महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
गर्भके बच्चेकी हत्या करनेवाला यदि युद्धमें शस्त्रोंके आघातसे मर जाय तो उसकी शुद्धि हो जाती है अथवा प्रज्वलित अग्निमें कूदकर अपने आपको होम दे तो वह शुद्ध हो जाता है ॥ ४६ १/२ ॥
सुरापो वारुणीमुष्णां पीत्वा पापाद् विमुच्यते ॥ ४७ ॥ तया स काये निर्दग्धे मृत्युं वा प्राप्य शुद्ध्यति । लोकांश्च लभते विप्रो नान्यथा लभते हि सः ॥ ४८ ॥ मदिरा पीनेवाला पुरुष यदि मदिराको खूब गरम करके पी ले तो पापसे छुटकारा पा जाता है, अथवा उससे शरीर जल जानेके कारण उसकी मृत्यु हो जाय तो वह शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध हो जानेपर ही वह ब्राह्मण शुद्ध लोकोंको प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं ॥ ४७-४८ ॥
गुरुतल्पमधिष्ठाय दुरात्मा पापचेतनः । स्त्र्याकारां प्रतिमां लिंग्य मृत्युना सोऽभिशुद्ध्यति ॥ ४९ ॥ पापपूर्ण विचार रखनेवाला दुरात्मा पुरुष यदि गुरुपत्नी-गमनका पाप कर बैठे तो वह लोहेकी गरम की हुई नारी-प्रतिमाका आलिङ्गन करके प्राण दे देनेपर ही उस पापसे शुद्ध होता है ॥ ४९ ॥
अथवा शिश्नवृषणावादायाञ्जलिना स्वयम् ॥ ५० ॥ नैर्ऋतीं दिशमास्थाय निपतेत् स त्वजिह्मगः । ब्राह्मणार्थेऽपि वा प्राणान् संत्यजेत् तेन शुद्ध्यति ॥ ५१ ॥ अथवा अपने शिश्न और अण्डकोषको स्वयं ही काटकर अञ्जलिमें लेकर सीधे नैर्ऋत्य-दिशाकी ओर जाता हुआ गिर पड़े या ब्राह्मणके लिये प्राणोंका परित्याग कर दे तो शुद्ध हो जाता है ॥ ५०-५१ ॥
अश्वमेधेन वापीष्ट्वा अथवा गोसवेन वा । अग्निष्टोमेन वा सम्यगिह प्रेत्य च पूज्यते ॥ ५२ ॥ अथवा अश्वमेधयज्ञ, गोसव नामक यज्ञ या अग्निष्टोम यज्ञके द्वारा भलीभाँति यजन करके वह इहलोक तथा परलोकमें पूजित होता है ॥ ५२ ॥
तथैव द्वादशसमाः कपाली ब्रह्महा भवेत् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं स्वकर्म ख्यापयन् मुनिः ॥ ५३ ॥ एवं वा तपसा युक्तो ब्रह्महा सवनी भवेत् । ब्रह्महत्या करनेवाला मनुष्य उस मरे हुए ब्राह्मणकी खोपड़ी लेकर अपना पापकर्म लोगोंको सुनाता रहे और बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए सबेरे, शाम तथा दोपहर तीनों समय स्नान करे। इस प्रकार वह तपस्यामें संलग्न रहे। इससे उसकी शुद्धि हो जाती है ॥ ५३ १/२ ॥
एवं तु समभिज्ञातामात्रेयीं वा निपातयेत् ॥ ५४ ॥
द्विगुणा ब्रह्महत्या वै आत्रेयीनिधने भवेत् ।
इसी तरह जो जान-बूझकर गर्भिणी स्त्रीकी हत्या करता है; उसे उस गर्भिणी-वधके
कारण दो ब्रह्महत्याओंका पाप लगता है ।। ५४ १/२ ।।
सुरापो नियताहारो ब्रह्मचारी क्षितीशयः ।। ५५ ।।
ऊर्ध्वं त्रिभ्योऽपि वर्षेभ्यो यजेताग्निष्टुता परम् ।
ऋषभैकसहस्रं वा गा दत्त्वा शौचमाप्नुयात् ।। ५६ ।।
मदिरा पीनेवाला मनुष्य मिताहारी और ब्रह्मचारी होकर पृथ्वीपर शयन करे। इस तरह
तीन वर्षोंतक रहनेके बाद 'अग्निष्टोम' यज्ञ करे। तत्पश्चात् एक हजार बैल या इतनी ही गौएँ
ब्राह्मणोंको दान दे तो वह शुद्ध हो जाता है ।। ५५-५६ ।।
वैश्यं हत्वा तु वर्षे द्वे ऋषभैकशतं च गाः ।
शूद्रं हत्वाब्दमेवैकमृषभं च शतं च गाः ।। ५७ ।।
यदि वैश्यकी हत्या कर दे तो दो वर्षोंतक पूर्वोक्त नियमसे रहनेके बाद एक सौ बैल
और एक सौ गौओंका दान करे, तथा शूद्रकी हत्या कर देनेपर हत्यारेको एक वर्षतक
पूर्वोक्त नियमसे रहकर एक बैल और सौ गौओंका दान करना चाहिये ।। ५७ ।।
श्ववराहखरान् हत्वा शौद्रमेव व्रतं चरेत् ।
मार्जारचाषमण्डूकान् काकं व्यालं च मूषिकम् ।। ५८ ।।
उक्तः पशुसमो दोषो राजन् प्राणिनिपातनात् ।
कुत्ते, सूअर और गदहोंकी हत्या करके मनुष्य शूद्रवध-सम्बन्धी व्रतका ही आचरण करे।
राजन्! बिल्ली, नीलकण्ठ, मेढक, कौआ, साँप और चूहा आदि प्राणियोंको मारनेसे भी
उक्त पशुवधके ही समान पाप बताया गया है ।। ५८ १/२ ।।
प्रायश्चित्तान्यथान्यानि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ।। ५९ ।।
अल्पे वाप्यथ शोचेत पृथक् संवत्सरं चरेत् ।
त्रीणि श्रोत्रियभार्यायां परदारे च द्वे स्मृते ।। ६० ।।
काले चतुर्थे भुञ्जानो ब्रह्मचारी व्रती भवेत् ।
स्थानासनाभ्यां विहरेत् त्रिरह्नाभ्युपयन्नपः ।
एवमेव निराकर्ता यश्चाग्नीनपविध्यति ।। ६१ ।।
अब दूसरे प्रायश्चित्तोंका भी क्रमशः वर्णन करता हूँ। अनजानमें कीड़ों-मकोड़ोंका वध
आदि छोटा पाप हो जाय तो उसके लिये पश्चात्ताप करे। इतनेहीसे उसकी शुद्धि हो जाती
है। गोवधके सिवा अन्य जितने उपपातक हैं उनमेंसे प्रत्येकके लिये एक-एक वर्षतक
व्रतका आचरण करे। श्रोत्रियकी पत्नीसे व्यभिचार करनेपर तीन वर्षतक और अन्य
परस्त्रियोंसे समागम करनेपर दो वर्षोंतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए दिनके चौथे
पहरमें एक बार भोजन करे। अपने लिये पृथक् स्थान और आसनकी व्यवस्था रखते हुए
घूमता रहे। दिनमें तीन बार जलसे स्नान करे। ऐसा करनेसे ही वह अपने उपर्युक्त पापोंका
निवारण कर सकता है। जो अग्निको भ्रष्ट करता है, उसके लिये भी यही प्रायश्चित्त है ॥ ५९—६१ ॥
त्यजत्यकारणे यश्च पितरं मातरं गुरुम् ।
पतितः स्यात्स कौरव्य यथा धर्मेषु निश्चयः ॥ ६२ ॥
ग्रासाच्छादनमात्रं तु दद्यादिति निदर्शनम् ।
(ब्रह्मचारी द्विजेभ्यश्च दत्त्वा पापात् प्रमुच्यते ।)
कुरुनन्दन! जो अकारण ही पिता, माता और गुरुका परित्याग करता है, वह पतित हो जाता है। उसे केवल अन्न और वस्त्र दे और पैतृकसम्पत्तिसे वंचित कर दे। वह ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करते हुए ब्राह्मणोंको दान दे (और पिता-माता आदिका पूर्ववत् आदर करने लगे) तो उस पापसे मुक्त हो जाता है, यही धर्मशास्त्रोंका निर्णय है ॥ ६२½ ॥
