसे भरे हुए थे, उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर सुरश्रेष्ठ ब्रह्माजी सम्पूर्ण जगत्का कार्य सिद्ध करनेके लिये ठहर गये ॥ ३३ ॥ ततो वर्षसहस्रान्ते वितानमकरोत् प्रभुः । विधिना कल्पदृष्टेन यथावच्चोपपादितम् ॥ ३४ ॥ ऋषिभिर्यज्ञपटुभिर्यथावत् कर्मकर्तृभिः । समिद्भिः परिसंकीर्णं दीप्यमानैश्च पावकैः ॥ ३५ ॥ काञ्चनैर्यज्ञभाण्डैश्च भ्राजिष्णुभिरलंकृतम् । वृतं देवगणैश्चैव प्रवरैर्यज्ञमण्डलम् ॥ ३६ ॥ तथा ब्रह्मर्षिभिश्चैव सदस्यैरुपशोभितम् । तदनन्तर कई सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भगवान् ब्रह्माने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार वहाँ एक यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञकुशल महर्षियों तथा अन्य कार्यकर्ताओंने यथावत् विधिके अनुसार उस यज्ञका सम्पादन किया। वहाँ यज्ञवेदियोंपर समिधाएँ फैली हुई थीं। जगह-जगह अग्निदेव प्रज्वलित हो रहे थे। चमचमाते हुए सुवर्णनिर्मित यज्ञपात्र यज्ञमण्डपकी शोभा बढ़ाते थे। वह यज्ञमण्डल श्रेष्ठ देवताओं तथा सभासद् बने हुए महर्षियोंसे सुशोभित होता था ॥ ३४-३६ १/२ ॥ तत्र घोरतमं वृत्तमृषीणां मे परिश्रुतम् ॥ ३७ ॥ चन्द्रमा विमलं व्योम यथाभ्युदिततारकम् । विकीर्याग्निं तथा भूतमुत्थितं श्रूयते तदा ॥ ३८ ॥ उस समय वहाँ एक अत्यन्त भयंकर घटना घटित हुई, जिसे मैंने ऋषियोंके मुँहसे सुना था। जैसे ताराओंके उगनेपर निर्मल आकाशमें चन्द्रमाका उदय हो, उसी प्रकार उस यज्ञमण्डपमें अग्निको इधर-उधर बिखेरकर एक भयंकर भूत प्रकट हुआ, ऐसा सुना जाता है ॥ ३७-३८ ॥