भार्यायां व्यभिचारिण्यां निरुद्धायां विशेषतः ।
यत् पुंसः परदारेषु तदेनां चारयेद् व्रतम् ॥ ६३ ॥
यदि पत्नीने व्यभिचार किया हो और विशेषतः इस कार्यमें पकड़ ली गयी हो तो परायी स्त्रीसे व्यभिचार करनेवाले पुरुषके लिये जो प्रायश्चित्तरूप व्रत बताया गया है, वही उससे भी करावे ॥ ६३ ॥
श्रेयांसं शयनं हित्वा याऽन्यं पापं निगच्छति ।
श्वभिस्तामर्दयेद् राजा संस्थाने बहुविस्तरे ॥ ६४ ॥
जो अपने श्रेष्ठ पतिको छोड़कर अन्य पापीकी शय्यापर जाती है, उस कुलटाको अत्यन्त विस्तृत मैदानमें खड़ी करके राजा कुत्तोंसे नोचवा डाले ॥ ६४ ॥
पुमांसमुन्नयेत् प्राज्ञः शयने तप्त आयसे ।
अप्यादधीत दारूणि तत्र दह्येत पापकृत् ॥ ६५ ॥
एष दण्डो महाराज स्त्रीणां भर्तृष्वतिक्रमात् ।
संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो भवेत् ॥ ६६ ॥
द्वे तस्य त्रीणि वर्षाणि चत्वारि सहसेविनि ।
कुचरः पञ्चवर्षाणि चरेद् भैक्ष्यं मुनिव्रतः ॥ ६७ ॥
इसी तरह व्यभिचारी पुरुषको बुद्धिमान् राजा लोहेकी तपायी हुई खाटपर सुलाकर ऊपरसे लकड़ी रख दे और आग लगा दे, जिससे वह पापी उसीमें जलकर भस्म हो जाय। महाराज! पतिकी अवहेलना करके परपुरुषोंसे व्यभिचार करनेवाली स्त्रियोंके लिये भी यही दण्ड है, उपर्युक्त कहे हुएमें जिन दुष्टोंके लिये प्रायश्चित्त बताया है, उनके लिये यह भी विधान है कि एक वर्षके भीतर प्रायश्चित्त न करनेपर दुष्ट पुरुषको दूना दण्ड प्राप्त होना चाहिये। जो मनुष्य दो, तीन, चार या पाँच वर्षोंतक उस पतित पुरुषके संसर्गमें रहे, वह मुनिजनोचित व्रत धारण करके उतने ही वर्षोंतक पृथ्वीपर घूमता हुआ भिक्षावृत्तिसे जीवन-निर्वाह करे ॥ ६५—६७ ॥
परिवित्तिः परिवेत्ता या चैव परिविद्यते ।
पाणिग्राहास्त्वधर्मेण सर्वे ते पतिताः स्मृताः ।। ६८ ।।
ज्येष्ठ भाईका विवाह होनेसे पहले ही यदि छोटा भाई अधर्मपूर्वक विवाह कर ले तो
ज्येष्ठको 'परिवित्ति' कहते हैं; छोटे भाईको 'परिवेत्ता' हैं और उसकी पत्नीको जिसका
परिवेदन (ग्रहण) किया जाता है, परिवेदनीया कहते हैं-ये सब-के-सब पतित माने गये
हैं ।। ६८ ।।
चरेयुः सर्व एवैते वीरहा यद् व्रतं चरेत् ।
चान्द्रायणं चरेन्मासं कृच्छ्रं वा पापशुद्धये ।। ६९ ।।
इन तीनोंको पृथक्-पृथक् अपनी शुद्धिके लिये उसी व्रतका आचरण करना चाहिये जो
यज्ञहीन ब्राह्मणके लिये बताया गया है। अथवा एक मासतक चान्द्रायण या कृच्छ्रचान्द्रायण
व्रत करे ।। ६९ ।।
परिवेत्ता प्रयच्छेत तां स्नुषां परिवित्तये ।
ज्येष्ठेन त्वभ्यनुज्ञातो यवीयानप्यनन्तरम् ।
एवं च मोक्षमाप्नोति तौ च सा चैव धर्मतः ।। ७० ।।
परिवेत्ता पुरुष उस नववधूको पतोहूके रूपमें ज्येष्ठ भाईको सौंप दे और ज्येष्ठ भाईकी
आज्ञा मिलनेपर छोटा भाई उसे पत्नीरूपमें ग्रहण करे। ऐसा करनेपर वे तीनों धर्मके
अनुसार पापसे छुटकारा पाते हैं ।। ७० ।।
अमानुषीषु गोवर्ज्यमनावृष्टिर्न दुष्यति ।
अधिष्ठात्रवमन्तारं पशूनां पुरुषं विदुः ।। ७१ ।।
पशु जातियोंमें गौओंको छोड़कर अन्य किसीकी अनजानमें हिंसा हो जाय तो वह
दोषावह नहीं मानी जाती; क्योंकि मनुष्यको पशुओंका अधिष्ठाता एवं पालक माना गया
है ।। ७१ ।।
परिधायोर्ध्ववालं तु पात्रमादाय मृन्मयम् ।
चरेत् सप्तगृहान्नित्यं स्वकर्म परिकीर्तयन् ।। ७२ ।।
तत्रैव लब्धभोजी स्याद् द्वादशाहात्स शुद्धयति ।
चरेत् संवत्सरं चापि तद् व्रतं येन कृन्तति ।। ७३ ।।
गोवध करनेवाला पापी उस गायकी पूँछको इस प्रकार धारण करे कि उसका बाल
ऊपरकी ओर रहे। फिर मिट्टीका पात्र हाथमें लेकर प्रतिदिन सात घरोंमें भिक्षा माँगे और
अपने पापकर्मकी बात कहकर लोगोंको सुनाता रहे। उन्हीं सात घरोंकी भिक्षामें जो अन्न
मिल जाय, वही खाकर रहे। ऐसा करनेसे वह बारह दिनोंमें शुद्ध हो जाता है। यदि पाप
अधिक हो तो एक वर्षतक उस व्रतका अनुष्ठान करे, जिससे वह अपने पापको नष्ट कर
देता है ।। ७२-७३ ।।
भवेत्तु मानुषेष्वेवं प्रायश्चित्तमनुत्तमम् ।
दानं वा दानशक्तेषु सर्वमेतत् प्रकल्पयेत् ॥ ७४ ॥
इस प्रकार मनुष्योंके लिये परम उत्तम प्रायश्चित्तका विधान है। उनमें जो दान करनेमें समर्थ हों, उनके लिये दानकी भी विधि है। यह सब प्रायश्चित्त विचारपूर्वक करना चाहिये ॥ ७४ ॥
अनास्तिकेषु गोमात्रं दानमेकं प्रचक्षते ।
श्ववराहमनुष्याणां कुक्कुटस्य खरस्य च ॥ ७५ ॥
मांसं मूत्रं पुरीषं च प्राश्य संस्कारमर्हति ।
अनास्तिक पुरुषोंके लिये एक गोदानमात्र ही प्रायश्चित्त बतलाया गया है। कुत्ते, सूअर, मनुष्य, मुर्गे और गदहेके मांस और मल-मूत्र खा लेनेपर द्विजका पुनः संस्कार होना चाहिये ॥ ७५ १/२ ॥
ब्राह्मणस्तु सुरापस्य गन्धमादाय सोमपः ॥ ७६ ॥
अपस्त्र्यहं पिबेदुष्णं त्र्यहमुष्णं पयः पिबेत् ।
त्र्यहमुष्णं पयः पीत्वा वायुभक्षो भवेत् त्र्यहम् ॥ ७७ ॥
सोमपान करनेवाला ब्राह्मण यदि किसी शराबीकी गन्ध भी सूँघ ले तो वह तीन दिनोंतक गरम जल पीकर रहे, फिर तीन दिन गरम दूध पीये। तीन दिन गरम दूध पीनेके बाद तीन दिनतक केवल वायु पीकर रहे। इससे वह शुद्ध हो जाता है ॥ ७६-७७ ॥
एवमेतत् समुद्दिष्टं प्रायश्चित्तं सनातनम् ।
ब्राह्मणस्य विशेषेण यदज्ञानेन सम्भवेत् ॥ ७८ ॥
इस प्रकार यह सनातन प्रायश्चित्त सबके लिये बताया गया है। ब्राह्मणके लिये इसका विशेषरूपसे विधान है। अनजानमें जो पाप बन जाय, उसीके लिये प्रायश्चित्त है ॥ ७८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि प्रायश्चित्तीये
पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पापोंके प्रायश्चित्तकी
विधिविषयक एक सौ पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ७८ १/२ श्लोक हैं)
* जिसने अग्निकी स्थापना नहीं की है, उसे 'अनाहिताग्नि' कहा जाता है। तात्पर्य यह कि उक्त दक्षिणा दिये बिना उसके द्वारा की हुई अग्निस्थापना व्यर्थ हो जाती है।
खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
खड्गकी उत्पत्ति और प्राप्तिकी परम्पराकी महिमाका वर्णन
वैशम्पायन उवाच
कथान्तरमथासाद्य खड्गयुद्धविशारदः ।
नकुलः शरतल्पस्थमिदमाह पितामहम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कथाप्रसङ्गकी समाप्तिके समय अवसर पाकर खड्गयुद्धविशारद नकुलने बाणशय्यापर सोये हुए पितामह भीष्मसे इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥
नकुल उवाच
धनुः प्रहरणं श्रेष्ठमतीवात्र पितामह ।
मतस्तु मम धर्मज्ञ खड्ग एव सुसंशितः ॥ २ ॥
नकुल बोले—धर्मज्ञ पितामह! यद्यपि इस जगत्में धनुष अत्यन्त श्रेष्ठ अस्त्र समझा जाता है, तथापि मुझे तो अत्यन्त तीखा खड्ग ही अच्छा जान पड़ता है ॥ २ ॥
विशीर्णे कार्मुके राजन् प्रक्षीणेषु च वाजिषु ।
खड्गेन शक्यते युद्धे साध्वात्मा परिरक्षितुम् ॥ ३ ॥
राजन्! जब धनुष टूट जाय और घोड़े भी नष्ट हो जायँ तब भी युद्धस्थलमें खड्गके द्वारा अपने शरीरकी भलीभाँति रक्षा की जा सकती है ॥ ३ ॥
शरासनधरांश्चैव गदाशक्तिधरांस्तथा ।
एकः खड्गधरो वीरः समर्थः प्रतिबाधितुम् ॥ ४ ॥
एक ही खड्गधारी वीर धनुष, गदा और शक्ति धारण करनेवाले बहुत-से योद्धाओंको बाधा देनेमें समर्थ है ॥ ४ ॥
अत्र मे संशयश्चैव कौतूहलमतीव च ।
किंस्वित् प्रहरणं श्रेष्ठं सर्वयुद्धेषु पार्थिव ॥ ५ ॥
पृथ्वीनाथ! इस विषयमें मेरे मनमें संशय और अत्यन्त कौतूहल भी हो रहा है कि सम्पूर्ण युद्धोंमें कौन-सा आयुध श्रेष्ठ है? ॥ ५ ॥
कथं चोत्पादितः खड्गः कस्मै चार्थाय केन च ।
पूर्वाचार्यं च खड्गस्य प्रब्रूहि प्रपितामह ॥ ६ ॥
पितामह! खड्गकी उत्पत्ति कैसे और किस प्रयोजनके लिये हुई? किसने इसे उत्पन्न किया? खड्गयुद्धका प्रथम आचार्य कौन था? यह सब मुझे बताइये ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा माद्रीपुत्रस्य धीमतः ।
स तु कौशलसंयुक्तं सूक्ष्मचित्रार्थसम्मतम् ॥ ७ ॥
ततस्तस्योत्तरं वाक्यं स्वरवर्णोपपादितम् ।
शिक्षया चोपपन्नाय द्रोणशिष्याय भारत ॥ ८ ॥
उवाच स तु धर्मज्ञो धनुर्वेदस्य पारगः ।
शरतल्पगतो भीष्मो नकुलाय महात्मने ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतनन्दन! जनमेजय! बुद्धिमान् माद्रीपुत्र नकुलकी वह बात कौशलयुक्त तो थी ही, सूक्ष्म तथा विचित्र अर्थसे भी सम्पन्न थी। उसे सुनकर बाणशय्यापर सोये हुए धनुर्वेदके पारङ्गत विद्वान् धर्मज्ञ भीष्मने शिक्षाप्राप्त महामनस्वी द्रोणशिष्य नकुलको सुन्दर स्वर एवं वर्णोंसे युक्त वाणीमें इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया ॥ ७-९ ॥
भीष्म उवाच
तत्त्वं शृणुष्व माद्रेय यदेतत् परिपृच्छसि ।
प्रबोधितोऽस्मि भवता धातुमानिव पर्वतः ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा— माद्रीनन्दन! तुम जो यह प्रश्न कर रहे हो, इसका तत्त्व सुनो। मैं तो खूनसे लथपथ हो गेरूधातुसे रँगे हुए पर्वतके समान पड़ा हुआ था। तुमने यह प्रश्न करके मुझे जगा दिया ॥ १० ॥
सलिलैकार्णवं तात पुरा सर्वमभूदिदम् ।
निष्प्रकम्पमनाकाशमनिर्देश्यमहीतलम ॥ ११ ॥
तात! पूर्वकालमें यह सम्पूर्ण जगत् जलके एकमात्र महासागरके रूपमें था। उस समय इसमें कम्पन नहीं था। आकाशका पता नहीं था। भूतलका कहीं नाम भी नहीं था ॥ ११ ॥
तमसाऽऽवृतमस्पर्शमतिगम्भीरदर्शनम् ।
निःशब्दं चाप्रमेयं च तत्र जज्ञे पितामहः ॥ १२ ॥
सब कुछ अन्धकारसे आवृत था। शब्द और स्पर्शका भी अनुभव नहीं होता था। वह एकार्णव देखनेमें बड़ा गम्भीर था। उसकी कहीं सीमा नहीं थी, उसीमें पितामह ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ ॥ १२ ॥
सोऽसृजद् वातमग्निं च भास्करं चापि वीर्यवान् ।
आकाशमसृजच्चोर्ध्वमधो भूमिं च नैर्ऋतीम् ॥ १३ ॥
उन शक्तिशाली पितामहने वायु, अग्नि और सूर्यकी सृष्टि की। आकाश, ऊपर, नीचे, भूमि तथा राक्षससमूहकी भी रचना की ॥ १३ ॥
नभः सचन्द्रतारं च नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा ।
संवत्सरानृतून् मासान् पक्षानथ लवान् क्षणान् ।। १४ ।। चन्द्रमा तथा तारोंसहित आकाश, नक्षत्र, ग्रह, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, लव और क्षणोंकी सृष्टि भी उन्होंने ही की ।। १४ ।।
ततः शरीरं लोकस्थं स्थापयित्वा पितामहः । जनयामास भगवान् पुत्रानुत्तमतेजसः ।। १५ ।। मरीचिमृषिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । वसिष्ठाङ्गिरसौ चोभौ रुद्रं च प्रभुमीश्वरम् ।। १६ ।। तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने लौकिक शरीर धारण करके मुनिवर मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अङ्गिरा तथा स्वभाव एवं ऐश्वर्यसे सम्पन्न रुद्र—इन तेजस्वी पुत्रोंको उत्पन्न किया ।। १५-१६ ।।
प्राचेतसस्तथा दक्षः कन्याषष्टिमजीजनत् । ता वै ब्रह्मर्षयः सर्वाः प्रजार्थं प्रतिपेदिरे ।। १७ ।। प्रचेताओके पुत्र दक्षने साठ कन्याओंको जन्म दिया। उन सबको प्रजाकी उत्पत्तिके लिये ब्रह्मर्षियोंने पत्नीरूपमें प्राप्त किया ।। १७ ।।
ताभ्यो विश्वानि भूतानि देवाः पितृगणास्तथा । गन्धर्वाप्सरसश्चैव रक्षांसि विविधानि च ।। १८ ।। पतत्रिमृगमीनाश्च प्लवङ्गाश्च महोरगाः । तथा पक्षिगणाः सर्वे जलस्थलविचारिणः ।। १९ ।। उद्भिदः स्वेदजाश्चैव साण्डजाश्च जरायुजाः । जज्ञे तात जगत् सर्वं तथा स्थावरजङ्गमम् ।। २० ।। उन्हीं कन्याओंसे समस्त प्राणी, देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, नाना प्रकारके राक्षस, पशु, पक्षी, मत्स्य, वानर, बड़े-बड़े नाग, जल और स्थलमें विचरनेवाले सब प्रकारके पक्षिगण, उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज प्राणी उत्पन्न हुए। तात! इस प्रकार सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम जगत् उत्पन्न हुआ ।। १८—२० ।।
भूतसर्गमिमं कृत्वा सर्वलोकपितामहः । शाश्वतं वेदपठितं धर्मं प्रयुयुजे ततः ।। २१ ।। सर्वलोकपितामह ब्रह्माने इन समस्त प्राणियोंकी सृष्टि करके उनके ऊपर वेदोक्त सनातनधर्मके पालनका भार रखा ।। २१ ।।
तस्मिन् धर्मे स्थिता देवाः सहाचार्यपुरोहिताः । आदित्या वसवो रुद्राः ससाध्या मरुदश्विनः ।। २२ ।। आचार्य और पुरोहितगणोंसहित देवता, आदित्य, वसुगण, रुद्रगण, साध्यगण, मरुद्गण तथा अश्विनीकुमार—ये सभी उस सनातन धर्ममें प्रतिष्ठित हुए ।। २२ ।।
भृग्वत्र्यङ्गिरसः सिद्धाः काश्यपाश्च तपोधनाः ।
वसिष्ठगौतमागस्त्यास्तथा नारदपर्वतौ ॥ २३ ॥ ऋषयो वालखिल्याश्च प्रभासाः सिकतास्तथा । घृतपाः सोमवायव्या वैश्वानरमरीचिपाः ॥ २४ ॥ अकृष्टाश्चैव हंसाश्च ऋषयो वाग्नियोनयः । वानप्रस्थाः पृश्नयश्च स्थिता ब्रह्मानुशासने ॥ २५ ॥ भृगु, अत्रि और अङ्गिरा—ये सिद्ध मुनि, तपस्याके धनी काश्यपगण, वसिष्ठ, गौतम, अगस्त्य, देवर्षि नारद, पर्वत, वालखिल्य ऋषि, प्रभास, सिकत, घृतप (घी पीकर रहनेवाले), सोमप (सोमपान करनेवाले), वायव्य (वायु पीकर रहनेवाले), मरीचिप (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले) और वैश्वानर तथा अकृष्ट (बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए अन्नसे जीविका चलानेवाले), हंसमुनि (संन्यासी), अग्निसे उत्पन्न होनेवाले ऋषिगण, वानप्रस्थ और पृश्निगण—ये सभी महात्मा ब्रह्माजीकी आज्ञाके अधीन रहकर सनातनधर्मका पालन करने लगे ॥ २३-२५ ॥
दानवेन्द्रास्त्वतिक्रम्य तत् पितामहशासनम् । धर्मस्यापचयं चक्रुः क्रोधलोभसमन्विताः ॥ २६ ॥ परंतु दानवेश्वरोंने क्रोध और लोभसे युक्त हो ब्रह्माजीकी उस आज्ञाका उल्लंघन करके धर्मको हानि पहुँचाना आरम्भ किया ॥ २६ ॥
हिरण्यकशिपुश्चैव हिरण्याक्षो विरोचनः । शम्बरो विप्रचित्तिश्च विराधो नमुचिर्बलिः ॥ २७ ॥ एते चान्ये च बहवः सगणा दैत्यदानवाः । धर्मसेतुमतिक्रम्य रेमिरेऽधर्मनिश्चयाः ॥ २८ ॥ हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, विरोचन, शम्बर, विप्रचित्ति, विराध, नमुचि और बलि—ये तथा और भी बहुत-से दैत्य और दानव अपने दलके साथ धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करके अधर्म करनेका ही दृढ़ निश्चय लेकर आमोद-प्रमोदमें जीवन व्यतीत करने लगे ॥ २७-२८ ॥
सर्वे तुल्याभिजातीया यथा देवास्तथा वयम् । इत्येवं धर्ममास्थाय स्पर्धमानाः सुरर्षिभिः ॥ २९ ॥ वे सभी दैत्य कहते थे कि 'हम और देवता एक ही जातिके हैं; अतः जैसे देवता हैं वैसे हम हैं।' इस प्रकार जातीय धर्मका आश्रय लेकर दैत्यगण देवर्षियोंके साथ स्पर्धा रखने लगे ॥ २९ ॥
न प्रियं नाप्यनुक्रोशं चक्रुर्भूतेषु भारत । त्रीनुपायानतिक्रम्य दण्डेन रुरुधुः प्रजाः ॥ ३० ॥ भरतनन्दन! वे न तो प्राणियोंका प्रिय करते थे और न उनपर दयाभाव ही रखते थे। वे साम, दाम और भेद—इन तीनों उपायोंको लाँघकर केवल दण्डके द्वारा समस्त प्रजाओंको
पीड़ा देने लगे ॥ ३० ॥ न जग्मुः संविदं तैश्च दर्पादसुरसत्तमाः । अथ वै भगवान् ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिरुपस्थितः ॥ ३१ ॥ तदा हिमवतः शृङ्गे सुरम्ये पद्मतारके । शतयोजनविस्तारे मणिरत्नचयाचिते ॥ ३२ ॥ वे असुरश्रेष्ठ घमण्डमें भरकर उन प्रजाओंके साथ बातचीत भी नहीं करते थे। तदनन्तर ब्रह्मर्षियोंसहित भगवान् ब्रह्मा हिमालयके सुरम्य शिखरपर उपस्थित हुए। वह इतना ऊँचा था कि आकाशके तारे उसपर विकसित कमलके समान जान पड़ते थे। उसका विस्तार सौ योजनका था। वह मणियों तथा रत्नसमूहोंसे व्याप्त था ॥ ३१-३२ ॥ तस्मिन् गिरिवरे पुत्र पुष्पितद्रुमकानने । तस्थौ स विबुधश्रेष्ठो ब्रह्मा लोकार्थसिद्धये ॥ ३३ ॥ बेटा नकुल! जहाँके वृक्ष और वन फूलोंसे भरे हुए थे, उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर सुरश्रेष्ठ ब्रह्माजी सम्पूर्ण जगत्का कार्य सिद्ध करनेके लिये ठहर गये ॥ ३३ ॥ ततो वर्षसहस्रान्ते वितानमकरोत् प्रभुः । विधिना कल्पदृष्टेन यथावच्चोपपादितम् ॥ ३४ ॥ ऋषिभिर्यज्ञपटुभिर्यथावत् कर्मकर्तृभिः । समिद्भिः परिसंकीर्णं दीप्यमानैश्च पावकैः ॥ ३५ ॥ काञ्चनैर्यज्ञभाण्डैश्च भ्राजिष्णुभिरलंकृतम् । वृतं देवगणैश्चैव प्रवरैर्यज्ञमण्डलम् ॥ ३६ ॥ तथा ब्रह्मर्षिभिश्चैव सदस्यैरुपशोभितम् । तदनन्तर कई सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भगवान् ब्रह्माने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार वहाँ एक यज्ञ आरम्भ किया। यज्ञकुशल महर्षियों तथा अन्य कार्यकर्ताओंने यथावत् विधिके अनुसार उस यज्ञका सम्पादन किया। वहाँ यज्ञवेदियोंपर समिधाएँ फैली हुई थीं। जगह-जगह अग्निदेव प्रज्वलित हो रहे थे। चमचमाते हुए सुवर्णनिर्मित यज्ञपात्र यज्ञमण्डपकी शोभा बढ़ाते थे। वह यज्ञमण्डल श्रेष्ठ देवताओं तथा सभासद् बने हुए महर्षियोंसे सुशोभित होता था ॥ ३४-३६ १/२ ॥ तत्र घोरतमं वृत्तमृषीणां मे परिश्रुतम् ॥ ३७ ॥ चन्द्रमा विमलं व्योम यथाभ्युदिततारकम् । विकीर्याग्निं तथा भूतमुत्थितं श्रूयते तदा ॥ ३८ ॥ उस समय वहाँ एक अत्यन्त भयंकर घटना घटित हुई, जिसे मैंने ऋषियोंके मुँहसे सुना था। जैसे ताराओंके उगनेपर निर्मल आकाशमें चन्द्रमाका उदय हो, उसी प्रकार उस यज्ञमण्डपमें अग्निको इधर-उधर बिखेरकर एक भयंकर भूत प्रकट हुआ, ऐसा सुना जाता है ॥ ३७-३८ ॥
नीलोत्पलसवर्णामं तीक्ष्णदंष्ट्रं कृशोदरम् ।
प्रांशुं सुदुर्धर्षतरं तथैव ह्यमितौजसम् ॥ ३९ ॥
उसके शरीरका रंग नीलकमलके समान श्याम था, दाढ़ें अत्यन्त तीखी दिखायी देती थीं; और उसका पेट अत्यन्त कृश था। वह बहुत ऊँचा, परम दुर्धर्ष और अमित तेजस्वी जान पड़ता था ॥ ३९ ॥
तस्मिन्नुत्पतमाने च प्रचचाल वसुन्धरा ।
महोर्मिकलितावर्तश्चुक्षुभे स महोदधिः ॥ ४० ॥
उसके उत्पन्न होते ही धरती डोलने लगी, समुद्र क्षुब्ध हो उठा और उसमें उत्ताल तरंगोंके साथ भँवरें उठने लगीं ॥
पेतुरुल्का महोत्पाताः शाखाश्च मुमुचुर्द्रुमाः ।
अप्रशान्ता दिशः सर्वाः पवनश्चाशिवो ववौ ॥ ४१ ॥
आकाशसे उल्काएँ गिरने लगीं, बड़े-बड़े उत्पात प्रकट होने लगे, वृक्ष स्वयं ही अपनी शाखाओंको गिराने लगे, सम्पूर्ण दिशाएँ अशान्त हो गयीं और अमङ्गलकारी वायु प्रचण्ड वेगसे बहने लगी ॥ ४१ ॥
मुहुर्मुहुश्च भूतानि प्राव्यथन्त भयात् तथा ।
ततः स तुमुलं दृष्ट्वा तं च भूतमुपस्थितम् ॥ ४२ ॥
महर्षिसुरगन्धर्वानुवाचेदं पितामहः ।
सभी प्राणी भयके मारे बारंबार व्यथित हो उठते थे। उस भयानक भूतको उपस्थित हुआ देख पितामह ब्रह्माने महर्षियों, देवताओं तथा गन्धर्वोंसे कहा— ॥ ४२ १/२ ॥
मयैवं चिन्तितं भूतमसिर्नामैष वीर्यवान् ॥ ४३ ॥
रक्षणार्थाय लोकस्य वधाय च सुरद्विषाम् ।
‘मैंने ही इस भूतका चिन्तन किया था। यह असि नामधारी प्रबल आयुध है। इसे मैंने सम्पूर्ण जगत्की रक्षा तथा देवद्रोही असुरोंके वधके लिये प्रकट किया है ॥ ४३ १/२ ॥
ततस्तद्रूपमुत्सृज्य बभौ निस्त्रिंश एव सः ॥ ४४ ॥
विमलस्तीक्ष्णधारश्च कालान्तक इवोद्यतः ।
तत्पश्चात् वह भूत उस रूपको त्यागकर तीस अङ्गुलसे कुछ बड़े खड्गके रूपमें प्रकाशित होने लगा। उसकी धार बड़ी तीखी थी। वह चमचमाता हुआ खड्ग काल और अन्तकके समान उद्यत प्रतीत होता था ॥ ४४ १/२ ॥
ततः स शितिकण्ठाय रुद्रायर्षभकेतवे ॥ ४५ ॥
ब्रह्मा ददावसिं तीक्ष्णमधर्मप्रतिवारणम् ।
इसके बाद ब्रह्माजीने अधर्मका निवारण करनेमें समर्थ वह तीखी तलवार वृषभचिह्नित ध्वजावाले नीलकण्ठ भगवान् रुद्रको दे दी ॥ ४५ १/२ ॥
ततः स भगवान् रुद्रो महर्षिजनसंस्तुतः ॥ ४६ ॥
प्रगृह्यासिममेयात्मा रूपमन्यच्चकार ह । चतुर्बाहुः स्पृशन् मूर्ध्ना भूस्थितोऽपि दिवाकरम् ॥ ४७ ॥ उस समय महर्षिगण रुद्रदेवकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। तब अप्रमेयस्वरूप भगवान् रुद्रने वह तलवार लेकर एक-दूसरा चतुर्भुज रूप धारण किया जो भूतलपर खड़ा होकर भी अपने मस्तकसे सूर्यदेवका स्पर्श कर रहा था ॥ ४६-४७ ॥
ऊर्ध्वदृष्टिर्महालिङ्गो मुखाज्ज्वालाः समुत्सृजन् । विकुर्वन् बहुधा वर्णान् नीलपाण्डुरलोहितान् ॥ ४८ ॥ उसकी दृष्टि ऊपरकी ओर थी, वह महान् चिह्न धारण किये हुए था। मुखसे आगकी लपटें छोड़ रहा था और अपने अङ्गोंसे नील, श्वेत तथा लोहित (लाल) अनेक प्रकारके रंग प्रकट कर रहा था ॥ ४८ ॥
बिभ्रत्कृष्णाजिनं वासो हेमप्रवरतारकम् । नेत्रं चैकं ललाटेन भास्करप्रतिमं वहन् ॥ ४९ ॥ शुशुभातेऽतिविमले द्वे नेत्रे कृष्णपिङ्गले । उसने काले मृगचर्मको वस्त्रके रूपमें धारण कर रक्खा था, जिसमें सुवर्णनिर्मित तारे जड़े हुए थे। वह अपने ललाटमें सूर्यके समान एक तेजस्वी नेत्र धारण करता था। उसके सिवा काले और पिङ्गलवर्णके दो अत्यन्त निर्मल नेत्र और शोभा पा रहे थे ॥ ४९ १/२ ॥
ततो देवो महादेवः शूलपाणिर्भगाक्षिहा ॥ ५० ॥ सम्प्रगृह्य तु निस्त्रिंशं कालाग्निसमवर्चसम् । त्रिकूटं चर्म चोद्यम्य सविद्युतमिवाम्बुदम् । चचार विविधान् मार्गान् महाबलपराक्रमः ॥ ५१ ॥ विधुन्वन्नसिमाकाशे तथा युद्धचिकीर्षया । तदनन्तर भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न शूलपाणि भगवान् महादेव काल और अग्निके तुल्य तेजस्वी खड्गको तथा बिजलीसहित मेघके समान चमकीली तीन कोनोंवाली ढालको हाथमें लेकर भाँति-भाँतिके मार्गोंसे विचरने लगे; और युद्ध करनेकी इच्छासे वह तलवार आकाशमें घुमाने लगे ॥ ५०-५१ १/२ ॥
तस्य नादं विनदतो महाहासं च मुञ्चतः ॥ ५२ ॥ बभौ प्रतिभयं रूपं तदा रुद्रस्य भारत । भरतनन्दन! उस समय जोर-जोरसे गर्जते और महान् अट्टहास करते हुए रुद्रदेवका स्वरूप बड़ा भयंकर प्रतीत होता था ॥ ५२ १/२ ॥
तद्रूपधारिणं रुद्रं रौद्रकर्मचिकीर्षया ॥ ५३ ॥ निशम्य दानवाः सर्वे हृष्टाः समभिदुद्रुवुः । भयानक कर्म करनेकी इच्छासे वैसा ही रूप धारण करनेवाले रुद्रदेवको देखकर समस्त दानव हर्ष और उत्साहमें भरकर उनके ऊपर टूट पड़े ॥ ५३ १/२ ॥
अश्मभिश्चाभ्यवर्षन्त प्रदीप्तैश्च तथोल्मुकैः ।। ५४ ।। घोरैः प्रहरणैश्चान्यैः क्षुरधारैरयोमयैः । कुछ लोग पत्थर बरसाने लगे, कुछ जलते लुआठे चलाने लगे, दूसरे भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे काम लेने लगे और कितने ही लोहनिर्मित छुरोंकी तीखी धारोंसे चोट करने लगे ।। ५४ ½ ।।
ततस्तु दानवानीकं सम्प्रणेतारमच्युतम् ।। ५५ ।। रुद्रं दृष्ट्वा बलोद्धूतं प्रमुमोह चचाल च । तत्पश्चात् दानवदलने देखा कि देवसेनापतिका कार्य सँभालनेवाले उत्कट बलशाली रुद्रदेव युद्धसे पीछे नहीं हट रहे हैं, तब वे मोहित और विचलित हो उठे ।। ५५ ½ ।।
चित्रं शीघ्रपदत्वाच्च चरन्तमसिपाणिनम् ।। ५६ ।। तमेकमसुराः सर्वे सहस्रमिति मेनिरे । शीघ्रतापूर्वक पैर उठानेके कारण विचित्र गतिसे विचरण करनेवाले एकमात्र खड्गधारी रुद्रदेवको वे सब असुर सहस्रोंके समान समझने लगे ।। ५६ ½ ।।
छिन्दन् भिन्दन् रुजन् कृन्तन् दारयन् पोथयन्नपि ।। ५७ ।। अचरद् वैरिसङ्घेषु दावाग्निरिव कक्षगः । जैसे सूखी लकड़ी और घास-फूँसमें लगा हुआ दावानल वनके समस्त वृक्षोंको जला देता है, उसी प्रकार भगवान् रुद्र शत्रुसमुदायमें दैत्योंको मारते-काटते, चीरते-फाड़ते, घायल करते, छेदते तथा विदीर्ण और धराशायी करते हुए विचरने लगे ।। ५७ ½ ।।
असिवेगप्रभग्नास्ते छिन्नबाहूरुवक्षसः ।। ५८ ।। सम्पर्कीर्णान्त्रगात्राश्च पेतुरुर्व्यां महाबलाः । तलवारके वेगसे उन सबमें भगदड़ मच गयी। कितनोंकी भुजाएँ और जाँघें कट गयीं। बहुतोंके वक्षःस्थल विदीर्ण हो गये और कितनोंके शरीरोंसे आँतें बाहर निकल आयीं। इस प्रकार वे महाबली दैत्य मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ५८ ½ ।।
अपरे दानवा भग्नाः खड्गपातावपीडिताः ।। ५९ ।। अन्योन्यमभिनर्दन्तो दिशः सम्प्रतिपेदिरे । दूसरे दानव तलवारकी चोटसे पीड़ित हो भाग खड़े हुए और एक-दूसरेको डाँट बताते हुए उन्होंने सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण ली ।। ५९ ½ ।।
भूमिं केचित् प्रविविशुः पर्वतानपरे तथा ।। ६० ।। अपरे जग्मुराकाशमपरेऽम्भः समाविशन् । कितने ही धरतीमें घुस गये, बहुत-से पर्वतोंमें छिप गये, कुछ आकाशमें उड़ चले और दूसरे बहुत-से दानव पानीमें समा गये ।। ६० ½ ।।
तस्मिन् महति संवृत्ते समरे भृशदारुणे ।। ६१ ।।
बभूव भूः प्रतिभया मांसशोणितकर्दमा ।
वह अत्यन्त दारुण महान् युद्ध आरम्भ होनेपर पृथ्वीपर रक्त और मांसकी कीच जम गयी। जिससे वह अत्यन्त भयंकर प्रतीत होने लगी ।। ६१ १/२ ।।
दानवानां शरीरैश्च पतितैः शोणितोक्षितैः ।। ६२ ।।
समाकीर्णा महाबाहो शैलैरिव सकिंशुकैः ।
महाबाहो! खूनसे लथपथ होकर गिरी हुई दानवोंकी लाशोंसे ढकी हुई यह भूमि पलाशके फूलोंसे युक्त पर्वत-शिखरोंद्वारा आच्छादित-सी जान पड़ती थी ।। ६२ १/२ ।।
स रुद्रो दानवान् हत्वा कृत्वा धर्मोत्तरं जगत् ।। ६३ ।।
रौद्रं रूपमथोत्क्षिप्य चक्रे रूपं शिवं शिवः ।
दानवोंका वध करके जगत्में धर्मकी प्रधानता स्थापित करनेके पश्चात् भगवान् रुद्रदेवने उस रौद्ररूपको त्याग दिया। फिर वे कल्याणकारी शिव अपने मङ्गलमय रूपसे सुशोभित होने लगे ।। ६३ १/२ ।।
ततो महर्षयः सर्वे सर्वे देवगणास्तथा ।। ६४ ।।
जयेनाद्भुतकल्पेन देवदेवं तथार्चयन् ।
तत्पश्चात् सम्पूर्ण महर्षियों और देवताओंने उस अद्भुत विजयसे संतुष्ट हो देवाधिदेव महादेवकी पूजा की ।।
ततः स भगवान् रुद्रो दानवक्षतजोक्षितम् ।। ६५ ।।
असिं धर्मस्य गोप्तारं ददौ सत्कृत्य विष्णवे ।
तदनन्तर भगवान् रुद्रने दानवोंके खूनसे रँगे हुए उस धर्मरक्षक खड्गको बड़े सत्कारके साथ भगवान् विष्णुके हाथमें दे दिया ।। ६५ १/२ ।।
विष्णुर्मरीचये प्रादान्मरीचिर्भगवानपि ।। ६६ ।।
महर्षिभ्यो ददौ खड्गमृषयो वासवाय च ।
भगवान् विष्णुने मरीचिको, मरीचिने महर्षियोंको और महर्षियोंने इन्द्रको वह खड्ग प्रदान किया ।। ६६ १/२ ।।
महेन्द्रो लोकपालेभ्यो लोकपालास्तु पुत्रक ।। ६७ ।।
मनवे सूर्यपुत्राय ददुः खड्गं सुविस्तरम् ।
बेटा! फिर महेन्द्रने लोकपालोंको और लोकपालोंने सूर्य-पुत्र मनुको वह विशाल खड्ग दे दिया ।। ६७ १/२ ।।
ऊचुश्चैनं तथा वाक्यं मानुषाणां त्वमीश्वरः ।। ६८ ।।
असिना धर्मगर्भेण पालयस्व प्रजा इति ।
तलवार देकर उन्होंने मनुसे कहा—'तुम मनुष्योंके शासक हो; अतः इस धर्मगर्भित खड्गसे प्रजाका पालन करो ।। ६८ १/२ ।।
धर्मसेतुमतिक्रान्ताः स्थूलसूक्ष्मात्मकारणात् ।। ६९ ।।
विभज्य दण्डं रक्ष्यास्तु धर्मतो न यदृच्छया ।
दुर्वाचा निग्रहो दण्डो हिरण्यबहुलस्तथा ।। ७० ।।
व्यङ्गता च शरीरस्य वधो वानल्पकारणात् ।
असेरेतानि रूपाणि दुर्वारादीनि निर्दिशेत् ।। ७१ ।।
'जो लोग स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीरको सुख देनेके लिये धर्मकी मर्यादाका उल्लंघन करें, उन्हें न्यायपूर्वक पृथक्-पृथक् दण्ड देना। धर्मपूर्वक समस्त प्रजाकी रक्षा करना, किसीके प्रति स्वेच्छाचार न करना। कटुवचनसे अपराधीका दमन करना 'वाग्दण्ड' कहलाता है। जिसमें अपराधीसे बहुतसा सुवर्ण वसूल किया जाय, वह 'अर्थदण्ड' कहलाता है। शरीरके किसी अङ्गविशेषका छेदन करना 'काय-दण्ड' कहा गया है। किसी महान् अपराधके कारण अपराधीका जो वध किया जाता है, वह "प्राणदण्ड" के रूपमें प्रसिद्ध है। ये चारों दण्ड तलवारके दुर्निवार या दुर्धर्ष रूप हैं। यह बात समस्त प्रजाको बता देनी चाहिये ।। ६९—७१ ।।
असेरेवं प्रमाणानि परिपाल्य व्यतिक्रमात् ।
स विसृज्याथ पुत्रं स्वं प्रजानामधिपं ततः ।। ७२ ।।
मनुः प्रजानां रक्षार्थं क्षुपाय प्रददावसिम् ।
क्षुपाज्जग्राह चेक्ष्वाकुरिक्ष्वाकोश्च पुरूरवाः ।। ७३ ।।
'जब प्रजाके द्वारा धर्मका उल्लङ्घन हो जाय तो खड्गके द्वारा प्रमाणित (साधित) होनेवाले इन दण्डोंका यथायोग्य प्रयोग करके धर्मकी रक्षा करनी चाहिये।' ऐसा कहकर लोकपालोंने अपने पुत्र प्रजापालक मनुको विदा कर दिया। तत्पश्चात् मनुने प्रजाकी रक्षाके लिये वह खड्ग क्षुपको दे दिया। क्षुपसे इक्ष्वाकु और इक्ष्वाकुसे पुरूरवाने उस तलवारको ग्रहण किया ।। ७२-७३ ।।
आयुश्च तस्माल्लेभे तं नहुषश्च ततो भुवि ।
ययातिर्नहुषाच्चापि पूरुस्तस्माच्च लब्धवान् ।। ७४ ।।
पुरूरवासे आयुने, आयुसे नहुषने, नहुषसे ययातिने और ययातिसे पूरुने इस भूतलपर वह खड्ग प्राप्त किया ।। ७४ ।।
अमूर्तरयसस्तस्मात्ततो भूमिशयो नृपः ।
भरतश्चापि दौष्यन्तिर्लेभे भूमिशयादसिम् ।। ७५ ।।
पूरुसे अमूर्तरया, अमूर्तरयासे राजा भूमिशयने और भूमिशयसे दुष्यन्तकुमार भरतने उस खड्ग को ग्रहण किया ।। ७५ ।।
तस्माल्लेभे च धर्मज्ञो राजनैलविलस्तथा ।
ततस्त्वैलविलाल्लेभे धुन्धुमारो नरेश्वरः ।। ७६ ।।
राजन्! उनसे धर्मज्ञ ऐलविलने वह तलवार प्राप्त की। ऐलविलसे वह महाराज धुन्धुमारको मिली ॥ ७६ ॥
धुन्धुमाराच्च काम्बोजो मुचुकुन्दस्ततोऽलभत् ।
मुचुकुन्दान्मरुत्तश्च मरुत्तादपि रैवतः ॥ ७७ ॥
रैवताद् युवनाश्वश्च युवनाश्वात्ततो रघुः ।
इक्ष्वाकुवंशजस्तस्माद्धरिणाश्वः प्रतापवान् ॥ ७८ ॥
हरिणाश्वादसिं लेभे शुनकः शुनकादपि ।
उशीनरो वै धर्मात्मा तस्माद् भोजः स यादवः ॥ ७९ ॥
यदुभ्यश्च शिबिर्लेभे शिबेश्चापि प्रतर्दनः ।
प्रतर्दनादष्टकश्च पृषदश्वोऽष्टकादपि ॥ ८० ॥
धुन्धुमारसे काम्बोजने, काम्बोजसे मुचुकुन्दने, मुचुकुन्दसे मरुत्तने, मरुत्तसे रैवतने, रैवतसे युवनाश्वने, युवनाश्वसे इक्ष्वाकुवंशी रघुने, रघुसे प्रतापी हरिणाश्वने, हरिणाश्वसे शुनकने, शुनकसे धर्मात्मा उशीनरने, उशीनरसे यदवंशी भोजने, यदुवंशियोंसे शिबिने, शिबिसे प्रतर्दनने, प्रतर्दनसे अष्टकने तथा अष्टकसे पृषदश्वने वह तलवार प्राप्त की ॥ ७७—८० ॥
पृषदश्वाद् भरद्वाजो द्रोणस्तस्मात् कृपस्ततः ।
ततस्त्वं भ्रातृभिः सार्धं परमासिमवाप्तवान् ॥ ८१ ॥
पृषदश्वसे भरद्वाजवंशी द्रोणाचार्यने और द्रोणाचार्यसे कृपाचार्यने खड्गविद्या प्राप्त की। फिर कृपाचार्यसे भाइयों सहित तुमने उस उत्तम खड्गका उपदेश प्राप्त किया है ॥ ८१ ॥
कृत्तिकास्तस्य नक्षत्रमसेरग्निश्च दैवतम् ।
रोहिणी गोत्रमस्याथ रुद्रश्च गुरुरुत्तमः ॥ ८२ ॥
उस ‘असि’ का नक्षत्र कृत्तिका है, देवता अग्नि है, गोत्र रोहिणी है तथा उत्तम गुरु रुद्रदेव हैं ॥ ८२ ॥
असेरष्टौ हि नामानि रहस्यानि निबोध मे ।
पाण्डवेय सदा यानि कीर्तयन् लभते जयम् ॥ ८३ ॥
पाण्डुनन्दन! असिके आठ गोपनीय नाम हैं। उन्हें मेरे मुँहसे सुनो। उन नामोंका कीर्तन करनेवाला पुरुष युद्धमें विजय प्राप्त करता है ॥ ८३ ॥
असिर्विशसनः खड्गस्तीक्ष्णधारो दुरासदः ।
श्रीगर्भो विजयश्चैव धर्मपालस्तथैव च ॥ ८४ ॥
१. असि, २. विशसन, ३. खड्ग, ४. तीक्ष्णधार, ५. दुरासद, ६. श्रीगर्भ, ७. विजय और ८. धर्मपाल-ये ही वे आठ नाम हैं ॥ ८४ ॥
अग्रयः प्रहरणानां च खड्गो माद्रवतीसुत ।
महेश्वरप्रणीतश्च पुराणे निश्चयं गतः ॥ ८५ ॥
(एतानि चैव नामानि पुराणे निश्चितानि वै ।)
माद्रीनन्दन! खड्ग सब आयुधोंमें श्रेष्ठ है। भगवान् रुद्रने सबसे पहले इसका संचालन किया था। पुराणमें इसकी श्रेष्ठताका निश्चय किया गया है। उपर्युक्त सारे नाम पुराणोंमें निश्चितरूपसे कहे गये हैं॥ ८५॥
पृथूस्तूत्पादयामास धनुराद्यमरंदमः ।
तेनेयं पृथिवी दुग्धा सस्यानि सुबहून्यपि ।
धर्मेण च यथापूर्वं वैन्येन परिरक्षिता ॥ ८६ ॥
शत्रुदमन पृथुने सबसे पहले धनुषका उत्पादन किया था और उन्होंने ही इस पृथ्वीसे नाना प्रकारके शस्यों (अन्नके बीजों) का दोहन किया था। उन वेनकुमार पृथुने पहलेके ही समान धर्मपूर्वक इस पृथ्वीकी रक्षा की थी॥ ८६॥
तदेतदार्षं माद्रेय प्रमाणं कर्तुमर्हसि ।
असेश्च पूजा कर्तव्या सदा युद्धविशारदैः ॥ ८७ ॥
माद्रीनन्दन! यह ऋषियोंका बताया हुआ मत है। तुम्हें इसे प्रमाण मानकर इसपर विश्वास करना चाहिये। युद्धविशारद पुरुषोंको सदा ही खड्ग की पूजा करनी चाहिये॥ ८७॥
इत्येष प्रथमः कल्पो व्याख्यातस्ते सुविस्तरात् ।
असेरुत्पत्तिसंसर्गो यथावद् भरतर्षभ ॥ ८८ ॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने असि (खड्ग) की उत्पत्ति का प्रसङ्ग तुम्हें विस्तारपूर्वक और यथावत्रूपसे बताया है। इससे यह सिद्ध हुआ कि खड्ग ही आयुधोंमें सबसे प्रथम प्रकट हुआ है॥ ८८॥
सर्वथैतदिदं श्रुत्वा खड्गसाधनमुत्तमम् ।
लभते पुरुषः कीर्तिं प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ८९ ॥
खड्गप्राप्तिका यह उत्तम प्रसङ्ग सब प्रकारसे सुनकर पुरुष इस संसारमें कीर्ति पाता है और देहत्यागके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है॥ ८९॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि खड्गोत्पत्तिकथने
षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ॥
इस प्रकार श्रीमद्भारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें खड्गकी उत्पत्तिका कथनविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६६॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ½ श्लोक मिलाकर कुल ८९½ श्लोक हैं)
धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय
सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
धर्म, अर्थ और कामके विषयमें विदुर तथा पाण्डवोंके पृथक्-पृथक् विचार तथा अन्तमें युधिष्ठिरका निर्णय
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तवति भीष्मे तु तूष्णींभूते युधिष्ठिरः ।
पप्रच्छावसथं गत्वा भ्रातॄन् विदुरपञ्चमान् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह कहकर जब भीष्मजी चुप हो गये, तब राजा युधिष्ठिरने घर जाकर अपने चारों भाइयों तथा पाँचवें विदुरजीसे प्रश्न किया— ॥ १ ॥
धर्मे चार्थे च कामे च लोकवृत्तिः समाहिता ।
तेषां गरीयान् कतमो मध्यमः को लघुश्च कः ॥ २ ॥
'लोगोंकी प्रवृत्ति प्रायः धर्म, अर्थ और कामकी ओर होती है। इन तीनोंमें कौन सबसे श्रेष्ठ, कौन मध्यम और कौन लघु है?' ॥ २ ॥
कस्मिंश्चात्मा निधातव्यस्त्रिवर्गविजयाय वै ।
संहृष्टा नैष्ठिकं वाक्यं यथावद् वक्तुमर्हथ ॥ ३ ॥
'इन तीनोंपर विजय पानेके लिये विशेषतः किसमें मन लगाना चाहिये। आप सब लोग हर्ष और उत्साहके साथ इस प्रश्नका यथावत्रूपसे उत्तर दें और वही बात कहें, जिसपर आपकी पूरी आस्था हो' ॥ ३ ॥
ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः प्रथमं प्रतिभानवान् ।
जगाद विदुरो वाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन् ॥ ४ ॥
तब अर्थकी गति और तत्त्वको जाननेवाले प्रतिभाशाली विदुरजीने धर्मशास्त्रका स्मरण करके सबसे पहले कहना आरम्भ किया ॥ ४ ॥
विदुर उवाच
बाहुश्रुत्यं तपस्त्यागः श्रद्धा यज्ञक्रिया क्षमा ।
भावशुद्धिर्दया सत्यं संयमश्चात्मसम्पदः ॥ ५ ॥
**विदुरजी बोले—**राजन्! बहुत-से शास्त्रोंका अनुशीलन, तपस्या, त्याग, श्रद्धा, यज्ञकर्म, क्षमा, भावशुद्धि, दया, सत्य और संयम—ये सब आत्माकी सम्पत्ति हैं ॥ ५ ॥
एतदेवाभिपद्यस्व मा तेऽभूच्चलितं मनः ।
एतन्मूलौ हि धर्मार्थावेतदेकपदं हि मे ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! तुम इन्हींको प्राप्त करो। इनकी ओरसे तुम्हारा मन विचलित नहीं होना चाहिये। धर्म और अर्थकी जड़ ये ही हैं। मेरे मतमें ये ही परम पद हैं ।। ६ ।।
धर्मेणैवर्षयस्तीर्णा धर्मे लोकाः प्रतिष्ठिताः ।
धर्मेण देवा ववृधुर्धर्मे चार्थः समाहितः ।। ७ ।।
धर्मसे ही ऋषियोंने संसार-समुद्रको पार किया है। धर्मपर ही सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं। धर्मसे ही देवताओंकी उन्नति हुई है और धर्ममें ही अर्थकी भी स्थिति है ।। ७ ।।
धर्मो राजन् गुणः श्रेष्ठो मध्यमो ह्यर्थ उच्यते ।
कामो यवीयानिति च प्रवदन्ति मनीषिणः ।। ८ ।।
राजन्! धर्म ही श्रेष्ठ गुण है, अर्थको मध्यम बताया जाता है और काम सबकी अपेक्षा लघु है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ।। ८ ।।
तस्माद् धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मना ।
तथा च सर्वभूतेषु वर्तितव्यं यथात्मनि ।। ९ ।।
अतः मनको वशमें करके धर्मको अपना प्रधान ध्येय बनाना चाहिये और सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये, जैसा हम अपने लिये चाहते हैं ।। ९ ।।
वैशम्पायन उवाच
समाप्तवचने तस्मिन्नर्थशास्त्रविशारदः ।
पार्थो धर्मार्थतत्त्वज्ञो जगौ वाक्यं प्रचोदितः ।। १० ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! विदुरजीकी बात समाप्त होनेपर धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले अर्थशास्त्रविशारद अर्जुनने युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर कहा ।।
अर्जुन उवाच
कर्मभूमिरियं राजन्निह वार्ता प्रशस्यते ।
कृषिर्वाणिज्यगोरक्षं शिल्पानि विविधानि च ।। ११ ।।
**अर्जुन बोले—**राजन्! यह कर्म-भूमि है। यहाँ जीविकाके साधनभूत कर्मोंकी ही प्रशंसा होती है। खेती, व्यापार, गोपालन तथा भाँति-भाँतिके शिल्प—ये सब अर्थप्राप्तिके साधन हैं ।। ११ ।।
अर्थ इत्येव सर्वेषां कर्मणामव्यतिक्रमः ।
न ह्यृतेऽर्थेन वर्तेते धर्मकामाविति श्रुतिः ।। १२ ।।
अर्थ ही समस्त कर्मोंकी मर्यादाके पालनमें सहायक है। अर्थके बिना धर्म और काम भी सिद्ध नहीं होते—ऐसा श्रुतिका कथन है ।। १२ ।।
विषयैरर्थवान् धर्ममाराधयितुमुत्तमम् ।
कामं च चरितुं शक्तो दुष्प्रापमकृतात्मभिः ।। १३ ।।
धनवान् मनुष्य धनके द्वारा उत्तम धर्मका पालन और अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये दुर्लभ कामनाओंकी प्राप्ति कर सकता है ॥ १३ ॥ अर्थस्यावयवावेतौ धर्मकामाविति श्रुतिः । अर्थसिद्ध्या विनिर्वृत्तावुभावेतौ भविष्यतः ॥ १४ ॥ श्रुतिका कथन है कि धर्म और काम अर्थके ही दो अवयव हैं। अर्थकी सिद्धिसे उन दोनोंकी भी सिद्धि हो जायगी ॥ १४ ॥ तद्गतार्थं हि पुरुषं विशिष्टतरयोनयः । ब्रह्माणमिव भूतानि सततं पर्युपासते ॥ १५ ॥ जैसे सब प्राणी सदा ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार उत्तम जातिके मनुष्य भी सदा धनवान् पुरुषकी उपासना किया करते हैं ॥ १५ ॥ जटाजिनधरा दान्ताः पङ्कदिग्धा जितेन्द्रियाः । मुण्डा निस्तन्तवश्चापि वसन्त्यर्थार्थिनः पृथक् ॥ १६ ॥ जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले जितेन्द्रिय संयतचित्त शरीरमें पंक धारण किये मुण्डितमस्तक नैष्ठिक ब्रह्मचारी भी अर्थकी अभिलाषा रखकर पृथक्-पृथक् निवास करते हैं ॥ १६ ॥ काषायवसनाश्चान्ये श्मश्रुला ह्रीनिषेविणः । विद्वांसश्चैव शान्ताश्च मुक्ताः सर्वपरिग्रहैः ॥ १७ ॥ अर्थार्थिनः सन्ति केचिदपरे स्वर्गकांक्षिणः । कुलप्रत्यागमाश्चैके स्वं स्वं धर्ममनुष्ठिताः ॥ १८ ॥ सब प्रकारके संग्रहसे रहित, संकोचशील, शान्त, गेरुआ वस्त्रधारी, दाढ़ी-मूँछ बढ़ाये विद्वान् पुरुष भी धनकी अभिलाषा करते देखे गये हैं। कुछ दूसरे प्रकारके ऐसे लोग हैं जो स्वर्ग पानेकी इच्छा रखते हैं; और कुलपरम्परागत नियमोंका पालन करते हुए अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके धर्मोंका अनुष्ठान कर रहे हैं; किंतु वे भी धनकी इच्छा रखते हैं ॥ १७-१८ ॥ आस्तिका नास्तिकाश्चैव नियताः संयमे परे । अप्रज्ञानं तमोभूतं प्रज्ञानं तु प्रकाशिता ॥ १९ ॥ दूसरे बहुत-से आस्तिक-नास्तिक संयम नियम-परायण पुरुष हैं जो अर्थके इच्छुक होते हैं। अर्थकी प्रधानताको न जानना तमोमय अज्ञान है। अर्थकी प्रधानताका ज्ञान प्रकाशमय है ॥ १९ ॥ भृत्यान् भोगैर्द्विषो दण्डैर्यो योजयति सोऽर्थवान् । एतन्मतिमतां श्रेष्ठ मतं मम यथातथम् । अनयोस्तु निबोध त्वं वचनं वाक्यकण्ठयोः ॥ २० ॥